हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सामाजिक चेतना – #65 ☆ राजभाषा दिवस विशेष – असमिया भाषा का इतिहास ☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय 

(सुदूर उत्तर -पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना की अगली कड़ी में  राजभाषा दिवस पर प्रस्तुत है हमारे उत्तर पूर्व  में स्थित असम की आधिकारिक भाषा का  ज्ञानवर्धक इतिहास असमिया भाषा का इतिहास।आप प्रत्येक सोमवार सुश्री  निशा नंदिनी  जी के साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना  #65 ☆

☆ राजभाषा दिवस विशेष – असमिया भाषा का इतिहास ☆

आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की श्रृंखला में पूर्वी सीमा पर अवस्थित असम की भाषा को  असमी,असमिया अथवा आसामीकहा जाता है।असमिया भारत के असम प्रांत की आधिकारिक भाषा तथा असम में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा है। इसको बोलने वालों की संख्या डेढ़ करोड़ से अधिक है।

भाषाई परिवार की दृष्टि से इसका संबंध आर्य भाषा परिवार से है। बांग्ला, मैथिली, उड़िया और नेपाली से इसका निकट का संबंध है। गियर्सन के वर्गीकरण की दृष्टि से यह बाहरी उपशाखा के पूर्वी समुदाय की भाषा है। सुनीतिकुमार चटर्जी के वर्गीकरण में प्राच्य समुदाय में इसका स्थान है। उड़िया तथा बंगला की भांति असमी की भी उत्पत्ति प्राकृत तथा अपभ्रंश से ही हुई है।

यद्यपि असमिया भाषा की उत्पत्ति सत्रहवीं शताब्दी से मानी जाती है। किंतु साहित्यिक अभिरुचियों का प्रदर्शन तेरहवीं शताब्दी में रुद्र कंदलि के द्रोण पर्व (महाभारत) तथा माधव कंदलि के रामायण से प्रारंभ हुआ। वैष्णवी आंदोलन ने प्रांतीय साहित्य को बल दिया।शंकर देव (1449-1567) ने अपनी लंबी जीवन-यात्रा में इस आंदोलन को स्वरचित काव्य, नाट्य व गीतों से जीवित रखा।

सीमा की दृष्टि से असमिया क्षेत्र के पश्चिम में बंगला है। अन्य दिशाओं में कई विभिन्न परिवारों की भाषाएँ बोली जाती हैं। इनमें से तिब्बती, बर्मी तथा खासी प्रमुख हैं। इन सीमावर्ती भाषाओं का गहरा प्रभाव असमिया की मूल प्रकृति में देखा जा सकता है।असमिया एकमात्र बोली नहीं हैं। यह प्रमुखतः मैदानों की भाषा है।

बहुत दिनों तक असमिया को बंगला की एक उपबोली सिद्ध करने का उपक्रम होता रहा है। असमिया की तुलना में बंगला भाषा और साहित्य के बहुमुखी प्रसार को देखकर ही लोग इस प्रकार की धारण बनाते रहे हैं। परंतु भाषा वैज्ञानिकों की दृष्टि से बंगला और असमिया का समानांतर विकास आसानी से देखा जा सकता है। मागधी अपभ्रंश के एक ही स्रोत से निःसृत होने के कारण दोनों में समानताएँ हो सकती हैं। पर उनके आधार पर एक दूसरे की बोली सिद्ध नहीं किया जा सकता।

क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से असमिया के कई उपरूप मिलते हैं। इनमें से दो मुख्य हैं- पूर्वी रूप और पश्चिमी रूप। साहित्यिक प्रयोग की दृष्टि से पूर्वी रूप को ही मानक माना जाता है। पूर्वी की अपेक्षा पश्चिमी रूप में बोलीगत विभिन्नताएँ अधिक हैं। असमिया के इन दो मुख्य रूपों में ध्वनि, व्याकरण तथा शब्दसमूह, इन तीनों ही दृष्टियों से अंतर मिलते हैं। असमिया के शब्दसमूह में संस्कृत तत्सम, तद्भव तथा देशज के अतिरिक्त विदेशी भाषाओं के शब्द भी मिलते हैं। अनार्य भाषा परिवारों से गृहीत शब्दों की संख्या भी कम नहीं है। भाषा में सामान्यत: तद्भव शब्दों की प्रधानता है। हिंदी उर्दू के माध्यम से फारसी, अरबी तथा पुर्तगाली और कुछ अन्य यूरोपीय भाषाओं के भी शब्द आ गए हैं।

भारतीय आर्यभाषाओं की श्रृंखला में पूर्वी सीमा पर स्थित होने के कारण असमिया कई अनार्य भाषा परिवारों से घिरी हुई है। इस स्तर पर सीमावर्ती भाषा होने के कारण उसके शब्द समूह में अनार्य भाषाओं के कई स्रोतों के लिए हुए शब्द मिलते हैं। इन स्रोतों में से तीन अपेक्षाकृत अधिक मुख्य हैं-

(१) ऑस्ट्रो-एशियाटिक – खासी, कोलारी, मलायन

(२) तिब्बती-बर्मी-बोडो

(३) थाई-अहोम

शब्द समूह की इस मिश्रित स्थिति के प्रसंग में यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि खासी, बोडो तथा थाई तत्व तो असमिया में उधार लिए गए हैं। पर मलायन और कोलारी तत्वों का मिश्रण इन भाषाओं के मूलाधार के पास्परिक मिश्रण के फलस्वरूप है। अनार्य भाषाओं के प्रभाव को असम के अनेक स्थान नामों में भी देखा जा सकता है। ऑस्ट्रिक, बोडो तथा अहोम के बहुत से स्थान नाम ग्रामों, नगरों तथा नदियों के नामकरण की पृष्ठभूमि में मिलते हैं। अहोम के स्थान नाम प्रमुखत: नदियों को दिए गए नामों में हैं।

असमिया लिपि मूलत: ब्राह्मी का ही एक विकसित रूप है। बंगला से उसकी निकट समानता है। लिपि का प्राचीनतम उपलब्ध रूप भास्कर वर्मन का 610 ई. का ताम्रपत्र है। परंतु उसके बाद से आधुनिक रूप तक लिपि में “नागरी” के माध्यम से कई प्रकार के परिवर्तन हुए हैं।

