हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१९ ☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ख्वाब : बहुत लाजवाब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१९ ☆

☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘जो नहीं है हमारे पास/ वो ख्वाब है/ पर जो है हमारे पास/ वो लाजवाब है’ शाश्वत् सत्य है, परंतु मानव उसके पीछे भागता है, जो उसके पास नहीं है। वह उसके प्रति उपेक्षा भाव दर्शाता है, जो उसके पास है। यही है दु:खों का मूल कारण और यही त्रासदी है जीवन की। इंसान अपने दु:खों से नहीं, दूसरे के सुखों से अधिक दु:खी व परेशान रहता है।

मानव की इच्छाएं अनंत है, जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जाती हैं और सीमित साधनों से असीमित इच्छाओं की पूर्ति असंभव है। इसलिए वह आजीवन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और सुक़ून भरी ज़िंदगी नहीं जी पाता। सो! उन पर अंकुश लगाना अनिवार्य है। मानव ख्वाबों की दुनिया में जीता है अर्थात् सपनों को संजोए रहता है। सपने देखना तो अच्छा है, परंतु तनावग्रस्त  रहना जीने की ललक पर ग्रहण लगा देता है। खुली आंखों से देखे गए सपने मानव को प्रेरित करते हैं करते हैं, उल्लसित करते हैं और वह उन्हें साकार रूप प्रदान करने में अपना सर्वस्व झोंक देता है। उस स्थिति में वह आशान्वित रहता है और एक अंतराल के पश्चात् अपने लक्ष्य की पूर्ति कर लेता है।

परंतु चंद लोग ऐसी स्थिति में निराशा का दामन थाम लेते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं और उन्हें यह संसार दु:खालय प्रतीत होता है। दूसरों को देखकर वे उसके प्रति भी ईर्ष्या भाव दर्शाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अभावों से नहीं; दूसरों के सुखों को देख कर दु:ख होता है–अंतत: यही उनकी नियति बन जाती है।

अक्सर मानव भूल जाता है कि वह खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ जाना है। यह संसार मिथ्या और  मानव शरीर नश्वर है और सब कुछ यहीं रह जाना है। मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् यह अनमोल जीवन प्राप्त होता है, ताकि वह भजन सिमरन करके अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सके। परंतु वह राग-द्वेष व स्व-पर में अपना जीवन नष्ट कर देता है और अंतकाल खाली हाथ जहान से रुख़्सत हो जाता है। ‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक रह पाएगा’ और ‘यह दुनिया है एक मेला/ हर इंसान यहाँ है अकेला’ स्वरचित गीतों की ये पंक्तियाँ एकांत में रहने की सीख देती हैं। जो स्व में स्थित होकर जीना सीख जाता है, भवसागर से पार उतर जाता है, अन्यथा वह आवागमन के चक्कर में उलझा रहता है।

जो हमारे पास है; लाजवाब है, परंतु बावरा इंसान इस तथ्य से सदैव अनजान रहता है, क्योंकि उसमें आत्म-संतोष का अभाव रहता है। जो भी मिला है, हमें उसमें संतोष रखना चाहिए। संतोष सबसे बड़ा धन है और असंतोष सब रोगों  का मूल है। इसलिए संतजन यही कहते हैं कि जो आपको मिला है, उसकी सूची बनाएं और सोचें कि कितने लोग ऐसे हैं, जिनके पास उन वस्तुओं का भी अभाव है; तो आपको आभास होगा कि आप कितने समृद्ध हैं। आपके शब्द-कोश  में शिकायतें कम हो जाएंगी और उसके स्थान पर शुक्रिया का भाव उपजेगा। यह जीवन जीने की कला है। हमें शिकायत स्वयं से करनी चाहिए, ना कि दूसरों से, बल्कि जो मिला है उसके लिए कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। जो मानव आत्मकेंद्रित होता है, उसमें आत्म-संतोष का भाव जन्म लेता है और वह विजय का सेहरा दूसरों के सिर पर बाँध देता है।

गुलज़ार के शब्दों में ‘हालात ही सिखा देते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह होता है।’

हमारी मन:स्थितियाँ परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। यदि समय अनुकूल होता है, तो पराए भी अपने और दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और विपरीत परिस्थितियों में अपने भी शत्रु का क़िरदार निभाते हैं। आज के दौर में तो अपने ही अपनों की पीठ में छुरा घोंपते हैं, उन्हें तक़लीफ़ पहुंचाते हैं। इसलिए उनसे सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए जीवन में विवाद नहीं, संवाद में विश्वास रखिए; सब आपके प्रिय बने रहेंगे। जीवन मे ं इच्छाओं की पूर्ति के लिए ज्ञान व कर्म में सामंजस्य रखना आवश्यक है, अन्यथा जीवन कुरुक्षेत्र बन जाएगा।

