आध्यात्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (17) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

एकादश अध्याय

(अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )

 

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।

पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ।। 17।।

मुकुट गदा औ” चक्र से तेजपुंज द्युतिमान

देख रहा मैं आपको अनायास विद्यमान।

दीप्ति अनल औ” सूर्य सम,  आभा भव्य ललाम

चकाचौंध है प्रखर , प्रभु ! दर्शन मुश्किल काम ।। 17।।

 

भावार्थ :  आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ।। 17।।

 

I see  Thee  with  the  diadem,  the  club  and  the  discus,  a  mass  of  radiance  shining everywhere, very hard to look at, blazing all round like burning fire and the sun, and immeasurable.।। 17।।

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

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सूचना/Information ☆ जनता कर्फ्यू : एक वैज्ञानिक और नायाब कदम : हम चलेंगे दो कदम – श्री राकेश कुमार पालीवाल ☆

सूचना/Information 

(मानवता के हित में  श्री राकेश कुमार पालीवाल जी के फेसबुक से पेज साभार)

श्री राकेश कुमार पालीवाल

☆ जनता कर्फ्यू : एक वैज्ञानिक और नायाब कदम : हम चलेंगे दो कदम ☆

(ई- अभिव्यक्ति सम्पूर्ण विश्व में विश्वयुद्ध से भी भयावह इस दौर में ईश्वर से मानवीय संवेदनाओं एवं मानवता की रक्षा की कामना करता है। बस पहल आपको करनी है। )

प्रधान मंत्री जी ने टी वी पर आने से पहले अपनी टीम से काफी विचार विमर्श किया होगा। उसी के बाद उन्होंने रविवार की छुट्टी के दिन जनता कर्फ्यू का नायाब तरीका चुना है।

इसे आप वैज्ञानिक दृष्टि से देखिए। रविवार की छुट्टी के दिन 14 घंटे का बन्द वायरस के फैलने की चेन की काफी हद तक कमर तोड़ सकता है और हम इटली और स्पेन बनने से बच सकते हैं जिन्होंने रविवार की छुट्टी में सार्वजनिक स्थलों पर मटर गस्ती करके इसे पूरे देश में फैला दिया था।

इसका दूसरा लाभ यह मिलेगा कि हम एक देश के रूप में किसी भी आपदा का सामना करने के लिए तैयार दिखेंगे और जरूरत पड़ी तो ऐसे कर्फ्यू कुछ और दिन ज्यादा देर के लिए लागू कर कोरोना को पूरी तरह अलविदा कह देंगे।

जनता कर्फ्यू से कोई नुकसान नहीं है। फिर भी यदि सिर्फ आलोचना के लिए आलोचना करना ही यदि हमारा धर्म है तो हमारी नकारात्मकता को कोई कम नहीं कर सकता।

हमने तो एक कदम आगे बढ़कर शनिवार की छुट्टी को भी जनता कर्फ्यू में शामिल कर दो दिन घर में रहने का मन बना लिया है। अपने आफिस के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों से भी यही अपील की है कि जब तक बहुत जरूरी नहीं हो घर से बाहर नहीं निकलें।

जैसे बूंद बूंद से समुद्र बनता है वैसे ही एक एक व्यक्ति के घर में रुकने से सड़क, बाज़ार और शहर की भीड़ कम होगी। आज यही हमारे और देश के हित में है।

आमीन।

 (मानवता के हित में  श्री राकेश कुमार पालीवाल जी के फेसबुक से पेज साभार)

(आप सब से करबद्ध प्रार्थना है इस  वैज्ञानिक और नायाब कदम पर सबके साथ चलिए और  प्रण लीजिये – हम चलेंगे दो कदम)

 

 

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ समय है एक होकर लड़ने का ………  ☆ श्रीमती समीक्षा तैलंग

श्रीमती समीक्षा तैलंग 

 

( कोरोना वायरस की महामारी की त्रासदी  से जूझते विश्व में मानवीय संवेदनाएं जीवित हैं जो हमें जाति, धर्म , भेद भाव से परे जोड़ती है और यह रिश्ता है मानवता का । पढ़िए श्रीमती समीक्षा तैलंग जी की एक सच्ची संवेदनशील कहानी  “समय है एक होकर लड़ने का ……… “।  )

☆ समय है एक होकर लड़ने का ………   ☆

[आज कोई व्यंग्य नहीं है मेरे पास। लेकिन एक हकीकत है, सच्ची कहानी है। पोस्ट कर रही हूं। आग्रह है कि जरूर पढिये। मैं और मेरी मावशी (काम वाली बाई) के बीच हुई बातचीत, एक कहानी के रूप में।  कृपया अवश्य पढिए एक मेड की सच्चाई उसकी जुबानी – समीक्षा तैलंग ]

 

आज सुबह मेरी मावशी (मेड) का फोन आया। मैं भी सोच ही रही थी कि पहल उसी ने कर दी।

जानते हो क्यों… हालचाल लेने, हम सब के…।

वो अब अमरावती में स्थित किसी गांव में है। जो उसका अपना है।

बहुत अच्छा लगता है जब कोई दूसरा आपके लिए फिक्रमंद होता है।

मुझसे इतनी आत्मीयता से पूछा- “कैसे हो ताई आप सब?”

