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हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #77 – 15 – जिम उर्फ़ जेम्स एडवर्ड कार्बेट ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं  – 15 – जिम उर्फ़ जेम्स एडवर्ड कार्बेट”)

☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #77 – 15 – जिम उर्फ़ जेम्स एडवर्ड कार्बेट☆ 

भारत लम्बे समय तक ब्रिटिश राज के आधीन रहा और जहाँ एक ओर उसने  जनरल डायर सरीखे खूंखार मानवद्रोहियों के अत्याचार सहे तो ऐसे अनेक अंग्रेज भी इस धरा पर आये जिन्होंने यहाँ के निवासियों का दिल अपनी सेवा भावना व न्यायप्रियता से जीता । उस वक्त संयुक्त प्रांत या आज के उत्तरप्रदेश के अंग रहे उत्तराखंड को, ऐसी ही दो महान हस्तियों का सानिध्य मिला, एक बन्दूक के शौक़ीन जिम कार्बेट और दूसरी अहिंसा की पुजारिन लन्दन में जन्मी  कैथरीन उर्फ़ सरला देवी ।

जिम यानी जेम्स एडवर्ड कार्बेट 1875 में कालाढुँगी के पोस्टमास्टर की ग्यारहवीं संतान के रूप में जन्मे और जब वे केवल चार वर्ष के नन्हे बालक थे तो उनके पिता की मृत्यु हो गई । कुमाऊं के अपेक्षाकृत मैदानी इलाके में बसे कालाढुँगी के खूबसरत जंगल जानवरों और परिंदों से भरे थे और यहाँ के बृक्ष, हिंसक जानवर,कोसी के अज़गर, चारा चरते हिरण और आसमान में उड़ते परिंदे नन्हे जिम के पहले साथी बने । आठ वर्ष की उम्र में, गुलेल और तीर कमान से जंगली मुर्गियों और मोरों का शिकार करने वाला यह नन्हा शिकारी, दुनाली भरतल बंदूक का मालिक बना । ऐसी बंदूक जिसकी  दाईं नाल फटी हुई थी और पीतल के तारों से बन्दूक के कुंदे और नालों को आपस में जोड़कर बांधा गया था । पर इससे क्या ? नन्हे शिकारी के लिए यह थी तो गर्व की बात । और यह गौरव पूर्ण क्षण जिम ने सबसे पहले अपने चाचा की उम्र के  कुंवर सिंह के साथ साझा किये जिसने उसे शिकार खेलने की बारीकियां समझाई और साथ ही पेड़ों पर चढ़ना भी सिखाया । बाद के दिनों में कुंवर सिंह अफीमची हो गया और बहुत बीमार पड़ा तब जिम कार्बेट ने उसकी बड़ी सेवा की और मौत के मुंह से बाहर निकाला ।   

जिम, जिसे कुमाऊं के पहाड़ी लोग आदर से कापेट साहब कहते थे , ने अठारह वर्ष की उम्र में अपनी स्कूली शिक्षा नैनीताल से पूरी की और फिर रेलवे में नौकरी कर ली । इस सिलसिले में उन्हें अपने प्रिय जंगलों से हज़ार किलोमीटर दूर बिहार के मोकामा घाट में जाना पडा । यहाँ रहते हुए उन्होंने अपने कामगारों के बच्चों के लिए स्कूल खोला और इस काम में उनके साथी बने स्टेशन मास्टर रामसरन, जो खुद तो ज्यादा पढ़े लिखे न थे पर शिक्षा का महत्व समझते  थे । बाद में सरकार ने स्कूल को अधिकृत कर मिडिल स्कूल  बना दिया और जिम के साथी रामसरन को ‘राय साहब’ का खिताब मिला । खेलकूद के शौक़ीन जिम ने मैदान साफ़ करवाकर फुटबाल और हॉकी के खेल शुरू किए और इसी दौरान वे प्रथम विश्वयुद्ध के समय वे सेना में भर्ती हो गये । मोकामाघाट में ही उन्होंने माल लदाई का ठेका लिया ।

सेना की नौकरी से त्यागपत्र देकर जिम 1922 में कालाढुँगी आकर बस गए । यहाँ उन्होंने खेती की जमीनें खरीदी, जंगली जानवरों से खेतों की रक्षा के लिए लम्बी बाउंड्री वाल बनवाई, सत्रह कृषक  परिवारों को न केवल बसाया वरन  उनके लिए पक्के मकान बनवाये, अपने लिए एक शानदार बँगला बनवाया । जिम का यह बँगला कोई दो हेक्टेयर जमीन के एक छोटे से हिस्से में बना था । और इसमें वे अपनी बहन मैगी और शिकारी कुत्ते रोबिन के साथ सर्दियों के मौसम में रहते थे । उनकी गर्मिया व्यतीत होती थी नैनीताल के गुर्नी हाउस में । 1947 में भारत आज़ाद हुआ और जिम ने भरे मन से अपने इस प्यारे देश, जहाँ उसका जन्म हुआ और नाम व प्रसिद्धि मिली, को अलविदा कह दिया और वे अपनी बहन के साथ केन्या में जा बसे, जहाँ उनकी मृत्यु 1955 में हो गई । जब वे भारत छोड़ कर जा रहे थे तब   कालाढुँगी  का बँगला चिरंजीलाल को बेच दिया और खेती की जमीनें कृषकों के नाम कर दी । वन विभाग ने इस बंगले को 1965 में खरीदकर, जिम कार्बेट के द्वारा उपयोग में लाई गई अनेक वस्तुएं, बर्तन, मेज-कुर्सी, शिकार व अन्य गतिविधियों को दर्शाते उनके चित्रों व छायाचित्रों को संग्रहित कर संग्रहालय का स्वरुप दिया है । ऐसा कर उत्तराखंड के वन विभाग ने इस महान शिकारी, अद्भुत लेखक और एक शानदार इंसान, जिसे अपने लोगों व सहकर्मियों से और इस देश के वाशिंदों से बेपनाह प्यार  था, को सच्ची श्रद्धांजलि दी है ।

जिम कार्बेट जब केन्या में बस गए तो उन्हें भारत में बिताए अपने पचहत्तर से कुछ कम वर्षों की बहुत याद आती और अपनी इन्ही यादों को, शिकार की कहानियों को, भारत के जंगल की वनस्पतियों व जानवरों को, जंगल के प्राकृतिक सौन्दर्य और सबसे बढ़कर नैनीताल की हरी-भरी  वादियों से लेकर कालाडुंगी के मैदानों और फिर सूदूर बिहार के मोकामाघाट के भोले-भाले ग्रामीणों के साथ बिताए दिनों का शानदार वर्णन उन्होंने कोई आधा दर्जन किताबों के माध्यम से किया । उनकी चर्चित कृतियों में कुमाऊं के नरभक्षी, जीती जागती कहानी जंगल की और मेरा हिन्दुस्तान बहुत लोकप्रिय है । कुमाऊं के नरभक्षी की कहानियां तो महाविद्यालय के अंग्रेजी  पाठ्यक्रम में लम्बे समय तक शामिल रही ।

जिम कार्बेट का जंगल ज्ञान अद्भुत था । उन्हें पत्ता खडकने, वृक्षों को देखकर, जानवरों के पदचिन्ह देखकर जंगल में क्या घटने वाला है इसका अंदाजा हो जाता था । वे शेर की आवाज निकालने में माहिर थे और अक्सर नरभक्षी शेर को मादा शेर की आवाज निकालकर अपनी ओर आकर्षित कर लेते थे । कुमाऊं के प्रशासन ने जंगलों में पनाह लिए दुर्दांत दस्यु सुल्ताना को पकड़ने के लिए जिम कार्बेट की मदद ली थी और उन्होंने अनेक बार पुलिस टीम को जंगल में भटकने से बचाया था ।  उनका निशाना इतना गजब का था कि शायद ही कोई गोली बेकार गई हो । अपनी बहादुरी और जंगल ज्ञान के कारण उन्होंने कोई दस नरभक्षी शेरों का शिकार हिमालय की तराई में बसे जंगलों में किया । वे 1931में गिर्जिया गांव के पास मोहन नरभक्षी शेर का शिकार करने नैनीताल जिला प्रशासन द्वारा भेजे गए। शेर के संबंध में जानकारियां एकत्रित करते वक्त ग्रामीणों ने  बताया कि जब कभी रात में शेर गांव में आता है तो रूक-रूककर हल्के कराहने की आवाज सुनाई देती है । जिम ने उनके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर अंदाज लगाया कि शेर घायल हैं और बंदूक की गोली या साही के नुकीले कांटे ने उसके पैर में जख्म बना दिए हैं । ग्रामीण जिम की बात से असहमत थे क्योंकि उन्होंने दिन में इसी शेर को पूर्णतः स्वस्थ देखा है। लेकिन जब जिम ने इस नरभक्षी का शिकार किया तो ग्रामीणों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा क्योंकि उसके अगले बाएं पैर से साही के चार से पांच इंच तक लंबे तीस कांटे निकले । इन्हीं घावों ने इस शेर को नरभक्षी बना दिया और चलते वक्त उसके कराहने की आवाज ग्रामीणों को सुनाई देती थी।

हम सब, कभी न कभी जंगल , वन अभ्यारण्य या वाघ संरक्षण केन्द्रों का , आनन्द लेने  जिप्सी सफारी से गए होंगे और अगर  हमने जंगल में बाघ, तेंदुए  या अन्य किसी बड़ी बिल्ली को नहीं देखा होगा तो चिड़ियाघरों में तो वनराज के दर्शन अवश्य करे होंगे । इस दौरान आपने कभी गौर किया कि जंगल में जब बाघ विचरता होगा तो कैसा दृश्य निर्मित होता होगा ? इसका शानदार चित्रण जिम कॉर्बेट ने अपनी पुस्तक ‘Man Eaters of Kumaon’ के एक अध्याय ‘The Bachelor of Powalgarh’ में किया है । कुमायूं के जंगलों में विचरण करने वाला यह 10 फीट 7 इंच लंबा मानवभक्षी बाघ अंतत: जिम की बन्दूक  से निकली गोली का शिकार बना पर शिकार होने से पहले 1920 से 1930 तक इसकी उपस्थिति मात्र से पहाड़ के बहादुर निवासी भी अपने-अपने घरों में दुबक जाते थे । आप भी जिम की इस कहानी के छोटे से हिस्से का मजा लीजिये ।   

Sitting on a tree stump and smoking, I had been looking at this scene for sometimes when the hind nearest to me raised her head, turned in my direction and called ; and a movement later the Bachelor stepped Into the open, from the thick bushes below me.  For a long minute he stood with head held high surveying the scene, and then with slow unhurled steps started to cross the glade. In his rich winter coat, which the newly risen sun was lighting up, he was a magnificent sight as, with head turning now to the right and now to the left, he walked down the wide lane the deer had made for him. At the stream he lay down and quenched his thirst, then sprang across and, as he entered the dense tree jungle beyond, called three times ।n acknowledgement of the homage the jungle folk had paid him, for from the time he had entered  the glade every chital had called, every jungle fowl had cackled, and every one of a troupe of monkeys on the trees had chattered.

