हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “बूंद बूंद शब्द” (काव्य संग्रह) – सुश्री मनजीत मानवी  ☆ श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री जयपाल जी द्वारा  सुश्री मनजीत मानवी  जी के काव्य संग्रह “बूंद बूंद शब्द” पर सार्थक विमर्श ।

☆ “बूंद बूंद शब्द” (काव्य संग्रह) – सुश्री मनजीत मानवी  ☆ पुस्तक चर्चा – श्री जयपाल ☆

पुस्तक —  बूंद बूंद शब्द [ काव्य संग्रह ]

लेखिका — मनजीत मानवी [9896850047]

कीमत — 295/- [पेपर बैंक]

प्रकाशक — ‘आथर्स प्रेस,  नई दिल्ली

कविता और व्यथा का अंतरंग रिश्ता – श्री जयपाल ☆

मैं लिखती हूँ कि

अब बदले दुनिया

अन्तिम व्यक्ति के हक में

 

मैं लिखती हूँ कि

सपनों की घुटन

नहीं और  समा सकती मन में

 

मैं लिखती हूँ कि

खुद का अपना दावा

मैं पेश करूँ हर सूरत में

उपरोक्त पंक्तियाँ है—‘बूद बूंद शब्द’–कविता-संग्रह की एक कविता से । कविता संग्रह है मंजीत मानवी का । इन पंक्तियों में जीवन के प्रति जैसी जिजीविषा दिखाई देती है, जीवन जीने की उत्कट लालसा जैसी इन पंक्तियों में मौजूद है,वैसी ही जीवन की धड़कन इस संग्रह की हर कविता में सुनी जा सकती है–‘

कभी कोई बूंद

मेरी पीर लिए

बरसे वहां

तुम हो जहां

 

कभी कोई पत्ता

तेरी प्रीत लिए

यूं सरसराए

कि तुम आए !

निश्छल प्रेम से लबालब इन कोमल भावनाओं को समर्पित है यह काव्य-संग्रह । इसका एहसास पाठक को हर पन्ने पर कविताओं को पढ़ते हुए होता है l दरअसल  कवयित्री के काव्य सरोकार और जीवन सरोकारों को अलग अलग नहीं किया जा सकता । उनके जीवन आदर्श और जीवन संघर्ष दोनों इन कविताओं के असली सर्जक हैं । जीवन से प्यार और जीवन से संघर्ष-यही है इन कविताओं का सारांश—

ऊपर से कठोर

उलझी

सुप्त

भीतर से उजली

स्पष्ट

तृप्त….

 

बहुत दिन हुए

कोई चेहरा नहीं देखा

दर्द की लौ से

साबुत और रोशन

कवयित्री महिला-जनान्दोलनों से जुड़ी रही है । एक स्त्री की मानसिक पीड़ा और उसके संघर्ष को बड़ी शिद्दत के साथ महसूस करती है l अंतिम व्यक्ति के साथ  अंतिम स्त्री के दर्द और संघर्ष को भी अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति देती है–

मेहरबानी की

जूठन पर पलती

वह अंतिम स्त्री भी

चाहती है

पंख पसार के जीना..

 

पांव में छाले हैं

सर पर मैला

महिला के प्रति पुरुषवादी-पितृसत्तात्मक रवैये को वह महिला शोषण का एक हथियार करार देती है जो महिला को मात्र एक शरीर समझता है और उसकी गरिमा और सम्मान को कोई महत्त्व नहीं देता–

मेरा शरीर

तुम्हारे खेल का

मैदान नहीं

 

न ही तुम्हारी

सत्ता का

तुच्छ गलियारा

कवयित्री दलित स्त्री, मजदूर स्त्री, गुलाम स्त्री, बलात्कृत स्त्री, पितृसत्ता/ पुरूष सत्ता की शिकार स्त्री आदि स्त्रियों के सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ सीधे विद्रोह का आह्वान करती है कि इस व्यवस्था को अब बदलना ही  होगा, इसे अब और  सहन नहीं किया जा सकता ।

प्रबुद्ध और प्रतिबद्ध कवयित्री शुभा  मनजीत की काव्य कला पर अपनी  सारपूर्ण टिप्पणी में कहती हैं– ‘सरल प्रवाहमयी भाषा, मार्मिक बिम्ब और उपमाएं, प्रतिगामी सामाजिक ढांचों,शास्त्रों के प्रतिरोध में चिन्हित की गई विषय वस्तु और एक तरह की गीतात्मकता मनजीत की लेखन शैली की विशेषता है …..।’

कवयित्री न केवल सामाजिक संबंधों  और अंतरंग मानवीय रिश्तों के प्रति संवेदनशील है बल्कि वह शब्दों के प्रयोग के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील है। शब्दों की मितव्ययिता सभी कविताओं की विशेषता है। शब्दों और वाक्यों की तराश कविताओं को गंभीरता प्रदान करने में सफल रही हैं l

मनजीत स्वयं स्वीकार करती हैं–

कितना अंतरंग रिश्ता है

कविता और व्यथा का

 

छंदों की आत्मा में

अनायास ही

घुल मिल जाता है

इस दौर की आर्थिक/सामाजिक, राजनीतिक/साँस्कृतिक विकृतियों के विरोध में खड़ी और गहरे मानवीय सरोकारों की पक्षधर इन कविताओं को पढ़ा जाना बहुत जरूरी है।

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ गहरे पानी पैठ – लेखिका : डॉ. मुक्ता ☆ समीक्षक – डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’ ☆

डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’

☆ गहरे पानी पैठ – लेखिका : डॉ. मुक्ता ☆ समीक्षक – डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’

पुस्तक- गहरे पानी पैठ

लेखिका – डॉ मुक्ता

प्रकाशक – SGSH Publications

मूल्य– 350

पृष्ठ संख्या– 264

☆ मानव मूल्यों एवं सामाजिक सरोकारों के बहुमूल्य प्रकरणों का दस्तावेज: गहरे पानी पैठ – डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’ ☆

निबंध लेखन अथवा शैली गद्य साहित्य की एक गूढ़ विधा है जिसे गहरे पानी में बैठने के समान योग साधक की भांति रचनाकार को बैठना पड़ता है, वह भी खुली आँखों के। निबंध के अनेक प्रकार हैं जिनमें सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षिक, ललित एवं चिंतनपरक आदि। विवेच्य निबन्ध संग्रह ‘गहरे पानी पैठ’ के साथ प्रस्तुत होती हैं डॉ मुक्ता। लेखिका एवं कवयित्री साहित्यिक जगत में विलक्षण प्रतिभा की धनी हैं। इनके सर्जनात्मक क्रम में इनकी विलक्षणता को देखा जा सकता है। इनका संपूर्ण साहित्य चुनौतीपूर्ण, दुर्लभ और लीक से हटकर है जिसमें गूढ़ से गूढ़तम रूप में विविध रचनाधर्मिता पाई जाती है। इसलिए हम इन्हें अन्य विद्वानों से विलग श्रेणी में खडा पाते हैं। डॉ मुक्ता जी प्रथमतः काव्य की मर्मज्ञ पाठक हैं, किंतु प्रस्तुत निबंध संग्रह के अतिरिक्त उनके अब तक 300 से अधिक निबंध सामने आ चुके, जो इन्हें निबंध लेखन के क्षेत्र में अग्र-पंक्ति में खड़ा करते हैं। जो अपने आप में साहित्यिक जगत में कीर्तिमान संस्थापित करती हैं। वर्तमान में इनसे अधिक निबंधों का सृजन-प्रकाशन एवं प्रस्तुतिकरण शायद ही अन्य किसी का हो। वह साहित्य की गद्य-पद्य दोनों विधाओं की एक समान मर्मज्ञ एवं अधिकारी विद्वान हैं। मैं जब कभी उनकी रचनाओं को पढ़ने बैठता हूँ तो समझ नहीं पाता कि उनका गद्य पढ़ा जाए या पद्य है। उनके सृजन में गहनता तो है ही, रचनाओं के विषय बड़े सामयिक और सामाजिक मूल्यों से संपृक्त होते हैं, जो एक सजग रचनाकार का पहला दायित्व है। डॉ. मुक्ता ने अपने इस निबंध संग्रह में राष्ट्रव्यापी घटनाओं, मानवीय संवेदनाओं, भावनाओं, पीड़ाओं, नारी-अस्मिता के अतिरिक्त शिक्षाप्रद, प्रेरणादायक एवं साहित्यिक तथा विमर्शगत अथवा चिंतनपरक और सुचिन्तनपरक 75 निबंधों को संगृहीत किया है। 21 वीं सदी अथवा वर्तमान में हिंदी साहित्य को लेकर साहित्यकार डॉ. मुक्ता चिंतातुर है। आज समाज ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, राष्ट्रीयता, सहृदयता तथा कल्याण कारक भावों से दूर होते जा रहा है। मनुष्य परहित के मार्ग से हटकर, स्वहित की ओर उन्मुख हो गया है। वस्तुतः उनका निबन्ध सृजन सद्गुणी एवं सद्मार्गदर्शन से भरपूर सत्य, अहिंसा, प्रेम, दया, करुणा, उदारता, सहनशीलता, संयम एवं त्याग से परिपूर्ण चिंतनशील हैं; यथा- दिशाहीन समाज और घटते जीवन-मूल्यों ने मनुष्य को मानवताहीन बना दिया है, किराये का मकान बनाम घर के अंतर को नजरअंदाज कर युवा पीढ़ी संस्कारहीन हो, नैतिक मूल्यों का ह्रास कर रहें हैं, क्यों? मातृ हंता युवा, ज़िंदगी की शर्त- संधि-पत्र, स्मित-रेखा औ’ संधि, बाल यौन उत्पीड़न समस्या व समाधान, मज़दूरी इनकी मजबूरी आदि जो भी निबंध हैं प्रश्न चिह्न खड़ा करते हैं, चूंकि आज इंसान चलता-फिरता पुतला बन, आरक्षण के सहारे अपने-अपने खेमों में बंटा हुआ गुमशुदगी के रिश्तों के समान सुनता और सहन करता है, अपेक्षा-उपेक्षा से त्रस्त है, साथ ही लेखिका सोचती है कि विभिन्न मंचों पर सुविधा-प्राप्त सम्मान-कितने सार्थक हैं और नारी अस्मिता-प्रश्नों के दायरे में क्यों? यह कैसा राम राज्य है जिसमें कानून, शिक्षा, संस्कार व समाज में ऑनर किलिंग, सेल्फ मैरिज, बढ़ते तलाक, अविश्वास, आधुनिकता व नारी के बदलते तेवर संवेदनहीन हो गए, क्या प्रॉब्लम है? कब थमेगा यह सिलसिला क्या ये काफ़िले चलते रहेंगे, सोचते हैं लोग क्या कहेंगे, पुरुष वर्चस्व, तारीफ़ सुनना, मानसिक प्रदूषण बढ़ गया है, जिंदगी लम्हों की किताब के समान अथवा मौन भी खलता है और लफ़्ज़ों के ज़ायके भी बदल गए हैं, दोस्ती क्या है, सहनशक्ति बनाम दण्ड के मायने बदल गए है, अंतर्मन की शांति भंग हो गई है, खामोशियों की जुबाँ में ज़िन्दगी समझौता बन गई है अब तो लगता है मौन सबसे कारगर दवा है या फिर खामोशी एवं आबरू बचाने का सिलसिला है जहाँ जीवन संभव नहीं, असंभव हो गया, रिश्ते बनाम ग़लतफ़हमी, ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त, अहं बनाम अहमियत, बदलाव बनाम स्वीकार्यता, चिन्ता बनाम पूजा, समय व जिंदगी, उपलब्धि व आलोचना, जुनून बनाम नफ़रत सब अधूरी ख्वाहिशें हैं, ठीक ही कहा है ‘आईना झूठ नहीं बोलता’ इस बदलते परिप्रेक्ष्य में चाहे साहित्यकार और उसकी शब्द साधना, महाभारत नहीं रामायण, उपहार व सम्मान, मनन व आनंद, कभी दोस्ती और क़ामयाबी को खोजती रहे किंतु ज़िंदगी मैं शब्द, तुम अर्थ, शिकायतें कम, शुक्रिया ज्यादा में कहीं खो गई है, इसी बीच कोरोना काल और जीवन के शाश्वत् सत्य- प्रेम, प्रार्थना और क्षमा, हिम्मत, प्यार व परवाह, उम्मीद, कोशिश अथवा रिश्ते बनाम संवेदनाएं, संतान का सुख: संतान से सुख, चाहे कोरोनाकाल में सम्बंधों की बात हो, सब प्रयास विफल ही रहे अर्थात नाकामयाबी ही हाथ लगी।

