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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 108 ☆ पं. रामेश्वर गुरू – आम आदमी के प्रतिनिधि पत्रकार  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी द्वारा लिखित रामेश्वर गुरू स्मृति शताब्दि समारोह के अवसर पर वैचारिक आलेख – पं. रामेश्वर गुरू – आम आदमी के प्रतिनिधि पत्रकारइस ऐतिहासिक रचना के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।)

रामेश्वर गुरू स्मृति शताब्दि समारोह के अवसर पर वैचारिक आलेख 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 108 ☆

🌻 पं. रामेश्वर गुरू – आम आदमी के प्रतिनिधि पत्रकार 🌻

पं. रामेश्वर गुरू  कलम से ही नहीं मैदानी कार्यो से भी आम आदमी के प्रतिनिधि पत्रकार 

वर्ष १९५० का दशक, तब जबलपुर एक छोटा शहर था। कुल दो कालेज थे। विश्वविद्यालय नहीं था। तब शहर के साहित्य के केंद्र में पं. भवानी प्रसाद तिवारी तथा रामेश्वर गुरू थे।शहर के अन्य व्यक्ति जो बहुत अध्ययनशील तथा रचनाशील थे, वे थे बाबू रामानुजलाल श्रीवस्तव ऊंट’, नाटककार बाबू गोविंद दास, सुभद्रा कुमारी चौहान भी थी, जिनका बड़ा रौब-दाब था। परसाई जी व अन्य युवा लेखक व पत्रकार इन सुस्थापित व्यक्तित्वो से संपर्क में रहकर अपनी कलम को दिशा दे रहे थे. पं रामेश्वर गुरु ने पत्रकारिता के शिक्षक की भूमिका भी इन नये लेखको के लिये स्वतः ही अव्यक्त रूप से निभाई. 

‘अमृत बाजार पत्रिका’ दैनिक समाचार पत्र के प्रतिनिधि के रूप में पं रामेश्वर गुरू

वर्ष १९४६ में पं. रामेश्वर गुरू जी जबलपुर के प्रतिष्ठित क्राइस्ट चर्च के हाई स्कूल में अध्यापक थे पर साथ ही वे आजीवन एक सजग पत्रकार भी रहे । उनकी पत्रकारिता में भी रचनात्मक गुण थे। अपने लेखन से ‘अमृत बाजार पत्रिका’ दैनिक समाचार पत्र के प्रतिनिधि के रूप में उन्होने जबलपुर की सकारात्मक छबि राष्ट्रीय स्तर पर बनाई. 

प्रहरी के संपादक   

वर्ष १९४७ मे तिवारी जी और गुरू जी के संपादकत्व में ‘प्रहरी’ साप्ताहिक पत्र जबलपुर से निकला। यह तरूण समाजवादियों का पत्र था और प्रखर था। इसी पत्र में परसाई उपनाम से हरिशंकर परसाई जी की  पहली रचना छपी. परसाई जी ने अपने संस्मरण में लिखा है कि प्रहरी के माध्यम से ही  गुरू जी से उनका परिचय हुआ। वे उनके घर जाने लगे। उनके निकट जाने पर परसाई जी को मालूम हुआ कि गुरू जी कितने अध्ययनशील साहित्य प्रेमी और रचनाकार थे। 

प्रहरी’ में वे नियमित लिखते थे। गंभीर भी, आलोचनात्मक भी और व्यंग्यात्मक भी। उनकी भाषा बहुत प्रखर और बहुत जीवंत थी। वे ‘प्रहरी’ में इस प्रतिभा के साथ बहुत धारदार लेख लिखते थे। उनके लेखों में  गहरी संवेदना होती थी। वे गरीबों, शोषितों के पक्षधर थे। इस वर्ग के लोगों पर उनके रेखाचित्र बहुत संवेदनपूर्ण और बहुत मार्मिक है। दूसरी तरफ़ वे सत्ता और उच्चवर्ग की आत्मकेंद्रित जीवन शैली के विरोधी थे। सत्ता चाहें राजनैतिक हो या आर्थिक या साहित्यिक- उस पर वे प्रहार करते थे। घातक प्रव्रत्तियों में लिप्त बड़े व्यक्तियों पर वे बिना किसी डर के बहुत कटु प्रहार करते थे।

पं. रामेश्वर गुरू का व्यंग काव्य 

 ‘प्रहरी’ में वे व्यंग्य काव्य भी लिखते थे जिसका शीर्षक था- बीवी चिम्पो का पत्र। यह हर अंक में छपता था और लोग इसका इंतजार करते थे। उसी पत्र में ‘राम के मुख से’ कटाक्ष भी वे लिखते थे।

पं. रामेश्वर गुरू का बाल साहित्य  

‘प्रहरी’ में एक पृष्ठ बच्चों के लिए होता था। उसे गुरू जी संपादित करते थे और इसमें लिखते भी थे। यह पृष्ठ सुदन और मुल्लू के नाम से जाता था। “सुदन” पं भवानी प्रसाद तिवारी जी का घर का नाम था और “मुल्लू” गुरू जी का। गुरू जी बाल साहित्य में बहुत रूचि लेते थे और उन्होंने बच्चों के लिए नाटक भी लिखे थे। ‘प्रहरी’ की फ़ाइलों में उनका लिखा ढेर सारा बाल साहित्य है, जिसके संकलन तैयार किये जाने चाहिये.

‘वसुधा’ मासिक पत्रिका में सहयोग 

पं. रामेश्वर गुरू का बहुत महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य ‘वसुधा’ मासिक पत्रिका का पौने तीन वर्षों तक प्रकाशन था। इस पत्रिका में सहयोग सबका था, पर ‘वसुधा’ तब बिखरे हुए प्रगतिशील साहित्यकारों की पत्रिका थी।गुरू जी बौद्धिक भी थे और भावुक भी। वे छायावादी युग के थे, मगर छायावादी कविताएं उन्होंने नहीं लिखी। वे दूसरे प्रकार के कवि थे। माखनलाल चतुर्वेदी का प्रभाव उन पर था, पर वह प्रभाव प्यार, मनुहार, राग का नहीं, राष्ट्र्वाद का था। भाषा श्री माखनलाल जी से प्रभावित थी। कवि भवानी प्रसाद मिश्र उनके अभिन्न मित्र थे। कुछ प्रभाव उनका भी रहा होगा। गुरू जी की कविताओं पर न निराला का प्रभाव है, न पंत का। इस मामले में वे सर्वथा स्वतंत्र थे। उनकी कविताओं में देश प्रेम, सुधारवादिता, और जनवादिता है। वे संवेदनशील थे और गरीब शोषित वर्ग के प्रति उनकी स्थाई सहानुभूति थी। वे इस वर्ग के संघर्ष, अभाव और दुख पर कविताएं लिखते थे। वे उदबोधन काव्य भी लिखते थे। तरूणों का, मजदूरों का, संघर्ष और परिवर्तन के लिए आव्हान अपनी कविताओं में वे करते थे। 

उनकी शब्द-सामर्थ्य बहुत थी और वे मुहावरों के धनी  थे। वे बहुत अच्छी बुंदेली जानते थे और उनकी बुंदेली कविताएं बहुत अच्छी है। व्यंग्य काव्य अकसर वे बुंदेली में लिखते थे।

