हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 109 – देश-परदेश – क से कार ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 109 ☆ देश-परदेश – क से कार ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हिंदी भाषा जितनी सरल है, हमने अंग्रेजी का चोला पहनकर उसके साथ खूब खिलवाड़ करते हैं। हमने तो बचपन में क से कबूतर ही पढ़ा और जाना था। घर के आसपास तो क्या दूर तक कोई कार नहीं दिखती थी। कबूतर खूब देखे हैं। वैसे कबूतर भी उड़ तक फुर से आंखों से ओझल हो जाता है, आजकल की कार भी तो हवा में ही उड़ती हैं।

सत्तर के दशक में एक चर्चा राजनीति गलियारों में भी कार को लेकर खूब चली थी। “बेटा  कार बनाता! मां सरकार चलाती!! उसका जवाब भी कुछ ऐसा ही था” बेटा कार बनाता! मां बेकार बनाती!!

हमारे अनुसार तो आज का दिन “कार दिवस” घोषित कर दिया जाना चाहिए। प्रातः काल ही समाचार पत्र में एक खबर थी, कि गूगल के कहने पर एक अर्ध निर्मित पुल से कार नीचे नदी में गिर गई, तीन युवा की मृत्यु भी हो गई हैं।

कुछ दिन पूर्व गुजरात में एक व्यक्ति ने मात्र दस वर्ष पुरानी अच्छी हालत वाली कार को अपने खेत की मिट्टी में दफना कर सैंकड़ों लोगों को भोज भी खिलाया। हमे तो आज तक ऐसे किसी भोज का निमंत्रण नहीं मिला, जहां शगुन का लिफाफा ना देना पड़ा हो।

एक अमरीकी न्यूज चैनल के वीडियो में हमारे देश की एक खबर के खूब चटकारे लिए हैं। नई बी एम डब्लू को बिगड़ैल औलाद ने नदी में डूबो दिया, उसको पिता से जगुआर ब्रांड की कार चाहिए थी। इस वीडियो को हमारे युवा, अपने अपने पिता को भेजकर अपनी बात मनवाने के हथियार के रूप में उपयोग कर सकते हैं।

आज सुबह से सोशल मीडिया पर कार ही छाई हुई हैं। एक साथी ने फोन पर बताया उनके घर के बाहर कोई अनजान अपनी कार खड़ी कर पांच दिन बाद उठाने के लिए आया था। जब मित्र ने इस बाबत उससे प्रश्न किया, तो विनम्रता पूर्वक कहने लगा आप ने घर के बाहर सी सी टीवी लगा रखें है। इसलिए कार की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए, आपके घर के बाहर कार पार्क कर दी थी।

मित्र को हमने भी ज्ञान दे दिया, बहुत बड़े वाले गमले रख कर उसको लोहे की पत्ती से कसवा देवें, कोई कार आपके घर के बाहर नहीं लगाएगा। मित्र भी हाज़िर जवाब था, बोला इतना गमले आदि पर खर्च करने से तो बाहर लगे सी सी टीवी के कैमरे ही उतरवा कर कुछ पैसे बना लूंगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 535 ⇒ दया के पात्र ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दया के पात्र।)

?अभी अभी # 535 ⇒ दया के पात्र ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दया धर्म का मूल हैपाप मूल अभिमान।

तुलसी दया छांड़ियेजब लग घट में प्राण।।

हे गोविंद हे गोपाल, हे दया निधान

दया एक ईश्वरीय गुण है। ईश्वर को दयानिधान और करूणासागर भी कहा गया है। यह दया प्राणी मात्र में व्याप्त है। मातृत्व भाव इसका प्रतीक है। मनुष्य को तो छोड़िए, हर हिंसक जीव चाहे वह नर हो या मादा, अपने अंडे, बच्चे, चूज़े को ना केवल जन्म ही देते हैं, उसकी प्राकृतिक आपदा और अन्य शिकारी प्राणियों से, जी जान से सुरक्षा और बचाव करते हैं। हिंसक वृत्ति के होते हुए भी आप इन वन्य प्राणियों को, नन्हें श्रावकों को, अपने मुंह में दबाकर, सुरक्षित स्थान पर, यहां से वहां, ले जाते हुए देख सकते हैं। सौजन्य, डिस्कवरी चैनल।

मनुष्य मात्र में दया, करुणा और मोह, आसक्ति स्थायी भाव हैं। इसीलिए वह कभी मोहासक्त तो कभी दयालु हो जाता है। जब हमसे किसी का दुख देखा नहीं जाता, तो हममें दया और करुणा का भाव जागृत हो जाता है और हम भरसक उसकी सहायता करने की कोशिश करते हैं।।

दया के साथ दान शब्द भी उसी तरह जुड़ा हुआ है, जिस तरह दया के साथ धर्म। किसी की गरीबी अथवा अभाव देखकर सबसे पहले हममें

दया का भाव उत्पन्न होता है, दान की इच्छा तो बाद में जागृत होती है। जो दया का पात्र है, उसे ही दान दिया जाना चाहिए।

लोग तो दया के वशीभूत होकर भिखारियों को भी दान दे देते हैं, जिसे बोलचाल की भाषा में भीख कहा जाता है।

भिक्षावृत्ति अपराध होते हुए भी संतों और महात्माओं को भिक्षा दी जाती है, जिसके बदले में वे शिष्यों को दीक्षा प्रदान करते हैं। हरि ओम शरण तो यहां तक कह गए हैं ;

भिखारी सारी दुनिया

दाता एक राम ….।।

दया का पात्र हमेशा तो हम खोजने से रहे, इसलिए चलो दानपात्र में ही कुछ योगदान कर देते हैं, जो पात्र होगा, उस तक वह पहुंच जाएगा। दया तो एक संचारी भाव है, आता है, चला जाता है। अगर आप भावुक व्यक्ति हैं तो कुछ मदद कर देंगे, अन्यथा केवल द्रवित होकर वहां से प्रस्थान कर जाएंगे। लेकिन दान की वृत्ति तो कुछ देने की ही होती है।

