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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 44 ☆ चंद्रकोर ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है असमय भयावह वर्षा पर आधारित रचना  “चंद्रकोर”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 44 ☆ ☆ चंद्रकोर ☆   पाणी पाणी ओरडत राती उठलं शिवार कसा अंधाऱ्या रातीला आला पावसाला जोर   वीज कडाडली त्यात आणि विझली ही वात धडधडते ही छाती भीती दाटलेली आत झोप उडाली घराची जागी रातभर पोरं कसा अंधाऱ्या रातीला...   मेघ रडवेला झाला कुणी डिवचल त्याला गडगड हा लोळला ओला चिंब केला पाला त्याला शांतवण्यासाठी बघा नाचला हा मोर कसा अंधाऱ्या रातीला...   चंद्र होता साक्ष देत शुभ्र होतं हे आकाश क्षणभरात अंधार कुठं गेला हा प्रकाश काळ्या ढगानं झाकली कशी होती चंद्रकोर कसा अंधाऱ्या रातीला...   डोळ्यांसमोर तरळे जसा कापसाचा धागा एका दिसात टाचल्या त्यानं धरतीच्या भेगा इंद्र देवाने सोडला वाटे जादूचा हा दोर कसा अंधाऱ्या रातीला...   जाऊ पावसाच्या गावा सोडू कागदाच्या नावा नावेमधे हा संदेश ठेवा लक्ष...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 41 –  गाठोडे ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे    (श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। आज  प्रस्तुत है  नानी / दादी की स्मृतियों में खो जाने लायक संयुक्त  परिवार एवं ग्राम्य परिवेश में व्यतीत पुराने दिनों को याद दिलाती एक अतिसुन्दर मौलिक कविता   “ गाठोडे”) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य # 41 ☆   ☆  गाठोडे ☆   कुठे गेले आजीबाई तुझे गाठोडे ग सांग। खाऊ, खेळणी, औषध यांची देत आसे बांग।   गाठोड्यात पोटलीची असे जादू  लई भारी। क्षणार्धात दिसेनासी होई समूळ बिमारी।   काच कांगऱ्या कवड्या खेळ पुन्हा रोज रंगे। सारीपाट  सोंगट्यांची हवी मला जोडी संगे।   मऊशार उबदार तुझी गोधडी जोडाची। जादू तिची वाढविते कशी रंगत स्वप्नाची।   गाठोड्याची कळ तुझ्या कुणी दाबली ग बाई। सर त्याची कपाटाला कशी येईल ग बाई।   श्रीमतीचे आईचे हे भूत जाईल का देवा गाठोड्याच्या मायेचा तो पुन्हा देशील का ठेवा।   ©  रंजना मधुकर लसणे आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली 9960128105...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 4 ☆ स्वप्न ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे ( ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है । आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण  कविता “स्वप्न“.)  ☆...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 30 ☆ जीव ताटवा फुलांचा ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे (सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  प्रकृति के आँचल में लिखी हुई एक अतिसुन्दर भावप्रवण  मराठी कविता  “जीव ताटवा फुलांचा ”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 30 ☆ ☆ जीव ताटवा फुलांचा  ☆ कधी दूर ताटवा फुलांचा, माझ्या संगतीला येतो.   कधी दूर ताटवा चांदण्यांचा, राती संगतीला राहतो.   कधी रात राहते संगतीस, तव आठवांचा पूर येतो.   कधी आठवणींच्या हिंदोळयावर सूर, डोळ्यांतून येतो.   कधी सूर आळवी- आर्जवी, उर हळाळून येतो.   कधी जीव आठवांच्या ताटव्यात, चांदणेच होतो.   © सुजाता काले पंचगनी, महाराष्ट्रा। 9975577684 sujata.kale23@gmail.com...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ राजमाता जिजाऊ ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अत्यंत भावपूर्ण कविता "राजमाता जिजाऊ "।) ☆ कविता –  राजमाता जिजाऊ  ☆   राजमाता जिजाऊने इतिहास घडविला सिंदखेड गाव तिचा कर्तृत्वाने सजविला.. . . !   उभारणी स्वराज्याची शिवबाचा झाली श्वास स्वाभिमान जागविला गुलामीचा केला -हास.. . . !   सोनियाच्या नांगराने जनी पेरला विश्वास माता, भगिनी रक्षण कर्तृत्वाचा झाली ध्यास.   माय जिजाऊची कथा मावळ्यांचा काळजात छत्रपती शिवराय दैवी लेणे अंतरात.. . !   वीरपत्नी, वीरमाता संघटीत शौर्य शक्ती भवानीचा अवतार चेतविली देशभक्ती.. . . . !   © विजय यशवंत सातपुते यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009. मोबाईल  9371319798....
