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हिन्दी साहित्य – परिचर्चा ☆ “साहित्य या शिल्प या अन्य कला, सब संवेदना और कल्पना के आयाम हैं” – सुश्री शंपा शाह ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ परिचर्चा ☆ “साहित्य या शिल्प या अन्य कला, सब संवेदना और कल्पना के आयाम हैं” – सुश्री शंपा शाह ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆ 

( इस परिचर्चा के परिपेक्ष्य में झीलों के शहर भोपाल में भारतीय स्टेट बैंक के सेवाकाल के 21 वर्षों का प्रवास सहज ही चलचित्र की तरह गुजर गया। साथ ही  भारत भवन के अभिन्न अंग जैसे रूपांकर, रंगमंडल, वागर्थ और अनहद और साथ ही राष्ट्रीय इंदिरा गाँधी मानव संग्रहालय भी आँखों के सामने से चलचित्र की तरह  गुजर गए । श्री प्रवीण महुवाले, श्री असीम दुबे और कई प्रिय रंकर्मी मित्रों की यादें भी ताजा हो आई। भारत भवन ने संगीत, रंगकर्म, साहित्य एवं कला के नए आयाम रचे हैं इसी कड़ी में सुश्री शंपा शाह जी की कलाकृतियां हैं। श्री कमलेश भारतीय जी का आभार जो हमें समय समय पर विभिन्न क्षेत्र की महत्वपूर्ण हस्तियों से ई -अभिव्यक्ति के पाठकों  के लिए परिचर्चा साझा करते रहते हैं। )

लेखक माता पिता की बेटी बनी शिल्पकार : शंपा शाह

यह बात मेरे लिए भी हैरान कर देने वाली है कि एक लेखक माता पिता की बेटी हो कर भी मैं शिल्पकार ही क्यों बनी । यह कहना है शंपा शाह का जो प्रसिद्ध लेखक रमेश चंद्र शाह व ज्योत्स्ना मिलन की बेटी हैं । मां ज्योत्स्ना मिलन तो सन् 2013 को विदा हो गयीं पर पिता रमेश चंद्र शाह आपके पास ही भोपाल में रहते हैं । इनके पति ईश्वर सिंह दर्शनशास्त्र के ज्ञाता हैं और फिलाॅसफी ऑफ एजुकेशन से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं । इनकी बहन राजुला एक फिल्मकार है ।

मूल रूप से पापा रमेश चंद्र शाह अल्मोड़ा के निवासी हैं और मां ज्योत्स्ना मालवा, मध्य प्रदेश से, लेकिन उनके माता पिता मुंबई में बस गए थे। शंपा का जन्म मुम्बई में हुआ। लेकिन अधिकांश पढ़ाई लिखाई भोपाल में हुई । एम एस सी फारेस्ट ईकोलाॅजी और सोशिओलाॅजी में एम ए तथा । म्यूजिओलाॅजी में डिप्लोमा किया ।

माता पिता लेखक हैं, इसका आभास कैसे हुआ?

-बचपन से ही । शाम की सैर पर जाते तो वे दोनों एक दूसरे को कविताएं सुनाते। कॉलेज से लौट कर पिता अपनी मेज कुर्सी पर डटे दिखते और घर के काम निपटा कर मां अपनी मेज पर ।

थिएटर का शौक कैसे लगा?

-काॅलेज में थी जब विभा मिश्रा ने अपने नाटक में ले लिया । चार साल खूब थियेटर किया । अनेक नाटक किये । दिन में सेरेमिक्स का ( चीनी मिट्टी) काम सीखते तो शाम को थियेटर । यह मेरी ज़िंदगी थी ।

फिर शिल्पकार कैसे बन गयीं ?

-भारत भवन से । वहीं न केवल थियेटर बल्कि संगीत, नृत्य, साहित्य, फिल्म और शिल्प से भी जुड़ी। वहां खूब प्रदर्शनियां लगतीं और अन्य कार्यक्रम होते । वैसे साहित्य या शिल्प या अन्य कला में मुझे कोई भेद नहीं दिखता, सब संवेदना और कल्पना के आयाम हैं ।

फिर भी प्रेरणा किससे ?

-भारत भवन में जो स्टूडियो था उसके प्रभारी व प्रसिद्ध शिल्पकार पांडुरंग दरोज मेरे गुरु और प्रेरणा स्त्रोत हैं ।

कैसे शिल्प बनाती हैं?

-सेरेमिक्स यानी चीनी मिट्टी के । इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में इक्कीस साल तक काम किया । यहां सेरेमिक्स अनुभाग की प्रमुख रही और इसके अंतर्गत पारंपरिक शिल्पों, जनजातीय मिथकों आदि पर केंद्रित प्रदर्शनियां क्यूरेट कीं। इसके साथ साथ एक कलाकार के बतौर देश के सभी प्रमुख नगरों तथा अन्य देशों में अपने शिल्प की प्रदर्शनियां लगाई।

आपको कौन से पुरस्कार मिले?

-सिरेमिक में पांच अखिल भारतीय पुरस्कार। जूनियर नेशनल फैलोशिप ।

लेखन नहीं किया ?

– पारंपरिक और जनजातीय कला पर, मिथक और संस्कृति पर बहुत से आलेख लिखे हैं । आदिवासी कलाकारों और साहित्यकारों पर भी प्रचुर लेखन किया है ।

बच्चे कितने?

-एक बेटा निरंजन जो बारहवीं में पढ़ता है ।

लक्ष्य ?

-कल से और बेहतर काम कर सकूं , कल से और बेहतर मन हो , कल से और बेहतर देख सकूं दुनिया को । कल से और बेहतर ज़िंदगी जिऊं।

हमारी शुभकामनाएं शंपा शाह को । आप सुश्री शंपा शाह जी को इस नम्बर पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं : 9424440575

 

© श्री कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – परिचर्चा ☆ ☆ आध्यात्मिक अभियान – ‘आपदां अपहर्तारं’ के सफल एक वर्ष पूर्ण ☆ प्रणेता – श्री संजय भारद्वाज एवं श्रीमती सुधा भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज 

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(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ हिन्दी साहित्य – परिचर्चा ☆ आध्यात्मिक अभियान – ‘आपदां अपहर्तारं’ के सफल एक वर्ष पूर्ण ☆ प्रणेता – श्री संजय भारद्वाज एवं श्रीमती सुधा भारद्वाज ☆

(इस आपदा के समय सभी लोग किसी न किसी रूप में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मानवता में अपना योगदान दे रहे हैं। सबकी अपनी-अपनी सीमायें हैं। कोई व्यक्तिगत रूप से, कोई चिकित्सकीय सहायता के रूप से तो कोई आर्थिक सहायता के रूप से अपना योगदान दे रहे हैं।  

ऐसे में कुछ लोग सम्पूर्ण मानवता के लिए अपना अभूतपूर्व आध्यात्मिक योगदान दे रहे हैं। उनका मानना है कि हमारी वैदिक परंपरा के अनुसार यदि हम सामूहिक रूप से प्रार्थना, श्लोकों का उच्चारण करें तो  समस्त भूमण्डल में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचरण होता है और “वसुधैव कुटुम्बकम” की अवधारणाना के अंतर्गत समस्त मानवता को इसका सकारात्मक लाभ अवश्य मिलता है। इस आध्यात्मिक अभियान के प्रणेता श्री संजय भारद्वाज जी के हम हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमारी जिज्ञासा स्वरुप ह्रदय में उत्पन्न कुछ प्रश्नों का उत्तर एक साक्षात्कार स्वरुप दिया है। इस सकारात्मकता का अनुभव मैंने स्वयं अपने “होम आइसोलेशन” के समय प्राप्त किया है। 

हमें पूर्ण विश्वास है कि वर्तमान परिस्थितयों में आपदा के इन क्षणों (लॉक -डाउन,  क्वारंटाइन और आइसोलेशन) में अध्यात्म द्वारा स्वयं एवं अपने आसपास सकारात्मक ऊर्जा के संचरण के लिए आपकी भी अध्यात्म सम्बन्धी जिज्ञासाओं की पूर्ति आध्यात्मिक अभियान “आपदां अपहर्तारं” के इस साक्षात्कार के माध्यम से पूर्ण हो सकेगी।

विदित हो कि इस आध्यात्मिक अभियान “आपदां अपहर्तारं” एक आज एक वर्ष पूर्ण हो जायेंगे और आपके ही एक और अभियान “हिंदी आंदोलन” ने इस वर्ष अपने सफल 26 वर्ष पूर्ण किये हैं। इस निःस्वार्थ वैश्विक एवं आध्यात्मिक मानव सेवा के लिए इन दोनों अभियानों के प्रणेताओं श्री संजय भारद्वाज जी  एवं श्रीमती सुधा भारद्वाज जी को  ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनायें। )

प्रश्न – आपके द्वारा स्थापित हिन्दी आंदोलन परिवार को 26 सफल वर्ष हो चुके। गत वर्ष से आपने यह आध्यात्मिक अभियान आरंभ किया।   कृपया दोनों की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालें।

उत्तर – हिन्दी आंदोलन परिवार मूलरूप से साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित संस्था है। भाषा सभ्यता की वीणा और संस्कृति की वाणी है। विभिन्न वर्गों के अवलोकन और अध्ययन से अनुभव हुआ कि विदेशी भाषा के प्रयोग ने हम भारतीयों में दंभ और खोखलापन भर दिया है। हम निरंतर अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। समुदाय की जड़ों को हरा रखने रखने में भाषा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कवि कुसुमाग्रज बाढ़ की विभीषिका में भी नदी को गंगा नहीं अपितु ‘गंगा माई’ कहकर संबोधित करते हैं। संस्कृति का यह धरातल आपकी अपनी भाषा देती है। फलत: भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में कार्य करने का मानस बना। सबके सहयोग से गत 26 वर्ष की अखंड यात्रा में हिंदी आंदोलन परिवार, इस क्षेत्र में अपना उल्लेखनीय स्थान बना चुका है।

जहाँ तक प्रश्न आध्यात्मिक अभियान का है, मेरा मानना है कि अध्यात्म मनुष्य में इनबिल्ट है। अध्यात्म का अर्थ है अपने चारों। मनुष्य जैसे-जैसे स्वयं का समग्र अध्ययन करने लगता है, उसके भीतर अपने अस्तित्व के प्रति जिज्ञासा बढ़ने लगती है।अपने केंद्र तक पहुँचने की यह जिज्ञासा सौम्य अथवा तीव्र रूप में प्रत्येक  मनुष्य में होती है पर अधिकांश को लगता है कि अध्यात्म तो वानप्रस्थ आश्रम से आरंभ करेंगे। कुछ तो अध्यात्म के लिए  संन्यास आश्रम की प्रतीक्षा में होते हैं। विशेष बात यह कि इनमें से हरेक जानता है कि जीवन क्षणिक है। इसका अर्थ है कि हर क्षण में पूरा जीवन है। ऐसे में अध्यात्म के लिए जीवन के किसी पड़ाव की प्रतीक्षा करना कुछ ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि अभी तो श्वास लेने का समय नहीं है, पचास वर्ष के बाद  लेना आरंभ करेंगे। होना तो यह चाहिए कि थोड़ी समझ आने के साथ ही अध्यात्म से जुड़ना हो जाना चाहिए।

गतवर्ष पहली बार महामारी ने मनुष्य की भौतिक रफ़्तार पर अंकुश लगा दिया। भय और लॉकडाउन ने लोगों को घर में कैद कर दिया था। निराशा-सी छा रही थी। मानस में लगातार चल रहा था कि इस महामारी का सामना करने के लिए मनोबल की आवश्यकता है। मनोबल मिलता है आस्था से। आस्था का स्रोत है अध्यात्म। फलत: हमने कोविड के विरुद्ध सारे दिशा-निर्देश पालने के साथ-साथ अध्यात्म को अपनाया। इसी पृष्ठभूमि में ‘आपदां अपहर्तारं’ आध्यात्मिक समूह और अभियान का श्रीगणेश हुआ। इस समूह में साधक अपनी साधना का पचास प्रतिशत कोविड के समूल नाश के लिए अर्पित करते हैं।

प्रश्न – आपकी शैक्षिक पृष्ठभूमि केमिस्ट्री और फार्मा क्षेत्र की है। फिर अध्यात्म का पथ कैसे चुना? 

उ- विज्ञान जीवन को देखना सिखाता है।  कहता है, जो दिख रहा है वही घट रहा है। अध्यात्म स्थूल विज्ञान को सूक्ष्म  ज्ञान के मार्ग पर ले जाता है। कहता है, जो घटता है वही दिखता है। देखने को दृष्टि से संपन्न करता है अध्मात्म। फार्मेसी के फॉर्मूलेशन हों या केमिस्ट्री के इक्वेशन, संग से ही संघ बनता है। ज्ञान-विज्ञान का संघ, जिज्ञासाओं के शमन के पथ पर ला खड़ा करता है।

प्रश्न – समूह का नाम आपदां अपहर्तारं क्यों रखा?

उ.- श्रीरामरक्षास्तोत्रम् में मेरा अटूट विश्वास है। मेरे पिता जी इसके पाठ किया करते थे। बुधकौशिक ऋषि द्वारा अनुष्टुप छंद में रचित यह स्तोत्र सकारात्मक ऊर्जा का साकार शब्दब्रह्म है। इसकी सकारात्मक ऊर्जा आपने स्वयं भी अनुभव की है। गत वर्ष अप्रैल- मई का समय भारत में कोविड-19 का शुरुआती समय था। विश्व पहली बार एक अनजान महामारी से जूझ रहा था। श्रीरामरक्षास्तोत्रम् का 35वाँ श्लोक है,

आपदां अपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्, लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो-भूयो नमाम्यहम्।

हमें आपदा के विरुद्ध लड़ना था, अत: नामकरण आपदां अपहर्तारं किया।

श्रीमती सुधा भारद्वाज 

प्रश्न–दोनों अभियानों में आप दंपति की  सहभागिता अभूतपूर्व एवं अनुकरणीय है। अपने कार्य, दोनों अभियान एवं दैनिक जीवन, ये सब में आप लोग कैसे मैनेज कैसे कर पाते हैं?

