हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 48 ☆ ज़िंदगी…लम्हों की किताब ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख ज़िंदगी…लम्हों की किताब।  वास्तव में  ज़िन्दगी लम्हों की किताब ही है। एक एक लम्हा किताब के पन्नों की तरह गुज़रता है, फर्क सिर्फ इतना कि आप उसे पलट कर पढ़ नहीं सकते। आपके हाथों में सिर्फ अगले अगले लम्हे ही हैं। हाँ मन के पन्नों को पलटा कर कभी भी  खुद को पढ़ा जा सकता है। इस आलेख के कई महत्वपूर्ण कथन हमें विचार करने के लिए उद्वेलित करते हैं। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 48 ☆

☆ ज़िंदगी…लम्हों की किताब

लम्हों की किताब है जिंदगी/ सांसों व ख्यालों का हिसाब है ज़िंदगी/ कुछ ज़रुरतें पूरी, कुछ ख्वाहिशें अधूरी/ बस इन्हीं सवालों का/ जवाब है जिंदगी।’ प्रश्न उठता है–ज़िंदगी क्या है? ज़िंदगी एक सवाल है; लम्हों की किताब है; सांसों व ख्यालों का हिसाब है; कुछ अधूरी व कुछ पूरी ख्वाहिशों का सवाल है। सच ही तो है, स्वयं को पढ़ना सबसे अधिक कठिन कार्य है। जब हम खुद के बारे में नहीं जानते; अनजान हैं खुद से… फिर ज़िंदगी को समझना कैसे संभव है? ‘जिंदगी लम्हों की सौग़ात है/ अनबूझ पहेली है/ किसी को बहुत लंबी लगती/ किसी को लगती सहेली है।’ ज़िंदगी सांसों का एक सिलसिला है। जब कुछ ख्वाहिशें पूरी हो जाती हैं, तो इंसान प्रसन्न हो जाता है; फूला नहीं समाता है– मानो उसकी ज़िंदगी में चिर-बसंत का आगमन हो जाता है और जो ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं; टीस बन जाती हैं; नासूर बन हर पल सालती हैं, तो ज़िंदगी अज़ाब बन जाती है। इस स्थिति के लिए दोषी कौन? शायद! हम…क्योंकि ख्वाहिशें हम ही मन में पालते हैं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। एक के बाद दूसरी प्रकट हो जाती है और ये हमें चैन से नहीं बैठने देतीं। अक्सर हमारी जीवन-नौका भंवर में इस क़दर फंस जाती है कि हम चाह कर उस चक्रवात से बाहर नहीं निकल पाते। परंतु इसके लिए दोषी हम स्वयं हैं, इसीलिए उस ओर हमारी दृष्टि जाती ही नहीं और न ही हम यह जानते हैं कि हम कौन हैं? कहां से आए हैं और इस संसार में आने का हमारा प्रयोजन क्या है? संसार व समस्त प्राणी-जगत् नश्वर है और माया के कारण सत्य भासता है। यह सब जानते हुए भी हम आजीवन इस मायाजाल से मुक्त नहीं हो पाते।

सो! आइए, खुद को पढ़ें और ज़िंदगी के मक़सद को जानें; अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें और बेवजह ख्वाहिशों को मन में विकसित न होने दे। ख्वाहिशों अथवा आकांक्षाओं को आवश्यकताओं तक सीमित कर दें, क्योंकि आवश्यकताओं की पूर्ति तो सहज रूप में संभव है; इच्छाओं की नहीं, क्योंकि वे तो सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं और उनका अंत कभी नहीं होता। जिस दिन हम इच्छा व आवश्यकता के गणित को समझ जाएंगे; ज़िंदगी आसान हो जाएगी। आवश्यकता के बिना तो ज़िंदगी की कल्पना ही बेमानी है, असंभव है। परमात्मा ने प्रचुर मात्रा में वायु, जल आदि प्राकृतिक संसाधन जुटाए हैं… भले ही मानव के बढ़ते लालच के कारण  हम इनका मूल्य चुकाने को विवश हैं। सो! इसमें दोष हमारी बढ़ती इच्छाओं का है। इसलिए इच्छाओं पर अंकुश लगाकर उन्हें सीमित कर; तनाव-रहित जीवन जीना श्रेयस्कर है।

