मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ आश्चर्य… कवी : अज्ञात ☆ प्रस्तुती : सुश्री उषा नाईक ☆

📖 वाचताना वेचलेले 📖

आश्चर्य… कवी : अज्ञात ☆ प्रस्तुती : सुश्री उषा नाईक ☆

पोट दुखो, पाठ दुखो, हात दुखो, मान

डोकं दुखो, पाय दुखो, नाक दुखो, कान

काही झालं, तरी आपलं, औषध पोटात घ्यायचं?

औषधाला कसं कळतं, कुठल्या गल्लीत जायचं?

*

जिथे दुखतं, तिथे कसं, हे औषध पोचतं?

उजेड नाही, दिवा नाही, त्याला कसं दिसतं?

हातगल्ली, पायगल्ली, पाठीचं पठार

छातीमधला मोठा चौक, पोटाचा उतार

*

फासळ्यांच्या बोळामधून, इकडेतिकडे वाटा

औषधाला कसं कळतं, कुठून जातो फाटा?

लालहिरवे दिवे नाहीत, नाही पाटी, खुणा

पोलीसदादा कुठेच नसतो, वाटा पुसतं कुणा?

*

आई, असं वाटतं की, इतकं लहान व्हावं

गोळीबरोबर पोटात जाऊन, सारं बघून यावं

आईने गपकन धरलं, म्हणे, बरी आठवण केली

आज तुझी आहेच राजा, ‘एरंडेलची पाळी

कवी : अज्ञात

प्रस्तुती :सौ. उषा नाईक

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ – झालो मी घायाळ… – ☆ श्री आशिष बिवलकर ☆

श्री आशिष  बिवलकर

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? झालो मी घायाळ… ? श्री आशिष  बिवलकर ☆

घायाळ केलंस सखे,

नयन तुझे तलवार!

हृदयाला भिडलीस,

केलेस जुलमी वार!

*
कुंतल तुझे

रेशमी जाल!

गोरे गोरे

मऊ मऊ गाल!

*
किती सुंदर अशी,

बहारदार तू हसते!

हास्यात तुझ्या

शरद पौर्णिमा भासते!

*
सौंदर्यात तुझ्या,

पुरता मी बुडालो!

प्रेमात तुझ्या,

पार वेडावलो!

*
एकटक तुला,

पहावयास वाटे!

ह्रदयात तुझ्या,

पत्ता माझा भेटे!

*
तुला पहात पहात लिहावी 

कविता की गझल!

अप्सरा जरी अवतरली,

तुझ्या पुढे काय तिची मजल!

*
तुझ्या वर्णनात

शब्द सुंदर होतात!

शृंगार रसात

कवितेत सजतात!

*
तुझ्या नावाने अखंडित,

श्वासांची गुंफलीय माळ!

मृत्यू जरी आला तरी,

थांबेल तो ही सर्वकाळ!

*

स्तुतीने सुखवलीस तू,

हरवून गेलीस काही काळ!

एव्हढ्या शिट्या दिल्यात मी,

शिजली का ग माझी डाळ! 

© श्री आशिष  बिवलकर

बदलापूर

मो 9518942105

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 231 – बुन्देली कविता – बढ़त जात उजयारो… ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बढ़त जात उजयारो।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 231 – बढ़त जात उजयारो… ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

 

बढ़त

जान उजयारी

मानों उठत जात है घुँघटा

बढ़त जात उजयारो।

 

मेंहदी रची, दौउ हाँतन में

जैसे सजे किवारे

कारे कैस लहरिया लैरए

नागिन से मतवारे ।

 

गोरो आँग दमक दरसावै

नैंनन अत सुखकारौ ।

बढ़त जात उजयारौ।

 

दोउ हाँत उठे ऊपर खौ

जैसे

जोत-जबारें

घूँघट कोर समारें ऐसे ।

जैसे दिया समारें ।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 231 – “बहके बहके आँगन की…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बहके बहके आँगन की...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 231 ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बहके बहके आँगन की...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

दद्दा की तस्वीर टँगी

जब से कीली पर थी

तब से ही वह भीट

वहाँ पर गीली गीली थी

 

नही लगी पर जंग

वहाँ माता के आँसू थे

वहीं पितर सम्पूर्ण

लोक सम्मत रहवासू थे

 