असमिया भाषा का व्यवस्थित रूप 13वीं तथा 14वीं शताब्दी से मिलने पर भी उसका पूर्वरूप बौद्ध सिद्धों के “चर्यापद” में देखा जा सकता है। “चर्यापद” का समय विद्वानों ने ईसवी सन् 600 से 1000 के बीच स्थिर किया है। दोहों के लेखक सिद्धों में से कुछ का तो कामरूप प्रदेश से घनिष्ट संबंध था। “चर्यापद” के समय से 12वीं शताब्दी तक असमी भाषा में कई प्रकार के मौखिक साहित्य का सृजन हुआ था। मणिकोंवर-फुलकोंवर-गीत, डाकवचन, तंत्र मंत्र आदि इस मौखिक साहिय के कुछ रूप हैं।

असमिया भाषा का पूर्ववर्ती रूप अपभ्रंश मिश्रित बोली से भिन्न रूप प्राय: 18वीं शताब्दी से स्पष्ट होता है। भाषागत विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए असमिया के विकास के तीन काल माने जा सकते हैं।

14वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी के अंत तक। इस काल को फिर दो युगों में विभक्त किया जा सकता है। पहला वैष्णव-पूर्व युग दूसरा वैष्णव युग। इस युग के सभी लेखकों में भाषा का अपना स्वाभाविक रूप निखर आया है। यद्यपि कुछ प्राचीन प्रभावों से वह सर्वथा मुक्त नहीं हो सकी है। व्याकरण की दृष्टि से भाषा में पर्याप्त एकरूपता नहीं मिलती। परंतु असमिया के प्रथम महत्वूपर्ण लेखक शंकरदेव (जन्म-1449) की भाषा में ये त्रुटियाँ नहीं मिलती हैं। वैष्णव-पूर्व-युग की भाषा की अव्यवस्था यहाँ समाप्त हो जाती है। शंकरदेव की रचनाओं में ब्रजबुलि प्रयोगों का बाहुल्य है।

17वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक। इस युग में अहोम राजाओं के दरबार की गद्यभाषा का रूप प्रधान है। इन गद्य कर्ताओं को बुरंजी कहा गया है। बुरंजी साहित्य में इतिहास लेखन की प्रारंभिक स्थिति के दर्शन होते हैं। प्रवृत्ति की दृष्टि से यह पूर्ववर्ती धार्मिक साहित्य से भिन्न है। बुरंजियों की भाषा आधुनिक रूप के अधिक निकट है।

19वीं शताब्दी के प्रारंभ से। 1819 ई. में अमरीकी बप्तिस्त पादरियों द्वारा प्रकाशित असमीया गद्य में बाइबिल के अनुवाद से आधुनिक असमीया का काल प्रारंभ होता है। मिशन का केंद्र पूर्वी आसाम में होने के कारण उसकी भाषा में पूर्वी आसाम की बोली को ही आधार माना गया। 1846 ई. में मिशन द्वारा एक मासिक पत्र “अरुणोदय” प्रकाशित किया गया। 1848 में असमीया का प्रथम व्याकरण छपा और 1867 में प्रथम असमीया अंग्रेजी शब्दकोश तैयार हुआ। श्रीमन्त शंकरदेव असमिया भाषा के अत्यंत प्रसिद्ध कवि, नाटककार तथा हिन्दू समाज सुधारक थे।

असमीया की पारंपरिक कविता उच्चवर्ग तक ही सीमित थी। भट्टदेव (1558-1638) ने असमिया गद्य साहित्य को सुगठित रूप प्रदान किया। दामोदरदेव ने प्रमुख जीवनियाँ लिखीं। पुरुषोत्तम ठाकुर ने व्याकरण पर काम किया। अठारहवी शती के तीन दशक तक साहित्य में विशेष परिवर्तन दिखाई नहीं दिए। उसके बाद चालीस वर्षों तक असमिया साहित्य पर बांग्ला का वर्चस्व बना रहा। असमिया को जीवन प्रदान करने में चन्द्र कुमार अग्रवाल (1858-1938), लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा (1867-1838) व हेमचन्द्र गोस्वामी (1872-1928) का योगदान रहा। असमीया में छायावादी आंदोलन छेड़ने वाली मासिक पत्रिका जोनाकी का प्रारंभ इन्हीं लोगों ने किया था। उन्नीसवीं शताब्दी के उपन्यासकार पद्मनाभ गोहाञिबरुवा और रजनीकान्त बरदलै ने ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। सामाजिक उपन्यास के क्षेत्र में देवाचन्द्र तालुकदार व बीना बरुवा का नाम प्रमुखता से आता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य को मृत्यंजय उपन्यास के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस भाषा में क्षेत्रीय व जीवनी रूप में भी बहुत से उपन्यास लिखे गए हैं। 40वें व 50वें दशक की कविताएँ व गद्य मार्क्सवादी विचारधारा से भी प्रभावित दिखाई देती है।

अहोम वंश की मुद्रा जिस पर असमिया लिपि में लिखा गया है। असमिया लिपि ‘पूर्वी नागरी’ का एक रूप है जो असमिया के साथ-साथ बांग्ला और विष्णुपुरिया मणिपुरी को लिखने के लिये प्रयोग की जाती है। केवल तीन वर्णों को छोड़कर शेष सभी वर्ण बांग्ला में भी ज्यों-के-त्यों प्रयुक्त होते हैं। ये तीन वर्ण हैं- ৰ (र), ৱ (व) और ক্ষ (क्ष)।

इस तरह असमिया भाषा का इतिहास बहुत प्राचीन और विस्तृत है।

 

© निशा नंदिनी भारतीय 

तिनसुकिया, असम

9435533394

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 15 – कबीर पूछ रहे …. ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज पस्तुत है आपका अभिनव गीत  “कबीर पूछ रहे …..। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 15 – ।। अभिनव गीत ।।

☆ कबीर पूछ रहे ….☆

 

वे लिये हथौड़ा

और छैनी

हम सम्हालते

रहे नसेंनी

 

प्रश्नों से बाहर

क्या आयेंगे

जीवन के सच

को तब पायेंगे

 

ठोंक तीन उँगलियाँ

हथेली पर

भैया जी मींड़

रहे खैनी

 

सपनों सा स्वाद

लिये तरकारी

पकती है रोज-

सुबह, सरकारी

 

गालें अब क्या

कबीर पूछ रहे

साखी फिर सबद

या रमैनी

 

खिड़की पर बैठ

गई फुलवारी

भीतर भड़ास

लिये है क्यारी

 

खिलना, मुरझाना

तो आदत है

फूलों     की

अपनी पुश्तैनी

 

© राघवेन्द्र तिवारी

20-06-2020

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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सूचना/Information ☆ निवेदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ निवेदन

 

साहित्यीक बंधू भगिनी आणि रसिक वाचकहो

आपणा सर्वांच्या सहकार्यामुळे आणि उत्तम प्रतिसादामुळे ‘ई-अभिव्यक्ती – मराठी’ आज एक महिना पूर्ण करीत आहे.