जिस तरह जल ऊपर से नीचे की ओर बहता है, फल पेड़ से जमीन पर गिरता है, ठीक उसी प्रकार दया और दान के भाव समर्थ से असमर्थ की ओर प्रवाहित होते हैं। जो असमर्थ है, वह क्या दया दिखाएगा और कुछ दान करेगा।।

दया और दान का पात्र कभी भरता नहीं। दुख दर्द और आर्थिक अभाव कुछ लोगों की नियति है, केवल एक निमित्त बनकर ही हम इसमें अपना योगदान कर सकते हैं।

ईश्वर हमें इतना सक्षम बनाए कि हम हर दीन दुखी की कुछ सहायता कर सकें। प्राणी मात्र के लिए सदा हमारे मन में दया और करुणा का भाव बना रहे ;

सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 266 – शेष.. विशेष…अशेष! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 266 ☆ शेष.. विशेष…अशेष!… ?

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,

तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

संत कबीर का यह दोहा अपने अर्थ में सरल और भावार्थ में असीम विस्तार लिए हुए है। जैसे वृक्ष से झड़ा पत्ता दोबारा डाल पर नहीं लगता, वैसे ही मनुष्य देह बार-बार नहीं मिलती। मनुष्य देह बार-बार नहीं मिलती अर्थात दुर्लभ है। जिसे पाना कठिन हो, स्वाभाविक है कि उसका जतन किया जाए। देह नश्वर है, अत: जतन का तात्पर्य सदुपयोग से है।

ऐसा भी नहीं कि मनुष्य इस सच को जानता नहीं पर जानते-बूझते भी अधिकांश का जीवन पल-पल रीत रहा है, निरर्थक-सा क्षण-क्षण  बीत रहा है।

कोई हमारे निर्रथक समय का बोध करा दे या आत्मबोध उत्पन्न हो जाए तो प्राय: हम अतीत का पश्चाताप करने लगते हैं। जीवन में जो समय व्यतीत हो चुका, उसके लिए दुख मनाने लगते हैं। पत्थर की लकीर तो यह है कि जब हम अतीत का पश्चाताप कर रहे होते हैं, उसी समय   तात्कालिक वर्तमान अतीत हो रहा होता है।

अतीतजीवी भूतकाल से बाहर नहीं आ पाता, वर्तमान तक आ नहीं पाता, भविष्य में पहुँचने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अपनी एक कविता स्मरण हो आ रही है,

हमेशा वर्तमान में जिया,

इसलिए अतीत से लड़ पाया,

तुम जीते रहे अतीत में,

खोया वर्तमान,

हारा अतीत

और भविष्य तो

तुमसे नितांत अपरिचित है,

क्योंकि भविष्य के खाते में

केवल वर्तमान तक पहुँचे

लोगों की नाम दर्ज़ होते हैं..!

अपने आप से दुखी एक अतीतजीवी के मन में बार-बार आत्महत्या का विचार आने लगा था। अपनी समस्या लेकर वह महर्षि रमण के पास पहुँचा। आश्रम में आनेवाले अतिथियों के लिए पत्तल बनाने में महर्षि और उनके शिष्य व्यस्त थे। पत्तल बनाते-बनाते  महर्षि रमण ने उस व्यक्ति की समस्या सुनी और चुपचाप पत्तल बनाते रहे। उत्तर की प्रतीक्षा करते-करते व्यक्ति खीझ गया। मनुष्य की विशेषता है  जिन प्रश्नों का उत्तर स्वयं वर्षों नहीं खोज पाता, किसी अन्य से उनका उत्तर क्षण भर में पाने की अपेक्षा करता है।

वह  चिढ़कर महर्षि से बोला, ‘आप पत्तल बनाने में मग्न हैं।  एक बार इन पर भोजन परोस दिया गया, उसके बाद तो इन्हें फेंक ही दिया जाएगा न। फिर क्यों इन्हें इतनी बारीकी से बना रहे हैं, क्यों इसके लिए इतना समय दे रहे हैं?’

महर्षि मुस्कराकर शांत भाव से बोले, ‘यह सत्य है कि पत्तल उपयोग के बाद नष्ट हो जाएगी। मर्त्यलोक में नश्वरता अवश्यंभावी है तथापि मृत्यु से पहले जन्म का सदुपयोग करना ही जीवात्मा का लक्ष्य होना चाहिए। सदुपयोग क्षण-क्षण का। अतीत बीत चुका, भविष्य आया नहीं। वर्तमान को जीने से ही जीवन को जिया जा सकता है, जन्म को सार्थक किया जा सकता है, दुर्लभ मनुज जन्म को भवसागर पार करने का माध्यम बनाया जा सकता है। इसका एक ही तरीका है, हर पल जियो, हर पल वर्तमान जियो।’

स्मरण रहे, व्यतीत हो गया, सो अतीत हो गया। अब जो शेष है, वही विशेष है। विशेष पर ध्यान दिया जाए, जीवन को सार्थक जिया जाए तो देह के जाने के बाद भी मनुष्य रहता अशेष है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥  मार्गशीर्ष साधना 16 नवम्बर से 15 दिसम्बर तक चलेगी। साथ ही आत्म-परिष्कार एवं ध्यान-साधना भी चलेंगी💥

 🕉️ इस माह के संदर्भ में गीता में स्वयं भगवान ने कहा है, मासानां मार्गशीर्षो अहम्! अर्थात मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। इस साधना के लिए मंत्र होगा-

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

  इस माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा को दत्त जयंती मनाई जाती है। 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 534 ⇒ सिया का घर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सिया का घर।)