जहाँ इनके निबंधों का जटिल-साहित्यिक, बोधगम्य रूप सामने आया है, वहीं दूसरी ओर सरल और अपेक्षाकृत महनीय रूप भी। संपूर्णत: इनकी शब्द-शक्ति लोकमंगल से जुड़ी हुई है तथा निबंधकार डॉ. मुक्ता निबंध के भविष्य पर अपने कालखंड को विभिन्न प्रकारों के दृष्टि-पथ में रखकर विचार करती हुई प्रतीत होती हैं। निबंध पाठक की आत्मा और मस्तिष्क दोनों को प्रभावित करने में निहित हैं जो एक प्रकार से प्रेरक, शिक्षाप्रद, अवलोकन और चिंतन की चेतना का स्वत: प्रस्फुटन हैं। लेखिका ने वर्तमान युग में जीवन और साहित्य में भव्यता, जीवन का ह्रास और क्षुद्रताओं, संकीर्णताओं, विषमताओं तथा विकास से चिंतत होकर जीवन और साहित्य को समीक्षित करने तथा सर्वोत्तम ज्ञान-राशि के प्रचार-प्रसार को कारक रूप में प्रस्तुत करती हैं। भौतिकवादी युग में मानव-मन को संतुलित रखने और विश्रांति प्रदान करने का स्तुत्य प्रयास किया है। मानवीय परंपराओं और सामाजिक मूल्यों से सामंजस्य स्थापन हुआ है। सामाजिक सरोकारों के अंतर्गत ही व्यक्ति जनरीतियों, रूढ़ियों, नियमों, सिद्धांतों आदि कुशलताओं और आवश्यक आदतों को सीखता है, इस दृष्टि से ये महत्वपूर्ण निबंध समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। कुल मिलाकर निबंध विविध विषयक प्रकरणों भौतिक और वैचारिक परिवेश का समन्वय के साथ विवेचन प्रस्तुत करते हैं। अभिव्यक्ति में अनेक ऐसे बिंदु- समाज-राजनीति में परिव्याप्त विसंगतियों, विडंबनाओं, विद्रूपताओं तथा भ्रष्टाचार व कदाचार आदि नानारूपों में मुखरित अथवा उपस्थित हुए हैं, जो विमर्शगत अध्ययन का सटीक क्षेत्र बने हैं। संग्रह के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय बोध पहलू का सन्निवेश लेखिका को लोक-जीवन के अधिक-से-अधिक नजदीक लाता है। वह अपने युगीन परिवेश को संपूर्ण गुण-दोषों के साथ अपने निबंधों में चित्रित करने का प्रयास करती है।

प्रकृत संग्रह में लोकतत्त्वों की व्याप्ति और विचारों की व्यापकता इतनी है कि पाठक उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि निबंधकार का भाव एवं विचार पक्ष इतना अधिक गहन है कि समस्त सृष्टि के लोकतत्त्वों को समाए हुए हैं।

यह निबंध-संग्रह शिल्प और लोक-रंजन का अनुपम संग्रह है, जो अवसाद से दूर समाज व सृजन के वृहद लोक में ले जाता है। लेखिका का अभीष्ट भी शायद यही है कि उनका रचा अधिसंख्य पाठकों तक पहुँचे और उनकी ज्ञानग्रंथी को कचोटे। निःसंदेह प्रस्तुत निबंध-संग्रह अथवा आलेख संग्रह जीवन, साहित्य, संस्कृति और लोक के विराट सत्य के अन्वेषण का उपक्रम है जो समुद्र मंथन के समान संग्रहणीय है, साथ ही पठनीय, श्लाघनीय तथा सराहनीय बन पड़ा है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि निबंध-संग्रह ‘गहरे पानी पैठ’ समाज के भिन्न-भिन्न अंगों में संतुलन बनाए रखने का सद्प्रयास करते हैं। लेखिका का आग्रह भी शाश्वत है कि साहित्य, नित्य परिवर्तनशील समाज का वास्तविक रूप प्रतिनिधित्व करे तथा समाज के पुनर्गठन के लिए सृजन में नए-नए विचारों को प्रस्फुटित करें। यदि साहित्य को एक रचनात्मक शक्ति के रूप में अपना दायित्व निर्वहन करना है तो साहित्यकार को नवीन विचारों की देन में समाज का नेतृत्व करना होगा, यही राजधर्म, राष्ट्रधर्म, साहित्यधर्म एवं मानव धर्म है। उक्त संदर्भ में डॉ मुक्ता का रचना संसार समग्रतः समसामयिक समाज के अनुरूप सटीक एवं सार्थक रूप में सृजित है। पुस्तक छात्र-छात्राओं, विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के लिए बहुत उपयोगी है। चूंकि जो साहित्य सम्पूर्ण समाज का हित, कल्याण और सुसंस्कारों से सुसज्जित होता है वह सदैव उपयोगी होता है। जहाँ चिंतन और मंथन है वहाँ भाषा गम्भीर और तत्सम प्रधान है, अतः निबंधों की भाषा विषयानुसार है। सहज, सरल प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग निबंधों को बोधगम्य बनाता है।

© डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’

साहित्यालोचक एवं अनुवादविद

चरखी दादरी, हरियाणा, मो. 81999-29206

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बाल साहित्य: कल, आज और कल – लेखिका: डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है लेखिका : डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ जी द्वारा लिखित बाल साहित्य: “कल, आज और कलकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २१५ ☆

☆ बाल साहित्य: कल, आज और कल – लेखिका: डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’

 

पुस्तक समीक्षा: बाल साहित्य: कल, आज और कल

लेखक: डॉ. रामेश्वरी नादान‘ 

प्रकाशक: रावत डिजिटल (बुक पब्लिशिंग हाउस), गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश 

ISBN: 978-81-990525-1-2 

प्रथम संस्करण: 2025 

मूल्य: 150.00 

पृष्ठ संख्या: 66 

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

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डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ की पुस्तक बाल साहित्य: कल, आज और कल बाल साहित्य के क्षेत्र में एक संक्षिप्त किंतु गहन शोध कार्य है। 66 पृष्ठों की यह पुस्तक बाल साहित्य के इतिहास, वर्तमान और भविष्य को समेटती है और इसका आकर्षक, सुंदर व नयनाभिराम कवर पाठकों को तुरंत अपनी ओर खींचता है। यह पुस्तक शिक्षकों, लेखकों, शोधकर्ताओं और बाल साहित्य प्रेमियों के लिए एक उपयोगी संसाधन है।

कथानक और संरचना- पुस्तक का अनुक्रम व्यवस्थित और व्यापक है, जो बाल साहित्य की उत्पत्ति, संरचना, विधाओं और डिजिटल युग में इसके विकास को रेखांकित करता है। लेखिका ने प्रमुख लेखकों और उनके योगदान को शामिल किया है, साथ ही अपनी साहित्यिक यात्रा को भी साझा किया है, जो इसे व्यक्तिगत और प्रेरणादायक बनाता है। पुस्तक में कॉमिक्स, विज्ञान कथाओं और डिजिटल माध्यमों जैसे आधुनिक आयामों पर भी ध्यान दिया गया है।

इस पुस्तक में प्रमुख बाल साहित्यकारों का उल्लेख किया गया हैं। आबिद सुरती: भारतीय कॉमिक्स के क्षेत्र में अग्रणी, जिन्होंने ‘बाहादुर’ जैसे किरदारों से बच्चों को रोमांचक कहानियाँ दीं। अनंत पई: ‘अमर चित्र कथा’ के संस्थापक, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और इतिहास को बच्चों तक पहुँचाया। परशुराम शर्मा: बाल साहित्य में हास्य और मनोरंजन के लिए जाने जाते हैं, उनके कार्य बच्चों को आकर्षित करते हैं। शंकर सुल्तानपुरी: वरिष्ठ साहित्यकार, जिनकी रचनाएँ बच्चों में नैतिक मूल्यों को प्रोत्साहित करती हैं। देवेंद्र मेवाड़ी: विज्ञान कथाओं के माध्यम से बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने वाले लेखक। प्रकाश मनु: कविता और कहानियों के जरिए बच्चों के लिए प्रेरणादायक साहित्य रचने वाले साहित्यकार। डॉ. घमंडीलाल अग्रवाल: बाल साहित्य में गहन और विचारोत्तेजक रचनाओं के लिए प्रसिद्ध। दीनदयाल शर्मा: बच्चों के लिए सरल और शिक्षाप्रद कहानियाँ लिखने वाले साहित्यकार। ओमप्रकाश क्षत्रिय: बाल साहित्य में योगदान देने वाले लेखक, जिनकी रचनाएँ प्रेरणादायक और रोचक हैं। शकुंतला कालरा: महिला साहित्यकार, जिन्होंने बच्चों के लिए संवेदनशील और भावनात्मक कहानियाँ लिखीं। बसंती पंवार: बच्चों के लिए प्रेरक और नैतिक कहानियों की रचनाकार, जिनके कार्य सराहनीय हैं। क्षमा शर्मा: बाल साहित्य में महिलाओं की भूमिका को सशक्त करने वाली लेखिका। नीलम राकेश: बच्चों के लिए कविताओं और कहानियों के माध्यम से सृजनात्मकता को बढ़ावा देती हैं। कमलेश चंद्राकर: समकालीन बाल साहित्य में सक्रिय, जिनकी रचनाएँ बच्चों को आकर्षित करती हैं। मुकेश नौटियाल: बच्चों के लिए रोचक और मनोरंजक कहानियाँ लिखने वाले चर्चित लेखक। मनोहर चमोली ‘मनु’: वर्तमान बाल साहित्य में अग्रणी, जिनके कार्य बच्चों में रचनात्मकता जगाते हैं। अर्चना त्यागी: समकालीन लेखिका, जिनकी रचनाएँ बच्चों के लिए प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं। 

विश्लेषण और मूल्यांकन- डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ ने इस पुस्तक में बाल साहित्य के ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों पहलुओं को संतुलित ढंग से प्रस्तुत किया है। लेखन शैली सरल, स्पष्ट और शोधपरक है, जो इसे सामान्य पाठकों और विशेषज्ञों दोनों के लिए उपयोगी बनाती है। पुस्तक का सबसे मजबूत पक्ष इसका व्यापक दृष्टिकोण है, जो आबिद सुरती और अनंत पई जैसे कॉमिक्स लेखकों से लेकर प्रकाश मनु और शकुंतला कालरा जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों तक को समेटता है।

विज्ञान कथाओं में देवेंद्र मेवाड़ी और डिजिटल युग में बाल साहित्य के महत्व पर लेखिका का विश्लेषण समकालीन संदर्भों को रेखांकित करता है। हालाँकि, 66 पृष्ठों की संक्षिप्तता के कारण कुछ विषयों, जैसे कमलेश चंद्राकर और अर्चना त्यागी जैसे लेखकों के कार्यों का विस्तृत विश्लेषण, और गहराई माँगता है। कुछ और उदाहरण या केस स्टडीज से पुस्तक और प्रभावी हो सकती थी। फिर भी, यह अपने उद्देश्य में सफल है।

पुस्तक का कथानक और संदेश- पुस्तक का केंद्रीय संदेश है कि बाल साहित्य बच्चों की कल्पनाशीलता, नैतिकता और रचनात्मकता को आकार देने में महत्वपूर्ण है। शंकर सुल्तानपुरी और बसंती पंवार जैसे लेखकों के नैतिक मूल्यों पर आधारित कार्यों से लेकर मनोहर चमोली ‘मनु’ और मुकेश नौटियाल जैसे समकालीन लेखकों की रचनाओं तक, यह पुस्तक बच्चों के लिए साहित्य की प्रासंगिकता को दर्शाती है। डिजिटल युग में बच्चों के लिए साहित्य को सुलभ और रोचक बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।

