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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 19 – अंधार  ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम   (श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजितजी की कलम का जादू ही तो है! अंधकार में प्रकाश की एक किरण ही काफी है हमारे अंतर्मन में आशा की किरण जगाने के लिए.  इस कविता अंधार  के लिए पुनः श्री सुजित कदम जी को बधाई. ) ☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #19☆    ☆ अंधार  ☆    अंधार माझ्या अंतर्मनात रूजलेला खोल श्वासात भिनलेला नसानसात वाहणारा दारा बाहेर थांबलेला चार भिंतीत कोडलेला शांत, भयाण भुकेलेल्या पिशाच्चा सारखा पायांच्या नखां पासून केसां पर्यंत सामावून गेला आहे माझ्यात आणि बनवू पहात आहे मला त्याच्याच जगण्याचा एक भाग म्हणून जोपर्यंत त्याचे अस्तित्व माझ्या नसानसात भिनले आहे तोपर्यंत आणि जोपर्यंत माझ्या डोळ्यांतून एखादा प्रकाश झोत माझ्या देहात प्रवेश करून माझ्या अंतर्मनात पसरलेला हा अंधार झिडकारून लावत नाही तोपर्यंत हा अंधार असाच राहील एका बंद...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 19 – ऐलोमा पैलोमा ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे   (आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनके पुरानी डायरी से एक कविता पर  एक कविता  “ऐलोमा पैलोमा ”.   बचपन में खेले गए खेलों के साथ उपजी कविता जैसे करेले की बेल के साथ अंकुरित होती है और बेल के साथ ही बढती है.  करेले के कोमल पत्ते,  फूल और फल. करेले की सब्जी के  स्वाद  सी कविता .  बचपन के खेल में गए गीत में सासु माँ का कथन  कि "बहु करेले की सब्जी खा फिर मायके जा" बहुत कुछ कह जाती है.  किन्तु, करेले सा यह कटु सत्य है कि  हम अपनी कविता की सही विवेचना हम  ही कर सकते हैं .  कुछ बातें गीतों और कविताओं में ही अच्छी लगती हैं. ऐसे  कुछ खेल अकेले ही  खेले जा सकते हैं. सुश्री प्रभा जी की कवितायें इतनी हृदयस्पर्शी होती हैं कि- कलम उनकी सम्माननीय रचनाओं पर या तो लिखे बिना बढ़ नहीं पाती अथवा निःशब्द हो जाती हैं। सुश्री प्रभा जी...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #20 – कोजागरी ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे   (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एकसामयिक एवं सार्थक कविता  “कोजागरी”।)    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 20 ☆    ☆ कोजागरी ☆ ती सोबतीस माझ्या कोजागरीच माझी येण्यास सोबतीला होताच चंद्र राजी मी भाग्यवंत आहे तू भेटलीस येथे माझे तुझे असूदे आता दिगंत नाते ग्लासात चंद्र आहे कोजागरी म्हणूनी ती केशरी मसाला गेली पुरी भिजोनी ओठास लावलेला प्याला जरी दुधाचा त्याच्यात गोडवा हा आला कसा मधाचा ही रात्र पौर्णिमेची हे रूप ही रुपेरी चंद्रास डाग आहे माझीच प्रीत कोरी ना वाटली कधीही मज नजर धुंद इतकी प्याला जरी दुधाचा तू वाटतेस साकी बागा भरून गेल्या साऱ्याच माणसांनी दोघेच फक्त आम्ही ह्या चिंब चांदण्यांनी © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८ ashokbhambure123@gmail.com...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ रंजना जी यांचे साहित्य #-18 – बहीण ☆ – श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे    (श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। आज  प्रस्तुत है  मानवीय रिश्तों पर आधारित  चारोळी विधा में  रचित एक भावप्रवण कविता  – “बहीण ”। )    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य #- 18 ☆     ☆  बहीण  ☆   थोरली बहीण प्रेमळ सावली। वैराण जीवनी भासते माऊली।   