एक समंदर कई कई

क्षमताओ वाला ले

झेल रहे थे अकथ कथा

जो बड़ी हठीली थी

 

और एक व्यवहार कुशल

कमरे की शीतलता

छायी थी घर में अंतरतक

कोई स्थिरता

 

बाहर सिगड़ी पर उबाल

खाती सी चाय मगर

रोने को चुहचुहा उठी

वीरान पतीली थी

 

अबभी…..चूना शेष बचा

उस युवा चुनौटी* में

पड़ा वहीं अगियारे* के

नजदीक चुनौती में

 

बहके बहके आँगन की

कुछ तुर्श रही गरिमा

घरके चेहरे की छबि

तक कुछ पीलीपीली थी

 

कहीं कैरिया* पड़ी, पड़ा

धागे के संग ऐनक

हुआ कभी करता था

जो सारे घर की रौनक

 

लगा खोजने को व्याकुल

है दद्दा की पनहीं

पर कुटुम्ब की हवा वहाँ

कुछ कुछ जहरीली थी 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

24-03-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लख चौरासी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लख चौरासी ? ?

श्मशान से उठता गाढ़ा धुआँ

वातावरण में पसरी चिरायंध,

मृत पशु की निकाली जाती खाल

ठोका-पीटा-कसा जाता चमड़ा,

जो जीते जी निरुपयोगी रहा

न मरके किसीके काम आया

परिक्रमा चौरासी में भटकता रहा

न इत का रहा, न उत का हो पाया।

?

© संजय भारद्वाज  

अपराह्न 1:45 बजे, 25.03.2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 15 मार्च से आपदां अपहर्तारं साधना आरम्भ हो चुकी है 💥  

🕉️ प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, श्रीराम स्तुति, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना कर साधना सम्पन्न करें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Weekly Column ☆ Witful Warmth # 42 – The Great Deceiver Maya, Our Mistress ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world. Today we present his satire The Great Deceiver Maya, Our Mistress 

☆ Witful Warmth# 42 ☆

☆ Satire ☆ The Great Deceiver Maya, Our Mistress… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

So, dear friends, the story begins on that fateful day when the greatest con artist of all—the human mind—decided to play its grandest trick on me. I woke up in the morning, rubbing my eyes, thinking, “Today, I’ll do something big, something that’ll go down in history!” But history? I couldn’t even cross my doorstep before Maya threw her first punch. “Beta, make some tea!” came my mother’s voice. Now, making tea isn’t exactly a grand feat, but Maya wove such a web around it that it wasn’t just tea—it squeezed the life out of me. No sugar, curdled milk, empty gas cylinder—and there I was, standing on the street with a pot in hand, singing like an unemployed poet, “Oh life, what have you given me?” Maya laughed, “This is just the trailer, the movie’s yet to come!” And trust me, the movie was so intense that even Shah Rukh’s films would pale in comparison. The shopkeeper said, “Cylinder will come tomorrow, cook on a stove today.” A stove? Is this 2025 or 1825? But behold Maya’s game—she turned me into a poet even while I hauled wood: “Life’s a stove, all smoke, no glow.” Neighbors laughed, “You’re quite the craftsman!” There was pain in that laughter, but who sees the tears in my eyes? Maya whispered, “Don’t cry, the day’s just begun.” And I, the fool, believed her and stepped out to embrace the day. Embrace? More like I got choked. 

The sun rose higher, and I thought, let’s hunt for a job. I grabbed my resume, polished my shoes, and set off—“There are more destinations to conquer!” But Maya had already written the script. I boarded the bus, reached for my pocket—my wallet was gone. The driver barked, “Ticket or get off!” I pleaded, “Brother, adjust a little, I’m jobless.” He laughed, “Then this isn’t a bus, it’s a train straight to Footpath Station!” The crowd clapped, and I stepped off—not as a hero, but as a villain. Standing on the road, I wondered, “Is this Maya or my fate mocking me?” Just then, a beggar approached, “Sir, spare two rupees.” I said, “Brother, I’m a beggar myself, you give me some.” He laughed, “You’re worse off than me!” Maya cackled, “See, I’ve made you the king of the streets!” King? Yes, without a crown, without a kingdom. My shoes were worn out, my stomach growled, and Maya shouted, “The interview’s still left!” Interview? That became a distant dream because by the time I reached the office, it was night. 