पं. रामेश्वर गुरू  मैदानी कार्यो से भी जनता के प्रतिनिधी पत्रकार 

पं. रामेश्वर गुरू ने जनता के प्रतिनिधी पत्रकार की भूमिका न केवल कलम से वरन अपने मैदानी कार्यो से भी निभाई है.  सुभद्राकुमारी चौहान की प्रतिमा की स्थापना नगर निगम कार्यालय के सामनेवाले लान में उन्होने ही  कराई। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के अभिनंदन में समारोह आयोजित किया। चिकित्सक और राजनीतिज्ञ डा. डिसिल्वा की स्मृति में उन्होंने डिसिल्वा रतन श्री माध्यमिक विद्यालय की  स्थापना कराई। वे जब शहर के मेयर बने, तब महात्मा गांधी और पंडित मदनमोहन मालवीय की आदमकद प्रतिमाओं की स्थापना उन्होने करवाई। अपने मित्र प्रसिद्ध पत्रकार हुकुमचंद नारद की स्मृति में उन्होंने विक्टोरिया अस्पताल में विश्राम-कक्ष भी बनवाया।

इस तरह पं. रामेश्वर गुरू  ने पत्रकारिता के वास्तविक मायने और आदर्श हमारे सामने रखे हैं, जिनके अनुसार पत्रकारिता केवल स्कूप स्टोरी या सनसनी फैलाना नही वरन समाज और लोकतंत्र के चौथे  स्तंभ के रूप में जनहितकारी सशक्त भूमिका का निर्वहन है. 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 89 –विनाश और विकास के मध्य संतुलन !!– ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है  समसामयिक विषय पर आधारित एक विचारणीयआलेख  विनाश और विकास के मध्य संतुलन !!। इस सामयिक एवं सार्थक रचना के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। ) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 89 ☆

 💥 आलेख – विनाश और विकास के मध्य संतुलन !!  💥

आपने कभी सोचा कि हर प्रार्थना का उत्तर नहीं आता है और कई बार भगवान का भेजा हुआ संदेश इंसान समझ नहीं पाता है?? ऐसा क्यों होता है कि – अपनों का साथ बीच में ही छूट जाता है?

आज जो विषम परिस्थितियां बनी हैं। वे पहले भी बन चुकी हैं। एक सृष्टिकर्ता केवल सृष्टि करते जाए तो सोचिए क्या होगा ? वसुंधरा तो पूरी तरह नष्ट हो जाएगी न। इसीलिए विनाश या जिसे प्रलय या नष्ट होना कहा जाता है। इसका होना भी नितांत आवश्यक है।

विनाश और विकास के बीच संतुलन कैसे हो इस पर किसी कवि की सुंदर पंक्तियां हैं….

सब कुछ करता रहता फिर भी मौन है

सब को नचाने वाला आखिर कौन है

आज देखा जाए तो कोई भी ऐसा इंसान नहीं है जिसने अपनों को नहीं खोया है। सारी सृष्टि हाहाकार कर उठी है। विनाश की ज्वाला ने धधक कर लाशों का ढेर बना दिया  और ऐसा विनाश रचा कि मानव मन भी आशंकित है।

किसी को किसी अपनों का कांधा नसीब नहीं हुआ तो किसी को अंतिम दर्शन भी नहीं मिले। यह विडंबना प्रकृति का एक ज्वलंत रूप ही है। आज का दृश्य सदियों बाद याद किया जायेगा। 

आज हम हैं कल हमारी यादें होंगी

जब हम ना होंगे हमारी बातें होंगी

कभी पलटोगे जिंदगी के पन्ने

तब शायद आपकी आंखों में भी बरसात होगी

यह विनाश की कहानी हमारी आने वाली कई पीढ़ियां याद करेगी। प्रकृति का नियम है और गीता में श्री कृष्ण जी ने कहा है…. मां के पेट से और पृथ्वी पर जन्म लेने वाला जो है उसका अंत उसी के चुने हुए कर्मों से होता है। पर विनाश सुनिश्चित है।

हम सब माया मोह के बंधन में भूल जाते हैं मेरा घर, मेरा बेटा, मेरा परिवार और मैं ही सर्वशक्तिमान, उस परम शक्ति को एक किनारे कर देते हैं। इस पर एक सुंदर सी घटना आपको याद दिलाती हूँ। एक राजा अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था। सारे जतन कर उसने वरदान प्राप्त किया कि…. जिसे भी वह छुए सब सोना हो जाए। विधाता ने तथास्तु कहकर सब नियंत्रित किया।

राजा की बेटी ने मांगा था कि उसकी मृत्यु अपने पिता के हाथों हो। राजा सब कुछ बड़े ध्यान से छूता। पर क्षण भर में ही वरदान उससे विनाश की ओर ले चला। राज्य का सारा राजपाट हर वस्तु सोने की हो निर्जीव हो गई।

बेटी खेलते खेलते आई राजा परेशान था। बेटी को गले लगाना चाहा पर।  यह क्या बात हुई वह छूते ही सोने की हो गई।

सृष्टि ने राजा को विकास और विनाश की घटना क्षणभर की ही लिखी थी।

ठीक वैसा ही मानव सब कुछ अपने हाथों लेकर आतताई बनने लगा था, परंतु सृष्टि की गतिविधि सभी को अलग-अलग कर नष्ट नहीं कर सकती थी। कहीं तूफान, कहीं जल का भयंकर प्रकोप, कहीं सूखा, तो कहीं कोरोना जैसी महामारी।

समूचा विश्व नष्ट होने की कगार पर था। उसने अपने शक्ति का आभास कराया और कुछ महात्मा जीव के कारण कहीं जीवन दायक हवा बनी, कहीं टीका बना और कहीं जीवन रक्षक दवाइयां, कहीं अच्छी चीजों का आविष्कार हुआ। शक्ति का संतुलन फिर से बनने लगा।

आत्मा कभी मर नहीं सकती, ना जल सकती है, न टूट सकती है, और ना खत्म हो सकती है, आत्मा अमर है।

नैन छिंदन्ती शस्त्राणि, नैन दहति पावकः

न चैनः क्लेदयन्त्यापो, न शोषयति मारुतः

बस एक नयी काया कवच से जीवन का फिर से आरंभ होता है। यही प्रकृति की विनाश और विकास की प्रक्रिया है। बिना दर्द के आंसू बहते नहीं है इसीलिए यह वक्त आया जो बहुत कुछ सिखा गया।

संपूर्ण जीवन की परिभाषा विकास विनाश से ही होकर गुजरती है। रेगिस्तान भी हरा हो जाता है।

जब अपने अपनों के साथ खड़े हो जाते हैं।  अब हमें हमारे जो अपने हैं उन्हें फिर से जीवन की आश नहीं छोड़नी चाहिए अपनों को समेट कर नई जिंदगी की शुरुआत करनी चाहिए।

चलिए जिंदगी का जश्न

कुछ इस तरह मनाते हैं

कुछ अच्छा याद रखते हैं

कुछ बुरा भूल जाते हैं

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 97 ☆ सामान्य लोग, असामान्य बातें ! ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # 97 ☆ सामान्य लोग, असामान्य बातें ! ☆

सुबह का समय है। गाय का थैलीबंद दूध लेने के लिए रोज़ाना की तरह पैदल रवाना हुआ। यह परचून की एक प्रसिद्ध दुकान है। यहाँ हज़ारों लीटर दूध का व्यापार होता है। मुख्य दुकान नौ बजे के लगभग खुलती है। उससे पूर्व सुबह पाँच बजे से दुकान के बाहर क्रेटों में विभिन्न ब्रांडों का थैलीबंद दूध लिए दुकान का एक कर्मचारी बिक्री का काम करता है।

