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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #34 – मानवतेचा झेंडा ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है गणतंत्रता दिवस के अवसर पर रचित मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण एक विचारणीय कविता  “मानवतेचा झेंडा”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 34☆ ☆ मानवतेचा झेंडा ☆ (सर्व भारतीयांना प्रजासत्ताक दिनाच्या हार्दिक शुभेच्छा ! )   मानवतेचा झेंडा घेउन फिरतो मी तर जोडू हृदये मने जिंकुया ध्यास निरंतर   काल फुलांच्या झाडाखाली जरा पहुडलो कोण शिंपुनी देहावरती गेले अत्तर   देशोदेशी नेत्यांच्या या इमले माड्या प्रत्येकाच्या वाट्याला ना येथे छप्पर   शूर विरांच्या कर्तृत्वावर संशय घेती जी जी करुनी अतिरेक्यांचा करती आदर   देशभक्त हे मुसलमान तर शानच आहे रोहिंग्यांचा फक्त बांधुया बोऱ्याबिस्तर   देशासाठी धर्म बाजुला ठेवू थोडा मिळून सारे कट्टरतेला देऊ टक्कर   ईद दिवाळी मिळून सारे करू साजरी खिरीत हिंदू लाडुत मुस्लीम होवो साखर   अशोक भांबुरे, धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८ ashokbhambure123@gmail.com   © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. ashokbhambure123@gmail.com मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 33 – चार दिशेची चार पाखरे ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे    (श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। आज  प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण  कविता  “चार दिशेची चार पाखरे” । ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य # 33 ☆   ☆ चार दिशेची चार पाखरे ☆   सोडून कट्टी कर ना ग बट्टी, हट्ट सखे हा सोड ना। प्रेमा मध्ये नको दुरावा, बरी नव्हे ही खोड ना।।धृ।।   चार दिशेची चार पाखरे, जमलो या काव्यांगणी। सुखदुःखांच्या अनेक लहरी, मनास गेल्या छेडुनी। क्षणात हसणे क्षणात रुसणे  मैत्रीस या तोड ना।।१।।   ताई, माई, दादा, भाऊ, जमले सारे दोस्त ग। काव्य मैफिली इथे रंगल्या अफलातून या मस्त ग। चढाओढी अन् कुरघोडीची कधी न जमली जोड ना।।२।।   हाती हात नि पक्की साथ काव्य रसाची सारी रात। भिन्न रंग- रूप धर्म जरी, मधे ना आली केव्हा...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होत आहे रे # 18 ☆ वंशाचा दिवा ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होत आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनकी  एक विचारणीय काव्य अभिव्यक्ति  वंशाचा दिवा । इस कविता के सन्दर्भ में उल्लेखनीय  एवं विचारणीय है कि - वंश का  दीप कौन?  पुत्र या पुत्री ? आप  स्वयं निर्णय करें ।  इस अतिसुन्दर रचना के लिए श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को नमन।)   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 18 ☆   ☆ वंशाचा दिवा ☆ (काव्यप्रकार:- मुक्तछंद)   वंशाचा दिवा लावा वंशाचा दिवा ! अहो प्रत्येक घरात लागायलाच हवा ! सुनेला मुलगा व्हायलाच हवा ! अशी होती समाजात हवा !!   आज काळ बदलला मते बदलली! मुलगी झाली घरे आनंदली ! सासरच्यांची मते बदलली ! मुलगी झाली घरी लक्ष्मी आली !!   मुलगा तर हवाच हवा ! त्याशिवाय कां येणार...
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मराठी साहित्य ☆ कविता ☆ स्वच्छतेचा देवदूत. . . ! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आज प्रस्तुत है राष्ट्र संत बाबा गाडगे जी महाराज पर उनकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति स्वच्छतेचा देवदूत. . . ! )    ☆  स्वच्छतेचा देवदूत. . . !  ☆ (श्री विजय सातपुते जी की फेसबुक वाल से साभार ) ( अष्टाक्षरी ) चिंध्या पांघरोनी बाबा धरी मस्तकी गाडगे डेबुजी या बालकाने दिले स्वच्छतेचे धडे. . . . !   विदर्भात कोते गावी ,जन्मा आली ही विभूती. हाती खराटा घेऊन ,स्वच्छ केली रे विकृती. . . !   वसा लोकजागृतीचा ,केला समाज साक्षर श्रमदान करूनीया ,केला ज्ञानाचा जागर.   झाडूनीया माणसाला ,स्वच्छ केले  अंतर्मन. धर्मशाळा गावोगावी ,दिले तन, मन, धन. . . . !   देहश्रम पराकाष्ठा, समतेची दिली जोड संत अभंगाने केली ,बोली माणसाची गोड.. . !   धर्म, वर्ण, नाही भेद...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 31 – गेली कित्येक वर्षे…! ☆ श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम   (श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजितजी की कलम का जादू ही तो है!  आज प्रस्तुत है  एक हृदयस्पर्शी कविता  "गेली कित्येक वर्षे...!" ) ☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #31☆  ☆ गेली कित्येक वर्षे...! ☆    शहरात गेल्यापासून तुम्ही पार विसरून गेलात मला.., आज इतक्या वर्षानंतर तुम्ही मला घर म्हणत असाल की नाही ठाऊक नाही... पण मी अजूनही सांभांळून ठेवलंय.., घराचं घरपण तुम्ही जसं सोडून गेलात तसंच . . . गेल्या कित्येक वर्षात अनेक उन पावसाळ्यात मी तग धरून उभा राहतोय कसाबसा.... तुमच्या शिवाय... रोज न चुकता तुमच्या सर्वांचीआठवण येते ... पण खरं सांगू . . . आता नाही सहन होत हे ऊन वा-याचे घाव ... माझ्या छप्परांनीही आता माझी साथ सोडायचा निर्णय घेतलाय... माझा दरवाजा तर तुमची वाट पाहून पाहून कधीच माझा हात सोडून निखळून पडलाय....! माझ्या समोरच...