Evening fell, and I thought, let’s meet some friends—maybe my heart will feel lighter. But Maya outdid herself here too. My friend said, “Good you came, I’m broke, lend me some money.” I replied, “Brother, my pocket’s full of air—and that’s polluted too!” He said, “No worries, sit, I’ll get tea.” Tea arrived, I started sipping, and the dhaba owner yelled, “Who’s paying?” My friend vanished, and I was trapped. The owner said, “Wash the dishes, then leave.” Now witness Maya’s magic—my day began making tea, and ended washing dishes. Hands covered in soap, eyes brimming with tears, and a single question in my mind—“Is this life or a punishment?” Maya placed her hand on my shoulder, “Not punishment, my art.” Art? This isn’t art, it’s cruelty! But who can reason with Maya? She just kept laughing, and I, like an empty vessel, kept sobbing. My friend called later, “Sorry, I was joking.” Joking? My life’s become a joke, and Maya’s sitting in the director’s chair, clapping away. 

Night arrived, and I returned home. Mom said, “Where were you? The food’s cold.” I replied, “Mom, I’ve gone cold from life itself.” I ate, but where was the taste? Maya had stolen that too. I tried to sleep, but Maya had kidnapped my sleep. Lying in the dark, I wondered, “What did I do wrong?” Maya answered, “Wrong? You were born—that’s your mistake!” And then her laughter echoed—ha ha ha! I buried my face in the pillow, but the tears wouldn’t stop. Outside, a dog was barking—perhaps another victim of Maya. “Brother, are you crying too?” I asked. The dog fell silent, maybe Maya scolded him too. I survived the night, morning came, and Maya was ready again—“New day, new drama!” I pleaded, “Enough, Maya! I can’t take it anymore.” But she said, “You’ll have to, because I’m Maya, the Great Deceiver!” And I, like a puppet, got entangled in her game again. 

Morning followed the same routine. I made tea, but this time Maya added a new twist—she swapped the sugar with salt. Mom shouted, “What is this?” I said, “Mom, this is the taste of my life—salty tears!” She snapped, “Stop the nonsense, go get milk.” I went, but the shopkeeper said, “Money first, milk later.” Empty pockets, teary eyes. I returned, and Mom taunted, “You’ll always be useless.” Useless? Yes, Maya had made me the emperor of the useless. The day progressed, and the phone rang. The electricity guy said, “Pay the bill, or we’ll cut the power.” I said, “Brother, my life’s already cut off, what’s electricity?” He laughed, “Then cry in the dark!” Darkness? It’s become my friend. Maya said, “See, I’ve shown you every shade—black, white, salty!” And I, without electricity, sat with a candle, talking to my shadow—“You’re better than me, at least Maya doesn’t toy with you.” 

Noon arrived, and a neighbor came by, “I hear crying from your house.” I said, “Brother, that’s my life, clinging to me and weeping.” He asked, “Some girl trouble?” I laughed, “Yes, a girl named Maya!” He didn’t understand and left. Then the postman arrived with a letter. I opened it—a job rejection: “You’re unfit.” Unfit? Maya taunted, “See, you’re unfit even for my game!” I tore the letter and screamed, “Maya, you’ve won!” But she said, “Won? The real fun of defeat is yet to come.” That evening, the power was cut. Sitting in the dark, I wondered, “What’s left?” Then water dripped from the ceiling—rain had started. Maya laughed, “I’ve summoned your tears from the sky!” I got drenched, and Maya danced. 

The night deepened, and I had a dream. Maya stood before me, saying, “You think I’m cruel? I’m your teacher.” I asked, “What have you taught me? To cry?” She said, “No, to endure!” Endure? Yes, Maya had turned me into an endurance machine. I woke up, my pillow soaked. The rain had stopped outside, but the storm inside me raged on. Mom said, “Get up, do something.” I replied, “Mom, what can a man defeated by Maya do?” She stayed silent—perhaps she sensed Maya’s presence. The day began, but for me, every day was the same—Maya’s game, Maya’s trap. I looked at the sky, “Oh Maya, you’ve taken everything, what’s left?” She said, “Your tears are left—I’ll squeeze those too!” And she did, while I kept crying. 

