हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 36 ☆ व्यंग्य – गांधी जी आज भी बोलते हैं ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  व्यंग्य  “गांधी जी आज भी बोलते हैं ”।  अपनी बेहतरीन  व्यंग्य  शैली के माध्यम से श्री विवेक रंजन जी सांकेतिक रूप से वह सब कह देते हैं जिसे पाठक समझ जाते हैं और सदैव सकारात्मक रूप से लेते हैं ।  श्री विवेक रंजन जी का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 36 ☆ 

☆ व्यंग्य – गांधी जी आज भी बोलते हैं  ☆

साहब की कुर्सी के पीछे गांधीजी दुशाला ओढ़े लगे हुए हैं। साहब कुछ वैचारिक किस्म के आदमी हैं। वे अकेले में गांधी जी से मन ही मन  बिन बोले बातें करते हैं। गांधीजी उनसे बोलते हैं कि  सारी योजनाएं तभी कारगर  होंगी जब उनके केंद्र में  कतार की पंक्ति में खड़ा अंतिम आदमी ही पहला व्यक्ति होगा। इसलिए साहब अक्सर लाभ पहुंचाते समय कतार के पहले व्यक्ति की उपेक्षा कर अंतिम व्यक्ति को भी,  जो गांधी जी के साथ आता है सबसे पहले खड़ा कर लेते हैं।

साहब की आल्मारियो से फाइलें तभी बाहर आती हैं जब अकेले में वे उनके विषय  में  गांधी जी से पूरी बातें कर लेते हैं। उनके पास गांधीजी गड्डी में आते हैं। गांधी जी साहब की लाठी हैं। गांधीजी के बिना साहब फाइल को  लाठी से हकाल देते हैं। वे गांधीजी के इतने भक्त हैं कि गांधीजी की संख्या साहब के कलम की दिशा पलट देती है। वे गांधी जी के सो जाने के बाद ही साहब क्वचित नशा करते हैं। वे गांधीजी  के नोट पर छपे हर चित्र की सुरक्षा बहुत जतन से करते हैं। साहब ने एक बकरी भी गांधीजी की ही तरह पाली हुई है। यदि उन्हें किसी की कोई सलाह पसंद नहींं आती तो वे बकरी  को घास खिलाने चले जाते हैं और इस तरह विवाद होने से बच जाता  है। स्वयम ही अगली बार समझदार व्यक्ति बकरी के लिए पर्याप्त घास लेकर साहब के पास पहुंचता है। साहब उसके साथ गड्डी में आये हुए गांधी जी से एकांत में चर्चा करतेे हैं। और गांधीजी का संकेत मिलते ही  व्यक्ति का काम सुगमता से कर देते हैं। बकरी निमियाने लगती है।

इसलिए मेरा मानना है कि गांधी जी आज भी बराबर बोलते हैं, उन्हें गुनने, सुनने औऱ समझने वाले की ही आवश्यकता है। जन्म के 150 वे वर्ष में हम सब को गांधी जी को पुनः पढ़ना समझना आचरण में उतारने की जरूरत है बस।

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर .

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 8 ☆ अघोषित युद्ध ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एकअतिसुन्दर व्यंग्य रचना “अघोषित युद्ध।  इस समसामयिक एवं सार्थक व्यंग्य के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को नमन ।  इस सन्दर्भ में मैं अपनी दो पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूंगा-

अब ना किताबघर रहे ना किताबें ना ही उनको पढ़ने वाला कोई

सोशल साइट्स पर कॉपी पेस्ट कर सब ज्ञान बाँट रहे हैं मुझको ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 8 ☆