सो! हमें जीवन में स्नेह, प्यार, त्याग व समर्पण भाव को बनाए रखना आवश्यक है, ताकि जीवन में समन्वय बना रहे अर्थात् जहाँ समर्पण होता है, रामायण होती है और जहाल इच्छाओं की लंबी फेहरिस्त होती है, महाभारत होता है। हमें जीवन में चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। स्व-पर, राग-द्वेष, अपेक्षा-उपेक्षा व सुख-दु:ख के भाव से ऊपर उठना चाहिए; सबकी भावनाओं को सम्मान देना चाहिए और उस मालिक का शुक्रिया अदा करना चाहिए। उसने हमें इतनी नेमतें दी हैं। ऑक्सीजन हमें मुफ्त में मिलती है, इसकी अनुपलब्धता का मूल्य तो हमें कोरोना काल में ज्ञात हो गया था। हमारी आवश्यकताएं तो पूरी हो सकती हैं, परंतु इच्छाएं नहीं। इसलिए हमें स्वार्थ को तजकर,जो हमें मिला है, उसमें संतोष रखना चाहिए और निरंतर कर्मशील रहना चाहिए। हमें फल की इच्छा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो हमारे प्रारब्ध में है, अवश्य मिलकर रहता है। अंत में अपने स्वरचित गा त की पंक्तियों से समय पल-पल रंग बदलता/ सुख-दु:ख आते-जाते रहते है/ भरोसा रख अपनी ख़ुदी पर/ यह सफलता का मूलमंत्र रे। जो इंसान स्वयं पर भरोसा रखता है, वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि जो नहीं है, वह ख़्वाब है;  जो मिला है, लाजवाब है। परंतु जो नहीं मिला, उस सपने को साकार करने में जी-जान से जुट जाएं, निरंतर कर्मरत रहें, कभी पराजय स्वीकार न करें।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८२ ⇒ बंटी और बबली ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बंटी और बबली।)

?अभी अभी # ९८२ ⇒ आलेख – बंटी और बबली ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कितना प्यारा नाम है बंटी और बबली ! बंटी है जहां, बबली है वहां। वैसे जरूरी नहीं कि हर बालक का नाम बंटी ही हो, और भी बहुत नाम हैं लाड़ प्यार वाले। कहीं उसे प्यार से बण्डू कहते हैं तो कहीं बिट्टू। जहां बिट्टू है, वहां फिर बिट्टी भी होगी। कहीं उसे बाबू कहते हैं तो कहीं बाबा। हमारा बाबा ही मराठी भाषियों का बाला अथवा बाळा है। बड़े होकर ये ही बाला साहेब ठाकरे और बाला साहेब देवरस कहलाते हैं। कौन जानता था बचपन का बाबू, बड़ा होकर बाबू जगजीवनराम निकलेगा।

जब बंटी की बात चली है तो क्यों न सबसे पहले “आपका बंटी” की ही बात कर ली जाए। जिन्होंने मन्नू भंडारी की कालजयी कृति आपका बंटी पढ़ी है, वे उसके बारे में मुझसे अधिक ही जानते होंगे, लेकिन जिन पाठकों ने यह उपन्यास नहीं पढ़ा, वे मेरा अभी अभी छोड़कर, पहले आपका बंटी पढ़ें।।

कोई भी उपन्यास हाथों हाथ नहीं पढ़ा जाता, लेकिन सन् १९७० में प्रकाशित यह उपन्यास आज के समय में भी कितना प्रासंगिक है, यह तो इस उपन्यास को पढ़ने के बाद ही जाना जा सकता है। इस उपन्यास के दो पक्ष हैं, एक स्त्री पुरुष के टूटते संबंध और बंटी की मनोव्यथा। बाल मनोविज्ञान पर हिंदी साहित्य में यह उपन्यास एक मील का पत्थर है।

फिल्म बंटी और बबली का, मन्नू भंडारी के आपका बंटी से कोई संबंध नहीं होते हुए भी समाज में बढ़ते तनाव, असुरक्षा और अपराध की पृष्ठभूमि में इन पात्रों के मनोविज्ञान का अध्ययन भी जरूरी हो जाता है। माता पिता का अपना व्यवहार किसी बच्चे की जिंदगी अगर बना सकता है, तो तबाह भी कर सकता है।।

एक लेखक कभी अपनी कहानी नहीं कहता। उसके आसपास बिखरी घटनाएं, दास्तान, लोगों की आपबीती, उनके कन्फेशन्स उसे अपनी कलम चलाने के लिए बाध्य कर देते हैं। हर लेखक मसीहा नहीं होता। या तो आवारा मसीहा होता है अथवा स्वदेश दीपक की तरह जिंदा ही किसी सलीब पर टंगा पड़ा होता है।

मन्नू भंडारी इतनी अकेली भी नहीं थी उस समय। राजेंद्र यादव के अलावा मोहन राकेश और कमलेश्वर एक परिवार की तरह ही तो थे। कहानियां लिखी जाती थीं, गर्मागर्म बहस चलती रहती थी और पकौड़ियां भी तली जाती थी। ममता और रवींद्र कालिया भी तब कहां अलग थे, इस लेखक समुदाय से।।

यही सच है, पर तो फिल्म रजनीगंधा बन भी गई, लेकिन आपका बंटी आज भी वहीं अकेला खड़ा है। और फिल्म में भी उसका साथ दिया भी तो किसने बबली ने। लेकिन दोनों मिलकर केवल एक मनोरंजक फिल्म ही बना पाए, इसके अलावा और कुछ नहीं।

धर्मवीर भारती भी एक समय इसी स्कूल के थे। लेकिन बाद में उन्होंने धर्मयुग में इतिहास रचा, तो कमलेश्वर सारिका में जा बैठे और राजेन्द्र यादव ने हंस का दामन थाम लिया। यह भी बुरा नहीं। जब चुक जाओ, तो संपादक बन जाओ। लेकिन यह जरूरी तो नहीं ! मनोहर श्याम जोशी ने साप्ताहिक हिंदुस्तान छोड़ने के बाद ही तो कसप, कुरू कुरू स्वाहा और हरिया हरक्यूलिस जैसी रचनाएं दी हैं।।

धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित एक फिल्म बनी थी ” एक था चंदर, एक थी सुधा”। यह फिल्म बनी जरूर, लेकिन दर्शकों को देखने को मिली मनोज कुमार की गुनाहों का देवता, जिसका भारती जी के उपन्यास से कोई लेना देना नहीं था।।

एक अच्छे लेखक का सृजन कभी सुख का सृजन नहीं हो सकता। क्योंकि लेखकीय सृजन में भोगा हुआ यथार्थ है, पीड़ा है, संत्रास है। लेखकीय पात्र बार बार अवचेतन में चिल्लाते हैं, कराहते हैं, लेखक को विचलित भी कर देते हैं। फेयरवेल टू आर्म्स जैसे उपन्यास का नोबेल पुरस्कार विजेता अर्नेस्ट हेमिंग्वे यूं ही खुद को गोली मारकर आत्म हत्या नहीं कर लेता।

किसी ने सही कहा है ;

बहुत कठिन है

डगर पनघट की।

आपका बंटी की कहानी है

हर परिवार की,

घट घट की।

लेकिन क्या करे बेचारी बबली।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८१ ⇒ संपादक मेहरबान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संपादक मेहरबान।)

?अभी अभी # ९८१ ⇒ आलेख – संपादक मेहरबान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो लिखता है, वह लेखक नहीं कहलाता, जो छपता है, वही लेखक कहलाता है। अगर संपादक मेहरबान तो लेखक पहलवान। आप कहीं भी छपें, अखबार में अथवा किसी पत्रिका में, या फिर आपकी कोई किताब प्रकाशित हो, तब ही तो आप लेखक कहलाएंगे।

गए वे दिन, जब लेखक वही कहलाता था, जिसकी

कोई किताब प्रकाशित होती थी। तब स्थिति यह थी, प्रकाशक मेहरबान, तो लेखक पहलवान। लेकिन आज समय ने लेखक को इतना आर्थिक और बौद्धिक रूप से संपन्न कर दिया है कि उसे किसी प्रकाशक की मिन्नत ही नहीं करनी पड़ती। किताब लिख, अमेजान पर डाल।।

कलयुग में जो छप जाए, वही साहित्य कहलाता है। अखबारों के संपादक लेखक के लिए भगवान होते हैं। अखबार का क्या है, वह तो विज्ञापन से ही चल जाएगा, लेकिन लेखक की कोई रचना, तब ही रचना कहलाएगी, जब वह कहीं छप जाएगी।

किसी अखबार के संपादक को पत्रकार कहा जाता है, साहित्यकार नहीं। होगा सबका मालिक एक, लेकिन संपादक का असली मालिक तो अखबार का मालिक ही होता है। मालिक खुश, तो संपादक खुश।।

कभी लेखन भी एक विधा थी, लोग लिख लिखकर ही लेखक बना करते थे। अगर प्यार किया, तो कविता लिखी, दिल टूटा तो ग़ज़ल लिखी। संपादक के नाम पत्र लिखे, जब छपने लगे, तो कॉन्फिडेंस बढ़ा। अखबारों और संपादकों से भी पहचान बढ़ी। प्रतिभा कुछ सीढ़ी और चढ़ी और उनकी भी अखबार में रचना छपी।

उधर अखबारों और पत्रिकाओं का भी अपना एक स्तर होता था। जो स्थापित मंजे हुए लेखक होते थे, उनसे तो रचना के लिए आग्रह किया जाता था, लेकिन किसी नए लेखक को कई पापड़ बेलने होते थे। रचना अस्वीकृत होना आम बात थी। जो नर निराश नहीं होते थे, उनकी किस्मत का ताला आखिर खुल ही जाता था।।

शुरू शुरू में एक लेखक के लिए हर संपादक भगवान होता है। अगर संपादक मेहरबान तो लेखक पहलवान, लेकिन अगर एक बार ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया, तो फिर लेखक भी संपादकी पर उतर आता है। याद कीजिए दिनमान के रघुवीर सहाय को, धर्मयुग के धर्मयुग भारती और साप्ताहिक हिंदुस्तान के मनोहर श्याम जोशी को।

जब लेखक ही संपादक हो, तो चर्चित लेखकों की तो पौ बारह।

साहित्यिक पत्रिकाओं की बात अलग है। ज्ञानोदय, सारिका, नई कहानियां, हंस और कथादेश तो लेखकों की अपनी ही जमीन रही है।।

इंदौर में एक अखबार ऐसा भी था, जो पत्रकारों और नवोदित लेखकों के लिए गुरुकुल और सांदीपनि आश्रम से कम नहीं था।

जहां राहुल बारपुते जैसे विद्वान और राजेंद्र माथुर जैसे जुझारू संपादक मौजूद हों, वह किसी नालंदा और तक्षशिला से कम नहीं।।

केवल एक पारखी को ही हीरे की पहचान होती है।

हर चमकती चीज सोना नहीं होती। एक कुशल संपादक ही किसी रचना की गुणवत्ता को परख सकता है। फिर भी कहीं कहीं ऊंची दुकान और फीके पकवान परोसे जा रहे हैं, और लोग चाव से खा भी रहे हैं। बस संपादक मेहरबान तो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१२ ☆ विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१२ ☆