भविष्य काळातही आपण सर्वांनी असेच सहकार्य करावे आणि उत्तमोत्तम साहित्य सादर करण्याची संधी संपादक मंडळास द्यावी, ही अपेक्षा आणि नम्र विनंती.

 

दिनांक चौदा सप्टेंबर भाषा  भगिनी  हिंदीस हिंदी दिनाच्या हार्दिक शुभेच्छा

 

आभार 

सम्पादक मंडळ (मराठी) 

श्रीमती उज्ज्वला केळकर 

Email- [email protected] WhatsApp – 9403310170

श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

Email –  [email protected]WhatsApp – 9421225491

 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 43 ☆ अभंग – शब्दगंगा… ☆ कवी राज शास्त्री

कवी राज शास्त्री

(कवी राज शास्त्री जी (महंत कवी मुकुंदराज शास्त्री जी)  मराठी साहित्य की आलेख/निबंध एवं कविता विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। मराठी साहित्य, संस्कृत शास्त्री एवं वास्तुशास्त्र में विधिवत शिक्षण प्राप्त करने के उपरांत आप महानुभाव पंथ से विधिवत सन्यास ग्रहण कर आध्यात्मिक एवं समाज सेवा में समर्पित हैं। विगत दिनों आपका मराठी काव्य संग्रह “हे शब्द अंतरीचे” प्रकाशित हुआ है। ई-अभिव्यक्ति इसी शीर्षक से आपकी रचनाओं का साप्ताहिक स्तम्भ आज से प्रारम्भ कर रहा है। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “अभंग—शब्दगंगा… )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 14 ☆ 

☆ अभंग—शब्दगंगा… ☆

शब्दांचा प्रवाह,

वाहता असावा

मनात नसावा, न्यूनगंड…०१

 

शब्द गंगा सदा

वैचारिक ठेवा

अनमोल हवा, संदेश तो…०२

 

निर्मळ, सोज्वळ

असावे प्रेमळ

साधावे सकळ, योग्यकर्म…०३

 

शब्द ज्ञान देती

शब्द भूल देती

शब्द त्रास देती, नकळत…०४

 

म्हणुनी सांगणे

सहज बोलणे

शब्दांत असणे, प्रेमळता…०५

 

कवी राज म्हणे

अलिप्त असावे

सचेत रहावे, सदोदित…०६

 

कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री.

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन,

वर्धा रोड नागपूर,(440005)

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मी ☆ श्री शरद कुलकर्णी

 ☆ कवितेचा उत्सव ☆ मी ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆ 

 

ऋचा वेदनेची मी,

साक्षेपी व्यथेचा वेद.

मूर्तिमंत यातनांचा,

मी कृतार्थ प्रवाही स्वेद.

सावरुन सर्व किनारे,

मी व्रतस्थ कालसरिता.

दैनंदिनीत स्वैरमुक्त,

तरी बंदिस्त मी कविता.

©  श्री शरद कुलकर्णी

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ लोककथा – मुकणा मोर ☆ डॉ. मंजुषा देशपांडे

☆ जीवनरंग ☆ लोककथा – मुकणा मोर ☆ डॉ. मंजुषा देशपांडे 

 

खूप वर्षांपूर्वी गोंडवनात अगदी चिमण्यासारखे मोर असत त्यावेळची गोष्ट आहे ही.  त्या राज्यात मोराला खूपच महत्व होते.  राजाच्या किरीटावर चक्राकार मोरपिसे असत. राणीच्या किरीटावर पाच आणि अंबाड्यावरच्या सुवर्ण फूलावरही 2 मोरपिसे असत.  राजवाड्यातील जवळ जवळ सर्व दागिने मोरपिसांच्या घडणीचे बनवले जात. राजमुद्रेवरही मोराचे चिन्ह होते.  राजवाड्यात सगळीकडे मोराच्या विविध छटांची चित्रे चितारलेली असत.

त्या वाड्यात शंभर सव्वाशे लफ्फेदार पिसा-यांचे मोर  आणि त्यांच्या लांडोरी इकडून तिकडे सतत बागडत असत. राजवाड्यापासून दोन कोस दूरच्या जंगलातल्या टेकडीवर एक पठार होते.

ती होती मोरनाची! प्रत्येक वर्षी ‘शरद,चैत्र आणि वैशाख पौर्णिमेच्या रात्री  पिसारा झूलवत त्या जंगलातले सगळे मोर आणि मोरणी तिथे जात आणि रात्रभर स्वर्गीय नर्तन होई. दुसर्‍या दिवशी तिथे मोरपिसांचा नुसता सडा पडे.

वास्तविक मोर सोडून दुसर्‍या प्राण्यांना त्या पौर्णिमेच्या दिवशी मोरनाचीवर जायची मुभा नव्हती.  माणसे सोडून इतर सर्व प्राणी हा नियम कसोशीने पाळत.

राजा आणि त्याची माणसे मात्र पौर्णिमेच्या संध्याकाळी टेकडीवरच्या उंच झाडांवर चढून बसत आणि त्या सोहळ्याची मजा लुटत.

त्या मोरांचा एक राजा होता.  त्याला या प्रकाराचा खूपच राग येई.  पण करणार काय! त्याने एकदा राजाला एकटे गाठून सांगितले,  “चोरून मोरनाची पहाणा-यांच्या घरात मुकणा मोर जन्माला येतो”

” मुकणा मोर म्हणजे”? राजाने विचारले

“वयात आल्यावरही ज्याला पिसारा फुटू शकत नाही असा मोर”,  मोराने सांगितले. राजाला नीटसे कळले नाही पण राणीला कळले. तिला खूप भीती वाटली.  तिचे होणारे मूल तसे जन्माला आले तर… राजाने सारेच हसण्यावारी नेले.

