हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 42 ☆ लघुकथा – कुशलचन्द्र और आचार्यजी ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

(आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  की लघुकथा  ‘कुशलचन्द्र और आचार्यजी ’  में  डॉ परिहार जी ने उस शिष्य की पीड़ा का सजीव वर्णन किया है जो अपनी पढ़ाई कर उसी महाविद्यालय में व्याख्याता हो जाता है । फिर किस प्रकार उसके भूतपूर्व आचार्य कैसे उसका दोहन करते हैं।  इसी प्रकार का दोहन शोधार्थियों का भी होता है जिस विषय पर डॉ परिहार जी ने  विस्तार से एक व्यंग्य  में चर्चा भी की है। डॉ परिहार जी ने एक ज्वलंत विषय चुना है। शिक्षण के  क्षेत्र में इतने गहन अनुभव में उन्होंने निश्चित ही ऐसी कई घटनाएं  देखी होंगी । ऐसी अतिसुन्दर लघुकथा के  लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को नमन। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 42 ☆

☆ लघुकथा  – कुशलचन्द्र और आचार्यजी   ☆

 कुशलचन्द्र नामक युवक एक महाविद्यालय में अध्ययन करने के बाद उसी महाविद्यालय में व्याख्याता हो गया था। उसी महाविद्यालय में अध्ययन करने के कारण उसके अनेक सहयोगी उसके भूतपूर्व गुरू भी थे।

उनमें से अनेक गुरू उसे उसके भूतपूर्व शिष्यत्व का स्मरण दिलाकर नाना प्रकार से उसकी सेवाएं प्राप्त करते थे। शिष्यत्व के भाव से दबा और नौकरी कच्ची होने से चिन्तित कुशलचन्द्र अपने गुरुओं से शोषित होकर भी कोई मुक्ति का मार्ग नहीं खोज पाता था।

प्रोफेसर लाल इस मामले में सिद्ध थे और शिष्यों के दोहन के किसी अवसर को वे अपने हाथ से नहीं जाने देते थे।

वे अक्सर अध्यापन कार्य से मुक्त होकर कुशलचन्द्र के स्कूटर पर लद जाते और आदेश देते, ‘वत्स, मुझे ज़रा घर छोड़ दो और उससे पूर्व थोड़ा स्टेशन भी पाँच मिनट के लिए चलो।’

कुशलचन्द्र कंठ तक उठे विरोध को घोंटकर गुरूजी की सेवा करता।

एक दिन ऐसे ही आचार्य लाल कुशलचन्द्र के स्कूटर पर बैठे, बोले, ‘पुत्र, ज़रा विश्वविद्यालय चलना है। घंटे भर में मुक्त कर दूँगा।’

कुशलचन्द्र दीनभाव से बोला, ‘गुरूजी, मुझे स्कूटर पिताजी को तुरन्त देना है। वे ऑफिस जाने के लिए स्कूटर की प्रतीक्षा कर रहे होंगे। उनका स्कूटर आज ठीक नहीं है।’

आचार्यजी हँसे, बोले, ‘वत्स, जिस प्रकार मैं तुम्हारी सेवाओं का उपयोग कर रहा हूँ उसी प्रकार तुम्हारे पिताजी भी अपने कार्यालय के किसी कनिष्ठ सहयोगी की सेवाओं का उपयोग करके ऑफिस पहुँच सकते हैं। अतः चिन्ता छोड़ो और वाहन को विश्वविद्यालय की दिशा में मोड़ो।’

कुशलचन्द्र चिन्तित होकर बोला, ‘गुरूजी, हमारे घर के पास ऑफिस का कोई कर्मचारी नहीं रहता।’

आचार्यजी पुनः हँसकर बोले, ‘हरे कुशलचन्द्र! तुम्हारे पिताजी बुद्धिमान और साधन-संपन्न हैं। वे इस नगर में कई वर्षों से रह रहे हैं। और फिर स्कूटर न भी हो तो नगर में किराये के वाहन प्रचुर मात्रा में हैं।’