?  आलेख – विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

🌳माटी से मानुष तक इस हरियाली की रक्षा करें। विश्व पृथ्वी दिवस की एक दिन देर से शुभकामनाएँ।🌳

धरती हमारी चेतना का व्यापक विस्तार है और इसी चेतना को झकझोरने का एक वैश्विक अनुष्ठान है विश्व पृथ्वी दिवस।  उन्नीस सौ सत्तर की वह सुहानी मगर धरती के लिए हमारी फिक्रमंद सुबह में वर्ल्ड अर्थ डे सेलिब्रेशन का इतिहास है, जब अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन के एक आह्वान पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। वह सब महज एक प्रदर्शन नहीं था । आधुनिक मनुष्य का अपनी जड़ों को संभालने  का पहला सामूहिक संकल्प था जिसे आज पूरी दुनिया २२ अप्रैल के कैलेंडर में पृथ्वी दिवस के रूप में सहेज कर मनाती है। आज इस महाभियान की कमान अर्थ डे नेटवर्क नामक संस्था के हाथों में है जो दुनिया के कोने-कोने में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रही है।

प्रकृति के साथ मनुष्य का रिश्ता वैसा ही है जैसा एक नन्हे शिशु का अपनी मां के आंचल से होता है पर विडंबना देखिए कि विकास की अंधी दौड़ में हमने उसी आंचल को तार-तार करना शुरू कर दिया है।  संवेनदनशील दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि पृथ्वी दिवस मनाना किसी त्यौहार की रस्म अदायगी नहीं बल्कि अपनी उस मां से माफी मांगना है जिसके धैर्य की परीक्षा हम सदियों से ले रहे हैं। विकास के नाम पर, युद्धों के नाम पर , हम पृथ्वी के प्रति अप्राकृतिक बर्ताव करते आ रहे हैं। जब हम कंक्रीट के जंगलों को विस्तार देते हैं और हरियाली को हाशिए पर धकेलते हैं तब हम दरअसल अपने और अपनी आने वाली नस्लों के  फेफड़ों के लिए हवा कम कर रहे होते हैं।

 यह दिन हमें ठिठक कर सोचने का मौका देता है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में सिर्फ कभी समाप्त न किए जा सकने वाले प्लास्टिक के पहाड़ और जहरीली प्रदूषित नदियां ही सौंप कर जाएंगे।

भारतीय संस्कृति में तो भूमि को माता मानकर उसके वंदन की परंपरा रही है जहां सुबह उठकर पैर जमीन पर रखने से पहले भी क्षमा मांगी जाती है। इसी सांस्कृतिक बोध को आज के वैज्ञानिक यथार्थ से जोड़ना ही इस दिवस की सार्थकता है।

हमें समझना होगा कि जब हम एक पौधा रोपते हैं तो हम केवल मिट्टी में एक बीज नहीं डाल रहे होते बल्कि भविष्य के लिए एक उम्मीद की सांस बो रहे होते हैं। जल की एक बूंद को बचाना सागर की मर्यादा को बचाना है और बिजली की व्यर्थ खपत को रोकना सूरज की तपिश के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाना है।

आज जब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी भारी-भरकम शब्दावलियां हमारे ड्राइंग रूम तक पहुंच चुकी हैं तब समाधान किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि हमारी अपनी जीवनशैली के बदलाव में छिपा है।आवश्यक है कि हम अपने दैनिक आचरण को इतना सात्विक और प्रकृति अनुकूल बनाएं कि हर दिन पृथ्वी दिवस बन जाए। कूड़े का सही प्रबंधन और एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का त्याग करना वह छोटी सी आहुति है जो इस महायज्ञ में प्रत्येक नागरिक को देनी चाहिए। अंततः हमारी सफलता इस बात में नहीं है कि हमने कितनी ऊंची इमारतें खड़ी कीं बल्कि इस बात में है कि हम अपनी धरती की हरियाली और उसकी धड़कन को कितना सुरक्षित रख पाए।

हम सब मिलकर एक ऐसी सुबह का सपना देखें जहां हवाओं में सुगंध हो और नदियों में जीवन का संगीत बहता रहे।

सोलर पैनल से विद्युत उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, पर अब समय आ गया है कि हम हवा से बिजली बनाने वाले संयंत्र हर छत पर लगाएं। समुद्र की लहरों से बिजली बनाने को प्रोत्साहित किया जाए, बिजली से चलने वाली कारों को और बढ़ावा दिया जाए, यही विकल्प है जो पृथ्वी की नैसर्गिक रक्षा कर सकेंगे ।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८६ ☆ वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८६ ☆

वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

भीषण गर्मी जब अपने चरम पर होती है, तब केवल शरीर ही नहीं, मन और समाज भी तपने लगते हैं। आज हम एयर कंडीशनर और कूलर की ओर भागते हैं, लेकिन कभी ठहरकर सोचें—हमारे पूर्वजों ने इस तपती ऋतु के लिए क्या उपाय बनाए थे?

