हिन्दी साहित्य – कविता ☆ – रिश्ता… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता रिश्ता…।)

☆ कविता – रिश्ता… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

एक अजीब सा रिश्ता है,

मेरे तुम्हारे बीच में,

जिसका कोई नाम नहीं है,

कोई नाम हो ही नहीं सकता,                   

कोई नाम दिया ही नहीं गया,

नाम देना चाहे तो क्या नाम दें ?

आकर्षण, प्रेम, लगाव या क्या?

 

नाम कोई भी हो मगर एक,

अनाम रिश्ते की डोर बंधी है,

अटूट, अलौकिक, अकथनीय,

महसूस कराती हमारे बीच, 

दिल का स्पंदन, सांसों का बंधन, 

एक दूसरे की फिक्र,

एक दूसरे का जिक्र,

मिलने की चाहत,

ना बिछड़ने की हसरत,

एक अनजान सा रिश्ता,

अनोखा अनाम सा रिश्ता,

तुम ही बताओ क्या नाम दें?

बेनाम रिश्ते को क्या नाम दें?

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 595 ⇒ शहद की मधुमक्खी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शहद की मधुमक्खी।)

?अभी अभी # 595 ⇒ शहद की मधुमक्खी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कबीर यूँ तो जुलाहे थे, लेकिन जब दुहते थे, तो दोहे निकलते थे।

माखी गुड़ में गड़ी रहे, पंख रह्यो लिपटाय।

हाथ मले और सर धुने, लालच बुरी बलाय।

कबीरदासजी जिस मक्खी की बात कर रहे हैं, वह पहले तो गंदगी पर बैठती है, और बाद में गुड़ की ढेली पर। यह मक्खी बीमारियों की जड़ है। यह BPL माने बिलो पॉवर्टी लाइन वाली मक्खी है। हम जिस मक्खी की बात आज कर रहे हैं, वह मधु की मक्खी याने क्रीमी लेयर वाली मक्खी है।।

यह न तो गंदे में बैठती है, न ही गुड़ से इसे कोई विशेष प्रेम है। यह अपने आप में शहद की एक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है। यह एक रसिक भँवरे की तरह फूलों से परागकण एकत्रित करके शहद का थोक में उत्पादन करती है। लोभी भँवरों की तरह आदमी भी शहद के लालच में इसे पालने लग गया है, और उस लालन-पालन का उसने नाम रखा है, मधुमक्खी पालन।

मक्खी में भी ढाई आखर ही होते हैं, लेकिन मक्खियों से कोई प्रेम नहीं करता। मधुमक्खी में ढाई आखर नहीं है, लेकिन शहद के लालच में इंसान इससे प्रेम करता है। मक्खी से ज़्यादा लालची तो इंसान ही हुआ न।।

जंगलों में, बड़े बड़े वृक्षों के तनों में, पुरानी विशाल इमारतों के वे अंधेरे कोने, जहाँ जीरो मेंटेनेंस होता है, मधुमक्खी पहले मोम के छत्ते बनाती है, और फिर उसमें शहद का निर्माण करती है। फूलों के रस से शहद के निर्माण की यह प्रक्रिया बड़ी रोचक, विचित्र और प्रेरणादायक है। आश्चर्यजनक रूप से एक रानी मधुमक्खी और उसकी श्रमिक मधुमक्खी ही यह पूरा कारोबार संभालती है और नर को निखट्टू कहा जाता है।

जहाँ उत्पादन अधिक होता है, वहाँ परिवार नियोजन का कोई प्रयोजन नहीं। रानी मधुमक्खी निखट्टू नर की सहायता से एक दिन में 1500 अंडे दे देती है, जिनका पालन श्रमिक मधमक्खियों को ही करना पड़ता है। पहले मोम का छत्ता बनाना, और फिर फूलों से मधु निकाल छत्तों में एकत्रित करना। कौन जानता है, यह कर्म सकाम है या निष्काम।।

प्रकृति के आँचल में खनिज है, खाद्यान्न है, सब जीव जंतुओं के लिए राशन पानी है, हवा है, धूप है, पानी है। पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए जंगलों का अस्तित्व अवश्यम्भावी है।

प्रोजेक्ट टाइगर ! यानी प्रोटेक्ट टाइगर और प्रोटेक्ट जंगल। एनिमल किंगडम, ह्यूमन किंगडम से अधिक मूल्यवान है। हम मुँह उठाए मौज मस्ती और मनोरंजन के लिए वन में चले जाते हैं, वनचर हमारी बस्ती में भूले भटके ही आते हैं, और जब भी आते हैं, मुँह की खाते हैं।।

गुलाब में काँटे होते हैं, शहद पैदा करने वाली मधुमक्खी भी डंक मारती है। देवता अमृतपान करते हैं, शंकर गरल को धारण कर नीलकंठ कहलाते हैं। शहद के छत्तों की रक्षा के लिए ही शायद प्रकृति ने इन मधु मक्खियों को डंक हथियार के रूप में दिए हैं। हम प्रेम से शहद चाटते हैं, और मधुमक्खी काटे, तो भागते हैं।

जब भी आप नींबू-शहद का सेवन करें, इनके उपकार को न भूलें। आयुर्वेदिक उपचार में दवाओं का सेवन शहद के साथ ही किया जाता है। पृथ्वी पर अगर कहीं अमृत है, तो वह शहद ही में है। शहद ही में है। मधुमक्खी तुम धन्य हो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ विश्व पुस्तक मेले में बाल साहित्य को मिला प्रतिनिधित्व – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश करेंगे शिरकत ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ विश्व पुस्तक मेले में बाल साहित्य को मिला प्रतिनिधित्व –  श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश करेंगे शिरकत ☆

