हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह) –  लेखक : धर्मपाल महेन्द्र जैन ☆ सुश्री ज्योत्स्ना कपिल ☆

सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह) –  लेखक   : धर्मपाल महेन्द्र जैन ☆ सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

पुस्तक  : साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह)

लेखक   : धर्मपाल महेन्द्र जैन

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर (म. प्र.)

मूल्य – 275

पृष्ठ – 154

वर्ष – 2025

सरल, चुटीली और प्रभावशाली – साहित्य की गुमटी – सुश्री ज्योत्स्ना कपिल ☆ 

व्यंग्य के क्षेत्र में धर्मपाल महेंद्र जैन जी एक प्रतिष्ठित नाम हैं। वह हिन्दी व्यंग्य विधा के गिने-चुने बेहतरीन व्यंग्यकारों में से एक हैं। पिछले वर्ष शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनके व्यंग्यों का एक रोचक संग्रह आया था ‘साहित्य की गुमटी’। जितना आकर्षक पुस्तक का शीर्षक है उतने ही लुभावने और सोचने को विवश करने वाले उनके व्यंग्य हैं। इस पुस्तक में धर्मपाल जी ने साहित्य जगत की विसंगतियों, दिखावा और परिवर्तित होती प्रवृत्तियों पर हास्यपूर्ण अंदाज में तीखा कटाक्ष किया है। यह पुस्तक पाठक को हँसी-हँसी में गंभीर मुद्दों पर सोचने को भी विवश करती है।

श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

यहाँ गुमटी को एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। जिस प्रकार सड़क किनारे लगी गुमटी में भांति- भांति के लोग आते-जाते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार साहित्य रूपी गुमटी में भी भिन्न-भिन्न श्रेणी के यथा- लेखक, पाठक, आलोचक और प्रकाशकों की भीड़ दिखाई देती है। जो स्वयं को बहुत महान समझने का भ्रम पाले रखती है। उनकी कुंठा, उनके आग्रह, उनकी बेचारगी, यह सब इन पात्रों में, उनके संवाद और उनकी आदतों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

संग्रह की पहली रचना ‘ज़हर के सौदागर’ लेखक की एक जबरदस्त व्यंग्य रचना है, जिसमें लेखक ने समाज में फैल रही नफरत, हिंसा, अफवाह और स्वार्थ जैसे जहर पर तीखा व्यंग्य किया है। कहानी में ज़हर बेचने वाली एक दुकान का उदाहरण देकर लेखक समाज की वास्तविक स्थिति को उजागर करते हैं। रचना में बताया गया है कि पहले ज़हर का उपयोग सीमित था, लेकिन समय के साथ इसकी माँग तेजी से बढ़ने लगी। यह बढ़ती माँग केवल वास्तविक ज़हर की नहीं, बल्कि समाज में फैल रहे झूठ, नफरत और दुर्भावना जैसे मानसिक ज़हर की ओर संकेत करती है। यहाँ लेखक बड़ी कुशलता से यह दिखाते हैं कि कैसे लोग बिना सोचे-समझे इन विषैले विचारों को फैलाते हैं और समाज को दूषित कर देते हैं।

‘ वाट्सऐप नहीं भाट्सएप’ में समकालीन सामाजिक व्यवहार, विशेषकर व्हाट्सएप समूहों में दिखने वाली प्रवृत्तियों पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष किया गया है। आजकल व्हाट्सएप समूहों में होने वाली ‘अतिश्योक्तिपूर्ण’ प्रशंसा और चापलूसी दिखाई गई है। यहाँ हम देखते हैं कि कैसे कुछ सदस्य एक-दूसरे की रचनाओं की अतिश्योक्ति पूर्ण प्रशंसा करते हैं। यदि भूले से उनकी रचनाओं से असहमति जता दी जाए या आलोचना कर दें तो उसे व्यक्तिगत हमले की तरह लिया जाता है। ‘भाषा के हाइवे पर गड्ढे ही गड्ढे’ में समकालीन आलोचना पर गहरा कटाक्ष किया गया है। लेखक कहते हैं कि किसी कृति पर आलोचना देखकर ही पता चल जाता है कि वह मित्र द्वारा लिखी गई है अथवा अमित्र द्वारा। यदि मित्र की रचना है तो अपने ही किसी बंदे से लिखवाकर भेज देता है परन्तु यदि वह अमित्र की है (जो की होती है। क्योंकि लेखक आपस में प्रतिद्वंदिता के चलते अमित्र ही अधिक होते हैं) तो उसपर ऐसी आलोचना लिखी जाती है कि लेखक आत्महीनता का शिकार होकर लिखना ही भूल जाए।’ ‘लाइक बटोरो और कमाओ’ में अलग ही बानगी देखने को मिलती है। यहाँ फेसबुक की उस प्रवृत्ति का प्रदर्शन है जहाँ सारा फ़साना बस लाइक कमेंट का है। अगर जिन्दा हो, तो लाइक कमेंट करके अपने जीवित होने का प्रमाण दो। ‘ईडी है तो प्रजातंत्र स्थिर है’ आज की राजनीति का ज्वलंत उदाहरण है – हम राजनीतिज्ञ हैं दोमुँहे सांप जैसे। हमारे एक तरफ ईडी है तो दूसरी तरफ सीबीआई। हमको काहे का डर?

इसी प्रकार संग्रह में एक से बढ़कर व्यंग्य हैं जो हमारे समाज की राजनैतिक, आर्थिक, मानसिक, धार्मिक विचारधारा, लोगों के दोगलेपन पर सटीक प्रहार करते हैं। लिखने को तो इतना कुछ है कि अगर लिखने बैठूं तो एक पुस्तक ही बन जाएगी। धर्मपाल जी के व्यंग्य से मेरा साक्ष्य पहली बार हुआ है और मैं उनकी पैनी दृष्टि से चमत्कृत हुई हूँ, कायल हुई हूँ। एक व्यंग्यकार बनने के लिए आपमें तीखी दृष्टि, हास्यबोध, बेहतरीन वैचारिक क्षमता और जागरूकता होना बेहद आवश्यक है। धर्मपाल जी ऐसे ही जीनियस रचनाकार हैं जिनकी विचारशीलता का फलक बहुत विस्तृत है। संग्रह के कई व्यंग्य बेहद तीखे बन पड़े हैं- बम्पर घोषणाओं के जमाने में, रक्तबीज का क्या मतलब, होरी खेले व्यंग्य वीरा अवध में, विदेश में परसाई से दो टूक, साहब को जुकाम है पर…, संस्कृति एक संक्रामक बीमारी है, सरकार तुम ट्रिलियन हम पाई, अफवाह को अफवाह रहने दें, सांप अब सभ्य हो गए हैं, साहित्य अकादमी-सी पान गुमटी इत्यादि।

संग्रह की भाषा सरल, चुटीली और प्रभावशाली है। वे भारी-भरकम शब्दों का कहीं भी प्रयोग नहीं करते, बल्कि बहुत सहज भाव में गहरी बात कह देते हैं। कई स्थानों पर व्यंग्य इतना तीक्ष्ण है कि पाठक मुस्कुराते हुए भी समाज और साहित्य की वास्तविकता को महसूस करता है। संग्रह में साहित्यिक आयोजनों, पुरस्कारों की होड़, लेखकों की भंगिमा, उनके स्वार्थ और आलोचना की राजनीति जैसी स्थितियों पर तीक्ष्ण कटाक्ष हैं। धर्मपाल जी अपने व्यंग्यों के माध्यम से यह बताने का प्रयास करते हैं कि साहित्य केवल प्रसिद्धि पाने का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम होना चाहिए।

यह एक ऐसा संग्रह है जो मनोरंजन के साथ-साथ साहित्यिक दुनिया की वास्तविकता को भी जाहिर करता है। धर्मजी की पैनी दृष्टि और हास्यपूर्ण शैली इस पुस्तक को रोचक और प्रभावशाली बनाती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक बेहतरीन उपहार है जो व्यंग्य साहित्य में रुचि रखते हैं। यह एक रोचक व विचारोत्तेजक व्यंग्य-संग्रह है। इसमें लेखक ने साहित्यिक दुनिया की विभिन्न प्रवृत्तियों, दिखावे और विसंगतियों पर तीखे लेकिन हास्यपूर्ण व्यंग्य किए हैं। लेखक की पैनी दृष्टि और चुटीली भाषा इस संग्रह को तीखी धार देती है। मैं इस संग्रह के लिए धर्मपाल जी को बधाई देती हूँ और उनकी आगामी कृति के लिए शुभकामनायें, प्रतीक्षा की घड़ियाँ शुरू हो गई हैं।

©  सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

18-ए, विक्रमादित्य पुरी, स्टेट बैंक कॉलोनी, बरेली 243003

मो.- 9412291372

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अचानक डूबता सूरज उग आया – उपन्यासकार : श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’  समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी ☆

? पुस्तक चर्चा –  अचानक डूबता सूरज उग आया – उपन्यासकार : श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ? समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी ?