भावा बहिणीचे नाते जणू मोहरे वसंत । रूक्ष तापल्या मनाची असे पहिली पसंत ।   खट्याळ भाऊराया काढी बहिणीची खोडी। लाडीक या भांडणात वाढे जगण्याची गोडी।   अनमोल भासे मज तुझी चोळी अन्  साडी। नको मोडूस राजसा बहिणीची आस वेडी।   ©  रंजना मधुकर लसणे आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली 9960128105  ...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ मी_माझी – #23 – ☆ फुलं… ☆ – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते   (प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की अगली कड़ी  फुलं... .  सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं.  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं।  पुष्पों का हमारे जीवन के विभिन्न अवसरों पर सकारात्मक सम्बन्ध हैं. सुश्री आरुशी जी की कविता सहज ही हमें जीवन के प्रातः से संध्या तक घर आंगन से लेकर हमारे ह्रदय विभिन्न भावों में  फूलों की सुगंध का अहसास देती है.  सुश्रीआरुशी जी के संक्षिप्त एवं सार्थकआलेखों  तथा काव्याभिव्यक्ति का कोई सानी नहीं।  उनकी लेखनी को नमन। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़  सकेंगे।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #23 ☆   ☆ फुलं... ☆   फुलांना आपल्या आयुष्यात अनन्य साधारण महत्व आहे... आयुष्यातील प्रत्येक टप्प्यावर ह्यांची साथ मिळत असते, आणि गंमत म्हणजे बऱ्याच वेळा आपल्याला त्याची जाणीवही नसते... गृहीत धरतो की फुलं आहेतच, त्यात वेगळं...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 9 ☆ तू तेजस्विनी ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे   (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनकी कविता तू तेजस्विनी जो स्त्री जीवन पर आधारित महान महिलाओं को स्मरण कराती हुई एक अद्भुत कविता है.  श्रीमती उर्मिला जी  की सुन्दर कविता के माध्यम से उन समस्त स्त्री शक्तियों को नमन  एवं श्रीमती उर्मिला जी को ऐसी सुन्दर कविता के लिए हार्दिक बधाई. )   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 9 ☆   ☆ तू तेजस्विनी ☆ (विषय :- स्त्री जीवन)   तू तेजस्विनी माऊलींची मुक्ताबाई ! तू शूर शिवरायांची आई जिजाबाई ! तू कोल्हापूरची राणी पराक्रमी ताराबाई ! तू वीर शंभूराजे ची राजकुशल येसूबाई ! तू रायगडाच्या बुरुजावरची हिरकणी ! तू देशाची प्रथम प्राध्यापिका क्रांतीज्योती फुले सावित्रीबाई ! तू भगिनी निवेदिता विविकानंद बहिणाई ! तू...
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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ☆ शब्द ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते   (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए. जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है.आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं.  शब्द चाहे कैसा भी क्यों न हो कविता का अंश तो होता ही है. कविराज विजय जी ने ऐसे ही कई शब्दों से इस अतिसुन्दर कविता "शब्द" की रचना की है.)     ☆ शब्द ☆   शब्द  असा शब्द तसा सांगू तुला शब्द कसा? माणुसकीच्या ऐक्यासाठी पसरलेला एक पसा. .. . ! शब्द  अक्षरलेणे देऊन जातो देणे ह्रदयापासून ह्रदयापर्यंत करीत रहातो जाणे येणे. . . . ! शब्द आलंकृत शब्द सालंकृत. मनाचा आरसा जाणिवांनी सर्वश्रृत.. . . . ! कधी येतो साहित्यातून तर कधी काळजातून.. . ! शस्त्र होतो कधी कधी श्रावण सर शब्द म्हणजे कवितेचे हळवे ओले माहेरघर.. . . . !   © विजय यशवंत सातपुते यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009. मोबाईल  9371319798....
