हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 150 ☆ लघुकथा – चोर ओटी ! ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय एवं हृदयस्पर्शी लघुकथा ‘चोर ओटी। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 150 ☆

☆ लघुकथा – चोर ओटी☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

वह काम के लिए निकल ही रही थी कि स्वयं सेवी संस्थावालों का फोन आया कि वे आज बेटी को ले जाने के लिए आनेवाले हैं। काम से छुट्टी तो नहीं ले सकती, पहले ही बहुत नागा हो चुका है। आँसू पोंछती हुई वह काम पर निकल पड़ी। हमेशा की तरह डॉक्टर मैडम के घर समय से पहुँच गई। उसे देखते ही मैडम बोली- “संगीता जल्दी से झाड़ू-पोंछा कर दो बहू की ‘चोर ओटी’ की रस्म करनी है। “

“चोर ओटी? यह कौन सी रस्म होती है मैडम?”

 मैडम हँसते हुए बोली – “ हमारे यहाँ गर्भधारण के तीन महीने पूरे होने पर घर की औरतें गर्भवती स्त्री की गोद भरती हैं। उसके बाद ही उसके माँ बनने की खबर सबको दी जाती है। इसे ही ‘चोर ओटी’ कहते हैं। अब समझ में आया संगीता?”

संगीता के चेहरे का रंग उतर गया उसने मानों हकलाते हुए कहा- हाँ—हाँ मैडम!। उसके चेहरे पर भाव आँख-मिचौली कर रहे थे। वह सोचने लगी – मेरी बेटी के भी तो तीन महीने पूरे हो गए ——? जो भी हुआ उसमें मेरी बच्ची का क्या दोष है? कितने सपने देखे थे बेटी की शादी के लिए, एक पल में सब चकनाचूर हो गए। रोज की तरह काम करने गई थी, पीछे कौन आकर बेटी के साथ जबरदस्ती कर गया, पता ही नहीं चला।

 संगीता का काम में मन ही नहीं लग रहा था। जल्दी- जल्दी काम निपटाकर वह घर की ओर चल दी। रास्ते में उसने चूड़ियाँ और श्रृंगार का सामान खरीद लिया। घर आकर एक कोने में निर्जीव सी पड़ी बेटी को उठाकर उसको चूड़ियाँ पहनाई, बाल बनाएं। लाल चुनरी उढ़ाकर, माथे पर बिंदी लगाकर अंजुलि में चावल लेकर उसकी गोद भर दी। वह अपनी बेटी को खाली हाथ कैसे जाने देगी? संगीता सितारों से उसकी गोद भर देना चाहती है। वह बेटी को छाती से चिपकाए रो रही है। बलात्कार की शिकार नाबालिग बेटी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। संगीता मन ही मन कलप रही है – काश! वह भी सबको बता सकती कि उसकी बेटी माँ बनने वाली है।

स्वयंसेवी संस्थावाले दरवाजे पर आ गए हैं।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – [email protected]  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #206 – बाल कथा – दौड़ता भूत – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विनोदपूर्ण बाल कथा दौड़ता भूत)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 206 ☆

☆ बाल कथा – दौड़ता भूत ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

ऊन का गोला यहीं रखा था. कहां गया? काफी ढूंढा. इधर-उधर खुला हुआ था. उसे खींच खींचकर समेटा गया. तब पता चला कि वह ड्रम के पीछे पड़ा था.

पिंकी ने जैसे ही गोले को हाथ लगाना चाहा वह उछल पड़ी. बहुत जोर से चिल्लाई, “भूत!  दौड़ता भूत.”

यह सुनते ही घर में हलचल हो गई. एक चूहा दौड़ता हुआ भागा. वह पिंकी के पैर पर चढ़ा. वह दोबारा चिल्लाई, “भूत !”

दादी पास ही खड़ी थी. उन्होंने कहा, “भूत नहीं चूहा है.”

“मगर वह देखिए. ऊन का गोला दौड़ रहा है.”

तब दादी बोली, “डरती क्यों हो?  मैं पकड़ती हूं उसे, ”  कहते हुए दादी लपकी.

ऊन का गोला तुरंत चल दिया. दादी झूकी थी. डर कर फिसल गई.

पिंकी ने दादी को उठाया. दादी कुछ संभली. तब तक राहुल आ गया था. वह दौड़ कर गोले के पास गया.

