मराठी साहित्य – कविता ☆ कोरोना ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज  प्रस्तुत है आपकी एक समसामयिक कविता  “कोरोना।)

☆ कोरोना ☆

चार हात दूर होता

माझ्या पासून कोरोना

घाबरलो होतो मीही

मला म्हणाला डरो ना

 

धाडसाने विचारले

आला कशाला इकडं

काय करणार आहे

तू रे आमचं वाकडं

 

खाद्य खेळणी चीनची

असतात जीवघेणी

मरताय थोडे थोडे

लक्ष देता का रे कोणी

 

मीही तिथली उपज

टाकायला आलो फासे

मला पाहून कशाला

घाबरता तुम्ही असे

 

आलो आहे शिकवाया

स्वच्छतेचा परिपाठ

नका घाबरून जाऊ

फक्त रहा धष्टपुष्ट

 

अपघात जुलाबाने

रोज मरतात लोक

माझ्या एकट्याचा नाही

येथे तुम्हाला रे धाक

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

[email protected]

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 20 – महात्मा गांधी  और उनके अनुयायी ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह  गाँधी विचार, दर्शन एवं हिन्द स्वराज विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें.  आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला का अगला आलेख  “महात्मा गांधी  और उनके अनुयायी”। )

☆ गांधी चर्चा # 20 – महात्मा गांधी  और उनके अनुयायी

अपने जीवन काल में गांधीजी ने जो कुछ अनुभव प्राप्त किए, लोगों से सीखे और जो भी सिद्धांत बनाए उन्हे सबसे पहले स्वयं पर लागू किया और उन्हे परखा। उनके अनेक कार्यक्रम समाज सुधार की भावना से भी प्रेरित थे और उन्हे लागू करवाने में उन्हे विरोधों का भी सामना करना पड़ता यहाँ तक कि अनेक बार उनकी पत्नी कस्तूरबा भी उनसे सहमत न होती पर गांधीजी ने हार नही मानी वे सदैव अपने नियमों, सिद्धांतों का प्रचार प्रसार करते रहे। स्वतंत्रता के आन्दोलान में अनेक लोग उनके संपर्क में आए उनसे प्रभावित हुये और उनके सच्चे अनुयायी बन गए।इन व्यक्तियों ने आजीवन गांधीजी द्वारा बताई गई जीवन शैली का परिपालन किया। ऐसे अनेक नाम है उनमे से कुछ की चर्चा मैं करना चाहता हूँ।