कुशलचन्द्र बोला, ‘लेकिन रिक्शे से जाने में देर हो सकती है। मेरे पिताजी ऑफिस में कभी लेट नहीं होते।’

आचार्यजी बोले, ‘हरे कुशलचन्द्र, यह समय की पाबन्दी बड़ा बंधन है। अब मुझे देखो। मैं तो अक्सर ही महाविद्यालय विलम्ब से आता हूँ, किन्तु उसके बाद भी मुझे तुम जैसे छात्रों का निर्माण करने का गौरव प्राप्त है। अतः चिन्ता छोड़ो और अपने वाहन को गति प्रदान करो।’

कुशलचन्द्र बोला, ‘गुरूजी, आज तो मुझे क्षमा ही कर दें तो कृपा हो।’

अब आचार्यजी की भृकुटि वक्र हो गयी। वे तनिक कठोर स्वर में बोले, ‘सोच लो, कुशलचन्द्र। अभी तुम्हारी परिवीक्षा अर्थात प्रोबेशन की अवधि चल रही है और परिवीक्षा की अवधि व्याख्याता के परीक्षण की अवधि होती है। तुम जानते हो कि मैं प्राचार्य जी की दाहिनी भुजा हूँ। ऐसा न हो कि तुम अपनी नादानी के कारण हानि उठा जाओ।’

कुशलचन्द्र के मस्तक पर पसीने के बिन्दु झिलमिला आये। बोला, ‘भूल हुई। आइए गुरूजी, बिराजिए।’

इसी प्रकार कुशलचन्द्र ने लगभग छः माह तक अपने गुरुओं की तन, मन और धन से सेवा करके परिवीक्षा की वैतरणी पार की।

अन्ततः उसकी साधना सफल हुई और एक दिन उसे अपनी सेवाएं पक्की होने का आदेश प्राप्त हो गया।

दूसरे दिन अध्यापन समाप्त होने के बाद कुशलचन्द्र चलने के लिए तैयार हुआ कि आचार्य लाल प्रकट हुए। उसे बधाई देने के बाद बोले, ‘वत्स! कुछ वस्तुएं क्रय करने के लिए थोड़ा बाज़ार तक चलना है। तुम निश्चिंत रहो, भुगतान मैं ही करूँगा।’

कुशलचन्द्र बोला, ‘भुगतान तो अब आप करेंगे ही गुरूजी,किन्तु अब कुशलचन्द्र पूर्व की भाँति आपकी सेवा करने के लिए तैयार नहीं है। अब बाजी आपके हाथ से निकल चुकी है।’

आचार्यजी बोले, ‘वत्स, गुरू के प्रति सेवाभाव तो होना ही चाहिए। ‘

कुशलचन्द्र ने उत्तर दिया, ‘सेवाभाव तो बहुत था गुरूजी, लेकिन आपने दो वर्ष की अवधि में उसे जड़ तक सोख लिया। अब वहाँ कुछ नहीं रहा। अब आप अपने इतने दिन के बचाये धन का कुछ भाग गरीब रिक्शे और ऑटो वालों को देने की कृपा करें।’

आचार्यजी ने लम्बी साँस ली,बोले, ‘ठीक है वत्स, मैं पैदल ही चला जाऊँगा।’

फिर वे किसी दूसरे शिष्य की तलाश में चल दिये।

 

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ क्या होएगा? ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आज  प्रस्तुत है आचार्य संजीव वर्मा ‘ सलिल ‘ जी की  एक समसामयिक रचना    क्या होएगा?।)

☆ क्या होएगा? ☆

इब्नबतूता

पूछे: ‘कूता?

क्या होएगा?’

 

काय को रोना?

मूँ ढँक सोना

खुली आँख भी

सपने बोना

आयसोलेशन

परखे पैशन

दुनिया कमरे का कोना

येन-केन जो

जोड़ धरा है

सब खोएगा

.

मेहनतकश जो

तन के पक्के

रहे इरादे

जिनके सच्चे

व्यर्थ न भटकें

घर के बाहर

जिनके मन निर्मल

ज्यों बच्चे

बाल नहीं

बाँका होएगा

.