राहुल को पास आता देख कर गोला फिर उछला. राहुल डर गया, “लगता है गोले में मेंढक का भूत आ गया है.”

तब तक पापा अंदर आ चुके थे. उन्हों ने गोला पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया. गोला झट से पीछे खिसक गया.

“अरे यह तो खिसकता हुआ भूत है,”  कहते हुए पापा ने गोला पकड़ लिया.

अब उन्होंने काले धागे को पकड़कर बाहर खींचा, “यह देखो गोले में भूत!” कहते हुए पापा ने काला धागा बाहर खींच लिया.

सभी ने देखा कि पापा के हाथ में चूहे का बच्चा उल्टा लटका हुआ था.

“ओह ! यह भूत था,” सभी चहक उठे.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

21-04-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – [email protected] मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – लड़की तो थी ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा  ☆ लड़की तो थी ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

फुलवा  बैगा जनजाति से संबंध रखती थी। गर्भवती  फुलवा का आठवाँ महीना शुरू हो चुका था।

पति मायो ने उसे साप्ताहिक बाजार में, साथ चलने के लिए कहा जो सात किलोमीटर दूर था। उन्हें जरूरत की लगभग सभी चीजें खरीदने बाजार जाना पड़ता था। उन्होंने आधा किलोमीटर पैदल चलकर एक ऑटो लिया।

सौदा सुलुफ खरीदने के बाद मायो ने देखा हल्की रिमझिम तेज बारिश में बदल गई। उन्होंने बहुत इन्तजार किया। टाइम पास के लिये भजिए और रंगीन जलेबी खाई।

अंधेरा घिरने लगा था बारिश में पहाड़ और जंगल का मौसम डराने लगता है। हल्की सी कालिमा और हवाओं के थपेड़े—जब लोगों का शोर थम जाता है तो जंगल बोलना शुरू कर देता है। फिर उसकी भाषा समझना आसान नहीं होता।

घर लौटना जरूरी था। जरा सी बारिश थमी तो उन्होंने एक ऑटोवाले को तैयार किया और चल पड़े। बीच में एक नाला पड़ता था। पुल पर से पानी बह रहा था अतः ऑटोवाले ने आगे जाने से इंकार कर दिया।

मायो फुलवा से बोला चल- इतना पानी तो हम पार कर लेंगे। पुल के बीच में पहुँचते ही, दोनों कुछ संभल पाते उससे पहले, पहाड़ों से होता हुआ पानी का जोरदार रेला आया और दोनों को बहा ले गया।

सुबह परिजन खोजने निकले तो बहुत दूर मायो जंगली झाड़ियों में फँसा पड़ा था। उसे निकाला गया।फुलवा की खोज शुरू हुई। पुलिस ने मृत फुलवा के शरीर को पोस्टमार्टम के लिये भेजा।

 घर में शोक पसरा हुआ था ।मायो की माँ को लोग सांत्वना देने  आने लगे —

बेचारी बहू  भी गई और बच्चा भी। बहुत बुरा हुआ।

मालूम हुआ – पेट में लड़की तो थी – मायो की माँ बोली।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 15 ☆ लघुकथा – मंदाकिनी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा  – “मंदाकिनी“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 15 ☆

✍ लघुकथा – मंदाकिनी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मंदाकिनी को पूरा अहसास है कि कभी भी बुलावा आ सकता है। फिर भी चेहरे पर मुस्कराहट हमेशा की तरह विराजमान। बस बातें करती जा रही है जैसे कुछ अटका हुआ है और वह उससे मुक्ति पाना चाहती हो। अपनी एक मित्र सुस्मिता के बारे में बता रही है। बहुत बीमार थी। हृदयाघात का झटका पड़ा था। ऑक्सीजन लगी हुई थी परंतु सोमनाथ यानी कि उसके पतिदेव उसे बहुत उल्टा सुल्टा सुनाये जा रहे थे। झगड़ा तो होता रहता था उनमें परंतु समय का भी लिहाज नहीं। जैसे झगड़ा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो, बीमारी से, उच्च रक्तचाप से और हृदयाघात से भी। यही नहीं दोनों एक दूसरे पर लांछन लगाने से पीछे नहीं हटते थे चाहे डॉक्टर नर्स आकर बार बार चेतावनी देते देते खुद परेशान क्यों न हो जाएं।