निष्कर्ष और सिफारिश– बाल साहित्य: कल, आज और कल एक विचारोत्तेजक और जानकारीपूर्ण पुस्तक है, जो बाल साहित्य के प्रति उत्साही पाठकों, शिक्षकों, लेखकों और शोधकर्ताओं के लिए उपयुक्त है। यह आबिद सुरती, अनंत पई, शकुंतला कालरा, और अर्चना त्यागी जैसे लेखकों के योगदान को उजागर करती है। मैं इसे 4.5/5 की रेटिंग देता हूँ। इसकी संक्षिप्तता और व्यापक कवरेज इसे मूल्यवान बनाती है। यह पुस्तक विशेष रूप से उन लोगों के लिए अनुशंसित है जो बाल साहित्य के विकास और इसके भविष्य में रुचि रखते हैं।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

03/07/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 188 ☆ पुरातात्विक विरासत का संरक्षण:  चुनौतियाँ और समाधान ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है “पुरातात्विक विरासत का संरक्षण:  चुनौतियाँ और समाधानपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 188 ☆

☆ पुरातात्विक विरासत का संरक्षण:  चुनौतियाँ और समाधान – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

भारत की पुरातात्विक विरासत विश्व के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक खजानों में से एक है। मोहनजोदड़ो से लेकर खजुराहो, नालंदा से लेकर हम्पी तक, ये स्थल न केवल हमारे गौरवशाली अतीत के प्रतीक हैं, बल्कि इतिहास, वर्तमान और भविष्य के लिए शिक्षा, पर्यटन और राष्ट्रीय पहचान का आधार भी हैं। इन स्थलों की वर्तमान दशा चिंताजनक है। अतिक्रमण, पर्यावरणीय क्षति, उपेक्षा और अज्ञानता के कारण यह विरासत धीरे-धीरे नष्ट हो रही है। हमारी कितनी ही पुरातात्विक सम्पदा तस्करों द्वारा चोरी की गई तथा दुनियां भर के कई संग्रहालयों तक मंहगी कीमतों में पंहुचाई गई है। सोने के सिक्कों की लालच में कितने ही किलों की दीवारें क्षतिग्रस्त कर दी गई हैं।

भारत में 3, 600 से अधिक पुरातात्विक स्थल हैं, जिनमें से कई यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। परंतु इनमें से अधिकांश स्थल गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

अतिक्रमण और अवैध निर्माण: दिल्ली के पुराने किले के आसपास की अवैध बस्तियाँ या आगरा में ताजमहल के निकट प्रदूषण इसके उदाहरण हैं।  

प्राकृतिक क्षति: मानसून, भूकंप और वनस्पतियों के बढ़ने से स्थलों की संरचना कमजोर होती है। उदाहरणार्थ, कोणार्क के सूर्य मंदिर का क्षरण।  

पर्यटन का दबाव: ताजमहल जैसे स्थलों पर प्रतिदिन हजारों पर्यटकों के आने से संरचनात्मक दबाव बढ़ता है।  

चोरी और तस्करी: प्राचीन मूर्तियों और कलाकृतियों की अवैध तस्करी एक बड़ी समस्या है। 2021 में, तमिलनाडु से चुराई गई 250 से अधिक मूर्तियाँ विदेशों में बरामद की गईं।

जागरूकता की कमी: स्थानीय समुदायों को इन स्थलों के ऐतिहासिक मूल्य का एहसास नहीं है, जिससे उपेक्षा बढ़ती है। पर्यटक स्वयं का नाम इन महत्वपूर्ण स्थलो की दीवारों पर लिख कर उन्हें क्षति पहुंचाते हैं। इस सब के बावजूद, सुरक्षा और संरक्षण के प्रयास भी सराहनीय हैं।

संरक्षण में युवाओं की भूमिका .. युवा समाज का सबसे गतिशील और प्रौद्योगिकी-साक्षर वर्ग है। उनकी भागीदारी से पुरातत्व संरक्षण को नई दिशा मिल सकती है।

युवा सोशल मीडिया के माध्यम से विरासत के महत्व को प्रचारित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, हैशटैग #SaveOurHeritage जैसे अभियान चलाये जा सकते हैं। स्वयंसेवी समूह बनाकर ‘युवा भारत फॉर हेरिटेज’ जैसे संगठन सक्रिय किये जा सकते हैं जो साइटों की सफाई और डॉक्यूमेंटेशन में मदद करते हैं।  

तकनीकी नवाचार: युवा ड्रोन, 3D मॉडलिंग और AR/VR तकनीक से साइटों का डिजिटल संरक्षण कर सकते हैं। कोविड के दौरान ‘वर्चुअल संग्रहालय’ की लोकप्रियता इसका उदाहरण है।  

शैक्षिक पहल: कॉलेजों में पुरातत्व क्लब बनाकर युवाओं को जोड़ा जा सकता है। एनएसएस और एनसीसी जैसी संस्थाओ के कार्यक्रमों में पुरातात्विक संरक्षण को शामिल किया जाना चाहिए।

सामुदायिक नेतृत्व: युवा स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करके उन्हें संरक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बना सकते हैं।  उदाहरण के तौर पर, गुजरात के धोलावीरा में युवाओं ने ऐप विकसित करके पर्यटकों को साइट की जानकारी दी, जिससे जागरूकता बढ़ी।

संरक्षण के उपाय.. पुरातात्विक विरासत को बचाने के लिए निम्नलिखित उपाय कारगर हो सकते हैं: 

– वैज्ञानिक प्रबंधन: पत्थरों और भित्तिचित्रों को संरक्षित करने के लिए रासायनिक उपचार और जल निकासी व्यवस्था आवश्यक है।  

कानूनी सख्ती: ‘प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1958’ को और सशक्त बनाने की आवश्यकता है। अवैध खुदाई और तस्करी पर कठोर दंड होने चाहिए।  

सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय लोगों को पर्यटन से गाइड के रूप में जोड़कर या पर्यटको के लिये उपयोगी किताबों की बिक्री, खान पान की स्थानीय वस्तुओ आदि के विक्रय से उन्हें आर्थिक लाभ पहुँचाना।

निजी-सार्वजनिक भागीदारी: ‘अडॉप्ट ए हेरिटेज’ योजना के तहत कॉर्पोरेट्स को साइटों के रखरखाव की जिम्मेदारी दी जा सकती है।  

जलवायु अनुकूलन: समुद्र तटीय स्थलों जैसे महाबलीपुरम को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाने के लिए विशेष योजनाएँ बनाना।  

सरकार की जवाबदारी ..केंद्र और राज्य सरकारों को उनकी भूमिकाएँ निभानी होंगी: 

पर्याप्त बजट आवंटन: पुरातत्व विभाग को संसाधन मुहैया कराना। वर्तमान में, भारत का पुरातत्व बजट अमेरिका या यूरोप के मुकाबले नगण्य है।  

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: यूनेस्को और इकॉमोस जैसे संगठनों के साथ मिलकर प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता लेना।  

कानूनों का क्रियान्वयन:ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) को अधिक अधिकार देकर अतिक्रमण हटाने में सक्षम बनाना।  

शिक्षा और शोध: पुरातत्व विभागों को आधुनिक उपकरणों से लैस करना और विश्वविद्यालयों में शोध को प्रोत्साहित करना।  

सतत पर्यटन:ई-टिकटिंग, समय-सीमित प्रवेश और पर्यावरण-अनुकूल सुविधाएँ विकसित करना।  

सरकार की ‘राष्ट्रीय विरासत मिशन’ जैसी योजनाएँ सराहनीय हैं, लेकिन इन्हें गति देने की आवश्यकता है।

स्थानीय प्रशासन का कर्तव्य .. स्थानीय निकायों की भूमिका अहम होती है: 

नियमित निगरानी: साइटों के आसपास अवैध निर्माण रोकने के लिए सचेत रहना।  

कचरा प्रबंधन: ताजमहल जैसे स्थलों के निकट प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र घोषित करना।  

आपदा प्रबंधन: बाढ़ या भूकंप जैसी आपात स्थितियों के लिए योजनाएँ तैयार रखना।  

सामुदायिक जुड़ाव: स्थानीय लोगों को साइटों के इतिहास से अवगत कराने के लिए कार्यशालाएँ आयोजित करना।  

सुरक्षा उपाय: CCTV और सेंसर लगाकर चोरी रोकना।  

उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में सांची स्तूप के आसपास स्थानीय प्रशासन ने सौर ऊर्जा से चलने वाली रोशनी की व्यवस्था की है, जिससे रात्रि पर्यटन को बढ़ावा मिला है।

पुरातात्विक विरासत का संरक्षण केवल सरकार या विशेषज्ञों का नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग का दायित्व है। युवाओं की ऊर्जा, सरकार की नीतियाँ, स्थानीय प्रशासन की कार्यवाही और जनता की जागरूकता—इन सभी के समन्वय से ही हम अपने इतिहास को भविष्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं।  हमारी सभ्यता की परीक्षा इस बात में है कि हम अपने इतिहास को कितना सम्मान देते हैं।  

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बुन्देली दिवस विशेष – पर्यावरण महत्व एवं संरोधन ☆ आत्मकथ्य – स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ☆

🟢 पुस्तक चर्चा 🟢 पर्यावरण महत्व एवं संरोधन 🟢 आत्मकथ्य – स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव 🟢

(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)

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(एक सितंबर को बुंदेली दिवस समारोह – जबलपुर। बुंदेली लोक साहित्य के विद्वान, भाषा विज्ञानी डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 109वीं जयंती एवं 36वां बुंदेली दिवस समारोह सोमवार 1 सितंबर को संध्या 6.30 बजे से शहीद स्मारक भवन में गुंजन कला सदन एवं नगर की संस्थाओं द्वारा आयोजित है । इस अवसर पर स्मृति शेष डॉ. श्रीवास्तव की पुस्तक “पर्यावरण महत्व एवं संरोधन” के विमोचन के साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं विषयों के विद्वानों का अभिनंदन किया जाएगा । बुंदेली गीतों एवं नृत्यों के साथ ही पूर्व में सम्पन्न चित्रकला एवं बुंदेली नृत्य श्री प्रतियोगिता के विजेता भी पुरस्कृत होंगे ।)

आत्मकथ्य –  विकास के साथ विनाश – स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव

कहा जाता है, विकास के साथ विनाश भी चलता है। आज विज्ञान के युग में यह स्पष्टत: देखने को मिल रहा है। युगाधनों पूर्व जंगलों में जीवन बिताने वाले, नग्न फिरने वाले अथवा वल्कल और पत्राच्छादन का उपयोग करने वाले मृगयाचारी मनुष्य ने आज अपने लिये कितनी सुविधायें जुटा ली हैं-यह लिखने-बताने की बात नहीं रह गई। आज का मनुष्य उन्हीं सुविधाओं के बीच जी रहा है। यह एक अलग बात है कि कोई अधिक सुविधायें समेट सका है और कोई उनके लिए विकल है। यह वह स्थिति है जिसे विकास कहा जायेगा, किन्तु क्या यह सत्य नहीं है कि उसी विज्ञान ने हीरोशिमा का सत्यानाश कर दिया था और उसी ढंग से चलते चलने पर क्या संपूर्ण पृथ्वी पर का जीवन समाप्त नहीं हो सकता? हो सकता है क्योंकि मनुष्य वैचारिक-प्रदूषण के लपेटे में भी आ गया है।

पर्यावरणिक स्थितियाँ अत्यधिक चिन्ताजनक हो रही हैं। प्रकृति का संतुलन पूर्णत: डाँवाडोल हो रहा है। ओजोन की परत पतली पड़ रही है अथवा उसमें छिद्र हो गये हैं, कार्बनडायआक्साइड की मात्रा वायुमण्डल में आवश्यकता से अधिक हो रही है परिणामत: पृथ्वी पर ताप बढ़ रहा है। इसके कारण जिन भागों में सदा बर्फ जमा रहता था वे भी उससे प्रभावित होंगे, बर्फ पिघलेगा, समुद्र की सतह ऊँचे उठेगी और अनेक भूखंड जल मग्न हो जायेंगे। कारणों की खोज करने वाले विद्वानों का कहना है कि यह सब इसलिये होगा कि वनों की हरीतिमा आज वैसी नहीं रह गई, जैसी सौ-पचास वर्ष पूर्व तक थी।