☆ अघोषित युद्ध

कहते हैं जहाँ एक ओर बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा होता है तो वहीं दूसरी ओर चिड़चिड़ापन  चटनी के समान तीखा व चटपटा होता है, जो क्रोध को और लाग लपेट के साथ प्रस्तुत करता है । चिड़चिड़ा व्यक्ति क्या बोलता है ये समझ ही नहीं  पाता, उसके दिमाग में बस बदला लेने की प्रवत्ति ही छायी रहती है । वो मारपीट, समान तोड़ना, पुरानी बातों को याद करना, अपना माथा पीटना ऐसी हरकतों पर उतारू हो जाता है । ऐसी दशा में चेहरे का हुलिया बिगड़ जाता है  क्योंकि जब भी किसी को गुस्सा आता है तो चेहरा व आँखे लाल हो जाती है।  मन ही मन बैर पाल लेने की परंपरा बहुत पुरानी है । महाभारत युद्ध भी इसी का परिणाम था। खैर अब तो इलेक्ट्रॉनिक युग है सो बात-बात पर ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप इन पर कोई भी पोस्ट आयी नहीं कि दो खेमे तैयार एक पक्ष में माहौल बनाता है तो दूसरा विपक्ष में । बस इसी के साथ अनर्गल बात चीत का दौर शुरू हो जाता है । अब गुस्से में व्यक्ति अधिक से अधिक क्या कर सकता है बस अनफॉलो, अनफ्रेंड, रिमूव इनके अतिरिक्त और कोई इजाजत यहाँ नहीं होती ।

यकीन मानिए कि  ये सब करते हुए बहुत सुकून मिलता है दूसरे शब्दों में कहूँ तो राजा जैसी फीलिंग आती है । जिस तरह पुराने समय में बदला लेने के लिए युद्ध होते थे वैसे ही यहाँ पर भी अघोषित युद्ध आये दिन चलते रहते हैं जिसमें पिसता बेचारा असहाय वर्ग ही है क्योंकि वो इन पोस्ट्स को पढ़ता है और इसी आधार पर आपस में ज्ञान बाँटने लगता है ।

वीडियो, भड़काऊ पोस्ट, ज्ञान दर्शन की बातें ये सब खजाना खुला पड़ा है  सोशल मीडिया पर ;  बस यहाँ से वहाँ फॉरवर्ड करिए और दूसरों की नजरों में भले ही आप बैकवर्ड हो पर स्वयं की नजर में तो फॉरवर्ड घोषित हो ही जाते हैं । मजे की बात इन बातों का  प्रभाव भी दूरगामी होता है ; मन ही मन खिचड़ी पकने लगती और हमारे क्रियाकलाप उसी तरह हो जाते हैं जो सामने वाला चाहता है । भटकाव के इस दौर में जो लोग साहित्य को दर्पण मान  पुस्तक में डूब जाते हैं उनकी जीवन नैया तो संगम के पार उतर जाती है बाकी के लोगों को राम ही राखे ।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 38 – बेशर्म ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  एक व्यावहारिक लघुकथा  “बेशर्म । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  #38 ☆

☆ लघुकथा – बेशर्म ☆

 

“बेटी ! इसे माफ़ कर दे. आखिर तुम दोनों के पिता तो एक ही है.”

“माँ ! आप इसे माफ़ कर सकती हैं क्यों की आप सौतेली ही सही. मगर माँ हो. मगर, मैं नहीं। जानती हो माँ क्यों?”

अनीता अपना आवेश रोक नहीं पाई, “क्योंकि यह उस वक्त भाग गया था, जब आप को और मुझे इस की सब से ज्यादा जरूरत थी. उस वक्त आप दूसरों के घर काम कर के मुझे पढ़ा लिखा रही थी. आज जब मेरी नौकरी लग गई है तो ये घर आ गया.”

“यह अपने किए पर शर्मिंदा है.”

“माँ ! पहले यह हम से बचने के लिए ससुराल भाग गया था और अब वहाँ की जीतोड़ खेतीबाड़ी से बचने के लिए यहाँ आ गया. यह मुफ्तखोर है. इसे सौतेली माँ बहन का प्यार नहीं, मेरी नौकरी खीच कर लाई है.”