हंसते से बोली, और वह सुस्मिता, वह तो मुंह से ऑक्सीजन हटा कर सोमनाथ को दांत पीसते कहने लगी कि तुम नाली के कीड़े हो, तुमसे तो कुत्ता भी अच्छा है, खाकर दुम तो हिलाता है। तुम तो खाकर खाने को दौड़ते हो। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाते हुए आराम करने के लिए कहा तो वह और सुनाने लगी- अरे दीदी तुम इस आदमी को नहीं जानती। इसके अंदर कितना विष भरा है, कितनी जलन भरी है। यह किसी की सफलता से खुश नहीं होता, न हो सकता है। किसी की तारीफ तो मानो इसके कानों को पिघले सीसे के समान लगती है। बस सब इसकी तारीफ करें। यह छींके भी तो लोग कहें कि वाह क्या छींक है तो यह अपनी छींक से भी खुश होता है लेकिन तारीफ करने वाले से खुश नहीं होता। और मेरी सफलता या तारीफ तो इसे ऐसी लगती है जैसे , जैसे और जब वह कहते कहते हांफने लगी तो मैंने जबरदस्ती उसके मुंह पर ऑक्सीजन मास्क लगा दिया।

सुस्मिता शांत लेट गई। उसकी सांस सहज होती जा रही थी और सोमनाथ कमरे से बाहर निकल कर बरामदे में टहलने का उपक्रम करने लगे। सुस्मिता शांत लेटी थी पर मेरे ख्यालों में बोले जा रही थी, अरे दीदी इस आदमी की क्या बताऊं, इसकी मरजी या पसंद वाला कोई नेता बड़ा मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बन पाता, कोई और बन जाता है तो वह इसका ऐसा जानी दुश्मन बन जाता है कि उसका नाम तक सुनना पसंद नहीं करता यह जबकि किसी भी नेता से इसका दूर दूर का कोई संबंध नहीं होता। न कभी मिला किसी से और न इसे कोई पूछता है, यह न किसी राजनीतिक दल में है, न कार्यकर्ता है, न किसी नेता से कभी मिला न कोई मतलब, फिर भी अपनी पसंद। और जो घर में है, ऑफिस में हैं उनसे भी यही आशा कि या तो इसकी तारीफ करें या इसकी पसंद के लोगों की। यह कभी ऐसा तो सोचता ही नहीं कि और लोगों की अपनी पसंद नापसंदगी होती है। यह मामूली आदमी मेरी और घर की चिंता छोड़ जब अपने पसंदीदा नेता की बेमतलब चिंता करता है तो मेरे तन बदन में आग लग जाती है। घर संभलता नहीं, देश संभालने की बात करता है।

अपने संस्मरण सुनाते सुनाते मंदाकिनी थकान सी महसूस करने लगी और उसकी आवाज़ धीमी से धीमी होने लगी। मुझे लगा उसे नींद आने लगी है। नींद में फुसफुसाने लगी अब आगे कल बताऊंगी भाईसाहब। और उसकी कल, नींद खुलने पर ही हो जाती है। मैं इसी सोच में डूबा हुआ हूं कि मंदाकिनी इतनी गंभीर कवयित्री, लेखिका इतना लिखने के बावजूद हृदय में कितना अंबार लिए हुए है। हर किसी की पीड़ा को अपनी समझ कर जीती है और परेशान रहती है। स्वार्थ तो उसे छू भी नहीं गया। औरों की पीड़ा सहते सहते अपनी पीड़ा से तो जैसे कोई सरोकार ही नहीं। और इसीलिए विवाह का सोचा तक नहीं। मां बाप जब तक जीवित रहे उनकी सेवा करती रही। भाई कोई था नहीं। एक बहन थी सो ब्याह करके अपनी दुनिया में बस गई। अपनी बीमारी की बात भी उसने किसी को नहीं बताई। मुझे भी कहां बताया। मैं अपने एक मित्र को देखने आया था, तब उसका कमरा खुला था सो मैंने देख लिया। अंदर जाकर देखा तो आंख मिलाने से कतरा रही थी। मुझे भी, … मेरे मुंह से इतना ही निकला तो उसकी आंख से एक आंसू ढुलक गया। भाभी को नाहक तकलीफ होती इसीलिए…. और वाक्य अधूरा छोड़ दिया। मैं गुस्से में मुंह फुलाकर स्टूल पर बैठा रहा कुछ बोला नहीं। धीरे से बोली अच्छा होता मुझे आप यहां देख ही न पाते। मेरी आंखों में आंसू तैर रहे थे पर बड़ी मुश्किल से रोक पा रहा था। आखिर उसका था कौन, भाई, मित्र, पिता, माता सब मिलकर एक मैं। डॉक्टर से पता चल गया था कि लास्ट स्टेज का कैंसर है। पर उसने मुझे अहसास तक नहीं होने दिया। भाई साहब होनी को कोई टाल नहीं सकता। आप मेरी बात सुन लीजिए, वही आपका आखरी अहसान होगा। मैंने सहमति सूचक निगाह से देखा तो सुनाने लगी, वो मेरी एक सहेली सुष्मिता, आप नहीं जानते, उसकी बहुत याद आ रही है। मैंने कहा जिसकी कहानी तुम कल सुना रही थी।