गांधीजी की पत्नी के विषय में उनकी नातिन सुमित्रा गांधी कुलकर्णी अपनी पुस्तक “महात्मा गांधी मेरे पितामह” में लिखती हैं “ मेरा ऐसा विश्वास है कि आदि युग की अरुंधती के समान ही वर्तमान की कस्तूरबा गांधी अपने तेजस्वी सत्यनिष्ठ पति की सुयोग्य अर्धांगनी थीं जो स्वयं अपनी निर्भीकता, कर्मठ सेवा भाव और अपनी सुलझी हुई उदारता और चारित्र्य की प्रखरता से बापुजी के सारे देशी-विदेशी आश्रमों को प्रभासित किए हुए थीं।“ गांधीजी  ने कस्तूबा की सहनशीलता पर अपनी आत्मकथा “सत्य के प्रयोग” में अफ्रीका के घर में पेशाब के बर्तन उठाने के संदर्भ में लिखा है “ इसमे से हरेक कमरे में पेशाब के लिए खास बर्तन रखा जाता। उसे उठाने का काम नौकर का न था, बल्कि हम पति पत्नी का था। कस्तूर बाई दूसरे बर्तन तो उठाती पर पञ्चम कुल में उत्पन्न मुहर्रिर का बर्तन उठाना उसे असह्य लगा।इससे हमारे बीच कलह हुआ। मेरा उठाना उससे सहा न जाता था और खुद उठाना उसे भारी हो गया था।“ दुखी मन से कस्तूरबा का बर्तन उठाना गांधीजी को पसंद न आया। वे उनपर भड़क उठे और बोले “यह कलह मेरे घर में नहीं चलेगा”  कस्तूरबा भी कहाँ चुप रहती वे भी भड़क उठीं और बोली “ तो अपना घर अपने पास रखो मैं यह चली” गांधीजी आगे लिखते हैं “ मैंने उस अबला का हाथ पकड़ा और दरवाजे तक खींच कर ले गया। दरवाजा आधा खोला । कस्तूरबाई की आखों में गंगा जमुना बह रही थी वह बोली – तुम्हें तो शरम नहीं है। लेकिन मुझे है। जरा तो शरमाओ। मैं बाहर निकल कर कहाँ जा सकती हूँ ? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, इसलिए मुझे तुम्हारी डांट फटकार सुननी पड़ेगी। अब शरमाओ और दरवाजा बंद करो। कोई देखेगा तो दो में से एक की भी शोभा नहीं रहेगी।“ गांधीजी कहते हैं कि “हमारे बीच झगड़े तो बहुत हुये, पर परिणाम सदा शुभ ही रहा है। पत्नी ने अद्भुत सहनशक्ति द्वारा विजय प्राप्त की है।“ गांधीजी और कस्तूरबा के दांपत्य जीवन पर श्री राकेश कुमार पालीवाल अपनी पुस्तक  ” गांधी जीवन और विचार”  में लिखते हैं –  एक बार गांधी ने स्वास्थ लाभ के लिए कस्तूरबा को नमक और दाल छोड़ने की सलाह दी। कस्तूरबा ने कहा – ये दो चीज तो आप भी नही छोड़ सकते। गांधी ने तभी दोनों को त्यागने का व्रत ले लिया। कस्तूरबा को गांधी का त्याग देखकर बड़ा अफसोस हुआ। उन्होने यह दोनों चीजें छोड़ दी और गांधी से  अनुरोध किया कि वे अपना ब्रत तोड़ दे लेकिन गांधी भी उतने ही दृढ़ संकल्पी थे उन्होने आजीवन यह व्रत निभाया। बाद के सालों में दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए थे।“

महात्मा गांधी के एक अनन्य मित्र थे शंकर धर्माधिकारी जो दादा धर्माधिकारी के नाम से ही प्रसिद्ध हुये।  उनके पिता ब्रिटिश हुकूमत में जज की नौकरी करते थे पर दादा गांधीजी के सिद्धांतों के पक्के अनुयायी थे। गांधीजी की अनेक मान्यताओं की उन्होने बड़ी सुंदर व्याख्या की है। ऐसी ही व्याख्या स्त्री को बराबरी का दर्जा देने को लेकर है। गांधीजी यह मानते थे कि “स्त्रियों का मन कोमल होता है इसका मतलब वह कमजोर होती है ऐसी बात नही”। गांधीजी की इस मान्यता का भाष्य करते हुये दादा कहते हैं, “ स्त्री सुरक्षित नही, पर स्वरक्षित हो। शिक्षा के विकास के लिए उसमे दो तत्त्वो का समावेश होना चाहिए, सामंजस्य और अनुबंध। शिक्षा का स्वाभाविक परिणाम विनयशीलता में हो। स्त्रियों को स्त्रियों के और पुरुषो के साथ भी मैत्री की समान भूमि पर विचरण करने की कला साध्य होनी चाहिए। स्त्री पुरुषों का सामान्य मनुष्यत्व शिक्षा के कारण विकसित हो। स्त्री पुरुष के बराबर रहे यानी वह पुरुष जैसी होगी ऐसा नही। विकसित स्त्री का मतलब नकली पुरुष नहीं।समानत्व का अर्थ तुल्यत्व नहीं। स्त्री की भूमिका पुरुष की भूमिका तुल्य रहेगी, कभी-कभी वह उससे सरस या कई बातों में उसके जैसी होगी परंतु वह निम्न स्तर की कभी नही रहेगी। स्त्री की प्रतिष्ठा केवल ‘वीरमाता’ या ‘वीरपत्नी’ बनने में नही। उसका पराक्रम स्वायत्त होगा। वीरपुरुष की तरह वीरस्त्री बनना उसके लिए भूषणावह होना चाहिए।“ ( एक न्यायमूर्ति का हलफनामा से साभार।)  आज जब बीएचयू जैसे उच्च शिक्षा केंद्रों में स्त्री अपमान, नारी समानता, स्त्री सुरक्षा जैसे  अनेक प्रश्न उठ रहे है, इनको लेकर आंदोलन हो रहे है तब  क्या गांधीजी की मान्यताओं की ऐसी व्याख्या हमे मार्ग नही दिखाती? गांधीजी  आज भी प्रासंगिक है यह मानने की जरूरत है।