दुकान पर पहुँचा तो ग्राहकों के अलावा किसी नये ब्रांड का थैलीबंद दूध इस दुकान में रखवाने की मार्केटिंग करता एक अन्य बंदा भी खड़ा मिला। उसके काफी जोर देने के बाद दूधवाले कर्मचारी ने भैंस के 50 लीटर दूध रोज़ाना का ऑर्डर दे दिया। मार्केटिंग वाले ने पूछा, “गाय का दूध कितना लीटर भेजूँ?” ….”गाय का दूध नहीं चाहिए। इतना नहीं बिकता,” उत्तर मिला।…”ऐसे कैसे? पहले ही गायें कटने लगी हैं। दूध भी नहीं बिकेगा तो पूरी तरह ख़त्म ही हो जायेंगी। गाय बचानी चाहिए। हम ही लोग ध्यान नहीं देंगे तो कौन देगा? चाहे तो भैंस का दूध कुछ कम कर लो पर गाय का ज़रूर लो।”….”बात तो सही है। अच्छा गाय का भी बीस लीटर डाल दो।” ..संवाद समाप्त हुआ। ऑर्डर लेकर वह बंदा चला गया। दूध खरीद कर मैंने भी घर की राह ली। कदमों के साथ चिंतन भी चल पड़ा।

जिनके बीच वार्तालाप हो रहा था, उन दोनों की औपचारिक शिक्षा नहीं के बराबर थी। अलबत्ता जिस विषय पर वे चर्चा कर रहे थे, वह शिक्षा की सर्वोच्च औपचारिक पदवी की परिधि के सामर्थ्य से भी बाहर था। वस्तुतः जिन बड़े-बड़े प्रश्नों पर या प्रश्नों को बड़ा बना कर शिक्षित लोग चर्चा करते हैं, सेमिनार करते हैं, मीडिया में छपते हैं, अपनी पी.आर. रेटिंग बढ़ाने की जुगाड़ करते हैं, उन प्रश्नों को बड़ी सहजता से उनके समाधान की दिशा में सामान्य व्यक्ति ले जाता है।

एक सज्जन हैं जो रोज़ाना घूमते समय अपने पैरों से फुटपाथ का सारा कचरा सड़क किनारे एकत्रित करते जाते हैं। सोचें तो पैर से कितना कचरा हटाया जा सकता है..! पर टिटहरी यदि  रामसेतु के निर्माण में योगदान दे सकती है तो एक सामान्य नागरिक की क्षमता और  उसके कार्य को कम नहीं समझा जाना चाहिए।

आकाश की ओर देखते हुए मनुष्य से प्राय: धरती देखना छूट जाता है। जबकि सत्य यह है कि सारा बोझ तो धरती ने ही उठा रखा है। धरती की ओर मुड़कर और झुककर देखें तो ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपने-अपने स्तर पर समाज और देश की सेवा कर रहे हैं।

इन लोगों को किसी मान-सम्मान की अपेक्षा नहीं है। वे निस्पृह भाव से अपना काम कर रहे हैं।

युवा और किशोर पीढ़ी, वर्चुअल से बाहर निकल कर अपने अड़ोस-पड़ोस में रहनेवाले इन एक्चुअल रोल मॉडेलों से प्रेरणा ग्रहण कर सके तो उनके समय, शक्ति और ऊर्जा का समाज के हित में समुचित उपयोग हो सकेगा।

सोचता हूँ, सामान्य लोगों की असामान्य बातों और तदनुसार क्रियान्वयन पर  ही जगत का अस्तित्व टिका है।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ उधार की बैसाखी पर टिकी हिंदी लघुकथा ☆ डॉ कुंवर प्रेमिल

डॉ कुंवर प्रेमिल

(संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठतम साहित्यकार डॉ कुंवर प्रेमिल जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में सतत लेखन का अनुभव हैं। अब तक 350 से अधिक लघुकथाएं रचित एवं ग्यारह  पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन।  आपकी लघुकथा ‘पूर्वाभ्यास’ को उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के द्वितीय वर्ष स्नातक पाठ्यक्रम सत्र 2019-20 में शामिल किया गया है। वरिष्ठतम  साहित्यकारों  की पीढ़ी ने  उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है,जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। हम लोग इस पीढ़ी का आशीर्वाद पाकर कृतज्ञ हैं।  
आपने लघु कथा को लेकर कई  प्रयोग किये हैं। आज प्रस्तुत है हिंदी लघुकथा पर उनकी बेबाक राय रखता हुआ एक विचारणीय आलेख ‘उधार की बैसाखी पर टिकी हिंदी लघुकथा’। )

☆ उधार की बैसाखी पर टिकी हिंदी लघुकथा : डॉ. कुंवर प्रेमिल

‘चहुं ओर लघुकथाएं फैली हैं! ‘

यह मैं अकेला नहीं कह रहा हूं, बल्कि हर कोई कह रहा है. पढे लिखे,  बिना पढ़े-लिखे सभी लघुकथा के फैन हैं. सभी लघुकथाएं पढ़ रहे हैं. कहते हैं लंबी-लंबी कहानी पढ़ने के लिए किसके पास समय है. लघुकथा सरल-सुबोध है. हर जगह उपलब्ध है.

ट्रेन में सफर करते चलो, लघुकथाएं पढ़ते चलो, पढ़ते-पढ़ते दिल्‍ली पहुंच गए तो वहां तो लघुकथा के समुद्र में ही पहुंच गए. एक से बढ़कर एक. छोटी, मंझोली और बड़ी भी. कोई दो पंक्ति की, कोई एक पृष्ठ भर की, कोई डेढ़ दो पृष्ठ की भी मिल जाएगी.

लघुकथा के पास पाठकों की कमी नहीं है. लघुकथाकार हैं तो पाठक भी हैं. पाठकों के मामले में लघुकथा धनवान है. वरिष्ठ लघुकथाकार तो हैं ही, पढ़ते-पढ़ते पाठक भी न जाने कब लघुकथा लिखने लगता है, पता ही नहीं चलता. कहानी-कविता के बनिस्बत लघुकथा लिखना ज्यादा सरल प्रतीत होता है.

डॉ. शंकर पुणतांबेकर ने कहा है- ‘ कविता में कथा न हो तो प्रसंग तो होता ही है. इस मायने में कविता और लघुकथा परस्पर निकट हैं. हां समीक्षक इसे स्वीकार न करें यह अलग बात है. लघुकथा के साथ यह त्रासदी है कि उसकी वकालत उसी को ही करनी होती है. फैसला सुनाने वाला भी कोई तीसरा नहीं आता. ‘ (संदर्भ ‘ प्रतिनिधि लघुकथाएं-2010’).

कोई अपनी कहानी को संक्षिप्त कर लघुकथा कर देता है; उसके लिए वही लघुकथा है. वह जानता है कि लघुकथा के पास ऐसा कोई रूप-स्वरूप, आकार तो सुनिश्चित है नहीं तो डर काहे का. लिख डालो कैसी भी कितनी भी, छोटी-बड़ी और बन जाओ रातों रात लघुकथाकार.

आजकल एक-एक, दो-दो किलोमीटर पर लघुकथाकार मिल जाएंगे. अब तो मोबाइल पर भी लघुकथा पढ़ी जाने लगी है. अब सवाल यह उठता है कि जब लघुकथाओं को इतनी प्रसिद्धि मिली है, विस्तारित है, तो उसका आकार-प्रकार सुनिश्चित क्यों नहीं किया गया … और अब कौन व आकार को सुनिश्चित करने का प्रयत्न करेगा. इतना जरूरी काम गैरजरूरी बन कर कैसे रह गया ?

कहते हैं कि लघुकथा का अभी तक कोई मान्य समीक्षक नहीं है. समीक्षा हो रही है. मान्य समीक्षक के लिए इन समीक्षकों के पास कोई डिग्री-डिप्लोमा तो जरूर होगा. कौन सा विद्यालय या विश्व विद्यालय समीक्षक बनाने का पुनीत काम कर रहा है यह मालूम तो होना चाहिए. समीक्षकों के पास कोई डिग्री है भी या नहीं.