नई दिल्ली: (निप्र)। विश्व पुस्तक मेले के प्रगति मैदान के भारत मंडपम में लेखक मंच का कार्यक्रम नियमित रूप से संचालित होता है। जिसमें देश भर से पधारे हुए और आमंत्रित साहित्यकार भाग लेते हैं। इसी तारतम्य में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास नई दिल्ली द्वारा आयोजित 9 फरवरी 2025 को 12:00 बजे, आज के युवाओं की एक ज्वलंत समस्या पर एक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस आयोजित कार्यक्रम में प्रसिद्ध बाल साहित्यकार ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ भी शिरकत करेंगे। जिसका विषय है- सोशल मीडिया के युग में बाल एवं युवा साहित्य का बदलता स्वरूप। जिसमें बाल साहित्यकार क्षत्रिय जी,  बाल और युवा के बदलते साहित्य के स्वरूप पर अपनी बात रखेंगे। स्मरण रहे कि इस पैनल-चर्चा में देश भर के कई जानेमाने साहित्यकार भी भाग लेंगे। जिनमें श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेयी, सुश्री अनीता चाँद, श्री ओम प्रकाश क्षत्रिय, सुश्री तरुणा पुंडीर, डॉ नीतू सिंह राय जी प्रमुख हैं।

इस कार्यक्रम का संयोजन एशियन लिटरेचर समिति द्वारा किया जा रहा है। जिसका प्रसारण भारत सरकार द्वारा विभिन्न माध्यम से किया जाएगा।

💐 ई- अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ जी को इस विशिष्ट उप्लब्धि के लिए हार्दिक बधाई 💐

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ शोध… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ शोध ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

शोधून सापडेना आनंद हरवलेला

गुंता कसा सुटेना गुंत्यात गुंतलेला

 *

नाजूक बंधनानी हळव्या व्यथा पुरवल्या

आहेच जाच त्यांचा पदरास बांधलेला

 *

सोडून सर्व काही झालो फकीर आता

झोळीत माल भरला नाहीच संपलेला

 *

वैराग्य मिरवताना दडपून जीव जातो

उरतो मनात मागे संसार भोगलेला

 *

आदर्श जीवनाचे चुकते गणीत तेव्हा

छळतो तना मनाला अंधार दाटलेला

 *

जगणे जगावयाचे साधे सुबोध नाही

असते शिवावयाचा अंदाज फाटलेला

 *

जगण्यास लागणारा आधार मागण्याला

माणूस माणसाने असतोच शोधलेला

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ हे शब्द अंतरीचे # 201 ☆ कपाट… ☆ महंत कवी राज शास्त्री ☆

महंत कवी राज शास्त्री

?  हे शब्द अंतरीचे # 201 ? 

☆ कपाट… ☆ महंत कवी राज शास्त्री ☆

बंद कपाटाच्या ओठांवर

श्वास कुठला गुंतला आहे?

स्मृतींच्या धुळकट पानावर

विस्मृतीचा तुटला भाव आहे.!!

 

उघडले की वास जुना

काही गुपित सांडलेले

आठवणींची पत्रे जुनी

काळजाच्या घडीत गुंफलेले.!!

 

कधी पुस्तकांची गर्दी

कधी कपड्यांची शिस्त

पण आत कुठेतरी लपली

न पाळलेल्या कर्तव्याची भिस्त.!!

 

कधीतरी हात फिरवताना

एखादा स्वप्नमेख लागतो

बंद दाराआड दडलेला

काल पुन्हा हुंदका देतो.!!

 

कपाट म्हणजे केवळ सामान

का काळाचा एक ठेवा?

उघडले तर आठवणींचा सागर

बंद केले तर मौनाचा मेवा.!!

 

काळवंडले जुने कपाट

स्तब्ध उभा कविराज

पाहुनी त्याची ही व्यथा

हलला अंतःकरणाचा राज!

© कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन, वर्धा रोड नागपूर – 440005

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ हेचि दान देगा देवा… कवी : संत तुकाराम ☆ रसग्रहण – सौ. वृंदा गंभीर ☆

सौ. वृंदा गंभीर

? काव्यानंद ?

☆ हेचि दान देगा देवा… कवी : संत तुकाराम ☆ रसग्रहण – सौ. वृंदा गंभीर 

हेचि दान देगा देवा तुझा विसर न व्हावा..

गुण गाईन आवडी हेचि माझी सर्व जोडी..

नलगे मुक्ति धन संपदा. संतसंग देई सदा..

तुका म्हणे गर्भवासी सुखे घालावे आम्हासी..

हेची दान दे गा देवा तुझा विसर न व्हावा

जगद्गुरू तुकाराम महाराज म्हणतात देवा एक दान दे किंवा वरदान दे तुझा विसर कधी पडू देऊ नको.

मानव जन्म आला कि व्याप हाल अपेष्टा आल्याचं संसार आलाच कष्ट आलेच… संसारात गुंतून न राहता तुझी आठवण कायम असू दे तुझे गोड नाम मुखात असू दे दुसरं काही नको…

अमृताहूनी गोड नाम तुझे देवा

देवा तुझे नाम अमृताहून गोड आहे तुझ्या नामात शक्ती आहे तुझे नाम म्हणजे सत्य आहे. योग्य मार्ग आहे तेंव्हा देवा तुझा विसर पडू देऊ नको.

गुण गाईन आवडी हेची माझी सर्व जोडी

तुझे गुण मी आवडीने गाईन सत्कर्म करत राहील तुझे नाम अतिप्रिय आहे तुझं विस्मरण मी कधी होऊ देणार नाही देवा तू नेहमीच स्मरणात असावास म्हणून मी तुझे गोड गुणगान गात राहील.

घरादार मुलं बाळ धन संपदा जोडण्यापेक्षा मी पुण्य जोडत राहील धन जमा करण्याच्या नादात तुझा विसर पडतो तुझे कार्याचा विसर पडतो.