राणी मनात झुरू लागली. ‘ मला मुलगी होऊ दे’,   म्हणून मनोमन प्रार्थना करायला लागली.  खरे तर राज्याला चांगला  वारस मिळावा म्हणून तिने किती व्रतवैकल्ये केली होती. ती लवकरच फळाला येणार होती.

त्या दिवशीही शरद पौर्णिमा होती.  राजा आणि त्याचे मित्रमंडळ शिकारीसाठी जंगलात गेले होते. राणीला खूप अस्वस्थ वाटत होते. ती आणि तिच्या सख्या पुनव पूजेसाठी त्यांच्या देवीच्या मंदिरात जाणार होत्या. पूजा झाल्यावर जेवण आणि त्यानंतर नाचाचे फेरे.

राणी पूजा करुन परत येणार होती. खरे तर तिचे दिवस भरत आले होते पण पूजा झाली नाही तर.. तो अपशकून मानला जाई. त्यामुळे ती जड पावले  टाकत कशीबशी मंदिरात पोचली. तिने देवीची पूजा केली. ‘जन्मणारे मूल चांगले निपजू दे.’  त्याचा वंश वाढू दे!,  म्हणून डोळ्यात पाणी आणून तिने देवीकडे प्रार्थना केली.

देवळातच तिच्या पोटातून कळा येऊ लागल्या.  सख्यांनी लगबग करून सगळी व्यवस्था केली आणि राणीने एका देखण्या राजपुत्राला जन्म  दिला.

राज्यभर गूळाच्या बट्टया वाटण्यात आल्या. राजाने चहुबाजूंना सैनिक पाठवून जंगलात अस्वलाने तयार त्याच्या बाळंतीण अस्वलीसाठी तयार केलेले लाडू शोधून आणायला पाठवले.

हे लाडू फारच पौष्टिक असतात असे म्हणतात.   मोहाची फूले,  बाभळीचा डिंक, चारोळ्या आणि मध घालून ओबडधोबड बांधलेले लाडू जर कोण्या आईने खाल्ले  तर आई आणि बाळ दोन्ही टणटणीत व्हायलाच पाहिजे… रोज राणीपुढे त्या लाडवांचा ढीग पडायला लागला.

बाळ खरंच सुदृढ झालं आणि बापासारखं शूरही व्हायला लागलं.  राणीला मात्र काही खटकत होतं… कारण तिचं बाळंतपण करणा-या एका म्हातारीने तिला मुद्दाम वाड्यात येऊन. ‘राजपुत्र मुकणा मोर असणार आहे’, असे नुकतेच सांगितले होते. राजपुत्र खरे तर फक्त आठ वर्षांचा होता आणि राणीची कूस त्यानंतर काही भरली नव्हती.

राणीने देवीची रोज पूजा घालायचे ठरवले.  रोज पहाटे जंगलात फिरून सुंदर आणि सुवासिक फूले आणून संध्याकाळी देवीची सालंकृत पूजा बांधे आणि दिवसभर काही न खाता संध्याकाळी थोडा कुटकीचा भात खाऊन उपास सोडी.

हळुहळू राजाच्याही लक्षात यायला लागले . आता दोघे मिळून ती पूजा करत. काही वर्षे गेली.  राजपुत्र 13 वर्षांचा झाला. त्याच्यासारखा तिरंदाज दुसरा कुणी नव्हता. त्याची भाला फेक तर भल्याभल्यांना अचंबित करे.

मुलगा आईबापांच्या आज्ञेतही होता. पण राजा राणी मात्र झूरत होती.

एका दिवशी पूजेनंतर राजा राणी विमनस्कपणे बसले होते कारण राजपुत्र आता लवकरच 15 वर्षांचा होणार होता.  मोठा समारोह करायचा होता प्रथेप्रमाणे त्यानंतर राजपुत्र वर्षभर जंगलात राहून परत आला की त्याला युवराज अभिषेक व्हायचा होता आणि त्यानंतर वीस वर्षांच्या आत त्याचे लग्न करुन देणे भाग होते. एकमेकांशी काहीही न बोलता दोघेही हाच विचार करत होते. अचानक देवीच्या गाभा-यातून एक म्हातारी आजी बाहेर आली.  तिने राणीला सांगितले,  “सलग पाच  दिवस, मुकण्या मोराचे मांस मोराला खायला घाल.” सगळं मार्गाला लागेल.

जंगलात मुकण्या मोराला शोधणे सोपे नव्हते. कारण  त्या मोरांना मोरनाचीत प्रवेश नसतो त्यामुळे ते  पौर्णिमेचा तो मयूर क्रीडेचा सोहळा,  एखाद्या उंच झाडावर बसून टिपे गाळत पाहतात.

राजाने किंवा कुणीच असला मोर कधी पाहिला नव्हता.

पुन्हा मयूर राजा मदतीला आला.  तो म्हणाला..”मुकण्याला पिसारा नसला आणि त्याला पिल्ले द्यायची क्षमता नसली तरी तो अतिशय चिडलेला असतो  आणि तो मोरांमध्ये सर्वात बलवान असतो.  तो दहा नागांशी एकटा लढेल आणि जिंकेल.  ”  आपल्या जवळपास कुठे मुकणा मोर नाही पण सात टेकड्या ओलांडून पलिकडच्या जंगलात तो रहातो.”

राजा म्हणाला,  ” तुला कसे माहीत?

मोर म्हणाला, ” मागच्या जन्मी मी माणूस असताना मी टेकडीवरच्या झाडांवर चढून मोरनाचीवरचा पौर्णिमेचा सोहळा पहात असताना,  झाडावरून पडून मृत्यू पावलो होतो.

“खरेतर मीच मुकणा व्हायचो पण कसलासा डिंक आणि मखमलीचे किडे खाऊन मला पिसारा आला पण माझ्या पहिल्याच अंड्यातून मुकणा मोर निपजला पण त्यानं निसर्गाच्या विरूध्द जायचं नाकारलं आणि तो दूर जंगलात निघून गेला.”  मोर हुंदके देऊन रडू लागला.  राजा राणीच्या डोळ्यातूनही अश्रू वाहू लागले. ही कहाणी ऐकत मागे उभा असलेला राजपुत्र म्हणाला, ” मीही मुकणाच आहे ना,  मग त्या मोराच्या संगतीने मी त्याच्या जंगलात राहीन” मला राज्याचा लोभ नाही.  असे म्हणून तो कुणाचेही काही न ऐकता उजाडायच्या आत जंगलात निघून गेला.

