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आध्यत्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (30) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )   लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ।। 30 ।।   ज्वलित मुखों में भर इन्हें चाट रहे जो आप उग्र  ताप संतप्त जग में छाया परिताप ।। 30 ।।   भावार्थ :  आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।। 30 ।।   Thou lickest up, devouring all the worlds on every side with Thy flaming mouths. Thy fierce rays, filling the whole world with radiance, are burning, O Vishnu!।। 30 ।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in...
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आध्यत्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (29) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )   यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ।। 29 ।।   जैसे ज्वाला प्रति सहज खिंच जलते हैं पतंग त्यों तव मुख में प्रविश यह इनका मरण प्रसंग ।। 29 ।।   भावार्थ :  जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।। 29 ।।   As moths hurriedly rush into a blazing fire for (their own) destruction, so also these creatures hurriedly rush into Thy mouths for (their own) destruction.।। 29 ।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in...
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आध्यत्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (28) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )   यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ।।28 ।।   जैसे नदियां वेग से करतीं उदधि प्रवेश वैसे ही योद्धा ये सब , तव मुख अग्नि प्रवेश ।।28 ।।   भावार्थ :  जैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं॥28॥   Verily, just as many torrents of rivers flow towards the ocean, even so these heroes of the world of men enter thy flaming mouths   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in...
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आध्यत्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (26-27) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )   मी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ।।26।। वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्‍गै ।।27 ।। सभी पुत्र धृतराष्ट्र के , नृपति जो रत संग्राम भीष्म द्रोण सह कर्ण सम योद्धा कई अनाम ।। 26 ।। दिखते घुसते मुखों में जिनमें दाँत कराल कुछ पिस गये , कुछ अधचबे , बड़ा बुरा है हाल ।।27 ।।   भावार्थ :  वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिख रहे हैं।। 26-27 ।।   All the sons of Dhritarashtra with the hosts of...
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आध्यत्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (25) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना ) दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्टैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ।। 25 ।। प्रलय काल की अग्नि सम दाढें तव विकराल देख तुम्हारे रूप  को है मेरा यह हाल न ही मेरे मन शांति है , न दिशाओं का ज्ञान हो प्रसन्न मुझ पर दया , करिये कृपा निधान ।। 25 ।। भावार्थ :  दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।। 25 ।।   Having seen Thy mouths, fearful with teeth, blazing like the fires of cosmic dissolution, I know not the four quarters, nor do I find peace. Have mercy, O Lord of the gods! O abode of the universe!।। 25 ।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर,...
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आध्यत्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (24) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना ) नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्‌ । दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ।। 24 ।। हे नभ को छूते हुये प्रभु ! व्यापक ज्यों काल जलते फैले मुख सहित दीपित नेत्र विशाल विविध रंग औ" रूप  लख मन भारी भयभीत धैर्य - शांति सब खो गई जीवन के विपरीत ।। 24 ।।   भावार्थ :  क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ।। 24 ।।   On seeing thee (the Cosmic Form) touching the sky, shining in many colours, with mouths wide open, with large, fiery eyes, I am terrified at heart and find neither courage nor peace, O Vishnu!।। 24 ।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in ...
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आध्यात्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (23) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )   रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरूपादम्‌ । बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्‌ ॥   मुख अनेक , कई नेत्रमय बाहु औ जानु विशाल पैर औ"  उदर अनेक हैं, दाढें हैं विकराल भयकारी यह रूप लख व्याकुल हैं सबलोग मैं भी हूँ भयभीत प्रभु ! देख अलौकिक योग ।।23 ।।   भावार्थ :  हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ॥23॥   Having beheld Thy immeasurable form with many mouths and eyes, O mighty-armed, with many arms, thighs and feet, with many stomachs, and fearful with many teeth, the worlds are  terrified and so am I!   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in ...
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आध्यात्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (22) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )   रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गंधर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ।।22।।   रूद्र , वसु , आदित्य सह सिद्धों का समुदाय विश्वदेव , अश्विनी दो , मरूत औ" पितर निकाय। यक्ष , असुर , गंधर्व सब मिल कर के एक साथ विस्मित हो सब तक रहे, ओर तुम्हारी नाथ ।।22।।   भावार्थ :  जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं- वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं।।22।।   The Rudras, Adityas, Vasus, Sadhyas, Visvedevas, the two Asvins, Maruts, the manes and hosts of celestial singers, Yakshas, demons and the perfected ones, are all looking at Thee in great astonishment.।।22।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in ...
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आध्यात्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (21) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )   अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति। स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ देवताओं  के संघ जो तुममें निरत प्रवेश हाथ जोड़कर कर रहे विनती सतत विशेष स्वस्ति , स्वस्ति यों कह रहे ऋषि व सिद्ध के संघ करते  है प्रार्थनायें कई ,सब मिल के एक संग ।। 21 ।।   भावार्थ :  वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय 'कल्याण हो' ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं।। 21 ।।   Verily, into Thee enter these hosts of gods; some extol Thee in fear with joined palms: “May it be well.” Saying thus, bands of great sages and perfected ones praise Thee with complete hymns.।। 21 ।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in ...
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आध्यात्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (20) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ एकादश अध्याय (अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना ) द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ।। 20।। पृथ्वी औ" आकाश बिच , अन्तर अमित अपार सभी दिशाओं व्याप्त है प्रभु का ही अधिकार देख तुम्हें इस रूप  में आकुल है संसार थकित व्यथित त्रैलोक है देख विचित्र विकार  ।। 20।।   भावार्थ :  हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।। 20।।   The space between the earth and the heaven and all the quarters are filled by Thee alone; having seen this, Thy wonderful and terrible form, the three worlds are trembling with fear, O  great-souled Being!।। 20।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in ...
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