जिम कार्बेट को जंगल के जानवरों की न्यायप्रियता पर इंसानों से ज्यादा भरोसा था । एक बार जंगल में उन्होंने इसका अद्भुत नज़ारा देखा । जंगल के खुले मैदान में एक शेरनी महीने भर के बकरी के बच्चे का पीछा करते हुए जिम को दिखी । मेमना शेरनी को आते हुए देखकर मिमियाने लगा और शेरनी ने भी दबे पाँव उसका पीछा करना बंद किया और सीधे उसकी तरफ बढी । जब शेरनी मेमने से कुछ ही गज दूर थी तो बच्चा शेरनी से मिलने उसकी तरफ बढ़ा । शेरनी के बिलकुल नज़दीक पहुंचकर उसने अपना मुख आगे बढ़ाकर शेरनी को सूंघा । दिल में होने वाली  दो-चार  धडकनों तक जंगल की रानी और मेमना नाक से नाक मिलाये खड़े रहे । फिर अचानक शेरनी पलटी और जिस रास्ते आई थी उसी रास्ते वापस चली गई । जिम ने इस घटना को द्वितीय विश्वयुद्ध मे ख़त्म होने पर ब्रिटिश राज के बड़े नेताओं द्वारा हिटलर और दुश्मन देशों के नेताओं को ‘जंगल का क़ानून ‘ लागू करने संबंधी बयान पर आपत्ति दर्ज करते हुए अपने संस्मरणों में लिखा है कि ‘यदि ईश्वर ने वही क़ानून इंसानों के लिए बनाया होता जो उसने जंगली जानवरों के लिए बनाया है तो कोई जंग होती ही नहीं क्योंकि तब इंसानों में जो ताकतवर होते उनके दिल में अपने से कमजोर लोगों के लिए वही जज्बा होता जोकि जंगल के क़ानून में हम अभी देख चुके हैं ।’

जिम की कहानियों में उन ग्रामीणों का भी वर्णन है जो बड़ी मुफलिसी और गरीबी में अपने दिन गुजार रहे थे । उनकी इन कहानियों के पुनवा, मोती, कुंती, पुनवा की माँ जैसे अनेक नायक हैं जो ईमान की खातिर रुपये पैसे की परवाह नहीं करते थे । उनकी ऐसी ही कहानी का नायक उच्च जाति का ग्रामीण पहाड़ी है जो  जंगल में दलित परिवार के दो  बिछुड़े बच्चों को खोजकर लाता है और जब उसे घोषित ईनाम के पचास रुपये गाँव के लोग देने की बात करते हैं तो वह यह रकम लेने से ही इनकार कर देता है, क्योंकि उसकी निगाह में पुण्य का कोई मोल नहीं है । जिम की इन काहनियों से हमें तत्कालीन भारत की गरीबी, बाल विवाह, जात-पात, ऊँच नीच के भेदभाव का वर्णन मिलता है।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈



मराठी साहित्य – मीप्रवासीनी ☆ मी प्रवासिनी क्रमांक-९ – जगदलपूर ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

✈️ मीप्रवासीनी ✈️

☆ मी प्रवासिनी  क्रमांक- ९ – जगदलपूर ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆ 

बोरा केव्हज् पाहून आम्ही बसने आरकू व्हॅली इथे मुक्कामासाठी निघालो. खरं म्हणजे विशाखापट्टणम ते छत्तीसगडमधील जगदलपूर हा आमचा प्रवास किरंडूल एक्स्प्रेसने  होणार होता. ही किरंडूल एक्सप्रेस पूर्व घाटाच्या श्रीमंत पर्वतराजीतून, घनदाट जंगलातून, ५४ बोगद्यांमधून  प्रवास करीत जाते म्हणून त्या प्रवासाचे अप्रूप वाटत होते. पण नुकत्याच पडलेल्या धुवांधार पावसामुळे एका बोगद्याच्या तोंडावर डोंगरातली मोठी शिळा गडगडत येऊन मार्ग अडवून बसली होती. म्हणून हा प्रवास आम्हाला या डोंगर-दर्‍या शेजारून काढलेल्या रस्त्याने करावा लागला. हा प्रवासही आनंददायी होता. रूळांवरील अडथळे दूर सारून नुकत्याच सुरू झालेल्या मालगाडीचे दर्शन अधूनमधून या बस प्रवासात होत होते. प्रवासी गाडी मात्र अजून सुरू झाली नव्हती. अनंतगिरी पर्वतरांगातील लावण्याच्या रेशमी छटा डोळ्यांना सुखवीत होत्या.भाताची पोपटी, सोनसळी शेते, तिळाच्या पिवळ्याधमक नाजूक फुलांची शेती आणि मोहरीच्या शेतातील हळदी रंगाचा झुलणारा गालिचा, कॉफीच्या काळपट हिरव्या पानांचे मळे आणि डोंगर कपारीतून उड्या घेत धावणारे शुभ्र तुषारांचे जलप्रपात रंगाची उधळण करीत होते.

गाई, म्हशी, शेळ्या, मेंढ्या यांचे कळप चरायला नेणारे आदिवासी पुरुष, लाकूड-फाटा आणि मध, डिंक, चिंचा, आवळे, सीताफळे असा रानमेवा गोळा करून पसरट चौकोनी टोपल्यातून डोक्यावरून घेऊन जाणाऱ्या आदिवासी स्त्रिया मधून मधून दिसत होत्या. या स्त्रिया कानावर एका बाजूला उंच अंबाडा बांधतात. त्यावर रंगीबेरंगी फुलांच्या, मण्यांच्या माळा घालतात. घट्ट साडी नेसलेल्या, पायात वाळे आणि नाकात नथणी घातलेल्या तुकतुकीत काळ्या रंगाच्या या स्त्रिया भोवतालच्या निसर्गचित्राचा  भव्य कॅनव्हास जिवंत करीत होत्या. आरकू म्हणजे लाल माती.आरकू व्हॅली व परिसरातील आदिवासींना, वनसंपत्तीला संरक्षण देणारे विशेष कायदे आंध्र प्रदेश सरकारने केले आहेत. व्हॅलीतील सुखद,शीतल वास्तव्य अनुभवून आम्ही छत्तीसगडमधील जगदलपूर इथे जाण्यासाठी निघालो.

जगदलपूर हे बस्तर जिल्ह्याचे मुख्यालय आहे. बस्तरच्या खाणाखुणा पाषाण युगापर्यंत जातात. प्राचीन दंडकारण्याचा हा महत्वपूर्ण भूखंड आहे. हा सर्व भाग घनदाट जंगलसंपत्तीने, खनिजांनी समृद्ध आहे.साग आणि साल वृक्ष, बांबूची दाट बने, पळस यांचे वृक्ष तसेच चिरोंजी, तेंदूपत्ता,सियारी म्हणजे पळस, आंबा, तिखूर सालबीज, फुलझाडूचे गवत,  रातांबा आणि कित्येक औषधी वनस्पतींनी श्रीमंत असं हे जंगल आहे. या पूर्व घाटातील बैलाडीला या पर्वतरांगांमध्ये अतिशय उच्च प्रतीच्या लोहखनिजाचे प्रचंड साठे आहेत. ब्रिटिशांनी दुर्गम प्रदेशातील या खनिजसंपत्तीचा शोध लावला. बस्तर संस्थानच्या भंजदेव राजाला फितवून त्यांना हैदराबाद प्रमाणेच हे संस्थान स्वतंत्र ठेवायचे होते. भारताची आणखी मनसोक्त लूट करायची होती. पण पोलादी पुरुष सरदार वल्लभाई यांनी १९४८साली बस्तर संस्थान खालसा केले. विशाखापट्टणम ते जगदलपुर ही पूर्व घाटातून ५४ बोगदे खणून बांधलेली रेल्वे जपानने बांधून दिली. १९६० साली जपानबरोबर ४० वर्षांहूनही अधिक वर्षांचा करार करण्यात आला. बैलाडीलातील समृद्ध लोहखनिज खाणीतून काढून कित्येक किलोमीटर लांबीच्या सरकत्या पट्ट्यांवरून मालगाड्यात भरले जाते. तिथून ते विशाखापट्टणमला येते आणि थेट जपानला रवाना होते. कारणे काहीही असोत पण जपानबरोबरचा हा करार अजूनही चालूच आहे. ब्रिटिशांच्या, जपान्यांच्या बुद्धिमत्तेचे, चिकाटीचे, संशोधक वृत्तीचे कौतुक करावे की वर्षानुवर्षे त्यांनी आपल्या देशाची केलेली लूट पाहून विषाद मानावा अशी संभ्रमित मनस्थिती होते.

भाग-१ समाप्त

© सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

जोगेश्वरी पूर्व, मुंबई

9987151890

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈




हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #75 – 14 – उत्तराखंड के व्यंजन ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं  – 14 – उत्तराखंड के व्यंजन ”)

☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #76 – 14 – उत्तराखंड के व्यंजन ☆ 

भारत की विविधता में भोजन की विविधताओं का अपना अलग योगदान है । पहाड़ों पर कृषि कार्य मुश्किल है और चोटियों को काट-काटकर सीढ़ीनूमा खेतों पर किसानी करना मेहनत भरा काम है । इन छोटे छोटे खेतों में पहाड़ी पुरुष और महिलाएं गेहूँ, धान,मक्का, तरह-तरह की दालें, आलू आदि की पैदावार करते हैं और इन्ही उपजों से तैयार होता है कुमायूं का  सीधा सरल व जायकेदार शाकाहारी भोजन । पहाड़ों पर मांसाहारी भोजन का भी खूब चलन है  । पहले जब शिकार की अनुमति थी तब पहाड़ के निवासी जंगली मुर्गी, तीतर, बतखों के अलावा पहाड़ी बकरी , चीतल आदि का शिकार करते और अपनी जिव्हा को तृप्त करते थे । चोरी छिपे शिकार तो अंग्रेजों के जमाने में भी होता था और अगर अभी भी होता है तो पता नहीं पर माँसाहार के शौकीनों के लिए बिनसर  अपने लजीज पहाड़ी मुर्ग के लिए प्रसिद्ध है और होटलों में पहले से आर्डर देकर इसके लजीज व्यंजनों का स्वाद लिया जा सकता है । हम तीन दिन बिनसर में रुके और इन तीन दिनों में हमने कुमांउनी थाली में निम्न व्यंजनों का भरपूर स्वाद लिया ।  

भांग और तिल की चटनी काफी खट्टी बनाई जाती है । भांग की चटनी हो या तिल की चटनी, इसके लिए दानों को पहले गर्म तवे या कड़ाही में भूनकर और फिर इसमें इसमें जीरा, धनिया, नमक और मिर्च स्वादानुसार डालकर पीसा जाता है । नींबू का रस डालकर इसे आलू के गुटके व  रोटी आदि के खाने का मजा अलग ही है । स्वाद आलौकिक इस चटनी में घबराइये नहीं , नशा  बिलकुल भी नहीं होता है ।

‘आलू के गुटके’ विशुद्ध रूप से कुमाऊंनी स्नैक्स हैं । उबले हुए आलू के बड़े बड़े टुकड़ों को , पानी का इस्तेमाल किये बिना  सब्जी के रूप में पकाया जाता है। लाल भुनी हुई मिर्च, धनिया, जीरा आदि मसाले से युक्त इस सब्जी में तडका भी लगाया जाता है और इसे मडुए की रोटी के साथ खाने का मजा कुछ और ही है ।

कुमाऊं का रायता देश के अन्य हिस्सों के रायते से काफी अलग होता है । इसमें बड़ी मात्रा में ककड़ी (खीरा), सरसों के दाने, हरी मिर्च, हल्दी पाउडर और धनिए का इस्तेमाल होता है।  यह रायता बनाने के लिए छाछ  की क्रीम का उपयोग होता और इसे निकालने के लिए  दही को हल्का मथकर एक कपड़े के थैले में भरकर किसी ऊंची जगह पर टांग दिया जाता है ।  कपड़े में से सारा पानी धीरे-धीरे बाहर निकल जाता है, जबकि छाछ की क्रीम थैले में ही रह जाती है ।  इस क्रीम का इस्तेमाल करने से  कुमाऊंगी रायता काफी गाढ़ा होता है।

कुमाऊं की शान है मडुए के आटे से  बनी मडुए की रोटी । मडुआ, रागी जैसा यह एक स्थानीय अनाज है और इसमें बहुत ज्यादा फाइबर होता है,  स्वादिष्ट होने के साथ ही यह स्वास्थ्यवर्धक भी  है । भूरे  रंग की मडुए की रोटी को  घी, दूध या भांग व तिल की चटनी के साथ परोसा जाता है और आलू के गुटके इसके स्वाद को द्विगुणित कर देते हैं।

सिसौंण के साग में बहुत ज्यादा पौष्टिकता होती है ।  सिसौंण एक किस्म की भाजी है जिसे  आम बोलचाल की  भाषा में ‘बिच्छू घास’ के नाम से पुकारा जाता है क्योंकि इसके पत्तों या डंडी को सीधे छूने पर यह दर्द होने लगता और शरीर के उस भाग में  सूजन आ जाती है और बहुत ज्यादा जलन होती है । सिसौंण के हरे पत्तों को सावधानी पूर्वक काटकर जो स्वादिष्ट  सब्जी बनाई जाती है उसमे  और आश्चर्य की बात यह है कि इसे खाने में कोई नुकसान नहीं होता ।

मास के चैंस कुमाऊं क्षेत्र के खायी जाने वाली प्रमुख दाल है।  मास यानी काली उड़द को दड़दड़ा पीस कर बनाई जाने वाली इस दाल में प्रोटीन काफी मात्रा में होता है और इसलिए इसे हजम करना कुछ कठिन होता है और इसे खाना  कब्जियत का कारण भी हो सकता है , ऐसा हम लोगों ने महसूस किया । जीरा, काली मिर्च, अदरक, लाल मिर्च, हींग आदि के साथ यह दाल न सिर्फ स्वाद के मामले में अदभुत होती है बल्कि स्वास्थ्य के लिजाज से भी काफी अच्छी मानी जाती है।.