राजानेही  पुन्हा कधी मोरनाची पाहिली नाही.

यथावकाश राणीला दुसरा मुलगा झाला आणि तो राजा बनला.

इकडे राजपुत्र मुकण्या मोराला भेटला आणि त्यांनी मुकण्यांची मोरनाची सुरू केली.  वास्तविक मोरनाचीचा एक उद्देश मोराचे प्रजनन असा असतो पण मुकण्यांच्या मोरनाचीत केवळ क्रीडा आणि निखळ आनंद असतो.

अजूनही नवेगावच्या जंगलातल्या एका टेकडीवर ‘मुकण्यांची मोरनाची’ आहे.  दरवर्षी वैशाख पौर्णिमेला पंचक्रोशीतले मुकणे मोर आणि मुकणे पुरुष तिथे जमा होतात आणि पुढचे चार दिवस मोठी धूम असते.

©  डॉ. मंजुषा देशपांडे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सुखी निवृत्त जीवनाचा कानमंत्र ☆ श्री उद्धव भयवाळ 

श्री उद्धव भयवाळ

संक्षिप्त परिचय 

सेवानिवृत्त बँक अधिकारी

  • विनोदी कथा, एकांकिका, बालकथा , बालकवितेपासून लावणी प्रकारापर्यंत लिखाण .
  • “इंद्रधनू” हा कवितासंग्रह आणि “हसरी फुले” हा बालकवितासंग्रह  “तारांबळ” हा विनोदी कथासंग्रह प्रकाशित झाला आहे.
  • “हसरी फुले” या बालकवितासंग्रहास  “अंकुर वाड्मय पुरस्कार-२००८” प्राप्त.
  • “सुभद्रा प्रतिष्ठान” सेलू (जि. परभणी) यांचा कवितेसाठीचा प्रतिष्ठेचा “गौरव पुरस्कार” .
  • नाशिक येथील “कलाकुंज”  प्रकाशनाच्या वतीने साहित्यसेवेबद्दल नाशिक येथे सत्कार.
  • भारतीय नरहरी सेना {महाराष्ट्र प्रदेश} यांचा ‘नवरत्न’ पुरस्कारांपैकी साहित्य क्षेत्रातील पुरस्कार.
  • ‘महाराष्ट्र राज्य शैक्षणिक संशोधन व प्रशिक्षण परिषद पुणे यांच्यातर्फे मी इंग्रजीमध्ये अनुवादित केलेल्या “साने गुरुजींच्या छान छान गोष्टी” या पुस्तकाचा समावेश.
  • अ.भा.सानेगुरुजी कथामाला,जालना यांच्या बालकुमार कविसंमेलन अध्यक्षपद.
  • “सलिला साहित्यरत्न सन्मान” प्रदान.”अहिंदी भाषी क्षेत्रामध्ये हिंदी भाषेतील साहित्य निर्मिती” यासाठी हा राष्ट्रीय स्तरावरील सन्मान.

☆ विविधा ☆ सुखी निवृत्त जीवनाचा कानमंत्र ☆ श्री उद्धव भयवाळ 

एका पाहणीनुसार भारतामध्ये साठ वर्षांवरील जनसंख्या आठ कोटी आहे. याचा अर्थ आज घडीला भारतातील सात टक्के लोक ‘ज्येष्ठ नागरिक’ या व्याख्येत येतात. आणि दरवर्षी वेगवेगळ्या आस्थापनांमधून साधारणपणे सात लाख लोक निवृत्त होत आहेत. म्हणजे ज्येष्ठ नागरिकांची संख्या दिवसेदिवस वाढत जाणार हे निश्चित. यावरून कुणाचा असा समज होऊ शकतो की, या ज्येष्ठ नागरिकांपुढे जगण्यासाठीच्या खूप समस्या असणार आहेत. काही प्रमाणात ते खरे असेलही. पण निवृत्तीनंतरचे जीवन सुखी, आनंदी आणि चैतन्यमय कसे करायचे ते आपल्या हातात आहे.

निवृत्त जीवन आनंदाने जगण्यासाठी प्रामुख्याने तीन गोष्टींची आवश्यकता आहे.

१. आर्थिक स्थैर्य  २. आरोग्य   ३. प्रेमाची माणसं  (आप्तेष्ट, मित्र इत्यादि )

त्यापैकी आर्थिक स्थैर्य हवे असण्यासाठी निवृत्तीनंतर नियमित मासिक उत्पन्नाची हमी पाहिजे. दरमहा मिळणाऱ्या निवृत्ती वेतनाव्यतिरिक्त बँकेमधील ठेवीवर मिळणारे मासिक व्याज हासुद्धा एक चांगला पर्याय असू शकतो. आपण कष्टाने कमावलेल्या पुंजीचा आपल्याला निवृत्तीनंतर चांगला उपयोग व्हावा म्हणून जास्तीत जास्त परतावा मिळेल अशा ठिकाणी पैसा गुंतवावा. मात्र त्या गुंतवणुकीत कमीत कमी जोखीम असावी. कारण जसजसे वय वाढत जाते, तसतशी जोखीम घेण्याची मानसिकता कमी होत जाते. त्याचप्रमाणे अचानक उद्भवणाऱ्या आजारपणासारख्या गोष्टींसाठी थोडे पैसे बाजूला काढून ठेवावेत म्हणजे ऐनवेळी त्यासाठी धावपळ करावी लागणार नाही.

दुसरी महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे आपले आरोग्य. ते चांगले राहण्यासाठी आपणास झेपेल तसा नियमित व्यायाम करणे, खाण्यापिण्याच्या बाबतीत योग्य ती काळजी घेणे आणि स्वत:ला कशात तरी गुंतवून ठेवणे आवश्यक आहे. जसे की, नोकरीच्या व्यस्त वेळापत्रकामध्ये आपले काही छंद जोपासायचे राहून गेले असतील तर आता ते आपण करू शकतो. कारण अशा गोष्टींमुळे आपला मेंदू तरतरीत राहतो. त्याचप्रमाणे स्वत:चा आणि जोडीदाराचा आरोग्यविमा आपण नोकरीमध्ये असतांनाच काढून ठेवणे हेसुद्धा आवश्यक आहे.