वैसाख मास की परंपराएँ इसी प्रश्न का सजीव उत्तर हैं। जलदान, सत्तू का दान और मौसमी फलों का वितरण—ये केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं थे, बल्कि एक सुविचारित सामाजिक और वैज्ञानिक व्यवस्था थी। गाँव-गाँव में मटके रखना, राहगीरों के लिए पानी की व्यवस्था करना—यह समाज को निर्जलीकरण और लू से बचाने का सामूहिक उपाय था।

सत्तू ( चने का चूर्ण) वास्तव में गर्मी के विरुद्ध शरीर का प्राकृतिक कवच है। यह ठंडक देता है, ऊर्जा बनाए रखता है और शरीर के संतुलन को बनाए रखता है। मौसमी फल—तरबूज, खीरा, आम—ये शरीर को जल और पोषण दोनों देते हैं। जब इन्हें दान के रूप में बाँटा जाता है, तो यह संदेश भी जाता है कि जो हमारे लिए उपयोगी है, वही समाज के लिए भी आवश्यक है।

इसी परंपरा का एक अत्यंत संवेदनशील और व्यापक रूप हमें जीव-जंतुओं के प्रति हमारे व्यवहार में दिखाई देता है। गाँवों, कस्बों और शहरों में बड़े-बड़े पात्र, नाद और टंकियाँ रखी जाती हैं, जिनमें पानी भरा जाता है ताकि पशु-पक्षी भी अपनी प्यास बुझा सकें। साल भर जिन पात्रों पर शायद ध्यान नहीं जाता, वे इस समय साफ किए जाते हैं, उनमें ताज़ा पानी भरा जाता है। यह केवल एक कार्य नहीं, बल्कि करुणा का विस्तार है।

दरअसल, जब इन कार्यों को धर्म और पुण्य से जोड़ा गया, तभी वे व्यापक रूप से समाज में स्वीकार्य हो पाए। यही कारण है कि हम न केवल स्वयं इनका पालन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। बचपन में जो दृश्य हमने सहज रूप से देखे—आज उन्हें करते हुए समझ में आता है कि यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक वैज्ञानिक और संवेदनशील व्यवस्था थी।

वैसाख हमें सिखाता है कि प्रकृति, समाज और समस्त जीवों के साथ संतुलन बनाकर ही हम इस भीषण गर्मी से लड़ सकते हैं। यही हमारे संस्कारों की सच्ची ठंडक है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पथ, पाथेय और पथिक – डा. हर्ष कुमार तिवारी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

?  पथ, पाथेय और पथिक – डा. हर्ष कुमार तिवारी ? श्री यशोवर्धन पाठक

(जन्म दिवस पर आत्मीय बधाई)

आगे बढ़ते चलो, सफलता पीछे आयेगी,

कर्म करो वह आकर तुम्हें स्वयं रिझायेगी।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण सरल की उपरोक्त काव्य पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध की है जबलपुर के ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी डा. हर्ष कुमार तिवारी ने ‌जिन्हें संस्कार, संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता की विशेषताएं विरासत में मिलीं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार और आध्यात्मविद परम आदरणीय ‌पं. दीनानाथ जी तिवारी के प्रपौत्र, सम्माननीय पं . ब्रह्मदत्त जी तिवारी के पौत्र एवं स्वनामधन्य साहित्यकार, पत्रकार और शिक्षाविद श्रद्धेय डा. राजकुमार सुमित्र जी के यशस्वी पुत्र डा. हर्ष कुमार तिवारी ने प्रतिष्ठित विरासत और उच्च स्तरीय संबंधों पर सदा गर्व जरूर महसूस किया है लेकिन आगे बढ़ने के लिए कभी उनका उपयोग नहीं किया। श्रद्धेय सुमित्र जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से डा. हर्ष कुमार तिवारी ने अपने जीवन की विकास यात्रा में अपनी जमीन खुद तैयार की। शिक्षा, लेखन और पत्रकारिता में उन्होंने पूरी सक्रियता एवं दक्षता के साथ सराहनीय सफलताएं अर्जित की है। जबलपुर के दैनिक समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण विषयों पर उनके सोचनीय लेख अत्यंत पठनीय और प्रशंसनीय होते हैं। दैनिक जयलोक में प्रकाशित मन‌ की बात और सुनो एक बात शीर्षक से उनका कालम काफी चर्चा में रहा। पत्रकारिता में अपनी उल्लेखनीय गतिविधियों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं में संपादन कार्य भी किया और बाद में डायमीनिक संवाद टी.. वी… का संचालन करते हुए असरदार समाचारों की प्रस्तुति के साथ ही साहित्यकारों की श्रेष्ठ रचनाओं के‌ प्रसारण का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैंजो कि काफी चर्चित हो रहा है। श्रद्धेय डा. राजकुमार सुमित्र जी द्वारा साहित्यिक गतिविधियों और प्रकाशन को प्रोत्साहित करने के लिए डा. हर्ष कुमार तिवारी और श्री राजेश पाठक प्रवीण के सक्रिय सहयोग से पाथेय प्रकाशन सहित पाथेय समूह की जो स्थापना की थी, वह आज भी प्रगति के सोपान की कहानी लिखते हुए सुमित्र जी के स्वर्गवास के बाद भी संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित कर रही है।

ऐसे व्यक्ति अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं जो अपने गरिमामय व्यक्तित्व और कृतित्व से अपने परिवार की विरासत को गौरवान्वित करते हैं। डा हर्ष कुमार तिवारी भी ऐसे ही सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने पिता सहित अपने पूर्वजों की प्रेरणा दायक विरासत के अनुरूप सराहनीय कीर्तिमान स्थापित किया है यहां तक कि अपनी बिटिया प्रियम को भी ऐसे संस्कार और मार्गदर्शन दिये ‌कि‌वह भी बाल्यावस्था में ही बाल पत्रकार के रूप में पत्रकारिता क्षेत्र में प्रतिष्ठित हो‌ चुकी है और संस्कारधानी आज उसकी प्रतिभा से गौरवान्वित है।