वह कहानी नहीं भाईसाहब, मनुष्य जीवन का एक ऐसा हिस्सा है जिसे मैं शब्द ही नहीं दे पाई। उसके पति और उसके बीच के संबंध की एक बानगी कल आपको सुनाई थी। मेरी हैरानी की बात यह है कि सुस्मिता उसके साथ रह कैसे रही है, कहती है पति को प्यार भी करती है। क्या स्त्री पुरुष के साथ रहने की विवशता को प्यार की संज्ञा दी जा सकती है। थोड़ी देर कुछ नहीं बोली तो मेरा ध्यान उसकी ओर गया तो देखा कि पंखे को घूर रही है। पर वह है कहां?

निर्जीव आंखें हैं। मैं सोच रहा हूं कि वास्तव में औरों के लिए जिया जा सकता है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 65 – परवाह का रंग… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – परवाह का रंग।)

☆ लघुकथा # 65 – परवाह का रंग श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“अरे तुमने सुना कमला वो तुम्हारे पड़ोसी सोनी जी का बेटा विदेश जा रहा है? माँ बाप को वृद्धाश्रम भेजकर।  कितना आज्ञाकारी बनता था, भाई ऐसी औलाद से तो ईश्वर बच्चा ही न दे।” एक सांस में पूरी खबर सुना दी रेखा भाभी ने कमला को।

कमला धीरे से बोली – “आपको किसने कहा? किससे पता चली ये बात?”

“बस तुम्हें ही खबर नहीं, सारा मोहल्ला थू -थू कर रहा है अभी तो सुनकर आ रही हूँ।”

“भाभी सुनी हुई बात हमेशा सच हो जरूरी नहीं! अभी थोड़ी देर पहले फोन पर आंटी से मेरी बात हुई है। उन्होंने बताया कि उनका बेटा ट्रेनिंग के लिए विदेश जा रहा है। अपनी बिटिया के पास रहने के लिए जा रही हैं। आप स्वयं समझदार हैं? आपकी बहू और बेटे के बारे में भी तो लोग जाने क्या क्या कहते हैं…। अफवाहों पर यकीन ना करें तो अच्छा रहेगा बाकी आप स्वयं सोच लो…।”

“अच्छा चलो! यह सब बात छोड़ देते हैं। कमला एक कप चाय तो पिला दो। क्या करूँ ? आदत से मजबूर हूँ। लेकिन तुमने बहुत अच्छी बात कही अब मैं अपने घर परिवार के रिश्ते को मजबूत करूंगी। जा रही हूँ कमला।  बहू के घर के कामों में उसकी मदद करती हूं। तभी तो परवाह का रंग चढ़ेगा।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – माँ का दिल ☆ डॉ जयलक्ष्मी आर विनायक ☆

डॉ जयलक्ष्मी आर विनायक

☆ लघुकथा ☆ माँ का दिल ☆ डॉ जयलक्ष्मी आर विनायक ☆

ऊंची कद काठी के, मृतप्राय से, अपने पति को मृत्यु शैय्या पर देख सुमित्रा का मन धक सा हो रहा था। तीनों बेटियों को बुला लिया था डाक्टर ने जवाब जो दे दिया था। इसलिए हास्पिटल से पति को  वापिस लाने  के अलावा कोई चारा नहीं  बचा था। वैसे तो छोटी बेटी ने किचन संभाल लिया था। रोटी सब्जी दाल चावल तो बन ही जाता था। पर सुमित्रा को यह रह रह कर लग रहा था कि मेरी बेटियां इतने दूर से आई है, उन्हें कुछ अच्छा खिला सकती।