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मराठी साहित्य ☆ कविता ☆ विश्वमारी म्हणा किंवा महामारी ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव  समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  द्वारा  मानवता के लिए मेरी कविता "विश्वमारी या महामारी " का मराठी भावानुवाद ।  मैं  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  ( हिंदी , संस्कृत, अंग्रेजी एवं उर्दू के विद्वान ) एवं  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  का  हृदय से आभारी हूँ जो उन्होंने मेरे आग्रह को स्वीकार कर इस समसामयिक कविता का क्रमशः अंग्रेजी एवं मराठी  में भावानुवाद किया।  आप मौलिक हिंदी कविता एवं अंग्रेजी भावानुवाद निम्न लिंक्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं -  विश्वमारी या महामारी - हेमन्त बावनकर  Epidemic or Pandemic – Captain Pravin ...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 43 ☆ मावृत्वाचा पदर ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता  “मावृत्वाचा पदर”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 43 ☆ ☆ मावृत्वाचा पदर ☆ मी नाही देऊ शकत तुझ्या मातृत्वाच्या पदराला सागर किंवा आकाशाचं परिमाण...   अमृताहू मधुर अशा मातेच्या दुधावर वाढलेला जीव अमृतासारख्या भ्रामक कल्पनेला कसा देऊ शकेल थारा...   ॐकाराचा ध्वनी, चित्त शांत करीत असला तरी माझ्या मातेच्या मुखातून निघालेले ध्वनी मला आजही उर्जा देऊन पुलकीत करतात...   सूर्याचा प्रखर प्रकाश सौम्य करण्यासाठी ती होते चंद्र आणि लेकराच्या आयुष्याचं करून टाकते तारांगण...   तारांगणाला बांधलेल्या पाळण्याची दोरी तिच्या हातात असते म्हणून चंदनाच्या पाळण्यातलं आणि झोळीतलं बाळही तेवढ्याच निर्धास्तपणे झोपतं गरीब श्रीमंतीचा भेदभाव विसरून...   जगातली कुठलीच माता गरीब नसते मातृहृदयाच्या तिजोरीत न मावणारी श्रीमंती तिच्या प्रत्येक कृतीतून दिसत असते.   म्हणूनच  मातृत्वाच्या पदराला मी नाही देऊ शकत सागर किंवा आकाशाचं परिमाण...   © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. ashokbhambure123@gmail.com मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८...
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मराठी साहित्य ☆ कविता ☆ करोना करोना माजलास काय ?  ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते (समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव सामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है विश्व भर में फैली महामारी कोरोना वाइरस से सम्बंधित समसामयिक, विचारणीय कविता  “ कोरोना कोरोना माजलास काय ” )  ☆ कविता -  कोरोना कोरोना माजलास काय ? ☆   कोरोना कोरोना माजलास काय गर्दीच्या ठिकाणी घुसलास काय ? गर्दीच्या ठिकाणी जमावबंदी करणार तुझी संचारबंदी. सर्दी खोकला आणि ताप लक्षणे तुझी घेऊन जा. घाबरणार नाही मरणार नाही तुझ्या गमजा चालणार नाही . आम्ही घेतोय सावधानी नको तुझी मनमानी. आलास तसाच निघून जा धुतलेत हात निसटून जा. तुझे चाळे तुझ्या पाशी आमचे स्वास्थ्य आमच्या पाशी. तुझी  डाळ शिजणार नाही संसर्गाने मरणार नाही. असला जरी तू सर्वनाशी पुरे झाल्या पापराशी. नसलो जरी अविनाशी आम्ही आहोत पापनाशी. आम्ही आहोत पापनाशी.   © विजय यशवंत सातपुते यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 40 – माझी मायभूमि ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे    (श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। आज  प्रस्तुत है  मातृभूमि पर आधारित आपकी एक अतिसुन्दर मौलिक कविता   “माझी मायभूमि ”) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य # 40 ☆   ☆ माझी मायभूमि  ☆   माझी मायभूमी। विश्वाचे भूषण। संस्कृती रक्षण। सर्वकाळ।।१।।   उंच हिमालय। मस्तकी मुकूट।तैसा चित्रकूट। शोभिवंत ।।२।।   सप्त सरितांचे। जल आचमन। पावन जीवन।सकलांचे।।३।।   तव चरणासी।जलधी तरंग। उधळीती रंग। अविरत ।।४।।   नाना धर्म पंथ । अगणित  जाती। नांदती सांगाती। आनंदाने ।।५।।   संत महंत हे। ख्यातनाम धामी। नर रत्न नामी। पुत्र तुझे।।६।   वीर धुरंधर ।रत्न ते अपार। करिती संहार । अधमांचा।।७।।   असे माय तुझी।  परंपरा थोर । जपू निरंतर । प्रेमभावे।।८।।   ©  रंजना मधुकर लसणे आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली 9960128105...
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मराठी साहित्य – कविता ☆ विश्व कविता दिवस – श्वास मोकळा ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज  प्रस्तुत है  विश्व कविता दिवस पर आपकी एक  विशेष कविता   “श्वास मोकळा ”।) ☆ श्वास मोकळा ☆ (जागतिक कविता दिनाच्या सर्व कवी, कवयित्री व कवितांचा आस्वाद घेणाऱ्या रसिकांना मनापासून शुभेच्छा!)   रस्त्याने या जरी घेतला श्वास मोकळा मला वाटले रस्ता झाला आज पांगळा   सुन्याच बागा मैदानावर नाही गर्दी हुशार काळा आळसावून बसलाय फळा   शस्त्राविन हे युद्ध लादले या जगतावर रक्तपात ना मरतो आहे देह सापळा   मित्र जमेना संचारावर आली बंदी आवरला मग साऱ्यांनी हा मोह आंधळा   सार्क देश हे मिळून करतील इथे सामना नका करू रे तुम्ही पराचा उगा कावळा   बर्गर पिझ्झा खाणे आता बंदच केले आंबट-चिंबट चाखत आहे संत्र आवळा   तुझ्या सारखे कितीतरी रे आले गेले युद्ध जिंकुनी पुन्हा एकदा करू सोहळा   © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. ashokbhambure123@gmail.com मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८...
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