काप या कापा एक प्रकार की हरी करी है । सरसों, पालक आदि के हरे पत्तों को काटकर उबाल लिया जाता और फिर  पीस कर ‘काप’ बनाया जाता है जोकि कुमाऊंनी खाने का एक अहम अंग है। इसे रोटी और चावल के साथ खाया जाता है ।

गहत की दाल कुमाऊं क्षेत्र में बहुत प्रसिद्द है और  चावल और रोटी के साथ भी इसके लजीज स्वाद का लुत्फ हम लोगों ने लिया । होटल के संचालक ने हमें बताया कि यह दाल खाने से पेट की पथरी (स्टोन) कट जाती है । इसके अलावा इसकी तासीर गर्म होती है, इसलिए सर्दियों में इस दाल का सेवन ज्यादा होता है । धनिए के पत्तों, घी और टमाटर के साथपरोसी गई  इस दाल का स्वाद भुलाए नहीं भूलता है ।

बिनसर में हमने झिंगोरा या झुंअर की खीर खाई । झिंगोरा या झुंअर एक अनाज है और यह उत्तराखंड के पहाड़ों में उगता है। दूध, चीनी और ड्राइ-फ्रूट्स के साथ बनाई गई झिंगोरा की खीर एक आलौकिक स्वाद देती है.

अल्मोड़ा में हमने खोया के अलावा सुगर बॉल का भी इस्तेमाल से तैयार  बाल मिठाई का लुत्फ़ लिया  और साथ ही दही जलेबी भी खाई । दही जलेबी खाने हम अल्मोड़ा के भीड़ भरे बाज़ार में से होकर गुजरे जोकि नंदा देवी मंदिर के नज़दीक ही है । जब हम इस रास्ते से गुजरे तो पत्थरों व लकड़ी से बनी एक पुरानी दोमंजिला  इमारत ने हमें आकर्षित किया जिसकी छत को भी पत्थरों के बड़े बड़े स्लैब से बनाया गया था ।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈



मराठी साहित्य – मीप्रवासीनी ☆ मी प्रवासिनी क्रमांक-८ – सिंहगिरीचे शिल्प काव्य ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

✈️ मीप्रवासीनी ✈️

☆ मी प्रवासिनी  क्रमांक- ८ – सिंहगिरीचे शिल्प काव्य ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆ 

विशाखापट्टणम हे भारताच्या पूर्व किनाऱ्यावरील महत्त्वाचे बंदर आहे. या नैसर्गिक बंदरातून दररोज लक्षावधी टन मालाची आयात- निर्यात होते. जहाज बांधणीचा अवाढव्य कारखाना इथे आहे. विशाखापट्टणम हे ईस्टर्न नेव्हल कमांडचे मुख्यालय  आहे.

आम्ही इथल्या ऋषिकोंडा बीचवरील आंध्रप्रदेश टुरिझमच्या ‘पुन्नामी बीच रिसॉर्ट’ मध्ये राहिलो होतो. ऋषिकोंडा बीच ते भिमुलीपटनम असा  हा सलग बत्तीस किलोमीटर लांबीचा अर्धचंद्राकृती स्वच्छ समुद्र किनारा आहे. निळ्या हिरव्या उसळणाऱ्या लाटा गळ्यात पांढर्‍याशुभ्र फेसाचा मफलर घालून किनाऱ्यावरील सोनेरी वाळूकडे झेपावत होत्या. किनाऱ्यावरील हिरवळीने नटलेल्या, फुलांनी बहरलेल्या बागेत नेव्हल कमांडच्या बॅण्डचे सूर तरंगत होते. समुद्र किनार्‍यावरच पाणबुडीतले आगळे संग्रहालय बघायला मिळाले.’ आय एन एस कुरसुरा’ ही रशियन बनावटीची पाणबुडी १९७२ च्या पाकिस्तानी युद्धात कामगिरीवर होती. ९० मीटर लांब आणि ४ मीटर रुंद असलेल्या या पाणबुडीचे आता संग्रहालय केले आहे. आतल्या एवढ्याश्या जागेत पाणबुडीच्या सगळ्या भिंती निरनिराळे पाईप्स, केबल्स यांनी व्यापून गेल्या होत्या. छोट्या-छोट्या केबिन्समध्ये दोघांची झोपायची सोय होती. कॅप्टनची केबीन, स्वयंपाकघर, स्वच्छतागृह सारे सुसज्ज होते. क्षेपणास्त्रे होती. बघायला मनोरंजक वाटत होतं पण महिनोन् महिने खोल पाण्याखाली राहून शत्रुपक्षाचा वेध घेत सतर्क राहायचं हे काम धाडसाचं आहे. अशा या शूरविरांच्या  जीवावरच आपण निर्धास्तपणे आपलं सामान्य जीवन जगू शकतो या सत्याची जाणीव आदराने मनात बाळगायला हवी. विशाखापट्टणममधील सिंहगिरी पर्वतावरील सिंहाचलम मंदिर म्हणजे प्राचीन शिल्पकलेचा उत्कृष्ट नमुना आहे. हे ‘श्री लक्ष्मी वराह नृसिंह मंदिर’ चालुक्य ते विजयनगर या राजवटीत म्हणजे जवळजवळ ६०० वर्षांच्या कालावधीत बांधले गेले. दगडी रथाच्या आकाराच्या या मंदिरात कल्याणमंडप, नर्तक, वादक, रक्षक, पशुपक्षी, देवता यांच्या असंख्य सुबक मूर्ती कोरल्या आहेत. वराह नृसिंहाची मूर्ती चंदनाच्या लेपाने झाकलेली असते.

एका डोंगरावरील कैलासगिरी  बागेमध्ये शंकरपार्वतीचे शुभ्र, भव्य शिल्प आहे. तिथल्या व्ह्यू पॉइंटवरून अर्धचंद्राकृती समुद्रकिनारा व त्यात दूरवर दिसणाऱ्या बोटी न्याहळता आल्या. इथल्या  बागांमध्ये स्टीलचे मोठे- मोठे डबे, सतरंज्या घेऊन लोकं सहकुटुंब सहपरिवार  सहलीसाठी आले होते.

विशाखापट्टणमहून आम्ही बसने  बोरा केव्हज बघायला निघालो. वाटेत त्याडा इथले जंगल रिझॉर्ट पाहिले. थंडगार, घनदाट जंगलात नैसर्गिक वातावरणाला साजेशी बांबूची, लाकडाची छोटी झोपडीसारखी घरे राहण्यासाठी, पक्षी व वन्यप्राणी निरीक्षणासाठी बांधली आहेत. तिथे मोठ्या चिंचेच्या पारावर चहापाणी घेऊन बोरा केव्हजकडे निघालो. डांबरी रस्त्यावरून आमची बस वेगात चालली होती. रस्त्याच्या दुतर्फा साग, चिंच, पळस, आवळा असे मोठमोठे वृक्ष होते. त्यांच्या पलीकडे अनंतगिरी पर्वतरांगांच्या पायथ्यापर्यंत भाताची,तिळाची,मोहरीची शेती डुलत होती. कॉफीचे मळे होते. पर्वतरांगा हिरव्या पोपटी वनराईने प्रसन्न हसत होत्या. जिथे पर्वतांवर वनराई न्हवती तिथली लालचुटूक माती खुणावत होती.बोरा केव्हज् पाहण्यासाठी एका नैसर्गिक गुहेच्या तोंडाशी आलो. लांब-रुंद ८०-८५ पायऱ्या बाजूच्या कठड्याला धरून उतरलो. जवळजवळ सव्वाशे फूट खाली पोहोचलो होतो. गाईडच्या मोठ्या बॅटरीच्या मार्गदर्शनात गुहेच्या भिंती, छत न्याहाळू लागलो. निसर्गवैभवाचा अद्भुत खजिनाच समोर उलगडत गेला. कित्येक फूट घेराचे, शेकडो फूट उंचीचे, लवण(क्षार)  स्तंभ लोंबकळत होते. या विशाल जलशिलांना निसर्गतःच विविध आकार प्राप्त झाले आहेत. कुठे गुहेच्या छतावर सुंदर झुंबरे लटकली आहेत तर कुठे देवळांच्या छतावर कमळे कोरलेली असतात तसा कमळांचा आकार आहे. खाली खडकांवर मानवी मेंदूची प्रतिकृती आहे. भिंतीवर मक्याचे मोठे कणीस व मशरूम आहे. तर एकीकडे आई मुलाला घेऊन उभी आहे. दुसरीकडे म्हैस, माकडे, गेंडा,साप अशी शिल्पे तयार झाली आहेत. जरा पुढे गेल्यावर गुहेच्या भिंतीवर वडाच्या पारंब्यांचा विस्तार  आहे. कुठे दाढीधारी ऋषी दिसतात तर कुठे शिवपार्वती गणेश! गुहेच्या सुरुवातीला शिवलिंग तयार झाले आहे. या गुहेत पन्नास- साठ पायर्‍या चढून गेलं की मोठ्ठं शिवलिंग दिसतं.प्रकृतीचा हा अद्भुत आविष्कार आपण निरखून पाहू तेवढा थोडा.हा भूखंड प्राचीन दंडकारण्याचा भाग समजला जातो.

बोरा केव्हज् मधील निसर्गाचे हे अद्भूत शिल्पकाव्य दहा लाख वर्षांपूर्वीचे आहे. १८०७ साली सर विल्यम किंग यांना तिचा शोध योगायोगाने लागला. गोस्तानी नदी वाहताना अनंतगिरी पर्वतातील सिलिका, मायका, मार्बल, ग्रॅनाईट यासारखा न विरघळणारा भाग शिल्लक राहून प्रचंड मोठी गुहा तयार झाली. एका वेळी एक हजार माणसे मावू शकतात एवढी मोठी ही गुहा आहे.गुहेमध्ये वरून ठिबकणारे पाणी क्षार ( कॅल्साइट) मिश्रित होते. थेंब थेंब पाणी खाली पडल्यावर त्यातील थोडे सुकून गेले आणि राहिलेल्या क्षाराचे स्तंभ बनले. याच वेळी छतावरून ठिबकणारे थोडे थोडे पाणी सुकून छतावरून लोंबकळणारे क्षारस्तंभ तयार झाले. स्तंभाची एक सेंटीमीटर लांबी तयार व्हायला एक हजार वर्षे लागतात. यावरून या गुहेची प्राचीनता लक्षात येते.