भगता क्योंहै?

डरता क्यों है?

बिन मारे ही

मरता क्यों है?

पैनिक मत कर

हाथ साफ रख

हाथ साफ कर अब मत प्यारे!

वह पाएगा

जो बोएगा

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

२१-३-२०२०

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विशाखा की नज़र से # 27 – हाथों में हाथ  ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

(श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है  एक अतिसुन्दर भावप्रवण  एवं सार्थक रचना ‘हाथों में हाथ । आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़  सकते हैं । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 27 – विशाखा की नज़र से

☆ हाथों में हाथ ☆

 

तुमनें हाथ से छुड़ाया हाथ

और हाथ मेरा

दुआ मांगता आसमां तकता रहा

 

मुझे नहीं चाहिए अनामिका में

किसी धातु का कोई छल्ला

जो दबाव बनाता हो हृदय की रग में

 

तुम बस मेरी उंगलियों के

मध्य के खाली स्थान को भर दो

मेरे हाथ को बेवजह यूँ ही पकड़ लो

 

ताकि, मैं महसूस कर सकूं

मुलायम हाथ की मज़बूत पकड़

कह सकूं,

           “दुनिया को हाथ की तरह 

             गर्म और सुन्दर होना चाहिये “

 

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ दीपिका साहित्य # 8 ☆ नयी रोशनी ☆ सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

( हम आभारीसुश्री दीपिका गहलोत ” मुस्कान “ जी  के जिन्होंने ई- अभिव्यक्ति में अपना” साप्ताहिक स्तम्भ – दीपिका साहित्य” प्रारम्भ करने का हमारा आगरा स्वीकार किया।  आप मानव संसाधन में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। आपने बचपन में ही स्कूली शिक्षा के समय से लिखना प्रारम्भ किया था। आपकी रचनाएँ सकाळ एवं अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों / पत्रिकाओं तथा मानव संसाधन की पत्रिकाओं  में  भी समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में आपकी कविता पुणे के प्रतिष्ठित काव्य संग्रह  “Sahyadri Echoes” में प्रकाशित हुई है। आज प्रस्तुत है आपकी  एक अतिसुन्दर समसामयिक प्रेरणास्पद कविता नयी रोशनी । आप प्रत्येक रविवार को सुश्री दीपिका जी का साहित्य पढ़ सकेंगे।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ दीपिका साहित्य # 8 ☆

☆ नयी रोशनी

 

नयी रोशनी फिर जगमगाएगी , वो सुबह जल्द ही आएगी,

हौसला अपना रखना बुलंद, ये ख़ुशी हमसे कब तक छुप पाएगी ,

एक जुट होने का है वक़्त , फिर देखो हर जीत हमारी कहलाएगी ,

हिम्मत ना हारना बस जरा सा रास्ता है बाकी, उस पार फिर खुशियाली लहरायेगी ,

जीवन है संघर्ष का नाम दूसरा, उसके बाद सफलता तुमसे हाथ मिलाएगी ,

ये उतार चढ़ाव तो हिस्सा है, चलते रहना ही जिंदादिली कहलाएगी ,

फबता है खिलखिलाना तुमको , ये चिंता तो चंद लम्हेँ ही रह पाएगी ,

नयी रोशनी फिर जगमगाएगी, वो सुबह जल्द ही आएगी . .

 

© सुश्री दीपिका गहलोत  “मुस्कान ”  

पुणे, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विश्व कविता दिवस विशेष – सुनो कविता ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी”  जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  द्वारा विश्व कविता दिवस पर  रचित विशेष कविता सुनो कविता)

विश्व कविता दिवस विशेष – सुनो कविता

 

सुनो कविता

कविता दिवस पर रचना चाहती हूँ तुम्हें

जिसमें

गुनगुन निर्झर की

बोली सुने सृष्टि।।

कभी रोशनी की चादर से बुने दिन की कविता

कभी स्याह रेशम के ताने-बाने से बनी तारिका निशा की कविता।।

 

मानती हूँ कि बहुत गुनगुनाती है कविता मेरी

सूर कबीर तुलसी

रसखान की वाणी में

बहुत बोली है कविता!!