?अभी अभी # 534 ⇒ सिया का घर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(एक ईश्वरीय चेतना होती है, जो बाल स्वरूप में लीलाएं किया करती हैं।)

अपना घर तब तक अपना नहीं कहलाता, जब तक अपने साथ न हों। अगर घर आंगन हो, और बच्चे ना हों, तो कैसी फुलवारी। बच्चे फूल से कोमल होते हैं, बच्चे अपने पराये नहीं होते, बच्चे सिर्फ बच्चे होते हैं।

मेरा घर कब सिया का घर हो गया, मुझे पता ही नहीं चला। जहां आजकल बच्चों के नाम रिया, रिचा और दीया रखे जा रहे हों, वहां कुछ घरों में आज भी सिया मौजूद है। सीता और गीता तो मेरी बहनें रही हैं, अब इस उम्र में अगर मुझे घर बैठे सिया मिल जाए, तो क्या मेरी झोपड़ी जनक महल नहीं बन जाएगी।।

आपको पड़ोसी से भले ही कोई आस ना हो, फिर भी आस पड़ोस का अपना महत्व होता है। मेरे पड़ोस की ही तो है यह सिया, जो मेरी आंखों के सामने आज डेढ़ बरस की हो गई है। बच्चे की निगाह कहां पड़ जाए, किस पर पड़ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि वह तो भरे भुवन में किससे बात कर रहा होता है, कोई नहीं जानता।

उनसे मिली नजर तो मेरे होश उड़ गए। बच्चों में एक ऐसा आकर्षण होता है, जो सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बयां नहीं किया जा सकता। एक ईश्वरीय चेतना होती है, जो बाल स्वरूप में लीलाएं किया करती हैं। कब सिया के पांव पहली बार मेरे घर पड़े, पता नहीं, लेकिन उसके पांव पड़ते ही मेरा घर सिया का घर हो गया।।

घर के सामने से, दादा जी की गोद में निकलते वक्त, वह इशारा करती, अंदर चलो, और उसका गृह प्रवेश हो जाता। उसकी निगाहें चारों ओर देखती, परखती, परीक्षण करती, मानो घर की हर वस्तु से उसका बहुत पुराना नाता हो। उसकी निगाहें मुझे तलाशती। उसने अक्सर मुझे चश्मे में देखा है। बिना चश्मे के वह मेरी ओर रुख नहीं करती। जैसे ही चश्मा लगाकर मेरी आंखें चार होती, हमारी आंखें चार हो जाती।

वह मुझ पर कुछ देर त्राटक का प्रयोग करती और बाद में अपने खेल में व्यस्त हो जाती। बच्चों को खिलौनों की जरूरत नहीं होती। वे तो घर के सामान के साथ खेलना चाहते हैं, हर चीज बिखेरना चाहते हैं, तोड़ फोड़ करना चाहते हैं। इसीलिए उनका ध्यान भटकाने के लिए हम उसके सामने खिलौने परोस देते हैं।।

जब वह पहली बार आई तब छ: माह की थी, जमीन पर बैठना सीख गई थी। आज वह ठुमक ठुमक कर इतराती हुई चलती है। हमने ठुमक चलत रामचंद्र, का बचपन भले ही नहीं देखा हो, लेकिन हमने सिया को इठलाते, इतराते जरूर देखा है। केवल काग के भाग ही बड़े नहीं सजनी, हमने इस कलयुग में सिया का बचपन देखा है। उसे माखन रोटी ना सही, चम्मच से खीर, श्रीखंड और आमरस जरूर चखाया है।

अभी तक सिया बोलना नहीं सीखी है, लेकिन मुझे ढाई अक्षर प्रेम के जरूर सिखा रही है। वह तो आंखों आंखों और इशारों इशारों में केवल बात ही नहीं करती, सबका दिल भी चुरा लेती है। इतनी उम्र हो गई, इस हुनर से मैं अब तक अनजान था।।

जगतदुलारी है हमारी सिया। सिर्फ दो बरस की सिया, जब उसकी मां की देखादेखी, कंधे पर पर्स लटकाकर शान से चलती है, तो आप उसके पर्स को छू नहीं सकते। मानो कलयुग के रावणों को आगाह कर रही हो। खबरदार, मैं आज की सिया हूं।।

आजकल उसने पढ़ना लिखना भी शुरू कर दिया है। असली पढ़ाई वैसे भी ढाई आखर से ही शुरू होती है। वह जिस अक्षर पर उंगली रख दे, वह अक्षर ब्रह्म हो जाता है। कई तस्वीरें मेरे मन में बसी हैं सिया की, एक तस्वीर कहां उसके साथ न्याय कर सकती है।

आजकल वह अपने पांवों पर खड़ी हो चुकी है। मेरे दरवाजे पर दस्तक जरूर देती है, लेकिन अंदर नहीं आती क्योंकि उसके पर जो लग चुके हैं। वह मुझे आसक्त कर खुद पूरी तरह से उन्मुक्त हो चली है। कल रात वह अधिकार से आई, पूरे घर का निरीक्षण किया, अपना साम्राज्य उसे यथावत नजर आया। कुछ मीठा खाया, कुछ खिलौने फैलाए, और मेरा मन मोहकर वापस लौट गई।