प्रकृति के संगठक तत्वों में, जो स्वाभाविक अनुपात होता है, उसे विलोड़ा जा रहा है। इस विलोडऩ को बहुत कुछ सम्हालने की शक्ति वनों में हैं, किन्तु विशेषज्ञों की राय की चिन्ता न कर समाज ऐसे मार्ग पर चल रहा है कि पीछे हटने की दशा की चर्चा करना व्यर्थ है। आगे बढऩा असंभव हो जायगा, यह कहना भी अपर्याप्त है। कहना यह चाहिये कि जहाँ वह है, वहाँ भी नहीं रह सकेगा-उसका जीवन ही नहीं रह जायेगा।

कुछ वर्षों पूर्व की, उन वर्षों के आसपास की बात है जब मालगुजारी समाप्त हो रही थी, मुझे छोटी पहाडिय़ों पर लहकने वाले उन जंगलों को देखने का अवसर मिला जिन्हें मैंने अपने बाल्यकाल में देखा ही नहीं था, बल्कि जिनमें भ्रमण करने का नित्य ही मुझे सुयोग मिलता रहा। उस समय के वनों का मेरे मानस पटल पर अभी भी बिम्ब है। वे जंगल कोई सरकारी जंगल न थे, ऐसे जंगल थे जिनमें सामान्यत: सतकठा के पेड़ थे, बड़े पेड़ थे महुआ, चार, सेझा, बरसज के अच्छे मोटे और प्राय: 15-20 फुट ऊँचे और उन पेड़ों के बीच-बीच करौंदा, मकोय, कत्था, अमलतास, सिहारू आदि के मँझोले कद वाले पेड़ थे, झाडिय़ाँ थीं, पर क्या खूब अपनी गरिमा में। निकटस्थ गाँव जो एक प्रकार से हरी-भरी पहाडिय़ों के करखा में ही बसे थे और दो-तीन सौ घरों से अधिक आबादी वाले नहीं थे। निवासियों में 8-10 घर ब्राह्मणों के, 3-4 कुरमियों के, 2-3 घर कोरियों के, 5-6 घर गड़रियों के, 12-15 घर अहीरों के, 1-2 लुहारों के, 6-7 चर्मकारों के और शेष कोल, भुमियों और गौंड़ों के थे। बहुसंख्यक कोल, भुमिया और गौंड़ ही कहलाये। ब्राह्मण तो खेती-पाती और पुरोहिती करते, लुहार, चमार अपना धंधा करते, कोरी बाजार से सूत खरीदकर खादीनुमा कपड़े बुनते, गड़रिया और अहीर गाडऱ (भेड़) और गाय-भैंस पालते। यों दो-चार जानवर तो कोल-भुमिया और गौंड़ों के पास भी रहते थे पर उनका जीवन पूर्णत: सवर्णों के यहाँ खेती में मजदूरी पर काम करना था। उनकी स्त्रियाँ जंगलों से सूखी लकडिय़ाँ एकत्र कर उनकी लम्बी ‘मोरी’ बनाकर निकट के नगर में बेचने जाती थीं। कुछ लोग चार से चिरौंजी बनाते- बेचते, कुछ शहद एकत्र करते थे इत्यादि। पशु जंगल में चरने जाते थे। मालगुजार की ओर से कोई चरू नहीं लिया जाता था। ग्राम के चतुर्दिक हरियाली का सुंदर परिदृश्य था।

फिर कुछ वर्ष बाद मैंने उन्हीं पहाडिय़ों और जंगलों को देखा। भारतीय अब तक स्वतंत्रता का अर्थ अपने ढंग से लगा कर स्वयं को निर्बंध समझने लगे थे। अपने पहाड़, अपनी घाटियाँ, अपनी नटियाँ, अपनी पटियाँ और अपने महुआ, अपने कहुआ का भाव मर्यादाएँ लाँघने लगा और हर व्यक्ति स्वार्थ पूर्ति की ललक लेकर जंगलों के शोषण पर उतारू हो गया, अंधाधुंध कटाई की गई। उधर प्रकांडरों पर कुल्हाड़ी चली और इधर देखा ये गया कि वह कुल्हाड़ी मनुष्य के ही पैरों पर पड़ रही है तथा उनका वह स्वरुप जिसका चित्र ऊपर दिया गया है, बदलने लगा-गिरावट की ओर जाने लगा। वह स्थिति ही मुझे अच्छी नहीं लगी। पहाडिय़ों पर से हरीतिमा का कवच समाप्त हो रहा था, वे मुंडी हो चली थीं। तब मैंने जबलपुर से निकलने वाले ‘युगारम्भ’ मासिक में एक लेख लिखा था ‘जंगलों में हरियालियाँ लहकना चाहिये। ’ यह आज से कई दशक पहले की बात है किन्तु एक लेख की कौन परवाह करता है, पर स्थिति चित्रण देकर मैंने अपने दुखी मन को रिक्त किया, यह मुझे संतोष रहा। भारतीय पत्र-संसार में कदाचित वह पहला लेख था।

लोग और शासन दोनों यों नहीं मानते। अपने ढंग से चलने लगे हैं। शासन की भी तो ऐसी स्थिति हो गई है कि हम कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते पर फिर भी, हमारे भीतर से कोई बोलता है कि हम अपना धर्म पूरा नहीं कर रहे 29 अगस्त 1989 को कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता पं. कमलापति त्रिपाठी ने एक बयान दिया कि ‘राजनीति में अपराधियों की बढ़ती घुसपैठ हो चली है और पदाधिकारियों के पद बेचे जाते हैं। यह सुनने पर आश्चर्य होता है कि राजनीतिक दलों का पदाधिकारी बनने के लिये दलीय आस्था, दल की नीति एवं कार्यक्रमों के प्रति समर्पण का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। ’ यह शीर्ष पर पहुँचे उन व्यक्तियों से सम्बंधित बात है जो देश के विकास के लिए धर्म निष्ठता पीकर मानसिक विकृतियों में जा फंसे हैं। वनों का विनाश उनके देखते-देखते ही हो रहा है। परिणाम भी वे खुली आँखों से देख रहे हैं।

अभी दो वर्ष पूर्व फिर वही पहाडिय़ाँ देखीं और उन पर की हरियाली भी। कुछ नहीं रह गया। इसका चित्र मैंने इसी पुस्तक के अन्त में दी गई रचना ‘वनचारी पशु पक्षियों द्वारा प्रजातंत्र की माँग’ में किया है।

एक बात मैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि ऊपर जो कुछ लिखा है वह एक छोटे से क्षेत्र की बात है और उन जंगलों की है जो मालगुजारी थे पहले। पर, जंगल काटने के अपराध का प्रसार पूरे देश में फैला और जनसाधारण उन्हें उजाड़ते यह भूल गया कि इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। देश में आज स्थिति विकराल है।

वनों को केन्द्रक मानकर यदि विचार किया जाय तो हमारे सामने अनेकानेक और भी समस्याएँ उनके विनाश से सम्बद्ध हो जाती हैं। वन्य प्राणियों की संख्या में गिरावट-यहाँ तक कि कुछेक वनचारियों की प्रजाति ही समाप्त होने की स्थिति में पाई जा रही है, देश में वर्षा का असंतुलित वितरण पाया जा रहा है, भूगर्भ जल में कमी हो रही है, कहीं बाढ़ आती है, कहीं सूखा पड़ रहा है, औषधि-उपचार के लिए उपलब्ध होने वाली आवश्यक जड़ों, कंदों और वनस्पतियों की विलुप्ति हो रही है।

भारत के विकास हेतु विभिन्न प्रकार की परियोजनाओं के अन्तर्गत बाँधों के निर्माण और उद्योगों संयंत्रों के स्थापन से विभिन्न प्रकार का गैसीय प्रदूषण बढ़ रहा है। नदियों का जल दूषित हो रहा है। यहाँ तक कि समुद्र भी प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं।

और, देश का दुर्भाग्य यह है कि इस समय वैचारिक-प्रदूषण सर्वोच्च स्थिति बनाये हुए है। आध्यात्मिकता के आधार पर जीवन-यापन करने वाले देश में आध्यात्मिकता के सारे सिद्धान्त, सारे सूत्र मिट रहे हैं। एकत्व की भावना का विनाश हो गया है। भ्रष्टाचार- स्वार्थ और तेरी-मेरी बातों में देश के चोटी के नेता भी उलझ रहे हैं। हम यह टिप्पणी नहीं करना चाहते थे परन्तु अपने सीने पर हाथ रखकर यदि कोई सच बोलना चाहेगा तो यही कहेगा। 29 अगस्त 1989 को कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता पं. कमलापति त्रिपाठी ने जो बयान दिया उसका सार तत्व यही है कि मनुष्य कितने वैचारिक प्रदूषण में पगा हुआ है। अन्य सारे प्रदूषण भी बुनियाद रुप में हमारी दृष्टि में मनोविकार है। पर्यावरण के प्रदूषण का इतना हो-हल्ला मचने के बाद भी आखिर क्यों अपेक्षित जन-जागृति नहीं है? और जहाँ है भी वहाँ यह भी देखा जा रहा है कि यदि शासन की ओर से उस दिशा में कुछ किया जाता है तो ऐसा विरोध होता है कि उसमें रचनात्मक दृष्टि, संवेदनशीलता और सहयोग की प्रवृत्ति का अभाव नजर जाता है।

शासकीय स्तर पर पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति पाने के लिए तथा अन्यान्य संलग्न समस्याओं का सामना करने के लिए वन संरक्षण, पशु-पक्षियों की गिरती संख्या के सुधार के लिए अभारण्यों के स्थापन का कार्य हाथ में लिया गया है। इंडियन वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट (1972) इसीलिये बनाया गया है। बहुउद्देशीय परियोजनाएँ भी कार्यशील हैं। इनकी संख्या भी प्रतिवर्ष बढ़ाई जा रही है और पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए तो सारे विश्व द्वारा उपाय खोजे जा रहे हैं, किन्तु एक समस्या सुलझाने में दूसरी समस्या सामने या जाती है, तीसरी आ जाती है और असफलताओं का एक चक्र तैयार हो जाता है।

हमारी दृष्टि से वनों को संरक्षण देने और उनके विकास-विस्तार के कार्यक्रम का क्रियान्वयन समयबद्ध होना चाहिए। जहाँ भी वन लगाये जाएँ स्वाभाविकता का ध्यान रखा जावे। आशय यह है कि केवल पेड़ों को लगा देने से ही जंगल नहीं बन जाता। वन केवल कुछ खास पेड़ों के समूह ही नहीं हुआ करते। वे तो अनेकानेक जड़ी-बूटियों, जनोपयोगी फलों, कन्द-मूल आदि सहित बहुविध झाडिय़ों-लता-गुल्मों के झुरमुटों का निर्माण करते हुए ऐसे होते हैं जिनमें सैकड़ों प्रकार के वन्य प्राणी और पक्षी पलते हैं तथा जो बादलों को आकृष्ट कर जल वृष्टि की दिशा में उपयोगी होते हैं जो भूक्षरण को रोकते हैं, जिनके झरे हुए पत्ते धरती पर बिछकर वर्षाजल को एकदम बह जाने से रोकते हैं और बरसे हुए जल को भूगर्भ में प्रविष्ट करने में सहायक होकर आगे की शुष्क ऋृतु में झरनों की निरन्तरता बनाते हैं तथा जो पर्यावरण को प्रदूषण से विमुक्त रखते हैं।

पुरातन युग में पेड़-पौधों अथवा वनों को बहुआयामी महत्व दिया गया था। मनुष्य उनसे एकमएक होकर स्वयं को संवर्धित करने में उनका सहयोग पाता था तथा उनके प्रति कृतज्ञ होकर किस प्रकार उनकी पूजा भावना से अभिभूत हुआ था इस संबंध में हमने आगे किंचित विस्तार से विचार किया है, उनके बीच रहकर अनेकानेक प्रकार के मानवेतर प्राणियों को उसने किस दृष्टि से देखा है और अपने लिये उनका कितना क्या कैसा मूल्य माना है। इस संबंध में भी हमने जनसाधारण के बीच प्रचलित पूजा-भावना का चित्रण किया है। इससे स्पष्टत: यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिये कि विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों और प्राणियों एवं प्रकृति के अन्य उपादानों के बीच ही मनुष्य की स्थिति है। जीवन का एकाधिकार केवल उसे ही नहीं मिला है। अवश्य ही उसमें बुद्धिचातुरी है। पर इसका यह आशय नहीं कि वह केवल स्व अर्थ ही देखे। आज मनुष्य की आकांक्षायें-लालसायें प्रकृति के साथ अतिवादी, आक्रामक रुख अपनाने के लिये बाध्य कर रही है। कैसी विडम्बना है कि उसकी स्वयं में केन्द्रित भौतिक-कल्याण अथवा सुख सुविधा की भावना उसके ही अकल्याण का मार्ग प्रशस्त करे उसे अधिक सतर्क होकर चलने की आवश्यकता है। अतीत में मानव समाज ने पेड़ पौधों और मनुष्येतर प्राणियों का जो मूल्यांकन किया है, यह उसका कोई पागलपन नहीं था। उनके संरक्षण उनके हित में मनुष्य का कल्याण भी अंगीभूत है। यह समझ उसमें थी पर यह समझ आज हममें नहीं है। समय की इतनी लम्बी यात्रा में इस दिशा में हमने बहुत कुछ खोया है और आज भी खो रहे हैं। अपनी सफलताओं की दिशा में आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों से भरी दम्भोक्तियों में गर्क शायद हम तब तक नहीं चेतेंगे जब तक पूर्णत: नष्ट नहीं हो जाते। जब हम नष्ट हो जायेंगे तब क्या कोई मनु पृथ्वी पर मानव जीवन का प्रसार करने के लिये प्रकट होगा? कैसे मालूम है ?

