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संस्थाएं / Organisations ☆ हिन्दी परिपक्वता हेतु समर्पित संस्था हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर ☆

 ☆  संस्थाएं / Organisations  ☆ 

☆  हिन्दी परिपक्वता हेतु समर्पित संस्था – हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर ☆  

साहित्यिक गतिविधियों की बात करें  तो पूरे मध्य प्रदेश में संस्कारधानी जबलपुर का नाम सबसे पहले लिया जाता है। देश में प्रयागराज (इलाहाबाद) के पश्चात जबलपुर ही एक ऐसा शहर  है जहाँ लगभग हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं के राष्ट्रस्तरीय साहित्यकारों ने अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित की है। सुभद्रा कुमारी चौहान, भवानी प्रसाद तिवारी, द्वारिका प्रसाद मिश्र, हरिशंकर परसाई जैसे दिग्गजों को कौन नहीं जानता। जबलपुर के ही कामता प्रसाद गुरु की व्याकरण ने हिंदी को जो आयाम और दिशा दी है, उसके लिए सम्पूर्ण राष्ट्र उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगा। वर्तमान तक पहुँचते पहुँचते हिन्दी साहित्य का सृजन-प्रवाह धीमा तो नहीं हुआ परन्तु हिन्दी व्याकरण, शाब्दिक शुद्धता तथा रस-छंद-अलंकार की ओर अपेक्षानुरूप ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

बिना व्याकरण ज्ञान, बिना हिन्दी शब्दों की शुद्धता तथा हिन्दी साहित्य के अथाह सागर में बिना डुबकी लगाए ही लोग हिन्दी के मोती अर्जित करना चाहते हैं। बिना परिश्रम के कवि और लेखक बनना चाहते हैं। अपनी प्रायोजित प्रसिद्धि पाना चाहते हैं। ये लोग अल्पकालिक प्रसिद्धि की चाह में तरह-तरह के हथकण्डे अपनाने से भी परहेज नहीं करते। स्तरहीन लेखन से स्वयं को श्रेष्ठ दिखाना चाहते हैं, जबकि श्रेष्ठ होना और श्रेष्ठता प्रदर्शित करने में बहुत अंतर होता है। परस्पर पीठ थपथपाने का प्रचलन आज इतना अधिक हो गया है कि श्रेष्ठ साहित्य और साहित्यकार हाशिये पर जाते दिख रहे हैं। गहन अध्ययन, समयदान व चिंतन-मनन के पश्चात लिखे श्रेष्ठ और सद्साहित्य को आज पाठकों के लाले पड़ने लगे हैं। लोग स्तरहीन, त्रुटिपूर्ण और अर्थहीन साहित्य पढ़ कर ही सुखानुभूति करने लगा है। उपरोक्त टीस और अकुलाहट की परिणति ही “हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर” है।

हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर अपनी विशिष्ट साहित्य गतिविधियों को रचनात्मक स्वरूप प्रदान करने हेतु कटिबद्ध है। छद्म प्रचार-प्रसार से परे प्रतिवर्ष अपने स्थापना दिवस पर एक गरिमामय कार्यक्रम के साथ पूरे वर्ष हिन्दी भाषा, हिन्दी साहित्य एवं विभिन्न विधाओं की गोष्ठियों के माध्यम से यह साहित्य संगम अपनी वेबसाइट “हिन्दी साहित्य संगम डॉट कॉम” हिन्दी ब्लॉग “हिन्दी साहित्य संगम डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम तथा व्हाट्सएप समूह “हिन्दी साहित्य संगम” के माध्यम से हिन्दी रचना संसार में निरंतर सक्रियता बनाए हुए है। इस संस्था में सदस्यता शुल्क का कोई प्रावधान नहीं है। संस्कारधानी के इन्द्र बहादुर श्रीवास्तव, रमेश सैनी, मनोज शुक्ल, राजेश पाठक ‘प्रवीण’, राजीव गुप्ता, रमाकान्त ताम्रकार, अरुण यादव, विजय तिवारी ‘किसलय’ जैसे लोग इस संस्था के आधार स्तंभ हैं। छोटे-छोटे समूहों में एकत्र होकर अथवा ऑन लाइन  हिन्दी साहित्य प्रेमियों को हिन्दी की बारीकियों, हिन्दी शब्दों की संरचना, हिन्दी व्याकरण, छंद-रचना तथा काव्य में रुचि रखने वाले नवागंतुक साहित्यकारों को निःशुल्क  हर समय मार्गदर्शन दिया जा रहा है। प्रादेशिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों का लाभान्वित होना संस्था की सार्थकता का परिचायक है। ‘हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर’ के संस्थापक विजय तिवारी किसलय विगत 30 वर्ष से तन-मन-धन से हिन्दी साहित्य प्रेमियों को शुद्ध हिन्दी, स्तरीय हिन्दी साहित्य, हिन्दी काव्य एवं छांदिक मार्गदर्शन प्रदान करते आ रहे हैं। हिन्दी के प्रति कृतज्ञभाव रखने वाले श्री किसलय को हिन्दी सेवा में ही परमानंद प्राप्त होता है। भविष्य में इनकी अभिलाषा है कि शुद्ध हिन्दी, हिन्दी व्याकरण, छांदिक ज्ञान तथा हिन्दी भाषा में सृजन की जानकारी प्रदान करने वाली नियमित कार्यशालाएँ प्रारम्भ कर सकें। इनका कहना है कि आज केवल वही राष्ट्र विकसित और श्रेष्ठ हैं जिनकी अपनी भाषा है और जहाँ के लोग अपनी भाषा पर गौरवान्वित होते हैं। हमें भी अपनी हिन्दी को अपनाने का संकल्प लेना होगा। यहॉं ध्यातव्य  है कि विश्व की समस्त भाषाओं में सबसे ज्यादा शब्द भंडार हमारी हिन्दी भाषा का ही है, बस हमें उन्हें अपनाने और प्रसारित करने का बीड़ा भर उठाना है और यह कार्य हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर निश्छल भाव से भविष्य में भी करता रहेगा।

साभार : डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

ब्लॉग : हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर (hindisahityasangam.blogspot.com)

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




संस्थाएं / Organisations ☆  मुश्किल हालात में भी हम हैं न…. हैल्पिंग हेण्ड्स – फॉरएवर वेल्फेयर सोसायटी  ☆  

  ☆  संस्थाएं / Organisations  ☆ 

  ☆  मुश्किल हालात में भी हम हैं न…. हैल्पिंग हेण्ड्स – फॉरएवर वेल्फेयर सोसायटी    ☆  

 

आज के संवेदनहीन एवं संवादविहीन होते समाज में भी कुछ संवेदनशील व्यक्ति हैं, जिन पर समाज का वह हिस्सा निर्भर है जो स्वयं को असहाय महसूस करता है। ऐसे ही संवेदनशील व्यक्तियों की संवेदनशील अभिव्यक्ति का परिणाम है “हैल्पिंग हेण्ड्स – फॉरएवर वेल्फेयर सोसायटी” जैसी संस्थाओं का गठन। इस संस्था की नींव रखने वाले समाज-सेवा को समर्पित आदरणीय श्री देवेंद्र सिंह अरोरा  (अरोरा फुटवेयर, जबलपुर के संचालक) एक अत्यंत संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी हैं, जो यह स्वीकार करने से स्पष्ट इंकार करते हैं कि- वे इस संस्था की नींव के पत्थर हैं। उनका मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति जो इस संस्था से जुड़ा है वह इस संस्था की नींव का पत्थर है। उनकी यही भावना संस्था के सदस्यों को मजबूती प्रदान करती है।