In the end, I was sitting on the street. A child approached, “Uncle, why are you crying?” I said, “Son, what else can a man defeated by Maya do?” He asked, “Who’s Maya?” I laughed, “The guest who’ll soon visit your life!” The child left, and I sat there. Maya came to me, “Game over, now go.” I asked, “Where?” She said, “Back where you came from.” I thought, maybe it’s time to die. But Maya threw her final punch, “I won’t even let you die—keep living!” And I, like a living corpse, lay on the street. The crowd watched—some laughed, some cried. But Maya? She moved on, hunting for her next prey. My tears dried, but a sigh escaped my heart—“Oh Maya, you’ll always be the Great Deceiver!” And reader, if you’re crying too, know this—Maya has already arrived at your doorstep.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : [email protected]

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४९ – “शिक्षाविद और सहकारिता मनीषी – स्व. डा. सोहनलाल गुप्ता” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व शिक्षाविद और सहकारिता मनीषी – स्व. डा. सोहनलाल गुप्ताके संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)

स्व. डा. सोहनलाल गुप्ता

☆ कहाँ गए वे लोग # ४९ ☆

☆ “शिक्षाविद और सहकारिता मनीषी – स्व. डा. सोहनलाल गुप्ता” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक

कर्मवीर के आगे पथ का

हर पत्थर साधक बनता है 

दीवारें भी दिशा बताती

तब मानव आगे बढ़ता है

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि स्व. श्री ब्रजराज पांडव की इन पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध की थी जबलपुर के चर्चित सहकारिता मनीषी और शिक्षा शास्त्री स्व. डा. सोहनलाल गुप्ता ने जिन्होंने अपनी कर्मठता और विद्वत्ता से शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा अर्जित की जिसके कारण आज भी जनमानस के स्मृति पटल डा. एस एल गुप्ता की छवि और प्रभाव अंकित है।

डा. सोहन लाल गुप्ता एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रुप में समाज में प्रतिष्ठित और प्रेरक स्तंभ थे। शिक्षाविद और सहकारिता मनीषी के रुप में उन्होंने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए। एक सबके लिए और सब एक के लिए के सिद्धांत के पोषक और प्रचारक डा, सोहनलाल गुप्ता सिर्फ सहकारिता चिंतक और लेखक ही नहीं थे बल्कि उन्होंने सहकारी आंदोलन को सशक्त नेतृत्व भी प्रदान किया था।

 जबलपुर नागरिक सहकारी बैंक के प्रथम अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सहकारी बैकिंग को कमजोर वर्ग के आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनाने में सक्रिय योगदान भी दिया। वर्ष १९७०३ के दशक में मात्र दो लाख रुपए की पूंजी से शुरू किए गए इस नागरिक सहकारी बैंक में उस समय बैंक की प्रारंभिक स्थिति में डा. गुप्ता की लगभग ८० हजार रुपए की पूंजी शामिल थी। १९७९ तक उन्होंने बैठक के अध्यक्ष पद का सफलतापूर्वक निर्वाह किया। यह डा, एस. एल. गुप्ता का सहकारिता के प्रति गहरे लगाव और लगन का परिचायक था।