फिर हिदायत के साथ- “बिल्कुल भी बाहर मत निकलना।

थोड़ा बहुत बनाकर, कम बर्तन में ही एकाध महीना काम चला लेना। बच्चों को भी बोल देना थोड़ा थोड़ा काम करवाए आपके साथ।

अब तो दीदी की परीक्षाएं भी आगे बढ़ गई हैं। वो भी थोड़ा आपका हाथ बंटा सकती है।

सब कुछ ऑनलाइन मंगवाना…।”

फिर बोली, “कहीं पर भी मत जाना ताई। भाऊ से भी कहना, संभलकर रहे। वो बड़े साहब हैं। उनको तो ऑफिस जाना पड़ेगा।”

बोली- “ताई कल मोदीजी का भाषण सुना था।”

मैंने कहा, “हां पूरा सुना था।”

बोली- “कितना अच्छा बोले न वो…।

हम लोगों को अपने अपने घर तो भेज दिया क्योंकि शायद कुछ बहुत बड़ा होने वाला है इसलिए। लेकिन वो हम रोजंदारों की कितनी फिकर करते हैं न…।

आपको मालूम है…, वो जब कल बोले न… उसके पहले ही हम लोगों के लिए अनाज दिया जा रहा है, वो भी मुफ्त में।

वो लोग, हम सबसे यही कह रहे हैं, कि बस घर के अंदर रहो। कहीं मत निकलो। हम तुम सबको घर बैठे खिलाएंगे, जब तक ये कोरोना नहीं चला जाता…।

उसकी ये बात मेरे मन को छू गई…।”

शायद यही भावनात्मक डोर है जिसकी वजह से क्या गरीब, क्या अमीर सब अपने प्रधानमंत्री से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।

फिर उसने एक और बात बताई…। “ताज्जुब भी हुआ और लगा कि हमारे गांवों के लोग कितने जागरूक हो चुके हैं।”

बोली- “ताई! हम सब 70 लोग पुणे से बस से अपने गांव पहुंचे। बस स्टैंड पर ही गांव वालों ने हमें रोक दिया।

उन्होंने कहा, जो भी पुणे से आए हैं, सबसे पहले अस्पताल चलो। टेस्ट करने के बाद ही घर आने देंगे।“

बोली- “हम सबको तो पता था कि हमें कुछ नहीं है। फिर भी उनकी तसल्ली के लिए हम सब लोगों ने टेस्ट कराए। और फिर घर गए।

सामान दो दिन तक बाहर धूप में रखा रहा। और अब हम लोग भी घर के अंदर काम नहीं कर रहे।

बस धूप में रहने के लिए, खेतों में काम कर रहे हैं। रात में ही घर को जा रहे। पंद्रह दिन ऐसे ही करेंगे।”

मैंने कहा- “अच्छा कर रहे हो। तुम सब जानते हो अच्छा, बुरा…। अपने घर में सबकी देखभाल करो अच्छे से…। फिर जब सब ठीक हो जाए तभी आना लौटकर।”

बोली- “हां ताई, ऐसा ही करेंगे हम लोग। आप भी सब लोग ठीक से रहो वहां। बहुत चिंता लगी है हम लोगों को।

बीच बीच में फोन करके अपने हालचाल देते रहना और बाहर बिल्कुल मत निकलना क्योंकि वहां ज्यादा फैला हुआ है।”

मैंने कहा- “करूंगी फोन तुम्हें…।” और फिर फोन कट कर दिया।

बस एक ही खयाल आता रहा, यही अपनापन होता है। जो हम सब एक दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ते चले जाते हैं। अनगिनत लोगों से, कभी भी… कहीं भी…। अपने ही क्या, पराए भी अपने होते चले जाते हैं…।

 

©समीक्षा तैलंग,  पुणे

 

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विरोधाभास ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – विरोधाभास ☆

 

मर्त्यलोक

यों विरोधाभास का

पुलिंदा निकला,

भ्रम और ब्रह्म में

एक सौ अस्सी अंश का

फासला निकला,

जिसे अविनाशी समझा

तन वह नश्वर था,

पर नश्वर में ही

नित्य का बसेरा निकला।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 36 – वर्ण संकर ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण आलेख  “वर्णसंकर। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 35 ☆