सुखी निवृत्त जीवनासाठी तिसरी महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे प्रेमाची माणसे. यामध्ये ज्याप्रमाणे आपले कुटुंबीय आहेत, त्याचप्रमाणे नातेवाईक आणि मित्रही आहेत. या सर्वांना आपल्याविषयी प्रेम आणि काळजी वाटत असतेच. पण ते प्रेम वृद्धिंगत कसे होईल हे पाहणे आपल्याच हातात आहे. यासाठी आधी काही पथ्ये आपण पाळणे आवश्यक आहे. एक म्हणजे घरामध्ये कुणालाही अनाहूत सल्ला देण्याचे टाळावे. मुलांना त्यांचा संसार त्यांच्या मनाप्रमाणे करू द्यावा. त्यात अनावश्यक ढवळाढवळ नको. घरातील मुले, सुना, नोकरीस असतील तर नातवंडांची काळजी घेणे हे आपणास जमू शकते. त्याचप्रमाणे विजेचे किंवा टेलिफोनचे बील भरणे इत्यादी छोटी छोटी कामे आपण करू शकतो. त्यामुळे कुटुंबियांना आपली मदतच होते. दुसरे म्हणजे नोकरीमध्ये व्यस्त असतांना आपण जास्तीत जास्त वेळ नोकरीच्या ठिकाणी  घालवलेला असतो. कुटुंबियांना देण्यासाठी तेव्हा वेळच नसतो. आता निवृत्तीनंतर मात्र आपण जास्तीत जास्त वेळ कुटुंबियांसाठी द्यायला हवा. कुटुंबियांसोबत पर्यटनाला जाणे, सर्वांनी एकत्र बसून नाटक, सिनेमा पाहणे हे आपण करू शकतो. आपल्या जोडीदाराच्याही काही इच्छा, आकांक्षा आपल्या नोकरीच्या व्यग्रतेमुळे पूर्ण करायच्या राहून गेल्या असतील तर आता त्या पूर्ण करण्यासाठी ही चांगली संधी आहे. कारण प्रेम दिल्याने प्रेम वाढत असते ही गोष्ट सदैव ध्यानी असू द्यावी.

त्याचप्रमाणे सामाजिक कार्यासाठीसुद्धा थोडा वेळ आपल्या दिनक्रमातून काढला पाहिजे. कारण ज्या समाजात आपण राहतो, त्या समाजाचेही आपण देणे लागत असतो. तसेच नवनवीन मित्र मिळविणे, एखाद्या सामाजिक संस्थेशी स्वत:ला जोडून घेणे, सदैव उत्साही राहण्याचा प्रयत्न करणे या गोष्टी नक्कीच आपले निवृत्त जीवन सुखी बनवितील यात शंका नाही.

© श्री उद्धव भयवाळ

औरंगाबाद

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ थोडं स्वतःसाठी ☆ सौ. राजलक्ष्मी देशपांडे

☆ मनमंजुषेतून ☆ थोडं स्वतःसाठी ☆ सौ. राजलक्ष्मी देशपांडे

 

“स्वत:साठी जगलास तर मेलास दुसऱ्यासाठी जगलास तर जगलास” हे वाक्य आपण लहानपणापासून ऐकत असतो. ते पूर्णपणे खरं आहे. पण या वाक्याचा विपर्यास ही झालाय असं आपलं मला वाटतं.

आजूबाजूला काय दिसतं?

पूर्ण आयुष्य संसाराला, मुलांना वाहिलेली गृहिणी असते. तिचं समर्पण वंदनीय असतं. पण सतत दुसऱ्यांच्या म्हणजे मुलांच्या, घरातल्या संदर्भात जगण्याची तिला सवय होते. मात्र एका वळणावर मुलं स्वयंपूर्ण होतात. त्यांचं आईवर खूप प्रेम असलं तरी दैनंदिन आयुष्यात आईची गरज कमी होते. घरही स्थिरस्थावर होतं. मग मिळालेल्या या एवढ्या मोठ्या वेळेचं करायचं काय हा प्रश्न पडतो. शरीराची दुखणी, मनाचा एकटेपणा यांचा संबंध मग जुन्या घटनांशी, व्यक्तींशी, अगदी ज्यांच्यासाठी आयुष्य ओवाळून टाकलं, त्या

मुलांशीही जोडला जातो.

पुरूषांचं  हेच होतं. नोकरी, व्यवसायातले कष्ट संपतात. घरात राहण्याचा वेळ वाढतो. मग घरातल्या अनेक गोष्टी ज्या वर्षानुवर्षे चालू होत्या पण जाणवलेल्या नव्हत्या , त्या अचानक जाणवायला  लागतात. बारिक सारिक गोष्टीत हस्तक्षेप सुरू होतो. समाजातल्या,  राजकारणातल्या समस्यांवर कृतीशून्य चर्चा मोठ्या उत्कटतेने सुरू होते. आणि समवयस्कांखेरीज इतरांना त्यातली निरर्थकता जाणवल्यामुळे ती निरस वाटू लागते.

या दोन्ही मागचं कारण मला वाटतं, आपण नेहमी”दुसऱ्यांच्या संदर्भात”जगतो. “दुसऱ्यांसाठी”असं मी म्हणणार नाही. कारण दुसऱ्यांसाठी आपण जे करतो त्याचा आपल्याला आनंद होतो म्हणून करतो हे खरं आहे. त्यामुळं तसं आपण दुसऱ्यांसाठी काहीच करत नाही. दुसऱ्यांच्या संदर्भात करतो. तर आपण मूलतः आपल्यासाठी जन्मलो आहोत आणि आपल्यासाठी जगतो आहोत हेच आपण विसरतो.

आपण सवड असली तरी व्यायाम करत नाही,  फिरायला जात नाही. स्वत:साठी योग्य ते खात नाही.