सहकारिता और ग्रामीण विकास के अंतर्गत कृषिगत गतिविधियों में शोध कार्यों के लिए भी डा. सोहनलाल गुप्ता के की प्रभावी सोच और योगदान को भी शासन ने स्वीकार करते हुए उन्हें पुरस्कृत किया था। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के संदर्भ में डा. गुप्ता ने जो शोध कार्य किये, उसके लिए भी विश्व विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा उनकी सराहना की गई। ५ अगस्त १९१८ को जन्मे डा. सोहनलाल गुप्ता की महाविद्यालयीन शिक्षा सेंट कालेज में हुई थी। बाद में उन्होंने वर्ष १९४२ में एम. ए. की परीक्षा और वर्ष १९४३ मं एल. एल. बी. परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शिक्षा के प्रति डा. गुप्ता का लगाव बड़ा गहरा था। उन्होंने १९४६ में एम. काम. की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वर्ष १९५२ में डा. गुप्ता ने पी. एच. डी. की उपाधि अर्जित की और इसके बाद १९५३ में उन्होंने जबलपुर के जी. एस. कामर्स कालेज में सहायक प्राध्यापक के पद पर अपनी सेवाएं देना शुरू किया। डा. गुप्ता की सक्रिय और समर्पित सेवाओं का मूल्यांकन करते हुए उन्हें १९६० में कालेज में प्राध्यापक के पद पर पदोन्नत किया गया। इसके बाद डा. सोहनलाल गुप्ता ने जब महाविद्यालय में प्राचार्य का दायित्व संभाला तो उनसे उस समय उनकी विद्वता और योग्यता को देखते हुए कालेज को काफी आशाएं थीं। डा. गुप्ता ने कुशलता और सफलता के साथ उन अपेक्षाओं को पूर्ण किया और कालेज के विकास की अद्भुत कहानी लिखते हुए १९७७ में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी शिक्षा जगत के लिए जीवन पर्यंत पूरी तरह समर्पित डा. सोहनलाल गुप्ता शैक्षणिक क्षेत्र में नित नये लाभकारी और उपयोगी पाठ्यक्रमों के संचालन हेतु प्रयत्नशील रहे। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अर्थ वाणिज्य उच्च अध्ययन एवं अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की और संचालक के रुप में अनेक वर्षों तक उस केंद्र को महाकोशल क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण और उपयोगी संस्थान बनने में सफलता अर्जित की। इस संस्थान की स्थापना के पीछे डा. गुप्ता की सार्थक सोच यह थी कि आज का शिक्षित युवा अपने आर्थिक भविष्य के निर्माण के लिए व्यावसायिक और औधौगिक प्रबंध में व्यापक प्रशिक्षण प्राप्त करे। अपने शिक्षकीय जीवन के दौरान डा. एस. एल. गुप्ता ने पाठ्यक्रमों से संबंधित अनेक पुस्तकें का लेखन किया जो कि अर्थ वाणिज्य के क्षेत्र में विभिन्न कालेजों में छात्रों के लिए अध्ययन हेतु सहायक सिद्ध हुई।

 गांधीवादी विचारक डा. गुप्ता संत विनोबा भावे के वैचारिक दृष्टिकोण से भी काफी प्रभावित थे और यहीं कारण था कि उन्होंने जिला सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष पद पर काफी वर्षों तक सक्रियता पूर्वक अपने दायित्वों का का निर्वाह भी किया। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने कर्तव्यों और दायित्वों का ईमानदारी से निर्वाह करने वाले डा. सोहनलाल गुप्ता का स्वर्गवास दिनांक २२ अक्टूबर १९९६ को हुआ था लेकिन उनकी प्रेरक स्मृतियां सदा हमारा मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी। सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. राजकुमार सुमित्र जी के शब्दों में व्यक्ति बीत जाता है और समय भी किंतु स्मृतियां अशेष होती हैं। कुछ चित्र और कुछ स्मृतियां ऐसी होती हैं जिनके कारण स्मृति कोष सार्थक हो जाया करता है। श्रद्धेय डा. सोहनलाल गुप्ता जी की छवि और स्मृतियां ऐसी ही है।

© श्री यशोवर्धन पाठक

संकलन – श्री प्रतुल श्रीवास्तव

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

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आप गत अंकों में प्रकाशित विभूतियों की जानकारियों के बारे में निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं –

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १ ☆ कहाँ गए वे लोग – “पंडित भवानी प्रसाद तिवारी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २ ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३ ☆ यादों में सुमित्र जी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४ ☆ गुरुभक्त: कालीबाई ☆ सुश्री बसन्ती पवांर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५ ☆ व्यंग्यकार श्रीबाल पाण्डेय ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ६ ☆ “जन संत : विद्यासागर” ☆ श्री अभिमन्यु जैन ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ७ ☆ “स्व गणेश प्रसाद नायक” – लेखक – श्री मनोहर नायक ☆ प्रस्तुति  – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ८ ☆ “बुंदेली की पाठशाला- डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ९ ☆ “आदर्श पत्रकार व चिंतक थे अजित वर्मा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ११ – “स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १२ ☆ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆   

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १३ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लोकप्रिय नेता – नाट्य शिल्पी सेठ गोविन्द दास ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १४ ☆ “गुंजन” के संस्थापक ओंकार श्रीवास्तव “संत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १५ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कविवर – पंडित गोविंद प्रसाद तिवारी ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १६ – “औघड़ स्वाभाव वाले प्यारे भगवती प्रसाद पाठक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆ 