☆ वर्णसंकर

सभी चारों वर्णों में चार मुख्य दोष या विकार भी होते हैं प्रत्येक वर्ण में एक-एक । ब्राह्मणों में मोह या लगाव नामक विकार होता है, क्षत्रियों में क्रोध विकार होता है, लोभ या लालच वैश्यों का विकार है, और शूद्रों में काम-अवैध यौन संबंध विकार होता है । अब विभिन्न वर्णों में ये दोष कहाँ से आते हैं? आप कह सकते हैं कि ये दोष या विकार प्रकृति के विभिन्न गुणों के दुष्प्रभाव हैं । मोह शरीर और मस्तिष्क में अतिरिक्त या ज्यादा सत्त्व का दुष्प्रभाव है (सत्त्व प्रकृति के तीनों गुणों में सबसे शुद्ध और श्रेष्ठ है लेकिन फिर भी यह भौतिकवाद के अधीन ही है और इसकी अति भी नकरात्मकता उत्पन्न करती है)। क्रोध शरीर और मस्तिष्क में राजस गुण की अधिकता का दुष्प्रभाव है (राजस का अर्थ गतिविधि, गति, बेचैनी है जो निश्चित रूप से क्रोध में वृद्धि करता है), और इसी तरह अन्य दो वर्णों के लिए भी । चारों वर्णों में कई अन्य मामूली दोष भी होते हैं । जब वर्ण व्यवस्था बनाई गयी थी तब ब्राह्मणों में कम से कम दोष होते थे, क्षत्रियों में ब्राह्मणों से अधिक और बाकी दो से कम, और इसी तरह से अन्य वर्णों के लिए ।

अब अंतरजातीय विवाह और वर्णसंकर को समझने की कोशिश करें। मान लीजिए कि एक ब्राह्मण लड़का वैश्य लड़की से शादी करता है । झूठ बोलना भी वैश्य वर्ण का एक दोष है, क्योंकि व्यापार में यदि आप झूठ नहीं बोलते हैं तो आपको व्यापार में लाभ नहीं मिल सकता है । अब मान लीजिए कि विवाह के परिणाम स्वरूप इस ब्राह्मण पुरुष और वैश्य लड़की के यहाँ एक लड़के का जन्म होता है । मान लीजिए कि जब यह लड़का बड़ा हो जाता है तो वह अपने वंश के अनुसार ब्राह्मण के कार्यों शिक्षक या पुजारी या ज्योतिषी आदि को अपनाकर अपने गृहस्थ जीवन को चलाने के लिए धन अर्जित करना चाहता है। अब इस लड़के में अपने पिता और माता दोनों के गुण होना स्वाभाविक हैं, इसका अर्थ है कि उसके अंदर वैश्य जैसे लालच और झूठ बोलने का दोष भी अपनी माता से आ गया होगा । तो क्या वह पुजारी के अपने कर्तव्य का पालन करने में सक्षम हो सकता है? क्या लालच उसके मस्तिष्क में नहीं आयेगा जब वह किसी व्यक्ति के लिए अनुष्ठानों और समारोहों के लिए कुछ पूजा या कर्मकाण्ड करेगा? हर बार जब भी कोई उसे यज्ञ या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों आदि के लिए आमंत्रित करेगा तो क्या उसका लालच समय के साथ साथ नहीं बढ़ेगा? वह उन्हें पूरी श्रध्दा या ध्यान से नहीं कर पायेगा क्योंकि उसका लक्ष्य केवल धन एकत्र करना होगा । इसके अतिरिक्त, अगर किसी ने उससे पूछा कि क्या वह अनुष्ठान ठीक से कर रहा है, तो क्या वह झूठ नहीं बताएगा कि “हाँ मैं ठीक से कर रहा हूँ” क्योंकि उसमे अपनी माँ वैश्य के गुण भी प्राप्त हुए हैं । और जिन लोगों के लिए वह इन अनुष्ठानों को करेंगे, उन्हें गलत अनुष्ठानों के कारण नकारात्मक प्रभाव का सामना भी करना पड़ेगा ।

इसी तरह कल्पना करें कि यदि वह ज्योतिषी के पेशे का विकल्प चुनता है, तो क्या वह पैसे कमाने के लिए गलत भविष्यवाणी नहीं करेगा और वह अपने ग्राहकों को कुछ अंधविश्वास पूर्ण अनुष्ठान या दान देने के लिए मजबूर भी कर सकता है ।

इसी प्रकार एक शूद्र लड़की के साथ एक क्षत्रिय लड़के के अंतरजातीय विवाह की परिस्थिति लें । मान लीजिए कि ऐसे विवाह के पश्चात एक लड़की का जन्म हुआ, जिसमें क्रोध और वासना का दोष पैतृक रूप से आ जायेगा ।

क्या यह समाज में अवैध यौन संबंध और अपराध (क्रोध और वासना के कारण) नहीं बढ़ाएगा? इस प्रकार के अवैध यौन संबंध जातियों और वर्णो के नियमों से परे हैं जो अवश्य ही शादी के लिए लड़के और लड़की के गुणों को मेल करके करने चाहिए (यहाँ शादी में लड़के और लड़की की जन्म कुंडली और शादी समारोह में किये जाने वाले अनुष्ठानों और कर्मकांडो के आलावा उनके प्रकृति के तीन गुणों सत्व, राजस और तामस के संयोजन का मिलान भी है) ।