मनाला विकसित करण्यासाठी ध्यान, स्वसंवाद,  विवेकपूर्ण विचारप्रक्रियेची समज याकडे लक्ष देत नाही. (अर्थात या विवेकाची सवय लगेच होत नाही. बऱ्याचवेळा अविवेकानं वागून झाल्यावर “अरेरे. . . चुकलं आपलं”असं वाटतं. )पण तेही ठीक आहे. निदान यामुळे दुसऱ्यांवर रागवण्याचा क्षणिक उद्रेक झाला तरी नाराजीची पुटं चढत नाहीत मनावर.

स्वत:साठी काही पाठांतर करण्यात आपण वेळ देत नाही. कारण पाठांतर वगैरे लहान मुलांशी संबंधित. . . आता या वयात मला काय गरज? असं वाटतं. पण वाढत्या विस्मरणशक्तीवर काही श्र्लोकांच्या पाठांतरासारखे इतरही स्मरणशक्तीचे व्यायाम उपयुक्त असतात.

यातल्या कशालाही पैसे लागत नाहीत. २४तासात कमी होत चाललेल्या आणि कधीकधी वाढलेल्यासुध्दा जबाबदाऱ्या सांभाळून यातलं सगळं नाही पण थोडं काहीतरी आपण करू शकतोच. पण असं फक्त स्वत:साठी काही करायची आपल्याला सवय नसते. या अर्थानं स्वत:साठी जगणं हे फार महत्त्वाचे आहे. पैसा उडवणं आणि गुंतवणं यात फरक आहे. तोच फरक स्वत:पुरतं जगणं आणि स्वत: साठी जगणं यात आहे असं मला वाटतं. स्वत:पुरतं जगताना तुम्हाला दुसऱ्याचा विचार करायची,  दुसऱ्यासाठी झिजण्याची गरज नसते. पण स्वत:साठी जगण्यासाठी दुसऱ्यांसाठीचं जगणं सोडायची गरज नसते. गरज असते ती फक्त सतत दुसऱ्यांच्या संदर्भात जगणं सोडायची.

हेच तर “कैझान”आहे जे आपण कंपन्यांमध्ये राबवतो पण स्वत:च्या  आयुष्यात कैझानची गरज आणि ते अत्यंत छोट्या गोष्टीतून कसं इंम्प्लिमेंट करता येईल याचा विचार करतच नाही. माझ्या posts हे माझं loud thinking ही असतं हं. . . कारण मीही प्रवासीच आहे की कैझानची.

© सौ. राजलक्ष्मी देशपांडे

मोबाईल नं. ९८५०९३१४१७

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – सप्तदशोऽध्याय: अध्याय (15) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय १७

(आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद)

 

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌।

स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते ।।15।।

सरल सत्य प्रिय भाषण औ” दैनिक स्वाध्याय

जिस से न उद्वेग वह वाचिक तप कहलायॅ ।।15।।

भावार्थ :   जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम ‘यथार्थ भाषण’ है।) तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है ।।15।।

 

Speech which causes no excitement and is truthful, pleasant and beneficial, the practice of the study of the Vedas, are called austerity of speech. ।।15।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

[email protected] मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 64 ☆ व्यंग्य >> कृतघ्न नयी पीढ़ी ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  प्रस्तुत है  एक अतिसुन्दर कालजयी  व्यंग्य  ‘कृतघ्न नयी पीढ़ी’। डॉ परिहार जी ने इस व्यंग्य के माध्यम से वर्तमान परिवेश में  आत्ममुग्ध साहित्यकार की मनोव्यथा को मानों स्याही में घोल कर कागज पर उतार दिया है। इस कालजयी व्यंग्य  के लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को  सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 64 ☆

☆ व्यंग्य – कृतघ्न नयी पीढ़ी

बंधु, आज दिल एकदम बुझा बुझा है। कुछ बात करने का मन नहीं है। वजह यह है कि कुछ देर पहले कुछ लड़के दुर्गा जी का चन्दा माँगने आये थे। मैंने रोब से कहा, ‘ठीक है, इक्यावन रुपया लिख लो। ‘ वे रसीद काटते हुए बोले, ‘थैंक यू, अंकल जी। क्या नाम लिख दें?’

सवाल सुनकर मेरा दिल भरभराकर बैठ गया। ऐसा बैठा कि फिर घंटों नहीं उठा। निढाल पड़ा रहा। बार बार दिमाग़ में यही बात बवंडर की तरह घूमती रही कि साहित्य की सेवा में अपने बेशकीमती तीस साल देने और अपने खून को स्याही की जगह इस्तेमाल करने के बाद भी यह हासिल है कि इलाके की नयी पीढ़ी हमारे नाम से नावाकिफ़ है। बस यही लगता था कि धरती फट जाए और हम अपने साहित्य के विपुल भंडार को लिये-दिये उसमें समा जाएं। यह पीढ़ी हमारे बहुमूल्य साहित्य की विरासत पाने लायक नहीं है।

हमसे यह गलती ज़रूर हुई कि हम अपने ड्राइंग रूम से निकल कर सड़क पर नहीं आये। कागज़ पर क्रान्ति करते रहे। ड्राइंग रूम के भीतर बैठे बैठे रिमोट कंट्रोल से दुनिया को बदलते रहे।  ‘आम आदमी’ की माला पूरी निष्ठा से जपते रहे, लेकिन इस आम आदमी नाम के जीव को ढूँढ़ नहीं पाये। आम आदमी की तरफ पीठ करके श्रीमानों को सलाम बजाते रहे।  इस बीच हमारे इलाके के बहुत मामूली और घटिया लोग जनता की समस्याओं को लेकर दौड़ते रहे, उनके मरे-जिये में शामिल होते रहे, उनके लिए नेताओं-अफसरों से जूझते रहे। हमारी इस मामूली भूल के कारण हम जैसे महत्वपूर्ण लोग ड्राइंग रूम में ही बैठे रह गये और फालतू लोगों ने बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के बीच घुसपैठ कर ली। अब ये बच्चे हमसे हमारा नाम पूछते हैं तो हमारे मन में ग़ालिब का यह शेर कसकता है—‘पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है, कोई बतलाये कि हम बतलायें क्या?’