यह घर अब पूरी तरह सिया का घर हो चुका है और मैं सिया का रसिया।

सियाराम कहूं या सिया सिया तुम्हें सिया चौरसिया।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख – भगवान् का कितना अंश बचा डाॅक्टर में? ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ आलेख – भगवान् का कितना अंश बचा डाॅक्टर में? ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय  ने रोहतक पीजीआई के दीक्षांत समारोह में कहा कि डाॅक्टर को जनता भगवान् मानती है। ऐसे में डाॅक्टर को अपने पेशे को समाजसेवा का माध्यम बना लेना चाहिए। सेवाभाव से किये हर कार्य से परिवार में समृद्धि आती है। इस तरह महामना राज्यपाल ने डाॅक्टर के रूप में उन्हें भगवान् के बहुत करीब माना। पर आजकल आप जो स्थिति बड़े या छोटे अस्पतालों में देखते हैं, क्या वह डाॅक्टर को इसी रूप में, इसी छवि में प्रस्तुत करती है? मुझे याद है वह सन् 1999 का तेइस सितम्बर, जब मेरी बेटी के जीवन में भयंकर तूफान आया था और मैं उसे एम्बुलेंस में पीजीआई रोहतक में लेकर पहुंचा था। बेटी का छह घंटे लम्बा ऑपरेशन चला और वह ज़िंदगी की लड़ाई जीत गयी। डाॅक्टर एन के शर्मा ने पूछा कि क्या आपको विश्वास था कि बेटी का ऑपरेशन सफल होगा ? मैंने जवाब दिया कि डाॅक्टर शर्मा आप भी नहीं जानते, जब आप मेरी बेटी का ऑपरेशन कर रहे थे तब आपके नहीं वे हाथ भगवान् के हाथ थे, उस समय आप भगवान् के बिल्कुल करीब थे, जिससे मेरी बेटी को भगवान् ज़िंदगी लौटा गये। डाॅक्टर शर्मा की आंखों में भी खुशी के आंसू थे और मेरी आँखों में भी ! इसमें उन दिनों मंत्री और मेरे मित्र प्रो सम्पत सि़ह का भी योगदान रहा, जो पता चलते ही दूसरे दिन वे पीजीआई, रोहतक के डायरेक्टर के पास पहुंचे और मुझे भी बुला लिया ! इस तरह हम तीन माह के बाद पीजीआई से मुक्त हुए लेकिन सचमुच भगवान् के दर्शन हो गये।

आजकल क्या ऐसे भगवान् बच रहे हैं? प्राइवेट अस्पताल अब पांच सितारा होटल जैसे हो गये हैं और इनका सारा खर्च मरीज के परिजनों से ही वसूला जाता है। बड़े बड़े अस्पतालों की खबरें आती हैं कि लाखों लाखों रुपये का बिल बना दिया और परिजन परेशान हो रहे हैं घर‌ तक बिकने की नौबत आ जाती है, बैंक बेलेंस खाली हो जाते हैं। एक घटना और याद आ रही है! बेटी डेंगू से पीड़ित थी और डाॅक्टर अजय चौधरी ने उसका इलाज करना शुरू किया और बड़े विश्वास से कहा, कि मैं इसे ठीक कर दूंगा और उपचार शुरू किया। एक दिन बेटी के प्लेटलेट्स चढ़ाये जा रहे थे कि मुझे अज्ञात नम्बर से फोन आया और कहा गया कि आप फलाने अस्पताल पहु़ंच जाइये ! हम तोशाम के निकट खानक के मज़दूर हैं और हमारे एक साथी की मृत्यु इलाज के दौरान हो गयी है, डाॅक्टर हमें शव ले जाने नहीं दे रहे। मैं चलने लगा तो पत्नी ने रोकने की कोशिश की कि आपकी बेटी ज़िंदगी से लड़ रही है और आप दूसरों के लिए भाग रहे हो ? मैंने कहा कि क्या पता उनकी दुआ मेरी बेटी को लग जाये और मैंं उस अस्पताल गया, जहां वे लोग मेरी राह देख रहे थे, डाॅक्टर के चैम्बर में उनके साथ गया और विनती की कि आप इनके साथी का पार्थिव शरीर‌ दे दीजिए लेकिन डाॅक्टर का कहना था कि ये हमारे पैसे नहीं दे रहे, इस पर मजदूरों ने बताया कि हमारी यूनियन ने चंदा इकट्ठा किया है और वही हमारे पास है, इससे ज्यादा की हमारी हिम्मत नहीं। डाॅक्टर ने कहा कि मैं‌ तो अपनी फीस छोड़ दूंगा लेकिन मेरे सहयोगी डाॅक्टर नहीं मानेंगे। मैंने कहा कि  फिर ठीक है, मेरे सहयोगी पत्रकार मेरी बात मान जायेंगे और अभी आकर लाइव चला देंगे, फिर आपका क्या होगा, यह विचार कर लीजिए ! बस, वे सयाने और अनुभवी थे, उन्होंने बिना एक रुपया लिए उन्हें उनके साथी का शव सौंप दिया लेकिन ऐसी नौबत अनेक अस्पतालों में आती है और आये दिन ऐसी शर्मसार करने वाली खबरें भी पढ़ने को मिलती हैं ! कृपया भगवान् का रूप बने रहिये ! उदय भानु हंस ने कहा भी है :

मैं न मंदिर न मस्जिद गया

कोई पोथी न बांची कभी

एक दुखिया के आंसू चुने

बस, मेरी बंदगी हो गयी !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 533 ⇒ माफ कीजिए ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “माफ कीजिए।)

?अभी अभी # 533 ⇒ माफ कीजिए ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वैसे देखा जाए तो सुबह सुबह माफी मांगने का कोई औचित्य नहीं, लेकिन होते हैं कुछ लोग, जो उठते ही माफी मांगने लगते हैं।

जिस तरह रात को सोते वक्त कुछ लोगों को बिना तकिये के नींद नहीं आती, उसी तरह बिना किसी तकिया कलाम के सुबह सुबह उनका कोई वाक्य ही शुरू नहीं होता।

आइए आपसे माफी मांगने के पहले तकिये के मनोविज्ञान पर चर्चा करें। आखिर क्या है तकिया, और नींद से तकिये का क्या संबंध। बचपन में हमारा अपना तकिया होता था, और हम तकिये से खेल खेल में घर तक बनाया करते थे। एक महल हो तकियों का।।