उ.- हम सारी आपाधापी के बीच आजीवन साँस भी तो ले रहे होते हैं। क्या कभी विचार होता है कि साँस लेना कैसे मैनेज कर लेते हैं। विनम्रता से मेरा मानना है कि जो भीतर प्रकृतिगत है, सामान्यत: उसे मैनेज नहीं करना पड़ता।  जीवन क्षण-क्षण बीत रहा है। उसका बीतना हम रोक नहीं सकते लेकिन जीवन का रीतना अवश्य रोका जा सकता है। जीवन के रिक्त में अध्यात्म का रिक्थ उँड़ेलने का प्रयास करें तो सामंजस्य स्वयंमेव, प्रकृतिगत हो जाता है।

प्रश्न – साहित्य एवं अध्यात्म दोनों अलग-अलग विषय हैं। आपके साहित्य में कहीं न कहीं अध्यात्म की छाप दिखाई पड़ती है किन्तु दोनों के मध्य एक अदृश्य रेखा भी दिखाई देती है। आप दोनों के मध्य संतुलन कैसे बना पाते हैं?

उ.- ‘अक्षरं ब्रह्म परमं, स्वभावों अध्यात्म उच्यते’, योगेश्वर का यह कथन साहित्य और अध्यात्म का अंतर्सम्बंध अभिव्यक्त करने के लिए ‘भगवान उवाच’ है। अध्यात्म अपने अध्ययन के लिए प्रवृत्त करता है। आत्माध्ययन श्रेष्ठ मनुष्य बनने के पथ पर ले जाता है। चिंतन करें कि सामाजिक के परिवेश में  मनुष्य की भूमिका क्या है? मनुष्य समाज की इकाई है। साहित्य अर्थात समाज का हित। स्वाभाविक है कि स्वाध्यायी, श्रेष्ठ समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। उसका साहित्य अमृत बाँटेगा, हलाहल नहीं। अत: मेरा मानना है कि साहित्य और अध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अध्यात्म  का एक अधिवास है साहित्य जबकि साहित्य की नाभि में अध्यात्म का वास है।

प्रश्न – अध्यात्म में व्यक्तिगत साधना का चलन है।आपने सामूहिक साधना का मार्ग चुना।

उ- व्यक्तिगत और समष्टिगत में अंतर कहाँ है?   सनातन दर्शन मनुष्य को बाँधता नहीं अपितु मुक्त करता है। हमारी मीमांसा रोकती नहीं, विस्तार का मार्ग प्रशस्त करती है। हिंदूत्व  सामासिकता और सामूहिकता का दर्शन है। यह दर्शन आदेश नहीं करता, उपदेश देता है। स्पष्ट उपदेश है,-

 ‘आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् । सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति ।।’

जिस प्रकार आकाश से गिरा जल विविध नदियों के माध्यम से अंतत: सागर से जा मिलता है उसी प्रकार सभी देवताओं के लिए किया हुआ नमन एक ही परमेश्वर को प्राप्त होता है । तात्पर्य है कि किस धारा के साथ प्रवाहित होना है, यह व्यक्ति स्वयं निर्धारित करे।

गोस्वामी जी की धारा कुछ ऐसी है,-

‘जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि। बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥

जब सबमें श्रीराम ही बसते  हैं तो व्यक्तिगत  और समष्टिगत का भेद ही मिट जाता है।

प्रश्न – आपने ‘आत्म-परिष्कार’ साधना का सूत्रपात किया। इस अभिनव संकल्पना की पृष्ठभूमि क्या रही।

उत्तर – ‘आत्म-परिष्कार’ लीक से हटकर एक साधना है।इसमें विद्यार्थी भी आप, शिक्षक भी आप, परीक्षक भी आप और निर्णायक भी आप।  मनुष्य स्वयं को सबसे अधिक जानता है। वह अपनी दुर्बलताएँ जानता है। आत्म-परिष्कार श्रेष्ठ मनुष्य के निर्माण की साधना है। साधक अपनी दुर्बलताओं पर स्वयं विचार करता है। अपने आपसे अपने तर्क स्वयं साझा करता है। अपने शक्तिकेंद्र स्वयं जागृत कर दुर्बलताएँ कम करने का प्रयत्न करता है। इस तरह आत्म-मूल्याकंन से लेकर आत्म-परिष्कार की सारी प्रक्रिया उसीके हाथ में होती है। किसी अन्य से उसे कुछ भी साझा नहीं करना होता। आत्म-प्रदर्शन से आत्म-दर्शन की ओर ले जाता है, आत्म-परिष्कार।

प्रश्न – श्लोकपाठ मन ही मन करें या  सस्वर होना चाहिए?

उत्तर – निर्णय आपका है। मेरा मत है कि सस्वर पाठ, सामूहिकता की पुष्टि करता है व विस्तार भी। अनेक घरों में बच्चों या युवाओं को दैनिक आरती, हनुमान चालीसा, अन्य पाठ इसलिए कंठस्थ हैं क्योंकि उनके कानों ने वर्षों तक अपने  बुजुर्गों को इन्हें गाते या पाठ करते सुना है। सस्वर पाठ का एक लाभ यह भी है कि स्वर लहरियाँ घर के कोने-कोने में पहुँचती हैं। यह सकारात्मकता अथवा पॉजिटिव एनर्जी का विस्तार है। सस्वर पाठ, सामान्य साधक को साधना की अवधि में मन भटकने से  रोकने में भी सहायता करता है।

प्रश्न – किसी मंत्र के पाठ के लिए साधारणत: 108 मनकों की माला का उपयोग करते हैं। माला में 108 अंक का क्या महत्व है?

उत्तर – इसकी अलग-अलग व्याख्या आपको मिलेगी। 12 राशियों और 9 ग्रहों के गुणनफल के संदर्भ में 108 का महत्व है। इस गुणनफल में जीवन की सारी दशा, दिशा एवं समस्त आयाम छुपे हैं। इस संदर्भ में अन्य अनेक सिद्धांत भी मान्य हैं।

प्रश्न – रंगकर्मी के रूप में आपकी विशिष्ट पहचान है। रंगमंच और साहित्य व अध्यात्म एक-दूसरे को कैसे और कितना प्रभावित करते हैं।

उत्तर – जीवन ही रंगमंच है। अपितु वृहद और अधिक चुनौतियाँ व तदनुरूप अधिक अवसर प्रदान करनेवाला रंगमंच। मनुष्य एक ही समय, अनेक भूमिकाओं का निर्वहन कर रहा होता है।  मेरे अल्प ज्ञान में सारी भूमिकाएँ पूरक हैं। जगत अनन्योश्रित है। अत: एक-दूसरे से प्रभावित होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। अध्यात्म हो, साहित्य या रंगकर्म, मूलाधार तो समान है पर सबका स्थूल स्वरूप या ट्रीटमेंट भिन्न है।

प्रश्न – 19 मई 2021 को आपदां अपहर्तारं समूह को एक 1 वर्ष पूरा हो रहा है। गत एक वर्ष में समूह की यात्रा को आप किस तरह से देखते हैं।

उत्तर – वॉट्सएप समूह होते हुए भी आपदां अपहर्तारं की कार्यप्रणाली भी ईश्वर की अनुकम्पा से अभिनव ही है। आप इससे जुड़े हैं, अत: इसकी कार्यप्रणाली से भली-भाँति परिचित हैं। विभिन्न साधनाएँ ऑनलाइन हो सकती हैं, श्रीरामचरितमानस का पारायण ऑनलाइन हो सकता है, सत्संग एवं प्रबोधन ऑनलाइन हो सकता है, घर पर रहकर आप चक्रीय साधना की सामूहिकता अनुभव कर सकते हैं, यह सब सचमुच कल्पनातीत था पर कर्ता करवाता रहा, हम सब निमित्त होते गए।

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् के पाठ से प्रथम साधना आरंभ हुई थी। प्रथम साधना से ही देश भर से जुड़े साधकों ने धन्य कर दिया। विनम्रता से सूचित करना चाहता हूँ कि साधकों ने इन 365 दिनों में लगभग चार करोड़ बार नाम सुमिरन किया। विशेष बात यह कि साधना का कम से कम पचास प्रतिशत ( कुछ साधनाओं का शत प्रतिशत) कोविड की आपदा के नाश के लिए समर्पित किया गया। एक पाठ/माला से लेकर एक दिन में ग्यारह सौ से अधिक मालाजप करने वाले साधक इस परिवार में मनके की तरह सह-अस्तित्व लिए चल रहे हैं। राघव साधना हो या माधव साधना, श्रावण हो या पुरुषोत्तम मास या मार्गशीष मास साधना, श्रीगणेश साधना हो या गायत्री साधना, अथर्वशीर्ष का पाठ हो रूद्राष्टकम्, माँ शारदा साधना हो या श्रीहरि साधना, साधकों ने इस समूह को अखंड, अविरल भागीरथी बना दिया। श्रीरामचरितमानस का पारायण भी अद्भुत रहा।

हमारे आध्यात्मिक, धार्मिक ग्रंथ अनन्य साहित्यिक संपदा भी हैं। इनका पारायण आध्यात्मिक के साथ साहित्यिक मूल्यों के अध्ययन का अवसर भी प्रदान करता है।

ईश्वर की असीम अनुकम्पा से आपदां अपहर्तारं समूह ने साधकों के जीवन में सकारात्मकता का अपूर्व बल दिया है। साधकों की आशु प्रतिक्रियाओं में आप इसकी प्रतिध्वनि सुन सकते हैं। मैं नतमस्तक भाव से इसे उपलब्धि के रूप में ग्रहण करता हूँ।

प्रश्न – समूह एवं आध्यात्मिक अभियान को लेकर भविष्य की योजनाएँ क्या हैं?

उत्तर – जहाँ तक समूह का प्रश्न है, इसके कार्य का निरंतर विस्तार हुआ है। विगत वर्ष भर हम पारिवारिक स्तर पर इसका प्रबंधन देखते रहे हैं। अब जिस तरह का विस्तार है, उसे देखते हुए कुछ प्रोफेशनल हाथ, साथ लेना आवश्यक हो चला है। साधकों से विचार-विमर्श कर इस पर निर्णय लेंगे।

वृहद अभियान के अंतर्गत आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के शमन के उद्देश्य से एक अनुसंधान केंद्र आरम्भ करने का स्वप्न है। इसके पहले कदम के रूप में हम कम से कम दाम या नाममात्र शुल्क पर एक से दो एकड़ ज़मीन खरीद सकने के प्रयास में हैं। मानस है कि पुणे से 30 से 35 किलोमीटर की परिधि में ऐसा स्थान हो जहाँ परिवहन के सामान्य साधन पहुँचते हों। अस्थायी विकल्प के रूप में शहर या शहर से बाहर कोई स्थान लीज़ पर ले सकने की संभावना पर भी काम चल रहा है ताकि ध्यान, सामूहिक साधना और प्रबोधन-सत्संग हो सके।

जीवन का उद्देश्य, जन्म से पहले और मृत्यु के बाद अस्तित्व, ईश्वर की साकार या निराकार अवधारणा जैसे अनेक विषयों पर इस केंद्र में मंथन करना चाहते हैं।

इच्छा है कि वेद, वेदांग, उपनिषद, पुराण, विभिन्न सूत्र-संहिता, अलग-अलग धार्मिक-आध्यात्मिक पुस्तकों का एक वृहद पुस्तकालय यहाँ हो।

प्रयत्न कर रहे हैं, शेष हरि इच्छा!

प्रश्न – अपने व्यक्तित्व में साहित्य और अध्यात्म में किसका पलड़ा भारी पाते हैं?

उत्तर – लेखन और अध्यात्म मेरा समन्वित अस्तित्व हैं। मेरी वृत्ति सत्यार्थी है। साहित्य सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य के साथ किसी विशेषण का प्रयोग उचित नहीं, फिर भी कहना चाहूँगा कि अध्यात्म परम सत्य तक ले जाता है। मैं आजीवन सत्यार्थी बना रहना चाहता हूँ।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 84☆ “मैं मार्फत लेखन लिखने के बिल्कुल पक्ष में नहीं हूँ” – श्री रमेश सैनी ☆ साक्षात्कार – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है । आज प्रस्तुत है श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी द्वारा सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार एवं साहित्यकार श्री रमेश  सैनी जी का साक्षात्कार। ) 

श्री रमेश सैनी

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 84

☆ साक्षात्कार – “मैं मार्फत लेखन लिखने के बिल्कुल पक्ष में नहीं हूँ” – श्री रमेश सैनी  ☆

जय प्रकाश पाण्डेय – जब दिन प्रतिदिन व्यंग्यकारों की फौज में सैनिकों की संख्या बढ़ती जा रही है लगभग हर पत्र पत्रिकाओं में, सोशल मीडिया में व्यंग्य का बोलबाला है तब क्या आप मानते हैं कि व्यंग्यकार साहित्य के पंडितों के साथ यज्ञ में शामिल हो सकता है?