थोड़ी सी गड़बड़ी यह हुई कि बीस लाख की आबादी वाले इस शहर में से पन्द्रह बीस लोगों को चुन कर हम ‘शतरंज के खिलाड़ी’ की तरह दुनिया से बेख़बर,एक कोना पकड़ कर बैठे रह गये। ये पन्द्रह बीस लोग हमारी पीठ ठोकते रहे और हम उन्हें ‘वाह पट्ठे’ कहते रहे। हम उनकी घटिया रचनाओं पर झूमते रहे और वे हमारी घटिया रचनाओं पर सिर धुनते रहे। उन्हीं के साथ बैठकर चाय, सिगरेट और कुछ अन्य चीज़ें पीते रहे और दुनिया की दशा और दिशा पर ज्ञान बघारते रहे। जब बाहर निकले तो पाया कि दुनिया दूसरी दिशा में खिसक गयी है।

आपकी सूचनार्थ बता दूँ कि साहित्य के शब्दकोश में ‘आलोचना’ का अर्थ ‘प्रशंसा’ होता है। साहित्यकार का मन कोमल होता है, आलोचना का आघात उसे बर्दाश्त नहीं होता। इसलिए गोष्ठियों में आलोचना के नाम पर ख़ालिस तारीफ के अलावा कुछ नहीं होता। कोई मूर्ख साहित्य की पवित्रता के नशे में आलोचना कर दे तो मारपीट की नौबत आ जाती है। तीन चार साल पहले ‘वीरान’ और ‘बेचैन’ उपनाम वाले जो दो साहित्यकार स्वर्गवासी हुए थे वे वस्तुतः एक गोष्ठी में आलोचना के शिकार हुए थे। किसी नासमझ ने गोष्ठी में उनकी कविताओं को घटिया बता दिया था और चौबीस घंटे के भीतर उनकी जीवनलीला समाप्त हो गयी थी। यह तो अच्छा हुआ कि हादसा गोष्ठी के दौरान नहीं हुआ, अन्यथा सभी हाज़िर साहित्यकार दफा 302 में धर लिये जाते।

नयी पीढ़ी के बीच हमारी पहचान न बन पाने का ख़ास कारण यह है कि नयी पीढ़ी गुमराह है। टीवी, मोबाइल से चिपकी रहती है, साहित्य से कुछ वास्ता नहीं रहा। हमारा उत्कृष्ट लेखन बेकार जा रहा है। जल्दी ही हम साहित्यकार सरकार से माँग करने जा रहे हैं कि पच्चीस साल तक की उम्र के लोगों के लिए टीवी और मोबाइल कानूनन निषिद्ध कर दिया जाए और उनके लिए साहित्य का अध्ययन अनिवार्य कर दिया जाए। साहित्य में भी चाहे प्रेमचंद का साहित्य न पढ़ा जाए, लेकिन मेरे जैसे हाज़िर साहित्यकारों का साहित्य गर्दन पकड़कर पढ़ाया जाए। हमारी किताबों की बिक्री और हमारी रायल्टी बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी है।

कुछ कुचाली लोग कहते हैं कि आज के साहित्य में दम नहीं है, वह पाठक को पकड़ता नहीं है, और इसीलिये पाठक उससे दूर भागता है। यह सब दुष्प्रचार है। हम तो हमेशा बहुत ऊँचे स्तर का साहित्य ही रचते हैं (यकीन न हो तो हमारे मित्रों से पूछ लीजिए), लेकिन इस देश के पाठक का कोई स्तर नहीं है। जिस दिन पाठक मेरे साहित्य को खरीदने-पढ़ने लगेगा उस दिन समझिएगा कि उसका स्तर सुधर गया।

कुछ लोग कहते हैं कि आज के लेखक को जीवन की समझ नहीं है, उसके साहित्य में पाठक को कुछ मिलता नहीं है। मुझे यह सुनकर हँसी आती है। हमारे साहित्य में तो जीवन-तत्व भरा पड़ा है। जिसमें समझ हो वह ढूँढ़ ले। हीरा खोजने के लिए गहरे खोदना पड़ता है। ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ’। हमारे साहित्य में पैठो, मालामाल होकर बाहर निकलोगे। किनारे बैठे रहोगे तो मोती कैसे पाओगे भाई? हाँ,जब मिल जाए तो हमें ज़रूर सूचित कीजिएगा।

हमसे यह गलती भी हुई कि सारे वक्त छपने के लिए संपादकों की ठुड्डी सहलाते रहे, किताब के विमोचन के लिए मंत्रियों-नेताओं के चक्कर लगाते रहे, और पुरस्कारों के लिए समितियों के सदस्यों को साधते रहे। अपनी किताबों को कोर्स में लगवाकर कुछ माया पैदा करने के लिए दौड़-भाग करते रहे। इस बीच पाठक हमारी पकड़ से खिसक गया। हम जनता के बीच से ‘कच्चा माल’ उठाकर वापस अपने खोल में घुसते रहे। अपना तैयार माल लेकर जनता के बीच आने का आत्मविश्वास और साहस नहीं रहा, इसलिए अपने ‘सुरक्षा-चक्र’ के बीच बैठे, मुँहदेखी तारीफ सुन सुन कर आश्वस्त और मगन होते रहे।

जो भी हो, नयी पीढ़ी को चाहिए कि हमारा साहित्य खरीदे और पढ़े। माना कि किताबों की कीमत ऊँची है, लेकिन प्रकाशकों, लेखकों और सरकारी खरीद में मददगार अधिकारियों को लाभ देने की दृष्टि से यह उचित है। माना कि देश की जनता गरीब है और रोटी के लाले पड़े हैं, लेकिन साहित्य की अहमियत को देखते हुए पेट पर गाँठ लगाकर उसे हमारी किताबें खरीदना चाहिए। जब लोग पान खाकर थूक सकते हैं तो हमारा साहित्य खरीद कर ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

नयी पीढ़ी का फर्ज़ बनता है कि देश में हमारे योगदान को समझे और हम पर धन और सम्मान की वर्षा करे। हर हफ्ते हमारा अभिनन्दन करे और हमारी जन्मतिथि और पुण्यतिथि को पर्वों की तरह मनाये। हमें भले ही उससे ताल्लुक रखने की फुरसत न मिले, लेकिन वह हमें न भूले।

फिलहाल तो बंधु, उन लड़कों के रुख़ से दिल बहुत गिरा है। मायूसी ही मायूसी है। शाम को एक गोष्ठी है। उसमें मित्रों से मरहम लगवाऊँगा, तसल्ली के दो बोल सुनूँगा, तब कुछ मनोबल वापस लौटेगा। अभी तो बात करने का मन नहीं है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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