उपन्यास का नाम: अचानक डूबता सूरज उग आया

उपन्यासकार: राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी

प्रकाशक: कोहबर प्रकाशन लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

प्रकाशन वर्ष: 2025

कुल पृष्ठ: 152

मूल्य: ₹299

☆ “अचानक डूबता डूबता सूरज उग आया” :  मानव कर्तव्य की सफलता है ☆ डॉ जयप्रकाश तिवारी

इस उपन्यास में चिंतन के अनेक, विविध उत्कृष्ट रोचक और संवेदनशील आयाम हैं जो हमे मानव होने, मानव कर्त्तव्य का बोध करते हैं।

1 – इसका उपन्यास का नायक लखनऊ निवासी राजीव रस्तोगी है जो धनाढ्य परिवार से होते हुए भी सादगी और सनातन का जीता जागता प्रतिमूर्ति है। विश्वबन्धुत्व का व्यवहार उसके चरित्र से झलक रहा है। उसकी मित्र मंडली में सहृदय युवक/युवतियों की भरमार है। वहां जाति भेद, वर्गभेद, संप्रदाय भेद नहीं है। उसके मित्र मंडली में जहां अनेक हिन्दू युवक है, वही मुस्लिम सोहेल, एजाज, वाहिबा है तो अफ्रीकी मूल की ग्रेसी भी और एंग्लो इंडियन नायिका रूबी भी है, जिससे उसका विवाह संपन्न होता है। सभी मानवता और प्रगति के पुजारी हैं। उसमें धीरता के साथ साथ एक और गुण भी है, उसे गुण नदी; सद्गुण कहना चाहिए – गुह्यं च निगूहति गुणानि प्रकटी करोति की। यह संस्कृत और हमारी संस्कृति की देन है।

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

2 – इस उपन्यास के नायक का दिल यदि अपने संस्कार और प्रेम के लिए धड़कता है तो मस्तिष्कत कर कर्म दायित्व और नशा पीड़ित समाज के उन्मूलन के लिए।

3 इस उपन्यास में दिल और मस्तिष्क में अद्भुत समन्वय है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में राजीव का यह संतुलन हमे बहुत कुछ सिखाता है।

4 – यदि पाठक या समीक्षक से प्रश्न किया जाय कि राजेश हृदय की ओर उन्मुख है या मस्तिष्क, कर्तव्य की ओर? तो पाठक और समीक्षक उसे किसी एक वर्ग में नहीं रख पाएगा। उसे दोनों ही संवर्गों का श्रेष्ठ उदाहरण घोषित करना पड़ेगा। यह किसी के भी व्यक्तित्व का धनात्मक और चमत्कारी प्रभाव छोड़ने वाला चरित्र है।

5 –  ऐसा संतुलन वह अपने जीवन में कैसे रख पाया? या स्वयं को साध पाया तो इसका एकमात्र उत्तर है उसका सनातनी शिक्षा, मर्यादा और सिद्धांतों में अटूट विश्वास। वह लंदन में रिश्तेदार यहां उपेक्षित होने बावजूद अपने मां बाप को नहीं बताता कि पिता और मित्र में दरार आ जाएगी। वह पूछने पर प्रशंसा ही करता है। इस प्रकार इस उपन्यास ने सनातन संस्कृति और लखनऊ की तहजीब दोनों को निखारा है। यह जन्मभूमि और कर्मभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यही समर्पण मन में – “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का भाव जागृत करती है।

6 – संचरित बीमारियों की व्यापकता, उनके समाज और उनकी विभीषिका, टूटते परिवार का वर्णन तो है ही; टूटते परिवारों को कैसे जोड़ा जाय? यह उपाय भी है। नृपेंद्र और आरती के टूटते दाम्पत्य का जुड़ना, उनके दाम्पत्य जीवन के तिमिर से दाम्पत्य की किरण फूटना ही “अचानक डूबता सूरज उग आया” शीर्षक रूप में प्रकट हुआ है। इसका बिंब चित्र देखिए – “आरती और नृपेंद्र की नजरें एक दूसरे से मिली तो वे देर तक अपने को रोक नहीं सके। … दोनों ने अतीत की बीती हुई बात को एक दुःस्वप्न मानकर उसे हमेशा – हमेशा के लिए भुला देने का संकल्प लिया। उन्हें एक दूसरे से कुछ कहने के लिए अब शेष नहीं था क्योंकि आरती ने राजीव के पीछे के कमरे में बैठकर राजीव और नृपेंद्र के बीच हुई पूरी बात को सुन लिया था। अब सारा का सारा माहौल बदल चुका था। क्योंकि अब डूबता सूरज उग आया था”।

कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जागृति उपन्यास है जो एक ओर मानवीय संबंधों को जागृत करता है और दूसरी ओर नशा उन्मूलन की गूढ़ व्याख्या कर जन जागृति करता है। मानवीय दृष्टि और जनजागरण तथा नशा उन्मूलन की दृष्टि से यह अनुपम उपन्यास है। बीमारियों को केंद्र में रखकर प्रेम, सौहार्द्र और समर्पण का ऐसा तना बना बना गया है कि पाठक का मन कभी भी उबाऊपन, थकान, नीरसता का अनुभव नहीं करता; अपितु अपने को बुराइयों के निर्मूलन का एक अंग मन लेता है। इस यात्रा में सहयात्री बन जाता है। यही उपन्यासकार की सफलता है। यह यात्रा कैसे प्रारम्भ होती है? कैसे अपने लक्ष्य का संधान कर उसे पूर्णता तक पहुंचाती है, इसे पाठक स्वयं उपन्यास क्रय करके पढ़े तो उसे अधिक आनंद आएगा। हां, इतना अवश्य आश्वस्त करना चाहूंगा कि उपन्यास क्रय करने का उसे अफसोस या निराशा नहीं होगा, उसे धन व्यय की सार्थकता की अनुभूति होगी।

एक उपन्यासकार, कवि, समीक्षक और संगठनकर्ता के रूप में श्री राजेश सिंह श्रेयस का व्यक्तित्व अत्यंत ऊर्जस्वी है। उनके लेखन को नमन और साधुवाद। उनकी लेखनी अविरल, आबाद चलती रहे, उनको बहुत – बहुत बधाई और साधुवाद।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© डॉ जयप्रकाश तिवारी

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆ समीक्षा – श्री सुदर्शन कुमार सोनी ☆

श्री सुदर्शन कुमार सोनी

☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆ समीक्षा – श्री सुदर्शन कुमार सोनी ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – “व्यंग्य : कल आज और कल”

लेखक – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

पृष्ठ संख्या – १६६

प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली 

मूल्य – २२४ रु 

☆ व्यंग्य: कल, आज और कल” का अवलोकन व समीक्षा – श्री सुदर्शन कुमार सोनी ☆

यह सारांश विवेक रंजन श्रीवास्तव की पुस्तक “व्यंग्य: कल, आज और कल” का एक विस्तृत अवलोकन प्रदान करता है, जो हिंदी व्यंग्य के सैद्धांतिक आधार, ऐतिहासिक विकास और समकालीन प्रासंगिकता का एक बहुआयामी विश्लेषण है।

व्यंग्य की परिभाषा और ऐतिहासिक जड़ें

व्यंग्य की प्रकृति और उद्देश्य व्यंग्य को केवल हास्य नहीं, बल्कि साहित्य की एक सशक्त विधा के रूप में वर्णित किया गया है जो समाज के ताने-बाने में बुनी गई विसंगतियों, विडंबनाओं और कुरीतियों को उघाड़ने का साहस रखती है। यह मात्र हँसाने का साधन नहीं है, बल्कि हँसी के पीछे छिपे एक तीखे प्रहार की लेखकीय कला है, जो पाठक को झकझोरती है और उसे सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन की ओर सोचने पर मजबूर करती है। स्रोतों के अनुसार, व्यंग्य समाज का दर्पण है जो व्यवस्था, परंपराओं और सामूहिक मूर्खताओं को उजागर करता है।

सैद्धांतिक आधार: हास्य बनाम व्यंग्य  पुस्तक शुद्ध हास्य (Humor और Farce) और व्यंग्य (Wit, Satire और Irony) के बीच सूक्ष्म अंतर स्पष्ट करती है। जहाँ हास्य विषय-वस्तु से संबंधित है, वहीं विट, सटायर और विडंबना (Irony) अभिव्यक्ति के कौशल और लेखक की बुद्धि से जुड़े हैं। हँसी की तीव्रता के आधार पर इसे छह प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है: स्मित (मंद मुस्कान) से लेकर अतिहसित (अट्टहास) तक। एक सफल व्यंग्य वह है जो पाठक में ये बौद्धिक अनुभव उत्पन्न कर सके।