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १७ – “डॉ. श्री राम ठाकुर दादा- समाज सुधारक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १८ – “राजकुमार सुमित्र : मित्रता का सगुण स्वरुप” – लेखक : श्री राजेंद्र चन्द्रकान्त राय ☆ साभार – श्री जय प्रकाश पाण्डेय☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १९ – “गेंड़ी नृत्य से दुनिया भर में पहचान – बनाने वाले पद्मश्री शेख गुलाब” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २० – “सच्चे मानव थे हरिशंकर परसाई जी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २१ – “ज्ञान और साधना की आभा से चमकता चेहरा – स्व. डॉ कृष्णकांत चतुर्वेदी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २२ – “साहित्य, कला, संस्कृति के विनम्र पुजारी  स्व. राजेन्द्र “रतन”” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २३ – “मेरी यादों में, मेरी मुंह बोली नानी – सुभद्रा कुमारी चौहान” – डॉ. गीता पुष्प शॉ ☆ प्रस्तुती – श्री जय प्रकाश पांडे ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २४ – “संस्कारधानी के सिद्धहस्त साहित्यकार -पं. हरिकृष्ण त्रिपाठी” – लेखक : श्री अजय कुमार मिश्रा ☆ संकलन – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २५ – “कलम के सिपाही – मुंशी प्रेमचंद” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २६ – “यादों में रहते हैं सुपरिचित कवि स्व चंद्रकांत देवताले” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २७– “स्व. फ़िराक़ गोरखपुरी” ☆ श्री अनूप कुमार शुक्ल ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २८ – “पद्मश्री शरद जोशी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २९ – “सहकारिता के पक्षधर विद्वान, चिंतक – डॉ. नंद किशोर पाण्डेय” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३० – “रंगकर्मी स्व. वसंत काशीकर” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३१ – “हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, फारसी के विद्वान — कवि- शायर पन्नालाल श्रीवास्तव “नूर”” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३२ – “साइकिल पर चलने वाले महापौर – शिक्षाविद्, कवि पं. रामेश्वर प्रसाद गुरु” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३३ – “भारतीय स्वातंत्र्य समर में क्रांति की देवी : वीरांगना दुर्गा भाभी” ☆ डॉ. आनंद सिंह राणा ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३४ –  “जिनके बिना कोर्ट रूम भी सूना है : महाधिवक्ता स्व. श्री राजेंद्र तिवारी” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३५ – “सच्चे मानव – महेश भाई” – डॉ महेश दत्त मिश्रा” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३६ – “महिलाओं और बच्चों के लिए समर्पित रहीं – विदुषी समाज सेविका श्रीमती चंद्रप्रभा पटेरिया” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३७ – “प्यारी स्नेहमयी झाँसी वाली मामी – स्व. कुमुद रामकृष्ण देसाई” ☆ श्री सुधीरओखदे   ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३८ – “जिम्मेदार शिक्षक – स्व. कवि पं. दीनानाथ शुक्ल” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३९ – “सहृदय भावुक कवि स्व. अंशलाल पंद्रे” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४० – “मानवीय मूल्यों को समर्पित- पूर्व महाधिवक्ता स्व.यशवंत शंकर धर्माधिकारी” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४१ – “प्रखर पत्रकार, प्रसिद्ध कवि स्व. हीरालाल गुप्ता” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४२ – “जिनकी रगों में देशभक्ति का लहू दौड़ता था – स्व. सवाईमल जैन” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४३ – “संवेदनशील कवि – स्व. राजेंद्र तिवारी “ऋषि”” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४४ – “कर्णदेव की दान परम्परा वाले, कटनी के पान विक्रेता स्व. खुइया मामा” ☆ श्री राजेंद्र सिंह ठाकुर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४५ –  “सिद्धांतवादी पत्रकार – स्व. महेश महदेल” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४६ – “मधुर गीतकार-  स्व. कृष्णकुमार श्रीवास्तव ‘श्याम’” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४७ – “साहित्य के प्रति समर्पित : आदरणीय राजकुमार सुमित्र जी” ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४८ – “गीतों के राजकुमार मणि “मुकुल”- स्व. मणिराम सिंह ठाकुर “मणि मुकुल”  ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 1 – व्यंग्य – “यहां सभी भिखारी हैं” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

अब आप प्रत्येक सोमवार को श्री प्रतुल श्रीवास्तव जी के साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “यहां सभी भिखारी हैं)

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 1

☆ व्यंग्य ☆ “यहां सभी भिखारी हैं” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