कभी मां की गोद हमारा तकिया होती थी, तो कभी पिताजी का कंधा। तकिया एक आलंबन है नींद का। फिर शुरू हुआ गुड्डे गड्डियों की जगह टैडी का खेल।

मम्मी डैडी भी निश्चिंत। गुड़िया के कमरे में टैडी का महल। रोज एक नए टैडी के साथ सोना, मानो वही उसके सपनों का राजकुमार हो। वैसे टैडी तकिये में कोई खास अंतर भी नहीं है।

माफ कीजिए हम तकिये से टैडी पर आ गए, क्योंकि “माफ कीजिए”, हमारा तकिया कलाम है। इसके बिना हमारा कोई वाक्य पूरा नहीं होता। सुबह उठते ही जब हम अपनी श्रीमती जी से कहते हैं, माफ कीजिए, एक कप चाय मिलेगी, तो वह भी आजकल यही जवाब देने लग गई है, माफ तो मैं आपको जिंदगी भर नहीं करने वाली, लेकिन हां अगर एक कप चाय चाहिए, तो वह जरूर मिल जाएगी।।

तकिये की तरह सबके अपने अपने तकिया कलाम होते हैं, जो अनायास ही बोलने में आ जाते हैं। शुद्ध हिंदी वाले जिंदगी भर क्षमा मांगा करते हैं, तो अंग्रेजी तकिये वाले हंसते, खांसते, छींकते, एक्सक्यूज़ मी का राग ही अलापते रहते हैं।

हद तो तब होती है, जब तकिया कलाम का कुछ इस तरह प्रयोग होता है।

इस बात के लिए मैं आपको जिंदगी भर माफ नहीं कर पाऊंगा। वैसे भी आपसे माफी मांग कौन रहा है। मत करो माफ। हम भी याद करेंगे, यह इंसान हमें माफ किये बिना ही चला गया। अगर माफ कर देता, तो शायद जिंदगी से हाथ तो नहीं धोना पड़ता।।

लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं होता। अगली बार जब वह व्यक्ति मिलता है, तो उसे कुछ याद ही नहीं रहता। कौन सी माफी और कौन सी जिंदगी। माफ करना, वह तो मेरा तकिया कलाम था।

माफी चाहता हूं, मैं थोड़ा लेट हो गया। आप मत करिए उसको माफ, वह कुछ नहीं कर सकता। वह हमेशा लेट आएगा, और इसी तरह माफी मांगता रहेगा।।

सड़क पर कोई भिखारी उनसे पैसे मांग रहा है और वे कह रहे हैं, माफ करो भैया, आगे बढ़ो। वह तो केवल भीख मांग रहा है और एक आप हैं, जो उससे माफी मांग रहे हैं। मानो भीख नहीं देकर आपने बहुत बड़ी गलती कर दी हो। और अगर वह भिखारी भी आपको जिंदगी भर माफ नहीं करे तो आप क्या कर लोगे।

माफ कीजिए, हमने अभी अभी, सुबह सवेरे ही आपका बहुत समय ले लिया। अगर आपने भी हमें जिंदगी भर माफ नहीं किया, तो माफ कीजिए, हम अब कभी अभी अभी नहीं लिखेंगे।।

(मिलते हैं कल, क्योंकि “माफ कीजिए”, यह तो हमारा तकिया कलाम है।)

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #257 ☆ साथ और हालात… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख साथ और हालात। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 257 ☆

☆ साथ और हालात… ☆

साथ देने वाले कभी हालात नहीं देखते और हालात देखने वाले कभी साथ नहीं देते। दोनों विपरीत स्थितियाँ हैं, जो मानव को सोचने पर विवश कर देती हैं। साथ देने वाले अर्थात् सच्चे मित्र व हितैषी कभी हालात नहीं देखते बल्कि विषम परिस्थितियों में भी सदैव अंग-संग खड़े रहते हैं। वे निंदा-स्तुति की तनिक भी परवाह नहीं करते तथा आपकी अनुपस्थिति में भी आपके पक्षधर बन कर खड़े रहते हैं। वे आपकी बुराई करने वालों को मुँहतोड़ जवाब देते हैं। वे समय की धारा के साथ रुख नहीं बदलते बल्कि पर्वत की भांति अडिग व अटल रहते हैं। उनकी सोच व दृष्टिकोण कभी परिवर्तित नहीं होता। वे केवल सुखद क्षणों में ही आपका साथ नहीं निभाते बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी आपके साथ ढाल बनकर खड़े रहते हैं। वे मौसम के साथ नहीं बदलते और ना ही गिरगिट की भांति पलभर में रंग बदलते हैं। उनकी सोच आपके प्रति सदैव समान होती है।

‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ मौसम के साथ-साथ/ फूल और पात बदलते हैं’ शाश्वत् सत्य है तथा स्वरचित पंक्तियाँ उक्त संदेश प्रेषित करती हैं कि प्रकृति के नियम अटल हैं। रात के पश्चात् दिन, अमावस के पश्चात् पूनम व मौसम के साथ फूल-पत्तियाँ बदलती रहती हैं। सुख व दु:ख में परिस्थितियाँ भी समयानुसार परिवर्तित होती रहती हैं। इसलिए मानव को कभी भी निराशा का दामन नहीं थामना चाहिए। ‘जो आया है, अवश्य जाएगा’ पंक्तियाँ मानव की नश्वरता पर प्रकाश डालती हैं। मानव इस संसार में खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ ही यहाँ से लौट कर जाना है। ‘मत ग़ुरूर कर बंदे!/ माटी से उपजा प्राणी,  माटी में ही मिल जाएगा।’ सो! मानव को स्व-पर, राग-द्वेष, निंदा-स्तुति व हानि-लाभ से ऊपर उठ जाना चाहिए अर्थात् हर परिस्थिति में सम रहना कारग़र है। मानव को इस कटु सत्य को स्वीकार लेना चाहिए कि हालात देखने वाले कभी साथ नहीं देते। वे आपकी पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान व धन-वैभव से आकर्षित होकर आपका साथ निभाते हैं और तत्पश्चात् रिवाल्विंग चेयर की भांति अपना रुख बदल लेते हैं। जब तक आपके पास पैसा है तथा आपसे उनका व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध होता है; वे आपका गुणगान करते हैं। जब आपका समय व दिन बदल जाते हैं; आपदाओं के बादल मँडराते हैं तो वे आपका साथ छोड़ देते हैं और आपके आसपास भी नहीं फटकते।