 

आज जब सारा विश्व अदृश्य शत्रु ‘कोरोना’ से संघर्ष कर रहा है। हमारे देश में भी लॉकडाउन  लोग अपने अपने घरों में कैद हो गए हैं। आज हमारे पास घर हैं, राशन है और आपातकालीन व्यवस्था है।

उनका क्या जिनके पास छत ही नहीं है, अनाज तो दूर की बात है? उनका क्या जिनके पास छत है किन्तु, खाने को नहीं है? उनका क्या जो रोज कमाते और रोज खाते हैं? ऐसे और भी जरूरतमन्द लोग हैं जो रोज़मर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर सकते? फिर भूख … भूख होती है….हर इंसान को लगभग 6-8 घंटे में लगती ही है….फिर क्या अमीर क्या गरीब?   लेकिन भूख क्या होती है उससे पूछिये जिसके पास कुछ भी नही है।

किन्तु, आज भी मानवता जीवित है। मानवीय संवेदनाएं जीवित हैं। ऐसे कुछ लोग और ऐसे लोगों से बनी हुई संस्थाएं हैं, जो निःस्वार्थ भाव से अपनी जान जोखिम में डाल कर ऐसे लोगों के लिए दिन रात उनकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति में जुटे हैं। ऐसे भी कुछ लोग हैं जो ऐसी संस्थाओं को तन-मन-धन से सहयोग कर रहे हैं। साथ ही हमारे पुलिस मित्र जो 24×7 अपनी सेवाएँ दे रहे हैं उन्हें भी समय समय पर अपना पूर्ण सहयोग प्रदान कर रहे हैं।

ऐसी कई सेवभावी संस्थाएं सारे राष्ट्र में निःस्वार्थ भाव से तन मन धन से समाजसेवा में लगी हुई हैं। मेरी जानकारी में ऐसी ही एक संस्था जबलपुर में कार्यरत है जिसकी जानकारी ई-अभिव्यक्ति नें 1 नवंबर को 2018 प्रकाशित की थी जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं:-

संस्थाएं – “हैल्पिंग हेण्ड्स – फॉरएवर वेल्फेयर सोसायटी”

संस्था के अनुसार – “हमारी कोशिश होती है कि हम हर हाल और हर परिस्थिति में भी लोगों के काम आ सकें। हमारे सदस्यों का यही जज़्बा हमें बनाता है……हेल्पिंग हैंड्स”

वर्तमान परिस्थितियों में संस्था के श्री विनोद शर्मा जी के अनुसार – जब 21 दिन के कर्फ्यू की तरह के लाक डाउन की घोषणा कर दी गई है। ऐसे हालात में हमे उनकी भी चिंता करनी है जो गरीब और बेबस है। उनके पास खाने को कुछ भी नही है। हेल्पिंग हैंड्स की कार्यसमिति ने  ऐसे लोगो की मदद का निर्णय लिया है। ऐसे हालात में गरीबों बेबसों के लिए भोजन की व्यवस्था/खाने के पैकेट बांटने के लिए हमने प्रशासन से बात की। चूंकि मेडिकल प्रोटोकाल और कर्फ्यू दोनों है अतः प्रशासन ने कहा कि खाने के पैकेट आप हमारे पास तक पहुचाइए हम उन जरूरतमंद लोगों तक पहुँचा देंगे।

संस्था को इस काम के लिए प्रशासन द्वारा दो कर्फ्यू पास भी जारी किये गए। संस्था की ओर से उपाध्यक्ष श्री प्रवीण भाटिया एवं सचिव श्री देवेंद्र सिंह अरोरा पैकेट्स पुलिस ठाणे तक पहुंचा देते हैं । प्रशासन और पुलिस की पेट्रोलिंग टीम को मालूम है कि इस हालात में कहां-कहां जरूरतमंद लोग हैं? क्योंकि सारी सूचना वही पहुँच रही है। अब प्रशासन और पुलिस की टीम इन पैकेट्स को बांटने की व्यवस्था कर रही है। यह पूरी एक चेन है। व्यक्ति अकेले कुछ भी नही होता। जब सब मिल कर कोई काम करते हैं तब कुछ भी असंभव नही होता।

संस्था के ही एक सदस्य डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ जी कहते हैं – “इस कोरोना महामारी के आपद काल में मन निश्छल रखते हुए सबका कर्त्तव्य व दायित्व है कि हम मानवीय धर्म का पालन करें। धीरज रखें और समाज में मित्र भाव से परपीड़ाओं के यथोचित समाधान में सहयोगी बनें।“

धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी

आपद काल परखिअहिं चारी

एवं

परहित सरिस धर्म नहीं भाई,

परपीड़ा सम नहीं अधमाई.

जैसी सूक्तियों को चरितार्थ करें। हमारी हेल्पिंग हैंड्स सोसायटी ने  “फ़ॉर एवर वेलफेयर” वाक्य को सत्य साबित किया है।

हम सब देख ही रहे हैं कि जिस उदारता से हमारे सदस्यगण आगे बढ़कर सहयोग की घोषणा किये जा रहे हैं, इसकी कृतज्ञता हेतु कोई शब्द नहीं है।

हम तो बस इतना जानते हैं कि जबलपुर में हमारी संस्था “हेल्पिंग हैंड्स” और सदस्यों का जज़्बा यूँ ही बरकरार रहे। संस्था एक मिसाल कायम करे।

हेल्पिंग हैंड्स में न कोई छोटा न बड़ा सब सिर्फ भावना से जुड़े हैं। हमारे सदस्यों की नेक कामों के लिए भावना गंगा की तरह निर्मल और हिमालय की ऊंची है और वे दुनिया के सबसे नेक इंसान हैं।

(अधिक जानकारी  एवं हैल्पिंग  से जुडने के लिए आप श्री देवेंद्र सिंह अरोरा जी से मोबाइल 9827007231 पर अथवा फेसबुक पेज   https://www.facebook.com/Helping-Hands-FWS-Jabalpur-216595285348516/?ref=br_tf पर विजिट कर सकते हैं।)

 ☆  यह काम संस्था लगातार तब तक करेगी जब तक स्थिति सामान्य नही हो जाती ☆  

(हम ऐसी अन्य सामाजिक एवं हितार्थ संस्थाओं की जानकारी अभिव्यक्त करने हेतु कटिबद्ध हूँ।  यदि आपके पास ऐसी किसी संस्था की जानकारी हो तो उसे शेयर करने में हमें अत्यंत प्रसन्नता होगी।)

 ☆  ई- अभिव्यक्ति  की और से मानवता की सेवा में निःस्वार्थ और नेक इंसानों की टीम “हेल्पिंग  हैंड्स” के जज्बे को सलाम!  ☆