यों तो मनुष्यों और अन्य प्राणियों की शारीरिक संरचना, आवास, खानपान, बल आदि में बहुत से अंतर हैं किंतु मुख्य अंतर है बुद्धि का। मनुष्य को बुद्धिमान प्राणी माना जाता है जबकि अन्य प्राणियों को बुद्धिहीन अथवा अल्पबुद्धि वाला। हां, एक प्रमुख अंतर और है भिक्षा मांगने का। मनुष्य के अतिरिक्त संसार का अन्य कोई प्राणी भिक्षा नहीं मांगता। कुत्ता, गाय, घोड़ा, तोता आदि वे प्राणी जिन्हें मनुष्य का सत्संग या कुसंग प्राप्त हुआ वे अवश्य ही भोजन की मूक भीख मांगना सीख गए हैं।

भीख मांगने की प्रवृत्ति संभवतः तब शुरू हुई जब मनुष्य ने ईश्वर रूपी परम शक्ति को खोजा अथवा गढ़ा। भीख पाने के लिए या अच्छे शब्दों में कहें तो वरदान, उपहार, मदद पाने के लिए मनुष्य ने भक्ति या स्तुति का मार्ग अपनाया। चतुर-चालक लोग भक्ति और स्तुति के द्वारा सम्पन्न लोगों के कृपा पात्र बनकर उनसे भी तरह-तरह की भीख प्राप्त करने लगे। कटोरा लेकर भीख मांगने को समाज में  घृणित और शर्मनाक माना जाता है किंतु स्तुति करके मांगी गई भीख को वरदान अथवा कृपा कह कर सम्मान दिया जाता है यह बात अलग है कि कुछ लोग इसे चमचागिरी का प्रतिफल मानते हुए इसे हेय दृष्टि से देखते हैं, किंतु इसमें उनकी संख्या अधिक होती है जिनसे चमचागिरी नहीं बनती। आखिर चमचागिरी भी कठिन साधना है।

बात भीख की चल रही है तो बता दें कि किसी जमाने में नगरों की सीमा के बाहर रहकर जनकल्याण की भावना से ईश्वर की आराधना करने वाले और गुरुकुल वासी छात्र ही “भिक्षाम् देही” कहते हुए भीख मांगते थे। इन्हें लोग सहर्ष भिक्षा देते भी थे, किंतु भीख मांगना अब लाभ दायक व्यवसाय बन गया है। भिखारियों की गैंग/ यूनियन होती है इनका प्रमुख होता है। इनके कार्यक्षेत्रों का वितरण होता है। सफल भिखारियों के बैंक खातों में लाखों, करोड़ों रुपए जमा हैं। मंदिरों-मस्जिदों, नदी किनारों, बाजारों में बढ़ती भिखारियों की भीड़, बिना श्रम इनकी अच्छी आमदनी से ईर्ष्या और आमजन को होती तकलीफ के कारण मध्यप्रदेश के इंदौर और भोपाल शहर में भीख लेने-देने पर रोक लगा दी गई है। आश्चर्य है कि देश में अपनी मांग के लिए विरोध प्रदर्शन/आंदोलन करने की सुविधा होने के बाद भी इन शहरों के भिखारियों ने अब तक भिक्षावृत्ति बंद करने के खिलाफ कोई आंदोलन क्यों नहीं छेड़ा। हो सकता है कि राष्ट्रीय पार्टियों के प्रमुखों को उनके पार्टीजन इस मुद्दे को उनके संज्ञान में न  ला पाये हों अथवा वे हमारे प्रदेश की सीमा पर अवश्य ही भिखारियों का आंदोलन खड़ा करवा देते।