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – [email protected]

मोबाइल – 9424079675

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सूचनाएँ/Information ☆ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ‘पाथेय’ एवं ‘वर्तिका’ का संयुक्त आयोजन सम्पन्न ☆

सूचनाएँ/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ‘पाथेय’ एवं ‘वर्तिका’ महिला प्रकोष्ठ का संयुक्त आयोजन सम्पन्न ☆

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पाथेय संस्था एवं वर्तिका महिला प्रकोष्ठ के तत्वावधान में महिला काव्य गोष्ठी का आयोजन कला वीथिका में किया गया। काव्य गोष्ठी में 30 से अधिक महिला रचनाकारों ने नारी उत्थान से संदर्भित मनभावन कविताओं को प्रस्तुत कर समाज को जागरण का संदेश   यह आयोजन पाथेय संस्था द्वारा नगर के 8 युवा कलाकारों की चित्रकला प्रदर्शनी के समापन किया गया। इस अवसर  पर प्रदर्शनी के निर्देशक कलाकार प्रमोद कुशवाहा के साथ 8  युवा कलाकारों को  सम्मानित किया गया।

यह सम्मान वर्तिका एवं पाथेय से विजय नेमा अनुज, राजेश पाठक ‘प्रवीण’,  दीपक तिवारी, छाया त्रिवेदी, मीना भट्ट, निर्मला तिवारी, अर्चना मलैया, राजलक्ष्मी शिवहरे ने प्रदान किया। इस अवसर पर  रचनाकारों एवं अतिथियों के साथ विशिष्टजनों को भी  भव्य पेंटिंग प्रदान करके सम्मानित किया गया। लगभग 50  से अधिक पेंटिंग्स प्रदान की गईं।

ई-अभिव्यक्ति द्वारा  अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर  पाथेय एवं वर्तिका को इस आयोजन के लिए हार्दिक बधाई।

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 36 – आठवण ☆ श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

(श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजितजी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है  उनकी एक भावप्रवण  एवं संवेदनशील  कविता “आठवण ”। अक्सर जीवन के भागदौड़ में  कई बार हम किसी  कथन के पीछे छिपे एहसास को समझ नहीं पाते । किन्तु, यह कविता पढ़ कर आप निश्चित ही विचार करेंगे, ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है ।) 

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #36☆ 

☆ आठवण ☆ 

माझी माय मला नेहमी

म्हणते की..

तू ना तुझ्या बा सारखाच दिसतोस

तोंड नाक डोळे सगळ कस …

बा सारखंच..,

बोलणं सुध्दा

मला प्रश्न पडतो…

मी खरच बा सारखा दिसतो

का मायेला बा ची आठवण येते..,

© सुजित कदम, पुणे

7276282626

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हिन्दी साहित्य- कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #9 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

आचार्य सत्य नारायण गोयनका

(हम इस आलेख के लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी, योगाचार्य एवं प्रेरक वक्ता योग साधना / LifeSkills  इंदौर के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के महान कार्यों से अवगत करने में  सहायता की है। आप  आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के कार्यों के बारे में निम्न लिंक पर सविस्तार पढ़ सकते हैं।)

आलेख का  लिंक  ->>>>>>  ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी 

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #9 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(हम  प्रतिदिन आचार्य सत्य नारायण गोयनका  जी के एक दोहे को अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास करेंगे, ताकि आप उस दोहे के गूढ़ अर्थ को गंभीरता पूर्वक आत्मसात कर सकें। )

आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे बुद्ध वाणी को सरल, सुबोध भाषा में प्रस्तुत करते है. प्रत्येक दोहा एक अनमोल रत्न की भांति है जो धर्म के किसी गूढ़ तथ्य को प्रकाशित करता है. विपश्यना शिविर के दौरान, साधक इन दोहों को सुनते हैं. विश्वास है, हिंदी भाषा में धर्म की अनमोल वाणी केवल साधकों को ही नहीं, सभी पाठकों को समानरूप से रुचिकर एवं प्रेरणास्पद प्रतीत होगी. आप गोयनका जी के इन दोहों को आत्मसात कर सकते हैं :