अजूनही गुहेत ठिकठिकाणी पाणी ठिबकणे  व ते सुकणे ही प्रक्रिया चालूच आहे. चाळीस हजार वर्षांपूर्वी या गुहेत आदिमानव राहात होता असे पुरावे सापडले आहेत. आंध्र प्रदेश पर्यटन महामंडळाने या गुहेची उत्तम व्यवस्था ठेवली आहे. आवश्यक त्या ठिकाणी प्रखर झोतांचे दिवे सोडले आहेत. गुहेत स्वच्छता आहे. प्रशिक्षित मार्गदर्शक आहेत. हा प्राचीन अनमोल ठेवा चांगल्या तऱ्हेने जतन केला आहे.

अनंतगिरी वरील मानवनिर्मित शिल्प काव्य आणि निसर्गाने उभे केलेले शिल्पकाव्य मनावर कायमचे कोरले गेले.

© सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

जोगेश्वरी पूर्व, मुंबई

9987151890

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈




हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #75 – 13 – जिम कार्बेट से भोपाल ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं  – 13 – जिम कार्बेट से भोपाल ”)

☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #76 – 13 – जिम कार्बेट से भोपाल ☆ 

जिस दिन हमें जिम कार्बेट , रामनगर से भोपाल के लिए वापस निकलना था, उस रोज मैं अकेला ही सडक के किनारे  घने जंगलों को निहारता हुआ,शुद्ध हवा को अपने फेफड़ों में भरते हुए कोसी नदी के किनारे- किनारे  जंगल के रास्ते गिर्जिया देवी के मंदिर तक का भ्रमण को निकल पडा । यह मेरा नेचर वाक था बिना किसी गाइड के । इस सड़क मार्ग में  जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान के सागौन के  जंगल एक ओर हैं तो सड़क के उस पार अल्मोडे से उद्गमित कोसी नदी कल-कल करती बहती है। रास्ते में झूला पुल है जो शायद सौ वर्ष से भी अधिक पुराना होगा। गिर्जिया देवी के विषय में जो जानकारी मैंने ग्रामीणों से जानी वह भी  कम रोमांचक नहीं है । यह स्थल इतना अच्छा था कि मैं सपिरवार वापसी के पूर्व इस स्थान पर पुन: आया ।

रामनगर से 10 कि०मी० की दूरी पर ढिकाला मार्ग पर गर्जिया  गाँव के पास कोसी  नदी के बीचों-बीच ही कहना चाहिए देवी का मंदिर है। गिर्जिया तो लगता है अपभ्रंश है हिम पुत्री गिरिजा का। देवी गिरिजा जो गिरिराज हिमालय की पुत्री तथा संसार के पालनहार भगवान शंकर की अर्द्धागिनी हैं, कोसी (कौशिकी) नदी के मध्य एक  ऊँचे टीले पर यह मंदिर स्थित है। अनेक दन्तकथाएं इस  स्थान  से जुडी हुई हैं । पूर्व में  इस मन्दिर विराजित  देवी को उपटा देवी (उपरद्यौं) के नाम से जाना जाता था । जनमानस की मान्यता हैं कि वर्तमान गर्जिया मंदिर जिस टीले में स्थित है, वह कोसी नदी की बाढ़ में कहीं ऊपरी क्षेत्र से बहकर आ रहा था। मंदिर को टीले के साथ बहते हुये आता देख भैरव देव द्वारा उसे रोकने के प्रयास से कहा गया- ठहरो, बहन ठहरो, यहां पर मेरे साथ निवास करो, तभी से गर्जिया में देवी उपटा में निवास कर रही है। इस मन्दिर में मां गिरिजा देवी की शांति स्वरूपा मूर्ति है और श्रद्धालु उन्हें नारियल, लाल वस्त्र, सिन्दूर, धूप, दीप आदि चढ़ा कर मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद मांगते है ।  नव विवाहित स्त्रियां यहां पर आकर अटल सुहाग की कामना करती हैं। निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिये माता में चरणों में झोली फैलाते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर   श्रद्धालु घण्टी या छत्र चढ़ाते हैं ।

अगले दिन कार्तिक पूर्णिमा थी और इस पावन अवसर  पर माता गिरिजा देवी के दर्शनों एवं पतित पावनी कौशिकी (कोसी) नदी में स्नानार्थ भक्तों की भारी संख्या में भीड़ उमड़ने वाली थी । हमें तो वापस आना था सो नीचे बाबा भैरव की पूजा कर हम अपने गंतव्य की ओर चल दिए ।

जब जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान से लौट रहे थे उसी दिन ख़बरें आ रही थी की उत्तराखंड के किसान भी आन्दोलन में शामिल होने दिल्ली की ओर कूच कर रहे हैं । हम दिल्ली पहुँचने को लेकर कुछ चिंतित हुए और हमारे वाहन चालक भी रास्ते भर अपने स्त्रोतों से स्थिति की जानकारी ले रहे थे और हमें चिंतामुक्त कर रहे थे । मोगा में एक ढाबे पर किसानों का हूजूम दिखा। वे सब उधमसिंह नगर उत्तराखंड से ट्रेक्टर पर दिल्ली जाने रवाना हुए हैं। रास्ते भर हमें कोई बीस ऐसे ट्रैक्टर दिखाई दिए जिनकी ट्राली काली त्रिपाल से ढकी थी और आगे काला झंडा लहरा रहा था। ट्रालियों में अंदर दस से पंद्रह हष्ट पुष्ट किसान बहुत अच्छे कपड़े पहने, हाथ में मंहगा मोबाइल लिए बैठे थे। मोगा के ढाबे में भी वे बढ़िया खाना खा रहे थे। मैंने उनसे चर्चा की तो बोले मोदीजी से मिलने जा रहे हैं। उन्हें मालूम है कि इस बिल से उन्हें क्या नुकसान होने वाला है। वे जानते हैं कि अगर देश के सेठों ने उनकी फसल का मूल्य नहीं चुकाया तो बिल पास होने के कारण उन्हें एसडीएम कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ेंगे और प्रशासन कितनी ईमानदारी से गरीबों की बात सुनता है यह  हम सब जानते हैं। उन्हें भय है कि सरकार का अगला कदम एमएसपी हटाने का होगा और इसके लिए वे आंदोलन कर रहे हैं। सरदारजी कहते हैं कि क्या छोटा क्या बड़ा सभी किसानों की बरबादी इस बिल में छिपी हुई है।उधर दिल्ली बार्डर पर जब हम पहुंचे तो पुलिस बल तैनात था। पुलिस वैन और रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों को हमने कतार में देखा। खैर हम निर्विघिन्न हज़रत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुँच गए, पुत्री ने जोमेटो से खाना मंगाया, ट्रैन में बैठकर हम सबने रात्रि का भोजन व शयन  किया और जब नींद खुली तो स्वयं को भोपाल रेलवे स्टेशन  पर पाया ।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈



मराठी साहित्य – मीप्रवासीनी ☆ मी प्रवासिनी क्रमांक-७ – क्रोएशियाचे समुद्र संगीत ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

✈️ मीप्रवासीनी ✈️

☆ मी प्रवासिनी  क्रमांक- ७ – क्रोएशियाचे समुद्र संगीत ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆ 

क्रोएशियाला  एड्रियाटिक सागराचा ११०० मैल समुद्र किनारा लाभला आहे. दुब्रावनिक या दक्षिणेकडील समुद्रकिनाऱ्यावरील शहरात पोहोचताना उजवीकडे सतत निळाशार समुद्र दिसत होता. त्यात अनेक हिरवीगार बेटे होती. क्रोएशियाच्या हद्दीत लहान-मोठी हजारांपेक्षा जास्त बेटे आहेत. त्यातील फार थोड्या बेटांवर मनुष्यवस्ती आहे. काही बेटांवरील फिकट पिवळ्या रंगाची, गडद लाल रंगाच्या कौलांची टुमदार घरे चित्रातल्यासारखी दिसत होती. समुद्रात छोट्या कयाकपासून प्रचंड मोठ्या मालवाहू बोटी होत्या. डाव्या बाजूच्या डोंगरउतारावर दगडी तटबंदीच्या आत लालचुटुक कौलांची घरे डोकावत होती.

गाइडबरोबर केबलकारने एका उंच मनोऱ्यावर गेलो. तिथून निळ्याभोर एड्रियाटिक सागराचे मनसोक्त दर्शन घेतले. गार, भन्नाट वारा अंगावर घ्यायला मजा वाटली. तिथून जुने शहर बघायला गेलो. जुन्या शहराभोवती भक्कम दगडी भिंत आहे. दोन किलोमीटर लांब व सहा मीटर रुंद असलेल्या या खूप उंच भिंतीवरून चालत अनेक प्रवासी शहर दर्शन करीत होते.

दगडी पेव्हर ब्लॉक्सच्या रस्त्यावर एका बाजूला चर्च व त्यासमोर ओनोफ्रिओ फाउंटन आहे. रोमन काळात दूरवरून पाणी आणण्यासाठी खांबांवर उभारलेल्या पन्हळीमधून उंचावरून येणारे पाणी गावात नळाने पुरवत असत. तसेच ते ओनोफ्रिओ फाउंटनमधूनही पुरवण्याची व्यवस्था होती. आजही आधुनिक पद्धतीने या फाऊंटनमधून प्रवाशांसाठी पाण्याची व्यवस्था केली आहे.

रस्त्याच्या एका बाजूला सोळाव्या शतकातील एक फार्मसी आहे. वेगवेगळ्या रंगांच्या बाटल्या, औषधी कुटण्यासाठीचे खलबत्ते, औषधी पावडरी मोजण्याचे छोटे तराजू, औषधांचे फाॅर्म्युले, रुग्णांच्या याद्या असे सारे काचेच्या कपाटात प्रवाशांना बघण्यासाठी ठेवले आहे. मुख्य म्हणजे आजही या ठिकाणी आधुनिक फार्मसीचे दुकान चालू आहे. मुख्य रस्त्याच्या शेवटी १६ व्या शतकातले कस्टम हाऊस आहे. तिथे राजकीय मौल्यवान कागदपत्रे, वस्तू ठेवल्या जात.

‘गेम ऑफ थ्रोन (Game of Throne)’ ही वेब आणि टीव्ही सिरीयल जगभर लोकप्रिय झाली. त्यातील एका राजघराण्याचे शूटिंग दुब्रावनिक  येथे झाले आहे. हे शूटिंग ज्या ज्या ठिकाणी झाले त्याची ‘गेम ऑफ थ्रोन वॉकिंग टूर’ तरुणाईचे आकर्षण आहे. ‘गेम ऑफ थ्रोन’ असे लिहिलेले टी-शर्ट, बॅग, मग्स, सोव्हिनियर्स दुप्पट किमतीला जोरात खपत होते. दुब्रावनिकच्या नितळ निळ्याभोर समुद्रातून लहान-मोठ्या बोटीने काॅर्चुला,स्प्लिट, बुडवा, व्हार अशा निसर्गरम्य, ऐतिहासिक बेटांची सफर करता येते. ताज्या सी-फूडचा आस्वाद घ्यायला मिळतो.व्हार खाडीतून फार पूर्वीपासून क्रोएशिया व इटली यांचे व्यापारी संबंध होते. त्यामुळे इथे थोडी इटालियन संस्कृतीची झलक दिसते. पास्ता, पिझ्झा, वाइन, आईस्क्रीम यासाठी दुब्रावनिक प्रसिद्ध आहे. इथल्या समुद्रकिनाऱ्यांवर वाळू नाही तर चपटे, गोल गुळगुळीत छोटे छोटे दगड (पेबल्स) आहेत. अनेक ठिकाणी रस्त्यावर लव्हेंडर, रोजमेरीसारख्या साधारण मोगऱ्याच्या जातीच्या फुलांचा सुवासिक दरवळ पसरलेला असतो. नितळ, निळ्याशार, स्वच्छ समुद्रकिनाऱ्यांवर अनेक जण पोहोण्याचा पोटभर आनंद घेतात. स्वच्छ समुद्रकिनारा आणि सुंदर हवामान यामुळे क्रोएशियाकडे प्रवाशांचा वाढता ओघ आहे. इंग्लंड, फ्रान्स, इटली येथील लोकांना दोन तासांच्या विमान प्रवासावर हे ठिकाण असल्याने त्यांची इथे गर्दी असते. स्थानिक लोक स्लाव्हिक भाषेप्रमाणे इंग्लिश, फ्रेंच भाषा उत्तम बोलू शकतात.