आज 23 अप्रैल को डा . हर्ष कुमार तिवारी जी का जन्म दिवस है और हमारी मंगलकामना है कि मीडिया पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी सक्रिय गतिविधियों से हम सभी सदा गौरवान्वित होते रहें।

 © श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

💐 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से डॉ हर्ष कुमार तिवारी जी को उनके जन्मदिवस के अवसर पर अशेष हार्दिक शुभकामनाएं 💐

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८० ⇒ गाढव ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाढव।)

?अभी अभी # ९८० ⇒ आलेख – गाढव ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हर भाषा में कुछ शब्द बड़े प्यारे होते हैं, और अगर प्यार से बोले जाएं तो और भी प्यारे लगते हैं। शेक्सपीयर ने गुलाब का उदाहरण दिया। लेकिन अगर वे गुलाब की जगह किसी गधे का उदाहरण देते तो शायद बात नहीं बनती। हम जिसे चाहें उसे गधे की उपाधि दे सकते हैं, लेकिन गधे को हम किसी और अच्छे नाम से संबोधित नहीं कर सकते। हो सकता हो, यह कॉपीराइट का मामला हो।

कृष्ण चंदर ने एक गधे की आत्मकथा ही नहीं लिखी, वह उसे संसद तक ले भी गए और उसकी वापसी भी की। हमारे हिंदी के आचार्य हमें प्यार से कालिदास कहते थे। कालिदास कभी इतने विद्वान थे कि, जिस डाल पर बैठे होते थे, उसे ही काटते थे। सभी दासों के अपने अपने दासबोध हैं। रत्नावली के भी तुलसीदास थे। अगर रत्नावली उनके ज्ञान चक्षु नहीं खोलती, तो क्या संसार उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के तुलसी के रूप में जान पाता।।

ज्ञान की वर्षा गुरुकुल में होती है, कोई कृष्ण बन जाता है तो कोई सुदामा रह जाता है। बचपन के मित्र जब बरसों बाद मिलते हैं तो वही बचपन लौट आता है जहां जीवन में सहजता थी, सरलता थी, आपस में प्यारे प्यारे संबोधन थे। हमारे एक आचार्य हरिहर लहरी अपने विशेष प्रिय शिष्यों को बजरबट्टू कहते थे। हम भी अपने किसी मित्र को आपस में सिंधी कहते थे तो किसी को सरदार। बम्मन और कढ़ी तो बड़ा आम था। तब क्या हम मूर्ख अथवा गधे थे, जो हमें ना तो बुरा लगता था और ना ही हमारी धार्मिक भावना आहत होती थी। आज सोचते हैं तो आश्चर्य होता है। ये कहां आ गए हम।

आज वाणी पर संयम रखना पड़ता है। आज की पीढ़ी बाप शब्द तक से भड़क जाती है। बाप तक कैसे पहुंच गए, आपकी सातों पुश्तें याद करा देंगे। गांव में जिस तरह आज भी वृद्धजनों के लिए डोकरा और डोकरी शब्द प्रचलित है, गुजराती में बच्चों को डीकरा और डीकरी कहकर पुकारा जाता है। हमारे बनारस के छोरा छोरी महाराष्ट्र में मुलगा मुलगी हो जाते हैं। कहीं पोरा पोरी तो हैदराबाद में पोट्टा पोट्टी। आजकल के छोटे बच्चे पोट्टी का कुछ और ही अर्थ समझते हैं।।

अब देखिए, कितना प्यारा है आज का शब्द गाढव।

ध्वनि में माधव से मिलता जुलता। अन्यथा ना लें, हमारे यहां मिट्टी के माधो भी होते हैं और गोबर गणेश भी। आज आप इतना तनकर चल रहे हैं, कभी जीवन में आपने भी बेवकूफी की होगी। किसी ने आपको प्यार में ही सही, गधा अथवा बेईमान भी अवश्य ही कहा होगा। छुपा लें हमसे, क्या क्या छुपाएंगे। कभी तो आपको वे पुराने दिन याद आएंगे।

बहुत लाद लिया अपने आप पर परिवार और जिम्मेदारियों का बोझ। कर ली बहुत गधा हम्माली। बस अब नहीं होता। आता है कभी कभी ऐसा खयाल। फिर भी दिल है कि मानता नहीं। थोड़ा किसी ने फुसलाया, गधे को बाप बनाया, अपुन खुश।

अपनों के बिना भी क्या जीना ! तेरे बिना भी क्या जीना ?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७९ ⇒ घराना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घराना।)

?अभी अभी # ९७९ ⇒ आलेख – घराना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मेरा नाम राजू, घराना अनाम, बहती है गंगा,

जहां मेरा धाम …

लेकिन सभी जानते हैं, कपूर खानदान के इस चिराग का भी एक सेमी क्लासिकल फिल्म संगीत का घराना था, जिसमें शंकर जयकिशन, शैलेंद्र हसरत और मुकेश ने मिलकर जो गीतों की बरसात शुरू की थी, उसने मेरा नाम जोकर तक थकने का नाम नहीं लिया था। और जहां तक नाम का सवाल है, तो पृथ्वी थिएटर से शुरू इस कपूर परिवार के अभिनय का करिश्मा आज भी कायम है।