रमेश सैनी – वर्तमान समय में साहित्य का स्पेस बढ़ गया हैं लगभग, सभी पत्रिकाओं में व्यंग्य के लिए सुरक्षित स्थान है. इस कारण व्यंग्यकारों के लिए अवसर बढ़ गए हैं. जबकि काफी समय पहले कई पत्रिकाओं ने कहानी छापना बंद कर दियाथा. पर उस वक्त किसी कहानीकार और पाठक नोटिस नहीं लिया था. व्यंग्य में यह स्थिति अभी नहीं आई.आज समाज, राजनीति, मानवीय प्रवृत्तियों की विसंगतियों में काफी विस्तार हुआ है. जिसे पढ़ना देखना लेखक के लिए आसान  है. इस कारण बहुत से लेखकों ने कहानी और कविता का साथ छोड़ इसमें हाथ साफ करना शुरू कर दिया है. पर वे व्यंग्य की परम्परा से सामजंस्य नहीं बैठा पाए है  और कुछ भी, मानवीय सरोकार विषयों से इतर गैरजरूरी विषयों पर सपाट बयानी कर रहे हैं. यह भी सीनाजोरी से फतवा भी कर रहे हैं.. देखो मेरा व्यंग्य. अब तो सम्पादक नाम की सत्ता भी उनके सामने नहीं है. मोबाइल, लेपटॉप पर लिखो और सीधे फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम पर डाल दो. मित्रों के लाइक, वाह, बधाई की भरमार से उन्हें महान लेखक बनते देर नहीं लगती. ऐसा नहीं, आपने ध्यान दिया हो, ग्रुप फोटो में कुछ लोग अपनी मुण्डी घुसेड फोटो के फ्रेम आना चाहते हैं. ऐसा ही कुछ लोग अपनी मुण्डी घुसेड़ कर व्यंग्य के फ्रेम में आना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि सब कुछ गलत है, यहाँ भी बहुत कुछ अच्छा भी हो रहा है. पाण्डेय जी आपसे अनुरोध है कि उन्हें सैनिक न कहें. सैनिक का जीवन सदा अनुशासन में बंधा रहता है. और व्यंग्य की अवधारणा को तोड़कर अनुशासन के विपरीत आचरण करते हैं.

जय प्रकाश पाण्डेय –   सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के इस दौर में कुछ व्यंग्यकार आत्ममुग्ध एवं बेखबर होकर व्यंग्य लेखन में अराजकता का वातावरण बनाने की तरफ अग्रसर हैं, इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

रमेश सैनी- पाण्डेय जी जैसा मैंने पूर्व में कहा कि सोशल मीडिया के ये लोग व्यंग्यकार बन गए, पर व्यंग्य की समझ विकसित नहीं कर पाए और आत्ममुग्धता में वे कुछ भी, कैसा भी लिख रहे हैं. उन्हें यह भी नहीं मालुम हैं कि वे किस पर व्यंग्य लिख रहे हैं. शोषित पर कि शोषक पर. उनकी रचनाओं से मानवीय सरोकार, मानवीय सामाजिक प्रवृत्तियां, और उनकी समाज के प्रति  प्रतिबद्बता और जिम्मेदारी दूर हो गई हैं. इस कारण व्यंग्य में अराजकता का वातावरण हो गया है. आज बहुत गैरजिम्मेदाराना ढंग से लिखा जा रहा है.

जय प्रकाश पाण्डेय- इसे कैसे दूर किया जा सकता है?

रमेश सैनी – आज आधुनिक तकनीक ने अपनी नई सत्ता स्थापित कर ली. अतः अब आपके हाथ में कुछ नहीं है. बस एक आशा की किरण है, वह है, पाठक की सत्ता. वह अपनी बेबाक, बिना लागलपेट के अपनी प्रतिक्रिया और टिप्पणियों से लेखक को सुधरने/बदलने का अवसर दे सकता है.

जय प्रकाश पाण्डेय – क्या सफल व्यंग्यकार के अंदर परकाया प्रवेश करने की गहरी पकड़ होनी जरूरी है, परकाया प्रवेश से लिखी रचना में वैसी मारक शक्ति और पैनापन की कितनी संभावना रहती है?

रमेश सैनी – व्यंग्य में परकाया प्रवेश प्रचलित शब्द है. व्यंग्य में परकाया प्रवेश सभी विषयों का पठन, अध्ययन, अनुभव ,सामाजिक, मानवीय प्रवृत्तियों की समझ विकसित होने पर ही होता है. यह एक साधना है. इसे साधने के लिए श्रम करना पड़ता है. पाण्डेय जी, परकाया प्रवेश एक तांत्रिक साधना का शब्द है. इसे सिद्ध करने के लिए कठोर नियम, अनुशासन के साथ कठोर श्रम, तप से साधना करने पड़ती है. इसके बारे यह जनश्रुति है. अगर साधक ने थोड़ी भी गल्ती की. तब इसका उल्टा प्रभाव साधक पर हो जाता है और जान के लाले पड़ जाते है. बस यही कुछ लेखक के साथ होता है. वह थोड़ा भी साहित्यिक और मानवीय मानदंडों से विचलित हुआ. और उसके लेखकीय अस्तित्व पर सवाल उठ जाते हैं.

जय प्रकाश पाण्डेय – आजकल देखा जा रहा है कि व्यंग्यकार अपनी पुस्तक/रचना की समीक्षा कराने के लिए बड़ा आतुर होता है पर अपनी रचना की आलोचना सुनने का साहस भी नहीं होता, ऐसे में व्यंग्यकारों के समूह /मठ से व्यंग्यकार के हितों और अहितों पर कोई फर्क पड़ता है क्या ?

रमेश सैनी – पुस्तक, रचना की समीक्षा किसी भी लेखक के मूल्याकन का पहला कदम होता है. समीक्षा, आलोचना से लेखक अपनी जगह देख सकता है कि वह कहाँ है. इस आधार पर वह बेहतर स्थान के लिए  प्रयास भी करता है. अमूनन लेखक अपनी आलोचना से अपने को सहज नहीं पाता है. आलोचना, समीक्षा लेखक को तैयार करती है उसे अपने को सुधारने का अवसर मिलता है. बस उसमें कोई प्रोमोटर न हो. हाँ यह अवश्य देखा जा रहा है. कुछ समूह या उन्हें मठ भी कहा जा सकता है. जो प्रोमोटर का काम कर रहें हैं. इस संबंध में मेरा मानना है कि वे अज्ञानता में स्लो पायजन दे रहें हैं. और उसकी लेखकीय मृत्यु हो सकती है. अतः इसमें लेखक का अहित अधिक, हित की कम संभावना बहुत कम  है.

जय प्रकाश पाण्डेय – कोरोना त्रासदी ने हमें लम्बे समय घर में कैद में रखा ऐसे वक्त पर महामारी कोरोना पर बहुत लोग व्यंग्य लिख रहे हैं। क्या आप मानते हैं कि मानव जाति को समाप्त करने पर उतारू कोरोना महामारी पर व्यंग्य लिखकर कोई महान बन जाएगा?

रमेश सैनी – यह अत्यंत जरूरी सवाल है, पहले मेरा यह सोचना है कि आदमी आधुनिकता और तरक्की के नाम हवा में उड़ रहा था, उसने प्रगति के नाम प्रकृति का बहुत अत्यधिक दोहन किया. इस अहंकार ने उसे आसमान से जमीन में पटक दिया. आदमी को उसकी औकात बता दी. अब मूल प्रश्न पर, मैं आरंभ से देखता आ रहा हूँ. जब भी देश या विश्व में किसी प्रकार की आपदा, त्रासदी आती है, तब शायर, कवि, लेखक स्थितियों का बिना जाँच परख के जागृत हो जाते हैं. ऐसे समय में हो सकता हो तात्कालिक महत्व दिखता है. पर लम्बे समय में यह नहीं दिखता है. कोरोना पर सैकड़ों व्यंग्य आ गए हैं. लगभग हर व्यंग्यकार ने अपनी कलम से कोरोना से उपकृत किया है. अभी भी कोई ऐसी रचना आई है, जिसने पाठक को प्रभावित किया हो या आज उस पर चर्चा हो रही हो. सन्1962 के युद्ध के समय में लिखी गई कवि प्रदीप की रचना “ऐ वतन के लोगों, या कवि राजेंद्र अनुरागी की रचना “आज सारा वतन लाम पर है, जो जहाँ है वो वतन के काम पर है” आज भी लोगों की जबान पर है. हाँ यह तात्कालिकता लेखक कवि को उर्जा जरूर देती है.

जय प्रकाश पाण्डेय –  जब पूरी दुनिया में विरक्त, मुरझाया हुआ, मलिन एकाकीपन का दौर चल रहा हो तब क्या हास्य व्यंग्य हमारे जीवन और सोच में कोई सकारात्मक परिवर्तन कर सकता है?

रमेश सैनी – मेरा ऐसा मानना नहीं है. आधुनिक तकनीक ने सभी प्रकार के लोगों के लिए साधन उपलब्ध है, डीटीएच, इंटरनेट, फेसबुक इंस्टाग्राम, वाटसएप आदि सोशलमीडिया के माध्यम से अपनी रुचि के अनुसार धर्म, साहित्य, खेल, राजनीति को चयन कर इस स्थिति से मुक्त हुआ जा सकता है. कोरोना वायरस से हमारा शहर भी प्रभावित है. पूरे विश्व में कोरोना की त्रासदी ने सबको हिला कर रख दिया है. मैं भी इस स्थिति से अछूता नहीं था. मैं भी लाकडाउन के आरंभ में अवसाद की स्थिति में आ गया था. तब मैने हरिशंकर परसाई जी और रवीन्द्रनाथ त्यागी जी रचनाओं का पुर्नपाठ किया. जिससे मैं आश्वस्त हुआ. जीवन भी कोई चीज है, और इस स्थिति से शीघ्र मुक्त हो गया. साहित्य विशेष कर व्यंग्य और हास्य का पठनपाठन  एक असरकारी दवा है. इसे सभी आजमा कर देख सकते हैं. हर विपरीत स्थितियों में यह गुणकारी नुस्खा है.

जय प्रकाश पाण्डेय – इंटरव्यू के नाम से प्रचलित गद्य रूप विधा का विकास इधर तेजी से हुआ है तमाम बड़े राजनैतिक लोगों, लेखकों, कलाकारों से इंटरव्यू लिए जाते हैं। क्या आप मानते हैं कि सच को अनुभव और विचारों की संगति में प्रस्तुत करने का यह विरल तरीका है?

रमेश सैनी – इंटरव्यू एक वह विधा है. जहाँ सत्य से साक्षात्कार होता है. इसके माध्यम से लेखक, कलाकार और राजनीतिक लोगों के विचार, मन:स्थिति, समझ को पढ़ा जा सकता है. इसमें लोगों को अपनी बात सत्यता और दृढ़ता से रखना चाहिए. जिससे समाज उनके अनुभवों और विचारों को जाने और लाभ उठा सके. यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है कि जिसका इंटरव्यू लिया जा रहा है. उसको समझने पढ़ने और जानने अवसर मिल जाता है.

जय प्रकाश पाण्डेय – इन दिनों व्यंग्य/संस्मरण लेखन में “मार्फत लेखन” विवादास्पद लेखन माना जा रहा है। कुछ लोग मानते हैं कि मार्फत लेखन इतिहास पुरुषों की मूर्ति पर हथौड़ा चलाने की कोशिश मात्र है, पर कुछ लोगों का कहना है कि मार्फत लेखन में झूठ की संभावनाएं अधिक रहतीं हैं। इस बारे में आपका क्या विचार है?

रमेश सैनी – यह लेखन दूसरों के अनुभव पर लिखा जाता है और यह एक प्रकार की व्यंग्य लेखन में नयी विसंगति है यह लेखन जिस व्यक्ति के अनुभव पर लिखा जा रहा है. यह  सच्चाई और प्रमाणिकता से दूर भी हो सकता है. यह भी हो सकता है कि वह लेखक मार्फत लेखन के वह के माध्यम से किसी खास व्यक्ति की छवि को धूमिल कर रहा हूं और इसके विपरीत अपनी धूमिल छवि को साफ करने का. इस प्रकार का लेखन, जिसके अनुभव पर लिखा जा रहा है. उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है. इस तरह लेखक और अनुभवकर्ता दोनों सवालों के घेरे में आ जाते हैं, और पाठक ठगा सा महसूस करता है. क्योंकि जिसका अनुभव है वह झूठ भी बोल सकता है. वाहवाही के चक्कर में लंबी चौड़ी हाथी सकता है. मेरा मानना है कि यह पाठकों के साथ लेखकीय धोखा है. अतः ऐसे लेखन से बचना चाहिए और दूसरों के अनुभव से लिखने वाले लेखक का बचने के लिए एक रास्ता खुला रहता है. वह बहुत आसानी से कहता है  मैंने तो उसके अनुभव से लिखा है. यह कितना सच कितना झूठ है. यह वह ही जाने. यहां एक और बात हो सकती है  कि लेखक उसके अनुभवों की जांच पड़ताल करें. इस प्रकार के लेखन में लेखक की नीयत पर भी  प्रश्न उठते हैं. वह तो यह कहकर बच जाएगा कि इसमें मेरा कुछ नहीं है. जैसा मैंने सुना वैसे ही  लिख दिया.  कुछ उदाहरण सामने आए हैं. जिन्होंने दूसरों के अनुभवों पर लिखकर हरिशंकर परसाई की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया. यह भी सच है. लेखक व्यक्तित्व से नहीं अपने काम, अपने व्यक्तित्व से पहचाना जाता है, जाना जाएगा किंतु व्यक्तित्व, पाठक को लेखक के प्रति धारणा भी बनाता है अभी कुछ दिन पहले ज्ञान चतुर्वेदी जी का अंजनी चौहान के अनुभवों के आधार पर लेख या उपन्यास का अंश  एक बड़ी पत्रिका में प्रकाशित  हुआ जिससे काफी हो हल्ला हुआ और लोगों ने उस लेखन को सिरे से नकार दिया. इससे यह हो सकता है कि पत्रिका को व्यासायिक लाभ मिला हो. मैं इसे घटिया प्रवृत्ति मानता हूँ. हां! इस बहाने पत्रिका और लेखक  चर्चा के केंद्र में आ गए. पर इस घटना ने एक गुमनाम लेखक को पुनर्जीवित कर दिया. इसके पीछे एक चालाकी भरा कदम भी हो सकता है. ऐसे कई उदाहरण हैं. जो मेरे सामने आए हैं उसमें अब यह चलाकी आम हो गई है. अतः मैं मार्फत लेखन लिखने के बिल्कुल पक्ष में नहीं हूँ.