मानव जन्म मिळून पण जीवनाचे सार्थक करता येत नाही नाशिवंत सुखाच्या मागे धावून शाश्वत सुख विसरतो शाश्वत सुख तुझ्या नामात आहे म्हणून मी तुझ्या नामाशी जोडला जाणार आहे.

जीवनात अध्यात्मिक सुख पाहिजे कलियुगात भौतिक सुखाच्या मागे लागून दुःख प्राप्त होतं आणि तुझा विसर पडतो.

मला हे सुख नको आहे मला शाश्वत सुख जोडायचं आहे.

न लगे मुक्ती धन संपदा संत संग देई सदा

मला धन नकोय मुक्ती नकोय संतांची संगत हवी आहे.

मुक्ती मिळाली तर मी तुझ्या पासून लांब जाईल मला पुन्हा पुन्हा मानव जन्म दे मी तुझे गुणगान गाईल तुझी सेवा करत राहील.

तुझी सेवा घडावी म्हणून मला संतांची संगत दे संत सहवासात राहूदे * गुरु असावा महाज्ञानी गुरु महाज्ञानी असेलतर जीवनात मार्ग सापडतो म्हणून संत संगत दे… 

सुसंगतीने सुविचार प्राप्त होतात तर कुसंगतीने जीवन बरबाद होतं.

संगत जशी असेल तसं जीवन घडत असतं. जीवन सार्थकी लावायचे असेलतर संत संग आवश्यक आहे.

देवा, हे पांडुरंगा मला फक्त संत संग दे धन नको मुक्ती नको भक्ती दे.

तुका म्हणे गर्भवासी सुखे घालावे आम्हीसी

तुकाराम महाराज म्हणतात आता सुखाने जाऊदे गर्भातून तुझी सेवा करण्यासाठी आलो होतो आता तुझी सेवा झाली माझे कार्य संपले आहे. तेंव्हा देवा मला आनंदात स्वर्गसूख मिळूदे जिथे फक्त तुझे चरण असतील.

“गर्भात असताना सोहंम सोहंम जप होतो, बाहेर आल्यावर कोहम कोहम सुरु होतं.

कोहम, म्हणजे का आणलंस तू इथे मला का दूर केल तुझ्यापासून ही आर्त हाक असते बाळाची.

म्हणून महाराज म्हणतात गर्भवासी होतो आता सुखाने स्वर्गवासी होऊ दे शेवटचा दिवस गोड व्हावा

जिथे नामस्मरण चालू असते तिथे देव नक्कीच भेटतो.

मुखी नाम हाती काम

© सौ. वृंदा पंकज गंभीर (दत्तकन्या)

न-हे, पुणे. – मो न. 8799843148

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “शाळा सुटणारी मुले अर्थात गळती” ☆ सुश्री शीला पतकी ☆

सुश्री शीला पतकी 

🌸 विविधा 🌸 

☆ “शाळा सुटणारी मुले अर्थात गळती” ☆ सुश्री शीला पतकी 

दहावी काय कोणत्याही टप्प्यावर नापास झाले की मुले शाळा सोडतात पालकांना काहीच प्रॉब्लेम नसतात कारण दहा वर्षाचा मुलगा चहाच्या गाडीवर काम करून रोज शंभर रुपये मिळवतो शिवाय त्याचा चहा नाश्ता तिथेच चालतो म्हणजे तो खर्च नाही झोपडपट्टीतल्या पालकाकडे शंभर रुपये रोज मुलामुळे मिळतात मग ही मुलं शिक्षण नाही योग्य मार्गदर्शन नाही नको त्या वयात पैसा हातात त्यामुळे व्यसनाधीन होऊन बिघडतात