प्राचीन काल से भक्ति काल तक का विकास  : भारत में व्यंग्य की जड़ें बहुत पुरानी और गहरी हैं, जो संस्कृत साहित्य और कालिदास के प्रसंगों में भी दिखाई देती हैं। ऐतिहासिक रूप से कबीर, नानक और रैदास जैसे संतों को जातिगत भेदभाव और धार्मिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करने का श्रेय दिया जाता है। विशेष रूप से कबीर को उनकी बेबाक और कठोर भाषा के लिए जाना जाता है, जिन्होंने बाहरी आडंबरों को त्यागकर आंतरिक पवित्रता पर जोर दिया। पत्थर पूजने या मस्जिदों में ऊँची अजान देने पर उनके प्रसिद्ध दोहे सामाजिक व्यंग्य के कालजयी उदाहरण हैं। यहाँ तक कि गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में भी नारद मोह और लक्ष्मण-परशुराम संवाद जैसे प्रसंगों में व्यंग्य और हास्य का अनूठा समावेश मिलता है।

हिंदी व्यंग्य के स्तंभ और अभिव्यक्ति की विविधता

आधुनिक हिंदी व्यंग्य के चार स्तंभ स्रोतों में उन व्यक्तित्वों का गहन विश्लेषण दिया गया है जिन्होंने हिंदी में व्यंग्य को एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित किया:

  • हरिशंकर परसाई: इन्हें हिंदी व्यंग्य का पर्याय माना जाता है। परसाई ने सरल, बोलचाल की भाषा का उपयोग करके गहरे संदेश दिए। उनका व्यंग्य तर्क, विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित था, जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार और पाखंड पर चोट करना था।
  • शरद जोशी: अपनी संक्षिप्तता और अनूठे रूपकों के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने लघुता में विशाल सामाजिक और राजनीतिक विडंबनाओं को समेटने की कला में महारत हासिल की थी।उन्होने व्यंग्य पाठन को साहित्यिक कार्यक्रमों के मंचों जंहा पद्य का ही बोलबाला था वहां पर सफलतापूवर्क स्थापित किया
  • रवींद्रनाथ त्यागी: त्यागी का व्यंग्य मनोवैज्ञानिक गहराई और आत्म-व्यंग्य के लिए जाना जाता है। वे अक्सर स्वयं को भी अपने व्यंग्य के घेरे में रखते थे, यह दर्शाते हुए कि सुधार की शुरुआत स्वयं की पहचान से होती है।
  • श्रीलाल शुक्ल: उनका व्यंग्य गहरे सामाजिक यथार्थवाद में रचा-बसा है, जो विशेष रूप से ग्रामीण और शैक्षिक प्रणालियों के क्षरण पर केंद्रित है, जैसा कि उनके उपन्यास राग दरबारी में देखा जा सकता है।
  • विभिन्न विधाओं में व्यंग्य: नाटक, कविता और सिनेमा  व्यंग्य का प्रभाव निबंधों से आगे बढ़कर साहित्य और मीडिया के अन्य रूपों तक फैला है:
  • हिंदी नाटक: भारतेंदु हरिशचंद्र के अंधेर नगरी से शुरू होकर, आधुनिक नाटकों ने सत्ता प्रतिष्ठानों व प्रशासनिक भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए व्यंग्य का उपयोग किया है। हबीब तनवीर का चरणदास चोर लोक विधाओं के माध्यम से “सभ्य” समाज के पाखंड पर प्रहार करता है।
  • कविता: कविता की सघनता में व्यंग्य और भी पैना हो जाता है। हुल्लड़ मुरादाबादी, अल्हड़ बीकानेरी और काका हाथरसी जैसे कवियों ने अपनी लयबद्ध प्रस्तुतियों के माध्यम से व्यंग्य को मंचों पर लोकप्रिय बनाया।
  • फ़िल्मी गीत: बॉलीवुड में भी व्यंग्य एक शक्तिशाली माध्यम रहा है। “प्यासा” फ़िल्म का गीत ‘सर जो तेरा चकराए’ या ‘पैसा बोलता है’ जैसे गाने सामाजिक विडंबनाओं और मानवीय कमजोरियों को बिना कड़वाहट के रेखांकित करते हैं।

सामाजिक प्रभाव, महिला हस्तक्षेप और भविष्य की राह

व्यंग्य में महिलाओं की भूमिका : पुस्तक “व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप” पर विशेष प्रकाश डालती है, जो अक्सर साहित्यिक इतिहास में उपेक्षित रहा है। यह नोट किया गया है कि जहाँ लंबे समय तक इस विधा पर पितृसत्ता का प्रभाव रहा, वहीं सूर्यबाला, शांति मेहरोत्रा और स्नेहलता पाठक जैसी लेखिकाओं ने अपने विशिष्ट अनुभवों से व्यंग्य को नई पहचान दी। ये लेखिकाएं घरेलू विसंगतियों, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक पहचान की राजनीति को अपनी पैनी दृष्टि से संबोधित करती हैं।

व्यंग्य एक सामाजिक सुरक्षा तंत्र के रूप में : व्यंग्य को समाज के लिए एक महत्वपूर्ण “रक्षा तंत्र” (Defense Mechanism) के रूप में वर्णित किया गया है, जो इसकी बीमारियों की पहचान करता है और उनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद करता है। यह सत्ता संरचनाओं को चुनौती देने का एक जोखिम भरा लेकिन प्रभावी तरीका प्रदान करता है। शक्तिशाली लोगों के पाखंड का मजाक उड़ाकर, व्यंग्य जनता को याद दिलाता है कि कोई भी सत्ता मानवीय दोषों से ऊपर नहीं है।

डिजिटल युग की चुनौतियाँ  : समकालीन समय में, व्यंग्य के सामने नई चुनौतियाँ हैं। हालाँकि सोशल मीडिया मीम्स और वायरल वीडियो के माध्यम से व्यापक पहुँच प्रदान करता है, लेकिन यह सेंसरशिप और कानूनी खतरों के जोखिम भी पैदा करता है। एक चिंता यह भी है कि यदि व्यंग्य का उपयोग जिम्मेदारी से नहीं किया गया, तो यह केवल नकारात्मकता या हताशा पैदा कर सकता है। इसके अलावा, डिजिटल युग के “फिल्टर बबल्स” और गहरी बौद्धिक समझ की कमी के कारण व्यंग्य के सूक्ष्म संकेतों को अनदेखा किया जा सकता है।

लेखक का व्यक्तिगत दर्शन : लेखक, विवेक रंजन श्रीवास्तव, साझा करते हैं कि उनका व्यंग्य लेखन सामाजिक पाखंड और कथनी-करनी के अंतर से पैदा हुई आंतरिक बेचैनी का परिणाम है। वे व्यंग्य को एक “सामाजिक सफाईकर्मी” के रूप में देखते हैं जो वैचारिक कूड़े-कचरे को साफ करता है। उनका मानना है कि व्यंग्य का अंतिम उद्देश्य हमेशा सकारात्मक होना चाहिए—सामाजिक विसंगतियों का निदान करना और एक अधिक न्यायपूर्ण समाज को प्रेरित करना। उनका निष्कर्ष है कि जब तक मानव समाज में विसंगतियां रहेंगी, व्यंग्यकार की पैनी कलम की आवश्यकता बनी रहेगी।

कुल मिलाकर विवेक की यह पुस्तक ज्ञानवर्धक होकर संगहणीय व पठनीय है।

चर्चाकार… श्री सुदर्शन कुमार सोनी

संपर्क – 141 रोहित नगर फेज-2 भोपाल, मो  9425638352

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बादल का एक टुकड़ा (लघुकथा संग्रह) –  श्रीमती छाया त्रिवेदी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ बादल का एक टुकड़ा (लघुकथा संग्रह) – श्रीमती छाया त्रिवेदी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

जब साहित्यिक क्षेत्र में लघुकथा लेखन की बात आती है तो जबलपुर से अपने समय के प्रतिष्ठित शिक्षाविद और साहित्यकार स्व. पं. आनंद मोहन अवस्थी का समर्पित योगदान अपने आप मानस पटल पर उभर कर सामने आ जाता है। मेरी जानकारी के अनुसार शायद जबलपुर से लघुकथा लेखन की शुरुआत आनंद मोहन अवस्थी ने ही की थी और उसके बाद यहां से अन्य कथाकारों ने भी लघु कथा लेखन की गौरवशाली परंपरा को  आगे बढ़ाया ।इसी तारतम्य में महिला कथाकारों ने भी अत्यंत प्रभावी और सार्थक रुप से लघुकथाएं लिखीं और पाठक वर्ग ने इसे काफी पसंद भी किया।