जय प्रकाश पाण्डेय – एक बड़े व्यंग्यकार ने पिछले दिनों फेसबुक पर अपनी टिप्पणी में लिखा कि साहित्यकारों द्वारा लिखे अधिकतर संस्मरण झूठ का पुलिंदा होते हैं। आप इससे कितना सहमत हैं?

रमेश सैनी- फेसबुक सोशल मीडिया में एक आभासी दुनिया है. जिसमें अनेक लेखक आत्ममुग्ध होकर साहित्य म़ें अपना स्पेस तलाशते रहते हैं. जो इस तरह के जुमले हवा में लहराकर तमाशा करते रहते हैं. देखिए हर लेखक की एक क्रेडिट वेल्यु होती है जिसे वह सदा बचाए रखना चाहता है. अतः सब लेखक के लिए यह कहना ठीक नहीं कहा जाता सकता है. यदि कोई लेखक का कोई संस्मरण आपकी नज़र में अविश्वसनीय और झूठ लगता है. तब ऐसी स्थिति में उस लेखक को साहित्य, समाज और पाठक के बीच में तत्थों के साथ खड़ा करना चाहिए.

जय प्रकाश पाण्डेय – प्राय: यह देखा गया है कि कुछ साहित्यकार अपने पुराने संकलनों से प्रिय रचनाएँ छांटकर नया संकलन बना लेते हैं और उस संग्रह का नाम “प्रतिनिधि संग्रह” रखकर अपनी रचनाओं की नई तरह से चर्चा कराते रहते हैं. पुराने संकलनों से प्रिय रचना छांट लेने के बाद बची हुई कमजोर, लाचार, अभागिन रचनाएं क्या अप्रिय रचनाओं की श्रेणी में आ जातीं हैं  ? यदि ऐसी रचनाएं लेखक को कमजोर लगने लगतीं हैं, तो क्या लेखक को ऐसी रचनाओं को रिराइट कर वजनदार बनाना चाहिए। इस बारे में आपके क्या विचार हैं ?

रमेश सैनी – पाण्डेय जी, इसे इस तरह से देखा जाना चाहिए. यह प्रकाशक का व्यावसायिक और पाठक की सुविधा वाला पक्ष है. यह पाठक के लिए  लेखक की समस्त रचना न पढ़ कर लेखक की चयनित, विशिष्ट, प्रिय रचनाओं को पुस्तक में पढ़ने का माध्यम है. उसे कम पैसे में एक ही पुस्तक में महत्वपूर्ण रचनाएं मिल जाती है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण हरिशंकर परसाई जी और हरिवंश राय बच्चन जी की रचनाओं का है. परसाई जी की रचनाओं के छ: वाल्यूम, इसी तरह बच्चन जी के रचनाओं के छ: वाल्यूम प्रकाशित है, पूरी रचनाओं को पढ़ने के लिए आम पाठक को समय और पैसा दोनों व्यय करना होगा और दोनों स्थितियां ही कष्टदायक है.. रही शेष रचनाओं की, तो लेखक की शेष रचनाएं कमजोर, अभागी लाचार कहना  गलत होगा. वे रचनाएं भी महत्वपूर्ण होती है. अत: रिराइट का कोई अर्थ नहीं, हाँ, हर रचना का एक ऐतिहासिक महत्व होता है.

जय प्रकाश पांडेय – बहुत पहले ख्याति लब्ध व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ ने छटे हुए व्यंग्यकारों के बचपन पर “मेरा बचपन’ नाम से एक श्रृंखला चलाई थी. यथार्थ पर व्यंग्यकारों ने दिलेरी से बचपन की बदमाशियों को याद करते हुए वैसे ही बचपन पर अपनी कलम से बचपन की यादों को अपने सहज सरल भाषा में पारदर्शिता से बदमाशी भरे स्वरों में याद किया था. बचपन की यादों को साझा करते हुए लिखा था। आपकी तैरने की कला से आपने कुछ लोगों को डूबने से बचाने में मदद की. वाह-वाह लूटी थी और एक वयस्क लड़की को बचाने के चक्कर में आपका नर्मदा घाट जाना बंद कर दिया गया था. इस घटना से आपको जरूर ठेस लगी होगी और आपने जरूर कहानी या व्यंग्य लिखने की शुरुआत की होगी.

रमेश सैनी – मैं मेरा भी बचपन नर्मदा किनारे बीता मुझे लगभग 4 साल की उम्र में भली-भांति तैरना आ गया था. मैं बहुत अच्छा तैराक था. मैंने कॉलेज जाने के पूर्व तक हर वर्ष अनेक व्यक्तियों की डूबने से बचाया. इसे मैं अपनी उपलब्धि मानता हूं. नर्मदा तट जाने की बात को मैं इस  ढंग से लेता हूं. दादी ने उस वक्त धार्मिक फिल्मों के साथ-साथ सामाजिक फिल्मों को देखना आरंभ किया था. जिसमें इस तरह की घटनाओं से फिल्मों में जवान लड़के लड़कियों को आसानी से प्रेम हो जाता था. शायद मै भी इसमें न पड़ जाऊं. गांव में प्रेम करना कठिन और जटिल है. प्रेम का पर्दा खुल जाने पर व्यक्ति के साथ साथ परिवार को भी बहुत बड़ी सजा भुगतनी पड़ती है. शायद इससे बचने बचाने के लिए  उन्होंने  मेरा घाट पर जाना बंद करवा दिया. कि इस चक्कर में मेरी पढ़ाई में विघ्न पैदा ना हो. हो सकता है. यह भी सोचा हो कि “अति सर्वत्र वर्जते”, यदि मैं घाट में बना रहा हूं तो मेरे साथ घटना और दुर्घटना भी हो सकती है पर उस घटना को याद कर अब भी रोमांचित हो जाता हूँ. दादी ने शायद सही पकड़ लिया हो.. मै अब  भी अपने दादा दादी को अंदर तक याद करता हूँ, लगभग रोज याद करता हूँ. सच में वे दोनों महान व्यक्तित्व के धनी थे. मै ऐसा महसूस करता हूँ.

जय प्रकाश पांडेय – आपने जब अपने जीवन की पहली रचना लिखी. तब  किसी घटना विशेष, आक्रोश ने उस रचना को लिखने के लिए प्रेरित किया होगा.

रमेश सैनी- मेरी पहली रचना कविता थी जिसे एक पत्रिका ने अपने वार्षिकांक के कव्हर पेज में छापी थी. मुझे ऐसा लगता था कि कविता लिखने में अपने को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता हूँ. कविता लिखना सरल नहीं लगता है. और मैं ने गद्य का सहारा लिया और मेरा पहला व्यंग्य “पानी रे पानी” टाइम्स समूह की फिल्मी पत्रिका माधुरी में प्रकाशित हुआ. मेरे स्वभाव में है कि मैं अन्याय देख आवेशित हो जाता हूँ.

जय प्रकाश पांडेय – आपकी अनेक व्यंग्य रचनाओं से गुजरते हुए कभी-कभी ऐसा लगता है कि आपका रचना का स्वभाव यथार्थ के आकार की तरफ जाते जाते हुए ठहराव आक्रोशजन्य सा हो जाता है इसके पीछे निश्चित रूप से कोई कारण हो सकते हैं वह भी क्या हो सकते हैं?

रमेश सैनी –  मेरा पूरा जीवन गाँव में बीता है. मैंने वहाँ पर गरीबी मजबूरी, शोषण, बिना इलाज के मरते लोगों, और अंधविश्वासके प्रभाव को बहुत नजदीक से देखा है. गरीब शोषितों के चेहरों को मैंने बहुत बारीकी से पढ़ा है. यह सब देख कर आज जब मैं सोचता हूँ तो मेरे शरीर के रुऐं खड़े हो जाते हैं. तब मुझे प्रतिरोध करने का माध्यम नहीं मिल रहा था. यह आवेश यह प्रतिरोध मेरे अंदर  बहुत गहरे तक धंसा है. जब समझ आई. तब व्यंग्य के माध्यम से धीरे धीरे प्रस्फुटित होकर जब तब बाहर निकल रहा है. मैं उन दिनों को याद करता हूं तो मुझे आज भी आवेशित  हो जाता हूँ.

जय प्रकाश पांडेय – क्योंकि आपने लगातार कहानियां भी लिखी हैं. व्यंग्य भी लिखे हैं और उपन्यास भी लिख रहे हैं आपने कभी अध्यात्म रहस्यवाद और भूत प्रेतों के बारे में कभी कोई रचना लिखी है?

रमेश सैनी – मैंने अध्यात्म और रहस्यवाद भूत प्रेतों पर अभी तक कुछ भी नहीं लिखा है पर इसको पढ़ा बहुत है. चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति प्रिय उपन्यास हैं. जबलपुर के कैलाश नारद की अनेक रचनाएँ और बंगाल के तांत्रिकों की कहानियां  बहुत रुचि से पढ़ी है. मैं आदिवासी बहुल क्षेत्र मंडला का रहने वाला हूँ और ग्रामीण परिवेश से हूँ वहां पर तांत्रिक, पंडा, सौधन (महिला) आदि की कहानियां आम हैं. भूतों के अनेक प्रकार को जानता हूँ. इस तरह की कहानियों को मैंने लोगों से बहुत सुना है. हां! मैं इसे बहुत रुचि से और आनंद ले कर पढ़ता हूँ पर लिखा नहीं है.

जय प्रकाश पांडेय – आजकल आप गोष्ठियों में बोलते हुए पुस्तक का विमोचन करते हुए या इंटरव्यू देते हुए मौखिक समीक्षा आलोचना करते हुए अधिक नजर आते हैं. छपे हुए शब्दों में यदा-कदा नजर आते हैं ऐसा क्यों?

रमेश सैनी –पहले की अपेक्षा लेखन कम हुआ है, पर नियमित लिख रहा हूँ. अभी कुछ वर्षौं से व्यंग्य आलोचना पर रुचि बढ़ गई है. उसका एक कारण यह भी है. अभी व्यंग्य लेखन में थोड़ी सी अराजकता है. इसे समीक्षा, आलोचना, गोष्ठियों के माध्यम से लोगों को रेखांकित कर सचेत और प्रतिरोध भी करता हूँ.

जय प्रकाश पांडेय- समकालीन व्यंग्यकारों में आपने सबसे अधिक प्रभाव किसे ग्रहण किया है लोगों का विचार हैं कि आप व्यंग्य यात्रा के संपादक और ख्याति लब्ध व्यंग्यकार  प्रेम जनमेजय से ज्यादा प्रभावित दिखे हैं.

रमेश सैनी- आप सही सोच रहे हैं. प्रेम जनमेजय अच्छे व्यंग्यकार तो है ही ,संपादक भी बहुत अच्छे हैं. व्यंग्ययात्रा  के माध्यम से उन्होंने व्यंग्य के नए रूपों को सामने लाया है व्यंग आलोचना का परिदृश्य  पहले बहुत धूमल था, पर आज अपनी स्पष्टता के साथ सामने है. वे व्यंग्य आलोचना, व्यंग्य लेखन में नए लोगों को  उनकी अनेक कमजोरियों के बाबजूद स्पेस दे रहे हैं  यह व्यंग्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण काम है. इस सबके बाद बहुत बढ़िया इंसान है जोकि आज के समय में कठिन है. मेरे अच्छे मित्र तो हैं ही. मैं व्यंग्य के परिपेक्ष्य में समकालीन समय में उनसे निश्चित ही प्रभावित हूँ.

जय प्रकाश पांडेय –आप अपनी तरह से नए व्यंग्यकारों को बदलते समय के अनुसार कुछ कहना चाहेंगे?

रमेश सैनी- व्यंग्य की प्रसिद्धि, प्रभाव, और छपाव को देखकर नए लोग क्षेत्र में आए हैं. यह स्वागतेय है पर उनसे मेरा आग्रह है कि आप पुराने लेखकों हरिशंकर परसाई शरद जोशी, रवींद्रनाथ त्यागी आदि उनके समकालीन लेखकों की रचनाओं को अधिक से अधिक पढ़ें. इससे आपको व्यंग्य की दृष्टि को समझने में सहायता मिलेगी. साथ ही साथ आज के दौर की नई विसंगतियों को भी आप पढ़ने और पकड़ने की दृष्टि विकसित हो सकेगी. मेरी एक बात और भी है आपने जिन विसंगतियों को  देखा. उस पर आप लिख डाला पर यह ध्यान दें. कहीं वह सीधी सपाट बयानी तो नहीं है अतः अपने लिखे को जाँचना  चाहिए. अपने लिखे का संकेत, संदेश जाना चाहिए  कि रचना ने पाठक को प्रभावित और बैचेन कर दिया है. तभी रचना सफल होगी क्योंकि हर लिखी हुई विसंगति व्यंग्य नहीं होती है.

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈



हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 67 ☆ आमने-सामने -3 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है ।

प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ  के अंतर्गत आमने -सामने शीर्षक से  आप सवाल सुप्रसिद्ध व्यंग्यकारों के और जवाब श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के  पढ़ सकेंगे। इस कड़ी में प्रस्तुत है  सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री मुकेश राठौर जी , खरगोन  के प्रश्नों के उत्तर । ) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 67 

☆ आमने-सामने  – 3 ☆

श्री मुकेश राठौर (खरगौन) – 

प्रश्न-१ 

आप परसाई जी की नगरी से आते है| परसाई जी ने अपनी व्यंग्य रचनाओं में तत्कालीन राजनेताओं,राजनैतिक दलों और जातिसूचक शब्दों का भरपूर उपयोग किया | क्या आज व्यंग्यलेखक के लिए यह सम्भव है  या फ़िर कोई बीच का रास्ता है ?ऐसा तब जबकि रचना की डिमांड हो सीधे-सीधे किसी राजनैतिक दल,राजनेता या जाति विशेष के नामोल्लेख की|

प्रश्न- २

कथा के माध्यम से किसी सामाजिक, / नैतिक विसंगति की परतें उधेड़ना। बग़ैर पंच, विट, ह्यूमर के |ऐसी रचना कथा मानी जायेगी या व्यंग्य?