इस तरह के वर्णसंकर से दुनिया की वर्तमान स्थिति की कल्पना करें, जो वास्तव में सभी के लिए अराजक हो चुकी है । मैंने आपको एक स्तर का उदाहरण दिया है । अब आप कल्पना करें कि अभी तक जातियों के बीच कितना मिश्रण और अंतर-मिश्रण हो चूका है । तो जरा सोचिये मानव शरीर और मस्तिष्क के अंदर प्रकृति के तीनों गुण सत्त्व, राजस और तामस कितने पतले (dilute) हो चुके हैं । यही कारण है कि कलियुग नरक से भी बुरा है । यहाँ राजनेता जनता के पैसे को उड़ा रहे हैं । ब्राह्मण माँसाहारी भोजन तक कर रहे है यहाँ तक की लोग परिवारों के भीतर भी अवैध यौन संबंध स्थापित कर रहे हैं । लोग छोटी छोटी बातों के लिए एक-दूसरे की हत्या कर रहे हैं । और आप जानते हैं कि यह सब शुरू हुआ केवल वर्णसंकर की वजह से ।

आशीष एक पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा था । उन्होंने अपनी चेतना एकत्र की और विभीषण से कहा, “महोदय, क्या इसका कोई समाधान नहीं है? इस परिदृश्य के अनुसार, भविष्य में परिस्थितियाँ और भी बदतर हो जाएंगी?”

कहा, “मेरे प्रिय मित्र, यह कलियुग का भविष्य है और यह ऐसा ही है । यहाँ तक ​​कि अगर हम लोगों को इसके विषय में बताने की कोशिश करते हैं, और कहते हैं कि वे गलत कर रहे हैं, तो वे हमारी बात नहीं सुनेंगे । मैंने आपको बताया कि प्रत्येक युग के अपने नियम हैं और भगवान विष्णु प्रत्येक युग में पृथ्वी के लोगों की सहायता के लिए आते हैं और उस युग की आवश्यकताओं के अनुसार धर्म को फिर से स्थापित करते हैं । त्रेतायुगमें भगवान राम के रूप में आये थे, जिन्होंने कभी कोई नियम नहीं तोड़ा और पक्षियों, बंदरों, आदि जैसे ब्रह्मांड के छोटे जीवों की सहायता से रावण जैसे राक्षस का अंत किया और शारीरिक बल के उपयोग से नकारात्मकता समाप्त की । द्वापर युग में भगवान कृष्ण के रूप में आये जिन्होंने हमें सिखाया कि पारिवारिक जीवन का आनंद भोगते हुए भगवान की प्राप्ति कैसे की जाये और हमें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ भगवद गीता दिया । लेकिन कलियुग में यदि हम भगवद गीता के ज्ञान को आम लोगों को देने का प्रयास करेंगे, तो वे इसे सुनेंगे लेकिन अपने अमल में नहीं लायेंगे । कलियुग के लिए, भगवान की अलग योजना हैं, बस प्रतीक्षा करें और आपको याद रखना चाहिए कि भगवान विष्णु के कलियुग का अवतार अपने हाथों में तलवार के साथ आयेगा”

© आशीष कुमार  

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सूचनाएँ/Information ☆ विश्ववाणी हिंदी संस्थान एवं लघुकथा शोध केंद्र जबलपुर का संयुक्त आयोजन ☆

सूचनाएँ/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ विश्ववाणी हिंदी संस्थान एवं लघुकथा शोध केंद्र जबलपुर का संयुक्त आयोजन ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

जबलपुर संभाग आरंभ से लघुकथा का गढ़ रहा है। कुँवर प्रेमिल और मैंने बहुत सी सामग्री उपलब्ध करा दी है। दिवंगत लघुकथाकारों और जिनके संकलन नहीं हैं, ऐसे लघुकथाकारों की लघुकथाएँ तुरंत  संरक्षित की जाना आवश्यक है। मैं “जबलपुर में लघुकथा” शीर्षक से संकलन तैयार कर रहा हूँ। सभी से अनुरोध है कि अपने परिचित लघुकथाकारों के नाम, पते, चलभाष क्रमांक, चित्र व लघुकथाएँ मुझे वाट्सएप क्रमांक ९४२५१८३२४४ या ईमेल [email protected] पर अविलंब भेजें। पूर्व प्रकाशित लघुकथाओं के साथ पत्रिका का नाम, वर्ष, माह तथा संपादक का संपर्क भेजें। सभी सहयोगियों का नामोल्लेख संकलन में किया जाएगा।

अन्य स्थानों से लघुकथाएँ और जानकारी भेजें। ऐसे संग्रह हर स्थान के लिए तैयार किये जा रहे हैं।