पर्यावरण प्रदूषण की समस्या इतनी मामूली नहीं है जितनी समझी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के कत्र्तव्य से सम्बद्ध है यह बात कि वह इससे विमुक्त होने के उपायों में हाथ बँटाये। पर्यावरण संबंधी विकृति के संबंध में विचार करते हुये येले विश्वविद्यालय के प्राध्यापक जे. डोलाई तथा एल. डब्लू डोस कहते हैं कि इसके कारण मनुष्य में आक्रामकता एवं हिंसा की वृद्धि होती है। पर्यावरण के विघटन के कारण अंत:करण का भी विघटन होता है जो कि स्वयं को नष्ट तो करता ही है, बहिर्मुख होकर दूसरों को भी चपेट में ले लेता है। देश-विदेश में होनेवाली हिंसक घटनाओं में वृद्धि का मूल कारण पर्यावरण का विकृति जनित वैचारिक प्रदूषण है।

इक्कीसवी सदी की ओर हम बढ़ आये हैं। पर किन उपलब्धियों के साथ? इस पर लौट-लौटकर विचार करना आवश्यक है। सिंहावलोकन इसी को कहते हैं।

अतीत की कथाओं में अनुस्यूत तब के मानव की सूझ भी हमें ‘हम’ बनाये हुये हैं। पर अब हम किसी की सुनते ही नहीं। आज कल ‘मैं’ को ‘हम’ कहा जाना लगा है।

‘मैं’ और ‘हम’ के ठीक अर्थ को न समझने के कारण ही हम आधि-व्याधि ग्रसित हैं, ठीक अर्थ को समझता था पुरातन युग का मनुष्य, जो बहुत सरल था। सरलता व्यक्तियों में नहीं समाज में थी व्यक्ति स्वयं था भी नहीं कुछ। उसका मूल्य समाज में ही था। समाज से अलग भी वह कुछ है, इसका उसे बोध न था। था भी तो बहुत कम। आज भी यदि हम आदिवासियों के बीच जायें तो हम पायेंगे कि उनमें ‘मैं’ का विचार कम है, ‘हम’ का ख्याल अधिक है। उनकी कुछ भाषायें तो ऐसी हैं जिनमें ‘मैं’ नहीं है, ‘हम’ ही है, आदिवासी कबीलों में समस्यायें ढेर सारी हैं, पर प्राय: सब ‘हम’ वाली हैं। आदिवासी बोलता है, तो बोलता है ‘हम’। वहाँ ‘मैं’ का कान्सेप्ट ही पैदा नहीं हुआ

‘हम’ के कान्सेप्ट वाले क्षेत्र में एक व्यक्ति के तार दूसरे से जुड़े रहते हैं। तभी तो ‘हम’, ‘हम’ हैं, आज के पढ़े-लिखे मनुष्य से ‘हम’ दूर हटता जा रहा है, अत्यंत व्यक्तिवादी होता जा रहा है। तभी तो किसी कार्य को हाथ में लेने पर एक स्वर से ‘हैइया’ नहीं हो पाता और असफलता हाथ लगती है। कहा जाता है, देश को एकता की जरूरत है। पर कैसे हो? बुद्धि तत्व ‘हम’ को पीछे ढकेल रहा है। सब व्यक्ति-वादी होकर स्वार्थ साधन में दूसरों की ओर से आँखें बंद करके चल रहे हैं, किसी भी दिशा में हमारी सामूहिक एकता के दर्शन नहीं होते। जागृत मनुष्य से अच्छी तो निर्बुद्धि भेड़ें हैं जो एक दूसरे के पीछे लमडोर बनाये हुए चलती हैं। उनमें आगे-पीछे रहने-होने का झगड़ा भी नहीं होता। एक जिस ओर चली, दूसरी उसके पीछे चल देती है। भेड़ों को चलते हुये देखें तो लगता है ‘हम’ चल रहा है। एक ही जीवन सरक रहा है। आकाश में बादल आये, बिजली कौंधे-कडक़े, तो वे एक दूसरे पर सिमट जाती हैं, एक ढेर बन जाती हैं।

हम लोग ‘मैं’ को लेकर इस अणुवादी सभ्यता के प्रभाव में कैसे विभाजित, विखंडित हो रहे हैं। यह विखंडन वैचारिक ही है और इसे वैचारिक प्रदूषण समझना चाहिये, जिसकी समाप्ति में ही अनेक प्रकार के प्रदूषण की समाप्ति होगी। वहीं मनुष्य की गरिमा भी उचित शीर्ष पर पहुँचेगी।

जन-मन एक होकर ‘मैं’ से मुक्त होकर ‘हम’ की भावना में तिक्त, सामूहिक दायित्व बोध के साथ यदि प्राकृतिक तत्वों के समुचित संतुलन के लिये प्रयत्न शील हो तो निश्चय ही हम सभी प्रकार के प्रदूषणों के प्रभाव से विमुक्ति पा सकेंगे, अन्यथा हम समाप्त होंगे और अन्य प्राणी तथा वनस्पति जगत भी। कर्मों का विपाक तो होता ही है, परन्तु अनुकूल फल प्राप्ति की दिशा में होना चाहिये। गोपालदास ‘नीरज’ की काव्य पंक्तियाँ हैं-

आग लेकर हाथ में पगले जलाता है किसे,

जब यह बस्ती न रहेगी, तू कहाँ रह जायेगा।

वस्तुत: संसार में अकेला कोई पदार्थ नहीं। यहाँ सबकुछ सुगठित और सुसंबद्ध है। सर्वत्र अन्योन्याश्रय का सिद्धान्त कार्य कर रहा है। जड़-चेतन से विनिर्मित यह सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड एकता के सुदृढ़ बंधनों में बंधा हुआ है। बंधनों के स्वाभाविक क्रियारत् समानुपातक तालमेल को बिगाडऩा हमारे लिये आत्मघाती है। वास्तव में पारम्परिक बंधन ही सृष्टि की शोभा- सौंदर्य का, उसकी विभिन्न हलचलों का, उत्पादन-विकास एवं परिवर्तन का उद्गम केन्द्र है। इसे समझने के लिये सूक्ष्म पर्यवेक्षण की आवश्यकता है।

निर्वनीकरण, प्राणियों का शिकार, भूगर्भ सम्पदा का अत्यधिक दोहन चरम सीमा पर है। जन्तु एवं वनस्पति पृथ्वी-जल-वायु तथा अन्य जीवनोपयोगी पदार्थ प्रकृति के घटक हैं। आज प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण हमारे सामने कौन सी समस्यायें आ खड़ी हुई हैं, उनके निराकरण की दिशा में शासन द्वारा जो गति ग्रहण की जा रही है उसके संदर्भ में निकट भविष्य में प्रतिफलित होने वाले एवं दूरगामी परिणामों पर हमने इस पुस्तक में विचार किया है। आशा है कि अनुस्यूत विचार जनसाधारण और शासन के लिये उपयोगी होंगे। विकास के नाम पर बड़े-बड़े बाँधों के निर्माण की परियोजनायें हाथ में लेकर इतिहास और भूगोल बदलने के पूर्व एकाग्रचित्त होकर यह सोचना बहुत आवश्यक है कि हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी।

डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बुन्देली दिवस विशेष – पर्यावरण महत्व एवं संरोधन ☆ आचार्य शैलेंद्र पाराशर ☆

🟢 पुस्तक चर्चा 🟢 पर्यावरण महत्व एवं संरोधन 🟢 आचार्य शैलेंद्र पाराशर 🟢

(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)

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(एक सितंबर को बुंदेली दिवस समारोह – जबलपुर। बुंदेली लोक साहित्य के विद्वान, भाषा विज्ञानी डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 109वीं जयंती एवं 36वां बुंदेली दिवस समारोह सोमवार 1 सितंबर को संध्या 6.30 बजे से शहीद स्मारक भवन में गुंजन कला सदन एवं नगर की संस्थाओं द्वारा आयोजित है । इस अवसर पर स्मृति शेष डॉ. श्रीवास्तव की पुस्तक “पर्यावरण महत्व एवं संरोधन” के विमोचन के साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं विषयों के विद्वानों का अभिनंदन किया जाएगा । बुंदेली गीतों एवं नृत्यों के साथ ही पूर्व में सम्पन्न चित्रकला एवं बुंदेली नृत्य श्री प्रतियोगिता के विजेता भी पुरस्कृत होंगे ।)

लोक संस्कृति के विज्ञानवेत्ता – डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की ‘पर्यावरण महत्व एवं संरोधन’ कालजयी कृति

लोक वैज्ञानिक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव लोक संस्कृति, सभ्यता, हिन्दी, बुन्देली, भाषा विज्ञान, समाज विज्ञान एवं लोक विज्ञान के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान थे। उनका बुन्देलखण्ड एवं बुन्देली भाषा के प्रति आजीवन असीम अनुराग रहा है। उनकी लेखनी लोक जीवन के बहुविध विषयों पर साधिकार अनवरत् अविराम चलती रही। उनका सृजन शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। संस्कृति मनीषी डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व समाज की अमूल्य धरोहर है। डॉ. श्रीवास्तव की इस बौद्धिक विरासत को सहेज कर रखना एवं उनकी भावना के अनुकूल अध्ययन, मनन एवं आचरण से मूर्त रूप देने के लिए कृत संकल्पित होना समाज का नैतिक दायित्व है। उनके शैक्षणिक, सामाजिक, शोध कार्य, पुस्तकें, आलेख, अप्रकाशित रचनाएँ, नवाचारों के खुले द्वार हैं जो आने वाली पीढिय़ों की अमूल्य विरासत हैं। डॉ. श्रीवास्तव की यह पुस्तक इसे स्वयमेव् प्रमाणित करती है।

शब्द ब्रह्म के उपासक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने सृष्टि की रचना के मूल तत्व का गहनता से अध्ययन किया है। पुरुष शाश्वत और चेतन है, वहीं प्रकृति गतिशील एवं भौतिक है। दोनों साथ मिलकर सृष्टि का निर्माण करते हैं। सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि की रचना के दो मूल तत्व पुरुष और प्रकृति हैं। ब्रह्मांड की उत्पत्ति प्रकृति और पुरुष के मिलन से हुई है।

ज्ञान की देवी सरस्वती के उपासक डॉ. श्रीवास्तव ने आदिकाल से वर्तमान तक बहुविध पक्षों का सूक्ष्म, गहन एवं शोधात्मक अध्ययन, मनन एवं चिंतन कर समसामयिक सारगर्भित लेखन किया है।