जय प्रकाश पाण्डेय १ –

मुकेश भाई, व्यंग्य लेखन जोखिम भरा गंभीर कर्म है, व्यंग्य बाबा कहता है जो घर फूंके आपनो, चले हमारे संग। व्यंग्य लेखन में सुविधाजनक रास्तों की कल्पना भी नहीं करना चाहिए, लेखक के लिखने के पीछे समाज की बेहतरी का उद्देश्य रहता है। परसाई जी जन-जीवन के संघर्ष से जुड़े रहे,लेखन से जीवन भर पेट पालते रहे,सच सच लिखकर टांग तुड़वाई,पर समझौते नहीं किए, बिलकुल डरे नहीं। पिटने के बाद उन्हें खूब लोकप्रियता मिली, उनकी व्यंग्य लिखने की दृष्टि और बढ़ी।लेखन के चक्कर में अनेक नौकरी गंवाई। व्यंंग्य तो उन्हीं पर किया जाएगा जो समाज में झूठ, पाखंड,अन्याय, भ्रष्टाचार फैलाते हैं, व्यंग्यकार तटस्थ तो नहीं रहेगा न, जो जीवन से तटस्थ है वह व्यंंग्यकार नहीं ‘जोकर’ है। यदि आज का व्यंग्य लेखक तत्कालीन भ्रष्ट अफसर या नेता या दल का नाम लेने में डरता है तो वह अपने साथ अन्याय करता है। आपने अपने सवाल में अन्य कोई बीच के रास्ते निकाले जाने की बात की है, तो उसके लिए मुकेश भाई ऐसा है कि यदि ज्यादा     डर लग रहा है तो उस अफसर या नेता की प्रवृत्ति से मिलते-जुलते प्रतीक या बिम्बों का सहारा लीजिए, ताकि पाठक को पढ़ते समय समझ आ जाए। जैसे आप अपने व्यंग्य में सफेद दाढ़ी वाला पात्र लाते हैं तो पाठक को अच्छे दिन भी याद आ सकते हैं।पर आपके कहने का ढंग ऐसा हो, कि ऐसी स्थिति न आया…….

रहिमन जिव्हा बावरी, कह गई सरग-पताल।

आप तो कह भीतर गई, जूती खात कपाल।

जय प्रकाश पाण्डेय – २

मुकेश जी, व्यंग्य वस्तुत:कथन की प्रकृति है कथ्य की नहीं।कथ्य तो हर रचना की आकृति देने के लिए आ जाता है। आपके प्रश्न के अनुसार यदि कथा के ऊपर कथन की प्रकृति मंडराएंगी तो वह व्यंग्यात्मक कथा का रुप ले लेगी।

क्रमशः ……..  4

© जय प्रकाश पाण्डेय

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≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈



हिन्दी साहित्य – परिचर्चा ☆ आप मुझे प्रेमचंद की साहित्यिक सन्तान  कह सकते हैं: श्री कमलेश भारतीय ☆ श्री अजीत सिंह

श्री अजीत सिंह 

(ई- अभिव्यक्ति में श्री अजीत सिंह जी,  पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन का हार्दिक स्वागत है। हम  वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब की वेब विचार गोष्ठी में “साहित्य और पत्रकारिता” विषय पर वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय श्री कमलेश भारतीय जी से की गई परिचर्चा को ई -अभिव्यक्ति के पाठकों के साथ साझा करने के लिए आदरणीय श्री अजीत सिंह जी के हृदय से आभारी हैं। )

☆ आप मुझे प्रेमचंद की साहित्यिक सन्तान  कह सकते हैं: कमलेश भारतीय ☆ श्री अजीत सिंह ☆ 

जाने माने कथाकार व हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष श्री कमलेश भारतीय का कहना है कि साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों व कहानियों में जिस तरह ग्रामीण जीवन व दलित वर्ग की पीड़ा का वर्णन किया गया है,  वह मुझे हूबहू अपने गांव का वर्णन लगता था ।

” इसी वर्णन ने मुझ पर एक अमिट छाप छोड़ी है और मेरी कहानियों व लघुकथाएं में भी प्रेमचंद के चरित्रों से मिलते जुलते दलित व वंचित लोगों का ज़िक्र बहुतायत से मिलता है”।

कमलेश भारतीय ने यह बात वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब की वेब विचार गोष्ठी में “साहित्य और पत्रकारिता” विषय पर बोलते हुए कही।

“मेरे कमरे में मुंशी प्रेमचंद की फोटो देखकर कुछ लोग मुझसे पूछते थे, क्या यह आपके पिताजी की तस्वीर है?  मैं गर्वित हो कहता था आप मुझे प्रेमचंद की साहित्यिक सन्तान मान सकते हैं”।

एक रोचक किस्सा सुनाते हुए भारतीय ने कहा कि पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था।

“मैं स्कूल से अक्सर भाग जाता था । अध्यापकों व पिताजी से पिटाई होती थी। दादा जी कहते थे, पढ़ेगा नहीं तो भैंसें चराएगा।

आठवीं में हुआ तो दादी कहीं से ब्रह्मीबूटी लाई। सुबह सवेरे रोज़ पिलाती थी। बृहस्पतिवार को व्रत रखवाती थी। अब पता नहीं यह ब्रह्मीबूटी का कमाल था या बृहस्पतिवार के व्रत का या दादी की तपस्या और मन्नत का, कि मैं आठवीं में सेकंड डिविजन में पास हो गया। दादी ने लड्डू बांटे। मुझे भी कुछ हौसला सा मिला और मेरी पढ़ाई में रुचि बन गई। उसके बाद मैंने सभी परीक्षाएं फर्स्ट डिवीजन में पास की। अपने काॅलेज में तीनों वर्ष फर्स्ट और प्रभाकर परीक्षा में गोल्ड मेडल ।  यहीं से साहित्य में भी रुचि बनी।

कमलेश भारतीय पिछले 45 वर्षों से लिखते आ रहे हैं। उनके दस कथा संग्रह छप चुके हैं जिनमें चार लघु कथा संग्रह हैं। प्रमुख साहित्यकारों से उनके इंटरव्यू बड़े मकबूल हुए हैं। इन्हीं पर आधारित उनकी पुस्तक “यादों की धरोहर” पिछले साल अाई थी और अब उसका दूसरा संस्करण आकर भी समाप्त ।  इसी महीने उनकी नई पुस्तक “आम रास्ता नहीं है” अाई है ।

भारतीय ने चार भाषाओं इंग्लिश, हिंदी, पंजाबी व संस्कृत के साथ बी ए की और बी एड कर पंजाब के नवां शहर के  स्कूलों में 17 वर्ष अध्यापन किया। साथ में लेखन भी करते रहे और उनके लेख जालंधर के अखबारों में छपते रहे। सन् 1990 से उन्होंने स्कूल प्रिंसिपल की नौकरी छोड़ दैनिक ट्रिब्यून में पहले उपसंपादक और फिर हिसार में प्रिंसिपल संवाददाता के रूप में पत्रकारिता और साहित्य लेखन साथ साथ ही किया। उन्हे साहित्य लेखन के लिए अनेक पुरस्कार भी मिले जिनमें हरियाणा साहित्य अकादमी का देशबंधु गुप्त साहित्यिक पत्रकारिता का एक लाख रुपए का पुरस्कार तथा गैर – हिंदी राज्यों के हिंदी लेखकों के लिए केंद्र सरकार का 50 हज़ार रुपए का पुरस्कार उनकी पुस्तक “एक संवाददाता की डायरी” पर मिलना भी शामिल है।

वे तीन साल तक हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष के पद पर रहते हुए लालबत्ती की गाड़ी में भी चले।

एक प्रश्न के उत्तर में भारतीय ने कहा कि बेशक घटिया संवादों के लिए सोशल मीडिया बदनाम है, पर इसमें साहित्य को लोकप्रिय बनाने की भी भरपूर संभावनाएं हैं। हर भाषा का पूरा साहित्य इंटरनेट पर मौजूद है। लेखकों, खास तौर पर बड़े लेखकों, को अपने साथ युवाओं को जोड़ कर उनमें साहित्यिक रुचि विकसित करनी चाहिए। अध्यापक और माता पिता भी बच्चों को स्कूल और कॉलेज के दौरान  अच्छे साहित्य से परिचित करा सकते हैं।

” सोशल मीडिया पर डाले गए मेरे लेख को कई हज़ार लाइक और फॉरवर्ड मिल जाते हैं। जितनी संख्या में पुस्तक बिकती है उससे कई गुणा पाठक नेट पर मिल जाते हैं। लगभग हर लेखक का साहित्य नेट पर फ्री उपलब्ध है। सोशल मीडिया का उपयोग साहित्य प्रसार के लिए अच्छी तरह हो रहा है तथा इसके विस्तार की और बड़ी संभावनाएं हैं”।

रोचक साहित्य का ज़िक्र करते हुए कमलेश भारतीय ने कहा कि वे भी शुरू में स्कूल टाइम में जासूसी नॉवेल पढ़ते थे।

“मेरे स्कूल टीचर सरदार प्रीतमसिंह ने मुझे मुंशी प्रेमचंद की ओर मोड़ दिया। कॉलेज में अंग्रेज़ी के टीचर एच एल जोशी ने “ओल्ड मैन एंड द सी” नॉवेल के साथ अंग्रेज़ी साहित्य से रूबरू कराया और बस साहित्य की लगन लग गई, पढ़ने से शुरू हुई और लेखन तक पहुंच गई”।

इंटरव्यू की विधा का ज़िक्र करते हुए भारतीय ने कहा कि

वैसे तो हर पत्रकार इंटरव्यूअर होता है, पर साहित्यकार के इंटरव्यू के लिए उसके साहित्य का ज्ञान भी होना चाहिए और लेखन की साहित्यिक शैली भी आनी चाहिए,  तभी बात में गहराई आएगी। अच्छे लेखन के लिए अच्छा साहित्य पढ़ना बहुत ज़रूरी है।

पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप से भारतीय बड़े निराश हैं, खास तौर पर टेलीविजन पत्रकारिता से। सिर्फ सनसनी और चिल्लाना पत्रकारिता नहीं है। ऐसा व्यावसायिक और राजनैतिक दबावों के चलते हो रहा है। प्रिंट मीडिया कुछ बचा हुआ है पर वहां भी साहित्य के परिशिष्ट समाप्त प्राय हैं। कादम्बिनी और नंदन जैसी पत्रिकाएं हाल ही में बंद हो गयीं । पाठक, श्रोता व दर्शक को विवेक से काम लेते हुए मीडिया का उपयोग करना चाहिए”।

एक तरह से यह गोष्ठी एक इंटरव्यूअर का इंटरव्यू भी रही।

 

©  श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन

संपर्क: 9466647037

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – परिचर्चा ☆ व्हाट्सएप्प साक्षात्कार – व्यंग्य पुरोधाओ के सवाल – मेरे जवाब ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।

आज कोरोना महामारी ने सबकुछ ऑनलाइन कर दिया है । ऐसे में साक्षात्कार भी व्हाट्सप्प  / ज़ूम मीटिंग और कई अन्य डिजिटल मंचों  पर आरम्भ हो गए हैं। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक ऐसा ही साक्षात्कार – व्हाट्सएप्प साक्षात्कार – व्यंग्य पुरोधाओ के सवाल – मेरे जवाब। )

☆ व्हाट्सएप्प साक्षात्कार – व्यंग्य पुरोधाओ के सवाल – मेरे जवाब ☆

व्यंग्ययात्रा व्हाट्सअप समूह पर श्री रणविजय राव अद्भुत साक्षात्कार का आयोजन प्रति सप्ताह कर रहे हैं. सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डा प्रेम जन्मेजय, श्री लालित्य ललित जी के मार्गदर्शन में बना व्यंग्ययात्रा व्हाट्सअप समूह १७५ व्यंग्यकारो का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय व्हाट्सअप समूह है. इसमें भारत सहित केनेडा, दुबई, अस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशो के हिन्दी व्यंग्यकार सक्रिय भागीदारी के साथ जुड़े हुये हैं. व्यंग्यकार श्री रणविजय राव हर हफ्ते खुले मंच पर किसी एक व्यंग्यकार से सवाल पूचने के लिये समूह पर आव्हान करते हैं. व्यंग्यकारो से मिले सवालो के जबाब वह व्यंग्यकार देता है. इस तरह व्यंग्य पुरोधाओ के सवाल, व्यंग्यकार के जबाब से गंभीर व्यंग्य विमर्श होता है. इस हफ्ते सवालों के कटघरे में मुझे खड़ा किया गया है. मेरे चयन के लिये श्री रणविजय राव का हृदय से आभार, इस बहाने मुझे भी कुछ सुनने, कहने, समझने का सुअवसर मिला.

आइये बतायें क्या पूछ रहे हैं मुझसे मेरे वरिष्ठ, मित्र और कनिष्ठ व्यंग्यकार.

पहला सवाल है श्री शशांक दुबेजी का…अर्थशास्त्र में एक नियम है: “कई बार बुरी मुद्रा, अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है”। क्या व्यंग्य में भी आजकल यही हो रहा है?