लघुकथा लेखन के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्य साधना से संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाली सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार और शिक्षाविद श्रीमती छाया त्रिवेदी जी की लघुकथाएं भी पाठकों के बीच काफी चर्चित हुईं ।  उनका कहानी संग्रह और यशोदा हार गयी भी अपनी विषय सामग्री, शैली और रोचकता के कारण भी पाठक वर्ग के बीच लोकप्रिय रहा और उसके बाद लघुकथा संग्रह बादल का टुकड़ा ने भी आज साहित्यिक क्षेत्र में अपनी पठनीयता सिद्ध की है।लघुकथा संग्रह   बादल का टुकड़ा की अधिकांश कहानियां हमारे लिए इसलिए भी उत्सुकता उत्पन्न करती हैं क्योंकि छाया जी ने अत्यंत सरल भाषा और प्रभावी विषय सामग्री को लेकर ये कहानियां लिखी हैं। जब हम इस पुस्तक की कहानियां पढ़ते हैं तो वे हमें अपने जीवन के आसपास के प्रसंगों पर आधारित कहानियां प्रतीत होती हैं।इस संग्रह की लघुकथाएं अपनी डफ़ली अपना राग, दथरथ, ऐसा क्यों, मां, सफलता की उड़ान, देहरी, सीढ़ी, बादल का एक टुकड़ा, मानस पुत्र, मुआवजा, पीहर का नेग , आधुनिक गांधारी, प्रतीक्षा, विद्या मंदिर, किसका घर, कबाड़ वाला,  ढोंगी, भूल सुधार, हम पांच, उपहार, गंगा जल, संकल्प, हमें कुछ करना है, संकट की पाठशाला, मैं नेता नहीं हूं इत्यादि ऐसी ही लघुकथाएं हैं  जिन्हें पाठक वर्ग बार बार पढ़ना चाहता है और ये रचनाएं पाठकों को कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद महामहोपाध्याय आचार्य डा. हरिशंकर जी दुबे की इस कृति में प्रकाशित प्रतिक्रिया अत्यंत प्रभावी है जो पुस्तक की पठनीयता को सिद्ध करती है । उन्होंने लिखा है कि प्रस्तुत संग्रह की यह रचनाएं अपना विशेष संदर्भ रखती हैं।इन रचनाओं में समाज है, समाज के कसाव हैं, संबंधों की कसमसाहट है और तद्जन्य पीड़ा के परिणाम,प्रभाव , भी परिलक्षित होते हैं । दिव्यांगो की बात स्पष्ट करती स्पर्श की आंखें हैं तो देहदान पर आभार जैसी रचनाएं हैं तो मूक पालतू पशुओं का पक्ष स्पष्ट करती असंभव सी लघुकथाएं संजोई गई हैं।महाकवि आचार्य भगवत दुबे जी श्रीमती छाया त्रिवेदी जी की लघुकथाओं को प्रेरक और प्रभावी निरुपित किया है। पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि नियमबद्ध और अनुशासन प्रिय छाया त्रिवेदी ने अपनी लघु कथाओं में समाज के विविध विषयों पर दिशाबोधक दृष्टि प्रदान की  है। उनकी लघुकथाओं में लघुकथा के मूल भाव का सार्थक प्रस्तुतिकरण है ।

प्रतिष्ठित शिक्षाविद डा. इला घोष भी छाया जी की लघुकथाओं से प्रभावित दिखती हैं। उन्होंने भी इस संग्रह में अपनी बात कही है कि छाया जी के पास सूक्ष्म दृष्टि, संवेदनशील हृदय और अभिव्यक्ति की क्षमता है जिसका परिचय उनकी उनके इस लघुकथा संग्रह में मिलता है।

साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं की विकास शील गतिविधियों के लिए समर्पित, साहित्य साधक श्री राजेश पाठक प्रवीण ने भी लघु कथाओं को सामयिक और सराहनीय बताते हुए लिखा है कि विदुषी साहित्यकार, समता, ममता, सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति, सम्माननीया श्रीमती छाया त्रिवेदी की लघुकथाएं बिन्दु में सागर को समोए  हैं। सामाजिक आलोक के लिए विकल इन लघु कथाओं की हृदय स्पर्शी पृष्ठभूमि सामाजिक संस्कार का आव्हान करती है।श्रीमती छाया त्रिवेदी जी के लघुकथा संग्रह बादल का एक टुकड़ा में 90 लघुकथाएं सम्मिलित हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्य मनीषी श्री कृष्णकांत जी चतुर्वेदी, और अपने पूज्य पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. श्री रेवा प्रसाद दीक्षित, पूज्य मां स्व. श्रीमती सुशीला देवी दीक्षित को समर्पित यह पुस्तक  साहित्यिक क्षेत्र की एक श्रेष्ठ और संग्रहणीय कृति साबित होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ “शिवभूमीची शौर्यकथा” – लेखक : श्री गोविंद अनंत मोडक ☆ परिचय –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ “शिवभूमीची शौर्यकथा” – लेखक : श्री गोविंद अनंत मोडक ☆ परिचय –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

पुस्तक: शिवभूमीची शौर्यकथा

– – – महाराष्ट्राचा गोष्टीरूप इतिहास 

लेखक: श्री गोविंद अनंत मोडक

पृष्ठ: २४१

मूल्य: ३५०₹ 

श्री. गोविंद अनंत मोडक, यांनी बऱ्याच वर्षांपूर्वी संपादित केलेल्या ह्या दुर्मिळ पुस्तकात महाराष्ट्राच्या इतिहासाची माहिती फारच सुंदर लिहिली असून, ती वाचताना कंटाळा येत नाही, सर्व माहिती लिहिताना पाल्हाळ न लावता लिहिली असल्यामुळे तीनवेळा जरी हे पुस्तक कोणत्याही तरुणाने किंवा तरुणीने मन लावून वाचले तरी हा महाराष्ट्राचा संपूर्ण इतिहास त्याच्या मनात पक्का ठसेल.

सदरहू पुस्तकाची अनुक्रमणिका जरी सहज चाळली तरी ‘छत्रपती श्री शिवाजीराजे’ ह्यांच्या जन्मापूर्वीच्याही काळाचा आढावा घेऊन, शिवशाही कशी गाजली, कशी अस्त पावली, पेशवाई कशी सुरु झाली आणि पुढे एकंदरच मराठ्यांचे राज्य ‘कसे बुडाले’ इत्थंभुत माहिती सर्वच तरुण मुलामुलींना आणि प्रौढांनाही वाचायला मिळेल.

ह्या पुस्तकाची प्रस्तावना वाचून असे लक्षात येते की, इतिहासप्रेमी, अभ्यासक आणि संशोधक ह्यांना सदरहू पुस्तक कसे समजावून द्यावे ह्याबाबतच्या पाच-सहा विशेष सूचनाही लेखकाने लिहिल्या आहेत.

 महाराष्ट्राचा गोष्टीरूप इतिहास” हे पुस्तक मराठी इतिहासाचा थरारक, प्रेरणादायी आणि माहितीपूर्ण प्रवास आहे.

शिवरायांच्या तलवारीपासून पानिपतच्या रणांगणापर्यंत असे वीर जे धन दौलतीसाठी नाही लढले, ते स्वतःसाठी नाही लढले, ते राष्ट्रासाठी, आपल्या मातीसाठी, स्वराज्यासाठी, आपल्या शिवरायांसाठी लढले. रक्त, श्रद्धा आणि धगधगत्या ज्योतीने महाराष्ट्र घडवणाऱ्या वीरांचे जगणे तसेच विस्मृतीत गेलेल्या इतिहासाला पुन्हा जिवंत करणाऱ्या ऐतिहासिक गोष्टींचा हा संग्रह आहे. हा संग्रह महाराष्ट्राच्या वैभवशाली भूतकाळाची अनोखी सहल वाचकांना घडवतो.

यात शूर चांदबिबी व हुशार मलिक अंबर, भोसले घराण्याचा उदय, शहाजी राजांची कर्तबगारी शिवबांचे बालपण, स्वराज्य स्थापनेची पूर्वतयारी, स्वराज्य स्थापना, शहाजी राजांची कैद, अफजलखानाचा वध, बाजीप्रभूंचा पराक्रम, शाहिस्तेखानाची स्वारी, बादशहाशी समेट, कपटाने धरले पण युक्तिने सुटले, स्वराज्य व्यवस्था, गड आला पण, सिंह गेला, दोन मोठ्या लढाया, राज्याभिषेक, दक्षिण दिग्विजय, मराठी राज्यावरील आरिष्ट, स्थलांतर, जगण्यासाठी पराकाष्ठा, मराठी राज्यांत दुही, बाळाजी विश्वनाथांस पेशवाई कशी मिळाली, मराठी राज्याच्या वाढीची तयारी, निजामाचा मोड, शिंदे होळकरांचा उदय, गजेंद्रमोक्ष, कोल्हापूरकर संभाजी सभेट, आपसांत लढाई, बाजीरावांची धडाडी, ‘‘माझे मस्तक तरी किल्ल्यात पडू दे! ’’, आता हिंदु- झाले पाहिजे, माळव्याची सनद, आधी एकी मग मुलुखगिरी, शाहूंचा मृत्यु, इत्यादी अश्या एकूण ५९ गोष्टी या संग्रहात समाविष्ट केलेल्या असून सनावली आणि कठिण शब्दांचा कोश हि दिलेला आहे.