 

पर क्या आज वह वह बोलती है

जो बोलना चाहिए

क्या वह सुनाती है जो सुनाना चाहिए

वह दिखाती है जो दिखाना चाहिए।।

हाँ – – – सुनो कविता!!

सुनो कविता– सुनो ना

तुम्हें उगाने हैं बंजर में फूल

तुम्हें जगाने हैं बावरे बंजारे सपनें

तुम्हें जोड़नी है रिश्तों की टूटती डोर!!

बनना है तुम्हें वो साहित्य

जो समाज का दर्पण है!!

विश्व गुरु और सोन चिड़िया की कहानी वाला।।

चाणक्य और विदुर की रवानी वाला

अशफाक और आजाद की जवानी वाला।।

बनोगी ना?? रचोगी ना??चलोगी ना??

वहां तक मेरे साथ मेरी कविता।।

 

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र

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English Literature – Poetry ☆ World Poetry Day – Yes, you are the Witness ☆ Ms. Swapna Amrutkar

Ms.  Swapna Amrutkar

(We are extremely thankful to  young poetess Ms.  Swapna Amrutkar for sharing her literary work with e-abhivyakti.  Today we  present her special poem Yes, you are the Witness on the eve of World Poetry Day. )

☆ World Poetry Day – Yes, you are the Witness ☆

 

Feelings are floating

Like a silent river

With fair and unfair

Every new thought deeper, 1

Yes, you are the witness

Some emotions overflow

May heart beats squeezes

Some incident happened

& seasonal memories breezes, 2

Yes, you are the witness

Life changes in a second

Unknowingly hard time comes

My words becoming my weapon

And Poems becomes realities, 3

Yes, you are the witness

At every turning point of life

I follow my Index finger

You became my sharing box

And friends are Pen and Paper, 4

Yes, you are the witness

© Swapna Amrutkar, Pune

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मराठी साहित्य – कविता ☆ विश्व कविता दिवस – श्वास मोकळा ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज  प्रस्तुत है  विश्व कविता दिवस पर आपकी एक  विशेष कविता   “श्वास मोकळा ।)

☆ श्वास मोकळा ☆

(जागतिक कविता दिनाच्या सर्व कवी, कवयित्री व कवितांचा आस्वाद घेणाऱ्या रसिकांना मनापासून शुभेच्छा!)

 

रस्त्याने या जरी घेतला श्वास मोकळा

मला वाटले रस्ता झाला आज पांगळा

 

सुन्याच बागा मैदानावर नाही गर्दी

हुशार काळा आळसावून बसलाय फळा

 

शस्त्राविन हे युद्ध लादले या जगतावर

रक्तपात ना मरतो आहे देह सापळा

 

मित्र जमेना संचारावर आली बंदी

आवरला मग साऱ्यांनी हा मोह आंधळा

 

सार्क देश हे मिळून करतील इथे सामना

नका करू रे तुम्ही पराचा उगा कावळा

 

बर्गर पिझ्झा खाणे आता बंदच केले

आंबट-चिंबट चाखत आहे संत्र आवळा

 

तुझ्या सारखे कितीतरी रे आले गेले

युद्ध जिंकुनी पुन्हा एकदा करू सोहळा

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

[email protected]

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 3 ☆ जाऊ नकाचं तुम्ही ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है । आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण  कविता “जाऊ नकाचं तुम्ही“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 3 ☆

☆ कविता – जाऊ नकाचं तुम्ही☆ 

ओठात थांबलेल्या शब्दात गुंतलो मी

ती नजर मजशी सांगे जाऊ नकाचं तुम्ही

 

झाकोळल्या दिशा अन् मेघगर्जनांनी

संध्या ती मजशी सांगे जाऊ नकाचं तुम्ही

 

रात्रीत काजव्याचे स्वर कर्णकटू कानी

ती रजनी मजशी सांगे जाऊ नकाचं तुम्ही

 

सरता गं मध्यरात्र बोझील पापण्यांनी

ती निशा मजशी सांगे जाऊ नकाचं तुम्ही

 

सुटला पहाटवारा प्रीत बांधली ही कोणी

ती उषा मजशी सांगे जाऊ नकाचं तुम्ही.