मेरा जबाब.. आदरणीय शशांक जी स्वयं बहुत सुलझे हुये, मददगार व्यंग्ययात्री हैं.  प्रायः अखबारो में जो संपादकीय मेल लिखा होता है उस पर इतनी अधिक मेल आती है कि संबंधित स्तंभ प्रभारी वह मेल देखता ही नही है, या उस भीड़ में आपकी मेल गुम होकर रह जाती है. मुझे स्मरण है कि कभी मैने शशांक जी से किसी अखबार की वह आई दी मांगी थी जिस पर व्यंग्य भेजने से स्तंभ प्रभारी उसे देख ले, तो उन्होने स्वस्फूर्त मुझे अन्य कई आईडी भेज दी थीं. अस्तु शशांक जी के सवाल पर आता हूं. मैने बचपन में एक कविता लिखी थी जो संभवतः धर्मयुग में बाल स्तंभ में छपी भी थी ” बिल्ली बोली म्यांऊ म्यांऊ, मुझको भूख लगी है नानी दे दो दूध मलाई खाऊं,….   अब तो जिसका बहुमत है चलता है उसका ही शासन. चूहे राज कर रहे हैं… बिल्ली के पास महज एक वोट है, चूहे संख्याबल में ज्यादा हैं. व्यंग्य ही क्या देश, दुनियां, समाज हर जगह जो मूल्यों में पतन दृष्टिगोचर हो रहा है उसका कारण यही है कि बुरी मुद्रा, अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर रही है.

अगला सवाल वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री आशीष दशोत्तर जी का है.

व्यंग्य नाटकों के अभाव और इस क्षेत्र की संभावना पर आप क्या सोचते हैं?

सवाल मेरी प्रोफाईल के अनुरूप पूछा है आषीश जी ने. मेरी व्यंग्य की ५ किताबों के साथ ही नाटक की ३ पुस्तकें छप चुकी है. मेरे लिखित कुछ नाटक डी पी एस व अन्य स्कूलो में खेले गये हैं. मुझे म प्र साहित्य अकादमी से मेरे नाटक संग्रह हिंदोस्तां हमारा के लिये ३१००० रु का हरि कृष्ण प्रेमी सम्मान मिल चुका है. अस्तु आत्म प्रवंचना केवल परिचय के लिये.

मेरा जबाब.. मेरा मानना है कि नुक्कड़ नाटक इन दिनो बहुत लोकप्रिय विधा है. और व्यंग्य नाटको की व्यापक संभावना इसी क्षेत्र में अधिक दिखती है. लेखको का नाटक लेखन के प्रति लगाव दर्शको के प्रतिसाद पर निर्भर होता है. जबलपुर में हमारे विद्युत मण्डल परिसर में भव्य तरंग प्रेक्षागृह है, जिसमें प्रति वर्ष न्यूनतम २ राष्ट्रीय स्तर के नाट्य समारोह होते हैं, सीजन टिकिट मिलना कठिन होता है. बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली में भी नाटक के प्रति चेतना अपेक्षाकृत अधिक है. यह जरूर है कि यह क्षेत्र उपेक्षित है, पर व्यापक संभावनायें भी हैं.

अगला सवाल वरिष्ठ व्यंग्यकार, संपादक, समीक्षक बेहद अच्छे इंसान श्री दिलीप तेतरवे जी का रांची से है.

विवेक भाई, क्या आपको नहीं लगता कि व्यंग्य के टार्गेट्स पूरे भारत में कोरोना की तरह पसरे हुए हैं ?

मेरा जबाब… दिलीप जी से मेरी भेंट गहमर में एक साहित्यिक समारोह में हुई थी. स्मरण हो आया, हमने आजू बाजू के पलंग पर लेटे हुये साहित्यिक चर्चायें की हैं. सर कोरोना वायरस एक फेमली है, जो म्यूटेशन करके तरह तरह के रूपों में हमें परेशान करता रहा है, पिछली सदी में १९२० का स्पेनिश फ्लू भी इसी की देन था. मैं आपसे शतप्रतिशत सहमत हूं, मानवीय प्रवृत्तियां स्वार्थ के चलते रूप बदल बदल कर व्याप्त हैं, भारत ही क्या विश्व में और यही तो व्यंग्य का टार्गेट हैं.

अगला प्रश्न: विवेकरंजन जी, आप राजनीतिक व्यंग्य के संदर्भ में क्या विचार रखते हैं?  पूछ रही हैं व्यंग्य के क्षेत्र में तेजी से उभरती हुई युवा व्यंग्य यात्री सुश्री अपर्णा जी

मेरा जबाब.. अपर्णा जी, राजनीती जीवन के हर क्षेत्र में हावी है. हम स्वयं चार नमूनो में से किसी को स्वयं अपने ऊपर हुक्म गांठने के लिये चुनने की व्यवस्था के हिस्से हैं. असीमित अधिकारो से राजनेता का बौराना अवश्य संभावी है, यहीं विसंगतियो का जन्म होता, और व्यंग्य का प्रतिवाद भी उपजने को विवश होता है. अखबार जो इन दिनो संपादकीय पन्नो पर व्यंग्य के पोषक बने हुये हैं, समसामयिक राजनैतिक व्यंग्य को तरजीह देते हैं. और देखादेखी व्यंग्यकार राजनीतिक व्यंग्य की ओर आकर्षित होता है. मैं राजनैतिक व्यंग्यो में भी मर्यादा, इशारो और सीधे नाम न लिये जाने का पक्षधर हूं.

श्री प्रभाशंकर जी उपाध्याय

व्यंग्य: आपका एक व्यंग्य संग्रह है —‘कौवा कान ले गया’।  मुझे पता नहीं है कि इस पुस्तक में इस विषय पर कोई पाठ है अथवा नहीं किन्तु हालिया माहौल में यह कहावत पुरजोर चरितार्थ हो रही है। सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें प्रसारित की जा रही है वीडियो आनन फानन वाइरल हो रहे हैं। इन्हें पढ़ने और देखने वाले अपने कानों की सलामती का परीक्षण किए बगैर कौवे के पीछे दौड़ पड़ते हैं। व्यंग्य लेखन के तौर पर इसमें  हमारी निरोधात्मक भूमिका  क्या हो?

मेरा जबाब… स्वयं विविध विषयो पर कलम चलाने वाले वरिष्ठ जानेमाने व्यंग्यकार आदरणीय उपाध्याय जी का यह सवाल मुझे बहुत पसंद आया. बिल्कुल सर, कौआ कान ले गया मेरा संग्रह था. जिसकी भूमिका वरिष्ठ व्यंग्य पुरोधा हरि जोशी जी ने लिखी थी. उसमें कौवा कान ले गया शीर्षक व्यंग्य के आधार पर ही संग्रह का नाम रखा था.अफवाहो के बाजार को दंगाई हमेशा से अपने हित में बदलते रहे हैं, अब तकनीक ने यह आसान कर दिया है, पर अब तकनीक ही उन्हें बेनकाब करने के काम भी आ रही है. व्यंग्यकार की सब सुनने लगें तो फिर बात ही क्या है, पर फिर भी हमें आशा वान बने रहकर सा हित लेखन करते रहना होगा. निराश होकर कलम डालना हल नही है. लोगों को उनके मफलर में छिपे कान का अहसास करवाने के लिये पुरजोर लेखन जारी रहेगा.

श्री मुकेश राठौर जी

प्रश्न: व्यंग्य के अल्पसंख्यक जानकर कहते हैं कि व्यंग्य करुणा प्रधान होने चाहिए जबकि बहुसंख्यक पाठक चाहते हैं कि व्यंग्य हास्यप्रधान होने चाहिए|ऐसे में एक व्यंग्यकार अपने व्यंग्य में किस तत्व को प्रमुख हथियार बनाये?

मेरा जबाब... यह व्यंग्यकार की व्यक्तिगत रुचि, विषय का चयन, और लेखन के उद्देश्य पर निर्भर है. हास्य प्रधान रचना करना भी सबके बस की बात नही होती. कई तो अमिधा से ही नही निकल पाते, व्यंजना और लक्षणा का समुचित उपयोग ही व्यंग्य कौशल है. करुणा व्यंग्य को हथियार बना कर प्रहार करने हेतु प्रेरित करती ही है.

श्री लालित्य ललित जी

प्रश्न..  आप अपने को कितने प्रतिशत कवि और कितने प्रतिशत व्यंग्यकार मानते हैं ? —

मेरा जबाब…मेरा मानना है कि हर रचनाकार पहले कवि ही होता है, प्रत्यक्ष न भी सही, भावना से तो कवि हुये बिना विसंगतियां नजर ही नही आती. मेरा पहला कविता संग्रह १९९२ में आक्रोश आया था, जो तारसप्तक अर्ढ़शती समारोह में विमोचित हुआ था, भोपाल में.आज भी पुरानी फिल्में देखते हुये मेरे आंसू निकल आते हैं,  मतलब मैं तो शतप्रतिशत कवि हुआ. ये और बात है कि जब मैं व्यंग्यकार होता हूं तो शत प्रतिशत व्यंग्यकार ही होता हूं.

श्री टीकाराम साहू आजाद‘, नागपुर

प्रश्न..क्या आप व्यंग्य को विधा मानते हैं? व्यंग्य विधा नहीं है, तो क्या है? क्योंकि वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री डा. अशोक चक्रधर जी ने कहा कि व्यंग्य विधा नहीं है।

श्री के पी सक्सेना जी  दूसरे

प्रश्न.. आदरणीय, 131 व्यंग्यकारों के संचयन के लोकार्पण समारोह में आदरणीय पद्मश्री अशोक चक्रधर ने व्यंग्य को विधा नहीं, किसी भी विधा में प्रवेश की एक सुविधा निरूपित किया है। और वैसे भी व्यंग्य को एक विधा के रूप में स्वीकारने में कई विद्वानों में हिचकिचाहट देखी गयी है। आप क्या कहते हैं?

मेरा जबाब… किसी भी व्यक्तव्य को संदर्भ सहित ही समझना जरूरी है, डा अशोक चक्रधर ने कल जो कहा उसका पूरा संदर्भ समझें तो उन्होंने अलंकारिक प्रस्तुति के लिये कहा कि व्यंग्य सुविधा है, पर उसका मूल मर्म यह नही था कि व्यंग्य अभिव्यक्ति की विधा ही नही है. मेरा मानना है कि व्यंग्य अब विधा के रूप में सुस्थापित है. उनके कहने का जो आशय मैने ग्रहण किया वह यह कि उन्होने बिल्कुल सही कहा था कि किसी भी विधा में व्यंग्य का प्रयोग उस विधा को और भी मुखर, व अभिव्यक्ति हेतु सहज बना देता है. फिर बहस तो हर विधा को लेकर की जा सकती है, ललित निबंध ही ले लीजीये, जिसे विद्वान स्वतंत्र विधा नही मानते, पर यह हम व्यंग्यकारो का दायित्व है कि हम इतना अच्छा व भरपूर लिखें कि अगली बार अशोक जी कहें कि व्यंग्य उनकी समझ में स्वतंत्र विधा है.

श्री रमेश सैनी जी

प्रश्न.. विवेकरंजन जी आप बहु विधा में लिख रहें हैं,पर वर्तमान समय में व्यंग्य लेखन प्राथमिकता में दिख रहा है। लेखन में व्यंग्य की  प्राथमिकता (विषय) बदल गई है। आप की दृष्टि में व्यंग्य लेखन में क्या नहीं होना चाहिए ?

मेरा जबाब… रमेश सैनी जी मेरे अभिन्न मित्र व बड़े भाई सृदश हैं, व्यंगम के अंतर्गत हम साझा अनेक आयोजनो में व्यंग्यपाठ कर चुके हैं. व्यंग्य के वर्तमान परिदृश्य पर दूरदर्शन भोपाल में एक चर्चा में भी वे मेरे साथ थे. मैं हिन्दी में वैज्ञानिक विषयो पर सतत लिखता रहा हूं, बिजली का बदलता परिदृश्य मेरी एक पुस्तक है, विज्ञान कथायें मैने लिखी हैं, कवितायें तो हैं ही, समसामयिक लेखों के लिये मुझे रेड एण्ड व्हाईट पुरस्कार मिल चुका है,पर मेरी मूल धारा में व्यंग्य १९८१ से है. व्यंग्य लेखन में क्या नही होना चाहिये इस सवाल का सीधा सा उत्तर है कि  व्यक्तिगत कटाक्ष नही होना चाहिये, इसकी अपेक्षा व्यक्ति की गलत प्रवृति पर मर्यादित अपरोक्ष प्रहार व्यंग्य का विषय बनाया जा सकता है. व्यंग्य में सकारात्मकता को समर्थन की संभावना ढ़ूंढ़ना जरूरी लगता है. जैसे मैं एक प्रयोगधर्मी व्यंग्य लेख लिख रहा हूं लाकडाउन में सोनू सूद के द्वारा किये गये जन हितैषी कार्यो के समर्थन में.

शशि पुरवार जी

प्रश्न: व्यंग्य विधा नहीं अपितु माध्यम है सभी विधाओं में अपनी सशक्त अभिव्यक्ति का.. क्या व्यंग्य  गद्य ही नहीं अपितु  पद्य विधा में भी मान्य है ?

मेरा जबाब… शशि जी आपके सवाल में स्वयं आपने उत्तर भी दे रखा है. पद्य में भी व्यंग्य मान्य है ही. मंचो पर तो इसका नगदीकरण तेजी से हो रहा है.

श्री राजशेखर चौबे जी

प्रश्न: आप परसाई जी की नगरी से आते हैं। उन तक कोई भी पहुंच नहीं सकता। इस दौर के व्यंग्यकारों में किसे आप उनके सबसे नजदीक पाते हैं ?