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 33 – मी ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे (आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनकी अतिसुन्दर कविता  “मी”.  सुश्री प्रभा जी की कविता अनुवंश एक विमर्श ही नहीं आत्मावलोकन भी है।  यह कृति सक्षम है  सुश्री प्रभा जी के व्यक्तित्व  की झलक पाने के लिए। यह गंभीर काव्य विमर्श है ।  और वे अनायास ही इस रचना के माध्यम से अपनी मौलिक रचनाओं एवं मौलिक कृतित्व  पर विमर्श करती हैं। अभिमान एवं स्वाभिमान में एक धागे सा अंतर होता है और  पूरी रचना में अभिमान कहीं नहीं झलकता । झलकती है तो मात्र कठिन परिश्रम, सम्पूर्ण मौलिकता और विरासत में मिले संस्कार ।  इस बेबाक रचना  के लिए बधाई की पात्र हैं।  मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 33 ☆ ☆ मी ☆    मी नाही देवी अथवा समई देवघरातली! मला म्हणू ही...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #33 – सूर्य उगवतो आहे ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक  भावप्रवण कविता  “सूर्य उगवतो आहे”।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 33☆ ☆ सूर्य उगवतो आहे ☆   अलवार भावना त्याची मज कोमल म्हणतो आहे तो कुसुम म्हणता माजला हा गंध पसरतो आहे   हे भुंगे स्पर्शुन जाती पानास मिळेना संधी हा दहिवर पानावरती भावार्थ निथळतो आहे   मी फूल कळीचे होता पानाची वाढे सळसळ वाऱ्याने फूस दिल्याने तो मला बिलगतो आहे   हे फूल तोडुनी देतो मर्जीने कोणा माळी या शोकाकुल पानाचा आधार निखळतो आहे   हे फूल तोडुनी नेता निर्माल्य उद्याला होई या नैसर्गिक नियमांचा समतोल बिघडतो आहे   हे खेळ पाहुनी सारे मी खचले आज परंतू घेऊन नव्या स्वप्नांना हा सूर्य उगवतो आहे   या नदी तळ्याच्या काठी केल्यात फुलांनी वस्त्या हा चंद्र पाहण्या त्यांना पाण्यात उतरतो आहे   © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. ashokbhambure123@gmail.com मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 32 – भृण हत्या ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे    (श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। आज  प्रस्तुत है  सामजिक व्यवस्था को झकझोरती हुई एक कविता  “भृण हत्या” । ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य # 32 ☆   ☆ भृण हत्या ☆   करा विचार जरासा नका होऊ अविचारी। पुत्र मोहापाई  का हो भृणहत्या ही उदरी।   आजी आत्या मामी काकी आई ताई मावळण। रुपे नारीची अनेक करी प्रेम उधळण।   वंश वेल वाढवीन उद्धरीन दोन्ही कुळे । तरी का हो आई बाबा खिन्न होता  माझ्यामुळे।   तुझ्या हाती सोपविली माझ्या श्वासाची ही दोरं नको फिरवू ग सुरी होई घायाळ ही पोरं   मुले जरी वंश दीप मुली तरी कुठे कमी। खुडू नको गर्भी कळी फुलण्याची द्या ना हमी।   ©  रंजना मधुकर लसणे आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली 9960128105...
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मराठी साहित्य ☆ कविता ☆ फुले विद्यापीठ  .. . . . ! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आज प्रस्तुत है भारत वर्ष में स्त्री शिक्षा में क्रान्ति लाने वाली महान स्त्री शक्ति  सावित्री बाई फुले पर आधारित उनकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति फुले विद्यापीठ  .. . . . !  )  ☆ फुले विद्यापीठ  .. . . . !  ☆ (श्री विजय सातपुते जी की फेसबुक वाल से साभार ) तव्यावर भाकर भाजता भाजता ज्योतिबाच्या इच्छेखातर, गिरवाया शिकली  अक्षर कधी पिठात. .  तर कधी. . धूळपाटिवर. . . ! लिवाय शिकली. . .  वाचाय शिकली, तवा उमगलं माता सावित्रीला .. या समाजानं अज्ञानाच्या चुलाण्यावर रांधलेला रूढी परंपरेचा तवा .. . तापायला नगं . . .  तळपायला हवा. . . ! बाईवर लादलेली ,  पिढ्या पिढ्यांची . . वर्तुळाकार बंधन  . . . तिची...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होत आहे रे # 17 ☆ हुर्डा पार्टी ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होत आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनकी विनोदपूर्ण  कविता  हुर्डा पार्टी । इस कविता के सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि आप ‘ लोकमान्य हास्य  योग  संघ, दौलतनगर शाखा आनंदनगर पुणे की सदस्य रही हैं। उनके वर्ग की  सदस्याओं द्वारा  एक छोटी  पिकनिक ट्रिप  का आयोजन किया गया। किन्तु, वह ट्रिप कैंसिल हो गई। उन्होंने  काव्यात्मक कल्पना की है कि- यदि ट्रिप  सफलतापूर्वक आयोजित की जाती  तो कितना आनंद आता। मित्रों जीवन में आनंद का अपना महत्व है। आप भी इस काल्पनिक ट्रिप का आनंद लीजिये जिसे श्रीमती उर्मिला जी ने बड़े ही आनंदमय होकर कविता में शब्दबद्ध किया है।)   ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने...
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