यहां तो हर कोई दूसरा-तीसरा लघुकथा लेखक समीक्षक बना घूम रहा है. किसी की लघुकथा की किताब छपी नहीं कि वह खाना-पीना भूलकर किसी अच्छे समीक्षक की तलाश में घूमने लगता है. अच्छी समीक्षा लिख गई तो फिर बल्‍ले-बल्ले हो गई. तथाकथित समीक्षक ने भी उन लघुकथाओं को पूरा पढ़ा भी था, कौन जानता है ?

यह मान लेने में भी कोई हर्ज नहीं है कि उस समीक्षा को पढ़ने वाले कितने होंगे. सच पूछा जाए तो प्रबुद्ध पाठक हर किसी ऐरे-गैरे-नत्थूखैरे की लिखी समीक्षा क्यों पढ़े ? सच पूछा जाए तो अमान्य ही होंगी ऐसी समीक्षाएँ.

अब आते हैं लघुकथा विधा पर. इसे विधा मानने पर ही प्रश्न चिन्ह है.  डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ कहते हैं – ‘लघुकथा को विधा मानने वालें ने मौन साध लिया है और मौन स्वीकृतिलक्षणम्‌’. (संदर्भ-प्रतिनिधि लघुकथाएं’ वर्ष 2010).

लघुकथा आलेखों में प्राय: पढ़ने मिलता है- संवेदना लघुकथा की पहचान है.

दूसरे – सामाजिक परिवर्तन में लघुकथा का विशेष योगदान है.

ये दोनों बातें कितनी एक्सेप्टेबिल हैं, पाठक ही जानें.

जिस लघुकथा में संवेदनशीलता नहीं होगी तो क्या वह लघुकथा नहीं होगी और सामाजिक परिवर्तन तो ऐसा कुछ लघुकथा के खाते में गया नहीं है. अलबत्ता समाज में कहानी का पुरातनकाल से दखल रहा था पर वह भी कहानी, नई कहानी, समानांतर कहानी, दलित कहानी में बंटकर हाशिए पर चली गई.

‘लघुकथा एक आंदोलन है जो व्यवस्था को बदलने में सक्षम है.’ – यह भी गले नहीं उतरती. किसी लघुकथा ने किसी अंधविश्वास या रूढ़िवाद को उतारकर नहीं फेंका. अलबत्ता यह भी लिखा मिला, चाहे कहानी हो या लघुकथा, बाल कहानी-उपदेशात्मक न हो. सबक सिखाने जैसी कहानी/लघुकथा अब नहीं होनी चाहिए. यही बात पुरानी पीढ़ी के पाठक के गले नहीं उतरती. जब रचना में कोई सीख या सबक न हो तो उस कपोल कल्पित को पढ़ने में फायदा क्या है? दिया तले अंधेरा कहीं इसी को न कहते हों.

अब लघुकथा के विषय भी चुकने लगे हैं. लघुकथाकारों ने ढूंढ-दूंढकर विषयान्तर्गत लघुकथाएं लिख डाली हैं. एक लघुकथा दूसरी लघुकथा में घुसपैठ करने लगी है.

उत्तराखंड रुड़की की पत्रिका “अविराम साहित्यकी’ ने अपने जनवरी-मार्च 2013 के अंक में एक बहस “लेखन में मौलिकता की समस्या और साहित्यिक चोरी’ पर एक परिचर्चा का आयोजन किया था. पत्रिका के संपादक डॉ. उमेश महादोषी की चिंता सबके सामने हैं. उक्त परिचर्चा में विविध विचार पत्रिका के अंक (जुलाई-सितंबर 2013) में प्रकाशित हुए थे. मेरे अपने विचार भी उसमें शामिल हुए थे.

विश्व साहित्य में चेखव, ओ हेनरी, मोपांसा, सआदत हसन मंटो तुर्गनेव, खलील जिब्रान, आस्कर वाइल्ड, मार्कट्वेन, शेक्सपियर, कार्ल  सेंडबर्ग, माधवराव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, प्रेमचंद, ओर्लोस आदि. हमारे पुरोधा जो अपनी लघुकथाओं से भूत-वर्तमान-भविष्य के बीच सामंजस्य बैठा गए हैं उनमें हम कितना इजाफा कर पाए हैं या कर पाएंगे …. और प्रश्न यह भी है कि क्या तब उनकी लघुकथाएं भी किन्हीं योग्य समीक्षकों की नजरों से गुजरी होंगी या नहीं.

अंत में मेरा निवेदन है कि लघुकथा जो आज तक पूर्ण विधा नहीं बन पाई, जिसके पास आज भी समीक्षक नहीं और जिसका आकार बिना किसी ठौर-ठिकाने का है वह लघुकथा उधार की बैसाखी पर कितनी देर टिकी रह पाएगी. सभी गौर फरमाएं यह मेरी इल्तिजा है. इति.

© डॉ कुँवर प्रेमिल

एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मोबाइल 9301822782

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ☆ गहराते श्याम वर्ण की उजास ☆ श्रीमती समीक्षा तैलंग

श्रीमती समीक्षा तैलंग

( आज प्रस्तुत है  सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार – साहित्यकार श्रीमती समीक्षा तैलंग जी का गंभीर चिंतन  से उपजा एक विचारणीय ललित लेख गहराते श्याम वर्ण की उजास।)

☆  ललित लेख ☆ गहराते श्याम वर्ण की उजास ☆ श्रीमती समीक्षा तैलंग  ☆

आज सुबह ऊपरवाले ने क्या खूब कूची चलाई कि आसमान में कहीं रंग हल्के तो कहीं गाढे थे। हल्का नीला आंखों को शीतलता और तरोताजा कर रहा था। गाढा नीला रंग उसके बीच अपना अस्तित्व दिखा रहा था। सारे हल्के रंग मिलकर ही तो गाढा रंग बनाते हैं। जैसे जीवन के रंग…!!

सुनहरी छटा को बीच-बीच में कुछ छिड़क-सा दिया था। हां, यही सुनहरा चाहते हैं ना हम सब। धुंधलके से उजला होता। धीमा पडता स्याह रंग।

वह द्रव्य भी तो श्याम ही है जिसमें धरती समाहित है। लेकिन उस श्याम को वरण करना इतना ही आसान होता तो उसमें हम सब समा जाते। खुद को समर्पित कर देते उस श्याम में।

लेकिन हमारी आंखों की चमक सुनहरेपन से हमेशा ही आकर्षित होती है। हम भागते हैं उसके पीछे। लेकिन श्याम तो हमारे जीवन का मुख्य रंग है। उसे हम आंखें मूंदकर भी महसूस कर सकते हैं। उसी में प्रस्फुटित होता है ये सुनहरापन। और यही हमेशा शाश्वत रहता है।

काले में सुनहरा ढूंढना हरेक के बस की बात नहीं होती। इसीलिए हमारे अपने हाथों में भी वही कूची दे दी जन्मदाता ने। ऊपरवाला रंगों से परिचय करा देता है। लेकिन जीवन के कैनवस पर उसे भरने के लिए यही कूची काम आती है।

हम यदि उन रंगों के मार्फत उसका संदेश समझ पाते हैं तो हम सही रंगों का संतुलित सम्मिश्रण कर उससे अपनी जन्मकुंडली में निखार लाते हैं। बस रंगों की गहराई को समझना ही तो जीवन है।