मेरा जबाब… राजशेखर जी, आप को मैं बहुत पसंद करता हूं और आपके व्यंग्य चाव से पढ़ा करता हूं लेते लेटे, क्योकि आप व्यंग्य को समर्पित संपूर्ण संस्थान ही चला रहे हैं, ऐसा क्यो मानना कि कोई परसाई जी तक नही पहुंच सकता, जिस दिन कोई वह ऊंचाई छू लेगा परसाई जी की आत्मा को ही सर्वाधिक सुखानुभुति होगी. एक नही अनेक  अपनी अपनी तरह से व्यंग्यार्थी बने हुये हैं, पुस्तकें आ रही हैं, पत्रिकायें आ रही हैं, लिखा जा रहा है, पढ़ा जा रहा है शोध हो रहे हैं, नये माध्यमो की पहुंच वैश्विक है, परसाई जी की त्वरित पहुंच वैसी नही थी जैसी आज संसाधनो की मदद से हमारी है. आवश्यकता है कि गुणवत्ता बने.नवाचार हो. मेरे एक व्यंग्य का हिस्सा है जिसमें मैंने लिखा हे कि जल्दी ही साफ्टवेयर से व्यंग्य लिखे जायेंगे. यह बिल्कुल संभव भी है. १९८६ के आस पास मैने लिखा था ” ऐसे तय करेगा शादियां कम्प्यूटर ” आज हम देख रहे हैं कि ढ़ेरो मेट्रोमोनियल साइट्स सफलता से काम कर रही हैं. अपनी सेवानिवृति के बाद आप सब के सहयोग से मेरा मन है कि साफ्टवेयर जनित व्यंग्य पर कुछ ठोस काम कर सकूं. आप विषय डालें,शब्द सीमा डालें लेखकीय भावना शून्य हो सकता है, पर कम्प्यूटर जनित व्यंग्य तो बन सकता है.

सुष राजनिधि जी

प्रश्न: क्या एक कवि बहुत बेहतरीन व्यंग्यकार हो सकता है? और हास्य और मार्मिक व्यंग्य के अलावा भी किस किस भाव में व्यंग्य लिखे जा सकते हैं?

मेरा जबाब.. बिल्कुल हो सकता है, भावना तो हर रचनाकार की शक्ति होती है, और कवि को भाव प्रवणता के लिये ही पहचाना जाता है. प्रयोगधर्मिता हर भाव में व्यंग्य लिखवा सकती है.

श्री प्रमोद ताम्बट जी, भोपाल

प्रश्न :विवेकरंजन जी,आप व्यंग्य लेखन के अलावा  नाटक में भी सक्रिय हैं। नाटकों में व्यंग्य के प्रयोग का प्रचलन काफी पुराना है। शरद जी, प्रेम जी और भी कई व्यंग्यकारों ने नाटक लिखे और बहुत सारे व्यंग्यकारों की रचनाओं के नाट्य रूपांतरण भी हुए। श्रीलाल जी का राग दरबारी देश भर में खूब खेला गया फिर भी हिंदी में नाटकों की भारी कमी है। क्या आपको नहीं लगता कि देश भर के व्यंग्यकारों को यह कमी पूरी करने के लिए कमर कसना चाहिए?

मेरा जबाब… बहुत अच्छा संदर्भ उठाया है प्रमोद जी आपने. हिन्दी नाटको के क्षेत्र में बहुत काम होना चाहिये. नाटक प्रभावी दृश्य श्रव्य माध्यम है. पिताश्री बताते हैं कि जब वे छोटे थे तो  नाटक मंडलियां हुआ करती थीं जो सरकस की तरह शहरों में घूम घूम कर नाटक, प्रहसन प्रस्तुत किया करती थीं. जल नाद मेरा एक लम्बा नाटक है जिसके लिये प्रकाशक की तलाश है. निश्चित ही व्यंग्यकार मित्र नाटक लेखन में काम कर सकते हैं, पर सप्लाई का सारा गणित मांग का है.

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा जी

प्रश्न : व्यंग्य रचना की पहचान करने के लिए कोई रेटिंग स्केल बनाना हो तो आप कैसे बनायेंगे ?

मेरा जबाब — इसके मानक ढेर से है । जैसे विज्ञान में  फंक्शन आफ लिखकर ब्रेकेट में अनेक पैरामीटर लिख सकते हैं, उसी तरह व्यंग्य के मानकों में  अपरोक्ष प्रहार, हास्य, करुणा, पंच, भाषा, शैली, विषय प्रवर्तन, उद्देश्य, निचोड़, बहुत कुछ हो सकता है जिस पर स्केलिंग की जा सकती है । मन्तव्य यह कि मजा भी आये, शिक्षा भी मिले , जिस पर प्रहार हो वह तिलमिलाए भी तो बढिया व्यंग्य कहा जा सकता है । सहमत होंगे  आप ?

श्री परवेश जैन जी

प्रश्न : व्यंग्य विधा को स्थापित करने हेतु हमें अपने नाम के पूर्व व्यंग्यकार जोड़ना क्या सही कदम होगा ? आपके पिता एक अच्छे कवि हैं आप पिता से अलग राह पर चल रहें हैं l  आखिर जीवन में साहित्यिक क्षेत्र में क्या देखना चाहते हैं और क्या स्थापित करना चाहते हैं ? व्यंग्य की नयी पौध को व्यंग्य के मूल तत्वों को समझने और जानने हेतु व्यंग्य सिद्धांत के तौर पर किन पुस्तकों को पढ़ना चाहिए ?

मेरा जबाब — परवेश जी आप स्वतः व्यंग्य और कविता को नये मानकों व नये माध्यमों से जोड रहे सक्रिय रचनाकार हैं. व्यंग्य अड्डा को विदेशों से भी हिट्स मिल रहे हैं. मेरे पूज्य पिताश्री ने संस्कृत के महाकाव्यों के हिन्दी श्लोकशः पद्यानुवाद किये हैं जिनमें भगवत गीता, रघुवंश आदि शामिल हैं. वे छंद बद्ध राष्ट्रीय भाव की रचनाओ के लिये जाने जाते हैं. ९४ वर्ष की आयु में भी सतत लिखते रहते हैं. मैं उनके लेखन से प्रोत्साहित तो हुआ पर मेरी रुचि व्यंग्य में हुई, मेरी बिटियों की भी किताबें आ गईं हैं पर उनकी व्यंग्य लेखन में रुचि नही. दरअसल लेखन अभिव्यक्ति की व्यक्तिगत कला व अभिरुचि का विषय होता है. जैसा मैने राजशेखर जी के सवाल के जबाब में लिखा व्यंग्य में कुछ तकनीकी नवाचार कर पाऊ तो मजा आ जाये, पर यह अभी विचार मात्र है. मैंने अपने शालेय जीवन में जिला पुस्तकालय मण्डला की ढ़ेर सारी साहित्यिक किताबें पढ़ी और नोट्स बनाये थे. आज भी कुछ न कुछ पढ़े बिना सोता नही हूं . किससे क्या अंतर्मन में समा जाता है जो जाने कब पुनर्प्रस्फुटित होता है, कोई बता नही सकता. इसलिये नई पौध को  मेरा तो यही सुझाव है कि पढ़ने की आदत डालें, धीरे धीरे आप स्वयं समझ जाते हैं कि क्या अलट पलट कर रख देना है और क्या गहनता से पढ़ना है. क्या संदर्भ है और क्या वन टाइमर. हर रचनाकार स्वयं अपने सिद्धांत गढ़ता है, यही तो मौलिकता है. नई पीढ़ी छपना तो चाहती है, पर स्वयं पढ़ना नही चाहती. इससे वैचारिक परिपक्वता का अभाव दिखता है. जब १०० लेख पढ़ें तब एक लिखें, देखिये फिर कैसे आप हाथों हाथ लिये जाते हैं. गूगल त्वरित जानकारी तो दे सकता है, ज्ञान नही, वह मौलिक होता है, नई पीढ़ी में मैं इसी मौलिकता को देखना चाहता हूं.

श्रीमति अलका अग्रवाल सिगतिया जी  

प्रश्न.. आपने व्यंग्य के विषय चयन पर भी व्यंग्य लिखा है।यह बताएँ आप व्यंग्य लेखन के लिए विषय कैसे चुनते हैं। विषय,व्यंग्य को चुनता है,या,व्यंग्य विषय को? कितनी सिटिंग में परफेक्शन आता है? क्या व्यक्तिगत मतभेद के आधार पर आपके व्यंग्य में पात्र गढ़े हैं?…

मेरा जबाब… अलका जी, आप बहुविधाओ में निपुण हैं. आप में उत्सुकता और तेजी का समिश्रण परिलक्षित होता है. मैं सायास बहुत कम लिखता हूं, कोई विषय भीतर ही भीतर पकता रहता है और कभी सुबह सबेरे अभिव्यक्त हो लेता है तो मन को सुकून मिल जाता है. विषय और व्यंग्य दोनो एक दूसरे के अनुपूरक हैं, विषय उद्देश्य है और व्यंग्य माध्यम. मुझे लगता है कि कोई रचना कभी भी फुल एण्ड फाइनल परफेक्ट हो ही नही सकती, खुद के लिखे को जब भी दोबारा पढ़ो कुछ न कुछ तो सुधार हो ही जाता है.  चित्र का कैनवास बड़ा होना चाहिये, व्यक्ति गत मतभेद के छोटे से टुकड़े पर क्या कालिख पोतनी.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 63 ☆ परिचर्चा – व्यंग्य कोई गणित नहीं है – श्री आलोक पुराणिक ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी  की  परिचर्चा – व्यंग्य कोई गणित नहीं है – श्री आलोक पुराणिक। ) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 63

☆ परिचर्चा – व्यंग्य कोई गणित नहीं है – श्री आलोक पुराणिक ☆ 

देश के जाने-माने व्यंग्यकार श्री आलोक पुराणिक जी से महत्वपूर्ण बातचीत –

जय प्रकाश पाण्डेय – 

किसी भ्रष्टाचारी के भ्रष्ट तरीकों को उजागर करने व्यंग्य लिखा गया, आहत करने वाले पंंच के साथ। भ्रष्टाचारी और भ्रष्टाचारियों ने पढ़ा पर व्यंग्य पढ़कर वे सुधरे नहीं, हां थोड़े शरमाए, सकुचाए और फिर चालू हो गए तब व्यंग्य भी पढ़ना छोड़ दिया, ऐसे में मेहनत से लिखा व्यंग्य बेकार हो गया क्या ?

आलोक पुराणिक –

साहित्य, लेखन, कविता, व्यंग्य, शेर ये पढ़कर कोई भ्रष्टाचारी सदाचारी नहीं हो जाता। हां भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बनाने में व्यंग्य मदद करता है। अगर कार्टून-व्यंग्य से भ्रष्टाचार खत्म हो रहा होता श्रेष्ठ कार्टूनिस्ट स्वर्गीय आर के लक्ष्मण के दशकों के रचनाकर्म का परिणाम भ्रष्टाचार की कमी के तौर पर देखने में आना चाहिए था। परसाईजी की व्यंग्य-कथा इंसपेक्टर मातादीन चांद पर के बाद पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है। रचनाकार की अपनी भूमिका है, वह उसे निभानी चाहिए। रचनाकर्म से नकारात्मक के खिलाफ माहौल बनाने में मदद मिलती है। उसी परिप्रेक्ष्य में व्यंग्य को भी देखा जाना चाहिए।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

देखने में आया है कि नाई जब दाढ़ी बनाता है तो बातचीत में पंच और महापंच फेंकता चलता है पर नाई का उस्तरा बिना फिसले दाढ़ी को सफरचट्ट कर सौंदर्य ला देता है पर आज व्यंग्यकार नाई के चरित्र से सीख लेने में परहेज कर रहे हैं बनावटी पंच और नकली मसालों की खिचड़ी परस रहे हैं ऐसा क्यों हो रहा है  ?

आलोक पुराणिक –

सबके पास हजामत के अपने अंदाज हैं। आप परसाईजी को पढ़ें, तो पायेंगे कि परसाईजी को लेकर कनफ्यूजन था कि इन्हे क्या मानें, कुछ अलग ही नया रच रहे थे। पुराने जब कहते हैं कि नये व्यंग्यकार बनावटी पंचों और नकली मसालों की खिचड़ी परोस रहे हैं, तो हमेशा इस बयान के पीछे सदाशयता और ईमानदारी नहीं होती। मैं ऐसे कई वरिष्ठों को जानता हूं जो अपने झोला-उठावकों की सपाटबयानी को सहजता बताते हैं और गैर-झोला-उठावकों पर सपाटबयानी का आऱोप ठेल देते हैं। क्षमा करें, बुजुर्गों के सारे काम सही नहीं हैं। इसलिए बड़ा सवाल है कि कौन सी बात कह कौन रहा है।  अगर कोई नकली पंच दे रहा है और फिर भी उसे लगातार छपने का मौका मिल रहा है, तो फिर मानिये कि पाठक ही बेवकूफ है। पाठक का स्तर उन्नत कीजिये। बनावटी पंच, नकली मसाले बहुत सब्जेक्टिव सी बातें है। बेहतर यह होना चाहिए कि जिस व्यंग्य को मैं खराब बताऊं, उस विषय़ पर मैं अपना काम पेश करुं और फिर ये दावा ना  ठेलूं कि अगर आपको समझ नहीं आ रहा है, तो आपको सरोकार समझ नहीं आते। लेखन की असमर्थता को सरोकार के आवरण में ना छिपाया जाये, जैसे नपुंसक दावा करे कि उसने तो परिवार नियोजन को अपना लिया है। ठीक है परिवार नियोजन बहुत अच्छी बात है, पर असमर्थताओं को लफ्फाजी के कवच दिये जाते हैं, तो पाठक उसे पहचान लेते हैं। फिर पाठकों को गरियाइए कि वो तो बहुत ही घटिया हो गया। यह सिलसिला अंतहीन है। पाठक अपना लक्ष्य तलाश लेता है और वह ज्ञान चतुर्वेदी और दूसरों में फर्क कर लेता है। वह सैकड़ों उपन्यासों की भीड़ में राग दरबारी को वह स्थान दे देता है, जिसका हकदार राग दरबारी होता है।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

लोग कहने लगे हैं कि आज के माहौल में पुरस्कार और सम्मान “सब धान बाईस पसेरी” बन से गए हैं, संकलन की संख्या हवा हवाई हो रही है ऐसे में किसी व्यंग्य के सशक्त पात्र को कभी-कभी पुरस्कार दिया जाना चाहिये, ऐसा आप मानते हैं हैं क्या ?