यह दस्तूर-ए-दुनिया है। जैसे भंवर में फँसी नौका हवाओं के रुख को पहचानती है; उसी दिशा में आगे बढ़ती है, वैसे ही दुनिया के लोग भी अपना व्यवहार परिवर्तित कर लेते हैं। सो! दुनिया के लोगों पर भरोसा करने का कोई औचित्य नहीं है। ‘मत भरोसा कर किसी पर/ सब मिथ्या जग के बंधन हैं/ सांचा नाम प्रभु का/ झूठे सब संबंध हैं/… तू अहंनिष्ठ/ ख़ुद में मग्न रहता/ भुला बैठा अपनी हस्ती को।’ यह दुनिया का चलन है और प्रचलित सत्य है। उपरोक्त पंक्तियाँ साँसारिक बंधनों व मिथ्या रिश्ते-नातों के सत्य को उजागर करती हैं तथा मानव को किसी पर भरोसा न करने का संदेश प्रेषित करते हुए आत्म-चिंतन करने को विवश करती हैं।

मुझे स्मरण हो रहा है जेम्स ऐलन का निम्न कथन कि ‘जिसकी नीयत अच्छी नहीं होती, उससे कोई महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध नहीं होता।’

वैसे नीयत व नियति का गहन संबंध है तथा वे अन्योन्याश्रित हैं। यदि नीयत अच्छी व सोच सकारात्मक होगी, तो नियति हमारा साथ अवश्य देगी। इसलिए प्रभु की सत्ता में सदैव विश्वास रखिए, सब अच्छा, शुभ व मंगलकारी होगा। वैसे भी मानव को हंस की भांति निश्चिंत व विवेकशील होना चाहिए।  जो मनभावन है, उसे संजो लीजिए और जो अच्छा ना लगे, उसकी आलोचना मत कीजिए, क्योंकि विवाह के सभी गीत सत्य नहीं होते। सो! मानव को आत्मकेंद्रित होना चाहिए और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, साहस व अपना आपा नहीं खोना चाहिए, क्योंकि हर इंसान सुखापेक्षी है। वह अपने दु:खों से अधिक दूसरों के सुखों से अधिक दु:खी रहता है। इसलिए दु:ख में वह आगामी आशंकाओं को देखते हुए अपने साथी तक को भी त्याग देता है, क्योंकि वह किसी प्रकार का खतरा मोल लेना नहीं चाहता।

‘अगर आप सही अनुभव नहीं लेते, तो निश्चित् है आप ग़लत निर्णय लेंगे।’ हेज़लिट का यह कथन अनुभव व निर्णय के अन्योन्याश्रित संबंध पर प्रकाश डालते हैं। हमारे अनुभव हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं, क्योंकि जैसी सोच वैसा अनुभव व निर्णय। मानव का स्वभाव है कि वह आँखिन देखी पर विश्वास करता है, क्योंकि वह सत्यान्वेषी होता है।

‘मानव मस्तिष्क पैराशूट की तरह है, जब तक खुला रहता है; तभी तक का सक्रिय व कर्मशील रहता है।’ लार्ड डेवन की उपर्युक्त उक्ति मस्तिष्क की क्रियाशीलता पर प्रकाश डालती है, जो स्वतंत्र चिंतन की द्योतक है। यदि इंसान संकीर्ण मानसिकता में उलझा  रहता है, तो उसका दृष्टिकोण उदार व उत्तम कैसे हो सकता है? ऐसा व्यक्ति दूसरों के हित के बारे में कभी चिंतित नहीं रहता बल्कि स्वार्थ साधने के निमित्त कार्यरत रहता है। उसे विश्वास पात्र समझने की भूल करना सदैव हानिकारक होता है। ऐसे लोग कभी आपके हितैषी नहीं हो सकते। जैसे साँप को जितना भी दूध पिलाया जाए, वह डंक मारने की आदत का त्याग नहीं करता। वैसे ही हालात को देखकर निर्णय लेने वाले लोग कभी सच्चे साथी नहीं हो सकते, उन पर विश्वास करना जीवन की सबसे बड़ी अक्षम्य भूल है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 532 ⇒ ||| संस्पर्श ||| ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|||संस्पर्श|||।)

?अभी अभी # 532 ⇒ |||संस्पर्श||| ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Contiguity)

किसी से इतना सामिप्य, कि स्पर्श का अहसास होने लगे, संस्पर्श कहलाता है। यह आकस्मिक भी हो सकता है और प्रयत्न स्वरूप भी। भीड़ में ऐसा स्पर्श स्वाभाविक है, क्योंकि वहां तो धक्का मुक्की भी होती है और इरादतन चेष्टा भी। कुछ लोगों के लिए यह स्वाभाविक और अपरिहार्य भी हो सकता है तो कुछ के लिए असुविधाजनक और तकलीफदायक। बच्चे, वृद्ध और बीमार अक्सर जहां भीड़ और भगदड़ के शिकार होते हैं, वहीं महिलाओं के लिए तो यह स्थिति और भी बदतर हो सकती है, जिसमें कुचेष्टा के साथ साथ अभद्र व्यवहार की भी आशंका बनी रहती है।