संस्थाएं / Organisations – ☆ हैल्पिंग हेण्ड्स – फॉरएवर वेल्फेयर सोसायटी ☆ – डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय’

 ☆ हैल्पिंग हेण्ड्स – फॉरएवर वेल्फेयर सोसायटी ☆ 

डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय

(www.e-abhivyakti.com की ओर से मानव कल्याण एवं समाज सेवा के लिए निःस्वार्थ भाव से समर्पित संस्था “हेल्पिंग हेण्ड्स फॉरएवर वेलफेयर सोसायटी” के सदस्यों का उनके चतुर्थ स्थापना दिवस के अवसर पर हार्दिक अभिनंदन।   इस विशेष अवसर  पर  कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय’ जी के आख्यान को उद्धृत करने में प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं।)  

 

हेल्पिंग हेण्ड्स फॉरएवर वेलफेयर सोसायटी का आज हम सभी चतुर्थ स्थापना दिवस मनाने हेतु आत्मीय एवं पारिवारिक रूप से एकत्र हुए हैं। आप सभी को हृदयतल से बधाई।

संस्था “यथा नाम तथा गुणो” का पर्याय है। ‘हेल्पिंग हैंड्स’ अर्थात ‘मददगार हाथ’ आज प्राणपण से समाजसेवा में अहर्निश तत्पर हैं। यह सब मैं संस्था से जुड़कर देख पा रहा हूँ। मैं आज केवल संस्था के उद्देश्य “परोपकारी भाव” से संबंधित अपने विचार आप सब के साथ बाँटना चाहता हूँ। उपस्थित विद्वतजनों से 5 मिनट शांति एवं ध्यान चाहूँगा।

महापुण्य उपकार है, महापाप अपकार।

स्वार्थ के दायरे से निकलकर व्यक्ति जब दूसरों की भलाई के विषय में सोचता है, दूसरों के लिये कार्य करता है, वही परोपकार है। इस संदर्भ में हम कह सकते हैं कि भगवान सबसे बड़ा परोपकारी है, जिसने हमारे कल्याण के लिये संसार का निर्माण किया। प्रकृति का प्रत्येक अंश परोपकार की शिक्षा देता प्रतीत होता है। सूर्य और चाँद हमें  प्रकाश देते हैं। नदियाँ अपने जल से हमारी प्यास बुझाती हैं। गाय-भैंस हमारे लिये दूध देती हैं। बादल धरती के लिये झूमकर बरसते हैं। फूल अपनी सुगन्ध से दूसरों का जीवन सुगन्धित करते हैं।

परोपकारी मनुष्य स्वभाव से ही उत्तम प्रवृत्ति के होते हैं। उन्हें दूसरों को सुख देकर आनंद मिलता है।

परोपकार करने से यश बढ़ता है, दुआयें मिलती हैं, सम्मान प्राप्त होता है।

तुलसीदास जी ने कहा है-

‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधभाई।’

प्रकृति भी हमें परोपकार करने के हजारों उदाहरण देती है जैसे :-

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः।

परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थं इदं शरीरम् ॥

अपने लिए तो सभी जीते हैं किन्तु वह जीवन जो औरों की सहायता में बीते, सार्थक जीवन है। उदाहरण के लिए किसान हमारे लिए अन्न उपजाते हैं, सैनिक प्राणों की बाजी लगा कर देश की रक्षा करते हैं। परोपकार किये बिना जीना निरर्थक है। स्वामी विवेकानद, स्वामी दयानन्द, गांधी जी, रवींद्र नाथ टैगोर जैसे महान पुरुषों के जीवन परोपकार के जीते जागते उदाहरण हैं। ये महापुरुष आज भी वंदनीय हैं।

न्यूटन के गति का  तीसरा नियम भी कहता है:-

For every action, there is an equal and opposite reaction.

ठीक वैसे ही कर्म का फल भी मिलता है अर्थात- जैसी करनी, वैसी भरनी।

यों रहीम सुख होत है, उपकारी के संग।

बाँटनवारे को लगे, ज्यों मेहंदी को रंग ॥

जब कोई जरूरतमंद हमसे कुछ माँगे तो हमें अपनी सामर्थ्य के अनुरूप उसकी सहायता अवश्य करना चाहिए। सिक्खों के गुरू नानकदेव जी ने व्यापार के लिए दी गई सम्पत्ति से साधु-सन्तों को भोजन कराके परोपकार का सच्चा सौदा किया।

एक बात और है। परोपकार केवल आर्थिक रूप में नहीं होता; वह मीठे बोल बोलना, किसी जरूरतमंद विद्यार्थी को पढ़ाना, भटके को राह दिखाना, समय पर ठीक सलाह देना, भोजन, वस्त्र, आवास, धन का दान कर जरूरतमंदों का भला कर भी किया सकता है।

पशु और पक्षी भी अपने ऊपर किए गए उपकार के प्रति कृतज्ञ होते हैं। फिर मनुष्य तो विवेकशील प्राणी है। उसे तो पशुओं से दो कदम आगे बढ़कर परोपकारी होना चाहिए। परोपकार अनेकानेक रूप से कर आत्मिक आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। जैसे-प्यासे को पानी पिलाना, बीमार या घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाना, वृद्धों को बस में सीट देना, अन्धों को सड़क पार करवाना, गोशाला बनवाना, चिकित्सालयों में अनुदान देना, प्याऊ लगवाना, छायादार वृक्ष लगवाना, शिक्षण केन्द्र और धर्मशाला बनवाना परोपकार के ही रूप हैं।

आज का मानव दिन प्रति दिन स्वार्थी और लालची होता जा रहा है। दूसरों के दु:ख से प्रसन्न और दूसरों के सुख से दु:खी होता है। मानव जीवन बड़े पुण्यों से मिलता है, उसे परोपकार जैसे कार्यों में लगाकर ही हम सच्ची शान्ति प्राप्त कर सकते हैं। यही सच्चा सुख और आनन्द है। ऐसे में हर मानव का कर्त्तव्य है कि वह भी दूसरों के काम आए।

उपरोक्त तथ्यों से आप सबको अवगत कराने का मेरा केवल यही उद्देश्य है कि यदि हमें ईश्वर ने सामर्थ्य प्रदान की है, हमें माध्यम बनाया है तो पीड़ित मानवता की सेवा करने हेतु हमें कुछ न कुछ करना ही चाहिए और सच कहूँ तो इसके लिए संस्कारधानी में हेल्पिंग हैंड्स से अच्छा और कोई दूसरा विकल्प हो ही नहीं सकता।

अंत में मैं अपने इस दोहे के साथ अपनी बात समाप्त करना करना चाहता हूँ।

किसलय जग में श्रेष्ठ है, मानवता का धर्म।

अहम त्याग कर जानिये, इसका व्यापक मर्म।।

संस्था की सफलता एवं सार्थकता हेतु मंगलभाव एवं सभी का धन्यवाद।

 

साभार – डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय’ 