इतिहास गोष्टीच्या स्वरूपात – सोपा, रंजक व शैक्षणिक दृष्टिकोनातून मांडलेला विद्यार्थी, शिक्षक, वाचक आणि इतिहासप्रेमींसाठी आदर्श ग्रंथ – – 

मराठी साम्राज्याचा अभिमान जागवणारा प्रेरणादायी इतिहास“शिवभूमीची शौर्यकथा”

हे पुस्तक, महाराष्ट्रातल्या तरुण पिढीतल्या सर्वांनीच वाचण्याइतके सोप्या आणि भाषेची लांबण टाळून लिहिलेले आहे. पुस्तकाच्या शेवटी परिशिष्ट असून त्यात सनावली, प्रसिद्ध व्यक्तींचा कार्यकाळ इ. माहिती असून, बऱ्याच ऐतिहासिक शब्दांचे अर्थही त्यात दिलेले आहेत.

गडकोट किल्ल्यांवर भटकंती करणाऱ्या प्रत्येक मराठी व्यक्तीच्या संग्रही असावे, असे हे पुस्तक आहे. सर्वच तरुणांना हे पुस्तक आवडेल अशी आम्ही आशा करतो.

परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

पालघर 

मो. 9619800030

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ “जिनॉमिक्स” – लेखक : डॉ. संजय गुप्ते व डॉ. अविनाश भोंडवे  – परिचय : डॉ. सुहास नेने  ☆ प्रस्तुती –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ “जिनॉमिक्स” – लेखक : डॉ. संजय गुप्ते व डॉ. अविनाश भोंडवे  – परिचय : डॉ. सुहास नेने  ☆ प्रस्तुती –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

पुस्तक :  जिनॉमिक्स – मानवी जीवनाच्या अंतरंगाचा उलगडा

 – – – अद्भुत विज्ञान शाखेची सर्वांगीण ओळख

लेखक : डॉ. संजय गुप्ते, डॉ. अविनाश भोंडवे,

पाने : २८१

मूल्य: ४७५₹ 

जिनॉमिक्स मानवी जीवनाच्या अंतरंगाचा उलगडा’ हे आंतरराष्ट्रीय पातळीवरचे नामवंत स्त्री रोग व प्रसूती तज्ज्ञ डॉ. संजय गुप्ते आणि आजवर आरोग्यविषयक पंचवीस पुस्तकांचे लेखक, फैमिली डॉक्टर, तसेच आरोग्य विश्लेषक म्हणून सुविख्यात डॉ. अविनाश भोंडवे यांनी लिहिलेले पुस्तक ‘ रोहन प्रकाशन’तर्फे नुकतेच प्रकाशित झाले.

जिनॉमिक्स किंवा जनुकशास्त्र या जीवशास्त्राच्या उपशाखेत, एखाद्या जीवाच्या सर्व जनुकांचा (जीन्सचा) आणि त्यातील डीएनएच्या संपूर्ण रचनेचा, कार्याचा, विकासाचा आणि रोगांशी असलेल्या संबंधाचा अभ्यास केला जातो. जिनेटिक्स किंवा अनुवंश शास्त्र, हे एखाद्या विशिष्ट जनुकाचा वैयक्तिकरीत्या अभ्यास करते. जेम्स वॉट्सन आणि फ्रान्सिस क्रीक यांनी लावलेल्या डीएनएच्या दुहेरी हेलिक्सचा शोध हा या क्रांतीचा पाया होता. जिनॉम मॅपिंग, क्रिस्पआर सिस्टीम, क्रिस्पआर-एसकेपी प्रक्रिया हे या पायावर बांधलेले वरचे मजले आहेत. कृत्रिम मानवी जिनॉम तयार करण्याचे तंत्र, म्हणजे सिंथेटिक जिनॉम प्रोजेक्ट, हा त्याचा कळस आहे. कुणी सांगावे, आयव्हीएफमुळे, कस्टमाईज्ड, डिझायनर बाळसुद्धा अगदी मनाला हवे तसे, प्रयोगशाळेत तयार करता येऊ शकेल आणि तेदेखील मातेच्या आयुष्यातल्या कोणत्याही वयात. या सर्व प्रगतीचा आढावा सोप्या भाषेत या पुस्तकात घेतला आहे.

जनुकीयशास्त्राची सारी मदार जिनॉमवर असते. जिनॉम या सहा अब्ज (तीन अब्ज जोड्या) अक्षरांनी सजलेला, अगणित पानांचा ग्रंथ आहे. ४६ गुणसूत्रे ही त्यातील प्रकरणे आहेत. जीन्स किंवा जनुके ही त्यामधील वाक्ये आहेत आणि बेसेस, न्यूक्लिओटाईड किंवा कोडॉन हे त्यामधील शब्द आहेत. जिनेटिक्सची मूळाक्षरे गिरवताना या पुस्तकात जीनेटिक्स आणि जिनॉमिक्स यांची प्राथमिक ओळख, डीएनएचे कार्य, अनुवंशिकता, उत्परिवर्तन, आनुवंशिक आजार, जनुकीय चाचण्या, त्यांची आवश्यकता, डाएट अशा विविध विषयांवर या पुस्तकात प्रकाश टाकला आहे. जिनॉमिक्सचा केवळ मानवी आरोग्यावरच नव्हे, तर शेती, शिक्षण, आहार, क्रीडा आणि गुन्हे अन्वेषणशास्त्र या क्षेत्रात कशा रीतीने कायापालट होतो आहे, याबद्दल या पुस्तकात सविस्तर भाष्य केलेले आहे.

सर्व जगाला भेडसावणाऱ्या कर्करोगाबाबत, कर्करोगाचे जीवशास्त्र उलगडून सांगत आणि या विषयाशी संबंधित मनात येणाऱ्या सर्व प्रश्नांची उकल करण्याचा प्रयत्न केला आहे.

जनुकीय चाचण्या जनुकीय विकारांसाठी आवश्यक आहेत, असे सांगितल्यानंतर त्यासाठी असलेल्या वेगवेगळ्या प्रकारच्या उपलब्ध चाचण्या, त्यातही पारंपरिक व खास प्रगत तंत्रज्ञानातील अशी विभागणी करून प्रत्येकातील फायदे तोटे विशद केले आहेत.

जनुकशास्त्राच्या इतिहासात दीपस्तंभासारख्या असणाऱ्या सर्व शास्त्रज्ञांची नावे घेऊन त्यांना मानवंदना द्यायला लेखक विसरलेले नाहीत. सुप्रसिद्ध अभिनेत्री अँजेलिना जोलीने, स्तनाच्या कर्करोगाबाबत, जनजागृती आणि लोकहिताच्या दृष्टीने केलेल्या कृतीचे कौतुकही ते करतात. ‘जन्माला येणाऱ्या बाळाचे लिंग, पुरुषाच्या गुणसूत्रावरच ठरत असते’, हे स्पष्ट करताना मुलीला जन्म देणाऱ्या मातांना त्रास देणाऱ्या पुरुषप्रधान संस्कृतीला फटकारायला लेखक मागेपुढे बघत नाहीत.

कोणतीही वैज्ञानिक पार्श्वभूमी नसलेल्या व्यक्तीलाही जिनॉमिक्सच्या विश्वात भरारी घ्यावीशी वाटावी, अशा पद्धतीने पुस्तकाची मांडणी केल्यामुळे पुस्तकाचा आवाका वाढतो. सर्वांना समजेल, रुचेल अशा रोजच्या व्यवहारातील उदाहरणांनी, उदा. मांजा फिरकीभोवती गुंडाळलेला असणे, स्वतंत्र कार्यालय, विभागीय कार्यालय, सैनिकांचे हुद्याप्रमाणे रांगेत उभे राहणे, लाकडी पट्टीत ठोकलेले खिळे, समजावून सांगितले असल्यामुळे ते मनात ठसते.

मूळ इंग्रजी शब्दांचे ओढूनताणून मराठीत भाषांतर करण्याचा सोस टाळल्यामुळे मजकुरातील क्लिष्टता कमी झाली आहे. ठिकठिकाणी दिलेल्या आकृत्यांमुळे आणि तालिकांमुळे स्पष्टीकरणास पुष्टी मिळते. अवघड शब्दांची शब्दसूची दिल्यामुळे त्याबद्दल विशेष माहिती मिळविणे सोपे जाते.

मुखपृष्ठावरील रंगसंगती, उचित शब्दरचना आणि नागमोडी शिडीसारख्या डीएनएच्या चित्राने पुस्तकाबद्दलची उत्सुकता शिगोशिग वाढली आहे आणि जीवनाच्या अंतरंगाचा उलगडा नक्की उलगडावा, असे वाटल्यावाचून राहत नाही.