राजधानी झाग्रेब आणि दुब्रावनिक यांच्या साधारण मध्यावर झाडर नावाचे शहर एड्रियाटिक सागराकाठी आहे. हॉटेलमधून चालत चालत समुद्रकाठी पोहोचलो. समोर अथांग निळा सागर उसळत होता. झळझळीत निळ्या आकाशाची कड  क्षितिजावर टेकली होती. लांब कुठे डोंगररांगा आणि हिरव्या बेटांचे ठिपके दिसत होते. दूरवर एखादी बोट दिसत होती. आणि या भव्य रंगमंचावर अलौकिक स्वरांची बरसात होत होती. प्रत्यक्ष समुद्रदेवाने वाजविलेल्या पियानोच्या स्वरांनी आसमंत भारून गेले होते.

या समुद्र काठाला दहा मीटर लांबीच्या सात रुंद पायर्‍या आहेत. विशिष्ट प्रकारे बांधलेल्या या पायर्‍यांना पियानोच्या कीज्  सारखी आयताकृती  छिद्रे आहेत. सर्वात वरच्या पायरीवर, ठरावीक अंतरावर छोटी छोटी गोलाकार वर्तुळे आहेत. या वेगवेगळ्या उंचीवरच्या समुद्रात उतरणाऱ्या पायर्‍यांच्या आतून ३५ वेगवेगळ्या लांबी-रुंदीचे पाईप्स बसविले आहेत. संगीत वाद्याप्रमाणे वैशिष्ट्यपूर्ण रचना असलेले हे पाईप म्हणजे समुद्र देवांचा पियानो आहे. किनाऱ्यावर आपटणाऱ्या समुद्राच्या लाटांमुळे या पाईप्समधील हवा ढकलली जाते. लाटांच्या आवेगानुसार, भरती- ओहोटीनुसार या पाईप्समधून सुरेल सुरावटी निनादत असतात. उतरत्या पायऱ्या, त्याच्या आतील रचना आणि वाऱ्याचा, लाटांचा आवेग यामुळे हे स्वरसंगित ऐकता येते. आम्ही सर्वात वरच्या पायरीवरील गोल भोकांना कान लावून या संगीत मैफलीचा आनंद घेतला. पायर्‍या उतरून गार गार निळ्या पाण्यात पाय बुडवले. ज्ञानदेवांची ओवी आठवली..

निळीये रजनी वाहे मोतिया सारणी

निळेपणी खाणी सापडली..

आकाश आणि समुद्राच्या या निळ्या खाणीमध्ये स्वर्गीय सुरांचा खजिना सापडला होता.

झाडर या प्राचीन शहराने मंगोल आक्रमणापासून दुसऱ्या महायुद्धापर्यंत अनेक लढाया पाहिल्या. दुसऱ्या महायुद्धामध्ये तर झाडर हे नाझी सैन्याचे मुख्यालय होते. अमेरिका आणि ब्रिटनच्या बॉम्बवर्षावाने झाडर भाजून निघाले, उध्वस्त झाले. युद्धानंतर विद्रूप झालेल्या शहराची, समुद्रकिनार्‍याची पुनर्रचना करण्यात आली. सरकारने जगप्रसिद्ध स्थापत्यविशारद निकोल बेसिक यांच्याकडे या समुद्रकिनाऱ्याच्या सुशोभीकरणाचे काम सोपविले. त्यांच्या कल्पकतेतून हे अलौकिक सागर संगीत निर्माण झाले आहे. त्यांना ‘सर्वोत्कृष्ट युरोपियन पब्लिक स्पेस’  सन्मान या कलाकृतीसाठी 2006 साली मिळाला.

निकोल बेसिक यांनी इथे ‘दी ग्रीटिंग टू दी सन’ हे आणखी एक आगळे स्मारक सूर्यदेवांना समर्पित केले आहे. त्यांनी या समुद्रकिनार्‍यावर  आहे त्यांनी या समुद्रकिनाऱ्यावर २२ मीटर परिघाचे आणि ३०० पदरी काचांचे वर्तुळ बांधले. या वर्तुळात सौरऊर्जा शोषणाऱ्या पट्ट्या बसविल्या. या पट्ट्या दिवसभर सूर्याची ऊर्जा साठवितात आणि काळोख पडला की त्या वर्तुळातून रंगांची उधळण होते. त्यावर बसविलेली ग्रहमालासुद्धा उजळून निघते. किनारपट्टीवर लावलेल्या सौरऊर्जेच्या दिव्यांनी किनारा रत्नासारखा चमकू लागतो.

सूर्यास्ताचा अप्रतिम नजारा समोर दिसत होता. आकाशातल्या केशरी रंगांची उधळण समुद्राच्या लाटांवर हिंदकळत होती. आकाश आणि सागराच्या निळ्या शिंपल्यामध्ये सूर्य बिंबाचा गुलाबी मोती विसावला होता. दूरवरून एखादी चांदणी चमचमत  होती. पु.शी. रेगे यांची कविता आठवली,

आकाश निळे तो हरि

अन् एक चांदणी राधा

श्रीकृष्णासारखी ती असीम, सर्वव्यापी निळाई आणि त्यातून उमटणारे ते पियानोचे- बासरीचे अखंड अपूर्व संगीत! निसर्ग आणि मानव यांच्या विलोभनीय मैत्रीचा साक्षात्कार अनुभवून मन तृप्त झाले.सौंदर्य आणि संगीत यांचा मधुघट काठोकाठ भरला.

© सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

जोगेश्वरी पूर्व, मुंबई

9987151890

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈




हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #75 – 12 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं  – 12 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ”)

☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #76 – 12 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ☆ 

जब से भारत में शहरीकरण बढ़ा है और विकसित होते  व्यवसायिक केन्द्रों में युवा पीढी अपने सपनों को साकार करने हाड़-तोड़ मेहनत कर रही है तो उन्हें मानसिक सूकून देने पर्यटन के क्षेत्र में भी एक नई क्रान्ति हुई है । यह क्रान्ति है, प्रकृति के नज़दीक तेजी से, कुकुरमुत्तों की भाँती उगते हुए रिसार्टों की । शहर की जिन्दगी से दूर , हरी भरी वादियों, नदियों और समुद्री किनारों के बीच बने  इन खूबसूरत  होटलों में,  जहाँ एक ओर रहन-सहन की आधुनिक सुविधाएं है, शहर की कोलाहल व  भागदौड़ भरी जिन्दगी से मुक्ति है तो दूसरी ओर उनके गतिविधि केंद्र या एक्टिविटी सेंटर मनोरंजन के लिए अनेक गतिविधियों को भी संचालित करते हैं और  साहस व रचनात्मकता से भरपूर यह गतिविधियाँ सभी उम्र के लोगों के लिए होती हैं, जिससे परिवार की तीन पीढियां एक साथ अवकाश के क्षणों का लुत्फ़ उठा सकती हैं ।

कोशी नदी, जिसका पौराणिक नाम  कौशिकी है के किनारे,  क्लब महिन्द्रा द्वारा संचालित, कार्बेट रिसार्ट, जहाँ हम ठहरे थे, ऐसी अनेक गतिविधियों का संचालन, अपने सदस्य अतिथियों के मनोरंजनार्थ सुबह से देर शाम तक करता रहता है । और जब कोई ग्यारह बजे हमने उनके एक्टिविटी सेंटर में  संपर्क किया तो पता चला कि नेचर वाक व सायकल चालन का आयोजन वे सुबह-सुबह करते हैं और दोपहर में विलेज वाक का मजा लिया जा सकता है । नेचर वाक का मजा तो मैं पिछली यात्रा के दौरान नौकुचियाताल में ले चुका था और अगले दिन यानी 29 नवम्बर की सुबह इस हेतु मैं जाने ही वाला था तथा बढ़ती उम्र के साथ सायकिल चलाना तो लगभग भूल ही चुका था, और ऐसा अनुभव मैंने एक्टिविटी सेंटर में खडी सायकिल को थोड़ी दूर चलाकर कर भी लिया, इसीलिए हमने विलेज वाक या ग्राम भ्रमण पर जाने का निर्णय लिया ।

हम लोग, एक गाइड के साथ जिप्सी में सवार होकर, गाँव की ओर चल पड़े । रिसार्ट से कोई दस किलोमीटर दूर सड़क के किनारे बसे एक गाँव में जब गाइड ने हमें उतरने को कहा तो एकबारगी लगा कि सड़क के किनारे बसे गाँव देखकर क्या मिलेगा । पर जैसे ही गाइड आगे बढ़ा और हम शनै-शनै रिंगौडा गांव की उबड़ खाबड़  गलियों से होकर गुजरने लगे तो आनंद दुगना होता चला  गया । हमारा भ्रमण हमें प्रकृति के नजदीक ले जा रहा था । प्रकृति द्वारा निर्मित कच्चा  मार्ग, उसके किनारे खड़े ऊंचे ऊंचे वृक्ष हमें मोह रहे थे । बीच-बीच में गाइड हमें बताता जाता था कि साहब यह साल का वृक्ष  है जो सालभर हराभरा रहता है, देखिये यह बेलपत्र का पेड़ है, इसके पत्ते छोटे हैं और यह बेलपत्र  आपके यहाँ की बड़े पत्तों वाली  प्रजाति जैसा नहीं है, यह हल्दू है जैसा नाम वैसा गुण, इसका तना अन्दर से पीले रंग का होता है । इतने में उसने कुछ और बृक्षों की ओर इशारा किया और मैं भी ठहरा वनस्पति  शास्त्र का पुराना विद्यार्थी, झट से बोल उठा हाँ भाई यह शीशम और सागौन के पेड़ हैं, सबसे अच्छी इमारती लकड़ी इन्ही से मिलती है ।  हम कुछ दूर चले ही थे कि एक विशाल बरगद के वृक्ष ने हमारा स्वागत किया । इस वृक्ष  के नीचे गिर ग्राम देवी विराजित हैं जो  ग्रामीणों की श्रद्धा व पूजा  का केंद्रबिंदु  है । बरगद के निकट ही एक बरसाती नाला था और बरगद की फैलती जड़ों ने भू स्खलन को रोक दिया था, जहाँ इस बड़े बृक्ष की जड़ें नहीं फ़ैली थी वहाँ से मिट्टी का कटाव स्पष्ट दिखता था । तनिक आगे, ढलान पर  एक सुन्दर दृश्य हमारा इन्तजार कर रहा था, पानी का झरना, गाँव से कोई दो किलोमीटर दूर,ग्रामीणों के लिए वर्ष भर जल का एक मात्र स्त्रोत । पहाड़ी क्षेत्रों में यही हाल है, उन्हें आज भी पेय जल लाने के लिए लम्बी दूरियाँ तय करनी पड़ती है लेकिन पहाड़ी महिलाएं इस जिम्मेदारी को प्रसन्नता पूर्वक तेज गति से निपटाती है । इस झरने का पानी बहुत ही मीठा था और बिस्लहरी या आरओ के पानी को भी मात कर रहा था । हम सब ने एक-एक चुल्लू पानी पिया और रिंगौडा गांव के  जीरो प्वाइंट की ओर चल दिए , सामने धीर गंभीर, कलकल  नाद करती हुई कोशी नदी बह रही थी और साल के दो विशाल बृक्षों के मध्य खड़े होकर जब हमने ऊपर, आसमान  की ओर देखा तो एक विरल-सघन आबादी का शहर दिखाई दिया, गाइड ने हमें बताया कि यह नैनीताल की वादियाँ हैं । इस नैसर्गिक  व्यु को हमें बहुत देर तक निहारते रहे और फिर दूसरे मार्ग से आगे बढ़ गए । एक कुटी के सामने, शुद्ध कुमायुनी अंदाज में हमारा स्वागत करने,  विमला आरती का थाल लिए खडी थी । उन्होंने हमें तिलक लगाया, आरती उतारी और फिर प्रेम से अपना घर दिखाया । लेंटाना और  कुरी की  झाड़ियों की फेंसिंग के मध्य सुन्दर बागीचा है जहाँ आम,कड़ी पत्ता,बेलपत्र, आवंला  और सब्जियों की बागवानी के मध्य दो कमरे व एक रसोईघर बनाया हुआ है । मकान के सामने ही कुछ खम्भों  पर  पुआल की छत से एक चबूतरानुमा जगह पर बेंच व टेबल लगाकर भोजन शाला बनाई गई है । यह विमला का स्वरोजगार है- होम स्टे, कुमायुनी भोजन  व जैविक उत्पाद का विक्रय केंद्र । ग्रामीणजन भी  हम शहरियों की मानसिकता अब समझने लगे हैं । यद्दपि चाय की चुस्कियों और कडी-पत्ता व  आलू के पकोड़े खाते हुए मैंने उसकी आर्थिक आमदनी के बारे में तो कुछ नहीं पूछा पर ग्रामीण समस्यायों के बारे में जरुर जानने की कोशिश की । पेय जल की समस्या का जिक्र तो मैं  पहले कर ही चुका हूँ , बिजली के खम्भे गाँव में इसलिए नहीं लगे हैं क्योंकि यह आबादी वन क्षेत्र  के अंतर्गत है लेकिन केंद्र सरकार ने सभी घरों में अनुदान देकर सोलर पेनल लगवा दिए हैं और इससे उत्पन्न ऊर्जा  से ग्रामीण प्रकाश, व हैण्ड-पम्प आदि चलाने की व्यवस्था कर लेते हैं । बच्चे शिक्षित हो रहे हैं यह अच्छी खबर विमला ने हमें दी । वह देर तक हमें अपने किस्से सुनाती रही और हर बार शाम को रुकने व भोजन कर वापस जाने का आग्रह करती रही पर हमें जिप्सी चालक को तय समय पर छोड़ना था सो हम उसके जैविक उत्पादों में से पहाडी लूंण ( एक प्रकार का मसाले दार नमक, कुछ कुछ वैसा ही जैसा बुंदेलखंड के हमारे जैन बंधू प्रयोग में लाते हैं ) व बोतल बंद चटनी क्रय कर अपने ठिकाने लौट आये जहाँ रात्रि का भोजन और बिछौना हमारा इन्तजार कर रहा था ।