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संस्था के सदस्यों के निःस्वार्थ समर्पण की भावना को देखते हुए हमें यह संदेश प्रचारित करना चाहिए कि व्यर्थ खर्चों पर नियंत्रण कर भिक्षावृत्ति को  हतोत्साहित करते हुए ऐसी संस्था को तन-मन-धन से  सहयोग करना चाहिए जो ‘अर्थ ‘की अपेक्षा समाज को विभिन्न रूप से सेवाएँ प्रदान कर रही है । हम आप सबकी ओर से श्री अरोरा जी एवं  संस्था के सभी  समर्पित सदस्यों का हृदय से सम्मान करते हैं  जो अपने परिवार  एवं  व्यापार/रोजगार/शिक्षा (छात्र  सदस्य)  आदि दायित्वों  के साथ मानव धर्म को निभाते हुए  समाज  के असहाय सदस्यों की सहायता करने हेतु तत्पर हैं।  

(अधिक जानकारी  एवं हैल्पिंग हेण्ड्स – फॉरएवर वेल्फेयर सोसायटी  से जुडने के लिए आप श्री देवेंद्र सिंह अरोरा जी से मोबाइल 9827007231 पर अथवा फेसबुक पेज  https://www.facebook.com/Helping-Hands-FWS-Jabalpur-216595285348516/?ref=br_tf पर विजिट कर सकते हैं।)

(हम  ऐसी अन्य सामाजिक एवं हितार्थ संस्थाओं की जानकारी अभिव्यक्त करने हेतु कटिबद्ध हैं ।  यदि आपके पास ऐसी किसी संस्था की जानकारी हो तो उसे शेयर करने में हमें अत्यंत प्रसन्नता होगी।)

 




संस्थाएं – काव्यस्पंदन संस्था (प्रसिद्धीसाठी नाही, प्रगती साठी), महाराष्ट्र

काव्यस्पंदन संस्था, महाराष्ट्र

(प्रसिद्धीसाठी नाही, प्रगती साठी)

स्थापना:  29 अप्रैल 2017

 

  1. दैनंदिन लेखन व्यासंग जोपासणा-या साहित्यिकांचे हक्काचे व्यासपीठ.

 

  1. पारिवारीक स्नेहबंधातून विविध साहित्य प्रकारांचे ज्ञानार्जन, प्रचार व प्रसार.

 

  1. काव्यस्पंदन संस्थेमार्फत दोन वर्षाच्या कार्यकाळात सुमारे दोनशे पंधरा राज्यस्तरीय कथा, काव्य, लेख स्पर्धा, उपक्रमांचे  यशस्वी आयोजन.

 

  1. भजन,  अभंग, ओवी, भारूड, गण, गौळण,पोवाडे,  विडंबन गीत, भावगीत, लावणी अशा अभिजात पारंपरिक साहित्य प्रकारांवर दैनंदिन उपक्रम व कार्यशाळांचे आयोजन.

 

  1. बालसाहित्यासाठी स्वतंत्र समुह.

 

  1. म्हणी, वाक्प्रचार, काव्यमय गोष्ट,  उखाणे,  काव्यकोडे आदी साहित्य प्रकारासाठी विशेष स्पर्धा / उपक्रमांचे आयोजन.

 

  1. साहित्यिकांची मुलाखत. नवीन रवी, नवीन कवी उपक्रम.

 

  1. नाविन्यता आणि वेविध्य जोपासणा-या काव्यस्पंदन महास्पर्धा अंतर्गत दहा फेर्‍यांचे यशस्वी  आयोजन.

 

  1. पारिवारीक स्नेहबंध जपणारे अनोखे स्नेहबंधन. काव्यस्पंदन.

 

समूह प्रशासक –  1) श्री भालचंद्र कऱ्हाडे  2) श्रीमति रंजना लसणे

समूह संचालक –  1) कवीराज विजय यशवंत सातपुते  2)कवियित्री संगिता माने

संयोजन समिति – 1) डॉ. रवीद्र वेदपाठक  2) श्री अजय रामटेके 3) श्री अजित माने  4)  सुश्री निशिगंधा सदामते

 




संस्थाएं – व्यंग्यम (व्यंग्य विधा पर आधारित व्यंग्य पत्रिका/संस्था), जबलपुर

संस्थाएं – व्यंग्यम (व्यंग्य विधा पर आधारित व्यंग्य पत्रिका/संस्था), जबलपुर

 

विगत दिवस साहित्यिक संस्था व्यंग्यम द्वारा आयोजित 23वीं व्यंग्य पाठ गोष्ठी में सभी ने परम्परानुसार अपनी नई रचनाओं का पाठ किया.  इस संस्था की प्रारम्भ से ही यह परिपाटी रही है कि प्रत्येक गोष्ठी में व्यंग्यकर सदस्य को अपनी नवीनतम व्यंग्य रचना का पाठ करना पड़ता है । इसी संदर्भ में इस व्यंग्य पाठ गोष्ठी में सर्वप्रथम जय प्रकाश पांडे जी ने ‘सांप कौन मारेगा,  यशवर्धन पाठक ने  ‘दादाजी के स्मृति चिन्ह’, बसंत कुमार शर्मा जी ने ‘अंधे हो क्या’, राकेश सोहम जी ने ‘खा खाकर सोने की अदा’, अनामिका तिवारीजी ने ‘हम आह भी भरते हैं’,  रमाकांत ताम्रकार जी ने ‘मनभावन राजनीति बनाम बिजनेस’, ओ पी सैनी ने ‘प्रजातंत्र का स्वरूप’, विवेक रंजन श्रीवास्तव ने ‘अविश्वासं फलमं दायकमं’, अभिमन्यु जैन जी ने ‘आशीर्वाद’, सुरेश विचित्रजी ने ‘शहर का कुत्ता’, रमेश सैनी जी ने ‘जीडीपी और दद्दू’, डा. कुंदनसिंह परिहार जी ने ‘साहित्यिक लेखक की पीड़ा’ व्यंग्य रचनाओं का पाठ किया.

इस अवसर पर बिलासपुर से पधारे व्यंग्यम पत्रिका के संस्थापक संपादक व्यंंग्यकार महेश शुक्ल जी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही. श्री महेश शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय उदबोधन में व्यंग्यम पत्रिका के बारे में बताया – उस वक्त पत्रिका प्रकाशन का निर्णय कठिन था और हम सब रमेश चंद्र निशिकर, श्रीराम आयंगर, श्रीराम ठाकुर दादा , डा.कुंदन सिंह परिहार, रमेश सैनी आदि मित्रों के सहयोग से यह पत्रिका व्यंंग्यकारो में कम समय ही चर्चित हो गई थी. उस समय महेश शुक्ल ने अपने से संबंधित परसाई जी के संस्मरण सुनाए. इस अवसर पर बुंदेली के लेखक द्वारका गुप्त गुप्तेश्वर की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। गोष्ठी का संचालन रमेश सैनी और आभार प्रदर्शन व्यंंग्यकार एन एल पटेल ने किया.