स्पर्श में सुख है, अगर वह आपकी मर्जी और सहमति से हो रहा है। बच्चों का कोमल स्पर्श कितना रोमांचित कर देता है। प्रेम और रिश्तों की गर्माहट है जहां, संस्पर्श की संभावना है वहां। एक विज्ञापन में तो युवा मां और उसकी अति सुंदर और नाजुक बिटिया की कोमल त्वचा की देखभाल पारदर्शी पियर्स pears साबुन ही करता है।।

मुझे जड़ और चेतन दोनों में इस स्पर्श का अहसास होता है। स्पर्श को छूना भी कहते हैं, कोई भी चीज आपके मन को छू सकती है। फूल से कोमल बच्चे भी होते हैं और रात को हमारे सिरहाने लगा तकिया भी। टेडी बियर में ऐसा क्या है, आखिर है तो वह भी निर्जीव ही।

गुलाबी ठंड और सुबह सवा पांव बजे का वक्त ! सुबह का टहलना और सांची प्वाइंट के बूथ से दूध लाना, यानी एक पंथ दो काज, मेरी दिनचर्या का अंग है। दूध के इंतजार में चौराहे पर अकेले खड़े रहने का भी एक अलग ही आनंद है। इक्के दुक्के इंसान और मोहल्ले के आवारा कुत्ते चौराहे को व्यस्त बनाए रखते हैं। जो इन कुत्तों से डरते हैं, वे सुबह टहलने नहीं जाते अथवा किसी लाठी का सहारा अवश्य ले लेते हैं।।

मुझमें कुछ ऐसा खास है कि कुत्ते मेरे पास नहीं फटकते और अगर कोई गलती से पास आ गया, तो वह और अधिक पास आने की कोशिश करता है। उसे पास बुलाने में कुछ योगदान मेरी चेष्टाओं का भी होता है।

आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। दूध के इंतजार में मैं चौराहे का निरीक्षण कर रहा था। अचानक एक काले सफेद रंग का कुत्ता मेरे सामने से गुजरा। वह जब तेज चलने की कोशिश करता था, तो उसका एक पांव लंगड़ाने लगता था। एक स्वाभाविक दया अथवा करुणा का संचार मेरे मन में हुआ होगा, मुझे नहीं पता।।

एकाएक घूमते घूमते वह मेरे पास आकर ठिठक गया। कुत्ते सूंघकर निरीक्षण करते हैं। एक दो चक्कर लगाकर, वह थोड़ा और पास आकर मेरे पास खड़ा हो गया। न जाने क्यों, बेजुबान प्राणियों की आँखें मुझे लगता है, बहुत कुछ कह जाती हैं। उसने मुझसे लगभग सटकर, मुंह ऊंचा कर दिया। अब वह मेरी कमजोरी का फायदा उठा रहा था।

मुझे गाय को सहलाने की आदत है। हमारे छूने का इन प्राणियों को अहसास होता है। इनके कहां हमारी तरह हाथ होते हैं। ये प्राणी अक्सर किसी दीवार अथवा पेड़ से अपना शरीर रगड़ लेते हैं।

गाय हो या कुत्ता बिल्ली, अधिक लाड़ में ये अपना मुंह ऊपर कर देते हैं ताकि आप इनको आसानी से सहला सकें।।

हमारे अजनबी श्वान महाशय ने भी यही किया। और हमने भी, आदत से मजबूर, उसे सहला भी दिया। बस कुत्ते में इंसान जाग उठा। वह तो हमारे गले ही पड़ गया। इतने में मेरे पास एक दो कुत्ते और आ गए, और मेरे वाले कुत्ते पर भौंकने लगे। शायद मैं उनके इलाके का था, और जिस कुत्ते को मैने मुंह लगाया था, वह किसी और इलाके का होगा।

उनके लगातार भौंकने से मेरा वाला कुत्ता विचलित हो गया, और उसे मजबूरन मुझे छोड़कर जाना पड़ा। मुझे अब केवल इन कुत्तों से छुटकारा पाना था। क्योंकि उनकी मुझमें कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। उनका उद्देश्य शायद केवल उस कुत्ते को खदेड़ना ही रहा होगा।।

गुलजार अप्रत्यक्ष रूप से शायद इन शब्दों में यही कहना चाहते होंगे ;

हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू।

हाथ से छू के इसे

रिश्तों का इल्जाम ना दो।।

जब गुलजार की ये पंक्तियां हमें इतना छू जाती हैं, तो रिश्तों की तो बात ही कुछ और है। मजबूर हम, मजबूर तुम। प्रेम के वशीभूत हमने तो जानवर में इंसान जागते देखा है, कभी तो यह इंसान भी जागेगा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “रोबोट ले रहे हैं मानव का स्थान” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ आलेख – “रोबोट ले रहे हैं मानव का स्थान” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

आधुनिक युग में, तकनीकी विकास ने मानव जीवन के हर क्षेत्र को बदल दिया है। इस प्रगति में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) और रोबोटिक्स का योगदान प्रमुख है। आज रोबोट्स केवल फ़ैक्टरियों में सीमित नहीं रहे; बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर, साइंटिस्ट, वकील, और क्लीनर मेन जैसे विविध क्षेत्रों में मानव की जगह ले रहे हैं। ये परिवर्तन समाज पर दूरगामी प्रभाव डाल रहे हैं, जो सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं में देखे जा सकते हैं।