घराना गर्व और गौरव का विषय है, अच्छे घराने की बहू के लिए ही गृह लक्ष्मी जैसे विशेषणों का प्रयोग किया जाता था। राजघरानों में आज हम भले ही केवल होलकर और सिंधिया राजघरानों तक ही सिमटकर रह गए हों, लेकिन शास्त्रीय संगीत के घरानों की बात तो कुछ और ही है।।

नृत्य और संगीत हमें स्वर्ग की नहीं, गंधर्व लोक की देन हैं, सवाई गंधर्व और कुमार गंधर्व इनके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आप मानें या ना मानें, संगीत के घरानों और राजघरानों का आपसी संबंध बहुत पुराना है। आइए कुछ संगीत घरानों की चर्चा करें।

भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की वह परंपरा है जो एक ही श्रेणी की कला को कुछ विशेषताओं के कारण दो या अनेक उप श्रेणियों में बाँटती है।।

घराना (परिवार, कुटुंब), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं। घराना शब्द हिंदी शब्द ‘घर’ से आया है जिसका अर्थ है ‘घर’। यह आमतौर पर उस स्थान को संदर्भित करता है जहां संगीत विचारधारा की उत्पत्ति हुई; उदाहरण के लिए, ख्याल गायन के लिए प्रसिद्ध कुछ घराने हैं: दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, इंदौर, अतरौली-जयपुर, किराना और पटियाला।

इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु व उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है। घराना किसी क्षेत्र विशेष का प्रतीक होने के अलावा, व्यक्तिगत आदतों की पहचान बन गया है, यह परंपरा ज़्यादातर संगीत शिक्षा के पारंपरिक तरीके तथा संचार सुविधाओं के अभाव के कारण फली-फूली, क्योंकि इन परिस्थितियों में शिष्यों की पहुँच संगीत की अन्य शैलियों तक बन नहीं पाती थी।

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायन के लिये प्रसिद्ध घरानों में से निम्न घराने शामिल होते हैं: आगरा, ग्वालियर, इंदौर, जयपुर, किराना, और पटियाला।

सबसे पुराना ग्वालियर घराना है। तानसेन भी ग्वालियर से ही आए थे। हस्सू हद्दू खाँ के दादा नत्थन पीरबख्श को इस घराने का जन्मदाता कहा जाता है। दिल्ली के राजा ने इनको अपने पास बुला लिया था।।

जरा इन गायकों और उनके घरानों पर भी गौर कर लिया जाए ;

१. मेवाती घराना : पंडित जसराज

२.पटियाला घराना : उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, बेगम अख्तर, निर्मला देवी और परवीन सुल्ताना

३. जयपुर अंतरौली घराना मल्लिकार्जुन मंसूर, किशोरी अमोनकर और अश्विनी भिड़े।

४. किराना घराना: भीमसेन जोशी  

५. आगरा घराना : जितेंद्र अभिषेकी

इन घरानों की शुद्धता, मर्यादा और अनुशासन का पालन शिष्यों को भी करना पड़ता है। गुरु शिष्य परम्परा यूं ही फलीभूत नहीं होती।

ना मिलावट ना खोट यही शास्त्रीय संगीत की पहचान है। एक भी सुर गलत नहीं।

धारवाड़, कर्नाटक से आए, घराने की बंदिश से अपने को मुक्त रखते हुए, लोक संगीत को शास्त्रीय संगीत की ऊंचाईयों तक पहुंचाने वाले कुमार गंधर्व स्वयं अपने आपमें एक घराना हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७८ ⇒ अंतिम चौराहा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम चौराहा।)

?अभी अभी # ९७८ ⇒ आलेख –  अंतिम चौराहा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चार दिल चार राहें जहां मिले उसे चौराहा कहते हैं।

मैं तो चला, जिधर चले रस्ता! मैं चलूं, वहां तक तो ठीक, लेकिन क्या कहीं रास्ता भी चलता है। कबीर के अनुसार, अगर चलती को गाड़ी कहा जा सकता है, तो रास्ता भी चल सकता है और जब रास्ता चलेगा तो वह भी घिस घिसकर रास्ते से, रस्ता हो जाएगा।

चौराहे को चौरस्ता भी कहते हैं। कहीं कहीं तो इसे चौमुहानी भी कहते हैं। रास्तों की तरह, गलियां भी होती हैं, ठाकुर शिवप्रसाद सिंह की गली, आगे मुड़ती है, और वहीं कहीं बंद गली का आखरी मकान धर्मवीर भारती का है।।

इंसान का क्या है, जिंदगी में कभी दोराहे पर खड़ा है तो कभी चौराहे पर। होने को तो खैर तिराहा भी होता है, लेकिन न जाने मेरे शहर के गांधी स्टेच्यू को लोग रीगल चौराहा क्यूं कहते हैं, जब कि यहां तो तीन ही रास्ते हैं। हां, यह भी सही है कि एक रास्ता स्वयं रीगल थिएटर भी था, लेकिन समय ने वह रास्ता भी बंद कर दिया।

थिएटर तो सारे बंद हुए, मैं अब फिल्म देखने कहां जाऊं।

जिस चौराहे से चार राहें निकलती हैं, उन्हें आप चौराहे की भुजा भी कह सकते हैं। हम तो जब भी श्रीनाथ जी के दर्शन के लिए नाथद्वारा जाते हैं, काकरौली, चारभुजा जी और एकलिंग जी होते हुए झीलों की नगरी उदयपुर अवश्य जाते हैं। जहां सहेलियों की बाड़ी हो, वहां तो भूल भुलैया होगी ही।