पहाड़ के भोलेभाले  ग्रामीणजनों व उनके गावों का उल्लेख जिम कार्बेट ने अपनी किताब My ।nd।a में बख़ूबी किया है । वे लिखते हैं कि “जिस हिन्दुस्तान को मैं जानता हूँ, उसमें चालीस करोड़ लोग रहते हैं, जिनमें से नब्बे फीसदी लोग सीधे-सादे, ईमानदार, बहादुर, वफादार और मेहनती हैं जिनकी रोजाना की इबादत ऊपर वाले से यही रहती है कि उनकी जान-माल की सलामती बनी रहे और वो अपनी मेहनत का फल अच्छे से खा सकें । हिन्दुस्तान के ये वो लोग हैं जो निपट गरीब हैं और जिन्हें अक्सर ‘ हिन्दुस्तान के करोड़ों अधपेटे’ कहा जाता है ।”  जिम कार्बेट को ऐसे हिन्दुस्तानियों से बेपनाह मुहब्बत थी और एक बार ऐसे ही किसी गाँव के लोगों ने आदमखोर शेर से स्वयं को बचाने के लिए जिम कार्बेट को चन्दा जमा करके एक टेलीग्राम भेजा था । इस टेलीग्राम को भेजने के लिए ग्रामीणों का हरकारा कई मील दूर पैदल चलकर पोस्ट आफिस गया था । जिम कार्बेट ने भी इन विश्वासी  ग्रामीणों को निराश नहीं किया और वे, टेलीग्राम मिलते ही  मोकामघाट(बिहार ) से इस गाँव के लिए अपना काम छोड़कर आ गए – एक आदमखोर शेर को मारने के लिए । उन्हें हज़ार मील की लम्बी यात्रा  और लगभग बीस मील पैदल चलकर इस गाँव में पहुंचने में तब एक सप्ताह का समय लगा था । और वह गाँव इन्ही वादियों के मध्य स्थित था । लौटते वक्त हमें जंगल विभाग का वह गेस्ट हाउस भी दिखा जहाँ बाघ के शिकार के लिए आये जिम कार्बेट ने अपनी रातें बिताई थी।

आज़ादी के बाद इन सत्तर सालों में गाँव का नक्शा बदला है, घर अब पक्के हो गए हैं, पहुँच मार्ग और आवागमन के साधनों का जाल बिछा है , मूलभूत सुविधाएं भी सुधरी हैं और ग्रामीण जनों को उपलब्ध हुई हैं । लेकिन एक बात आज भी ठीक वैसी ही है जिसका जिक्र जिम कार्बेट ने My ।nd।a में किया  है और जिसका हिंदी अनुवाद मैंने ऊपर लिखा है।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈



मराठी साहित्य – मीप्रवासीनी ☆ मी प्रवासिनी  क्रमांक-६ – सौंदर्य संपन्न आणि संशोधक क्रोएशिया ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

✈️ मीप्रवासीनी ✈️

☆ मी प्रवासिनी  क्रमांक-६ – सौंदर्य संपन्न आणि संशोधक क्रोएशिया ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆ 

टर्की एअरलाइन्सने ऑस्ट्रिया इथे पोहोचलो. ऑस्ट्रियाहून बसप्रवास करून क्रोएशियाची राजधानी झाग्रेब इथे गेलो.  क्रोएशिया हा मध्य युरोपमधील एक छोटासा, सौंदर्यसंपन्न  देश आहे. झाग्रेब हे त्याच्या राजधानीचे शहर सावा नदीच्या काठी एका डोंगररांगांच्या पायथ्याशी वसले आहे.

रोमन काळापासून हे ऐतिहासिक महत्त्वाचे शहर आहे. गाईड बरोबर जुन्या शहराचा फेरफटका केला. एका मोठ्या चौकाच्या  सभोवताली असलेल्या आकर्षक दुकानांतून लोकांची खरेदी चालली होती. खाण्यापिण्याचा आनंद घेणाऱ्यांची गर्दी उसळली होती. पुढील चौकात झाग्रेब शहराचा तेरा चौरस मीटर लांब रुंद असलेला मिश्रधातूमध्ये बनविलेला नकाशा बघायला मिळाला. एका दगडी वेशीच्या कमानदार,उंच दरवाजातून आत गेल्यावर चौदाव्या शतकात बांधलेले सेंट मार्क चर्च दिसले. याचे उतरते छप्पर अतिशय देखणे आहे. छपरावर छोट्या छोट्या लाल व हिरवट टाईल्स चौकटीमध्ये बसविलेल्या आहेत. उजव्या बाजूला लाल-पांढऱ्या टाइल्सचे सोंगट्यांच्या पटासारखे डिझाईन आहे. यापुढे हिरवट रंगाच्या टाईल्स वर तीन सिंह  लाल टाइल्स मध्ये आहेत. चर्चच्या सभोवतालच्या उंच कोनाड्यात बारा धर्मगुरू दगडावर कोरलेले आहेत. हिरव्या सोनेरी रंगाच्या टाईल्सचा बेल टॉवर शोभिवंत दिसतो. एकोणिसाव्या शतकात इथे मोठा भूकंप झाला पण सुदैवाने बेल टॉवर अबाधित राहिले.

‘मार्शल टिटो स्क्वेअर’हा झाग्रेबमधील सर्वात मोठा चौक आहे.रुंद रस्ते, पुतळे, कारंजी, रेस्टॉरंटस्, मॉल्स रंगीबेरंगी फुलांनी सजलेल्या छोट्या बागा यामुळे हा चौक शोभिवंत दिसतो. रस्त्याच्या कडेला असलेल्या अनेक दुकानातून क्रोशाचे विणकाम असलेल्या सुंदर लेस, रुमाल, ड्रेस नजाकतीने मांडले होते. तऱ्हेतऱ्हेचे टाय होते. गाईडने सांगितले की नेकटाय आणि फुटबॉल यांची सुरुवात क्रोएशियाने केली.

झाग्रेबपासून साधारण दोन तासांवर ‘प्लिटविक लेक्स नॅशनल पार्क’ आहे.  अनेक डोंगर, दर्‍या, नद्या, धबधबे, सरोवरे असलेला हा एक खूप मोठा नैसर्गिक विभाग आहे. २९५ चौरस किलोमीटरच्या परिसरात पसरलेला प्लिटविक लेक्स परिसर फार प्राचीन काळापासून म्हणजे हिमयुगानंतर अस्तित्वात आला असे शास्त्रज्ञ म्हणतात. हा संपूर्ण विभाग चुनखडीच्या डोंगरांनी व्यापलेला आहे. या खडकांची सतत झीज होत असते. त्यामुळे डोंगर उतारावर अनेक घळी तयार झाल्या आहेत. त्यातून जलधारा कोसळत असतात. त्यांचे अनेक लहान-मोठे तलाव तयार झाले आहेत. निळ्या-हिरव्या रंगाचं गहिरं पाणी आणि त्यात तरंगणारी पांढऱ्या स्वच्छ कापसाच्या ढगांची प्रतिबिंबे मोहक दिसतात.

गाईड बरोबर जंगलातील थोडी पायवाट चालून एका छोट्या दोन डब्यांच्या रेल्वेत बसलो. दोन्ही बाजूंना बर्च, पाइन, ओक अशा सूचिपर्णी वृक्षांचे घनदाट जंगल होते. पाच मिनिटात गाडीतून उतरून परत चालायला सुरुवात केली. अनेक पायर्‍यांची चढ-उतर केली. छोट्या जंगलवाटेमधून ठिकठिकाणी निळ्या हिरव्या रंगांचे तलाव आणि त्यात अनेकांगांनी उड्या मारणारे असंख्य धबधबे यांचे नेत्रसुखद दर्शन होत होते. निसर्गाला अजिबात धक्का न लावता हे पायी चालण्याचे मार्ग तयार केले आहेत. वर्षानुवर्षे या चुनखडीच्या डोंगरांमधील कॅल्शिअम विरघळल्यामुळे ते सच्छिद्र झाले आहेत. या सातत्याने होणार्‍या प्रक्रियेमुळे या डोंगरातून येणारे झरे, धबधबे यांचा प्रवाह बदलत राहतो. वाहून गेलेल्या कॅल्शिअमचे पुन्हा लहान-मोठे दगड, बंधारे बनतात. त्यामुळे पाण्याच्या प्रवाहाचा ओघ बदलत राहतो. मोठे धबधबे निर्माण होतात. इथल्या लहान-मोठ्या सोळा सरोवरांपैकी एका सरोवरातून यांत्रिक बोटीतून फेरफटका मारला. किनाऱ्याजवळील मातकट रंगाच्या पाण्यातून बोट निळसर हिरव्या नितळ पाण्यात शिरली. किनाऱ्यावरील उंच, हिरव्या वृक्षांची छाया त्यात हिंदकळू लागली. गार गार वाऱ्याने शिरशिरी भरली होती. चालून चालून पाय दमले होते पण डोळे आणि मन तृप्त झाले होते.