दादा धर्माधिकारी के  एक पुत्र न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर धर्माधिकारी हैं, उन्होने अपनी पुस्तक “एक न्यायमूर्ति का हलफनामा “ में गांधीजी के अनेक अनुयायियों का जिक्र किया है और उन घटनाओं का सजीव चित्रण किया है जो हमे बताती हैं कि लोगों पर गांधीजी का प्रभाव कितना व्यापक था और लोग किस निष्ठा के साथ उनके बताए मार्ग पर चलने का सफल प्रयास करते थे। न्यायमूर्ति धर्माधिकारी अपनी इस पुस्तक में श्रीकृष्णदासजी जाजू को याद करते हुए लिखते हैं कि “गांधीजी के एकादश व्रतों में ‘अस्तेय’ और अपरिग्रह ये दो व्रत हैं। जाजूजी इन  व्रतों के जीते जागते उदाहरण थे। एक बार दादा और माँ  जाजूजी के साथ गांधी सेवा संघ के सम्मेलन में हुदली गए थे। वहाँ खड़ी ग्राम-उद्योग की वस्तुओं की प्रदर्शनी लगी थी। दादा और माँ  जाजूजी प्रदर्शनी देखने निकले। दादा  ने माँ से कहा, ‘थोड़े पैसे साथ ले लेना।’ सुनकर जाजूजी ने कहा, प्रदर्शनी  में देखने और कुछ सीखने जाना है या चीजें खरीदने के लिए ? दादा ने  कहा, ‘यह तय करके की कुछ खरीदना ही है नही जा रहे। अगर कोई अच्छी चीज दिखी तो ले लेंगे।‘ जाजूजी को बहुत अचरज हुआ। बोले ‘यह क्या बात हुयी ? अगर आपको किसी चीज की जरूरत है तो उसे ढूढ़ेंगे’।पर केवल कोई चीज अच्छी ढीखती है, इसलिए बिना जरूरत उसका संग्रह करना कहाँ तक उचित है? अनावश्यक चीजे याने कबाड़।“

गांधीजी ने देश के उद्योगपतियों के लिए ट्रस्टीशिप का  सिद्धांत प्रतिपादित किया था। जमना लाल बजाज, घनश्याम दास बिरला आदि ऐसे कुछ देशभक्त उद्योगपति हो गए जिन्होने  गांधीजी के निर्देशों को अक्षरक्ष अपने व्यापार में उतारा। गांधीजी  से प्रभावित ये उद्योगपति आज के व्यापारियों जैसे न थे जिनका लक्ष्य केवल और केवल मुनाफा कमाना रह गया है। और  मुनाफाखोरी की यह आदत सारे नियम कानूनों का उल्लघन करने से भी नही चूकती। जन कल्याण , समाज सेवा आदि की भावना अब उद्योगपतियों के लिए गुजरे जमाने की बातें हैं, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्ति के साधन बन गए हैं और  टीवी पर डिबेट की विषयवस्तु बन कर रह गई है। जमना लाल बजाज के विषय में न्यायमूर्ति धर्माधिकारी अपनी इस पुस्तक में लिखते हैं “ महात्मा गांधी ने जमनालालजी को जैसा प्रमाणपत्र दिया, वैसा शायद ही अन्य किसी को मिला हो! गांधीजी की राय से ‘उनकी और जमनालालजी की सच्ची राजनीति याने विधायक कार्य। जमनालालजी अपनी सम्पति के ट्रस्टी या संरक्षक के नाते ही बर्ताव करते थे। अगर वे  ट्रस्टीशिप की पूर्णता तक पहुँचे न होंगे तो उसका कारण मैं ही हूँ। लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जमनालालजी ने अनीति से एक पाई तक नहीं कमाई और जो भी कमाया वह सब जनता जनार्दन की भलाई के लिए खर्च किया।‘ सच क्या आजकल ऐसे उद्योगपति बचे हैं? जमना लाल बजाज ने सत्याग्रहाश्रम , महिला सेवा मंडल, शिक्षा मंडल, चरखा संघ, गांधी सेवा संघ आदि संस्थाओं की नीव डाली। उन्होने ही सबसे पहले वर्धा का अपना ‘श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर’ 17 जुलाई 1928 को अस्पृश्यों के लिए खुला कर, उनके प्रेरणास्त्रोत गांधीजी के सहयोगी व पुत्र होने का सम्मान प्राप्त किया।