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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हिन्दी साहित्य ☆ धारावाहिक उपन्यासिका ☆ पगली माई – दमयंती – भाग 16 ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

(प्रत्येक रविवार हम प्रस्तुत कर रहे हैं  श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा रचित ग्राम्य परिवेश पर आधारित  एक धारावाहिक उपन्यासिका  “पगली  माई – दमयंती ”।   

इस सन्दर्भ में  प्रस्तुत है लेखकीय निवेदन श्री सूबेदार पाण्डेय जी  के ही शब्दों में  -“पगली माई कहानी है, भारत वर्ष के ग्रामीण अंचल में पैदा हुई एक ऐसी कन्या की, जिसने अपने जीवन में पग-पग पर परिस्थितिजन्य दुख और पीड़ा झेली है।  किन्तु, उसने कभी भी हार नहीं मानी।  हर बार परिस्थितियों से संघर्ष करती रही और अपने अंत समय में उसने क्या किया यह तो आप पढ़ कर ही जान पाएंगे। पगली माई नामक रचना के  माध्यम से लेखक ने समाज के उन बहू बेटियों की पीड़ा का चित्रांकन करने का प्रयास किया है, जिन्होंने अपने जीवन में नशाखोरी का अभिशाप भोगा है। आतंकी हिंसा की पीड़ा सही है, जो आज भी  हमारे इसी समाज का हिस्सा है, जिनकी संख्या असंख्य है। वे दुख और पीड़ा झेलते हुए जीवनयापन तो करती हैं, किन्तु, समाज के  सामने अपनी व्यथा नहीं प्रकट कर पाती। यह कहानी निश्चित ही आपके संवेदनशील हृदय में करूणा जगायेगी और एक बार फिर मुंशी प्रेमचंद के कथा काल का दर्शन करायेगी।”)

इस उपन्यासिका के पश्चात हम आपके लिए ला रहे हैं श्री सूबेदार पाण्डेय जी भावपूर्ण कथा -श्रृंखला – “पथराई  आँखों के सपने”

☆ धारावाहिक उपन्यासिका – पगली माई – दमयंती –  भाग 16 – उन्माद ☆

(अब  तक आपने पढ़ा  —- अब तक आप पढ़ चुके हैं कि पगली दवा ईलाज से ठीक हो अपना सामान्य जीवन जी रही थी, उसनें सेवा धर्म अपना लिया था। निस्वार्थ सेवा ही उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य बन गया था। उसकी दिनचर्या अच्छी भली चल रही थी। अब आगे पढ़े—- )

पूर्वावलोकन–पगली माई जब लोगों की सेवा करते करते थक कर निढाल हो जाती, तो कुछ पल आराम करने के लिए वटवृक्ष की छांव में आकर लेट जाती। आज पगली माई का दिल बहुत घबरा रहा था।

आज वह ठीक से सो भीनहीं पाई थी, उसे देश और समाज की चिंता सता रही थी। एक तरफ पडोसी देश ईस्लाम के रक्षा के नाम पर विषवमन कर आतंकवादी कार्यवाही में सहयोग तथा समर्थन दे देश में अपने समुदाय के नवयुवा पीढ़ी को भड़का रहा था, तो दूसरी तरफ अपने देश के तथा कथित राजनेता अपना राष्ट्र धर्म भूल वोटों की खेती में छद्म राष्ट्रभक्ति का स्वांग रच कोरी लफ्फाजी करने में ही मस्त थे।  सभी देश हित का परित्याग कर सत्ता के लिए वोटों का समीकरण अपने पक्ष में करने के चक्कर में थे और जनता बेचारी चक्कर-घिन्नी बन खाली खेल देख रही थी। उसे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था।  चुनाव सर पर था और सत्ता प्राप्ति की चाह उन्हें घिनौनी राजनीतिक चालें चलनें पर मजबूर कर रही थी।