भिक्षावृत्ति चाहे किसी भी स्वरूप में हो डायरेक्ट कटोरा लेकर अथवा स्तुति/आराधना या चमचागिरी करके यह हमारे देश की परम्परा है, हमारा अधिकार है और अधिकारों का हनन नहीं किया जाना चाहिए। कौन भिखारी नहीं है? कोई ईश्वर से धन दौलत, प्रतिष्ठा, प्रेमिका – पत्नी, पुत्र, स्वास्थ्य, सुख-शांति, ट्रांसफर, प्रमोशन, मुकदमे में जीत की भीख मांगता है तो कुछ लोग ईश्वर, खुदा, यीशु का नाम लेते हुए नेता/मंत्री बनने के लिए जनता से वोटों की भीख मांगते हैं। सभी भिखारी हैं। अलग – अलग नामों से भिक्षा पूरी दुनिया में मांगी जा रही है । भीख मांगने से मना नहीं किया जा सकता, हां भीख देना ऐच्छिक हो सकता है । कोई भी हो चाहे ईश्वर अथवा व्यक्ति, याचक को भीख देने में विलम्ब कर सकता है, पूरी तरह से इन्कार भी कर सकता है किंतु मांगने के अधिकार पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता । एक लोकप्रिय मंत्री ने भिन्न कामों को लेकर उनके पास अर्जी लगाने वालों को जो बोला उसका आशय भिखारी समझ कर लोगों ने बखेड़ा खड़ा कर दिया। कल जिन लोगों ने उनके करबद्ध आग्रह पर उन्हें अपना बहुमूल्य वोट दिया था वे उनके इस कथन से हतप्रभ हैं। विपक्षी उनके बयान के विरोध में जमीन आसमान एक कर रहे हैं। मंत्री जी को चाहिए कि वे मांगने वालों को मांगने दें। देना उनकी मर्जी पर है चाहें तो अन्य नेताओं/मंत्रियों की तरह चीन्ह – चीन्ह कर दें अथवा न दें। वैसे अब तो वोटों की भीख पाने चुनाव के पूर्व सरकार और सभी विपक्षी दल बिना भीख मांगे लोगों पर मोतियों की वर्षा करने लगे है। वोटरों को क्या-क्या फ्री मिल रहा है आप जानते ही हैं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 642 ⇒ तीन तेरह (3.13) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता  – “तीन तेरह (3.13)।)

?अभी अभी # 642 ⇒  तीन तेरह (3.13) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

3.13

रात्रि के तीन बज गए

तेरह, फिर भी रह गए …

मैं सोया रहता हूं,

मेरे पास पड़ा रहता है

मेरा मोबाइल

और चलती रहती है

उसकी डिजिटल घड़ी ..

समय के साथ सोना

और जागना, एक साथ।

अभी समय है मेरे उठने में

अभी समय है मेरे जागने में

मैं इसलिए सोया हुआ हूं, क्योंकि मैं सुबह

चार बजे उठता हूं।

3.47

मैं उठ गया हूं

जाग भी गया हूं

तेरह फिर भी रह गए

अभी चार बजने में ..

यानी मैं समय से

पहले उठ गया हूं

तेरह मिनिट पहले।

मैं जागता रहूंगा

और तेरह मिनिट

जब तक

चार नहीं बज जाती ..

अब आप इसे डिजिटल

स्लीप कहें अथवा

डिजिटल ध्यान,

लेकिन मुझे समय के साथ

जागना भी पसंद है

और सोना भी।।

4.00

अब और तीन तेरह नहीं

क्योंकि चार बज गए हैं

घड़ी ने अपना काम किया

मुझे समय से उठा दिया..

आपका सोने का

समय समाप्त ..

शुभ प्रभात !!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 213 ☆ # “हम कब बोलेंगे ?” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हम कब बोलेंगे  ?”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 213 ☆

☆ # “हम कब बोलेंगे ?” # ☆

जीना इसी का नाम है तो

क्यों जी रहे हैं हम ?

हर पल हर घड़ी

यह जहर क्यों पी रहे हैं हम ?

 

चारों तरफ एक

खामोशी बढ़ रही है

खामोशी नई-नई

कहानियां गढ़ रही है

 

आंखों में आंसू हैं

चेहरे पर डर का साया है

किसने यह भयानक आतंक

हर जगह फैलाया है

 

ऐसे माहौल में

कोई कैसे सांस लेगा

इस घुटन से घबराकर

कमजोर तो अपना गला

खुद ही फांस लेगा

 

हम आजाद हैं पर

कैदी सा जी रहे हैं

भावनाओं का गला घोट

होठों को सी रहें हैं

 

कब हमारी खामोशी टूटेगी ?

कब गुलामी की बेड़ियां छूटेगी ?

कब तक हमारी दुनिया

यूं ही लुटेगी ?

कब हमारे अंदर

आक्रोश की चिंगारी

बारूद बन फूटेगी ?

 

कब हम अपना मुंह खोलेंगे ?

अन्याय के खिलाफ खड़े होकर

हम कब बोलेंगे ?

हम कब बोलेंगे ? /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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