गांधीजी के सामुदायिक जीवन में प्रार्थना का बड़ा महत्व था। उनके द्वारा स्थापित आश्रमों में सुबह और शाम सर्वधर्म प्रार्थना होती और इसका क्रमिक विकास हुआ, जिसमें काका कालेलकर का बहुत बड़ा योगदान है। आश्रम-भजनावली का संपादन उन्होने ही किया और इसकी प्रस्तावना में उन्होने बड़े विस्तार से बताया है कि किस प्रकार बौद्ध मंत्रों, कुरान की आयतों, जरथोस्ती गाथा, बाइबल, देवी देवताओं की स्तुतियाँ, भजन, रामचरित मानस,  उपनिषद के श्लोक, गीता आदि का समावेश आश्रम-भजनावली में हुआ। काका लिखते हैं कि सुबह की प्रार्थना में अनेक देव-देवियों की उपासना आती है। इसका विरोध भी अनेक आश्रमवासियों ने किया था। गांधीजी ने कहा कि ये सब श्लोक एक ही परमात्मा की उपासना सिखाते हैं। नाम रूप की विविधता हमें ना केवल सहिष्णुता सिखाती है,बल्कि हमे सर्व-धर्म-सम-भाव  की ओर ले जाती है। यह विविधता हिन्दू धर्म की खामी नहीं किन्तु खूबी है।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सजल ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि‘

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है  अतिसुन्दर गीत  “सजल ।  इस अतिसुन्दर गीत के लिए श्रीमती कृष्णा जी बधाई की पात्र हैं।)

☆ सजल ☆

 

प्रिया तुम्हारे प्यार में, बनने लगे कबीर

बढ़ती हैं पींगें नयी, मनवा हुआ अधीर

 

आँखें अपलक जोहतीं, बाट गगन के तीर

सूनी राहें देख के, नयन बहाएँ नीर

 

हरिदर्शन पाऊँ भला, कहाँ हमारे भाग्य

उर में छवि घनश्याम की, मनवा धरे न धीर

 

काव्य कला समझे नहीं, नहीं शिल्प का ज्ञान

भाव – भाव  सुरभित सुमन, शब्द – शब्द में पीर

 

जीवन जीने की कला, रखें संतुलित दृष्टि

रखें धीर दुख में, रहें सुख में भी गंभीर।

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

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सूचनाएँ/Information ☆ लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल एवं विश्व वाणी हिंदी संस्थान, जबलपुर द्वारा लघु कथा गोष्ठी आयोजित ☆

सूचनाएँ/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल एवं विश्व वाणी हिंदी संस्थान, जबलपुर द्वारा लघु कथा गोष्ठी आयोजित☆