दूसरे दिन माँ को बेटियों ने घर पर नहीं पाया। सोचा, कहां चली गयी होगीं? तभी दरवाजा खोल माँ का आगमन हुआ। माँ के कंधे पर बैग झूल रहा था। उसमे से उन्होंने एक डिब्बा निकाला और डायनिंग टेबल पर रख दिया। ‘क्या है इसमें?’ बेटियों ने उत्सुकता से पूछा।

‘तुम सबको श्रीखंड पसंद है ना? वो ही लेने गयी थी।’

© डॉ जयलक्ष्मी आर विनायक

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – लघुकथा – नामालूम किस्सा… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “– नामालूम किस्सा… –” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ — नामालूम किस्सा…  — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

एक आदिम कथा है। पिछले जन्म में एक आदमी की तीन इच्छाएँ अपूर्ण रह गई थीं। पहली इच्छा थी ज़मीन खरीदने की, दूसरी इच्छा थी मकान बनाने की और तीसरी इच्छा थी अपने निर्मित मकान में रहने की। इसके लिए वह अथक परिश्रम करता था। उसे डर लगता था कहीं किसी कारण से बाधित होने लगे और ऐसे में हो कि जो इच्छाएँ अपनी आँखों में चमकती हैं और अपने हृदय में नवजात हिरण की तरह कुलाँचे मारती हैं वे इच्छाएँ कुम्हलाने लगें। तब तो उसकी इच्छाएँ उसके लिए उपास्य हो जाती थीं। खाए तो वह कटौती कर के, ताकि अपनी इच्छाओं की आपूर्ति के लिए कुछ रूपयों की बढ़ोत्तरी हो सके। बोले तो वह शब्दों को घटा कर। झोंपड़ी जैसे मकान में ज्यादा बोलना शोभा भी तो न देता। बोलने के लिए अपनी विशेष संपदा हो। अपनी ज़मीन और अपने मकान से बड़ी संपदा और क्या हो सकती है। अपने आलीशान मकान में रहें और कोई आए तो अपनी अद्भुत शान प्रतिबिंबित हो। ज़ोर से बोलने और खास कर अधिक बोलने में तब कोई तुक हो। सुनने वाले को मानना पड़े कमाया है तभी तो ऐसे बातूनीपन की फसल काट रहा है।

पर विधाता के बनाए हुए जन्म – मृत्यु के बंधन से वह मुक्त तो था नहीं। जन्म से आया था तो मृत्यु से जाने का संदेशा आया। वह मृत्यु से कंधों पर गया तो जैसे अपनी तीन अधूरी इच्छाओं को गिनते हुए। चिता में शरीर का दाह हुआ तो तीनों इच्छाएँ आग की लपटें बन कर आकाश की यात्रा पूरी कर रही हों। यह वही आकाश था जहाँ उसका अगला जन्म निर्धारित था। उसने अगले जन्म में जोर लगाया कि अपनी तीन इच्छाओं का लोक ऐसा हो कि ज़मीन मकान होने में यह भी हो कि अपने मकान में रहने का सुख अर्जित हो जाए। पर इस जन्म में वह मात्र ज़मीन खरीद पाया और उसके जीवन के दिन पूरे हो जाने से उसे जाना पड़ा। एक इच्छा पूरी हो जाने का उसे संतोष था, लेकिन दो इच्छाएँ अधूरी रह जाने का मनस्ताप उसे गहरी आत्मा तक कुरेद कर रख देता था। इसी मनस्ताप ने उसे नए जन्म में ढाला। जन्म था तो इच्छाओं के लिए ही तो था। बेहद स्फूर्ति और लगन से उसने दूसरी इच्छा के अनुरूप पहले से खरीदी हुई अपनी ज़मीन पर अपना मकान बनाना शुरु किया। मकान तो बना, लेकिन मृत्यु ने अपने मकान में रहने से उसे वंचित कर दिया। सच यह था आवागमन का अब वह इतना शौकीन हो गया था कि अगले जन्म का मानो वह स्वयं नियंता हो और भगवान तो बस एक द्रष्टा हो। अगले जन्म में अपने मकान में रहने की उसकी तीसरी इच्छा पूरी तो हुई, लेकिन अब तो इच्छाओं का दास हो जाने से उसने चौथी इच्छा का आविष्कार कर लिया था। उसे धुन थी अपने मकान में अपने बच्चों की शादी देखने की। वह मानता था बहुत ही जोश – खरोश से वह अपनी इच्छाओं का दासत्व निभाता है। पर भगवान जानता था वह कितना थकता टूटता और चिंदा – चिंदा बिखरता है। भगवान ने उससे कहा बच्चों की शादी देखने की इच्छा तुम्हारा एक बहुत बड़ा भ्रम है। उन्होंने तो शादी कर ली है और उनके बड़े – बड़े बेटे – बेटियाँ हैं। बल्कि वे अपने बच्चों की शादी करने की चिंता करते हैं। यह उसके लिए बड़े ही अचरज और धक्के की बात हुई। अपने बच्चों के अपने प्रति इस तरह दुराव कर लेने से उसने जैसे तैसे अपनी इच्छाओं से अपने को मुक्त किया। उसे नए जन्म से अब बहुत विरक्ति हो गई थी। उसकी विरक्ति देखते हुए भगवान सोच में पड़ गया। मृत्यु का जिस तरह सिलसिला था जन्मों का भी तो वही उपक्रम था। इस दृष्टि से उसका पुन: जन्म तो हुआ, लेकिन एक रद्दोबदल के साथ। बल्कि भगवान ने तो सब के लिए एक ही जैसा नियम बना लिया। जन्मों से सदाबहार वसंत की तरह धरती लदती रहे, लेकिन किसी को अपने पूर्व जन्म का हल्का सा भी किस्सा मालूम न होता।