आमंत्रण

लघुकथाकार अपना परिचय (नाम, जन्म तिथि, माता-पिता-जीवनसाथी, शिक्षा, प्रकाशित एकल पुस्तकें, स्थायी पता, दूरभाष/चलभाष, ईमेल आदि) तथा ५ मौलिक लघुकथाएँ, मौलिकता प्रमाणपत्र सहित [email protected] पर ईमेल करें।

जिलेवार/विषयवार लघुकथाकारों की जानकारी सूचीबद्ध की जाना है। अन्य दिवंगत तथा समकालिक लघुकथाकारों की जानकारी एकत्र कर भेजें।

 

आचार्य संजीव वर्मा “सलिल”

संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान

संरक्षक लघुकथा शोध केंद्र जबलपुर

(ईकाई लघुकथा शोधकेंद्र भोपाल)

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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 27 ☆ मालतीचं पत्र ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है।  श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है उनके स्वानुभव  एवं  संबंधों  पर आधारित  कथा  “मालतीचं पत्र”। उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / धार्मिक /पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। )

☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 27 ☆

☆ मालतीचं पत्र ☆ 

(कथा)

रोजच्याप्रमाणे पोस्टमन दिसल्याबरोबर मंजुळा बाईंनी त्याला विचारलंच ..” आमचं  पत्र आलंय कां.? ” पोस्टमन फक्त गालातल्या गालात हसला व पुढं गेला त्याला हे नित्य परिचयाचं होतं.

पण त्यानंतर चारच दिवसांनी त्याने मंजुळाबाईंच्या हातात एक लिफाफा दिला व म्हणाला घ्या तुमच्या सुनबाईंचं पत्र.! अगदी उत्साहाने त्यांनी ते फोडलं पण वाचता येत नसल्याने त्यांनी आजूबाजूला पाहिलं तेवढ्यात आमच्या घराच्या ओसरीवर बसायला येणाऱ्या सदाला त्यांनी हाक मारली व म्हणाल्या ” सदा एवढं पत्र वाचून दाखव रं !”

मग ओसरीवरच मंजुळाबाई मांडी घालून डाव्या हाताचा कोपरा गुडघ्यावर टेकवून ऐटीत बसल्या अन् म्हणाल्या “बघ रं काय म्हणतीय मालती ?”

मालती हे माझं माहेरचं नाव पण मला त्या कायम त्याच नावानं बोलवायच्या.

आमचं. लग्न होण्यापूर्वी माझे सासरे वर्षभर अगोदर गेलेले होते. आम्हा दोघांना एकाच खात्यात एकाच दिवशी नोकरी लागल्याने आम्ही परगावी होतो. आणि मोठ्या दिरांच्या बदलीने तेही दूर त्यामुळे गावी त्या व शाळेत जाणारी दोन मुले गावी असायची.

साधारण १९६३ साल खेडेगावात त्यावेळी दुसरा  काही विरंगुळा नसायचा. मुलं शाळेत गेली की त्या एकट्या असायच्या. तशा माझ्या चुलत सासुबाई, आजेसासुबाई तिथंच असायच्या. आमचं घर बऱ्यापैकी ऐसपैस. आमची स्वयंपाकघरं वेगवेगळी पण ओसरी मोठ्ठ अंगण एकच होतं.

आजेसासूबाईंना सर्वजण मोठीआई म्हणायचे. म्हणजे वयाने तर होत्याच पण ओसरीचा अर्ध्या खणाचा भाग त्यांच्या बैठकीने व्यपलेला असायचा.

ओसरीवर बसून जाणायेणाऱ्यांकडे नव्वदाव्या वर्षीही त्यांचं अगदी बारीक लक्ष असायचं. अन् पोस्टमन घराच्या दिशेने येताना दिसला की म्हणायच्या ….

“अगं मंजुळा तुझ्या मालतीचं पत्र आलं गं ऽऽ आलं…!”

मी पोस्टकार्ड वर कधीच पत्र लिहीत नसे. कारण माझा मजकूर त्यावर कधी बसायचाच नाही.फुलस्केप वर पानभर आणि पाठपोठ असा माझा मजकूर असायचा….

माझ्या ठसठशीत अक्षरातला सविस्तर मजकूर वाचून त्यांना खूप आनंद व्हायचा. म्हणायच्या

बघा माझी मालती कशी रेघ न् रेघ कळवती लिहून काय झालं काय नाही…

माझ्या जन्म दिलेल्या मुलालाही नाही पण हिला किती काळजी असते.

माझं आलेलं पत्र त्या दिवसातून दोन तीनदा तरी भेटेल त्याच्याकडून वाचून घ्यायच्या.

माझ्या पत्रात माझं घरातलं सगळं आवरून ऑफिसला जाताना होणारी तारेवरची कसरत, ऑफिसात साहेबांचा खाल्लेला ओरडा. कारण एस एस.सी  झाल्यावर दोन वर्षांतच नोकरी सुरू.त्यामुळे वय आणि अनुभव दोन्ही बेताचेच.! असं सगळं माझं साग्रसंगीत वर्णन त्या पत्रात असायचं. त्याची त्यांना गंमत आणि कौतुक दोन्हीही वाटायचं.