समजण्यास अवघड असा हा विषय सरळ, सोप्या, सहज समजेल अशा भाषेत मांडून, या अ‌द्भुत विज्ञान शाखेचा अनोखा खजिना लोकांसाठी उपलब्ध करून दिला, याबद्दल डॉ. संजय गुप्ते व डॉ. अविनाश भोंडवे ही लेखकद्वयी अभिनंदनास पात्र आहे. यामुळे सर्वसामान्यांमधील जनुकीय शास्त्राबद्दलची भीती, अज्ञान आणि गैरसमजुतीची दरी मिटवण्यासाठी मैलाचा दगड ठरेल याची खात्री वाटते.

पुस्तक परिचय: डॉ. सुहास नेने

 प्रस्तुती : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

पालघर 

मो. 9619800030

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆  “कविता भी तुम्हें देखती है” – श्री जयपाल ☆ समीक्षा – श्री मोहन बेगोवाल ☆

श्री मोहन बेगोवाल

पुस्तक चर्चा ☆ “कविता भी तुम्हें देखती है” – श्री जयपाल ☆ समीक्षा – श्री मोहन बेगोवाल

पुस्तक – कविता भी तुम्हें देखती है

कवि : जयपाल

प्रकाशक: यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र

मूल्य: ₹199/-

पृष्ठ: 150

☆ जयपाल की कविता, समय के सच का शब्द चित्र है — श्री मोहन बेगोवाल ☆

जयपाल जी का सद्य-प्रकाशित कविता संग्रह “कविता भी तुम्हें देखती है” समकालीन कविता के परिदृश्य में एक अत्यंत सटीक और मर्मस्पर्शी हस्तक्षेप है। यह संग्रह न केवल आज के दौर की विसंगतियों को रेखांकित करता है, बल्कि उस बेचैनी को भी स्वर देता है जिसे एक संवेदनशील नागरिक अनवरत महसूस कर रहा है।

जहाँ आज के पूंजीवादी युग का ‘बुलडोजर’ मानवीय संवेदनाओं को कुचलने पर आमादा है, वहीं जयपाल जी की कविताएँ मनुष्यता को केंद्र में लाने का सार्थक प्रयास करती हैं। ये कविताएँ केवल शब्द-शिल्प नहीं, बल्कि व्यवस्था की आक्रामकता के विरुद्ध एक ‘नैतिक ढाल’ के रूप में खड़ी होती हैं। कवि की लेखनी सत्ता और विद्रूपताओं के बीच फँसे साधारण मनुष्य की रक्षा की गुहार लगाती है।

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।)

संग्रह की विशेषता इसकी वे छोटी कविताएँ हैं, जो अपने कलेवर में लघु हैं किंतु प्रभाव में बेहद तीक्ष्ण। जैसा कि अक्सर कहा जाता है, ‘घाव करे गंभीर’—ये कविताएँ पाठक को केवल झकझोरती नहीं, बल्कि उसे आत्म-मंथन और सामाजिक चेतना के उस पड़ाव पर ले जाती हैं जहाँ वह व्यवस्था से प्रश्न करने का साहस जुटा पाता है।

इन कविताओं में सत्ता के उन विविध रूपों की शिनाख्त की गई है जिनका सीधा प्रभाव मानवीय नियति पर पड़ता है। कवि ने बड़ी ही सूक्ष्मता से रेखांकित किया है कि कैसे वर्तमान परिवेश में व्याप्त ‘भय’ धीरे-धीरे मानवीय प्रवृत्तियों का हिस्सा बनता जा रहा है। इन अमानवीय स्थितियों के बीच भी जयपाल जी की कविताएँ ‘मनुष्यता की तलाश’ को जीवित रखती हैं।

यह संग्रह पारंपरिक साँचों को तोड़कर एक नया मार्ग प्रशस्त करता है। पुस्तक के शुरुआती 20 पृष्ठों में समाहित विद्वानों के लेख पाठक को कविताओं की पृष्ठभूमि समझने में मदद करते हैं। संग्रह की अनूठी विशेषता यह है कि अधिकांश कविताएँ ‘स्नैपशॉट’ (लघु बिम्ब) शैली में हैं और प्रत्येक कविता के साथ एक संबंधित चित्र दिया गया है, जो कविता के प्रभाव को द्विगुणित कर देता है।

“कविता भी तुम्हें देखती है” मात्र एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि एक जागरूक लेखक का वैचारिक घोषणापत्र है। संग्रह की 150 पृष्ठों की यह यात्रा पाठक के मन में केवल उत्तर ही नहीं छोड़ती, बल्कि अनिवार्य ‘सवाल’ भी खड़े करती है। जब कविता वाक्य की परिधि लांघकर ‘असर’ करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि कवि समय की नब्ज थामने में सफल रहा है।

जयपाल जी की सादगी भरी भाषा पाठकों के सीधे हृदय में उतरती है और उन्हें अपने परिवेश के प्रति अधिक सचेत बनाती है।जयपाल जी की कविताओं की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि जब कविता समाप्त होती है, तब पाठक के भीतर एक ‘वैचारिक विस्फोट’ होता है। ये रचनाएँ पाठक की चेतना को इस कदर झकझोरती हैं कि वह स्वयं को उन दृश्यों का हिस्सा मानने लगता है। जिसे समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। यहाँ कविता वाक्य की परिधि लांघकर साक्षात जीवन बन जाती है।

जब कविता केवल कल्पना न रहकर ‘आज के दौर का दस्तावेज’ बन जाती है, तो वह साहित्य के साथ-साथ इतिहास और समाजशास्त्र का भी हिस्सा हो जाती है।जयपाल जी को इस शानदार उपलब्धि के लिए हमारी ओर से भी बहुत-बहुत बधाई!

समीक्षा – श्री मोहन बेगोवाल

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “मेरे अपने” – स्व. डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ “मेरे अपने” – स्व. डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

☆ स्व. डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल की  कृति – “मेरे अपने” – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल का विगत दिनों स्वर्गवास हो गया।  वे एक चर्चित रचनाकार थीं । गद्य और पद्य दोनों ही में उन्होंने प्रभावी और पठनीय सृजन किया। पूर्व में लिखी गई उनकी कृति मेरे अपने पर पुस्तक समीक्षा सादर स्मरण विनम्र श्रद्धांजली सहित अवलोकनार्थ प्रस्तुत है।)

—–

साहित्यिक क्षेत्र में पिछले दिनों  सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती प्रार्थना अर्गल जी  की साहित्यिक रचनाओं की एक ऐसी कृति सामने आई है जिसमें गद्य और पद्य की उनकी उत्कृष्ट और सराहनीय रचनाओं का समावेश है। ऐसी कृतियों की एक विशेषता यह होती है कि गद्य और पद्य के प्रशंसक पाठकों को अपनी पसंद की  रचनाएँ पढने की सुविधा रहती है।

सुपरिचित साहित्यकार डा प्रार्थना राजेन्द्र अर्गल लखनवी की यह साहित्यिक कृति 134 रचनाओं का एक खूबसूरत गुलदस्ता है जिसमें पठनीय कविताएँ, कहानियाँ, लघु कथायें, संस्मरण और चिंतन आलेख शामिल हैं।

इस कृति की शुरुआत एक कविता से की गई है जो कि मेरे बाबूजी के शीर्षक से लिखी गई पिता को विनम्र  श्रद्धांजलि है। अन्य रचनाएँ विभिन्न विधाओं पर आधारित हैं। इन कविताओं में मां नर्मदे  को लेकर रक्षाबंधन, बसंती मौसम, अंजनि पुत्र, बगीचा  , तिरंगा, प्रकृति, मोबाईल, नये वर्ष का स्वागत, प्यार का इज़हार, चांद, नारी, आशीर्वाद  सुख दुःख, लेखनी, राजा रानी, मधुर स्मृतियाँ, माँ जैसे शीर्षक से अनेक प्रभावी और भावनात्मक कविताएँ सम्मिलित हैं।

इस महत्वपूर्ण पुस्तक में सामाजिक स्थितियों पर केन्द्रित अनेक लघु कथायें भी पाठकों को पढ़ने को मिल सकती हैं। अतिथि, क्या वो दिन थे, आशीर्वाद, जहर, पन्ना, दानवीर जैसी लघु कथायें भी पाठक वर्ग उत्सुकता और रोचकता के साथ पढ़ेगा। कृति में बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम, शांति धाम, व्यवस्था जैसे शीर्षक के साथ अनेक चिंतन परक  सारगर्भित लेख हैं जिसे पढ़ कर पाठक जरूर कुछ नया सोचने को बाध्य होगा।

कृति में नल जैसे विषय पर संस्मरण भी पठनीय है। अतिथि संतुष्ट हो जायेगा जैसे विषय पर लोगों को पढ़ने के लिए रोचक कहानी भी शामिल है।

आदरणीया प्रार्थना जी ने इस कृति में समाज और साहित्य के प्रेरक व्यक्तित्व को भी सस्नेह सम्मिलित किया है। गीत पराग की प्रधान संपादक डा गीता गीत पर केन्द्रित उनकी कविता भी सराहनीय है।