जिस दिन श्याम को समझ जाएंगे, जीवन उजास हो जाएगा। प्रकृति ने अपनी रंगीन छटा में मुझे आकृष्ट कर लिया। और अब उसने अपना सुनहरा रूप दिखाना शुरू कर दिया है।

© श्रीमती समीक्षा तैलंग 

पुणे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 94 ☆ अनुकरणीय सीख ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख  अनुकरणीय सीख। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 94 ☆

☆ अनुकरणीय सीख

‘तुम्हारी ज़िंदगी में होने वाली हर चीज़ के लिए ज़िम्मेदार तुम ख़ुद हो। इस बात को जितनी जल्दी मान लोगे, ज़िंदगी उतनी बेहतर हो जाएगी’ अब्दुल कलाम जी की यह सीख अनुकरणीय है। आप अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी हैं, क्योंकि जैसे कर्म आप करते हैं, वैसा ही फल आपको प्राप्त होता है। सो! आप के कर्मों के लिए दोषी कोई अन्य कैसे हो सकता है? वैसे दोषारोपण करना मानव का स्वभाव होता है, क्योंकि दूसरों पर कीचड़ उछालना अत्यंत सरल होता है। दुर्भाग्य से हम यह भूल जाते हैं कि कीचड़ में पत्थर फेंकने से उसके छींटे हमारे दामन को भी अवश्य मलिन कर देते हैं और जितनी जल्दी हम इस तथ्य को स्वीकार कर लेते हैं; ज़िंदगी उतनी बेहतर हो जाती है। वास्तव में मानव ग़लतियों का पुतला है, परंतु वह दूसरों पर आरोप लगा कर सुक़ून पाना चाहता है, जो असंभव है।

‘विचारों को पढ़कर बदलाव नहीं आता, विचारों पर चलकर आता है।’ कोरा ज्ञान हमें जीने की राह नहीं दिखाता, बल्कि हमारी दशा ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ व ‘थोथा चना, बाजे घना’ जैसी हो जाती है। जब तक हमारे अंतर्मन में चिन्तन-मनन की प्रवृत्ति जाग्रत नहीं होती, हमारा भटकना निश्चित् है। इसलिए हमें कोई भी निर्णय लेने से पूर्व उसके सभी पक्षों पर दृष्टिपात करना आवश्यक है। यदि हम तुरंत निर्णय दे देते हैं, तो उलझनें व समस्याएं बढ़ जाती हैं। इसलिए कहा गया है ‘पहले तोलो, फिर बोलो’ क्योंकि जिह्वा से निकले शब्द व कमान से निकला तीर कभी लौटकर नहीं आता। द्रौपदी  का एक वाक्य ‘अंधे की औलाद अंधी’ महाभारत के युद्ध का कारण बना। वैसे शब्द व वाक्य जीवन की दिशा बदलने का कारण भी बनते हैं। तुलसीदास व कालिदास के जीवन में बदलाव उनकी पत्नी के एक वाक्य के कारण आया। ऐसे अनगिनत उदाहरण विश्व में उपलब्ध हैं। सो! मात्र अध्ययन करने से हमारे विचारों में बदलाव नहीं आता, बल्कि उन्हें अपने जीवन में धारण करने पर उसकी दशा व दिशा बदल जाती है। इसलिए जीवन में जो भी अच्छा मिले, उसे अपना लें।

अनुमान ग़लत हो सकता है, अनुभव नहीं। यदि जीवन को क़ामयाब बनाना है, तो याद रखें – ‘पांव भले ही फिसल जाए, ज़ुबान को कभी ना फिसलने दें।’ अनुभव जीवन की सीख है और अनुमान मन की कल्पना। मन बहुत चंचल होता है। पल-भर में ख़्वाबों के महल सजा लेता है और अपनी इच्छानुसार मिटा डालता है। वह हमें बड़े-बड़े स्वप्न दिखाता है और हम उन के पीछे चल पड़ते हैं। वास्तव में हमें अनुभव से काम लेना चाहिए; भले ही वे दूसरों के ही क्यों न हों? वैसे बुद्धिमान लोग दूसरों के अनुभव से सीख लेते हैं और सामान्य लोग अपने अनुभव से ज्ञान प्राप्त करते हैं। परंतु मूर्ख लोग अपना घर जलाकर तमाशा देखते हैं। हमारे ग्रंथ व संत दोनों हमें जीवन को उन्नत करने की सीख देते और ग़लत राहों का अनुसरण करने से बचाते हैं। विवेकी पुरुष उन द्वारा दर्शाए मार्ग पर चलकर अपना भाग्य बना लेते हैं, परंतु अन्य उनकी निंदा कर पाप के भागी बनते हैं। वैसे भी मानव अपने अनुभव से ही सीखता है। कबीरदास जी ने भी कानों-सुनी बात पर कभी विश्वास नहीं किया। वे आंखिन देखी पर विश्वास करते थे, क्योंकि हर चमकती वस्तु सोना नहीं होती और उसका पता हमें उसे परखने पर ही लगता है। हीरे की परख जौहरी को होती है। उसका मूल्य भी वही समझता है। चंदन का महत्व भी वही जानता है, जिसे उसकी पहचान होती है, अन्यथा उसे लकड़ी समझ जला दिया जाता है।

यदि नीयत साफ व मक़सद सही हो, तो यक़ीनन किसी न किसी रूप में ईश्वर आपकी सहायता अवश्य करते हैं और आपकी चिंताओं का अंत हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि परमात्मा में विश्वास रखते हुए सत्कर्म करते जाओ; आपका कभी भी बुरा नहीं होगा। यदि हमारी नीयत साफ है अर्थात् हम में दोग़लापन नहीं है; किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर का भाव नहीं है, तो वह हर विषम परिस्थिति में आपकी सहायता करता है। हमारा लक्ष्य सही होना चाहिए और हमें ग़लत ढंग से उसे प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। यदि हमारी सोच नकारात्मक होगी, तो हम कभी भी अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच पाएंगे; अधर में लटके रह जाएंगे। इसके साथ एक अन्य बात की ओर भी मैं आपका ध्यान दिलाना चाहूंगी कि हमारे पांव सदैव ज़मीन पर टिके रहने चाहिए। इस स्थिति में हमारे अंतर्मन में अहं का भाव जाग्रत नहीं होगा, जो हमें सत्य की राह पर चलने को प्रेरित करेगा और भटकन की स्थिति से हमारी रक्षा करेगा। इसके विपरीत अहं अथवा सर्वश्रेष्ठता का भाव हमें वस्तुस्थिति व व्यक्ति का सही आकलन नहीं करने देता, बल्कि हम दूसरों को स्वयं से हेय समझने लगते हैं। अहं दौलत का भी भी हो सकता है; पद-प्रतिष्ठा व ओहदे का भी हो सकता है। दोनों स्थितियां घातक हैं। ये मानव को सामान्य व कर्त्तव्यनिष्ठ नहीं रहने देती। हम दूसरों पर आधिपत्य स्थापित कर अपने स्वार्थों की पूर्ति करना चाहते हैं। पैसा बिस्तर दे सकता है, नींद नहीं; भोजन दे सकता है, भूख नहीं: अच्छे कपड़े दे सकता है, सौंदर्य नहीं; ऐशो-आराम के साधन दे सकता है, सुक़ून नहीं। सो! दौलत पर कभी भी ग़ुरूर नहीं करना चाहिए।

