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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 19 ☆ राणी ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे ( ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है  उनका एक श्रृंगारिक “राणी“.)  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ दीनानाथा ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता  “दीनानाथा”।) ☆ दीनानाथा ☆   नाही झाली भेट तुझी नाही वाचली मी गीता माय बापाच्या चरणी फक्त ठेवला मी माथा   तेथे भेट तुझी झाली गाली हसला तू होता माझ्या हाताला लागली जणू तुकयाची गाथा   नाही व्हायचे वाल्मिकी राम नाम गाता गाता होवो श्रावणा सारखी माझ्या आयुष्याची कथा   माझ्या भाग्याची थोरवी कीर्ति आई यश पिता हात त्यांचे डोईवरी काय मागू दीनानाथा   माया मोहाची पायरी नको घराला रे दाता लालसेचा घडा मनी त्याला घाततो पालथा   © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. ashokbhambure123@gmail.com मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य – वेदना दिगंत ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी  एक भावप्रवण रचना “वेदना दिगंत” ) ☆ विजय साहित्य – वेदना दिगंत ☆   पिकवतो मोती |माझा बळीराजा || ढळे घाम ताजा | वावरात |   राब राबूनीया | खंतावला राजा || वाजलाय बाजा | संसाराचा.  |   पोर दूरदेशी  |  शिकावया गेली|| सावकारे केली | लुटालूट   |   ऋण काढूनीया  |  करतोया सण || पावसात मन | गुंतलेले   |   काळी माय त्याला  | देते दोन घास  || जगण्याची  आस  | दुणावली  |   माझा  बळीराजा  | जोजवितो  आसू     || खेळवितो हासू | लटकेच   |   कविराजा मनी |  सतावते खंत  || वेदना दिगंत   | बळीराजा   |   © विजय यशवंत सातपुते यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009. मोबाईल ...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ सुजित साहित्य – सांगावा ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम (सुजित शिवाजी कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण कविता  “सांगावा ”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। )  ☆  सुजित साहित्य  –  सांगावा ☆    मोठा  अभंग   किती खोलवर             जीवनाचा  वार संकटांचा भार              काळजात .. . . !   शब्दांनीच सुरू              शब्दांनी शेवट चालू वटवट                  दिनरात.. . . . !   चार शब्द कधी              देतात आधार वास्तवाचा वार         ...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 57 – भूपतीवैभव वृत्त ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे (आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  एक आध्यात्मिक  एवं दार्शनिक कविता भूपतीवैभव वृत्त । सुश्री प्रभा जी की यह रचना वास्तव में  जन्म और पुनर्जन्म के मध्य विचरण करते ह्रदय की व्यथा कथा है।  पंढरपुर जाना कब संभव होगा यह तो उनके ही हाथों है किन्तु, विट्ठल की कृपा इस जीवन में सदैव बनी रहे यही अपेक्षा है। सुश्री प्रभा जी द्वारा रचित  इस भावप्रवण रचना के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन।   मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 57 ☆ ☆ भूपतीवैभव वृत्त  ☆   पाहिले कधी ना स्वप्न वेगळे काही चौकटी  घराच्या  मुळी मोडल्या नाही वाटले असे की एक सारिका व्हावे पिंज-यात  राघूसंगे रुणझुण गावे   पण क्षणात ठिणगी चेतवून मज गेली जगण्याला माझ्या नवी झळाळी आली अवचितसे  आले  वाटेवरती कोणी अन आयुष्याची झाली मंजुळ गाणी   नव्हताच कोणता...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मीनाक्षी साहित्य – मी सरपंच झाले – ☆ सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। कई पुरस्कारों/अलंकारों से पुरस्कृत/अलंकृत सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी का जीवन परिचय उनके ही शब्दों में – “नियतकालिके, मासिके यामध्ये कथा, ललित, कविता, बालसाहित्य  प्रकाशित. आकाशवाणीमध्ये कथाकथन, नभोनाट्ये , बालनाट्ये सादर. मराठी प्रकाशित साहित्य – कथा संग्रह — ५, ललित — ७, कादंबरी – २. बालसाहित्य – कथा संग्रह – १६,  नाटिका – २, कादंबरी – ३, कविता संग्रह – २, अनुवाद- हिंदी चार पुस्तकांचे मराठी अनुवाद. पुरस्कार/सन्मान – राज्यपुरस्कारासह एकूण अकरा पुरस्कार.) अब आप सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी के साप्ताहिक स्तम्भ – मीनाक्षी साहित्य को प्रत्येक बुधवार आत्मसात कर सकेंगे । आज प्रस्तुत है आपकी एक  सार्थक कविता  मी सरपंच झाले . ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मीनाक्षी साहित्य – मी सरपंच झाले – ☆   डोईवर  पदर, खाली  नदर, सही  भाद्दर, अशी  मी  निवडून आले, राखीव कोट्यातून सरपंच झाले.   तू हुबा रहायचं हात  जोडायच, जादा न्हाई बोलाय, असं मला धनी म्हनाले, अन्  मी सरपंच झाले. ।।   आम्ही करतो परचार , अजब कारभार, तुला न्हाई  जमनार, मालकांचे  बोल  मी आयकले नि गुमान हुबी मी रहायले  ।।   