जबलपुर, १४-३-२०१६।  विश्व वाणी हिंदी संस्थान अभियान के ४०१ विजय अपार्टमेंट जबलपुर स्थित मुख्यालय में ख्यात छंद शास्त्री आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी की अध्यक्षता में देश की जानी-मानी लघुकथाकार आदरणीया सुश्री कांता राय जी के मुख्य आतिथ्य में लघु कथा गोष्ठी का आयोजन किया गया।
कांता जी ने लघुकथा शोध केंद्र भोपाल के गठन व् गतिविधियों की जानकारी दी। लघुकथा विधा को आगे ले जाने के लिए लगातार लघुकथा गोष्ठियों की आवश्यकता पर बल दिया । कम शब्दों में अपनी बात कह सकने की क्षमता रखने वाली लघुकथा आज के  जीवन में एक बहुत सार्थक विधा के रूप में साहित्य  के एक  विशेष अंग के रूप में उभरकर कर हमारे सामने है। कांता  जी ने जबलपुर में लघुकथा शोध संस्थान भोपाल की ईकाई स्थापित करने की घोषणा करते हुए आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ को संरक्षक, पवन जैन-मधु जैन को संयोजक तथा विश्ववाणी हिंदी संस्थान – अभियान को सहयोगी संस्था घोषित किया।
सलिल जी ने विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के उद्देश्यों और कार्यक्रमों से अवगत कराया तथा कुछ लघुकथा में संक्षिप्तता, सारगर्भितता, व्यंजनात्मता, मार्मिकता आदि को आवश्यक बताते हुए उदाहरण प्रस्तुत किये। लघुकथा के उद्भव, विधान, विकास यात्रा, मध्य प्रदेश और जबलपुर के अवदान आदि पर विस्तृत चर्चा हुई।
सर्व आदरणीय सुरेश कुशवाहा तन्मय, मीना भट्ट, पुरुषोत्तम भट्ट, डॉ. कामना श्रीवास्तव, पवन जैन, मधु जैन, प्रभात दुबे, अर्चना राय, श्री राय, छाया सक्सेना, छाया त्रिवेदी, विनीता श्रीवास्तव, डॉ. भावना दीक्षित, मिथिलेश बड़गैंया, डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे, सुरेंद्र सिंह पवार, रमाशंकर खरे आदि ने विमर्श में सार्थक सहभागिता की। सभी उपस्थित लघुकथाकारों की लघुकथाओं पर  वाचन पश्चात चर्चा की गयी।
विवरण:  सुश्री छाया सक्सेना, मुख्यालय सचिव

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हिन्दी साहित्य- कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #22 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

आचार्य सत्य नारायण गोयनका

(हम इस आलेख के लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी, योगाचार्य एवं प्रेरक वक्ता योग साधना / LifeSkills  इंदौर के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के महान कार्यों से अवगत करने में  सहायता की है। आप  आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के कार्यों के बारे में निम्न लिंक पर सविस्तार पढ़ सकते हैं।)

आलेख का  लिंक  ->>>>>>  ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी 

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे # 22 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(हम  प्रतिदिन आचार्य सत्य नारायण गोयनका  जी के एक दोहे को अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास करेंगे, ताकि आप उस दोहे के गूढ़ अर्थ को गंभीरता पूर्वक आत्मसात कर सकें। )

आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे बुद्ध वाणी को सरल, सुबोध भाषा में प्रस्तुत करते है. प्रत्येक दोहा एक अनमोल रत्न की भांति है जो धर्म के किसी गूढ़ तथ्य को प्रकाशित करता है. विपश्यना शिविर के दौरान, साधक इन दोहों को सुनते हैं. विश्वास है, हिंदी भाषा में धर्म की अनमोल वाणी केवल साधकों को ही नहीं, सभी पाठकों को समानरूप से रुचिकर एवं प्रेरणास्पद प्रतीत होगी. आप गोयनका जी के इन दोहों को आत्मसात कर सकते हैं :

पराधीन को सुख कहाँ? सुख भोगे स्वाधीन । 

जो सुख चाहे होश रख, मत हो विषयाधीन ।।

– आचार्य सत्यनारायण गोयनका

#विपश्यना

साभार प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email [email protected] if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Our Fundamentals:

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga.  We conduct talks, seminars, workshops, retreats, and training.

Email: [email protected]

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यात्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (13) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

एकादश अध्याय

(संजय द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति विश्वरूप का वर्णन )

 

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।

अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ।। 13 ।।

तव ईश्वर की देह में , ही सारा संसार

अर्जुन ने देखा , प्रकट – विघटित विविध प्रकार ।। 13 ।।

 

भावार्थ :  पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।। 13 ।।

.There, in the body of the God of gods, Arjuna then saw the whole universe resting in the one, with its many groups.।। 13 ।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 31 ☆ नदी ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जीसुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “नदी ”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 31☆

☆ नदी 

झरने से जब

वो नदी के रूप में परिवर्तित हुई,

उसे पेड़, बादल और हवाओं ने

अच्छी तरह समझाया

कि जो गुज़र जाती है,

उसका कभी ग़म न करना

और बस आगे ही आगे बढती रहना!