आलोक पुराणिक –

रचनात्मकता में बहुत कुछ सब्जेक्टिव होता है। व्यंग्य कोई गणित नहीं है कोई फार्मूला नहीं है। कि इतने संकलन पर इतनी सीनियरटी मान ली जायेगी। आपको यहां ऐसे मिलेंगे जो अपने लगातार खारिज होते जाने को, अपनी अपठनीयता को अपनी निधि मानते हैं। उनकी बातों का आशय़ होता कि ज्यादा पढ़ा जाना कोई क्राइटेरिया नहीं है। इस हिसाब से तो अग्रवाल स्वीट्स का हलवाई सबसे बड़ा व्यंग्यकार है जिसके व्यंग्य का कोई  भी पाठक नहीं है। कई लेखक कुछ इस तरह की बात करते हैं , इसी तरह से लिखा गया व्यंग्य, उनके हिसाब से ही लिखा गया व्यंग्य व्यंग्य है, बाकी सब कूड़ा है। ऐसा मानने का हक भी है सबको बस किसी और से ऐसा मनवाने के लिए तुल जाना सिर्फ बेवकूफी ही है। पुरस्कार किसे दिया जाये किसे नहीं, यह पुरस्कार देनेवाले तय करेंगे। किसी पुरस्कार से विरोध हो, तो खुद खड़ा कर लें कोई पुरस्कार और अपने हिसाब के व्यंग्यकार को दे दें। यह सारी बहस बहुत ही सब्जेक्टिव और अर्थहीन है एक हद।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

आप खुशमिजाज हैं, इस कारण व्यंग्य लिखते हैं या भावुक होने के कारण ?

आलोक पुराणिक –

व्यंग्यकार या कोई भी रचनाशील व्यक्ति भावुक ही होता है। बिना भावुक हुए रचनात्मकता नहीं आती। खुशमिजाजी व्यंग्य से नहीं आती, वह दूसरी वजहों से आती है। खुशमिजाजी से पैदा हुआ हास्य व्यंग्य में इस्तेमाल हो जाये, वह अलग बात है। व्यंग्य विसंगतियों की रचनात्मक पड़ताल है, इसमें हास्य हो भी सकता है नहीं भी। हास्य मिश्रित व्यंग्य को ज्यादा स्पेस मिल जाता है।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

वाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर में आ रहे शब्दों की जादूगरी से ऐसा लगता है कि शब्दों पर संकट उत्पन्न हो गया है ऐसा कुछ आप भी महसूस करते हैं क्या ?

आलोक पुराणिक –

शब्दों पर संकट हमेशा से है और कभी नहीं है। तीस सालों से मैं यह बहस देख रहा हूं कि संकट है, शब्दों पर संकट है। कोई संकट नहीं है, अभिव्यक्ति के ज्यादा माध्यम हैं। ज्यादा तरीकों से अपनी बात कही जा सकती है।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

हजारों व्यंग्य लिखने से भ्रष्ट नौकरशाही, नेता, दलाल, मंत्री पर कोई असर नहीं पड़ता। फेसबुक में इन दिनों” व्यंग्य की जुगलबंदी ” ने तहलका मचा रखा है इस में आ रही रचनाओं से पाठकों की संख्या में ईजाफा हो रहा है ऐसा आप भी महसूस करते हैं क्या  ?

आलोक पुराणिक –

अनूप शुक्ल ने व्यंग्य की जुगलबंदी के जरिये बढ़िया प्रयोग किये हैं। एक ही विषय पर तरह-तरह की वैरायटी वाले लेख मिल रहे हैं। एक तरह से सीखने के मौके मिल रहे हैं। एक ही विषय पर सीनियर कैसे लिखते हैं, जूनियर कैसे लिखते हैं, सब सामने रख दिया जाता है। बहुत शानदार और सार्थक प्रयोग है जुगलबंदी। इसका असर खास तौर पर उन लेखों की शक्ल में देखा जा सकता है, जो एकदम नये लेखकों-लेखिकाओं ने लिखे हैं और चौंकानेवाली रचनात्मकता का प्रदर्शन किया है उन लेखों में। यह नवाचार  इंटरनेट के युग में आसान हो गया।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

हम प्राचीन काल की अपेक्षा आज नारदजी से अधिक चतुर, ज्ञानवान, विवेकवान और साधन सम्पन्न हो गए हैं फिर भी अधिकांश व्यंग्यकार अपने व्यंग्य में नारदजी को ले आते हैं इसके पीछे क्या राजनीति है ?

आलोक पुराणिक –

नारदजी उतना नहीं आ रहे इन दिनों। नारदजी का खास स्थान भारतीय मानस में, तो उनसे जोड़कर कुछ पेश करना और पाठक तक पहुंचना आसान हो जाता है। पर अब नये पाठकों को नारद के संदर्भो का अता-पता भी नहीं है।

जय प्रकाश पाण्डेय – 

व्यंग्य विधा के संवर्धन एवं सृजन में फेसबुकिया व्यंगकारों की भविष्य में सार्थक भूमिका हो सकती है क्या ?

आलोक पुराणिक –

फेसबुक या असली  की बुक, काम में दम होगा, तो पहुंचेगा आगे। फेसबुक से कई रचनाकार मुख्य धारा में गये हैं। मंच है यह सबको सहज उपलब्ध। मठाधीशों के झोले उठाये बगैर आप काम पेश करें और फिर उस काम को मुख्यधारा के मीडिया में जगह मिलती है। फेसबुक का रचनाकर्म की प्रस्तुति में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है।

© जय प्रकाश पाण्डेय

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #57 ☆ हिंदी साहित्य और सोशल मीडिया ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
मित्रो,
हिंदी साहित्य और सोशल मीडिया के अंतर्सम्बंधों पर पिछले दिनों एक इंटरव्यू दिया था। मुद्रित रूप में पत्रिका में प्रकाशित होने पर अंक साझा करूँगा। आज इस इंटरव्यू की सॉफ्ट कॉपी आप सबके अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
☆ संजय उवाच –हिंदी साहित्य और सोशल मीडिया ☆

प्रश्न – सोशल मीडिया से हिंदी साहित्य के प्रसार में कुछ बढ़ावा मिला है?

उत्तर – केवल हिंदी साहित्य ही नहीं अपितु हर भाषा और बोली के साहित्य को सोशल मीडिया से लाभ हुआ है। इससे पहले अपने सृजन को लोगों तक पहुँचाने के पारम्परिक माध्यम सीमित थे। अभिव्यक्ति के लिए पत्र-पत्रिकाओं, सरकारी प्रसार माध्यमों और सार्वजनिक मंचों तक सीमित रहना पड़ता था। यहाँ तक पहुँचना प्रत्येक के लिए संभव भी नहीं था। सोशल मीडिया एक ऐसे मंच के रूप में उभरा जहाँ हर कोई अपने मन की बात कह सकता है।

प्रश्न – सोशल मीडिया पर प्रसारित होनेवाले हिंदी साहित्य का दर्जे के बारे में आपकी क्या राय है?

उत्तर- जहाँ तक बात स्तर की है, मैं इसे कुछ हद तक सापेक्ष या रिलेटिव टर्म कहूँगा। संभव है कि किसी पत्र या पत्रिका की एक विशिष्ट सोच या विचारधारा अथवा व्यावसायिक हितों के चलते एक ही तरह का साहित्य प्रकाशित करने की प्रवृत्ति हो। ऐसे में दूसरी धारा का साहित्य उस पत्रिका में स्थान नहीं पाएगा। क्या इसका अर्थ यह है होगा कि दूसरी धारा के साहित्य का कोई स्तर नहीं है? स्थूल तौर पर इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि सोशल मीडिया एक ऐसा मंच है जो नवोदितों से लेकर लब्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकारों तक सबके लिए खुला है। हाँ यह अवश्य है कि स्वतंत्रता का अर्थ उच्छृंखलता नहीं होना चाहिए। अश्लील और वीभत्स लेखन से बचा जाना चाहिए। यूँ देखा जाए तो इस श्रेणी का लेखन समाज के हित में न होने के कारण साहित्य ही नहीं है। अश्लील लेखन पर  नियंत्रण रखने का दायित्व सम्बंधित व्यक्ति के साथ-साथ सोशल मीडिया पर उससे जुड़े उसके मित्रों का भी है।

प्रश्न – लिखने वालों को लिए क्या यह एक बड़ा व्यासपीठ उपलब्ध हुआ है?

उत्तर- लिखने वालों के लिए सोशल मीडिया  एक बहुत बड़ा मंच है। लेखक होने के नाते मैं इस बात को बेहतर समझ सकता हूँ कि अनुभूति का लिखित या टंकित शब्दों  में अभिव्यक्त होना रचनाकर्म का एक भाग है। दूसरा भाग है, रचनाकार की अपनी रचना को पाठकों के साथ साझा करने की इच्छा। इसके बाद पाठक की प्रतिक्रिया आती है।  पारम्परिक पद्धति में लम्बा समय लेनेवाली यह प्रक्रिया अब एक क्लिक के द्वारा हो जाती है। यह बहुत बड़ा सकारात्मक और क्रांतिकारी परिवर्तन है।

प्रश्न – क्या कुछ ख़ामियाँ भी आपको नज़र आती हैं?

उत्तर- जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे आप शत-प्रतिशत सही कह सकें। फिर सही, गलत भी सापेक्ष होता है और अपनी-अपनी दृष्टि के अनुसार परिभाषित होता है। सर्वसामान्य रूप से देखने का प्रयास करें तो सोशल मीडिया की अपनी ख़ामियाँ निश्चित तौर पर हैं। बहुत बार जल्दी से अभिव्यक्त करने की कोशिश में अपरिपक्व, बेहद अपरिपक्व साहित्य आ जाता है। इसे मैं ‘इमैच्योर बेबी’ कहूँगा। दूसरी बड़ी ख़ामी प्रत्यक्ष नियंत्रण की अपनी सीमाओं के कारण साहित्य के नाम पर अश्लील और विकृत लेखन परोस देने की वृत्ति भी है। कुछ अन्य ख़ामियाँ भी हैं।

प्रश्न- सोशल मीडिया और साहित्य विषयक गंभीरता इस पर आपकी क्या राय है?

उत्तर- आज अनेक नए स्तरीय रचनाकार जो चर्चा में हैं, वे सोशल मीडिया की देन हैं। बदले दौर में गंभीर साहित्य को मुख्यधारा तक पहुँचाने और युवतर पाठकों को मुख्यधारा तक लाने का का श्रेय सोशल मीडिया को ही है। जिन पुस्तकों को ढूँढ़ने में महीनों बीत जाते थे,  आज ऐसे अनेक प्लेटफॉर्म है जिन पर वे पुस्तकें यूनिकोड या पीडीएफ फॉर्मेट में सहज उपलब्ध हैं। वेद, उपनिषद से लेकर इस क्षण रचा गया साहित्य, सभी कुछ उपलब्ध है इस महाकुम्भ में। संत कबीर ने लिखा है, ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।’ पाठक को तय करना है कि उसे क्या चाहिए और कितनी गहरी डुबकी लगानी है।

प्रश्न-  सोशल मीडिया पर प्रसारित होनेवाले हिंदी साहित्य में व्याकरण एवं शुद्धलेखन की स्थिति कैसी है?

उत्तर- मेरे पास अनेक पुस्तकें भूमिका या अभिमत लिखने के लिए आती हैं। स्वयं भी प्रकाशन के व्यवसाय से जुड़ा हूँ। जहाँ तक बात व्याकरण और वर्तनी की त्रुटियों की है तो सोशल मीडिया नहीं था, क्या तब व्याकरण और वर्तनी की त्रुटियाँ नहीं थीं? इन त्रुटियों का सोशल मीडिया से क्या संबंध? यह तो संबंधित व्यक्ति के भाषाई ज्ञान पर निर्भर करता है। मेरे पास आने वाली पुस्तकों के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि अधिकांश पांडुलिपियों में वर्तनी की अनेक त्रुटियाँ होती हैं। पाठशाला या महाविद्यालय के स्तर पर देवनागरी को दुय्यम रखने और जिज्ञासु की अनास्था, दोनों का समवेत दुष्परिणाम है यह। इसे सोशल मीडिया के मत्थे मढ़ना तर्कसंगत नहीं। यदि इसका दूसरा पहलू देखें तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर ऑटो स्पेलचेक की सुविधा शुद्ध वर्तनी के प्रयोग का अवसर उपलब्ध कराती है।

एक बात और, सोशल मीडिया साधन है साध्य नहीं। दूसरे, इसका प्रयोग करने की किसी पर बाध्यता नहीं है। सोशल मीडिया की महत्ता को समझने के लिए एक प्रयोग करें। कल्पना करें कि सोशल मीडिया का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया है। अब आप फिर से कागज पर लिखें। फिर से कुछ चुनिंदा पत्र-पत्रिकाओं को भेजें। फिर से सरकारी प्रसार माध्यमों के चक्कर लगाएँ। क्या आप यह सब करने के लिए तैयार हैं? 130 करोड़ के देश में कितने लोगों को मंच उपलब्ध होगा? कितनी प्रतिभाएँ दम तोड़ जाएँगी?

गरदन, एक सीमा तक ही पीछे घुमाई जा सकती है। ईश्वर ने मनुष्य को आँखें आगे देखने के लिए दी हैं। संकेत स्पष्ट है, अतीत के मुकाबले भविष्य की ओर देखा जाए। आज सोशल मीडिया, साहित्यकारों और सृजनशील लोगों के लिए घर बैठे एक क्लिक पर उपलब्ध अभिव्यक्ति का अद्भुत प्लेटफार्म है। आनेवाला समय, इससे अधिक गतिशील और अधिक उपयोगी प्लेटफार्म का होगा। स्मरण रहे कि परिवर्तन एकमात्र नियम है जो कभी परिवर्तित नहीं होता। परिवर्तन के साथ चलें, समय के साथ चलें।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com