  • साभार श्री जय प्रकाश पाण्डेय, जबलपुर 

 




संस्थाएं – पृथा फाउंडेशन, पुणे

पृथा फाउंडेशन, पुणे 

सुश्री मीनाक्षी भालेराव 

संस्थापक – अध्यक्ष 

(Please click on following photograph for more information)

 

हर एक इंसान में एक इंसान और रहता है

जो बचना चाहता है अपने इंसान होने को 

 




संस्थाएं – विश्व वाणी हिंदी संस्थान जबलपुर : : समन्वय प्रकाशन अभियान जबलपुर

विश्व वाणी हिंदी संस्थान जबलपुर : : समन्वय प्रकाशन अभियान जबलपुर
(हिंदी के विकास हेतु समर्पित स्वैच्छिक, अव्यवसायिक, अशासकीय संस्था)
सञ्चालन समिति:
अध्यक्ष: 
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जबलपुर,
वरिष्ठ उपाध्यक्ष:
अभियंता अरुण अर्णव खरे भोपाल
उपाध्यक्ष:
गोपाल बघेल कनाडा,
परामर्शदाता:
आशा वर्मा, डॉ. आरती प्रसाद अल्बुकर्क, संजीव वर्मा रोचेस्टर, डॉ. राजीव वर्मा ओंटेरियो, अर्चना नोगरैया राज यू के.,
मुख्यालय प्रभारी:
अभियंता विवेकरंजन ‘विनम्र’,
कार्यालय प्रभारी:
बसंत शर्मा,
कार्यालय सचिव: 
मिथलेश बड़गैया,
वित्त सचिव: 
डॉ. साधना वर्मा,
संस्कृति सचिव: 
पं, कामता तिवारी,  आशा रिछारिया,
सह सचिव: 
दिनेश सोनी,
कार्यकारिणी सदस्य: 
निहारिका सरन कोलम्बस, पूजा अनिल स्वीडन, डॉ. प्रार्थना निगम उज्जैन, प्रो. किरण श्रीवास्तव रायपुर, जयप्रकाश श्रीवास्तव, प्रकोष्ठ प्रभारी
उद्देश्य तथा गतिविधियाँ-
अ. हिंदी भाषा के व्याकरण, पिंगल, साहित्य, शोध आदि संबंधी मौलिक विचारों/योजनाओं को प्रोत्साहित/क्रियान्वित/प्रकाशित करना।
आ. सदस्य निर्धारित कार्यक्रमों का  स्वयं के तथा जुटाए गए संसाधनों से क्रियान्वयन करेंगे।
इ. सदस्यता शुल्क संरक्षक ११,००० रु., आजीवन ६,००० रु., वार्षिक ११०० रु., विद्यार्थी स्वैच्छिक।
ई. सदस्य बहुमत से प्रतिवर्ष सञ्चालन समिति का चुनाव करेंगे।
उ. सदस्यता राशि बैंक में जमा कर उसके ब्याज से गतिविधियाँ संचालित की जायेंगी।
ऊ. प्रति वर्ष संस्था का आय-व्यय सदस्यों को सूचित किया जायेगा।
ए. सञ्चालन समिति सदस्यों से प्राप्त सुझावों के अनुसार ही गतिविधियाँ संचालित करेगी।
ऐ. वर्तमान में
१. अंतरजाल पर हिंदी भाषा के व्याकरण व पिंगल के शिक्षण,
२. नव छंदों पर शोध,
३. सदस्यों की पुस्तक लेखन, संपादन, पाण्डुलिपि संशोधन, भूमिका/समीक्षा लेखन,
४. समन्वय प्रकाशन अभियान के माध्यम से मुद्रण- प्रकाशन,
५. शांति राज पुस्तकालय योजना के अंतर्गत विद्यालयों में पुस्तकालय स्थापना में सहायता,
६. विद्यार्थियों में सामाजिक चेतना, पर्यावरण बोध तथा राष्ट्रीयता भाव जागरण,
७. नवलेखन गोष्ठी में विधा विशेष के मानक/विधान सम्बन्धी मार्गदर्शन,
८. पुस्तक गोष्ठी में पुस्तक पर चर्चा,
९. शालाओं में पौधारोपण आदि योजनायें क्रियान्वित की जा रही हैं।
ओ. साहित्य सलिला, मुक्तिका/ग़ज़ल सलिला, लघुकथा सलिला, कुण्डलिनी सलिला, दोहा सलिला, पुस्तक सलिला, चौपाल चर्चा, पोएट्री सलिला, बाल साहित्य सलिला, हाइकू सलिला, छंद सलिला, कहावत/लोकोक्ति/मुहावरा सलिला आदि पृष्ठों के माध्यम से सदस्यों का मार्गदर्शन किया जाता है।
ॐ 
विश्व वाणी हिंदी संस्थान – शांति-राज पुस्तक संस्कृति अभियान 
समन्वय प्रकाशन अभियान 
समन्वय ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१
ll हिंदी आटा माढ़िए, उर्दू मोयन डाल l ‘सलिल’ संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल ll 
ll जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार l ‘सलिल’ बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार ll
शांतिराज पुस्तकालय योजना 
उद्देश्य: 
१. नयी पीढ़ी में हिंदी साहित्य पठन-पाठन को प्रोत्साहित करना।
२. हिंदी तथा अन्य भाषाओं के बीच रचना सेतु बनाना।
३. गद्य-पद्य की विविध विधाओं में रचनाकर्म हेतु मार्गदर्शन उपलब्ध करना।
४. सत्साहित्य प्रकाशन में सहायक होना।
५. पुस्तकालय योजना की ईकाईयों की गतिविधियों को दिशा देना।
गतिविधि: 
१. नियमित पुस्तकालय संचालित कर रही चयनित संस्थाओं को लगभग १०,००० रुपये मूल्य की अथवा १०० पुस्तकें निशुल्क प्रदान करना।
२. संस्था द्वारा चाहे जाने पर की गतिविधियों के उन्नयन हेतु मार्गदर्शन प्रदान करना।
३. संस्था के सदस्यों की रचना-कर्म सम्बन्धी कठिनाइयों का निराकरण करना।
४. संस्था के सदस्यों को शोध, पुस्तक लेखन, भूमिका लेखन तथा प्रकाशन तथा समीक्षा लेखन में मदद करना।
५. संस्था के चाहे अनुसार उनके आयोजनों में सहभागी होना।
पात्रता:
इस योजना के अंतर्गत उन्हीं संस्थाओं की सहायता की जा सकेगी जो-
१. अपनी संस्था के गठन, उद्देश्य, गतिविधियों, पदाधिकारियों आदि की समुचित जानकारी देते हुए आवेदन करेंगी।
२. लिखित रूप से पुस्तकालय के नियमित सञ्चालन, पाठकों को पुस्तकें देने-लेने तथा सुरक्षित रखने का वचन देंगी।
३. हर तीन माह में पाठकों को दी गयी पुस्तकों तथा पाठकों की संख्या तथा अपनी अन्य गतिविधियाँ संस्थान को सूचित करेंगी। उनकी सक्रियता की नियमित जानकारी से दुबारा सहायता हेतु पात्रता प्रमाणित होगी।
४. ‘विश्ववाणी हिंदी संस्थान-शान्ति-राज पुस्तक संस्कृति अभियान’ से सम्बद्ध का बोर्ड या बैनर समुचित स्थान पर लगायेंगी।
५. पाठकों के चाहने पर लेखन संबंधी गोष्ठी, कार्यशाला, परिचर्चा आदि का आयोजन अपने संसाधनों तथा आवश्यकता अनुसार करेंगी।
६. पुस्तकें भेजने का डाक व्यय लगभग १०% पुस्तकें लेनेवाली संस्था को देना होगा।
आवेदन हेतु संपर्क सूत्र-
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, सभापति विश्ववाणी हिंदी संस्थान, २०४ विजय अपार्टमेंट नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष- ९४२५१ ८३२४४ / ७९९९५ ५९६१८।
कार्यालय: समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष: ९४२५१८३२४४
http://divyanarmada.com