दुसरा मुद्दा म्हणजे आता सर्वच पालकांना इंग्रजी माध्यमाचे वेड लागले आहे. ऐपत नाही आर्थिक, घरामध्ये कोणतेही वातावरण नाही आणि सगळ्या घराने राबून विनाकारण एका मुलासाठी इंग्रजी माध्यमाचे पैसे भरत बसायचे.. त्याला ते झेपत नाही तो एखाद्या तुकडीत वारंवार नापास होतो आणि शाळा सुटते ती कायमची.. !या सगळ्यावर सरकारने एकच उपाय काढला तो म्हणजे नापासच करावयाचे नाही! त्यामुळे शिक्षणाचा स्तर खालावला परीक्षाच नाही म्हणल्यावर मुले कशाला अभ्यास करणार? शेवटी परीक्षा हा एक धाक होता.. मुलांनी अभ्यास करायला तोच मुळी संपला. शिक्षकही निवांत झाले… पण आम्ही शिकवत होतो त्यावेळेला एक मार्कही वाढवून देत नसू त्यामुळे मुलांना कसून तयार करून घेणे आणि आपल्या वर्गाचा निकाल उत्तम लावणे हे आमचे कामच होते पहिल्या वर्षी जेव्हा चौथीतल्या नापास मुलांनाही पाचवी ढकलण्यात आल तेव्हा माझ्या असे लक्षात आले की सहावीत आल्यावर या मुलींना वाचता येत नव्हते लिहिता येत नव्हते शेवटी मी त्यांचा एक स्वतंत्र वर्ग पाच तुकड्यातून तयार केला आणि त्या वर्गाला पूर्ण पहिली टर्म फक्त लिहायला आणि वाचायला शिकवायचे प्रत्येक शिक्षक आणि मग मराठीचा असो इंग्रजीचा असो गणिता चा… गणित शिक्षकाने पाढे पक्के करून घ्यायचे बेरीज वजाबाकी गुणाकार आणि भागाकार या चार क्रिया शिकवायच्या. इंग्रजी शिक्षकाने एबीसीडी आणि काही शब्द स्पेलिंग साठी त्यांना दिले होतेते शिकवावयाचे आम्ही हे सिल्याबस अभ्यास करून तयार केले होते परिणाम असा झाला की सहावीच्या दुसऱ्या सत्रात ही मुले अभ्यासू तर झालीच आव्हान स्वीकारायला तयार झाली. आपल्यासाठी कोणी विशेष राबत आहे या भावनेने प्रेरित झाली! पालकांची सभा घेऊन त्यांनाही वेळीच जाणिव दिली तेही थोडे बहुत सतर्क झाले आणि शेवटी या वर्गाचा निकाल शंभर टक्के आणि उत्तम लागला केवळ दहावीला प्रयत्न करून चालत नाही हे शिक्षकांना कोण सांगणार?( त्या नाही शिक्षणाचे फालतू कामे आहेतच आणि त्याचा ताणही आहे )पण असे काही वेगळे होण्यापेक्षा 35 पर्यंत आणून त्या मुलाला पास करण्याचा सपाटा बोर्डाने चालवलाच आहे वीस मार्गाच्या कुबड्या दिल्या मग उरले किती पंधरा मार्क.. पेपरच असे काढले की प्रश्नपत्रिकेच्या पहिल्याच पानात त्याला 15 मार्क पडतात. दहावीच्या परीक्षेला प्रश्न गाळलेल्या जागा, जोड्या लावा, वेगळा घटक ओळखा अशा फुटकळ प्रश्नांनी त्याला सहजच 20 मार्क मिळू लागले परीक्षकांचे कष्ट वाचले… नाहीतर परीक्षकांना सूचना 15 पर्यंत आलेल्या मुलाला वीस पर्यंत आणा वीस पर्यंत आलेल्या मुलाला 25 पर्यंत न्या आणि मग मॉडरेटर पर्यंत त्या मुलाला 35 मार्क मिळून जातात ही वाढवा वाढवी झाल्यामुळे मुलाला प्रत्यक्षात काहीही येत नाही आणि आपण स्वतःची त्या मुलाची पालकांची शाळेची आणि एकूण समाजव्यवस्थेची फसवणूक करीत आहोत. याकरता सर्वात महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे प्रत्येक टप्प्यावर उत्तम समुपदेशक हवेत नेमके काय खरे आहे याची जाणीव त्या विद्यार्थ्याला झाली पाहिजे त्याला प्रेरणा मिळाली पाहिजे त्याला त्याला वेगवेगळ्या लोकांच्या कथा सांगितल्या पाहिजेत नकारातून स्वीकाराकडे कसे जाता येते या वाटा त्यांना कळल्या पाहिजेत आम्ही आपलं काहीच करीत नाही 35 मिनिटांचा तास संपला की शिक्षकांचे त्या वर्गाप्रती काही देणे लागत नाही शिक्षक फक्त जबाबदार आहेत असे नाही पालक विद्यार्थ्यांना रोज शाळेत पाठवत नाही हे दुःख आहे मग कधी मध्ये शाळेत येणारे विद्यार्थी शाळेत रमत नाही बर शाळेत सगळेच फुकट मिळत असल्याने पालक राखोळी घातल्यासारखा विद्यार्थी शाळेत पाठवतात विद्यार्थ्यांनाही सगळे फुकट मिळत असल्यामुळे कसलीच जाण नाही पालकांच्या खिशाला तोशिष पडत नाही त्यामुळे शाळा म्हणजे गंमत झाली! शाळेमध्ये सध्या फक्त नाच गाणे चालू आहे कॅसेट लावून नाचणे नाटक तर संपतच आले नवीन क्रिएटिव्हिटी ला वाव नाही स्वतः काही लिहत नाहीत विज्ञानाला तर काहीच व्हॅल्यू नाही मुळात विज्ञान शिक्षक विज्ञान दृष्टिकोन असणारा असत नाही खेडेगावात तर अंधश्रद्धा दूर करा असे सांगणारे शिक्षक नवस फेडायला रजा घेऊन निघालेले दिसतात हे दुर्दैव आहे.. याच्या वरती विचार करायला कमिट्या ह्या थोरामोठ्यांच्या त्यात अनुभवी शिक्षकांचा समावेश नसतो त्यामुळे तोडगे भलतेच निघतात आणि सर्वात शेवटी महत्वाचे म्हणजे शिक्षणाने धड माणूस घडत नाही धड कर्मचारी घडत नाही तिथे काही वेगळ्याच परीक्षा असतात आणि वेगळेच फंडे असतात माझ्या शेजारी बांधकाम चालू आहे बांधण्यात येणाऱ्या बीम जेव्हा भरतात तेव्हा तो सर्व बाजूने समान मापाचा असावा यासाठी एक कोयत्यासारखा सरकपट्टीवरचा वर्नियर कॅलिपर त्यांनी बनवला आहे अर्थात त्याला हे नाव माहित नाही ते मी त्याला सांगितलं सर्व बाजूने माप सारखे असावे यासाठीच ते उपकरण आहे आम्ही शाळेत शिकवलेले उपकरण वेगळं पण तेच कार्य करणारे अतिशय साधे पट्टीवरचे उपकरण त्याने सुंदर बनवले आहे ही आहे त्या त्या ठिकाणांची गरज आणि त्यासाठी वापरलेले किंवा केलेले प्रयत्न हे शिक्षणाच्या पलीकडे आहेत हे वापरणारा माणूस शिक्षित नाही आहे की नाही गंमत मला तर खूपदा मनात प्रश्न येतो की काही टक्के मुलाने शिकू नये त्याला फक्त लिहायला वाचायला शिकवावे त्याला कष्टाची विविध कामे करता येईल असे ट्रेन्ड करावे आणि त्या कामाला भरपूर मजुरी द्यावी गवंड्याला हजार रुपये पगार आहे रोज.. शिक्षित बीए बीएड 5000मासिक वर काम करायला मिळतात दुर्दैव आहे.. 100 जागांसाठी परवा 1000 इंजिनिअर लाईन मध्ये उभे होते हा व्हिडिओ पाहिल्यावर खूप वाईट वाटले आता मुलांनी शिकावं तरी किती पण रोजगाराची उपलब्धता नाही नवनवीन रोजगार हुडकणारी एक कमिटी हवी त्या त्या भागातली वैशिष्ट्य लक्षात घेऊन त्याचे नियोजन झाले पाहिजे मी एक दिवसभर लिहीत बसले तरी हे संपणार नाहीत असो एका लेखाच्या निमित्ताने माझ्या मनात आलेले विचार मी शिक्षक म्हणून प्रामाणिकपणे मांडले आहेत आणि माझ्या अनुभवातून काही लिहले आहे इतकेच….. !!!