घनदाट सूचिपर्ण वृक्षराजी आणि अनेक प्रकारच्या ऑर्किड्सनी समृद्ध अशा इथल्या जंगल दऱ्यांमध्ये जैवसमृद्धी आहे. अनेक प्रकारची फुलपाखरे, विविध पक्षी, वटवाघळे, तपकिरी अस्वल आणि अन्य वन्य प्राणी यांच्या नैसर्गिक सहजीवनाचे अस्तित्व कसोशीने जपलेले आहे वृक्षांच्या जुन्या ओंडक्यांचा उपयोग करुन त्यापासून लाकडी बाके, कडेचे लाकडी कंपाउंड, उपहारगृहांचे लाकडी बांधकाम, पाय वाटेवरून घसरू नये म्हणून बसविलेल्या लाकडाच्या गोल  चकत्या सारं तिथल्या निसर्गाशी एकरूप होणारं आहे. ट्रेकिंग, सायकलिंग, केबल कार,बोट रोईंग अशा अनेक प्रकारांनी धाडसी तरुणाई इथल्या निसर्ग वैभवाचा मुक्त आनंद घेत होती. प्लिटविक लेक्स नॅशनल पार्कला युनेस्कोने १९७९ साली वर्ल्ड नॅचरल हेरिटेज…. जागतिक नैसर्गिक वारसा संपत्ती असा दर्जा दिला आहे .

क्रोएशियाला शास्त्रीय संशोधनाची महान परंपरा आहे. आज दैनंदिन व्यवहारात आपण अनेक गोष्टींचा सहजतेने वापर करतो त्यातील कितीतरी महत्त्वाचे शोध येथील जगप्रसिद्ध शास्त्रज्ञ निकोला टेस्ला ( Nikola Tesla १८५६–१९४३) यांनी लावले आहेत. त्यांची प्रयोगशाळा व ऑफिस असलेली इमारत झाग्रेब इथे बघायला मिळाली.

जगप्रसिद्ध शास्त्रज्ञ थॉमस एडिसन यांनी ज्यावेळी इलेक्ट्रिसिटीमध्ये डायरेक्ट करंटचा (DC ) शोध लावला त्याच वेळी निकोला टेस्ला यांनी अल्टरनेटिंग इलेक्ट्रिक करंटचा (AC ) शोध लावला. त्यामुळे इलेक्ट्रिकच्या  वापरामध्ये सुरक्षितता, सहज वहन व किमतीमध्ये बचत झाली. नुसते बटण दाबून इलेक्ट्रिकचे दिवे लावताना आपण निकोला टेस्ला यांची आठवण ठेवली पाहिजे. टीव्ही चॅनल्स बदलताना, एसी लावताना आपण रिमोट कंट्रोलचा वापर करतो त्याचे संशोधन निकोला टेस्ला यांचेच. फ्रीज, मिक्सर, वाशिंग मशीन, हेअर ड्रायर अशा अनेक वस्तू ज्यावर चालतात त्या इलेक्ट्रिक मोटरचा शोध टेस्ला यांनीच लावला. रेडिओचा शोध प्रथम मार्कोनी यांच्या नावावर होता. पण हा शोध टेस्ला यांनीच प्रथम लावल्याचे सिद्ध होऊन १९४ ३ साली त्यांना या संशोधनाचे पेटंट देण्यात आले. थर्मास, गॅस लायटर हेही त्यांचेच संशोधन!

त्यांच्या सन्मानार्थ इलेक्ट्रिक कारला टेस्ला असे नाव देण्यात आले आहे.

विसाव्या शतकापासून क्रोएशिया उद्योगधंदे, व्यापार, शैक्षणिक संस्था, दळणवळणाची साधने यांतही आघाडीवर राहिले आहे .मोठ्या पुलांची बांधणी, सस्पेन्शन ब्रिज, टर्बाइन्स, पॅरॅशूट जम्पिंग, आपण वापरत असलेले चष्मे हे संशोधन क्रोएशियातील शास्त्रज्ञांचे आहे. टीव्हीची सॅटॅलाइट डिश, असे अनेक महत्त्वाचे शोध लावले फाउंटन पेन चा शोध लावणारे पिकाला मास्टरयांच्या नावाची पेन फॅक्टरी अजूनही झाग्रेब मध्ये आहे .एमपी थ्री चा शोध इथलाच. क्रोएशियाच्या नवीन पिढीनेही हा वारसा पुढे नेला आहे. कार पार्किंग बाय टेक्स्ट मेसेज, सोलर पाॅवरवर चालणारा मोबाईल चार्जर बनविले आहेत. फेरारी, पोर्शे अशा कंपन्यांशी स्पर्धा करणारी इलेक्ट्रिक कार कंपनी झाग्रेब पासून जवळच आहे. केवळ 45 लाख लोकसंख्या असलेल्या या देशातील संशोधन निश्चितच कौतुकास्पद आहे.

© सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

जोगेश्वरी पूर्व, मुंबई

9987151890

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈




हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #75 – 11 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं  – 11 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ”)

☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #76 – 11 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ☆ 

 नैनीताल में एक रात बिताकर और हिमालय दर्शन करते हुए हम जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य की ओर चल दिए । नैनीताल के ताल और वन शिखरों को पार करते हुए हम  धीरे-धीरे मैदान की ओर बढ़ रहे थे ।  लेकिन मैदान भी हरे भरे जंगलों और खेतों में उगती हुई नई रबी फसल की  हरियाली  की छटा बिखेर रहे थे । मैं सदैव सोचता हूँ कि रंग बिरंगे फूलों और पत्तों को अपने आँचल में समेटे हुए भारत भूमि के जंगल अद्भुत हैं और यह विश्व भर में इसीलिए भी विलक्षण हैं क्योंकि हमारे जंगलों में रंग-बिरंगी  वनस्पतियों की अनेक प्रजातियाँ हैं, हमारी पृकृति एकरंगी नहीं है और इसीलिये हमारी संस्कृति भी बहुरंगी है ।

कार से यह मनमोहक  यात्रा  लगभग तीन घंटे की थी और  इस दौरान हमने तीन  पर्यटक स्थलों का भी भ्रमण किया । नैनीताल से मैदान उतरते ही पहला मनभावक दृश्य कोशी नदी के जल प्रपात का था । थोड़े कम घने जंगलों के मध्य कोई आधा किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम इस जलप्रताप के निकट पहुंचे । शांत प्रकृति के बीच चीतल और लंगूरों के दर्शन हुए तो कुछ पक्षी भी चहचहाते हुए दिख गए । जल प्रताप वन क्षेत्र के अन्दर है और जाहिर है सरकार को शुल्क दिए बिना प्रकृति की इस अनुपम नैसर्गिक  कृति का आनंद आप नहीं ले सकते । कोशी नदी, उत्तराखंड की  प्रमुख पवित्र नदियों मे से के है और  कौसानी के पास से उद्गमित होकर अल्मोड़ा , नैनीताल रामनगर होकर बहती है और आगे रामगंगा से मिल जाती है। यह छोटा सा मनलुभावन जलप्रपात इसी नदी में  कलकल करता बहता है । जलप्रपात जंगल की सीमा के अन्दर है तो इसीलिये बिना टिकट प्रवेश हो नहीं सकता । हम पैदल भी चले और रास्ते भर सागौन के घने  वृक्षों के मध्य जंगली मुर्गियां  व चीतल को निहारते हुए आगे बढ़ते रहे ।

कुछ दूरी पर हनुमानघाट है और यहाँ निर्माणाधीन मंदिर परिसर में हनुमान की चित्ताकर्षक मूर्तियाँ उनके विभिन्न स्वरूपों यथा पंचमुखी हनुमान, बाल हनुमान, राम भक्त हनुमान आदि को दर्शाती हैं और ऊपर की ओर सुन्दरकाण्ड से प्रेरित अनेक भित्तिचित्र हनुमान की महिमा और सीता के खोज के उद्देश्य से उनकी लंका यात्रा को दर्शाते हैं ।

इन दोनों स्थलों को पारकर हम कालाडुंगी पहुँच गए । रास्ते में हमने एक लम्बी और पक्की बाउंड्री वाल भी देखी और फिर जिम कार्बेट का निवास स्थान, उनका अंग्रेजी स्थापत्य की छवि लिए बँगला  भी देखा , जिसे अब इस महान शिकारी, पर्यावरणविद  और भारत प्रेमी की याद में संग्रहालय में बदल दिया गया है । मैं जब महाविद्यालय में अध्ययनरत था तो हमारी अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तक में एक लम्बी कहानी थी ‘मेन इटर्स आफ कुमायूं’, समय के साथ शिकार की इस कहानी को तो मैं भूल गया पर उसके लेखक जिम कार्बेट की बहादुरी के किस्से मन में बसे रहे और आज उन्ही जिम कार्बेट के बंगले  के सामने मैं खडा था, जहाँ इस मानवता और पशुओं के प्रेमी ने अपनी बहन के साथ भारत के आज़ाद होने तक निवास किया था । जिम कार्बेट की चर्चा चंद पंक्तियों में करना उनके भारत प्रेम के प्रति अन्याय होगा । मैंने संग्रहालय के द्वारा संचालित सुवेनियर शाप से जिम कार्बेट द्वारा लिखी गई  दो पुस्तकें Man Eaters of Kumon व मेरा हिन्दुस्तान (My ।nd।a का हिन्दी अनुवाद ) खरीदी । इस यात्रा वृतांत को लिखते हुए मैं इन दो पुस्तकों को भी पढ़ रहा हूँ और इस महान व्यक्तित्व पर आगे अलग से चर्चा करने का ख्याल मन में उपजने लगा है तो चलिए शिकारी  जिम कार्बेट को यहीँ छोड़कर हम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान का एक चक्कर लगा लें ।

जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य के बारे में केवल इतना बताना चाहता हूँ कि 1936 में जब यह अस्तित्व में आया तो इसे हैली नेशनल पार्क नाम दिया गया और फिर 1955-1956 में, जिम कॉर्बेट को श्रद्धांजलि और वन्य जीवन के संरक्षण में उनके योगदान को ध्यान में रखते हुए, इसे अपना वर्तमान, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, नाम मिला। मैं बाघ परियोजना को समर्पित इस उद्द्यान के बारे में इससे ज्यादा चर्चा इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि यह जानकारी तो आपको गूगल महाराज भी दे देंगे । मैं तो आपसे अपनी उस एक मात्र जंगल सफारी की यात्रा का अनुभव साझा करूंगा जिसका भरपूर आनंद मैंने 28 नवम्बर 2020 की हल्की पर चुभन वाली ठण्ड में सुबह सबेरे छह बजे से दस बजे तक लिया । आनलाइन के इस युग में जंगल सफारी के लिए पहले से ही आरक्षण करवाना अनिवार्य है । कोरोना के इस संक्रमण काल में भी जब मैंने रामनगर पहुँच कर इसकी तहकीकात की तो पता चला कि अगले दिन की सफारी मिलना मुश्किल ही है । शुक्र था कि हमने रुपये 3800/- देकर एक जिप्सी पहले ही आरक्षित करवा ली थी । इस लागत में जिप्सी का किराया 2200/- रूपए व वनक्षेत्र में प्रवेश  का शुल्क 1080/-  शामिल है शेष राशि बुकिंग एजेंट के खाते में । हमें गाइड की सुविधा वन विभाग के माध्यम से मिल गई और इसका शुल्क 800/- रुपये अलग से था । झिरना, ढेरा, ढिकाला आदि प्रवेश द्वारों से इस  राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश किया जा सकता है पर हमने बुकिंग एजेंट की सलाह पर बिजरानी गेट से वन गमन सुनिश्चित किया । तराई क्षेत्र के इस घने जंगल के दर्शन तो रामनगर से ही होने लगते है ।  सागौन का सघन  वृक्षारोपण बाहरी इलाके में है और सागौन के ऐसे  लम्बे व मोटे तने युक्त वृक्ष मैंने मध्य प्रदेश के विभिन्न जंगलों में, जहाँ के सागौन की गुणवत्ता सबसे बेहतर है, भी नहीं देखे ।  जंगल के अन्दर तो वनस्पतियों की अनेक प्रजातियाँ हैं, ज्यादातर वृक्ष साल के हैं, फिर हल्दू, जामुन, आम, सेमल, बरगद आदि भी बहुतायत में हैं । ऊँचे घने पेड़ों के नीचे लेंटाना व कुरी की झाडियां और घांस सारे जंगल को घेरे हुए हैं। हमारे गाइड ने बताया कि लेंटाना की झाड़ियाँ तेजी से फैलती हैं और इनके उन्मूलन के ‘असफल प्रयास’ वन विभाग द्वारा समय समय पर होते रहते हैं । यह लेंटाना की झाडिया हमने अपने बचपन में भी खूब देखी थी । इसकी बाडी लगाकर बाग़ बगीचों की रक्षा होती थी और लाल पीले रंग के गुच्छेदार फूल व काले रंग के फल किसी काम के न थे । हाँ इसकी बेंत अच्छी बनती थी जिसका उपयोग हमारे शिक्षक व पिताजी हमें सुधारने के लिए अक्सर करते थे । जंगल में अन्दर जाने के पहले हमारे गाइड ने  हमें बताया था कि इस पार्क की खासियत रॉयल बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी और घड़ियाल के साथ अन्य  प्रजातियों के जंगली  जानवर जैसे काला  भालू, हिरणों की विभिन्न प्रजातियाँ, बार्किंग डियर, सांभर, चीतल, श्याम मृग आदि  और गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों की उपलब्धता है और आपको इन सभी को  देखने का सुनहरा अवसर अवश्य  मिलेगा । इसके अलावा  यहाँ पक्षियों में ग्रेट चितकबरा हॉर्नबिल, सफेद पीठ वाला गिद्ध,मोर, हॉजसन बुशचैट, उल्लू आदि भी दीखते हैं । पर हमारी किस्मत कोई ख़ास अच्छी न थी । हमने बाघ के पदचिन्ह तो खूब देखे पर वनराज हमसे शर्माते ही रहे । गणेश के स्वरुप हाथी तो खैर दिखे ही नहीं बस दो चार ऐसे पेड़ों को हमने देखा जिन्हें रात में हाथियों ने धाराशाई कर दिया था । लेकिन इतनी निराशा की बात भी न थी हम चीतल, सांभर, बार्किंग डियर, जंगली मुर्गियां, सफ़ेद गिद्ध, मोर आदि को उनके ही घर में विचरते हुए देखने  में  कामयाब हुए ।  राम गंगा नदी और दीमक की अनेक विशालकाय बाम्बियाँ हमें जगह जगह दिखी पर मगरमच्छ, और किंग कोबरा जैसे सरीसृप देखने से हम वंचित ही रहे । कोई तीन -चार घंटे हम इस शानदार जंगल में बिताकर वापस अपने ठिकाने क्लब महिंद्रा के जिम कार्बेट रिसोर्ट में वापस आ गए और दोपहर कैसे बिताई जाय इसकी चर्चा रिसार्ट के  गतिविधि विशेषज्ञ से करने पहुँच गए ।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈



हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #75-10 – बिनसर वन अभ्यारण ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं -10 – बिनसर वन अभ्यारण”)

☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #75-10 – बिनसर वन अभ्यारण ☆ 

बिनसर वन अभ्यारण, अल्मोड़ा जिले में स्थित है । एक ऊंची पहाड़ी चोटी में हरे भरे वृक्षों से आच्छादित यह स्थल लगभग 200 प्रजातियों की वनस्पतियों और 150 किस्म के पक्षियों का घर है । स्थानीय भाषा में इस पहाड़ी को झांडी ढार  कहते हैं लेकिन बिनसर का अर्थ है नव प्रभात और इस पहाड़ी से सुबह सबरे नंदा देवी पर्वत शिखर में सूर्योदय देखना अनोखा अनुभव प्रदान करता है । सूर्य की प्रथम किरण जब नंदा देवी पर पड़ती है तो 300 किलोमीटर की यह पर्वतमाला गुलाबी रंग से सरोबार हो उठती है और फिर ज्यों ज्यों सूर्य की रश्मियाँ अपने यौवन की ओर बढ़ती हैं तो पूरी पर्वत श्रंखला रजत हो उठती है । यद्दपि हमने पिछली बार कौसानी से सूर्योदय के समय गुलाबी होते हिम शिखर के दर्शन किये थे पर इस सौभाग्य से हम बिनसर में तीन दिन तक रुकने के बाद भी वंचित ही रहे । प्रकृति के एक अन्य रूप, जल शक्ति के प्रतीक वरुण देवता ने धुंध और बादलों का ऐसा जाल बिछाया कि हिम शिखर का दिखना तो दूर , हिमालय की निचली पहाड़ियां भी लुकाछिपी का खेल खेलती रही । इस ऊँची पहाड़ी पर कुमायूं विकास मंडल ने एक सुन्दर होटल का निर्माण किया है । मेरी पुत्री को इंटरनेट के माध्यम से कुछ कार्य करना था और वाई-फाई की आशा में हम इस होटल के प्रबंधक से मिले । उन्होंने हमारे आग्रह को स्वीकार कर लिया । हमारे ड्राइवर महाशय होटल का एक चक्कर लगा आये और उनसे हमें पता चला कि यहाँ से हिम दर्शन हो रहे हैं, फिर क्या था हम होटल द्वारा निर्मित व्यू पॉइंट की ओर चले गए और वहाँ से हिमालय को निहारते रहे । बर्फ की श्वेत चादर से ढका  नंदा देवी पर्वत माला की चोटियों हमें  रुक रुक कर दिखने लगी । जब कभी बादलों के बीच से सूर्य देव अपनी छटा इन चोटियों पर बिखेरते तो अचानक ही हिम शिखर चांदी जैसा चमकने लगता । हम इस अद्भुत दृश्य को निहार ही रहे थे कि होटल प्रबंधक ने हमारे लिए गर्मागर्म चाय भिजवा दी । चाय की ट्रे लिए बेयरे ने हमारे अनुरोध को अनमने ढंग से स्वीकार करते हुए त्रिशूल से लेकर नेपाल तक फैली हिम चोटियों की दिशा बताई और साथ ही यह सूचना भी दी की मुख्य  शिखर बादलों की ओट में छिपे हुए हैं यह सब कुछ पर्वत माला का निचला हिस्सा है । लेकिन हमें इस सूचना से कोई सरोकार न था हम तो चाय की चुस्कियों के साथ हिमालय को निहारते रहे । कोई आधे घंटे में पुत्री ने  भी अपना काम निपटा लिया और हम सब बिनसर वन अभ्यारण में ट्रेकिंग के लिए निकल गए । मौसम खराब होने के कारण पर्यटक भी नहीं थे और गाइड भी गायब थे । मैंने वनस्पति शास्त्र के अपने अल्प ज्ञान का प्रयोग कर कुछ वनस्पतियों जैसे देवदार, चीड़, ओक आदि की पहचान की तो वाहन चालक ने हमें बांज, उतीस, बुरांश  के पेड़ दिखाए । देवदार एक सीधे तने वाला ऊँचा शंकुधारी पेड़ है, जिसके पत्ते लंबे, हरे रंग के और कुछ लाली लिए हुए होते है और कुछ गोलाई लिये होते हैं तथा लकड़ी मजबूत किन्तु हल्की और सुगंधित होती है। संस्कृत साहित्य में इसका बड़ा गुणगान किया गया है और इसका प्रयोग  औषधि व यज्ञादि में होता है । ओक या सिल्वर ओक की खासियत यह है कि इसके पत्ते खाँचेदार होते हैं। पेड़ की पहचान इसके पत्तों और फलों से होती है। सिल्वर ओक की लकड़ी सुन्दर होती  है और उससे बने फर्नीचर उत्कृष्ट कोटि के होते हैं। एक समय जहाजों के बनाने में इस्सका काष्ठ ही प्रयुक्त होता था। बुरांश, जिसे हमारे वाहन चालक ने पहचाना,  हिमालयी क्षेत्रों में 1500 से 3600 मीटर की मध्यम ऊंचाई पर पाया जाने वाला सदाबहार वृक्ष है। बुरांस के पेड़ों पर मार्च-अप्रैल माह में लाल सूर्ख रंग के फूल खिलते हैं। बुरांस के फूलों का इस्तेमाल दवाइयों में किया जाता है, वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में पेयजल स्रोतों को यथावत रखने में बुरांस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बुरांस के फूलों से बना शरबत हृदय-रोगियों के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है। बुरांस के फूलों की चटनी और शरबत बनाया जाता है, वहीं इसकी लकड़ी का उपयोग कृषि यंत्रों के हैंडल बनाने में किया जाता है। हमें ऐसी जानकारी थी कि बिनसर वन्य जीव अभयारण्य में तेंदुआ पाया जाता है। इसके अलावा हिरण और चीतल तो आसानी से दिखाई दे जाते हैं। पर अभ्यारण्य में एक भी पशु नहीं दिखा हाँ लौटते वक्त एक लंगूर अवश्य दिख गया । यहां 150 से भी ज्यादा तरह के पक्षी पाये जाते हैं। इनमें उत्तराखंड का राज्य पक्षी मोनाल सबसे प्रसिद्ध है पर इन विभिन्न पक्षियों की  मधुर आवाज तो हमें सुनाई दी पर दर्शन किसी के न हुए ।  इस दो किलोमीटर की ट्रेकिंग का अंत जीरो प्वाइंट पर होता है । यह इस पहाड़ी की  सबसे उंचा शिखर है और यहाँ से हिम शिखर के दर्शन होते हैं ।  अधिक सर्दी पड़ने पर यहाँ बर्फबारी भी हो जाती है ।

जब हम पहाड़ी से नीचे उतर रहे थे तो एक पुरानी कोठरी पर मेरी निगाह पड गई । पत्थरों  से निर्मित    यह जल स्त्रोत 120 वर्ष पुराना है जिसका जीर्णोदार कैम्पा योजना के तहत अभी कोई दो बर्ष पहले किया गया था । सदियों पुरानी पेयजल की यह व्यवस्था कुमाऊं के गांवों में नौला व धारे के नाम से जानी जाती है। यह  नौले और धारे यहां के निवासियों के पीने के पानी की आपूर्ति किया करते थे। इस व्यवस्था को अंग्रेजों ने भी नहीं छेड़ा था। नौला भूजल से जुड़ा ढांचा है। ऊपर के स्रोत को एकत्रित करने वाला एक छोटा सा कुण्ड है। इसकी सुंदर संरचना देखने लायक होती है। ये सुंदर मंदिर जैसे दिखते हैं। इन्हें जल मंदिर कहा जाय तो ज्यादा ठीक होगा। मिट्टी और पत्थर से बने नौले का आधा भाग जमीन के भीतर व आधा भाग ऊपर होता है।नौलों का निर्माण केवल प्राकृतिक सामग्री जैसे पत्थर व मिट्टी से किया जाता है।नौला की छत चौड़े किस्म के पत्थरों  से ढँकी रहती है। नौला के भीतर की दीवालों पर किसी-न-किसी देवता की मूर्ति विराजमान रहती है।  हमारे वाहन चालक ने हमें बताया कि शादी के बाद जब नई बहू घर में आती है तो वह घर के किसी कार्य को करने से पहले नौला पूजन के लिए जाती है और वहां से अपने घर के लिए पहली बार स्वच्छ जल भरकर लाती है। यह परंपरा आज तक भी चली आ रही है। विकास की सीढ़ियों को चढ़ते हुए अब लोगों ने इस व्यवस्था को भुला देना शुरू कर दिया है।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