ख्वाहिशें कभी पूरी नहीं होती और कई बार हम पहले ही घुटने टेक कर पराजय स्वीकार लेते हैं; उन्हें पूरा करने के निमित्त जी-जान से प्रयत्न भी नहीं करते और स्वयं को झोंक देते हैं– चिंता, तनाव, निराशा व अवसाद के गहन सागर में; जिसके चंगुल से बच निकलना असंभव होता है। वास्तव में ज़िंदगी सांसों का सिलसिला है। वैसे भी ‘जब तक सांस, तब तक आस’ रहती है और जिस दिन सांस थम जाती है, धरा का, सब धरा पर, धरा ही रह जाता है। मानव शरीर पंच-तत्वों से निर्मित है…सो! मानव अंत में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश में विलीन हो जाता है।

‘आदमी की औक़ात, बस! एक मुट्ठी भर राख’ यही जीवन का शाश्वत सत्य है। मृत्यु अवश्यंभावी है; भले ही समय व स्थान निर्धारित नहीं है। इंसान इस जहान में खाली हाथ आया था और उसे सब कुछ यहीं छोड़, खाली हाथ लौट जाना है। परंतु फिर भी वह आखिरी सांस तक इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और अपनों की चिंता में लिप्त रहता है। वह अपने आत्मजों व प्रियजनों के लिए आजीवन उचित- अनुचित कार्यों को अंजाम देता है…उनकी खुशी के लिए, जबकि पापों का फल उसे अकेले ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि ‘सुख के सब साथी, दु:ख में न कोय’ अर्थात् सुख-सुविधाओं का आनंद तो सभी लेते हैं, परंतु वे पाप के प्रतिभागी नहीं होते। आइए! हम इससे निजात पाने की चेष्टा करें और हर पल को अंतिम पल मानकर निष्काम कर्म करें। ‘पल में प्रलय हो जाएगी, मूरख करेगा कब?’ जी हां! कल अर्थात् भविष्य अनिश्चित है; केवल वर्तमान ही सत्य है। इसलिए जो भी करना है; आज ही नहीं, अभी करना बेहतर है। कबीर जी का यह संदेश उक्त भाव को अभिव्यक्त करता है। क़ुदरत ने तो हमें आनंद ही आनंद दिया है, दु:ख तो हमारी स्वयं की खोज है। इससे तात्पर्य है कि प्रकृति दयालु है; मां की भांति  हर आवश्यकता की पूर्ति करती है। परंतु मानव स्वार्थी है; उसका अनावश्यक दोहन करता है;

जिसके कारण अपेक्षित संतुलन व सामाजिक- व्यवस्था बिगड़ जाती है तथा उसके कार्य-व्यवहार में अनावश्यक हस्तक्षेप करने का परिणाम है… सुनामी, अत्यधिक वर्षा, दुर्भिक्ष, अकाल, महामारी आदि… जिनका सामना आज पूरा विश्व कर रहा है। मुझे स्मरण हो रही हो रहा है… भगवान महाबीर द्वारा निर्दिष्ट–’जियो और जीने दो’ का सिद्धांत, जो अधिकार को त्याग कर्तव्य-पालन व संचय की प्रवृत्ति का त्याग करने का संदेश देता है। सृष्टि का नियम है कि ‘एक सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है।’ सो! जीवन में ज़रूरतों की पूर्ति करो; व्यर्थ की ख्वाहिशें मत पनपने दो, क्योंकि वे कभी पूरी नहीं होतीं और उनके जंज़ाल में फंसा मानव कभी भी मुक्त नहीं हो पाताता। इसलिए सदैव अपनी चादर देख कर पांव पसारने अर्थात् संतोष से जीने की सीख दी गयी है… यही अनमोल धन है अर्थात् जो मिला है, उसी में संतोष कीजिए, क्योंकि परमात्मा वही देता है, जो हमारे लिए आवश्यक व शुभ होता है। सो! ‘सपने देखिए! मगर खुली आंख से’…और उन्हें साकार करने की पूर्ण चेष्टा कीजिए; परंतु अपनी सीमाओं में रहते हुए, ताकि उससे दूसरों के अधिकारों का हनन न हो।