चर्चा ही चर्चा करे, धारण करे न कोय । 

धर्म बेचारा क्या करे? धारे ही सुख होय ।। 

– आचार्य सत्यनारायण गोयनका

#विपश्यना

साभार प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

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Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यात्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – दशम अध्याय (41) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दशम अध्याय

(भगवान द्वारा अपनी विभूतियों और योगशक्ति का कथन)

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌।।41।।

जो विभूति मय प्रभामय औ” प्रभाव मय वस्तु

जान उसे मम अंश ही किम् बहुना इति अस्तु।।41।।

भावार्थ :  जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान।।41।।

 

Whatever being there is that is glorious, prosperous or powerful, that know thou to be a manifestation of a part of My splendour.।।41।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 37 – भीतर का बसन्त सुरभित हो………☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  अग्रज डॉ सुरेश  कुशवाहा जी  की  हमें जीवन के कटु सत्य से रूबरू कराती एक विचारणीय कविता  “भीतर का बसन्त सुरभित हो………। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 37 ☆

☆ भीतर का बसन्त सुरभित हो……… ☆  

 

स्वयं हुए पतझड़, बातें बसन्त की करते

ऐसा लगता है-

अंतिम पल में ज्यों, दीपक कुछ अधिक

चमकता है।

 

ऋतुएं तो आती-जाती है

क्रम से अपने

पर पागल मन देखा करता

झूठे सपने,

पहिन फरेबी विविध मुखौटे

खुद को ठगता है।

ऐसा लगता है…….

 

बचपन औ’ यौवन तो

एक बार ही आये

किन्तु बुढापा अंतिम क्षण तक

साथ निभाये,

साथ छोड़कर, मन अतीत में

व्यर्थ भटकता है।

ऐसा लगता है……….

 

स्वीकारें अपनी वय को

मन और प्राण से

क्यों भागें डरकर

हम अपने वर्तमान से

यौवन के भ्रम में जो मुंह का

थूक निगलता है

ऐसा लगता है……….

 

भीतर का बसन्त

सुरभित हो जब मुस्काये

सुख,-दुख में मन

समरसता के गीत सुनाए,

आचरणों में जहाँ शील,

सच औ’ शुचिता है।

तब ऐसा लगता है।।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 989326601

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – साहित्य में आइंस्टीन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – साहित्य में आइंस्टीन ☆

 

भारी भीड़ के बीच

कर्णहीन नीरव,

घोर नीरव के बीच

कोलाहल मचाती भीड़,

परिभाषाएँ सापेक्ष होती हैं,

क्या कहते हो आइंस्टीन..?

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

[email protected]

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 39 – त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार ……… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनके चौदह वर्ष की आयु से प्रारम्भ साहित्यिक यात्रा के दौरान उनके साहित्य  के   ‘वाङमय चौर्य’  के  कटु अनुभव पर आधारित एक विचारणीय आलेख “त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार ……….  सुश्री प्रभा जी  का यह आलेख इसलिए भी विचारणीय है, क्योंकि  हमारी समवयस्क पीढ़ी को साहित्यिक चोरी का पता काफी देर से चलता था जबकि सोशल मीडिया के इस जमाने में चोरी बड़ी आसानी से और जल्दी ही पकड़ ली जाती है। किन्तु, शब्दों और विचारों के हेर फेर के बाद  ‘वाङमय चौर्य’  के  अनुभव को आप क्या कहेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को अपने तरीके से जीता है।  जैसे वह जीता है , वैसा ही उसका अनुभव होता है।  इस अतिसुन्दर  एवं विचारणीय आलेख के लिए  वे बधाई की पात्र हैं। उनकी लेखनी को सादर नमन ।  

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 39 ☆

☆  त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार ……… ☆ 

वयाच्या तेरा चौदाव्या वर्षी कविता माझ्या आयुष्यात आली. शाळेत असताना हस्तलिखिताच्या निमित्ताने!