आमची मुलं जरा मोठी झाल्यावर आम्ही उभयता मे १९७९ मध्ये “नेपाळ दार्जिलिंग” सहलीला गेलो होतो. तिथंन मी प्रवासाच्या सुरुवातीपासूनचं संपूर्ण सहलीचं वर्णन वेळोवेळी पाठवत होते.

त्यातल्या एका पत्रात मी हिमालयाच्या बर्फाच्छादित शिखरांचं वर्णन पाठवलं. कैलास पर्वताच नाव ऐकताच त्या म्हणाल्या बघा  कैलासराणा शिवचंद्रमौळी जिथं रहातो ते माझी सून मुलगा बघून आली. त्या रोज ते स्तोत्र म्हणत असल्यानं त्यांनी मला नंतर सांगितलं की तुमच्याबरोबर मी कैलास पर्वताचं दर्शन घेऊन आल्याचं मला जाणवलं.

पत्र म्हणजे तरी काय हो “या हृदयीचे त्या हृदयी.!”  आपल्या मनाच्या कप्प्यातल्या भावना इतरांना समजावून सांगण्याचा एक खूप सुंदर सोपं साधन !

आठवणींना उजाळा देणारी शब्दांजली म्हणजेच पत्र.! अगदी आत्ता हे लिहिताना माझ्या पूर्वीच्या सर्व आठवणी जाग्या झाल्या. म्हणून तर म्हणतात ” मनात दाटलेल्या भावनांना वाट मोकळी करुन देणारं हळूवार शस्त्र म्हणजे पत्र “!

मग ते पत्र श्रीसमर्थांनी छत्रपती संभाजी महाराजांना लिहिलेले असो, पूज्य साने गुरुजींनी लिहिलेली ,पं.जवाहरलाल यांनी प्रियदर्शनीस लिहिलेली, बॅ.पी.जी.पाटील यांनी पूज्य कर्मवीर भाऊराव पाटील यांना लंडनहून लिहिलेली, सीमेवरच्या वीर जवानाने त्याच्या प्रियजनांस लिहिलेली असो ही एक अत्यंत अनमोल ठेव आहे असे मला. वाटते.!

“पू. मंजुळा स्मृतीस अर्पण”

 

©®उर्मिला इंगळे

सतारा  मो –  9028815585

दिनांक:-.२१-३-२०

!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु!!

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मराठी साहित्य – कादंबरी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ #7 ☆ मित….. (भाग-7) ☆ श्री कपिल साहेबराव इंदवे

श्री कपिल साहेबराव इंदवे 

(युवा एवं उत्कृष्ठ कथाकार, कवि, लेखक श्री कपिल साहेबराव इंदवे जी का एक अपना अलग स्थान है. आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशनधीन है. एक युवा लेखक  के रुप  में आप विविध सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अतिरिक्त समय समय पर सामाजिक समस्याओं पर भी अपने स्वतंत्र मत रखने से पीछे नहीं हटते. हमें यह प्रसन्नता है कि श्री कपिल जी ने हमारे आग्रह पर उन्होंने अपना नवीन उपन्यास मित……” हमारे पाठकों के साथ साझा करना स्वीकार किया है। यह उपन्यास वर्तमान इंटरनेट के युग में सोशल मीडिया पर किसी भी अज्ञात व्यक्ति ( स्त्री/पुरुष) से मित्रता के परिणाम को उजागर करती है। अब आप प्रत्येक शनिवार इस उपन्यास की अगली कड़ियाँ पढ़ सकेंगे।) 

इस उपन्यास के सन्दर्भ में श्री कपिल जी के ही शब्दों में – “आजच्या आधुनिक काळात इंटरनेट मुळे जग जवळ आले आहे. अनेक सोशल मिडिया अॅप द्वारे अनोळखी लोकांशी गप्पा करणे, एकमेकांच्या सवयी, संस्कृती आदी जाणून घेणे. यात बुडालेल्या तरूण तरूणींचे याच माध्यमातून प्रेमसंबंध जुळतात. पण कोणी अनोळखी व्यक्तीवर विश्वास ठेवून झालेल्या या प्रेमाला किती यश येते. कि दगाफटका होतो. हे सांगणारी ‘मित’ नावाच्या स्वप्नवेड्या मुलाची ही कथा. ‘रिमझिम लवर’ नावाचं ते अकाउंट हे त्याने इंस्टाग्रामवर फोटो पाहिलेल्या मुलीचंच आहे. हे खात्री तर त्याला झाली. पण तिचं खरं नाव काय? ती कुठली? काय करते? यांसारखे अनेक प्रश्न त्याच्या मनात आहेत. त्याची उत्तरं तो जाणून घेण्यासाठी किती उत्साही आहे. हे पुढील भागात……”