अहंकार व संस्कार में फ़र्क होता है। अहंकार दूसरों को झुकाकर खुश होता है; संस्कार स्वयं झुक कर खुश होता है। इसलिए बच्चों को सुसंस्कृत करने की सीख दी जाती है; जो परमात्मा में अटूट आस्था, विश्वास व निष्ठा रखने से आती है। तुलसीदास जी ने भी ‘तुलसी साथी विपद् के, विद्या, विनय, विवेक’ का संदेश दिया है। जब भगवान हमें कठिनाई में छोड़ देते हैं, तो विश्वास रखें कि या तो वे तुम्हें गिरते हुए थाम लेंगे या तुम्हें उड़ना सिखा देंगे। प्रभु की लीला अपरंपार है, जिसे समझना अत्यंत कठिन है। परंतु इतना निश्चित है कि वह संसार में हमारा सबसे बड़ा हितैषी है। इंसान संसार में भाग्य लेकर आता है और कर्म लेकर जाता है। अक्सर लोग कहते हैं कि इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है। परंतु वह अपने कृत-कर्म लेकर जाता है, जो भविष्य में उसके जीवन का मूलाधार बनते हैं। इसलिए रहीम जी कहते हैं कि ‘मन चंगा, तो कठौती में गंगा।’

सो! संसार में मन की शांति से बड़ी कोई संपत्ति नहीं है। महात्मा बुद्ध शांत मन की महिमा का गुणगान करते हैं। ‘दुनियादारी सिखा देती है मक्कारियां/ वरना पैदा तो हर इंसान साफ़ दिल से होता है।’ इसलिए मानव को ऐसे लोगों से सचेत व सावधान रहना चाहिए, जिनका ‘तन उजला और मन मैला’ होता है।’ ऐसे लोग कभी भी आपके मित्र नहीं हो सकते। वे किसी पल भी आपकी पीठ में छुरा घोंप सकते हैं। ‘भरोसा है तो चुप्पी भी समझ में आती है, वरना एक-एक शब्द के कई-कई अर्थ निकलते हैं।’ इसलिए छोटी-छोटी बातों को बड़ा न कीजिए; ज़िंदगी छोटी हो जाती है। गुस्से के वक्त रुक जाना/ ग़लती के वक्त झुक जाना/ फिर पाना जीवन में/ सरलता और आनंद/ आनंद ही आनंद।’ हमारी सोच, विचार व कर्म ही हमारा भाग्य लिखते हैं। कुछ लोग किस्मत की तरह होते हैं, जो दुआ की तरह मिलते हैं और कुछ लोग दुआ की तरह होते हैं, जो किस्मत बदल देते हैं। ऐसे लोगों की कद्र करें; वे भाग्य से मिलते हैं। अंत में मैं कहना चाहूंगी कि मानव स्वयं अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी है और इस तथ्य को स्वीकारना ही बुद्धिमानी है, महानता है। सो! अपनी सोच, व्यवहार व विचार सकारात्मक रखें, यह ही आपके भाग्य-निर्माता हैं।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

#239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 46 ☆ राष्ट्रभाषा हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में स्वीकारें ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

(डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका  एक अत्यंत ज्ञानवर्धक, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक आलेख  “राष्ट्रभाषा हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में स्वीकारें”.)

☆ किसलय की कलम से # 46 ☆

☆ राष्ट्रभाषा हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में स्वीकारें ☆

भारत एक विशाल देश है। विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं, परंतु सभी भाषाओं की धरोहर भारतीय संस्कृति ही है। प्रत्येक भाषा में रामायण और महाभारत के ग्रंथ उपलब्ध हैं। विभिन्न भाषाओं में कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ही विषय पर साहित्य उपलब्ध होना कोई नई बात नहीं है। यही कारण है कि अपनी मूल भाषा की उन्नति के लिए क्षेत्रीय लोगों का उद्वेलित होना एक सीमा तक उचित प्रतीत होता है। हर व्यक्ति अपनी समृद्धि के रक्षार्थ हद से आगे जा सकता है। हिन्दी को लेकर भी कुछ इसी तरह का विरोध समझ में आता है परंतु इसमें क्षेत्रीय भाषा बोलने वाले कितने दोषी हैं। यह एक चर्चात्मक विषय है। इसके लिए शासन की कमजोरियाँ एवं प्रचार-प्रसार का गलत नजरिया भी दोषी है, जिसके कारण क्षेत्रीय भाषा बोलने वालों को शायद ऐसा भ्रम होने लगता है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार से कहीं वे अपनी भाषा ही को न खो बैठें। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज हिन्दी के अतिरिक्त सभी अन्य भाषा बोलने वाले लोगों का झुकाव गुरोत्तर अंग्रेजी की ओर होने लगा तथा शासन द्वारा लगातार की जा रही उपेक्षा आग में घी का काम कर रही है। आज देश के प्रत्येक शिक्षित एवं समृद्ध वर्ग की संस्कृति इंग्लिश, हिन्दी एवं अंग्रेजी का मिश्रण होती जा रही है। आज उच्च वर्ग का आधार अंग्रेजियत से भी जोड़ा जाता है। इस परिवेश में हिन्दी की सार्थकता पर चिंतित होना स्वाभाविक है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक सर्वसम्मत भाषा होती है, जिसका आदर एवं प्रचार-प्रसार करना प्रत्येक देशवासी का कर्त्तव्य होना चाहिए। आज हमारे देश में राष्ट्रभाषा के नाम पर स्वीकृत हिन्दी अपने आपको यथोचित स्थान पर स्थापित करने में असमर्थता का अनुभव करती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि राष्ट्र स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती तक पहुँचकर भी हिन्दी की प्रगति नहीं कर सकता। आज हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि साहित्य तकनीकी एवं चिकित्सकीय क्षेत्र में भी हिन्दी बहुत आगे निकल गई है। हिन्दी शब्दकोष विशाल से विशालतम हो गया है। प्रत्येक हिन्दी भाषी को उसकी सार्थकता का अनुभव देश-विदेश में होने लगा है। यह अक्षरतशः सत्य है कि हिन्दी अब किसी भी विदेशी भाषा से कमजोर नहीं है। इतनी समर्थ भाषा का सर्वसम्म6 राष्ट्रभाषा बनने की असमर्थता निश्चित रूप से कुछ लोगों की अदूरदर्शिता के अलावा और कुछ नहीं है , क्योंकि संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि किसी भी प्रादेशिक भाषा का विकास भी उतना ही आवश्यक है । जितना कि राष्ट्रभाषा हिन्दी का सर्वांगीण विकास। आज समय की मांग है कि भारत की सुख-समृद्धि चाहने वाला प्रत्येक भारतवासी सारे भ्रम दूर कर अपनी भाषा के साथ-साथ राष्ट्रभाषा हिन्दी का भी विकास एवं प्रचार-प्रसार करे तभी हिन्दी की सार्थकता में चार चाँद लग सकेंगे।

अंततः यह कहना उचित होगा कि चाहे राष्ट्र की प्रगति का प्रश्न हो या जन जागृति का, प्रदेश की बात हो अथवा संपूर्ण राष्ट्र की, जब तक हिन्दी भारत की संपर्क भाषा के रूप में अंगीकृत नहीं की जाती तब तक इसकी वास्तविकता सार्थकता सिद्ध नहीं होगी और न ही विश्व समुदाय इसकी महत्ता स्वीकार करेगा।

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 107 ☆ जल-जंगल-जमीन के अधिकार के आदि प्रवक्ता बिरसा मुण्डा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  का एक ऐतिहासिक जानकारी से ओतप्रोत आलेख  – जल-जंगल -जमीन के अधिकार के आदि प्रवक्ता बिरसा मुण्डा।  इस ऐतिहासिक रचना के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 107 ☆

🌻 जल-जंगल-जमीन के अधिकार के आदि प्रवक्ता बिरसा मुण्डा  🌻

आज रांची झारखंड की राजधानी है. बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहातु गांव में हुआ था.  यह तब की बात है जब  ईसाई मिशनरियां अंग्रेजी फौज के पहुंचने से पहले ही ईसाइयत के प्रचार के लिये गहन तम भीतरी क्षेत्रो में पहुंच जाया करती थीं. वे गरीबों, वनवासियों की चिकित्सकीय व शिक्षा में मदद करके उनका भरोसा जीत लेती थीं. और फिर धर्मान्तरण का दौर शुरू करती थीं. बिरसा मुंडा भी शिक्षा में तेज थे. उनके पिता सुगना मुंडा से लोगों ने कहा कि इसको जर्मन मिशनरी के स्कूल में पढ़ाओ, लेकिन मिशनरीज के स्कूल में पढ़ने की शर्त हुआ करती थी, पहले आपको ईसाई धर्म अपनाना पड़ेगा. बिरसा का भी नाम बदलकर बिरसा डेविड कर दिया गया.