 © श्री रामदेव धुरंधर

10 / 03 / 2018

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 14 ☆ लघुकथा – कैनवास… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा  – “कैनवास“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 14 ☆

✍ लघुकथा – कैनवास… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

वे हर आयोजन में उपस्थित। लगता सबको ध्यान से देख रही हैं। पर मुझे महसूस होता कि वे आँखों से केवल देख रही हैं और आँखों के भीतरी पर्दे पर किसी और का प्रतिबिम्ब है। वे अंदर बाहर दोनों देखती हैं। यही नहीं साठ साल पहले का देखती हैं और आज का भी। सजी संवरी एम्बेसडर में बैठी अपने आप को और हृष्ट पुष्ट युवा पति को और व्हील चेयर पर बैठे बीमार वृद्ध पति को एक साथ देखती हैं, ऐसा लगता।

उनकी दृष्टि बहुत बड़ा कैनवास है, जिस पर हँसता खेलता बचपन, यौवन की अँगड़ाइयॉं, विवाह के सात फेरे, नन्हीं सी जान की छटपटाहट, बच्चों की किलकारियाँ, परिवार की जिम्मेदारियाँ, पति का बिजनेस और अपना स्कूल जब कुछ एक साथ कैनवास पर चलता रहता है। रंग बदलते रहते हैं। दृश्य भी बदलते रहते हैं पर उनकी तारतम्यता कभी भंग नहीं होती। सबसे बड़ी बात है कि आँखों में शून्यता पर चेहरे पर सदाबहार मुस्कान जो सबको आकर्षित करती।

मुझे किसी कारण शहर छोडना पड़ा। गर्मी का मौसम समाप्त होकर बरसात का मौसम आने वाला है। श्रावण मास चल रहा है। मुझे डाक से एक लिफाफा मिला। खोल कर देखा तो उसमें राखी थी और दो पंक्तियों की चिट्ठी, समय पर बाँध लीजिएगा। जब हम एक ही शहर में थे तब कभी ऐसा नहीं हुआ, बस हर पर्व व अवसर पर शुभकामनाओं का आदान प्रदान होता। मेरे हाथ में उनकी भेजी राखी है और मस्तिष्क में शून्यता में खोई उनकी नजरें। और अब मेरी आंखें भी कैनवास बन गईं। सब कुछ कैनवास पर चित्रित हो रहा है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 64 – बुढ़ापा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अंधी दौड़।)

☆ लघुकथा # 64 – क्षमादान श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

रागिनी का बारहवीं कक्षा का रिजल्ट आया तो वो फेल हो गई थी। मां बचपन में ही चल बसी थी।

पापा के गुस्से के डर से उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?  जीवन बोझ लग रहा था। उसे याद आ रहा था जब पिछली क्लासों में वह किसी तरह पास होती थी तब पापा उसे बहुत मारते थे। भैया भाभी जीना मुश्किल कर देंगे। घर का काम तो पूरा करवाते ही हैं पढ़ने भी नहीं  देते। जाने अब क्या होगा?