☆ साप्ताहिक स्तम्भ #7 ☆ मित….. (भाग-7) ☆

रिमझिमला समोर पाहताच तो तिच्याकडे फक्त पाहत राहिला. ते छोटे छोटे मांजरीवाणी डोळे, काहीसे लांब मुलायम केस, उंची थोडी कमी होती. पण शरीर रचना अशी की एखाद्या  नटीला मागे टाकावं. आणि चेह-यावरचे तेज असे की झोपलेल्या सृष्टीला जागे करण्यासाठी दिनकराने तेज भरावे असे होते. तिला पाहताच सागरात डोलफ़िनने उंच झेप घेऊन आपला आनंद साजरा करावा. असं त्याचं मन अगदी आनंदाच्या सागरात उड्या मारत होते.

तिची सैरभैर फिरणारी नजर बहूतेक त्यालाच शोधत असावी. चहुबाजुला तिने आपल्या नजरेचा पसारा मांडला होता.  तेवढयात एक पन्नास – बावन वर्षांचा गृहस्थ येऊन तिला काहीतरी बोलू लागले. ती ही त्यांच्या गोष्टींना होकारार्थी मान हलवली. थोडे काळजीचे भाव चेह-यावर होतेच.  तिचे वडिल असावेत. असा मितने कयास बांधला. एक बारा वर्षाचा मुलगा, पंधरा साळा वर्षाची मुलगी, आई, बाबा आणि रिमझिम असा सारा परिवार तेथून जायला निघाला. रिमझिमने मागे वळून प्लॅटफार्मवर नजर भिरकावली. तेव्हा मित तिच्या अगदी जवळ उभा होता. ती थोडी घाबरली. पण तिला आनंद सुध्दा झाला. ते एकमेकांकडे बघतच राहिले. तिचे बाबा जवळ आले तेव्हा मितने त्याना नमस्कार केला.

मित- “नमस्ते अंकल. मै मित.”

ज्योतीप्रसाद – “नमस्ते बेटा. मै ज्योतीप्रसाद. रिमूने आपके बारे मे बताया.”

मित- “जी अंकल. हम दोनो बहोत अच्छे दोस्त है.”

मित त्यांच्यासोबत त्यांना हाटेलला गेला. त्याचा मनमिळाऊ स्वभाव आणि प्रभावी बोलणे यामुळे तो लवकरच त्यांच्या पुरण परिवारात मिसळला. रूमला बॅग वगैरे ठेऊन रिमझिमचे बाबा आणि मित सोफ्यावर गप्पा मारत बसले होते.

ज्योती प्रसाद- “आपकी बातें बहोत अच्छी हैं बेटा. लगता नहीं कि  पहली बार मिले है.”

मित- “जी  शुक्रिया अंकल. बस मम्मी पापा की मेहरबानी और आप जैसे बड़ो की दूवा है.”

गप्पा करत असताना मितचा फोन वाजू लागला. त्याने तो उचलला. प्रियंकाचा होता.

मित- “हॅलो”

प्रियंका- “अरे कुठे आहेस तू. आणि किती फोन केले तुला. कमीत कमी फोन तर रिसिव्ह कर.”

मित- “अगं हो… सोर्री… मी  एका महत्वाचा कामात अडकलो होतो. म्हणून…..”

प्रियंका- “अरे म्हणून काय, येतोयस ना. उशीर होतोय नाटकाला.”

मित- “ओके. तुम्ही पोहोचले का नाट्यगृहाला”

प्रियंका- “नाही. मी आता सी. एस. टी. ला आहे.  आणि लवकरच पोहोचतेय. तू पण जिथे असशील तिथून ये लवकर”

मित – “बरं चल मी येतोय.”

त्याने फोन ठेवला.

मित – “अंकल वो कूछ ज़रूरी काम है मै वो पुरा करता हूँ तब तक आप फ़्रेश हो जाईए.”

ज्योति प्रसाद- “अरे बेटा कहा चल दिए.”

मित- “जी अंकल, वो हमारे कॉलेज का ड्रामा कॉम्पटिशन है. और हमारी कॉलेज जो ड्रामा प्ले कर रही है वो मैने लिखा है और डायरेक्ट भी मै हक कर रहा हूँ. क्या आप आना पसंद करोगे.”

ज्योती प्रसाद- “अरे नही बेटा, हम अभी इतनी दुर से सफर करके आए. अभी कुछ देर आराम करेंगे. फिर बाद मै और भी घुमना है. आप चाहो तो बच्चो को ले जाओ”

त्यांनी नजर वळवून मुलांकडे पाहीले. गिरीष एकदम थकलेल्या अवस्थेत म्हटला

गिरीष- “मै बहोत थक गया हूँ पापा मै नही जाऊंगा”

सागरीकाचेही काहीसे असेच सुर होते. रिमझिमच्या आईला मात्र नाही म्हणणे योग्य वाटले नाही. ती म्हटली

आई- “अगर नही गए तो उन्हे बूरा लगेगा. चलिए ना ”

रिमझिम आईच्या सूरात सूर मिसळून

रिमझिम- हा पापा. और हम आये ही है महाराष्ट्रा घुमने.”