जनता के बीच धार्मिक उन्माद के बीज बो घृणा और नफरत का उन्माद फैला दिया गया था।  कोई खुद को इस्लाम का रक्षक झंडाबरदार बताता तो कोई खुद को हिंदुत्व का पैरोकार और कोई दलित हितों की बात कर अपने स्वार्थ की विषबेल सींच रहा था, कुछ लोग इंसानियत को टुकड़े टुकड़े कर धर्म रक्षा का नाटक कर रहे थे, सभी पार्टियों के नेता धर्म तथा इंसानियत का वास्ता दे आम इंसान का कत्ल करवा रहे थे, क्योंकि उनकी चिता की आग पर राजनीति की रोटी जो उन्हें सेंकनी थी।

वो उन देशवासियों के हत्यारे थे जिनका धर्म, संप्रदाय जातिवाद से कभी कोई रिश्ता भी न था। वे अपनी राह भटक चुके थे।  इन्ही बेकसूरों की चिंता पगली माई को खाये जा रही थी।  कुछ सोचो, जब हमारा राष्ट्र ही नही होगा, तो कहाँ होगा हिन्दू और कहाँ होगा मुसलमान?  आज देश की सारी फिजां में जहर घुला था, लोग अकारण एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे, और पगली माई बरगद की छांव में सोई किसी अज्ञात भय आशंका से थर थर कांप रही थी।  उसका आशंकित मन बारबार किसी अनहोनी की आशंका से दहल रहा था।

आज भारत बंद का आह्वान था, जुलूस निकलने वाला था जिसका उद्देश्य विपक्ष का अपना शक्ति परीक्षण तथा पक्ष का उद्देश्य उसे रोकना था।  टकराव की स्थिति उत्पन्न
हो गई थी।  भीड़ जुट गई थी, जोर जोर से नारेबाजी हो रही थी – “जो हमसे टकरायेगा, मिट्टी में मिल जायेगा”, “जिन्दाबाद मुर्दाबाद” के नारों के बीच प्रशासनिक अमला पूरी तरह चाक चौबंद दिख रहा था।

इसी बीच किसी नें भीड़ के बीच पत्थर उछाल दिया था। पत्थर उछलना था कि, मानों कयामत आकर खड़ी हो मुस्कुरा उठी हो। उन्मादी भीड़ हिंसक हो उठी थी और राष्ट्रद्रोहीयों की बांछें खिल गई थी। लगातार ईंट पत्थर हवा में उछल उछल कर जमीन पर गिर रहें थे,। लोगों के घायल शरीरों से निरंतर रक्त के फौव्वरे फूट रहे थे। जहाँ शैतान के  चेहरे पर शैतानी की कुटिल मुस्कान थी, वहीं इंसानियत की आंखों में अपनी बेबसी पर दुख और पीड़ा।

इन्ही दृश्यों को पगलीमाई अस्पताल के गलियारे से देख रही थी। जब उससे हिंसा का नग्न तांडव नहीं देखा गया तो वह दौड़ पड़ी माँ भारती का प्रति रूप बन कर लोगों को हिंसा की ज्वाला से बचाने।

वह लगातार दोनों हाथों को उपर उठाये  समझाने वाले अंदाज में चीखती जा रही थी कि अचानक भीड़ से एक पत्थर उछला और सनसनाता हुआ पगली माई के सिर से टकराया तथा उसके जमींदोज होते होते अनेक पत्थर गिरे थे उसके उपर, उसे देख ऐसा लगा कि शक्ति का अवतार बन दुष्टो का संहार करने वाली नारीशक्ति ने आज अचानक अहिंसा का हथियार उठा लिया हो।