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 18 – माणसं…. ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम   (श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजितजी की कलम का जादू ही तो है!  क्या  वास्तव में  व्याकरण, शब्द, विराम चिन्हों की तरह ही होते हैं मनुष्य? यह प्रयोग निश्चित ही अद्भुत है.  इस कविता माणसं.... के लिए पुनः श्री सुजित कदम जी को बधाई. ) ☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #18☆    ☆ माणसं.... ☆    कधी काना, कधी मात्रा.. . कधी उकार , कधी वेलांटी.. . कधी अनुस्वार , कधी स्वल्पविराम.. . कधी अर्ध विराम, कधी विसर्ग.. . कधी उद्गगारवाचक, तर कधी पुर्णविराम.. . अक्षरांना ही भेटतात, अशीच.. . . काहीशी माणसं..!   © सुजित कदम, पुणे  मो.7276282626...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 18 – स्त्री पर्व ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे   (आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  पुनः  स्त्री पर  एक कविता  “स्त्री पर्व ”. सर्वप्रथम क्षमा चाहूँगा – कविता सामयिक होते हुए भी सामयिकता को अनुशासनात्मक स्वरूप न दे पाया। वैसे तो  समय पूर्व कविता मिलने के बावजूद इन पंक्तियों के लिखे जाते तक स्त्री पर्व सतत जारी है....  स्त्री पर्व का अंत असंभव है जहां इस पर्व के अंत की परिकल्पना करते हैं वही नव स्त्री पर्व का प्रारम्भ है। यह सत्य है कि हमारी कविता हमारे जीवन से संवेदनात्मक दृष्टि से जुड़ी हुई है, एक व्यक्तिगत फोटो एल्बम की तरह। जैसे एल्बम के चित्रों में समय के साथ झलकती परिपक्वता के साथ ही कविता परिपक्व होती प्रतीत होती है, वैसे ही हमारी भावनाएं, संघर्ष, संवेदनाएं, वेदनाएं, मानसिकता आदि का आईना होती जाती हैं हमारी कवितायें। फिर एक वह क्षण भी आता है जब लगता है कि संवेदनाएं शेष नहीं रहीं फिर उसी क्षण से अंकुरित होती है नई कविता एक...
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मराठी साहित्य – कविता – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-2 ☆ माकडं   ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

ई-अभिव्यक्ति -गांधी स्मृति विशेषांक-2 श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे गांधी स्मृति (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  इस अवसर पर श्री अशोक जी की इस कविता के लिए हार्दिक आभार. )  ☆ माकडं  ☆ बापुजी, तुमच्या त्या तीन माकडांच्या वंशावळीने शहरात अगदी उच्छाद मांडलाय. आता त्यांची संख्या प्रचंड प्रमाणात वाढली आहे. काही वाईट ऐकायला नको म्हणून तुमचं माकड कानावर हात ठेवायचं आता ही माकडं कानांवर हात नाही ठेवत तर ती वाकमनची दोन निपल्स कानांत घालून बसतात आणि मग कुणाचं काहीच ऐकत नाहीत.   कुणाला काही वाईट बोलायचं नाही म्हणून तुमचं माकड तोंडावर हात ठेवायचं पण हल्ली मात्र ही माकडं तोंडात गुटका किंवा तंबाखुचा बार भरून ठेवतात रस्ताभर पिचकार्‍यांच्या रांगोळ्या काढत फिरतात पिचकारी मारल्यावर जर कुणी काही बोललंच तर त्यांचं तोंड कसं बंद करायचं हे त्यांना चांगलंच ठावूक असतं.   आता हे तुमचं तिसरं घमेंडखोर माकड भर चौकात लाल दिवा दिसत असताना डोळ्यावर मगरुरीची पट्टी बांधून स्वतःच्या किंवा दुसर्‍याच्या जिवाची चिंता न करता भूर्रकण निघून जातंय.   तुमची ती माकडं कशी शांत आणि एका ओळीत बसलेली असायची आता मात्र ओळ आणि शिस्त पार बिघडू गेलेली. बापुजी...
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