पिताजी जब ऑफिस से घर आए तो रागिनी थर-थर काँपने लगी। साथ ही भैया भाभी भी ऑफिस से घर आ गए।

पापा ने कहा- “बेटी चिंता मत करो, और मन लगाकर पढ़ाई करो। यदि तुम पढ़ाई नहीं करना चाहती तो बता दो दूसरे और भी प्रोफेशनल कोर्स हैं जो तुम कर सकती हो? सिलाई, कढ़ाई और पार्लर का कोर्स भी कर सकती हो? खाना तुम कितना अच्छा बनाती हो, ड्राइंग भी अच्छा करती हो। जो काम अच्छा लगे वही करो, डरो मत।”“

उसने कहा कि- “पापा में पार्लर का कोर्स करूंगी और साथ ही फिर से 12वीं की परीक्षा दूंगी इस बार मैं अच्छा करके दिखाऊंगी? आपने इतना विश्वास किया है।”

क्षमादान पाकर उसमें एक नया उत्साह जाग गया।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – लघुकथा – कोना कोई और… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय एवं सशक्त लघुकथा “– कोना कोई और… –” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ — कोना कोई और…  — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

जो भी प्राणी धरती पर जन्म ले उसे साँस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी और खाने के लिए भोजन मिल ही जाता है। न मिलता है तो संतोष। राजा के महल में जन्म लेने वाले बालक का मन धूल में खेलने के लिए मचलता है। उसे संभाल कर महल में बंद किया जाता है और सिखाया जाता है कि धूल से खतरनाक और कुछ नहीं। धूल में तरह – तरह के कीटाणु होते हैं जो अनेक रोगों के जन्म दाता होते हैं। पर बालक को इस दलील से संतोष नहीं होता, लेकिन महल में बंद हो जाने पर भागने के लिए कोई चारा न होने से उसे मन मार कर वहीं रह जाना पड़ता है।

उधर एक बालक होता है जो गरीब माँ – बाप के धूल धूसरित घर में जन्म लेता है। वह महल का स्वप्न देखता है, लेकिन उसे समझाया जाता है धूल ही उसकी सुबह है, धूल ही उसकी शाम। अत: धूल से संतोष करना वह सीखे। धूल से भागे तो भागता ही रहेगा, लेकिन उसे हर मोड़ पर धूल ही मिलेगी, महल नहीं। तो क्यों न पहले कदम पर ही धूल का संतोष कर ले, तब भागने की तृष्णा ही मिट जाएगी।

एक बालक हुआ जिसने पूरे संसार के लोगों के असंतोष का प्रतिनिधित्व किया। पूरा संसार होने से बालक का दायरा धरती से ले कर आकाश तक विस्तृत हुआ। उस बालक ने धूल में जन्म लेने पर संतोष नहीं किया और किसी तरह आगे बढ़ कर महल तक पहुँचा। पर महल में उसे संतोष नहीं हुआ, क्योंकि वह असंतोष की परिभाषा जानता ता। उसने अब ऊपरी आकाश की ओर रुख किया और वहाँ पहुँच कर रहा। वहाँ न धूल थी, न महल था। पर वह मनुष्य था इसलिए आकाश में भी उसके साथ असंतोष निबद्ध हुआ।

असंतोष की वजह से और आगे बढ़ने पर वह तारों के जमघट में खो गया। तारों की अपनी समझ यह हुई उसकी यही मंजिल थी, अत: यहाँ खो जाना ही उसके जीवन का सार तत्व हुआ। यदि तारों को मनुष्य के अनंत असंतोष की परिभाषा मालूम होती तो उसे अपने में विलय करने की अपेक्षा अभयदान देते कि वह अपनी यात्रा जारी रखे और संतोष की कामना में ब्रह्मांड के किसी और कोने के लिए कूच करे।

 © श्री रामदेव धुरंधर

15 – 03 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : [email protected]

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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