© सुश्री शीला पतकी

माजी मुख्याध्यापिका सेवासदन प्रशाला सोलापूर 

मो 8805850279

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “दर्शन…” ☆ सुश्री नीता चंद्रकांत कुलकर्णी ☆

सुश्री नीता कुलकर्णी

☆ “दर्शन…” ☆ सुश्री नीता चंद्रकांत कुलकर्णी

“विठ्ठलाच्या दर्शनाला जाऊन येते” ती सुनबाईला म्हणाली.

“कुठे जाता ?आज एकादशीची गर्दी असेल. “

“अग पंढरपूरला जायचं नशिबात नाही. ईथल्या तरी विठ्ठलाला भेटून येते.. देऊळ जवळ तर आहे”

“आजे मी येणार….. “

बारका नातु मागे लागला.

“अरे तुला कुठे गर्दीत सांभाळू… “

तस नातवानं भोकाडच पसरलं…

“मला पण विठ्ठलाला यायचयं “

तशी सुनबाई म्हणाली,

“एवढं रडतयं तर न्या की…

हे घ्या अकरा रुपये ठेवा देवाला… या दोघं दर्शन करून”

पोरगं खुष झालं खीदळायला लागल.

देवळात ही गर्दी होती. लांबच लांब रांगा लागल्या होत्या. पोरगं आनंदलं होत. नाचत होत. रांग हळूहळू पुढे सरकत होती. तस पोरग मात्र थोड्या वेळा नंतर कंटाळलं……

“आजे कधी दिसणार तुझा विठ्ठल?”

“आता थोड्या वेळानं दिसेल हं… जवळ आलो.. लगेच दर्शन होईल.. “

तिनी नातवाची समजुत काढली.

जरा वेळानं पोरगं म्हणालं,

“आजे गोष्ट सांग ना “

“अरे इथे कुठे ? घरी गेल्यावर सांगते”

“इथच सांग “

पोराला काहीतरी सांगून नादी लावायला हवं… म्हणून तीनी जनी दळण दळताना दमते… मग विठुराया येऊन तिला दळायला मदत करायचा ती छोटी गोष्ट सांगितली…

“आजे तुला दिसला का कधी तुझा विठ्ठल ? “

“माझं कुठलं बाबा एवढा भाग्य.. मला कुठला दिसायला विठ्ठल.. ” ती म्हणाली,

ईतक्यात पोराचं लक्ष गोळ्या विकणाऱ्या मुलाकडे गेलं. लगेच म्हणाला..

“आजे मला गोळ्या घे की…. “

“गप रे… पैशे नाहीत”

“ए आजे घे की.. “

पोरग ऐकेच ना.. हट्टच करायला लागलं…

देवाचे पैसे… अकरा रूपये तेवढे होते.

दुसऱे आणलेच नव्हते… पण पोरगं हट्टानं आलय खरं.. जाऊ दे.. लहान लेकरू आहे….

म्हणून… दहा रुपयाच गोळ्यांच पाकीट तीनी घेतलं. पोरगं जरा रमलं… पुढच्या दोन चार बारक्या पोरींनाही त्यानी गोळ्या दिल्या…

तसं त्या पोरीपण खुषं झाल्या..

“आजे तुला घे की गोळ्या…. “

“नको रे… “

आजीचं लक्ष विठ्ठलाकडे…

बऱ्याच वेळानी नंबर जवळ आला. तसं आजीनी पोराला कडेवर घेतलं.

“हा घे रुपया जवळ गेलं की त्या पेटीत टाक…. “

“आज दुसरं काहीच आणल नाही देवा… परत येईन तेव्हा आणीन रे… ” 

हात जोडून तिने विनवणी केली.

समोर विठ्ठलाला पाहिलं तस तिला कृतकृत्य झालो असं वाटलं.. आज ईथे का होईना.. त्याच दर्शन तर झालं….

ते सावळे रूप समोर दिसलं…

 पिवळा पितांबर, जरीचा शेला, गळ्यात तुळशीचे हार , कपाळाला बुक्का भक्ती भावानी आजींनी दर्शन घेतलं आपल्याबरोबर नातवाचही डोकं विठ्ठलाच्या पायावर टेकवलं….

पोरगं हसलं….

पुजाऱ्यान पोराच्या कपाळाला बुक्का लावला विठ्ठलाचा हार पोराच्या गळ्यात घातला…

पोरगं हरखूनच गेलं…

आजी बघायला लागली… गर्दीतून बाहेर आली. नातू गळ्यातला हार काढू देईना..

“मी नाही काढणार “म्हणायला लागला… तशीच घरी आली.

आता पोरगं जाम खुष होतं. नाचत होतं

दारातच सुनबाई.. म्हणाली,

“झालं का दर्शन ? आणि ह्याच्या गळ्यात हार कोणी घातला ?”