खुर्चीवर मी, शोभेची रानी, मागे घरधनी, हुकूम झेलत रहायले। नि नावाची सरपंच झाले।   चुलीतली अक्कल, लडवुन शक्कल, देऊन ...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 56 ☆ गुलामगिरी ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक समसामयिक एवं भावप्रवण कविता  “गुलामगिरी”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 56 ☆ ☆ गुलामगिरी ☆   वस्तीच्या ठिकाणी पोट भरत नाही म्हटल्यावर पंखातील बळ एकवटून लांबवर अन्न पाण्यासाठी भटकण्याची आम्हा पाखरांची सवयं स्वतःच पोटभरून पिल्लांसाठीचा चारा देखील हाती लागतो. फक्त उडण्याची जिद्द हवी. ज्यानं चोच दिली तो चारा देणारच हा विश्वास हवा.   असेच एके दिवशी उडत असतांना जवळच उष्टावलेल्या पत्रावळ्या, नजरेस पडल्या उष्ट्या पत्रावळ्यांवर ताव मारून तृप्त मनाने, लवकरच रानात पोहोचलो त्या दिवसापासून आमचे कष्ट संपले... गाव सधन होतं रोजच कुठे ना कुठे भोजनाचे सोहळे होत होते आम्ही उष्ट्या पत्रावळ्यांवर ताव मारत होतो जीवन खूप मजेत चाललं होतं...   पण एकेवर्षी दुष्काळ पडला अन्ना पाण्यासाठी लोक गाव सोडून जाऊ लागले आता आमचीही उपासमार सुरू झाली आता पहिल्या सारखी दूरवर उडण्याची ताकद पंखांत राहिली नव्हती उष्ट्या पत्रावळीसाठी स्विकारलेली गुलामगिरी आता जीवघेणी ठरत होती आळसावलेले पंख आकाश तोलू...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ उत्सव कवितेचा # 11 – रात रुपेरी ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर (सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  हम श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी के हृदय से आभारी हैं कि उन्होने साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा के माध्यम से अपनी रचनाएँ साझा करने की सहमति प्रदान की है। आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता  'रात रुपेरी' । ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा – # 11 ☆  ☆ रात रुपेरी ☆   मिटून गेल्या निळ्या नभातील कमलपाकळ्या डाळींबाच्या डालीवरती झुलू लागल्या स्वप्नकळ्या.   शिथील झाले दिशादिशांचे दिवसभराचे ताण थकल्या वाटा माग टाकीत उडे चिमुकला प्राण.   वाऱ्यावरूनी...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 7 ☆ परोपकार ☆ कवी राज शास्त्री

कवी राज शास्त्री (कवी राज शास्त्री जी (महंत कवी मुकुंदराज शास्त्री जी) का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप मराठी साहित्य की आलेख/निबंध एवं कविता विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। मराठी साहित्य, संस्कृत शास्त्री एवं वास्तुशास्त्र में विधिवत शिक्षण प्राप्त करने के उपरांत आप महानुभाव पंथ से विधिवत सन्यास ग्रहण कर आध्यात्मिक एवं समाज सेवा में समर्पित हैं। विगत दिनों आपका मराठी काव्य संग्रह “हे शब्द अंतरीचे” प्रकाशित हुआ है। ई-अभिव्यक्ति इसी शीर्षक से आपकी रचनाओं का साप्ताहिक स्तम्भ आज से प्रारम्भ कर रहा है। आज प्रस्तुत है पितृ दिवस के अवसर पर उनकी भावप्रवण कविता “परोपकार”) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 7 ☆  ☆ परोपकार ☆   एक फुलपाखरू मला स्पर्श करून गेलं अचानक बिचारं ते माझ्यावर आदळलं कसेतरी स्वतःला सावरत सावरत उडण्याचा स्व-बळे, प्रयत्न करू लागलं. त्याला मी जवळ घेतलं स्नेहाने अलगद ओंजळीत भरलं झाडाच्या फांदीवर हळूच सोडून दिलं… त्याला सोडलं जेव्हा, तेव्हा ओंजळ माझी रंगली पाहुनी त्या रंगाला मग कळी माझीच खुलली हसू मला आलं विचार सुद्धा आला, ना मागताच मला फुलपाखराने त्याचा रंग विनामूल्य बहाल केला, परोपकार कसा असावा याचा निर्भेळ पुरावा मला मिळाला…!   © कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री. श्री पंचकृष्ण...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 50 – आम्ही भाग्यवंत ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे    (श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आज  प्रस्तुत है  आपका  एक अत्यंत भावप्रवण  कविता  ” आम्ही भाग्यवंत”।  आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। ) ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 50 ☆ ☆ आम्ही भाग्यवंत ☆   नुरलिसे जीवा खंत। धन्य आम्ही भाग्यवंत।।१।।   प्रेम संस्काराने न्हालो यशवंत आम्ही झालो  ।।२।।   ओठी अमृताची गोडी जन मना नित्य जोडी।।३।।   संगे गोपाळांचा मेळा विठू जणू हा सावळा।।४।।   लुटे ज्ञानाची शिदोरी वसे शिष्यांच्या आंतरी।।५।।   घाली मायेची पाखर। बाणा परि कणखर ।।६।।   यशवंत भविष्याची। गुरुकिल्ली शिक्षणाची  ।।७।।   उभा पाठी हिमालय। बाबा जणू देवालय ।।८।।   प्रेम कोष उधळून। गेला निर्मोही सोडून ।।९।।   साद घाली वेडे मन यावे तोडुनी बंधन।।१०।।   माय पित्याविन दीन होऊ कशी पायी लीन।।११।।   रंजना लसणे आखाडा बाळापूर   ©  रंजना मधुकर लसणे आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली 9960128105...
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