पर्यावरणविद् डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की सद्य: प्रकाशित ‘पर्यावरण महत्व एवं संरोधन’ पुस्तक में पेड़-पौधों, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों की जीवन गाथा से लेकर ‘ पशु-पक्षियों द्वारा प्रजातंत्र की माँग’ सहित इक्कीस शीर्षकों में लेखक ने अत्यंत सूक्ष्मता, अध्ययन, मनन, चिंतन, शोध, नवाचार से, पर्यावरण प्रदूषण एवं फसलों के उत्पादन वृद्धि के लिए उपयोग में आने वाले रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के दुष्परिणाम सहित अनेक विषयों पर साधिकार लेखनी से सुधी पाठकों का ध्यान आकर्षित कराते हुए समस्याओं के समाधान के तरीके भी बताए हैं। पर्यावरण संरक्षण के पर्यावरण संरोधन, पर्यावरण का संरक्षण, सुरक्षा, दोहन के साथ उसे नष्ट होने से बचाना, सुरक्षित, संतुलन बनाये रखते हुए उसकी रक्षा करना प्राणी मात्र के जीवन, स्वास्थ्य, विकास और संस्कृति का आधार है। वहीं प्रकृति और मनुष्य के नैसर्गिक संतुलन को बनाए रखना सभी का नैतिक दायित्व है। वही मनुष्य का जीवन, स्वास्थ्य, विकास और संस्कृति में निहित जीवन मूल्यों को पोषित करना भी है। डॉ. श्रीवास्तव ने पर्यावरण संयोजन प्रकृति के सभी घटकों, जलवायु, मृदा, वनस्पति, जीव -जंतु, ऊर्जा की प्रकृति को समझते हुए संसाधनों का दुरुपयोग न करने का आह्वान करते हुए भविष्य के लिए उन्हें संरक्षित, एवं सुरक्षित करने का दायित्व निर्वाह करने के लिए उचित मार्गदर्शन दिया है। भारतीय सांस्कृतिक, सामाजिक एवं धार्मिक मूल्यों के अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण के संरोधन की मानसिकता बनाते हुए आचरण करने पर विशेष जोर दिया है। पर्यावरण संयोजन वायु, जल, मृदा प्रदूषण का बढऩा मानव को चतुर्दिक रूप से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर बहुत नुकसान पहुँचा रहा है, जिससे प्रति क्षण प्रकृति एवं मनुष्य को अनेक दुष्परिणाम का सामना करना पड़ रहा है।

समाज वैज्ञानिक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का ‘पर्यावरण संरोधन’ से आशय प्रकृति के सभी घटकों (जल, वायु, मृदा, वनस्पति, जीव-जंतु, ऊर्जा स्रोत) को संरक्षित करना, उनका विवेकपूर्ण उपयोग करना तथा भावी पीढिय़ों के लिए सुरक्षित रखना है।

वर्तमान समय में पर्यावरण संरोधन की सर्वाधिक आवश्यकता है। प्रदूषण नियंत्रण, वायु, जल और मृदा प्रदूषण का बढऩा मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता को हानि पहुँचा रहा है। जैव विविधता की रक्षा करने वाली अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं, जिससे पारिस्थितिक असंतुलन बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षरण और जलवायु असंतुलन से मानवता खतरे में है। जल, वन, ऊर्जा और खनिज सीमित हैं। इन्हें अंधाधुंध नष्ट किया जा रहा है जिससे प्रकृति और मनुष्य का भविष्य संकटग्रस्त होता जा रहा है। शुद्ध वातावरण के बिना स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और संस्कृति आदि सभी नष्ट हो सकते हैं।

पर्यावरण संरोधन के लिए वृक्षारोपण और जंगलों की रक्षा करना आवश्यक है। जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन, तालाब व नदियों की शुद्धि और जल का विवेकपूर्ण उपयोग, ऊर्जा संरक्षण हेतु नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन, जलविद्युत) अपशिष्ट प्रबंधन, प्लास्टिक व इलेक्ट्रॉनिक कचरे को पुनर्चक्रण द्वारा कम करना, प्रदूषण नियंत्रण हेतु औद्योगिक धुआँ, वाहनों का धुआँ और रासायनिक अपशिष्ट को नियंत्रित करना आदि जरूरी है। पर्यावरण संरोधन का तात्पर्य है कि प्रकृति का संरक्षण, संसाधनों का संतुलित उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता की रक्षा और सतत विकास की दिशा में आगे बढऩा है।

मनुष्य यदि पर्यावरण का संरोधन नहीं करेगा तो जीवन का आधार ही खतरे में पड़ जाएगा, अत: यह मानव का नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है कि वह प्रकृति की रक्षा करे, पर्यावरण ही जीवन का आधार है जो हमें शुद्ध हवा, स्वच्छ जल, उपजाऊ भूमि और जैव विविधता प्रदान करता है, हमारी संस्कृति में नदियाँ, पर्वत, वृक्ष और पशु-पक्षी सदैव पूजनीय रहे हैं। गहन चिंतक डॉ. श्रीवास्तव की पर्यावरण प्रदूषण की इस कृति में अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के प्रति चिंतन उनकी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है। आज अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं, जैव विविधता घट रही हैं। यदि हम समय रहते कदम नहीं उठाएँगे तो जीवन असंभव हो जाएगा। वहीं बढ़ते हुए प्रदूषण के खतरों से बचने के लिए पर्यावरण संरोधन की आवश्यकता तेजी से महसूस की जा रही है। पर्यावरण शिक्षा की वर्तमान में बहुत आवश्यकता है। यह अमूल्य ग्रंथ बच्चों व समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।

भारतीय संस्कृति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव हमें सिखाता है कि धरती पर सभी प्राणी हमारे कुटुम्ब का हिस्सा हैं। सतत् समावेशी विकास की नीतियाँ अपनाना, जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन, सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग, पर्यावरण शिक्षा व जन-जागरूकता, प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन, अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण, वनों की रक्षा करना बहुत जरूरी है। ‘पर्यावरण संरोधन’ केवल वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि विश्व के हर नागरिक का नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक दायित्व एवं कर्तव्य भी है। विश्व भर में रहने वाले प्रत्येक मनुष्य को सिर्फ शासन, संस्थाओं, पर्यावरणविदों, समाजसेवियों एवं दूसरों से अपेक्षा नहीं करना चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का प्रकृति एवं जीवन को प्रदूषण से मुक्त रखने का दायित्व है।

संवेदनशील लेखक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने पर्यावरण प्रदूषण को समाप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को संकल्प धारण करने का आह्वान किया है कि वे प्रकृति की रक्षा करते हुए पर्यावरण संरोधन के दायित्व का जीवन भर निर्वाह करेंगें। वहीं आने वाली पीढिय़ों के लिए एक सुरक्षित, संरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण विरासत सौंप कर जाएंगे।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना समस्त वैश्विक परिवार का हिस्सा है। इसमें समस्त प्रकृति समाहित है। मनुष्य जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ सदियों से प्रदूषण रहित प्रकृति का अविभाज्य हिस्सा रही हैं। लोक वैज्ञानिक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का अथक परिश्रम, चिंतन, लेखन उनकी विद्वता को स्वयमेव् मुखरित करता है। मूलत: यह पुस्तक नहीं, बल्कि शोध ग्रंथ है। इसमें उन्होंने प्राचीन काल से वर्तमान तक अनेक संदर्भ, शोध कार्यो एवं आख्यानों के उदाहरणों को समाहित कर प्रांजल भाषा में सुधी पाठकों के लिए अथक परिश्रम से लिखा है।

वस्तुत, डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की ज्ञानवर्धक कालजयी कृति पर्यावरण के संरोधन के प्रति समर्पण, संवेदनशीलता एवं साधना की परिचायक है। सादर नमन। 

आचार्य शैलेंद्र पाराशर

सेवानिवृत्त आचार्य, एम. ए., पी एच. डी.

64 नमन विद्यानगर, सांवेर रोड, उज्जैन(म. प्र. ) – 456010 मो. 94250 94144, 83190 65419

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “चौराहा…” – लेखक… श्री चन्द्रभान राही☆  समीक्षा – डॉ. कृष्णलता सिंह  ☆

डॉ. कृष्णलता सिंह 

 

“चौराहा…” – लेखक… श्री चन्द्रभान राही☆  समीक्षा – डॉ. कृष्णलता सिंह 

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – चौराहा

लेखक – श्री चन्द्रभान राही

प्रकाशक – इन्द्रा प्रकाशन, भोपाल

☆ सामाजिक कुरीति का सच्चा आईना- ‘‘चौराहा’’ उपन्यास – डॉ. कृष्णलता सिंह ☆

यह सर्वमान्य सत्य है कि ‘‘साहित्य समाज का दर्पण होता है।’’ साहित्यकार पर समाज का यथार्थ स्वरूप दिखाने का उत्तरदायित्व होता है। इस कसौटी पर श्री चन्द्रभान राही जी का उपन्यास चौराहा खरा उतरता है। यह उनका चौथा उपन्यास है, जो इन्द्रा प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित हुआ है। यह कोढ़ की तरह फैली सामाजिक समस्या भिक्षावृत्ति पर एक शोधपरक उपन्यास है, जिसे लेखक ने भिखारी समुदाय के बीच घुस कर बड़े परिश्रम से लिखा है। अगर ऐसा नहीं होता, तो भिक्षा वृति में लिप्त भिखारियों के जीवन के संघर्षों, भिक्षावृत्ति के नये-नये तरीके, वेश्यावृत्ति, किन्नर समुदाय की विवशताओं और भिखारी माफिया तंत्र की एक एक गतिविधियों का ऐसा विस्तृत, जीवन्त और मार्मिक आख्यान हमारे सामने नहीं ला पाते। समाज का यह कोना इतना वीभत्स है, इसमें इतने छेद हैं कि उनमें पैबन्द लगाने में सदियाँ बीत जायेंगी। फिर भी सम्मवतःवहाँ सब कुछ सामान्य न हो सके। क्योंकि वह सब मानव निर्मित अपराध जगत की उपज है, जो एक व्यापार की शक्ल में फल फूल रहा है। इस व्यापार पर अंकुश लगाने वाले ही उनके संरक्षक हैं, जिसका शायद हम सब को कदाचित ही अहसास होगा। राही जी ने उसी अन्धेरे कोने से रूबरू कराने के लिये हमें ऐसे चौराहे पर ला कर खड़ा किया है, जो दिन रात वाहनों के शोर शराबे से गुलजार रहता है, हरी, पीली और लाल बत्ती से चलायमान होता है। हर तरफ चहल पहल नजर आती है। ज़िन्दगी भागती दौड़ती नज़र आती है, सब कुछ अपने आप में परफेक्ट दिखाई देता है। बस कुछ पलों के लिये लाल बत्ती का सिग्लन होते ही वाहनों की रफ्तार चौराहे पर थम जाती है और दूसरी ज़िन्दगी सक्रिय हो जाती है। अचानक प्रतीक्षारत वाहनों के शीशे थपथपाये जाने लगते हैं और भिखारी माफिया का पूर्व रिहर्सल किया गया अभिनय शुरू हो जाता है।