“अगं दर्शन झालं आणि लगेच पुजाऱ्याने ह्याच्या गळ्यात हार, कधी घातला मलाही कळलं नाही “

“बसा पाणी देते. पोरान त्रास नाही ना दिला…. “

तसं पोरगं आईवर रागवलं.. कमरेवर हात ठेवून आईकडे बघायला लागलं….

“बघा सासूबाई ध्यान कसं दिसतय….. “

आईनी असं म्हटल्यावर पोरगं हसायला लागलं…

आजी बघायला लागली…

कमरेवर हात, कपाळाला बुक्का, आणि गळ्यात तुळशीचा हार घातलेला नातू तिच्याकडे बघून गोड हसत होता… काय झालं कळलंच नाही.. पण नातवाचा चेहरा तिला वेगळाच दिसत होता…

तिचे डोळे भरून आले….

क्षणभर काही समजेच ना….

तिला नातवाच्या जागी विठ्ठल दिसायला लागला…. साक्षात्कार झाल्यासारखंच झालं…

नातु हसतच होता….

ती निरखून बघायला लागली..

नातवाने मगाशी विचारलेलं..

“आजे तुला दिसला का ग तुझा विठ्ठल “हे तिला आठवलं…

आता तिचे डोळे भरून आले होते

ती बघतच राहिली…

हसत हसत… नातु एकदम धूम पळाला…

सुनबाई खिचडी करायला आत गेली..

भरल्या गळ्यान आजी म्हणाली

इथे जवळच आहेस…

इतका वेळ कडेवर होतास का रे…

धन्य रे बाबा तुझी…..

जनाबाईची दळणं तू दळायला गेला असशील पटलं बाबा मला आज..

आतूनच तिला लख्खपणे काहीतरी जाणवलं….

ती मनात म्हणाली…

“ईतकी वर्षे झाली अजूनही आमच्या आसपास आहेस… आम्हालाच समजायला उशीर होतोय…….. “

एकादशीला पंढरपूरला जायला मिळालं नाही याचं दुःख कुठल्या कुठे पळालं… विठ्ठलानी स्वतः येऊन क्षणभरका का होईना… आपल्याला दर्शन दिलं असंच तिला वाटलं.

त्याला कशात बघायचं हेही तिला आज नीट ऊमगलं…

आपल्याही आसपास असेलचं आपलाही विठ्ठल…

जरा नीट बघू आपण.. हळुहळु येईल ती दृष्टी…. ,

आपल्यालाही दिसेल मग… कुठल्या न कुठल्या रूपात..

आपला विठुराया…

© सुश्री नीता चंद्रकांत कुलकर्णी

मो 9763631255

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆  विचारायला काय जातं ?… – लेखिका : सुश्री स्नेहल अखिला अन्वित ☆ प्रस्तुती – सौ.बिल्वा शुभम् अकोलकर ☆

सौ. बिल्वा शुभम् अकोलकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ विचारायला काय जातं ?… – लेखिका : सुश्री स्नेहल अखिला अन्वित ☆ प्रस्तुती – सौ.बिल्वा शुभम् अकोलकर 

मागे बऱ्याच वर्षांपूर्वी टाटा स्कायच्या खूपच छान जाहिराती आल्या होत्या. काही जाहिराती खरच इतक्या नेमकेपणाने बनवलेल्या असतात की डायरेक्ट दिलातच घुसतात. त्यातल्या दोन माझ्या फारच आवडीच्या होत्या.

मिलिटरी परेड चाललेली असते, दोन मित्र इतरांप्रमाणेच ती परेड बघत असतात; त्यातल्या एकाला त्या परेड मधल्या मिलिटरी टँक मध्ये बसायची हुक्की येते, तो दुसऱ्याला मस्का मारत असतो विचार ना विचार ना…….. त्याचा मित्र त्याला हुर्रss करत उडवून लावतो.

आता त्या टँक मध्ये बसणं सोडा बाजूला तरी कोणी उभं राहू देईल का?

पण नाही………

त्याला आपली इच्छा मारणं अजिबात उचित वाटत नाही, तो म्हणतो बघूया विचारून आणि तो मग त्या उग्र चेहऱ्याच्या गाडीवानाला विचारतो,

Unclji, can I get a lift till Victoria hotel?

दुसऱ्या मित्राला वाटतं, झालं पडणार आता याला!

तो गाडीवान देखील याच्याकडे अचंबित नजरेने पाहतो आणि कोणाच्याही ध्यानीमनी नसताना त्याला लिफ्ट द्यायला राजी होतो!

अन् मग तो आश्चर्याचा झटका कॅच करणाऱ्या म्युझिक सकट टॅग लाईन येते……..

पुछने मे क्या ज्याता है??

दुसरी ही अशीच भारी. ……..

नवरा एका गेटटूगेदरला जाण्यासाठी एकटाच निघत असतो आणि बाईसाहेबांच्या मनात येत एवढं छान वातावरण आहे तर पाच मिनिटं का होईना मस्तपैकी बाहेर चक्कर मारायला जावं. बया नवऱ्याला विचारतेही लगेच, तो म्हणतो ठिक आहेस ना? इथे दहा मिनिटात मला गेटटूगेदरला पोचायचयं आणि तुझं काय भलतंच? पंचवीस वर्षांपासून ओळखतेस मला मी कधी लेट पोचलोय कुठे?

पण नंतर मात्र कशी कोण जाणे बायकोची इच्छा त्याला पूर्ण करावीशी वाटते आणि तो तिला चक्क ड्राईव्ह वर नेतो…

नवरा यावेळी नेणं शक्य नाही हे माहीत असूनही ती मनाला त्या क्षणी वाटलं ते बोलते आणि फारशी अपेक्षा नसतानाही तिची इच्छा पूर्ण होते सुद्धा!

सही ना?