ज्योती प्रसाद ( स्वतःशीच) – हाँ. और ये लडका विश्वास करना के लायक है या नही ये भी पता चल जाएगा. (रिमझिमला) सुनो तुम सब अपना मोबाईल लोकेशन ऑन रखना. मै वो लोकेशन पुलिस मे शेयर करता हूँ. ताकि वो हम पर नजर बनाए रखेंगे ”

कितीही झालं तरी स्वतः आणि एक पिता म्हणून मुलांच्या सुरक्षिततेची काळजी घेणे भागच होते. आसामी भाषेत केलेली ही चर्चा मितला काही कळली नव्हती.

मित त्यांना घेऊन शिवाजी नाट्यमंदीर, सी.एस.टी. ला पोहोचला. त्याच्या टीमला भेटला. त्याने टीमसोबत रिमझिमच्या कुटूंबाची ओळख करून दिली. संघरत्नला सगळी कहाणी माहीती होती. तो त्याला बाजूला घेऊन गेला.

संघरत्न- “क्या बॉस तु तर म्हटला होता की फ्रेंडशीप ठेवणार. आणि तू तर उसे घर तक …….”

मित – “ए तसं नाहीये काही….. (थोडं होकारार्थी मान हलवत) तसंच आहे काही….. पण तिला इथे मी नाही बोलावलं. फॅमिली टूर साठी आलीय इथं ती.”

संघरत्न- “अरे असू दे ना. आली ना…. मग कधी सांगतोयस”

मित- “काय?”

संघरत्न – “अरे कधी मारतोयस प्रपोज.”

मित – “काय?”

संघरत्न- “घाबरतोयस. हवं तर मला सांग मी करून देतो. आखिर दोस्त कब काम आयेंगे.”

मित- “ए फालतू कांहीही बरडू नकोस हं…. असं नाही. काहीतरी स्पेशल व्हायला हवं.”

संघरत्न- “मग काय शॅपेनच्या बाटलीत रिंग टाकून देणार आहेस का”

मित- “नाही रे. उलटा लटकून कीस करावी लागेल नाही तर ……”

दोघेही हसले.

  क्रमशः

 © कपिल साहेबराव इंदवे

मा. मोहीदा त श ता. शहादा, जि. नंदुरबार, मो  9168471113

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हिन्दी साहित्य- कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #25 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

आचार्य सत्य नारायण गोयनका

(हम इस आलेख के लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी, योगाचार्य एवं प्रेरक वक्ता योग साधना / LifeSkills  इंदौर के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के महान कार्यों से अवगत करने में  सहायता की है। आप  आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के कार्यों के बारे में निम्न लिंक पर सविस्तार पढ़ सकते हैं।)

आलेख का  लिंक  ->>>>>>  ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी 

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे # 25 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(हम  प्रतिदिन आचार्य सत्य नारायण गोयनका  जी के एक दोहे को अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास करेंगे, ताकि आप उस दोहे के गूढ़ अर्थ को गंभीरता पूर्वक आत्मसात कर सकें। )

आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे बुद्ध वाणी को सरल, सुबोध भाषा में प्रस्तुत करते है. प्रत्येक दोहा एक अनमोल रत्न की भांति है जो धर्म के किसी गूढ़ तथ्य को प्रकाशित करता है. विपश्यना शिविर के दौरान, साधक इन दोहों को सुनते हैं. विश्वास है, हिंदी भाषा में धर्म की अनमोल वाणी केवल साधकों को ही नहीं, सभी पाठकों को समानरूप से रुचिकर एवं प्रेरणास्पद प्रतीत होगी. आप गोयनका जी के इन दोहों को आत्मसात कर सकते हैं :

धर्म छुटे तो सुख छुटे, आकुल-व्याकुल होय ।

धर्म जगे तो सुख जगे, हरखित पुलकित होय ।। 

  आचार्य सत्यनारायण गोयनका

#विपश्यना

साभार प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

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Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यात्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (16) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

एकादश अध्याय

(अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )

 

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।

नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ।। 16।।

 

बाहु उदर मुख नेत्र कई , अगनित रूप  अनन्त

सभी तरफ बस आप हैं , कहीं न कोई अन्त

विश्वेसर विस्मित हूँ मैं , देख तुम्हारा रूप

आदि न अन्त न मध्य है , सब है अजब अनूप ।। 16।।

 

भावार्थ :  हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही॥16॥

 

I see Thee of boundless form on every side, with many arms, stomachs, mouths and eyes; neither the end nor the middle nor also the beginning do I see, O Lord of the universe, O Cosmic Form!

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

[email protected]

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