श्री चन्द्रभान राही

राही जी ने भले ही उपन्यास की पटकथा मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के बोर्ड आफिस के चौराहे और हनुमान मंदिर के आस पास रहने वाले भिखारियों, धन्धेंवालियों और किन्नरों के जीवन की कहानियों को लेकर बुनी है, परन्तु यही गोरख धन्धा अपने देश के किसी भी छोटे-बड़े शहर के चौराहे और मंदिर के आस पास हम देख सकते हैं। यह गज़ब का धन्धा है, इसमें न हींग लगती है और न फिटकरी, रंगचोखा चढ़ता है यानी जीरो इंवेस्टमेन्ट का धन्धा व्यक्ति को धन्ना सेठ बना देता है। इस उपन्यास के भिखारियों का सरगना जलील ख़ान बाम्बे के किसी डॉन का कभी गुर्गा था। अब भोपाल में भिखारियों का गिरोह चलाता है। पुलिस और सत्ता में बैठे बड़े बड़े मंत्री उसकी जे़ब में रहते हैं। उसकी हवेली में उसकी पूरी सरकार चलती है, भिखारियों के अपने पैसों के लिये उसने एक बैंक भी खोल रखा है। अपनी कमाई वह वहाँ जमा करा देते हैं, अपना हिस्सा वह जब चाहे निकाल सकते हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी रक़म उनके मनोनीत उत्तराधिकारी को सौंप दी जाती है। लेन देन के मामले में वह बहुत ईमानदार है। ईमानदारी से काम करने वाले भिखारियों के लिये वह मसीहा हैं, लेकिन गद्दारी और बेईमानी करने के लिये वह जल्लाद है। सारा काम बड़े व्यवस्थित रूप से चलाता है। भिखारियों के मेकअप और कस्ट्यूम का अलग विभाग है। वह किसी पर भीख मांगने का दबाव नहीं डालता है। बच्चों के हुनर को जानकर वह उनकी योग्यता के अनुसार उनको रोजगार भी दिलाता है, लेखक ने जलीलख़ान के व्यक्तित्व के स्याह और उजले दोनों पक्षों को भी संजीदगी से उकेरा है। आश्चर्य होता है कि इस पात्र के अपराधिक चरित्र को पढ़कर घृणा नहीं उत्पन्न होती है। कहानी का मुख्य पात्र या सूत्र धार राम नाम का एक वयस्क युवक है, जिसकी ज़िन्दगी जन्म से लेकर अब तक इसी हनुमान मंदिर के पास बैठने वाले भिखारियों के बीच कटी है। अपनी वफादारी के कारण वह ख़ान का चहेता बन जाता है। उसे भीख माँगना रुचिकर नहीं लगता है, अतः खान उसे चौराहे पर अख़बार बेचने का काम दे देता है। उसकी जन्मदात्री माँ हमारे सभ्य समाज की एक शिक्षित युवती है, जो अपना पाप छिपाने के लिये एक कोढ़िन भिखारी के पास एक अख़बार में लपेट कर उसे छोड़ जाती है। कोढ़िन इसे पाँच हजार में ख़ान के पास बेच देती है और ख़ान उस बच्चे का पालन पोषण करने के लिये उसे हर महीने अतिरिक्त पैसा देता है। अख़बार में श्रीराम की फोटो छपी होती है, इसलिए ख़ान उसका नाम राम रख देता है। यही राम अपनी आप बीती सुनाते हुए भिखारियों की दिनचर्या, उनके संघर्ष और उनके रहन सहन के एक-एक दरवाजे और खिड़कियाँ खोलता जाता है और हम अपने ही समाज के इस अजीबो गरीब अंधेरी दुनिया में प्रवेश कर अवाक् रह जाते हैं। अकसर सड़क पर हमारी मुलाकात भिखारियों से होती है। कभी हम उनकी दयनीय दशा देख कर अपनी ज़ेब कुछ ढीली कर देते हैं, कभी उपेक्षा से मुँह फेर कर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन लेखक उनके जीवन की गहराई में उतरा है, यह उपन्यास पढ़कर प्रतीत होता है। न जाने कितने भिखारी और भिखारिनें हैं, सबकी अलग-अलग जीवन गाथा है, कुछ तथाकथित सभ्य समाज की अवैध सन्तानें हैं, कुछ जन्मजात अनाथ हैं, जिन्हें उनके रिश्तेदार पैसों के लालच में बेच देते हैं। कोढ़ी, अपाहिजों को उनके परिवार वाले घर से निष्कासित कर देते हैं। अपने मन का आक्रोश छिपाये दर्द से जूझते हुए वह भीख मांगने पर मजबूर हो जाते हैं। हनुमान मंदिर के पीछे इनकी बस्ती बसी है। यहीं वह अपनी देह की ज़रूरतों की पूर्ति हेतु आपस में सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं, कुछ इन्हीं भिखारियों की अपनी संतानें हैं। इसी तरह देह व्यापार से जुड़ी धन्धें वालियाँ है, जिनकी अपनी विवशताएँ और कहानियाँ। समाज से उपेक्षित किन्नरों के जीवन की अपनी संघर्ष गाथा है। सबकी शरण स्थली यही चौराहा, जो इन्हें रोजगार देता है। इतनी सारे पात्रों, कथाओं और घटनाओं को एक सूत्र में पिरो कर राही जी ने बड़ी कुशलता से उपन्यास का तानाबाना गढ़ा है कि उसमें सभी पात्र और घटनाएँ सजीव हो उठती हैं। सिने रील की तरह आँखों के सामने सब कुछ गुजरने लगता है। पाठक एक सर्वथा नयी दुनिया में प्रवेश कर हक्काबक्का हो जाता है। जैसे जैसे उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है, उत्सुकता बढ़ती जाती है। उत्सुकता और कौतूहल कहीं पर भी विश्राम नहीं ले पाते हैं। उत्तरोत्तर हमारा परिचय एक नयी घटना और कहानी से होता रहता है, जो मन को बाँध लेती है। पात्रों की सर्जना इतनी विविधता पूर्ण है कि हर  भिखारी दूसरे से अलग दिखाई देताहै। उनका रहन-सहन, दिनचर्या और मानवीय संबन्धों का लेखा जोखा मन को अन्दर तक भिगो देता है, आँखें नम हो जाती हैं। भिखारी होने के बावजूद उनमें इन्सानित है। आरती, कमला, कोढ़िन मौसी आदि की जीवन गाथामन को झकझोर देती हैं। उनकी हँसी और मसखरी के पीछे छिपा दर्द हृदय को कचोटने लगता है। राही जी ने बड़ी संवेदन शीलता और ईमानदारी से भिखारियों के जीवन का यथार्थ हमारे सामने रखा है।

उपन्यास का कथ्य न केवल रोचक है, अपितु शोधपरक नवीनता लिये हुए है। भाषा प्रवाहमयी है। अपने मन्तव्य को अभिव्यक्त करने में पूर्णता समर्थ है।राही जी ने भारी भरकम शब्दों की जगह साधारण आम जन की भाषा का प्रयोग किया है। सरल सारगर्भित शब्दों के प्रयोग से साधारणीकरण की प्रक्रिया को विस्तार मिला है, जिससे पात्र और पाठक का तादात्म्य सरलता से स्थापित हो जाता है। संवाद भी पात्रों के अनुकूल हैं। उनमें कोई बनावट नजर नहीं आती है। कुल मिला कर चन्द्रभान राही जी ने देश और समाज के लिये अभिशाप भिक्षावृति और उसके माफिया तंत्र का कुरूप आईना दिखाने की एक सफल ईमानदार प्रयास किया है, जो दिमाग को खरोचता है, विक्षोभ उत्पन्न करता है, मन तिलमिला उठता है कि यह भिक्षावृति का व्यवसाय कैसे पुलिस और नेताओं की सांठ गाँठ से माफिया तंत्र देश में चला रहा है? हम मूक् दर्शक बनकर सब कुछ देख रहे हैं। इस कलंक को हम मिटा नहीं पा रहे हैं। इन सब प्रश्नों के उत्तर भी इस उपन्यास में खोजने पर मिल जायेगा।

उपन्यास का आवरण आकर्षक और विषयानुकूल है। इन्द्रा प्रकाशन का मुद्रण भी सुन्दर है।

अन्त में इतना कहना चाहूँगी कि उपन्यास चौराहा अपने नवीन कलेवर, वस्तुविन्यास, रचनाशिल्प, प्रवाहमयी भाषा और सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण पठनीय है। देश और समाज के इतने बड़े कलंक और अभिशाप को हमारे सामने लाने के लिये श्री चन्द्रभान राही जी के इस साहासिक और ईमानदार कोशिश के लिये साधुवाद। साहित्यिक जगत में इसका हृदय से स्वागत होगा, इसी विश्वास के साथ।

 ………………

© डॉ. कृष्णलता सिंह

मोबाइल- 9971107736, ईमेल- klsingh@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ जन्मदिवस विशेष – सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

🙏 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्रद्धेय आचार्य भगवत दुबे जी को जन्म दिवस १८ अगस्त पर शत शत प्रणाम 🙏

आचार्य भगवत दुबे हिन्दी के एक वरिष्ठ रचनाकार हैं। प्रचार प्रसार से दूर वे एक मौन साधक हैं और उन्होंने न केवल काव्य के कथ्य शिल्प को नये नये रुपों में संजाया संवारा है बल्कि महाकाव्य से लेकर मुक्तक -गजल तक को अपनी लेखनी का पाटल -स्पर्श प्रदान किया है।

सुविख्यात कवि श्री नीरज की इस प्रभावी प्रतिक्रिया का उल्लेख किया था सुप्रसिद्व कवि श्री चन्द्रसेन विराट ने राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले श्रद्धेय कवि आचार्य भगवत दुबे की काव्य कृति कांटे हुए किरीट में। कवि चन्द्रसेन विराट ने कवि नीरज की इस बात का उल्लेख करते हुए अपनी मंगल कामनाओं में अपनी जो बात इस काव्य पुस्तक में शामिल की वह भी आचार्य जी के काव्य को महत्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए काफी है। वे कहते हैं कि यह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि, कथाकार कितनी दिशाओं में एक साथ रचनारत रहा है, यह जानकर सुधी पाठक चकित रह जाता है। इसी कृति में आचार्य भगवत दुबे जी की काव्य सृजन से प्रभावित होकर एक और राष्ट्रीय कवि श्री शिवमंगल सिंह सुमन ने भी लिखा है कि कवि में अपनी कल्पनाओं को रुपक में डालने की विशेष प्रवृत्ति। दिखाई पड़ती है। भाषा में प्रवाह है और अच्छे प्रयोग देखने को मिलते हैं। उन्होंने लिखा है कि अधिकांश कविताएं उपदेशात्मक और शोषण, अन्याय एवं सांप्रदायिक संकीर्णता के विरोध में है। तदर्थ इन रचनाओं का विशेष महत्व है।

आचार्य जी की इस कृति में अधिकांश कविताएं कृषकों और ग्रामीणों के दैनिक जीवन और उनकी समस्याओं पर आधारित हैं। दरअसल आचार्य जी स्वयं भी गांव की सोंधी महक में पले बढ़े ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जिन्होंने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को न केवल अपने आस पास देखा है बल्कि उसे बड़ी गहराई से महसूस भी किया है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में यह बात बड़ी साफ तौर पर देखी जा सकती है। जैसे –

 0

न्याय मांगने, गांव हमारे, जब तहसील गये,

न्यायालय, खलिहान खेत, घर गहनें लील गये।

 0

 और कवि जब ऐसी विषम परिस्थितियों से पीड़ित जनमानस को, परेशान देखता है तो अपनी कविता में आवेश मिश्रित सीख भी देता है –

 O

अहंकार, अन्याय रौंदता फिरे जहां जन जीवन को

हे धिक्कार, अनीति सहन करने वाले, नर यौवन को

 O

आचार्य जी की कविताओं में शोषण के प्रति चिंता तो है लेकिन वे निराश नहीं है। उनका आशावादी दृष्टिकोण उनकी कविताओं में साफ साफ नजर आता है –

 O

संकल्पों की दीप्त प्रभा से सुखद सवेरा लाना है,

लेकर नयी उमंग, निराशाओं का तिमिर हटाना है।

 O

गांवों की गरिमामयी संस्कृति और पावन संस्कारों का महत्व भी आचार्य जी की कविताओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, एक कविता में वे लिखते हैं –

लक पांवड़े, जहां अतिथियों की

 खातिर बिछ जाते हैं,

नगरवासियों चलो तुम्हें,

 हम अपने गांव दिखाते हैं।

आचार्य जी को विरासत में मिले यही पावन संस्कार समाज के लिए प्रेरणा का विषय हो सकते हैं। जीवन में मातृ भक्ति का सिध्दांत उनके लिए सर्वोपरि था और इसकी झलक उनकी कविताओं में दिखाई देती है –

 O

टूटी कुटिया के भीतर जब शीश झुकाकर मैं जाता हूं,

मां के ममतालू चरणों में, मंदिर जैसा सुख पाता हूं।

 O

वर्ष 2001 में प्रकाशित राष्ट्रीय, सामाजिक, आध्यात्मिक, और ग्रामीण परिवेश की 68 कविताओं के इस संग्रह में आचार्य जी की प्रेरक सोच वाली ऐसी काव्य रचनाएं शामिल हैं जो आज भी सामयिक और प्रासंगिक हैं तभी तो सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और पाथेय के संस्थापक स्व. डा. राजकुमार सुमित्र ने एक जगह लिखा था कि “कवि आचार्य भगवत दुबे संस्कारधानी जबलपुर के ऐसे स्वनामधन्य साहित्य साधक हैं जिनके विविध वर्णी कृतित्व की यश सुरभि विंध्य -सतपुडा के शैल‌ शिखरों को लांघ कर भारत व्यापिनी हो गयी है।”