संस्थाएं – पाथेय  साहित्य कला अकादमी जबलपुर मध्य प्रदेश

पाथेय  साहित्य कला अकादमी जबलपुर मध्य प्रदेश

(पाथेय साहित्य कला अकादमी संस्कारधानी जबलपुर की प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक है। यह संस्था  डॉ.राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ और उनकी जीवनसंगिनी डॉ. गायत्री तिवारी का दिवा स्वप्न है।)

वरिष्ठ साहित्यकार पत्रकार डॉ.राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ और उनकी जीवनसंगिनी डॉ. गायत्री तिवारी ने अक्टूबर 1995 को पाथेय  प्रकाशन, पाथेय संस्था और पाथेय साहित्य कला अकादमी की स्थापना की.

प्रारंभ में अकादमी ने पारिवारिक स्तर पर प्रियजनों की स्मृति में, विविध विषयों के लिए 2100 और 1100 के 16 पुरस्कार प्रारंभ किए. निर्णय प्रविष्टियों के आधार पर होता था.

8 सितंबर 2015 को डॉ.गायत्री तिवारी के देहावसान से उत्पन्न स्थिति के कारण पुरस्कार योजना बंद कर दी गई.

27 दिसंबर 2015 से ही अकादमी ने ‘गायत्री जन्म स्मृति’ मनाने का निश्चय किया. गायत्री कथा सम्मान के लिए 11000 की राशि निश्चित की गई.

गायत्री सृजन सम्मान से नगरीय क्षेत्रीय प्रतिभाओं को सम्मानित करने का निर्णय लिया गया.

गायत्री कथा सम्मान से अब तक सम्मानित कथाकार –

सन 2015 – श्री राजेंद्र दानी 

सन 2016 – श्री कैलाश बनवासी 

सन 2017 – श्रीमती सुषमा मुनींद्र 

(सन 2018 के लिए का चयन किया जा रहा है)

अकादमी देशीय  स्तर पर अन्य संस्थाओं को भी सहयोग देती है.

वर्तमान में अकादमी के पदाधिकारी हैं.

अध्यक्ष – डॉ भावना शुक्ल

महासचिव – श्री राजेश पाठक प्रवीण

सचिव – डॉ हर्ष कुमार तिवारी

 




संस्थाएं – वर्तिका (संस्कारधानी जबलपुर की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था)

वर्तिका (संस्कारधानी जबलपुर की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था)
(वर्तिका की जानकारी आपसे साझा कराते हुए मुझे अत्यन्त गर्व का अनुभव हो रहा है। यह एक संयोग है की 1981-82 में मैंने वाहन निर्माणी प्रबंधन के सहयोग तथा स्व. साज जबलपुरी एवं मित्रों के साथ साहित्य परिषद, वाहन निर्माणी, जबलपुर की नींव रखी थी। 1983 के अंत में जब साज भाई के मन में वर्तिका की नींव रखने के विचार प्रस्फुटित हो रहे थे, उस दौरान मैंने भारतीय स्टेट बैंक ज्वाइन कर लिया। नौकरी के सिलसिले में जबलपुर के साथ साज भाई का साथ भी छूट गया। 34 वर्षों बाद जब डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ जी और वर्तिका के माध्यम से  पुनः मिलने का वक्त मिला तब अक काफी देर हो चुकी थी। नम नेत्रों से उनकी निम्न पंक्तियाँ याद आ रही हैं –
मैंने मुँह को कफन में छुपा लिया, तब उन्हें मुझसे मिलने की फुर्सत मिली ….
हाल-ए-दिल पूछने जब वो घर से चले, रास्ते में उन्हें मेरी मैयत मिली ….
साज भाई, श्री एस के वर्मा, श्री सुशील श्रीवास्तव, श्री इन्द्र बहादुर श्रीवास्तव और मित्रों के साथ ‘प्रेरणा’ पत्रिका के प्रकाशन एवं वाहन निर्माणी इस्टेट सामाजिक सभागृह में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों के आयोजन के लिए दिन-रात की भाग-दौड़ के पल आज मुझे स्वप्न से लगते हैं और वर्तिका की वर्तमान जानकारी साझा करना मेरा व्यक्तिगत दायित्व लगता है।) 

(वर्तिका की जानकारी आपसे साझा करते हुए मुझे अत्यन्त गर्व  का अनुभव हो रहा है। यह एक संयोग है कि 1981 में मैंने  वाहन निर्माणी प्रबंधन के सहयोग  तथा स्व. साज जबलपुरी एवं  मित्रों के साथ साहित्य परिषद, वाहन निर्माणी, जबलपुर की नींव रखी थी। 1983 के अन्त में जब साज भाई के मन में वर्तिका की नींव रखने  के विचार प्रस्फुटित हो रहे थे,  उस दौरान मैंने भारतीय स्टेट बैंक ज्वाइन कर लिया। नौकरी के सिलसिले में जबलपुर छूट गया और साज भाई का साथ भी। 34 वर्षों बाद जब डॉ विजय तिवारी ‘किसलय जी और वर्तिका के माध्यम से  उनसे  पुनः मिलने का वक्त मिला तब तक काफी देर हो चुकी थी।

नम नेत्रों से मुझे उनकी निम्न पंक्तियाँ याद आ रही हैं –

मैंने मुँह को कफ़न में छुपा लिया, तब उन्हें मुझसे मिलने की फुरसत मिली …..

हाल-ए-दिल पूछने जब वो घर से चले, रास्ते में उन्हें मेरी मैयत मिली …

साज भाई, श्री  एस के वर्मा, श्री सुशील श्रीवास्तव, श्री इन्द्र बहादुर श्रीवास्तव और मित्रों के साथ  ‘प्रेरणा’ पत्रिका के प्रकाशन एवं वहाँ  निर्माणी इस्टेट सामाजिक सभागृह में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों के आयोजन के  लिए दिन-रात की भाग-दौड़ के पल आज मुझे स्वप्न से लगते हैं, और वर्तिका की  वर्तमान जानकारी साझा करना मेरा व्यक्तिगत दायित्व लगता है।)

 

