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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (33) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद) धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ जो मन, इंद्रिय, प्राण को धारण करें समान वही सात्विकी धृति की है पार्थ! सही पहचान ।।33।। भावार्थ :  हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।) से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं ( मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम 'उनकी क्रियाओं को धारण करना' है।) को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है॥33॥ The unwavering  firmness  by  which,  through  Yoga,  the  functions  of  the  mind,  the life-force and the senses are restrained-that firmness, O Arjuna, is Sattwic!   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (31) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद) यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥   जो न समझती धर्म की और कार्य की शुद्धि उसको ही जाता कहा, पार्थ ! राजसी बुद्धि।।31।। भावार्थ :  हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है॥31॥ That by which one incorrectly understands Dharma and Adharma, and also what ought to be done and what ought not to be done-that intellect, O Arjuna, is Rajasic!   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (30) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद) प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥   प्रवृत्ति-निवृत्ति, भय-अभय का, बॅंधा मोक्ष का ज्ञान सात्विक बुद्धि को कार्याकार्य का होता शुभ अनुमान ।।30।। भावार्थ :  हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए राजा जनक की भाँति बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।) और निवृत्ति मार्ग को (देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए श्री शुकदेवजी और सनकादिकों की भाँति संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है ॥30॥ That which knows the path of work and renunciation, what ought to be done and what ought not to be...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (29) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद)   बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥   तीन भेद धृति, बुद्धि के होते गुण अनुसार पृथक ओर संपूर्णतः कहता पार्थ ! मैं सार ।।29।।   भावार्थ :  हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन॥29॥ Hear thou the threefold division of the intellect and firmness according to the Gunas, as I declare them fully and distinctly, O Arjuna!   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (28) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद)   आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥   जो अकुशल, शठ, आलसी, संस्कार से हीन तामस कर्ता विषादी, मन का रहा मलीन ।।28।।   भावार्थ :  जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री (दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता। ) है वह तामस कहा जाता है॥28॥ Unsteady, dejected,    unbending,    cheating,    malicious,    vulgar,    lazy    and proscrastinating-such an agent is called Tamasic.   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (27) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद)   रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥ लोभी हिंस्र, फलेच्छु व भोगी मलिन विचार हर्ष-शोक के भाव से राजस नित लाचार ।।27।। भावार्थ :  जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है॥27॥ Passionate, desiring to obtain the rewards of actions, cruel, greedy, impure, moved by joy and sorrow, such an agent is said to be Rajasic.   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (26) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद)   मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥   धैर्य और उत्साह से, लिप्ति मान से मुक्त हानि-लाभ, दुख-हर्ष से सात्विक कर्म विमुक्त ।।26।।   भावार्थ :  जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष -शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है॥26॥ He who is free from attachment, non-egoistic, endowed with firmness and enthusiasm and unaffected by success or failure, is called Sattwic. प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (25) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद) अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्‌। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ बिना विचारे हानि या हिंसा का परिणाम उसे दिया जाता सदा ‘तामस कर्म‘ का नाम ।।25।। भावार्थ :  जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है॥25॥ That action which is undertaken from delusion, without regard to the consequences of loss, injury and (one’s own) ability-that is declared to be Tamasic.   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (24) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद) यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्‍कारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्‌॥ जो फल इच्छा सहित हो, कर्म अहं-सायास उसको कहते राजस, भले हो बिना प्रयास।।24।। भावार्थ :  परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है॥24॥ But that action which is done by one longing for the fulfilment of desires or gain, with egoism or with much effort-that is declared to be Rajasic.     प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (23) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18   (सन्यास   योग) (कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन) (तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद) नियतं सङ्‍गरहितमरागद्वेषतः कृतम। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥   राग द्वेष से रहित हो, लिप्ति बिना, कृत कर्म कहलाता है सात्विक, यही धर्म का मर्म ।।23।।   भावार्थ :  जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है॥23॥ An action which is ordained, which is free from attachment, which is done without love or hatred by one who is not desirous of any reward-that action is declared to be Sattwic.   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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