वह हिंसा का जबाब प्रतिहिंसा से नहीं अहिंसा से दे रही थी और पत्थरों की मार सहते सहते वहीं गिर गई।  ऐसा लगा जैसे पगली माई और पत्थरों का जनम जनम का पुराना नाता रहा हो। पुलिस ने लाठीचार्ज कर भीड़ को तितर बितर कर दिया था। जब तथा कथित देशभक्तों की भीड़ छंटी तो वहां का दृश्य हृदय विदारक था। बिखरे ईंट पत्थर तथा जूते चप्पलों के ढेर के बीच घायल पगली दर्द और पीड़ा से जल बिन मछली की तरह पड़ी हुई छटपटा रही थी।  जहाँ प्रशासनिक अमला कानूनी कार्रवाई में व्यस्त थे, वहीं दूसरी तरफ मीडिया कर्मी दंगे फसाद की जड़ तक पहुँच अपना सामाजिक दायित्व निभाते हुये सच्चाई उजागर करने के के प्रयास में प्राणपण से जुटे हुए थे। उन पत्थर दिलों के बीच पड़ी पगली दर्द और पीड़ा को पीने का प्रयास कर रही थी। ऐसा लगा जैसे पत्थरों और पगली का चोली दामन का साथ हो।  उसकी आंखों के आंसू उसकी पीड़ा बयां कर रहे थे, और अब राजनैतिक अंतर विरोध के स्वर मुखरित हो उठे थे।  आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी हो चला था जैसा कि हर घटना के बाद होता है।  और पगली माई आज फिर उसी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती थी, जहाँ से पहले भी उसने नवजीवन पाया था। सड़क पर निरपराधों का खून देख फफक फफक कर रो पडी़ थी पगली की आत्मा।

अगले दिन अलसुबह के अखबारों में पगली के घायल होने का समाचार छपा तो लगा कि जैसे उसे देखने सारा शहर उमड़ पड़ा हो, क्योंकि तब तक उसके निस्वार्थ सेवा प्रेम की खबर सारे शहर में चर्चा का विषय बन चुकी थी।  आज क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सारे लोग अपना मतभेद भुला पश्चाताप की मुद्रा में खड़े थे।  सबके सिर झुके थे, शर्म से, उन्हें अपनी करनी पर अफ़सोस था। और वह बिस्तर पर पड़ी पड़ी सबको मानों अपने ममता के दामन में समेट लेना चाहती हो। उसे किसी से कोई गिला शिक़वा नहीं, उसने सबको क्षमादान दे दिया था। और उसके भीतर मूर्तिमान हो उठी थी साक्षात माँ भारती।

क्रमशः  –—  अगले अंक में7पढ़ें  – पगली माई – दमयंती  – भाग – 17  – महाप्रयाण 

© सूबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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हिन्दी साहित्य- कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #25 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

आचार्य सत्य नारायण गोयनका

(हम इस आलेख के लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी, योगाचार्य एवं प्रेरक वक्ता योग साधना / LifeSkills  इंदौर के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के महान कार्यों से अवगत करने में  सहायता की है। आप  आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के कार्यों के बारे में निम्न लिंक पर सविस्तार पढ़ सकते हैं।)

आलेख का  लिंक  ->>>>>>  ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी 

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे # 25 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(हम  प्रतिदिन आचार्य सत्य नारायण गोयनका  जी के एक दोहे को अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास करेंगे, ताकि आप उस दोहे के गूढ़ अर्थ को गंभीरता पूर्वक आत्मसात कर सकें। )

आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे बुद्ध वाणी को सरल, सुबोध भाषा में प्रस्तुत करते है. प्रत्येक दोहा एक अनमोल रत्न की भांति है जो धर्म के किसी गूढ़ तथ्य को प्रकाशित करता है. विपश्यना शिविर के दौरान, साधक इन दोहों को सुनते हैं. विश्वास है, हिंदी भाषा में धर्म की अनमोल वाणी केवल साधकों को ही नहीं, सभी पाठकों को समानरूप से रुचिकर एवं प्रेरणास्पद प्रतीत होगी. आप गोयनका जी के इन दोहों को आत्मसात कर सकते हैं :

धर्म छुटे तो सुख छुटे, आकुल-व्याकुल होय ।

धर्म जगे तो सुख जगे, हरखित पुलकित होय ।।

आचार्य सत्यनारायण गोयनका

#विपश्यना

साभार प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

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Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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