यह अंक चार हमें एक चौराहे पर लाकर खड़ा कर देता है जहां हमें जयपुर की बड़ी चौपड़ और छोटी चौपड़ याद आ जाती है। बही खाते वाले चोपड़ा जी कब फिल्मों में आ गए, और यश कमा गए कुछ पता ही नहीं चला।।

अगर आपसे पूछा जाए, आपके शहर में कितने चौराहे हैं, तो शायद आप गिन नहीं पाएं। इसीलिए इन चौराहों का नाम दे दिया जाता है। कहीं चौक तो कहीं चौराहा। हमने अगर एक चौराहे का नाम जेलरोड रख दिया तो दूसरे का चिमनबाग चौराहा। चिमनबाग तो आज चमन हो गया, लेकिन हमारे भाइयों ने उस चौराहे का नाम ही बदलकर चिकमंगलूर चौराहा कर दिया। वैसे भी किसी विकलांग को दिव्यांग बनने में कहां ज्यादा वक्त लगता है।

हमारे शहर के प्रमुख चौराहों में अगर पलासिया चौराहा है तो गिटार चौराहा भी। जहां रोबोट लगा है, वह रोबोट चौराहा और जहां आज लेंटर्न होटल नहीं है, वहां भी लैंटर्न चौराहा है। सांवेर रोड पर अगर मरी माता चौराहा है तो रेडिसन होटल पर रेडिसन चौराहा। कुछ चौराहों पर भुजाएं जरा जरूरत से ज्यादा ही फड़फड़ाती हैं, रीजनल पार्क के आसपास तो इतनी राहें हैं कि राही, राह भी भटक जाए।।

इन सब चौराहों के बीच, पंचकुइया रोड पर एक अंतिम चौराहा भी है, क्योंकि वहां से आखरी रास्ता मुक्ति धाम की ओर ही जाता है। लेकिन यह जीव माया में नहीं उलझता ! वह जानता है, कोई ना संग मरे। बस थोड़ा श्मशान वैराग्य, शोक सभा और उठावने के बाद शाम को छप्पन दुकान।

क्या भरोसा कब जिंदगी की शाम आ जाए, कौन सा चौराहा हमारा अंतिम चौराहा हो जाए ! लेकिन हमने तो चौराहों को पार करना सीख लिया है। ट्रैफिक का सिपाही भले ही सीटी बजाता रहे, सिग्नल लाल लाल आंखें दिखलाता रहे, कोई मार्ग अवरोधक हमारी जिंदगी की गाड़ी को इतनी आसानी से नहीं रोक सकता।।

ऊपर भले ही चित्रगुप्त गणेश चोपड़ा भंडार खोले हमारे खाते बही की जांच करते रहें, हम स्वयंसेवक अपनी लाठी स्वयं साथ लेकर आएंगे। चित्रगुप्त के खातों की भी सरकार जांच करवा रही है। सब डिजिटल, ऑनलाइन और पारदर्शी हो रहा है। ईश्वर की मर्जी जैसा डायलॉग अब नहीं चलेगा।

जिसकी लाठी उसकी भैंस। यमराज को दूसरा वाहन तलाशना पड़ेगा। चित्रगुप्त को आईटी सेक्टर के लिए शिक्षित लोगों को ऊपर भी जॉब देने होंगे, और वह भी फाइव डे वीक और आकर्षक पैकेज के साथ। उसके बाद ही हमारी अंतिम चौराहे से रवानगी होगी। स्वर्ग में बर्थ नहीं, एक नया जॉब, एक नया चैलेंज।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७४ – देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग – २ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७४ ☆ देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग – २ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

मित्र के गैस संबंधित कार्य  के लिए सब बाधाएं पार कर डीलर के हॉल में प्रवेश कर राहत की सांस ली। संबंधित व्यक्ति तक पहुंचने की लिए ज़िग जैग व्यवस्था थी। इसको “क्राउड मैनेजमेंट” भी कहा जाता है।

समय बहुत लग जाएगा, ये विचार आते ही दिमाग के घोड़े चलाए। कहीं पढ़ा था, पानी अपना रास्ता स्वयं बनाता है। उसी तर्ज पर हम भी चल पड़े, अधिकतर लोग मोबाइल में वीडियो देख रहे थे, उनकी नजरों के सामने से उनसे आगे निकल गए।

अधिकतर लोग तो झगड़ा कर रहे थे, पेट खाली हो तो गुस्सा भी बहुत आता है। यहां तो घर के चूल्हे ही नहीं जल पा रहें हैं। हम जैसे ही बुकिंग कर्मचारी के सामने पहुंचे और अपना काम बताया, वो बोला आप गलत जगह में आए हैं। आपको तो एजेंसी के कंप्यूटर विभाग में जाना पड़ेगा। हम तो भेड़ चाल के कारण भीड़ के साथ चले आए थे।

कंप्यूटर विभाग वाले सज्जन फुर्सत में थे। उन्होंने मित्र के आधार कार्ड को सिस्टम से हटा दिया। मित्र को इस बावत सूचित कर राहत की सांस ली। हमें डर लग रहा था, कहीं मित्र परिवार सहित हमारे यहां ना आ जाए, कुकिंग गैस की किल्लत का समय जो चल रहा हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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