तुम्ही आहात का या येड्यांमधले! काही का असेना भला पुछने मे क्या ज्याता है म्हणणारे ? मी तर आहे बाबा!

खरंच काय जातं विचारायला?

काय जातं आपल्या इच्छा बोलून दाखवायला?

जात काहीच नाही, पण प्रत्येक ठिकाणी आपला संकोच आड येतो.

बघा जरा यावरही विचार करून……….

किती जणी बेधडक आपल्या मनातली इच्छा बोलून दाखवतात सांगा?

बहुतेकदा मन मारूनच जगतात, ह्याला- त्याला काय वाटेल याचा विचार करत कुढतच बसतात. घरी कामाचा ढिगारा एकटा उपसतील, पण समोर नवरा रिकामा असेल; त्याला मदतीला बोलवावंही वाटत असेल; पण येईल का तो, असं कसं विचारायचं उगाच? जाऊ दे तिकडं! करत बसतील.

पण कधीतरी सांगूनही बघा की, तुम्हालाही गोड सरप्राईज मिळू शकतं, नाही येत कधी काही गोष्टी घरच्यांच्या लक्षात, म्हणून आपण आणून दिल्या तर चालतं, कोणाला माझी कदरच नाही करत रडण्यापेक्षा फार फार बरं!

या पुछने मे क्या ज्याता है चे रिझल्ट मला तर नेहमीच पॉझिटिव्ह मिळालेत ……

एकदा रात्री साडे अकरा वाजता घरातली चहा पावडर संपलीये, हे मला आठवलं. अन् तेव्हा मुलीची सकाळची शाळा होती, चहा तिच्यासाठी मस्ट होता. किराणा मालाची दुकान एव्हाना बंद झालेली होती. मी नवऱ्याला सांगितलं तर त्याने आता सगळं बंद झालं म्हणून मला वेड्यात काढलं. मी तरी त्याला जबरदस्तीने बाहेर काढलं.

म्हटलं चल पाहू तरी! 

एक मेडिकल जागं दिसलं. मी नवऱ्याला म्हणाले, विचारून बघूया ना!

तो म्हणाला, ठीक आहेस ना? मेडिकल मध्ये चहा कोण ठेवत का? जा तूच विचार, मी नाही येणार मुर्खपणा करायला!

मला पण कसंतरी वाटत होतं खरं, पण अगदी गरजच म्हणून मी मेडिकल मध्ये तोंड वर करून विचारुन बघितलं आणि फॉर माय सरप्राईज दहा रुपयाचं चहाचं पाकीट त्याने चक्क माझ्या हातात ठेवलं, अक्षरशः तिथल्या तिथे नाचत मी ते नवऱ्याला दाखवलं!

देखा? पुछनेमे क्या ज्याता है?

आपण आपलेच आराखडे बांधतो आणि त्याला धरूनच चालतो, काहीही म्हणा नकारघंटा वाजवायला जरा जास्तच आवडते आपल्याला.

एखाद्या मोठ्या दुकानात भाव करायला आपल्याला लाज वाटते, भाजीवाल्याकडे पुलाव मध्ये घालण्यासाठी फक्त चार फरसबी लागणार असतात, आपण पाव किलो घेतो (घरी भाजी आवडत नसली तरी) चार देईल का म्हणून, नॉनस्टॉप गाडी आपल्या गावावरून जाते, पण आपण दोन मिनीटं थांबवाल का विचारतच नाही, गप गुमान पुढे उतरुन मागे येतो.

खूप गोष्टी आहेत अशा ज्या आपण न विचारता सोडून देतो, आणि मन मारून जगत राहतो.

एकदा फक्त एकदा बोलून बघायला हवंच, नकोच ती रुखरुख मागे……

काय होणारे होऊन होऊन?

तसं तर आपण विनाकारण बरच बडबडत असतो पण जिथे बोलायचं तिथेच तोंड दाबून बसतो.

होणार नाही, मिळणार नाही वाटणारी unusual demand फक्त मनात न ठेवता विचारून, बोलून मला तरी खूप वेळा मिळालीये!

खरंतर हिच अनोखी डिमांड जेव्हा आश्चर्यकारक रित्या पूर्ण होते, तेव्हा तर एक वेगळीच मजा अनुभवायला मिळते.

तर आता, आपण मनात उचंबळून येणाऱ्या लहरींचा गळा घोटण्याआधी थोsssडं थांबायचं आणि फिल्मी स्टाईलमध्ये स्वतःशीच (मनातल्या मनात) बोलायचं!

चलो पुछ ही लेतें है, आखिर पुछने मे क्या ज्याता है?

पूछ डाला तो लाईफ झिंगालाला…..

हे मी नाही ते ऍडवाले म्हणतात बरं का..

तुम्ही त्या टाटा स्कायवाल्या ऍड नक्की बघाच हं यूट्यूबवर “puchneme kya jata hai” टाईप करा आणि पाच-सहा मस्त ऍड एन्जॉय करा……..

त्यांचा होऱ्या कायम लक्षात ठेवून आपली लाईफ झिंगालाला करायला मुळ्ळीच विसरू नका !

लेखिका : सुश्री स्नेहल अखिला अन्वित

संग्रहिका: सौ.बिल्वा शुभम् अकोलकर

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ पाढे… लेखक : श्री सुनील भातंब्रेकर ☆ प्रस्तुती व प्रतिक्रिया – श्री सुहास सोहोनी ☆

श्री सुहास सोहोनी

? इंद्रधनुष्य ?