 

पहाड़ों का साथ छूटा,

पर वो बिलकुल नहीं रोई;

उसका पानी अब उतना साफ़ नहीं रहा,

पर वो हरगिज़ नहीं टूटी;

उसपर न जाने कितने बाँध लगाए गए,

पर उसने उफ़ तक नहीं की-

बस जैसे उसे औरों ने समझाया था

वो करती रही!

 

बस उसके मन में कहीं

एक ख़ामोशी जनम लेने लगी

और वो उसको लाख चाहकर भी

मिटा नहीं पा रही थी…

 

एक साल

इतनी बारिश बरसी

कि वो सारे बंधनों से मुक्त हो गयी

और तब समझ पायी वो

अपनी शक्ति को!

 

अब वो बहती है

निर्बाध, मुक्त और खुली सांस लेती हुई!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिल्पी  ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  – शिल्पी  ☆

देखे-भोगे दुख का शिल्पी

गढ़ता प्रतिपल नए आखर,

मेरी आँख की गागर में

डूबे जाने कितने सागर!

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

[email protected]

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English Literature ☆ Weekly Column – Abhivyakti # 11 ☆ An innocent baby/Lesson to humanity ☆ Hemant Bawankar

Hemant Bawankar

(All of the literature written by me was for self satisfaction. Now I started sharing them with you all. Every person has two characters. One is visible and another is invisible. This poem shows us mirror.  Today, I present my poem ‘An innocent baby/Lesson to humanity ’.)

My introduction is available on following links.

☆ Weekly Column – Abhivyakti # 11 

☆ An innocent baby/Lesson to humanity ☆

 An innocent baby girl

in my neighbourhood

suddenly reminds me:

my daughter’s childhood.

 

Whenever she comes

to our home

suddenly she enthrall us

she fills our heart

with unlimited energy.

 

Her crawling on knees

in the house

suddenly reminds us

our kids’ childhood

and

we are forced

for crawling

on knees

with her.

 

Her innocent

crawling

towards us

in our arms

on our lap

claims her right

unknowingly

reminds us

her relations

our debts

of previous life.

 

Her childlike activities

her laughter

her obstinacy

and

above all

her pure heart

as of almighty God

suddenly compels and inspires us

to shower

the blessings on her

she may flourish

she may grow well

however,

her heart must be pure

as it is today.

 

She does not know

this world

the ups and downs

black and white

man and woman

race and religion

rich and poor

composite culture.

Suddenly I recall the story

‘Kabuliwala’*.

 

I am afraid.

She will certainly

forget us

when she will grow old

and

for this

you all will be answerable

you all will be responsible.

‘You’

you – the society

you – the contractor of the society

you – the contractor of the religion

you – the media

and

perhaps to some extent

me too

I – the present

I – the mirror

I – the humanity

I – who could not fight

with you.

 

However,

I will play

my role of humanity

and

from time to time

I will show you

the mirror

so that

you will not  dare

to toss a pebble

on our calm river

of the great composite culture.

 

Nothing is impossible

if you can keep

your heart clean,

as the heart of

an innocent baby girl

in my neighbourhood.

* Rabindranath Tagore’s famous tale “Kabuliwala

© Hemant Bawankar, Pune

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 42 ☆ पुन्हा नव्याने ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता “पुन्हा नव्याने ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 42 ☆

☆ पुन्हा नव्याने  ☆

 

जगतो आहे मरण रोजचे

दुःख पाहुणे कुण्या गावचे

 

सरणालाही पैसा नाही

टाळूया का मरण आजचे ?

 

शीतल सरिता सोबत असता

वाळवंट हे तप्त काठचे

 

मुरू लागल्या कच्च्या कैऱ्या

जीवनानुभव हेच लोणचे

 

निसर्ग लाभो देहाला या

तक्के, गाद्या नको फोमचे

 

पुन्हा नव्याने दुःख भेटता

जीवन वाटे बरे कालचे

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

[email protected]

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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