विसाव्या वर्षा नंतर कविता थांबेल असं मला वाटलं होतं, पण काही  वर्षे थांबल्या नंतर….कवितेच्या पुन्हा प्रेमात पडले, कवितेला व्यासपीठ मिळालं, अनेक ग्रुप मिळाले,  एका ग्रुप मधल्या बारा तेरा वर्षांनी मोठ्या असलेल्या कवयित्री बरोबर मैत्री झाली. आमची घरे जवळ असल्यामुळे  एकमेकींच्या घरी जाणं, कविसंमेलनात एकत्र सहभागी होणं, रिक्षा शेअर करणं यामुळे मैत्री वाढली, पण काही वर्षापासून असा शोध लागला की त्या कवयित्री कडे स्वतःची चांगली कविता नाही, ती सादर करत असलेल्या, दाद घेणा-या सर्व कविता मान्यवर कवींच्या चोरलेल्या कविता आहेत, हल्ली फेसबुक, व्हाटस् अॅप मुळे तिच्या चो-या उघडकीस आल्या, तिने त्या त्या कवींची माफीही मागितली पण निर्ढावलेपण अंगी मुरलेलं, वयाची पंचाहत्तरी उलटून गेली तरी व्यासपीठावर कविता सादर करण्याची इच्छा, दुस-यांच्या कविता वाचून दाद, मोठेपणा मिळवायची सवय लागलेली, कवयित्री म्हणून प्रतिमा पूर्ण डागाळलेली……पण मैत्रीच्या नात्याचं काय?

काही आयोजकांच्या मते आता तिच्या या वयात तिला वाळीत टाकणं म्हणजे तिला धक्का बसून ती कोलमडून जाईल, म्हणून वाङमय चौर्य हा गुन्हा माफ करायचा का ? थोड्या थोडक्या नव्हे वीस पंचवीस चोरलेल्या कवितांच्या आधारे सगळी कारकीर्द गाजवली! बाई उच्चशिक्षित, मराठीत एम.ए. असलेली, पण कवितेची चोर नव्हे तर अट्टल दरोडेखोर! तिला वृत्ताची जाण नाही पण अनेक वृत्तबद्ध कविता अनेक वर्षे सादर केल्या इतकंच नव्हे त्या दुस-यांच्या कविता स्वतःच्या संग्रहातही छापल्या. एका कवीने “पोलिसकेस करीन” म्हटल्यावर तिने  त्याला जाहीर माफी पत्र लिहून दिले ते फेसबुक वर प्रसिद्ध झाले!

केवढी ही शोकांतिका! असे मोह का होत असतील? तिच्या बरोबर केलेल्या अनेक मैफिली आठवल्या, तिचं खोटेपण, चोरटेपण आज लक्षात आलं!

कवयित्री म्हणून ती निश्चितच बाद झाली पण मैत्री चं काय?? त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार असलेली पण सतत काव्यक्षेत्रात दुस्वास करणारी, कुरघोडी करू पहाणारी ती……एक प्रश्नचिन्ह बनूनच राहिली आहे!

तिने मुक्तपणे माळली, दुस-याच्या बागेतली

सुंदर सुंदर फुले स्वतःच्या केसात…

आणि मिरवली

गंध स्वतःच्याच मालकीचा असल्याच्या तो-यात,

ती फुलं ही दुस-याची आणि गंधही परकाच असल्याचं समजलं सगळ्यांना

आणि बागेतल्या सा-याच फुलांनी केला  उठाव…..

तिची लूट थोपवण्यासाठी…

कवितेचे कित्येक ताटवे…   परतताहेत आता…

आपापल्या मालकांकडे  !

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- [email protected]

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