☆ पाढे… लेखक : श्री सुनील भातंब्रेकर ☆ प्रस्तुती व प्रतिक्रिया – श्री सुहास सोहोनी ☆

पूर्वीच्या काळी पाहुणे किंवा नातेवाईक वगैरे घरी आले की पढवून ठेवल्यासारखा एक प्रश्न हमखास विचारीत, ‘पाढे पाठ आहेत का रे?’ आपण ‘हो’ म्हटलं की ‘कितीपर्यंत?’ असा पुढचा प्रश्न! ‘पंधरा पर्यंत!!’ असं अभिमानाने सांगितलं की ‘तेराचा म्हणून दाखव पाहू!!’ तो कसाबसा अडखळत संपवला की ‘आता ‘चौदाचा म्हणून दाखव’ असा प्रश्नोपनिषादाचा पाढा चालू होई. कशी तरी सुटका करून घ्यावी लागत असे.

पाढे पाठ करायची एक सुंदर प्रथा का कोण जाणे मागे पडली. ‘बे एके बे’ पासून सुरु होणारे पाढे ‘तीस दाहे तीनशे’ पर्यंत म्हणता येणे ही हुशारीची – पाठांतराची परिसीमा होती. सर्वसाधारण मुलं ‘बारा’पर्यंत तरबेज असत. तेराला पहिली थोडी पडझड व्हायची. चौदा, पंधरा, सोळा हळूहळू का होईना ठीक जायचे. सतरा पासून अजून काही बुरुज ढासळायचे आणि एकोणीसला शरणागतीच्या पांढरे निशाण फडकावले जायचे. वीसला अर्थ नसायचा आणि एकवीसच्या पुढचे पाढे म्हणण्याची हिम्मत करणाऱ्याला लोकोत्तर मुलांमध्ये गणले जातात जात असे.

पण ते काही असो, बाकी सारे गणित विसरले तरी पाढे मात्र आयुष्यभर साथ देतात! ‘आठी साती छप्पन’, ‘बार चोक अठ्ठेचाळ’, ‘पाचा पाचा पंचवीस’ ह्या संथा एखाद्या गाण्याच्या लयीसारख्या मनात कोरल्या गेल्या आहेत. ‘भीमरूपी’ नंतर ‘महारुद्रा’ यावं किंवा ‘सुखकर्ता’ नंतर ‘दुःखहर्ता’ यावं इतक्या सहजतेने ‘चौदा सक’ नंतर ‘चौऱ्यांशी’ येई. मराठी शिकलेल्या एखाद्या मोठ्या कंपनीच्या चेअरमनच्या तोंडीही ‘अरे, सतरा लाखाला एक मशीन म्हणजे पाच मशीनचे – सतरा पाचा पंच्याऐंशी – म्हणजे एटी फाईव्ह लॅक्स होतील, ’ असा पाढा ऐकू आल्यास आश्चर्य वाटणार नाही.

आजकाल इंग्लिश पाढे म्हणतात, पण ‘फोर सिक्स जा ट्वेंटी फोर’ मध्ये ‘चार सक चोवीस’ची सहजता नाही. बाकी जाऊ द्या, पण कमीतकमी पाढे तरी मातृभाषेतच हवेत हे आमचं प्रामाणिक मत आहे. अहो, ते आकड्यांची श्लोक आहेत हो! त्यांना तरी इंग्रजीपासून सोडा ना! पूर्वीच्याही पूर्वी पाढे ‘तीस’पर्यंत थांबत नसत. पुढे दिडकी – अडीचकी – औटकी असे. हे म्हणणे डोक्यापेक्षा जिभेसाठी त्रासदायक होते. ‘बे ते दहा’ – छान पायवाट, ‘दहा ते वीस’ – दोनचार खड्डे वाला साधा रस्ता, ‘वीस ते तीस’ – प्रचंड खडबडीत रस्ता आणि दिडकीबिडकी म्हणजे केवळ दगडं अंथरलेला रस्ता, असा तो प्रवास असे.

जर कोणाला स्वतःचं बालपण आठवायचं असेल तर बाकी काही न करता बेशक पाढे म्हणा – बे एक बे, बे दुने चार, बे त्रिक सहा… क्षणात पोहोचता की नाही ही बघा बालपणीच्या रम्य दुनियेत!

या लेखावरील प्रतिक्रिया – – – 

जुन्या आठवणींना उजाळा देणारा फार सुंदर लेख ! एका लयीत, एका सुरात, एका तालात एखादं समूहगीत म्हटलं जावं, तसंच पाढ्यांचं सुरेल गायन होतं असे. सवयीने, सरावानं, एकुणव्वदासे, त्रियोत्रिदोन, चवरोदरसे, बावनिदोन अशा अवघड शब्दांच्या सुद्धा नेमक्या संख्या कळत असत ! ती पाढ्यांची भाषा होती. तसे उच्चार करायला पण मजा वाटत असे. आताच्या काळांत आकलन, सुलभीकरणासाठी पाढ्यांतल्या संख्याही सरळसोट उच्चारल्या जातात, असं ऐकिवात आहे – नक्की माहित नाही. १ ते ३० पर्यंतचे पाढे आलेच पाहिजेत आणि रोज म्हटलेच पाहीजेत असा दंडकच होता. पुढे पुढे गणित, बीजगणित, भूमिती, क्ष+य, प्रमेय, साधन, सिद्धी, सिद्धता, रायडर्स, सूत्रे, गृहितके असे अनेक विषय विनाकारणच शिकलो असंच म्हणायला पाहिजे, कारण पुढच्या आयुष्यांत त्यांचं नांवही घेण्याची कधी वेळ आली नाही !… पण पाढे हा अपवाद !! ते पाठ असल्याचा फायदा पदोपदी अनुभवाला येतो. आजही फावल्या वेळात आठवतील त्या पाढ्यांचं गुंजन केलं, तर वेळ कसा जातो ते कळतंच नाही !

 

लेखक : श्री सुनील भातंब्रेकर 

लेख प्रस्तुती व प्रतिक्रिया : श्री सुहास सोहोनी

रत्नागिरी

मो ९४०३०९८११०

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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