कृति के प्रारंभ में आदरणीया श्रीमती साधना उपाध्याय, श्रीमती अर्चना मलैया, श्रीमती निर्मला तिवारी, श्रीमती अलका मधुसूदन पटैल और श्री विजय नेमा अनुज जैसे उत्कृष्ट साहित्य साधकों ने अपनी मंगलकामनायें व्यक्त करते हुए प्रार्थना जी की कृति को साहित्यिक क्षेत्र की एक प्रभावी, पठनीय और प्रेरणा दायी  कृति निरूपित किया है।

इस कृति के प्रारंभ में ही आदरणीया डा प्रार्थना राजेन्द्र अर्गल लखनवी ने कृति के शीर्षक मेरेे अपने के औचित्य और उसके सार्थकता पर  प्रकाश डालते हुए उनके सभी मेरे अपनों के प्रति आभार और आदर व्यक्त किया है जिन्होंने उन्हें इस कृति के प्रकाशन के लिए प्रोत्साहित और प्ररित किया है।

मुझे भी विश्वास है कि साहित्यिक क्षेत्र में भी यह कृति पठनीय और लोकप्रिय सिध्द होगी।

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – पुस्तकावर बोलू काही ☆ “पार्थसूत्र” — लेखक : श्री वैभव केळकर आणि डॉ. मेघना दलाल ☆ परिचय – सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ “पार्थसूत्र” — लेखक : श्री वैभव केळकर आणि डॉ. मेघना दलाल ☆ परिचय – सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे

 

पुस्तक : पार्थसूत्र

लेखक – वैभव केळकर 

सहलेखिका – डॉ. मेघना दलाल 

प्रकाशक- मधुर राजीव बर्वे.. दिलीप राज प्रकाशन.

मूल्य – रुपये ३००

“पार्थ सूत्र” अर्जुनाच्या जीवन यात्रेवरील एक प्रेरणादायी गाथा आहे महाभारत या महाकाव्याचा आधार घेत हे पुस्तक प्राचीन तत्त्वज्ञान आणि आधुनिक दृष्टिकोन यांची सांगड घालत लेखक द्वय वाचकांना अर्जुनाचे आयुष्य उलगडून दाखवतात.

साधारणपणे 200 पानांचे हे पुस्तक महाभारतातील माहित असलेल्या गोष्टी पार्थ म्हणजे अर्जुनाच्या दृष्टिकोनातून आपल्याला सांगते.

 एकूण 23 कथनातून हे महाभारत आपल्यापुढे उभे केले आहे. ‘,

शून्य प्रहरी’ या सुरुवातीच्या लेखातच अर्जुन आपला नातू परीक्षित याला सांगतो की, “थांबण्याची वेळ ज्याची त्यालाच ओळखता आली पाहिजे.. “सर्व पांडव द्रौपदीसह वानप्रस्थाला निघाले आहेत आणि अर्जुनाचे मन भूतकाळाच्या विहिरीत डोकावले आहे, जिथे उमटते चित्र ते पांडवांचे! ज्यांची विटी विहिरीत पडली आहे आणि ती काढून देण्यासाठी त्यांना एका तेजःपुंज ऋषीची मदत मिळत आहे.. ते प्रत्यक्ष द्रोणाचार्य त्यांचे गुरु झाले! भीष्माचार्य हे पितामह! पांडवांना असे गुरु आणि पितामह मिळाले हे त्यांचे भाग्यच! त्यांनी कौरव- पांडवांना ज्या गोष्टी सांगितल्या, त्यातून अर्जुनाचे भावविश्व समृद्ध होत होते. त्यांच्यामध्ये शिस्त आणि प्रेम यांचा संगम तेव्हा राहिला होता..

 अर्जुन एक विशिष्ट उद्देश घेऊन जगला. जे करायचं ते स्थिर बुद्धीने करत होता. जिथे शंका येईल तिथे श्रीकृष्णाची त्याला साथ होती. अर्जुन मूल्यांनी प्रेरित असा होता. या पुस्तकात अर्जुनाच्या वैयक्तिक संघर्षांचे आणि कठीण प्रसंगातील त्याच्या विचार प्रक्रियेचे उत्कृष्ट चित्रण केलेले आहे.

अर्जुनाचा काळ आणि सद्य परिस्थिती याची सांगड घालत लेखकांनी या पुस्तकातील लेखन केलेले आहे. अर्जुनाने केलेली प्रत्येक गोष्ट काल सुसंगत अशी होती की, त्यातून आत्ताही प्रत्येकाला काही शिकण्यासारखे आहे..

एकूण 23 लेखातून महाभारतात असणारे अर्जुनाचे स्थान, त्याचे विचार आणि त्या त्यावेळी अर्जुन कसा वागला, यासंबंधी लेखक द्वयीने विचारपूर्वक लेखन केले आहे. बालपण, द्रौपदी स्वयंवर, एकांत वास, वनवास, विराट युद्ध, कर्ण वध असे सर्व लेख आपल्याला अर्जुनाचे महाभारताशी असलेले नाते त्याच्या तोंडून व्यक्त करून दाखवतात.. अगदी वानप्रस्थाश्रमा पर्यंतचा अर्जुनाचा जीवन प्रवास यात आपल्याला उलगडून दाखवलेला आहे.

 द्रोणाचार्य, भीष्म यांच्या बद्दल अर्जुनाला असलेला आदरही येथे व्यक्त झाला आहे. द्रौपदी आणि इतर सर्व भाऊ यांच्या बद्दलचे प्रेम, कर्तव्य ही अर्जुनाने आयुष्यात सांभाळले होते. हे एक वेगळ्या प्रकारचे असे पुस्तक मला वाटले..

 महाभारतातील गोष्टी आपण लहानपणापासून वाचत आलो आहोत तसेच मोठेपणी ही महाभारत अधिक सखोल त्याने वाचले आहे पण अर्जुनाच्या दृष्टिकोनातून महाभारत आणि त्याचा आधुनिक काळाशी असलेला संबंध हे अशा पद्धतीने लिहिलेले पुस्तक मात्र मी प्रथमच वाचले.

 प्रत्येक लेखात अर्जुन असा वागला होता आणि आताच्या काळात येणाऱ्या संघर्षात अर्जुन कसा वागला असता यासाठी होणारे वैचारिक मार्गदर्शन या पुस्तकात वाचायला मिळते. आपण प्रत्येक जण अर्जुनच असतो, की ज्याला वेगवेगळ्या प्रसंगांना तोंड द्यावे लागते.

अधून मधून प्रसंगाला अनुसरून काव्य लेखन ही या पुस्तकात केलेले आहे. दर्शन वृत्ती, जिज्ञासा वृत्ती, स्वामित्व वृत्ती, संघ वृत्ती, रचना वृत्ती, युद्ध प्रवृत्ती, पलायन वृत्ती अशा विविध गोष्टी जशा पितामहांनी सांगितल्या त्यातून पार्थला मिळालेले शिक्षण हे आजच्या काळातही उपयुक्त आहे. इंद्रप्रस्थ नगरी उभारली तेव्हा राज्य कसे असावे? प्रजेसाठी काय काय करावे? तसेच सर्वांना शांत सुखी व समृद्ध जीवन देण्यासाठी राज्यकर्त्यांनी कसे वागावे? अशा बऱ्याच गोष्टींचा अर्जुनाने कसा विचार केला असेल याचे मनोज्ञ दर्शन या लेखक द्वयीने केले आहे.

एकंदरच पुस्तक वाचनीय वाटले आणि महाभारतातील मुख्य नायक पार्थ म्हणजेच अर्जुन याच्या विचाराचा मागोवा घेऊन त्यातून आपल्याला आत्ताच्या काळातही उपयुक्त असे काही ज्ञान मिळते हे विशेष!

“पार्थसूत्र” या पुस्तकामध्ये मला जे आवडले ते मी येथे लिहिले आहे. एकंदरच महाभारताविषयी आपल्याला आपुलकी वाटते आणि मानवी आयुष्य आणि त्यात घडणाऱ्या घटना ह्या पुरातन काळापासून तशाच आहेत. म्हणूनच म्हंटले जाते की महाभारतात जे आहे ते सर्वत्र आहे! आणि ते कालातीत आहे..