जबलपुर की वाहन निर्माणी में वर्ष 1984 में साज जबलपुरी, नरेंद्र शर्मा, सुशील श्रीवास्तव, इंद्र बहादुर श्रीवास्तव और उनके अन्य साथियों ने इस सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं सामाजिक संस्था वर्तिका का गठन किया था।  निर्माणी के अंदर सीमित दायरे में ही वर्तिका ने अपनी नींव मजबूत कर ली थी और उसने आज अपना बरगदी स्वरुप धारण कर लिया है।
संस्कारधानी जबलपुर ही नहीं प्रादेशिक सीमा को लाँघकर देश के दूरांचलों में भी इसकी गतिविधियाँ पढ़ी और सुनी जा सकती हैं। वर्तिका के लंबे इतिहास के अनेक प्रसंग और यादगार पल आज भी सबके जेहन में बसे हैं। अनूठे और भव्य आयोजनों से वर्तिका की आज अलग पहचान बन चुकी है ।
साल भर वर्तिका की मासिक गोष्ठियों एवं काव्य पटल अनावरण कार्यक्रमों ने अपना एक नवीन इतिहास रचा है। हम मासिक गोष्ठियों में विभिन्न विषयों में दक्ष विशेषजों को आमंत्रित कर उनसे जीवनोपयोगी और ज्ञानवर्धक व्याख्यान सुनते हैं। कानून, शिक्षा, साहित्य, संगीत, चित्रकला, व्याकरण, चिकित्सा जैसे विषयों का समावेश निश्चित रुप से वर्तिका परिवार के लिए सोने में सुहागा जैसा हैं। साल भर लगातार स्थानीय एवं देश के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों का वर्तिका के कार्यक्रमों में शरीक होना हमें गौरवान्वित करता है । वर्तिका के बैनर तले कृतियों का विमोचन तथा मासिक गोष्ठियों के अतिरिक्त अनेक कार्यक्रमों का होते रहना वर्तिका की सफलता नहीं तो और क्या है ? वर्तिका द्वारा अन्य संस्थाओं में सहभागिता करना एवं नगर की संस्थाओं द्वारा वर्तिका को सहभागी बनाना भी एक अहम उपलब्धि है । वर्तमान समय में जब मानव निजी स्वार्थ और औपचारिकताओं तक ही सीमित होता जा रहा हो । उसे समाज, साहित्य और देश के प्रति सोचने की फुरसत कहाँ है। वर्तमान सूचना तकनीक ने सभी पुराने मानदंडों को गौण बना दिया है । ऐसे में हमारी नई सोच और नई चेतना ही कुछ कर सकती है । भावनाओं और नैतिक मूल्यों के ह्रास को रोकने के लिए भी अब संस्थाओं के माध्यम से प्रयास जरूरी हो गए हैं । हमारी वर्तिका भी सदैव ऐसे प्रयासों में सहभागिता प्रदान करती हैं।
विगत 34 वर्षों से वर्तिका ने अपनी सक्रियता एवं कार्यशैली से जो साहित्य सेवा की है और जो साहित्यकार दिए हैं, वे स्वयं ही उदाहरण स्वरूप हमारे सामने हैं। वर्तिका आज किसी पहचान की मोहताज नहीं है। जबलपुर एवं सीमावर्ती क्षेत्रों में इसकी गहरी पैठ है। आज वर्तिका से जुड़कर लोग स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। संस्थापक स्व. साज जबलपुरी जी से लेकर वर्तमान की पूरी इकाई वर्तिका को नित नवीनता प्रदान करती आ आई है। वर्तिका एक साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था है। साहित्य के अतिरिक्त भी समाज में वर्तिका अपना सहयोग प्रदान करती है। वैसे तो वर्तिका प्राम्भ से ही अपने वार्षिक आयोजनों के दौरान  स्मारिकाएँ एवं काव्य संग्रह प्रकाशित करती आई है। इस बार भी वार्षिक आयोजन में उत्कृष्ट स्मारिका वर्तिकायन- 2018 प्रकाशित की गई है, जिसमें साज जबलपुरी जी पर केन्द्रित विषयों को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। वार्षिक कार्यक्रम में वर्तिका राष्ट्रीय अलकरणों हेतु इस बार भी देश के विभिन्न प्रांतों की प्रतिभाएँ सम्मानित हुईं।
विजय तिवारी “किसलय”
अध्यक्ष (वर्तिका)



संस्थाएं – वर्जिन साहित्यपीठ: एक अभियान (निःशुल्क ईबुक्स एवं पुस्तक प्रकाशन*)

वर्जिन साहित्यपीठ: एक अभियान (निःशुल्क ईबुक्स एवं पुस्तक प्रकाशन*)

(आज जब  नामचीन एवं राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरुस्कृत लेखकों / सेलेब्रिटीज के अतिरिक्त शेष लेखकों के लिए  पारम्परिक प्रकाशन के द्वार लगभग बन्द हो चुके हैं, ऐसे समय में  स्व-प्रकाशन (Self-Publication) एक बड़े व्यवसाय के रूप में उभरा है। यहाँ तक कि किसी भी  प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय  साहित्य /ग्रंथ अकादमी  जैसे संस्थानों  से अपनी पुस्तकें प्रकाशित करना  स्वप्न देखने जैसा है।  ईबुक्स जैसे निःशुल्क प्रकाशन के क्षेत्र में अमेज़न, गूगल प्ले स्टोर आदि विशेष भूमिकाएँ निभा रहे हैं। ऐसे में  श्री ललित कुमार मिश्र  द्वारा  “वर्जिन साहित्यपीठ” जैसी संस्था के माध्यम से  निःशुल्क ईबुक्स एवं पुस्तक प्रकाशन लेखकों के लिए एक अभियान ही नहीं संजीवनी भी है।)

इस यात्रा की शुरुआत से पूर्व इसकी पृष्ठभूमि की चर्चा करना चाहूंगा। उन दिनों कॉलेज में प्रवेश लिया ही था, जब लेखन आरम्भ हुआ। वर्ष था 1993 और लेखन की वजह वही, जो ज्यादातर लेखक मित्रों के लेखन की होती है। करीब एक वर्ष पश्चात वजह के साथ-साथ लेखन भी कहीं गुम हो गया और मैं जीवन की सामान्य धारा में बहने लगा। 20 वर्ष कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला।

2015 में कुछ मित्रों की प्रेरणा से पुनः लेखन आरम्भ हुआ। किन्तु, इस लेखन में गति आई उसी वजह के अचानक लौट आने से। दो पुस्तकों की सामग्री तैयार हो चुकी थी। अब प्रश्न था इनके प्रकाशन का। बाहर निकला तो देखा बड़ा जंजाल था। व्यावसायिक प्रकाशक थे वे बिना रुपयों के बात करने को ही तैयार नहीं थे और जो अव्यावसायिक सरकारी प्रकाशक थे उनके नियम ही ऐसे थे कि हम उसमें फिट नहीं हो पा रहे थे। जैसे आयु सीमा इत्यादि। अब इन्हें कौन समझाए कि रचनाकार की अवस्था का ज्ञान उनकी आयु से नहीं बल्कि रचनाओं से होता है। किन्तु मैंने हार नहीं मानी और विकल्प खोजता रहा।