आज हम सभी गौरवान्वित हैं कि श्रद्धेय सुमित्र जी की इस बात से पूरा साहित्यिक क्षेत्र सहमत है।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ काव्य कृति – “सपनों के गांव में…” – कवि … श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ चर्चा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

यशोवर्धन की पुस्तक चर्चा ☆

☆ काव्य कृति – “सपनों के गांव में…” – कवि … श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ चर्चा – श्री यशोवर्धन पाठक

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – सपनों के गांव में…

कवि  – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’

प्रकाशक – पाथेय प्रकाशन 

☆ कृत्रिमता और आडम्बरपूर्ण दर्शन से दूर ग्रामीण परिवेश की झलक – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

भाई श्री संतोष नेमा संतोष का काव्य संग्रह “सपनों के गांव में ” इस समय मेरे सामने है इस संग्रह में संकलित सभी कविताओं की यह विशेषता है कि इन में कृत्रिमता नहीं है और ये सभी कविताएं बिना किसी लाग-लपेट के सीधी सरल भाषा में हैं। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ये कविताएं मेरे मन के आंगन में उतर गई हैं।

श्री संतोष नेमा ‘संतोष’

श्री संतोष नेमा की यह खासियत है कि वे जितनी खूबी से ईश्वर के विभिन्न रूपों में आस्था अभिव्यक्त करते हैं उतने ही अधिकार से प्रकृति का वर्णन करते हैं। इसी प्रकार उनकी सिद्ध हस्तता उनके लिखे उन गीतों में मिलती है जब वे मानवता और सद्भाव की बात करते हैं। उदाहरण के लिए उनकी लिखी कविताएं “सपनों के गांव में” तथा “मेरा गांव “ली जा सकती हैं। “सपनों के गांव” शीर्षक कविता में वे  कहते हैं –

नारी जहां पुजती हो, सच्चाई न बिकती हो,

 बने रहें सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।

 इसी कविता में वे आगे कहते हैं –

 दिव्य स्वप्न आंखों में, झरते फूल बातों में,

 जीवन के रसमय सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।

 ऐसा लगता है कि कवि का विश्वास सद्भावना की स्थापना में है। यह उचित भी है। जब भी कोई साहित्यकार स्वस्थ समाज की चर्चा करता है, वह ऐसे समाज की कल्पना करता है जहां सद्भावना हो।

यह वास्तविकता भी है। कोई भी समाज बिना सद्भाव के नहीं रह सकता। उनकी लिखी कविता “मेरा गांव” में भी यही जरूरत सामने आती है, जब वे कहते हैं –

 सादा जीवन रीत निराली, सच्चाई की पीते प्याली

 रहता सदा यहां सद्भाव, सबसे सुन्दर मेरा गांव।

 भारत के गांवों की यह खासियत है। शहरों में व्याप्त कृत्रिमता और आडम्बरपूर्ण दर्शन से दूर ग्रामीण परिवेश का परिचय श्री संतोष नेमा कराते हैं जब वे यह कहते हैं –

 छल प्रपंच पाखंड ने घेरा,

 लोभ मोह का सघन अंधेरा

 मन से तृष्णा दूर भगाएं

 अन्तर्मन में ज्योति जलायें।

 इस संग्रह में ऐसे विचारों की बहुलता है। कवि का जोर सदैव इस बात पर रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति में सद्भाव जगाने की आवश्यकता है। वह मानवता का अग्रदूत बनता है। बिना सद्भाव और मानवता के समाज की कल्पना श्री संतोष नेमा नहीं करते हैं। यह इस संकलन की विशेषता है कि ग्राम्य परिवेश का सुन्दर वर्णन ईश्वर के विभिन्न रूपों और अवतारों के श्रद्धापूर्ण स्मरण के साथ मिलता है। हिन्दू आस्था इस संग्रह में जगह जगह मिलती है। भगवान राम, कृष्ण, दुर्गा की भक्ति की कविताएं हैं लेकिन कवि को अन्य संप्रदायों का ख्याल है। वह दूसरे मतों की चर्चा करते हुए इसके लिए राजनीति को दोषी ठहराता है।

यह सही भी है। हम राजनीति में इस तरह डूब गए हैं कि हमें अपने पास पड़ोस का ख्याल नहीं रहता।

कवि को हमारी इस कमजोरी का ध्यान है। वह कहते हैं-

 सियासत ने हमें बांटा कुछ कदर,

 हिन्दू हिन्द के, मुसलमान पाकिस्तानी हो गए।

यह इस संकलन की विशेषता है। कवि का यद्यपि अडिग हिन्दू देवी देवताओं पंर विश्वास है और इसे अभिव्यक्त करने में पीछे नहीं रहता लेकिन उसे अन्य संप्रदायों का भी ध्यान है। यह सर्व धर्म सद्भाव और हमारी प्राचीन परंपरा के अनुरूप है। जिन मुसलमानों ने भारत में रहना स्वीकार किया और पाकिस्तान नहीं गए उन्हेंं पाकिस्तानी कहना ग़लत होगा।

इस काव्य संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी भाषा और शैली। इसकी भाषा जहां सुबोध है, इसकी शैली बोधगम्य और अकृत्रिम है। कवि बिना किसी बहाने बाजी या लाग लपेट के अपनी भावना रखता है। शब्दाडंबर और अलंकारों का उपयोग कर कविता को बोझिल नहीं बनाया गया है। अमिधा गुणों की खूबसूरती इन कविताओं में है। ” एक कहानी हो गये ” कविता में जातिवाद पर प्रहार है। पर्यावरणीय वर्णन भी है। ग्रामीण परिवेश का परिचय भी मिलता है जैसा संकलन के नाम से प्रकट होता है।

 ————-

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बाल कहानी-संग्रह – फूलों सी कहानियाँ – कहानीकार : सुश्री विनीता सिंह चौहान ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है सुश्री विनीता सिंह चौहान जी द्वारा लिखित बाल कहानी संग्रह – “फूलों सी कहानियाँकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 214 ☆

☆ बाल कहानी-संग्रह – फूलों सी कहानियाँ – कहानीकार : सुश्री विनीता सिंह चौहान ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’

पुस्तक का नाम: फूलों सी कहानियाँ

कहानीकार का नाम: विनीता सिंह चौहान

प्रकाशक का पता: साहित्य झरोखा प्रकाशन

मोबाइल नंबर: 9119117355, 9461149202

ईमेल: sahityajharokha@gmail.com

समीक्षक – ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश8827985775

☆ समीक्षा- फूलों सी कहानियाँ: मानवीय मूल्यों की सुगंध बिखेरती बाल साहित्य की अनुपम कृति –  ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

फूलों सी कहानियाँविनीता सिंह चौहान द्वारा रचित बाल कहानी संग्रह है, जिसका मुख्य उद्देश्य बच्चों में मानवीय मूल्यों और संस्कारों का बीजारोपण करना है। लेखिका ने अपने बचपन की मीठी यादों, किस्सों और कहानियों से प्रेरित होकर इस संग्रह का सृजन किया है, जिसे वह अपने कृतित्व से बचपन को पुनः जीने का प्रयास मानती हैं। पुस्तक में 32 कहानियाँ शामिल हैं, जो परोपकार सहित विभिन्न मानवीय मूल्यों पर केंद्रित हैं।

संग्रह की कहानियों में मानवीय मूल्यों पर गहन फोकस: यह पुस्तक मानवीय मूल्यों के विकास पर बल देती है, विशेषकर परोपकार को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। लेखिका मानती हैं कि बाल्यावस्था गीली मिट्टी के समान होती है, जिसमें मानवीय मूल्यों को रोपित करके एक खूबसूरत जीवन पाया जा सकता है। कहानियाँ दया, करुणा, कर्तव्यपालन, निष्ठा, सहिष्णुता, ईमानदारी जैसे सद्गुणों के विकास और लालच, क्रोध, ईर्ष्या जैसे दुर्गुणों के दमन में सहायक हैं।

विविधतापूर्ण कथ्य शैली: संपादक गोपाल माहेश्वरी के अनुसार, इस संग्रह में विभिन्न प्रकार की कहानियाँ हैं – कोई विज्ञान कथा है, कोई लोककथा, किसी ने लघु कथा का बाना पहना है तो कोई बोधकथा है। कुछ कहानियाँ पंचतंत्र की कहानियों जैसी लगती हैं, तो कुछ सुनी-सुनाई सी भी प्रतीत होती हैं। यह विविधता बच्चों को बाँधे रखती है और उन्हें अलग-अलग शैलियों से परिचित कराती है।

सरल एवं बोधगम्य भाषा: बच्चों के लिए लिखी गई ये कहानियाँ सरल और सीधी भाषा में हैं, जिससे छोटे पाठक आसानी से विषय-वस्तु को समझ पाते हैं। इनमें प्रत्येक कहानी के अंत में एक स्पष्ट “कहानी की सीख” दी गई है, जो उसके नैतिक संदेश को उजागर करती है।

प्रेरक और व्यावहारिक शिक्षाएँ:

“माँ की सीख” और “सबक” जैसी कहानियाँ बच्चों को माता-पिता की भावनाओं का सम्मान करने की प्रेरणा देती हैं।

“एक दोस्ती जो सिखा गई जिंदगी का सबक” और “सच्चे मित्र” दोस्ती के महत्व और मुसीबत में साथ निभाने की सीख देती हैं।

“सुबह का स्वप्न” और “बचपन और बारिश की वो नाव” जीवन में लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती हैं।

“परोपकार” और “उमा और जलपरी” जैसी कहानियाँ परोपकार, दया और ईर्ष्या से दूर रहने का संदेश देती हैं।

“ज्ञान की ताकत” और “गाँव की समझदार बेटी पूवी” विषम परिस्थितियों में भी योग्यता और ज्ञान से सफलता प्राप्त करने का हौसला देती हैं।

“लॉकडाउन और बेरोजगारी” और “गुब्बारेवाला” स्वदेशी बाजार को महत्व देने और मेहनत के महत्व को समझाती हैं।

“वायरस” और “बाल मेला एवं पौधारोपण” पर्यावरण संरक्षण और उसके प्रति जागरूकता का संदेश देती हैं।

“दुनिया का अंतिम दिन” और “पृथ्वी ग्रह का एलियन” अफवाहों से दूर रहकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने पर जोर देती हैं।

लेखिका का व्यक्तिगत जुड़ाव: लेखिका ने अपने दोनों बेटों को कहानियाँ सुनाकर उनमें गुणों और संस्कारों का विकास करने का प्रयास किया है, और वे स्वयं इन कहानियों के बीजरूप हैं। यह व्यक्तिगत जुड़ाव कहानियों में एक आत्मीयता प्रदान करता है।

‘फूलों सी कहानियाँ’ बच्चों के लिए एक अत्यंत उपयोगी संग्रह है क्योंकि यह बच्चों में नैतिक और मानवीय मूल्यों को विकसित करने का एक प्रभावी माध्यम है। कहानियों के माध्यम से दया, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा जैसे गुणों को बचपन से ही सिखाया जा सकता है।

यह बच्चों को समाज, पर्यावरण और व्यक्तिगत जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण शिक्षाएँ प्रदान करती है, जैसे परिवार में सहयोग, स्वदेशी का महत्व, पर्यावरण जागरूकता और अफवाहों से बचना।

यह बच्चों में सकारात्मक सोच और आत्म-विश्वास को बढ़ावा देती है, उन्हें जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने और लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है。

संक्षेप में, ‘फूलों सी कहानियाँ’ बाल साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है जो न केवल बच्चों का मनोरंजन करती है बल्कि उन्हें बेहतर इंसान बनने के लिए आवश्यक मूल्यों और संस्कारों से भी परिचित कराती है। यह संग्रह निश्चित रूप से देश के नौनिहाल पाठकों और श्रोताओं द्वारा पसंद किया जाएगा।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

03/07/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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