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९८ ☆ “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” – लेखक – डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित  व्यंग्य का मनोविज्ञानपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९८ ☆

☆ “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” – लेखक – डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा 

पुस्तक – “व्यंग्य का मनोविज्ञान”

लेखक – डॉ संजीव कुमार

प्रकाशक – इंडिया नेटबुक्स, नोएडा

एक सर्वथा नए अनछुए विषय पर और विश्वसनीय कृति के रूप में डा संजीव कुमार की नई किताब “व्यंग्य का मनोविज्ञान”लिखी गई है।  व्यंग्य को मात्र साहित्यिक विधा न मानकर उसे मनुष्य और समाज के अंतर्मन से जोड़कर देखती यह पुस्तक व्यंग्य को हँसी का साधन नहीं बल्कि सामाजिक आत्मावलोकन और मनोवैज्ञानिक फीडबैक मैकेनिज्म के रूप में स्थापित करती है ।

पुस्तक की संरचना पहचानने योग्य अकादमिक अनुशासन के साथ रची गई है। भूमिका के बाद आरम्भिक अध्यायों में लेखक ने व्यंग्य का स्वरूप उसकी परिभाषा और उसके मूल तत्त्वों जैसे विडंबना अतिशयोक्ति प्रतीक न्यूनोक्ति उपहास और व्यंग्यात्मक भाषा का विस्तार से विवेचन किया है।

व्यंग्य को वह ऐसी साहित्यिक अभिव्यक्ति मानते हैं जो किसी व्यक्ति विचार संस्था या समूचे समाज पर प्रहार करती हुई भी मूलतः सामाजिक सुधार की दिशा में उकसाने का काम करती है।

इस दृष्टि से व्यंग्य उनके लिए सामाजिक चेतना का सक्रिय माध्यम बन जाता है जो मनोरंजन के परदे के पीछे छिपे असुविधाजनक सत्य को पाठक के सामने लाता है।

ग्रंथ का दूसरा बड़ा आयाम व्यंग्यकार के मनोविश्लेषण से जुड़ा है। डॉ संजीव कुमार व्यंग्यकार की एक मानसिक संरचना की रूपरेखा खींचते हैं जिसमें समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता भीतर जमा असंतोष नैतिक आग्रह विद्रोही वृत्ति हास्यबुद्धि और न्याय बोध ये सभी तत्व सम्मिलित हैं। यही कारण है कि अपनी अनुभूति के अनुरूप हर व्यंग्यकार एक ही विषय पर अलग अलग तरह से व्यंग्य लिखता है।

व्यंग्यकार  केवल चुटकुला रचयिता नहीं बल्कि एक सजग और विश्लेषक व्यक्तित्व है जो सत्ता संरचनाओं रूढ़ मान्यताओं और ढोंग के साथ स्वयं अपनी कमजोरियों तक को व्यंग्य के दायरे में रखता है।

व्यंग्यकार की इस आत्म समावेशी दृष्टि को लेखक व्यंग्य का एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक गुण मानते हैं जो उसकी विश्वसनीयता को बढ़ाता है।

एक अलग खण्ड में संजीव जी व्यंग्य और पाठक के मनोविज्ञान के संबंध पर विस्तार से चर्चा करते हैं। उनके अनुसार व्यंग्य पाठक या दर्शक में एक साथ तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है पहली हँसी और मनोरंजन जो भावनात्मक तनाव को ढीला करते हैं दूसरी अपराध बोध और आत्म चिंतन जो व्यक्ति को अपनी भूमिका पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करते हैं और तीसरी परिवर्तन की आकांक्षा जो समाज के स्तर पर प्रतिरोध प्रश्नाकुलता और सुधार की इच्छा को जन्म देती है।

इस त्रिस्तरीय प्रभाव के कारण व्यंग्य उनकी दृष्टि में बड़ी ताकत से अपनी भूमिका निभाता है।

पुस्तक की एक विशेष शक्ति यह है कि व्यंग्य को वह अलग थलग साहित्यिक कोष्ठक में नहीं रखते बल्कि उसे सामाजिक सांस्कृतिक संरचनाओं के बीच रखकर पढ़ते हैं। धर्म परम्परा जाति वर्ग आर्थिक असमानताएँ और पितृसत्ता इन सबके साथ व्यंग्य का जटिल संबंध लेखक की निगाह से छूटा नहीं है।वे दिखाते हैं कि कैसे संस्कार रीति रिवाज पारिवारिक ढाँचे लैंगिक भूमिकाएँ और भाषिक परिस्थितियाँ व्यंग्य की दिशा और लक्ष्य तय करती हैं और इसके उलट व्यंग्य इन संरचनाओं की कमजोर कड़ियों पर चोट करके नए प्रश्न और नई दृष्टि  निर्मित करता है।

इस द्वंद्वात्मक पाठ के कारण पुस्तक केवल थ्योरी ऑफ सैटायर नहीं रह जाती बल्कि सोशल साइकोलॉजी ऑफ सैटायर का रूप ले लेती है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में लेखक विशेष रूप से डिजिटल युग के व्यंग्य पर लिखते हैं। सोशल मीडिया मीम संस्कृति स्टैंड अप कॉमेडी और ऑनलाइन कार्टूनों की तेज़ी से बदलती दुनिया के बीच व्यंग्य का स्वर गति और पहुँच किस प्रकार बदल गई है यह पुस्तक का एक रोचक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है। लेखक मानते हैं कि इन माध्यमों ने व्यंग्य को जनतांत्रिक और त्वरित जरूर बनाया है लेकिन साथ साथ इसने सतहीपन ट्रोलिंग समूह घृणा और नैतिक असंवेदनशीलता जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ाई हैं।

वे जिम्मेदार व्यंग्य के पक्ष में खड़े होकर यह ज़रूरत रेखांकित करते हैं कि हास्य और आलोचना दोनों के प्रयोग में मानवीय गरिमा संवेदनशीलता और निष्पक्षता के मूल्यों को न छोड़ा जाए।

पुस्तक का एक पूरा खण्ड व्यंग्य और नैतिकता के बीच नाज़ुक संतुलन पर केंद्रित है। यहाँ लेखक व्यंग्यकार के नैतिक दायित्वों की सूची तैयार करते हुए उसे सत्यनिष्ठ संवेदनशील निष्पक्ष और सुधारोन्मुख रहने की सलाह देते हैं। व्यंग्य के प्रहार का लक्ष्य व्यक्ति की गरिमा नहीं उसके असंगत आचरण और शोषक भूमिका हो यह पुस्तक बार बार स्पष्ट करती है।व्यंग्यकार को वे आक्रामक मनोरंजनकर्ता नहीं बल्कि उत्तरदायी सामाजिक हस्तक्षेपकर्ता के रूप में देखने का आग्रह करते हैं जो हास्य का सहारा लेकर भी अंततः न्याय समानता और मानवीयता की तरफ खड़ा होता है।

लेखन शैली की दृष्टि से पुस्तक मानक हिन्दी में लिखी गई है जिसमें अकादमिक अनुशासन के साथ साथ उदाहरणों और उपमानों का संयमित प्रयोग है। भाषा प्रभावी और स्पष्ट है ।  यह ग्रंथ सामान्य मनोरंजक पाठ से अधिक शोधार्थियों अध्यापकों तथा गंभीर लेखकों पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। विषय सूची से लेकर अंतिम अध्याय तक एक क्रमबद्धता बनी रहती है पहले व्यंग्य की परिभाषा और स्वरूप फिर व्यंग्यकार की मानसिकता उसके बाद पाठक समाज पर प्रभाव और अंत में डिजिटल युग नैतिकता तथा भविष्य की चुनौतियाँ यह क्रमिक विन्यास अध्ययन को सुगठित बनाता है।

पुस्तक में कुछ संभावित सीमाएँ भी संकेतित की जा सकती हैं। विश्लेषण का जोर लगभग पूरा सैद्धांतिक विमर्श पर है यदि समकालीन हिन्दी व्यंग्य कृतियों के अधिक विशिष्ट और विस्तृत पाठ विश्लेषण उदाहरण और उद्धरण यहाँ जोड़े जाते तो यह पुस्तक पाठ्य स्तर पर और भी प्रभावी हो सकती थी।

इसी तरह लेखक मनोविज्ञान की अवधारणाओं का व्याख्यात्मक उपयोग  करते हैं । प्रयोगात्मक या क्षेत्रीय अध्ययन पाठक सर्वे या केस स्टडी जैसी अनुसंधान विधियाँ जोड़ी जा सकती हैं । अभी यह मनोविज्ञान की व्याख्यात्मक शाखा पर ही अधिक आश्रित किताब बन गई है।

व्यंग्य का मनोविज्ञान हिन्दी व्यंग्य चिंतन में एक महत्त्वपूर्ण और आवश्यक ग्रंथ की तरह अपनी तरह की पहली किताब है। यह व्यंग्य को हँसी आलोचना मनोविज्ञान समाजशास्त्र और नैतिक दर्शन के संगम बिन्दु पर रखकर प्रस्तुत करती है । 

व्यंग्य लिखने वाले रचनाकारों के लिए यह पुस्तक अपने शिल्प और अपनी जिम्मेदारी को समझने का मार्गदर्शक बन सकती है आलोचकों और शोधार्थियों के लिए यह एक ठोस सैद्धांतिक आधार और गंभीर पाठकों के लिए व्यंग्य पठन के नए कोण खोलने वाला पाठ है।

यह कृति केवल व्यंग्य का मनोविज्ञान नहीं बल्कि व्यंग्य की समग्र मानसिक सामाजिक और नैतिक संरचना का सुविचारित मानचित्र प्रस्तुत करती है ।  हिन्दी साहित्य में दीर्घकालीन संदर्भ ग्रंथ बनने की क्षमता रखती है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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