तकनीकी प्रगति और रोबोट का उदय

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के माध्यम से निर्मित रोबोट्स में तेजी से सुधार हुआ है। ये रोबोट्स न केवल जटिल गणनाएँ करने में सक्षम हैं, बल्कि मानवीय निर्णय लेने और सीखने की क्षमता भी रखते हैं। मेडिकल क्षेत्र में रोबोट सर्जरी करते हैं, इंजीनियरिंग में जटिल डिजाइनों पर काम करते हैं, और शिक्षण के क्षेत्र में छात्र-छात्राओं को ज्ञान प्रदान करते हैं। यहां तक कि कंसल्टिंग और कानूनी मामलों में भी रोबोट्स के माध्यम से समस्या-समाधान किए जा रहे हैं। इन रोबोट्स ने बहुत हद तक यह साबित कर दिया है कि वे अनेक कार्यों में मानवीय गलती की संभावनाओं को कम कर सकते हैं और कुशलता को बढ़ा सकते हैं।

रोजगार पर संकट

हालांकि रोबोटिक्स और AI ने कई कार्यों को आसान और तेज़ कर दिया है, परंतु इसके कारण मानव रोजगार पर खतरा उत्पन्न हो गया है। जहाँ एक ओर रोबोट्स 24/7 बिना रुके कार्य कर सकते हैं, वहीं दूसरी ओर वे मानवीय कार्यशक्ति की आवश्यकता को कम करते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, कारखानों में रोबोटिक आर्म्स के आने से मजदूरों की नौकरी में कमी आई है। विभिन्न क्षेत्रों में, रोबोट्स के उपयोग से श्रम लागत में कटौती होती है, जिससे कंपनियाँ अधिक मुनाफा कमा सकती हैं, परंतु यह स्थिति मानव श्रमिकों के भविष्य को धुंधला कर रही है।

मानव कार्यशैली पर प्रभाव

रोबोट्स के कार्यक्षेत्र में आने से मानव कार्यशैली भी बदली है। इंसान के पास अब ऐसे कई कार्य रह गए हैं, जिनमें रचनात्मकता, भावनात्मक बुद्धिमता, और निर्णय क्षमता की अधिक आवश्यकता है। AI और रोबोट्स जहाँ तकनीकी कार्यों को सँभालते हैं, वहीं मानवीय गुण जैसे सहानुभूति, रचनात्मक सोच और नैतिकता केवल मानव में ही पाए जाते हैं। इस बदलाव ने लोगों को अपनी कार्यशैली में बदलाव लाने और खुद को नई भूमिकाओं के लिए तैयार करने के लिए प्रेरित किया है।

सामाजिक प्रभाव और चुनौतियाँ

रोबोट्स के बढ़ते उपयोग से समाज में कई नैतिक और सामाजिक प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। क्या रोबोट्स मानवीय संबंधों और संवेदनाओं को पूरी तरह से समझ सकते हैं? क्या वे सही और गलत का अंतर कर सकते हैं? इनके कारण समाज में आर्थिक विषमता और असमानता भी बढ़ी है, क्योंकि केवल वही लोग सफल हो पा रहे हैं, जो तकनीकी विकास के साथ कदम मिला पा रहे हैं। साथ ही, इससे मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ रहा है, क्योंकि कई लोग नौकरी खोने की चिंता में तनाव का शिकार हो रहे हैं।

समाधान और भविष्य की दिशा

रोबोटिक्स और AI के विस्तार को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, परंतु हमें इस तकनीकी युग में मानवता का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। इसके लिए नई पीढ़ी को टेक्नोलॉजी से संबंधित शिक्षा और कौशल में प्रशिक्षित करना होगा, ताकि वे रोबोट्स के साथ काम करने में सक्षम बन सकें। इसके अतिरिक्त, सरकारों को ऐसे नीतिगत कदम उठाने चाहिए जो रोजगार के नए अवसर सृजित कर सकें, और समाज में बेरोजगारी की समस्या का समाधान कर सकें।

अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि रोबोट्स ने कई क्षेत्रों में मानव का स्थान लिया है और भविष्य में यह प्रवृत्ति और भी तेजी से बढ़ सकती है। लेकिन, तकनीकी विकास और मानवता के बीच संतुलन बनाए रखना ही समाज के स्वस्थ और संतुलित विकास की कुंजी है। हमें एक ऐसे भविष्य की ओर देखना चाहिए, जहाँ मानव और रोबोट्स मिलकर कार्य करें, और इंसान का जीवन और भी समृद्ध और सुरक्षित बने।

 

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका जयपुर, राजस्थान

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 221 ☆ व्यवहार की भाषा… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना व्यवहार की भाषा। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 221 ☆ व्यवहार की भाषा

हमारा व्यवहार लोगों के साथ, खासकर जो हम पर आश्रित होते हैं उनके साथ कैसा है ?इससे निर्धारित होता है आपका व्यक्तित्व। विनम्रता के बिना सब कुछ व्यर्थ है। मीठी वाणी, आत्मविश्वास, धैर्य, साहस ये सब आपको निखारते हैं। समय- समय पर अपना  मूल्यांकन स्वयं करते रहना चाहिए।

यदि  कोई कुछ कहता है तो अवश्य ये सोचे कि अप्रिय वचन कहने कि आवश्यकता उसे क्यों पड़ी, जहाँ तक संभव हो उस गलती को सुधारने का प्रयास करें जो जाने अनजाने हो जाती है। जैसे- जैसे स्वयं को सुधारते जायेंगे वैसे- वैसे आपके करीबी लोगों की संख्या बढ़ेगी साथ ही वैचारिक समर्थक भी तैयार होने लगेंगे।

*

भावनाएँ भाव संग, मन  में  भरे  उमंग

पग- पग चलकर, लक्ष्य पूर्ण कीजिए।

*

इधर- उधर मत, नहीं व्यर्थ कार्यरत

समय अनमोल होता, ये संकल्प लीजिए। ।

*

पल- पल प्रीत धारे, खड़े खुशियों के द्वारे

राह को निहारते जो, उन्हें साथ दीजिए।

*

कार्य उनके ही होते, जागकर जो न सोते

जीवन के अमृत को, घूँट- घूँट पीजिए। ।

*

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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