1894 में छोटा नागपुर क्षेत्र में जहां बिरसा रहते थे, अकाल पड़ा, लोग हताश और परेशान थे. बिरसा को अंग्रेजों के धर्म परिवर्तन के अनैतिक स्वार्थी व्यवहार से चिढ़ हो चली थी. अकाल के दौरान बिरसा ने पूरे जी जान से अकाल ग्रस्त लोगों की अपने तौर पर मदद की. जो लोग बीमार थे, उनका अंधविश्वास दूर करते हुये उनका इलाज करवाया. बिरसा का ये स्नेह और समर्पण देखकर लोग उनके अनुयायी बनते गए. सभी वनवासियों के लिए वो धरती आबा हो गए, यानी धरती के पिता.

अंग्रेजों ने 1882 में फॉरेस्ट एक्ट लागू किया था जिस से सारे जंगलवासी परेशान हो गए थे, उनकी सामूहिक खेती की जमीनों को दलालों, जमींदारों को बांट दिया गया था. बिरसा ने इसके खिलाफ ‘उलगूलान’ का नारा दिया. उलगूलान यानी जल, जंगल, जमीन के अपने अधिकारों के लिए लड़ाई. बिरसा ने अंग्रेजों के खिलाफ एक और नारा दिया, ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’, यानी अपना देश अपना राज. करीब 4 साल तक बिरसा मुंडा की अगुआई में जंगलवासियों ने कई बार अंग्रेजों को धूल चटाई. अंग्रेजी हुक्मराम परेशान हो गए, उस दुर्गम इलाके में बिरसा के गुरिल्ला युद्ध का वो तोड़ नहीं ढूंढ पा रहे थे. लेकिन भारत जब जब हारा है, भितरघात और अपने ही किसी की लालच से, बिरसा के सर पर अंग्रेजो ने बड़ा इनाम रख दिया. किसी गांव वाले ने बिरसा का सही पता अंग्रेजों तक पहुंचा दिया. जनवरी १८९० में गांव के पास ही डोमबाड़ी पहाड़ी पर बिरसा को घेर लिया गया, फिर भी 1 महीने तक जंग चलती रही, सैकड़ों लाशें बिरसा के सामने उनको बचाते हुए बिछ गईं, आखिरकार 3 मार्च वो भी गिरफ्तार कर लिए गए. ट्रायल के दौरान ही रांची जेल में उनकी मौत हो गई.

लेकिन बिरसा की मौत ने न जाने कितनों के अंदर क्रांति की ज्वाला जगा दी. और अनेक नये क्रांतिकारी बन गये. राष्ट्र ने उनके योगदान को पहचाना है. आज भी वनांचल में बिरसा मुंडा को लोग भगवान की तरह पूजते हैं. उनके नाम पर न जाने कितने संस्थानों और योजनाओं के नाम हैं, और न जाने कितनी ही भाषाओं में उनके ऊपर फिल्में बन चुकी हैं. पक्ष विपक्ष की कई सरकारों ने जल जंगल और जमीन के उनके मूल विचार पर कितनी ही योजनायें चला रखी हैं.उनकी जयंती पर इस आदिवासी गुदड़ी के लाल को शत शत नमन. 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 96 ☆ पर्यावरण दिवस की दस्तक ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # 96 ☆ पर्यावरण दिवस की दस्तक ☆

लौटती यात्रा पर हूँ। वैसे यह भी भ्रम है, यात्रा लौटती कहाँ है? लौटता है आदमी..और आदमी भी लौट पाता है क्या, ज्यों का त्यों, वैसे का वैसा! खैर सुबह जिस दिशा में यात्रा की थी, अब यू टर्न लेकर वहाँ से घर की ओर चल पड़ा हूँ। देख रहा हूँ रेल की पटरियों और महामार्ग के समानांतर खड़े खेत, खेतों को पाटकर बनाई गई माटी की सड़कें। इन सड़कों पर मुंबई और पुणे जैसे महानगरों और कतिपय मध्यम नगरों से इंवेस्टमेंट के लिए ‘आउटर’ में जगह तलाशते लोग निजी और किराये के वाहनों में घूम रहे हैं। ‘धरती के एजेंटों’ की चाँदी है। बुलडोजर और जे.सी.बी की घरघराहट के बीच खड़े हैं आतंकित पेड़। रोजाना अपने साथियों का कत्लेआम  देखने को अभिशप्त पेड़। सुबह पड़ी हल्की फुहारें भी इनके चेहरे पर किसी प्रकार का कोई स्मित नहीं ला पातीं। सुनते हैं जिन स्थानों पर साँप का मांस खाया जाता है, वहाँ मनुष्य का आभास होते ही साँप भाग खड़ा होता है। पेड़ की विवशता कि भाग नहीं सकता सो खड़ा रहता है, जिन्हें छाँव, फूल-फल, लकड़ियाँ दी, उन्हीं के हाथों कटने के लिए।

मृत्यु की पूर्व सूचना आदमी को जड़ कर देती है। वह कुछ भी करना नहीं चाहता, कर ही नहीं पाता। मनुष्य के विपरीत कटनेवाला पेड़ अंतिम क्षण तक प्राणवायु, छाँव और फल दे रहा होता है। डालियाँ छाँटी या काटी जा रही होती हैं तब भी शेष डालियों पर नवसृजन करने के प्रयास में होता है पेड़।

हमारे पूर्वज पेड़ लगाते थे और धरती में श्रम इन्वेस्ट करते थे। हम पेड़ काटते हैं और धरती को माँ कहने के फरेब के बीच ज़मीन की फरोख्त करते हैं। खरीदार, विक्रेता, मध्यस्थ, धरती को खरीदते-बेचते एजेंट। विकास के नाम पर देश जैसे ‘एजेंट हब’ हो गया है!