ये संयोग ही था कि मैं प्रकाशन में नौकरी कर रहा था। इसका लाभ यह हुआ कि मैं प्रकाशन की तकनीकी प्रक्रिया में अनजाने में ही सक्षम होता जा रहा था। उस समय मुझे इसका तनिक भी आभास नहीं था कि एक दिन यही ज्ञान और कौशल वर्जिन साहित्यपीठ की नींव में अहम भूमिका निभाएगा। फिर एक दिन अमेज़न किंडल की जानकारी मिली। शुरुआती समस्याओ के बाद आखिरकार उसपर अपनी पुस्तक प्रकाशित करने में सफल हो ही गया। किन्तु मैं यहीं नहीं रुका, अन्य विकल्प भी तलाशता रहा और सफलता भी मिलती गई। इसके पश्चात गूगल और पोथी को भी अपने विकल्पों में शामिल किया। अपनी पुस्तकें प्रकाशित करने के पश्चात एक दिन अचानक खयाल आया कि मेरे जैसे और भी कई लेखक मित्र प्रकाशन हेतु संघर्षरत होंगे तो क्यों न उन तक भी यह लाभ पहुँचाया जाए, उनके संघर्ष को भी विराम दिया जाए ताकि वे भी अपना पूरा ध्यान लेखन पर केंद्रित कर सकें और साथ ही अपनी रचनाओं से कुछ राशि भी अर्जित कर सकें।

कहते हैं न, अपने हिय से जानिए, उनके हिय का बात। तो बस अपने अनुभवों अर्थात जरूरत और समस्याओं के आधार पर योजनाएं बनाता गया और समय के साथ कार्य को बेहतर करने के तरीके भी खोजता रहा। धीरे धीरे मित्र जुड़ते गए और हम सबके सहयोग से आगे बढ़ते गए। जैसे जैसे इसका दायरा बढ़ता गया, वैसे वैसे इसकी पहचान हेतु इसे एक नाम देने की आवश्यकता महसूस हुई। चूँकि मेरी पहचान में मेरी कविता वर्जिन की अहम भूमिका रही, और कहीं न कहीं वर्जिन साहित्यपीठ की नींव में मेरे पहले काव्य संग्रह वर्जिन का भी योगदान रहा, अतः मैंने इसका नाम वर्जिन साहित्यपीठ रख दिया। काव्य संग्रह का योगदान इस तरह कि साहित्यपीठ की योजनाएं की सफलता सुनिश्चित करने के लिए मैंने सभी प्रयोग अपने काव्य संग्रह पर ही किए।

वर्जिन साहित्यपीठ की वर्तमान योजनाओं में प्रमुख हैं:

*निःशुल्क ईबुक प्रकाशन:*

इस हेतु कोई नियम या शर्त नहीं है। आप सीधे अपनी पांडुलिपि की वर्ड फ़ाइल फोटो और परिचय के साथ virginsahityapeeth@gmail.com पर ईमेल कर दीजिए। पहली 10 प्रति की बिक्री से प्राप्त राशि संस्था रखती है और 11वीं प्रति की बिक्री से लेखक मित्र को 70% रॉयल्टी मिलने लगती है।

पारदर्शिता के लिए हम प्रत्येक माह के प्रथम सप्ताह में गूगल और अमेज़न की सेल रिपोर्ट लेखक मित्रों से शेयर करते हैं। लेखक मित्रों की जानकारी के लिए ईबुक्स के लिए ISBN की आवश्यकता नहीं होती है। ईबुक्स की कंपनियाँ स्वयं अपना क्रमांक देते हैं। उदाहरणार्थ अमेज़न अपनी ईबुक्स के लिए ASIN स्वयं प्रदान करता है।

*निःशुल्क पेपरबैक प्रकाशन:*

आपकी ईबुक की 25 प्रति बिकते ही हम उसका पेपरबैक प्रिंट ऑन डिमांड योजना के अंतर्गत प्रकाशित कर देते हैं एवं एक लेखकीय प्रति प्रदान करते हैं। । इस योजना में लेखक को 50% रॉयल्टी प्रदान की जाती है। लेखक को ISBN के लिए अलग से कोई कीमत नहीं चुकानी होती है। ISBN निःशुल्क एवं अनिवार्य है।

पेपरबैक प्रकाशन के अंतर्गत दो योजनाएँ हैं :-

1. प्रिंट ऑन डिमांड – इस योजना के अंतर्गत आप न्यूनतम एक प्रति भी प्रिंट करवा सकते हैं। आपकी पुस्तक इस योजना के तहत हमेशा स्टॉक में रहती है। लेखक कभी भी 1 प्रति से लेकर असंख्य प्रतियाँ ऑनलाइन ऑर्डर कर सकता है।

2. बल्क प्रिंटिंग – इस योजना में आपको आपकी आवश्यकता के अनुसार पुस्तकें प्रकाशित कर प्रदान की जाती है। न्यूनतम 50 प्रतियों का प्रकाशन अनिवार्य है।

आईएसबीएन (ISBN) अब स्वयं प्राप्त करें

कई मित्रों की जिज्ञासा और शंकाओं से ज्ञात हुआ कि कई प्रकाशक ISBN के लिए अलग से रुपये वसूल रहे हैं और जिन मित्रों को ISBN प्रक्रिया की जानकारी नहीं है वे रुपये दे भी रहे हैं जिससे प्रकाशकों की कालाबाज़ारी और बढ़ती जा रही है।
मैं आपको बताना चाहूंगा कि ISBN भारत सरकार निःशुल्क प्रदान करती है और आप स्वयं भी उनकी वेबसाइट पर अपनी आईडी बनाकर स्वरचित पुस्तकों के लिए ISBN प्राप्त कर सकते हैं। उनकी वेबसाइट है http://isbn.gov.in
इस हेतु आपको कोई भी सहयोग की आवश्यकता हो तो आप वर्जिन साहित्यपीठ से सम्पर्क कर सकते हैं।
वर्जिन साहित्यपीठ
9971275250

*आजीवन सदस्यता:*

इस योजना के तहत आप मात्र 3000 रुपये देकर आजीवन सदस्यता ले सकते हैं। इसके लाभ हैं:

  1. आप असंख्य ईबुक निःशुल्क प्रकाशित करवा सकते हैं जबकि अन्य मित्र उनकी ईबुक की न्यूनतम 10 प्रति बिकने पर ही अगली ईबुक निःशुल्क प्रकाशित करवा पाएंगे।
  2. साहित्यपीठ के संपादन में प्रकाशित होने वाली सभी ईबुक की प्रति आजीवन निःशुल्क प्राप्त कर सकेंगे। इस वर्ष काव्य मंजूषा 1 & 2, लघुकथा मंजूषा 1 & 2 तथा लकड़ी की काठी 1 & 2 साहित्यपीठ के संपादन में अब तक प्रकाशित हो चुकी है।
  3. आप आजीवन स्वरचित पुस्तकों का विज्ञापन साहित्यपीठ से तैयार करवा सकेंगे।
  4. यदि आप किसी लेखक को साहित्यपीठ की सदस्यता हेतु प्रेरित करते हैं तो सदस्यता राशि का10% आपको पुरस्कार स्वरूप प्रदान किया जाएगा।
  5. शुल्क वाले आयोजनों में 50% रियायत दी जाएगी

यदि आप भी इस अभियान का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो निःसंकोच संपर्क कीजिए:

वर्जिन साहित्यपीठ

9971275250

(टीप : www.e-abhivyakti.com  में  प्रकाशित उपरोक्त लेख कोई  विज्ञापन नहीं  है। अपितु,  आपको एक अच्छी जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास है।)