मन में विचार उठता है कि मनुष्य का विकास और प्रकृति का विनाश पूरक कैसे हो सकते हैं? प्राणवायु देनेवाले पेड़ों के प्राण हरती ‘शेखचिल्ली वृत्ति’ मनुष्य के बढ़ते बुद्ध्यांक (आई.क्यू) के आँकड़ों को हास्यास्पद सिद्ध कर रही है। धूप से बचाती छाँव का विनाश कर एअरकंडिशन के ज़रिए कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा देकर ओज़ोन लेयर में भी छेद कर चुके आदमी  को देखकर विश्व के पागलखाने एक साथ मिलकर अट्टहास कर रहे हैं। ‘विलेज’ को ‘ग्लोबल विलेज’ का सपना बेचनेवाले ‘प्रोटेक्टिव यूरोप’ की आज की तस्वीर और भारत की अस्सी के दशक तक की तस्वीरें लगभग समान हैं। इन तस्वीरों में पेड़ हैं, खेत हैं, हरियाली है, पानी के स्रोत हैं, गाँव हैं। हमारे पास अब सूखे ताल हैं, निरपनिया तलैया हैं, जल के स्रोतों को पाटकर मौत की नींव पर खड़े भवन हैं, गुमशुदा खेत-हरियाली  हैं, चारे के अभाव में मरते पशु और चारे को पैसे में बदलकर चरते मनुष्य हैं।

माना जाता है कि मनुष्य, प्रकृति की प्रिय संतान है। माँ की आँख में सदा संतान का प्रतिबिम्ब दिखता है। अभागी माँ अब संतान की पुतलियों में अपनी हत्या के दृश्य पाकर हताश है।

और हाँ, पर्यावरण दिवस के आयोजन भी शुरू हो चुके हैं। हम सब एक सुर में सरकार, नेता, बिल्डर, अधिकारी, निष्क्रिय नागरिकों को कोसेंगे। कागज़ पर लम्बे, चौड़े भाषण लिखे जाएँगे, टाइप होंगे और उसके प्रिंट लिए जाएँगे। प्रिंट कमांड देते समय स्क्रीन पर भले ही शब्द उभरें-‘ सेव इन्वायरमेंट। प्रिंट दिस ऑनली इफ नेसेसरी,’ हम प्रिंट निकालेंगे ही। संभव होगा तो कुछ लोगों, खास तौर पर मीडिया को देने के लिए इसकी अधिक प्रतियाँ निकालेंगे।

कब तक चलेगा हम सबका ये पाखंड? घड़ा लबालब हो चुका है। इससे पहले कि प्रकृति केदारनाथ के ट्रेलर को लार्ज स्केल सिनेमा में बदले, हमें अपने भीतर बसे नेता, बिल्डर, भ्रष्ट अधिकारी तथा निष्क्रिय नागरिक से छुटकारा पाना होगा।

चलिए इस बार पर्यावरण दिवस के आयोजनों  पर सेमिनार, चर्चा वगैरह के साथ बेलचा, फावड़ा, कुदाल भी उठाएँ, कुछ पेड़ लगाएँ, कुछ पेड़ बचाएँ। जागरूक हों, जागृति करें। यों निरी लिखत-पढ़त और बौद्धिक जुगाली से भी क्या हासिल होगा?

 

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 93 ☆ ग़लत सोच : ग़लत अंदाज़ ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख ग़लत सोच : ग़लत अंदाज़। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 93 ☆

☆ ग़लत सोच : ग़लत अंदाज़ 

ग़लत सोच, ग़लत अंदाज़ इंसान को हर रिश्ते से  गुमराह कर देता है। इसलिए सबको साथ रखो, स्वार्थ को नहीं, क्योंकि आपके विचारों से अधिक कोई भी आपको कष्ट नहीं पहुंचा सकता– यह कथन कोटिशः सत्य है। मानव की सोच ही शत्रुता व मित्रता का मापदंड है। ग़लत सोच के कारण आप पूरे जहान को स्वयं से दूर कर सकते हैं; जिसके परिणाम-स्वरूप आपके अपने भी आपसे आंखें चुराने लग जाते हैं और आपको अपनी ज़िंदगी से बेदखल कर देते हैं। यदि आपकी सोच सकारात्मक है, तो आप सबकी आंखों के तारे हो जाते हैं। सब आपसे स्नेह रखते हैं।

ग़लत सोच के साथ-साथ ग़लत अंदाज़ भी बहुत ख़तरनाक होता है। इसीलिए गुलज़ार ने कहा है कि लफ़्ज़ों के भी ज़ायके होते हैं और इंसान को लफ़्ज़ों को परोसने से पहले अवश्य चख लेना चाहिए। महात्मा बुद्ध की सोच भी यही दर्शाती है कि जिस व्यवहार की अपेक्षा आप दूसरों से करते हैं, वैसा व्यवहार आपको उनके साथ भी करना चाहिए, क्योंकि जो भी आप करते हैं; वही लौटकर आपके पास आता है। इसलिए सदैव अच्छे कर्म कीजिए, ताकि आपको उसका अच्छा फल प्राप्त हो सके।

मानव स्वयं ही अपना सबसे बड़ा शत्रु है, क्योंकि जैसी उसकी सोच व विचारधारा होती है, वैसी ही उसे संपूर्ण सृष्टि भासती है। इसलिए कहा जाता है कि मानव अपनी संगति से पहचाना जाता है। उसे संसार के लोग इतना कष्ट नहीं पहुंचा सकते; जितनी आप स्वयं की हानि कर सकते हैं। सो! मानव को स्वार्थ का त्याग करना कारग़र है। इसके लिए उसे अपनी मैं अथवा अहं का त्याग करना होगा। अहं मानव को आत्मकेंद्रिता के व्यूह में जकड़ लेता है और वह अपने घर-परिवार के इतर कुछ भी नहीं सोच पाता। सो! मानव को सदैव ‘सर्वे भवंतु सुखीन:’ की कामना करनी चाहिए, क्योंकि हम भारतीय वसुधैव कुटुंबकम् की संस्कृति में विश्वास रखते हैं, जो सकारात्मक सोच का प्रतिफल है।

सुख व्यक्ति के अहंकार की परीक्षा लेता है और दु:ख धैर्य की और सुख और दु:ख दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाला व्यक्ति ही सफल होता है। मानव को सुख-दु:ख में सदैव सम रहना चाहिए, क्योंकि सुख में व्यक्ति अहंनिष्ठ हो जाता है और किसी को अपने समान नहीं समझता। दु:ख में व्यक्ति के धैर्य की परीक्षा होती है। परंतु दु:ख में वह टूट जाता है और पथ-विचलित हो जाता है। उस स्थिति में चिंता व तनाव उसे घेर लेते हैं और वह अवसाद की स्थिति में पहुंच जाता है। सुख-दु:ख का चोली दामन का साथ है; दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक की उपस्थिति होने पर दूसरा कभी दस्तक नहीं देता और उसके जाने के पश्चात् ही वह आता है। सृष्टि का क्रम आना और जाना है। मानव संसार में जन्म लेता है और कुछ समय पश्चात् उसे अलविदा कह चला जाता है और यह क्रम निरंतर चलता रहता है।

परमात्मा हमारा भाग्य नहीं लिखता। हर कदम पर हमारी सोच, विचार व कर्म ही हमारा भाग्य निश्चित करते हैं। जैसी हमारी सोच होगी, वैसे हमारे विचार होंगे और कर्म भी यथानुकूल होंगे। हमें किसी के प्रति ग़लत विचारधारा नहीं बनानी चाहिए, क्योंकि यह हमारे अंतर्मन में शत्रुता का भाव जाग्रत करती है और दूसरे लोग भी हमारे निकट आना तक पसंद नहीं करते। उस स्थिति में सब स्वप्न व संबंध मर जाते हैं। इसलिए मानव को ग़लत सोच कभी नहीं रखनी चाहिए और बोलने से पहले सदैव सोचना चाहिए, क्योंकि हमारे बोलने के अंदाज़ से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। इसलिए रहीम जी का यह दोहा मानव को मधुर वाणी में बोलने की सीख देता है– ‘रहिमन वाणी ऐसी बोलिए, मनवा शीतल होय/  औरन को शीतल करे, ख़ुद भी शीतल होय।’ इसी संदर्भ में मैं इस तथ्य का उल्लेख करना चाहूंगी कि मानव को तभी बोलना चाहिए जब उसके शब्द मौन से बेहतर हों अर्थात् यथासमय, अवसरानुकूल सार्थक शब्दों का ही प्रयोग करना श्रेयस्कर है।

                  

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

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