संसार अद्भुत स्थान है। आप दूसरे के दिल में, विचारों में, दुआओं में रहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब आप किसी के लिए अच्छा करते हैं; उसका मंगल चाहते हैं; उसके प्रति मनोमालिन्य का दूषित भाव नहीं रखते। सो! ‘सब हमारे, हम सभी के’ –इस सिद्धांत को जीवन में अपना लीजिए…यही आत्मोन्नति का सोपान है। ‘कर भला, हो भला’ तथा ‘सबका मंगल होय’ अर्थात् इस संसार में हम जैसा करते हैं; वही लौटकर हमारे पास आता है। इसीलिए कहा गया है कि रूठे हुए को हंसाना; असहाय की सहायता करना; सुपात्र को दान देना आदि सब आपके पास ही प्रतिदान रूप में लौट कर आता है। वक्त सदा एक-सा नहीं रहता। ‘कौन जाने, किस घड़ी, वक्त का बदले मिज़ाज’ तथा ‘कल चमन था, आज एक सह़रा हुआ/ देखते ही देखते यह क्या हुआ’– यह हक़ीक़त है। पल-भर में रंक राजा व राजा रंक बन सकता है। क़ुदरत के खेल अजब हैं; न्यारे हैं; विचित्र हैं। सुनामी के सम्मुख बड़ी-बड़ी इमारतें ढह जाती हैं और वह सब बहा कर ले जाता है। उसी प्रकार घर में आग लगने पर कुछ भी शेष नहीं बचता। कोरोना जैसी महामारी का उदाहरण आप सबके समक्ष है। आप घर की चारदीवारी में क़ैद हैं… आपके पास धन-दौलत है; आप उसे खर्च नहीं कर सकते; अपनों की खोज-खबर नहीं ले सकते। कोरोना से पीड़ित व्यक्ति राजकीय संपत्ति बन जाता है। यदि बच गया, तो लौट आएगा,अन्यथा उसका विद्युत्-दाह भी सरकार द्वारा किया जाएगा। हां! आपको सूचना अवश्य दे दी जाएगी।

लॉक-डाउन में सब बंद है। जीवन थम-सा गया है। सब कुछ मालिक के हाथ है; उसकी रज़ा के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल पाता…फिर यह भागदौड़ क्यों? अधिकाधिक धन कमाने के लिए अपनों से छल क्यों? दूसरों की भावनाओं को रौंद कर महल बनाने की इच्छा क्यों? सो! सदा प्रसन्न रहिए। ‘कुछ परेशानियों को हंस कर टाल दो, कुछ को वक्त पर टाल दो।’ समय सबसे बलवान् है; सबसे बड़ी शक्ति है; सबसे बड़ी नियामत है। जो ठीक होगा, वह तुम्हें अवश्य मिल जाएगा। चिंता मत करो। जिसे तुम अपना कहते हो; तुम्हें यहीं से मिला है और तुम्हें यहीं सब छोड़ कर जाना है। फिर चिंता और शोक क्यों?

रोते हुए को हंसाना सबसे बड़ी इबादत है; पूजा है; भक्ति है; जिससे प्रभु प्रसन्न होते हैं। सो! मुट्ठी खुली रखना सीखें, क्योंकि तुम्हें इस संसार से खाली हाथ लौटना है। अपने हाथों से गरीबों की मदद करें; उनके सुख में अपना सुख स्वीकारें, क्योंकि ‘क़द बढ़ा नहीं करते, एड़ियां उठाने से/ ऊंचाइयां तो मिलती है, सर को झुकाने से।’ विनम्रता मानव का सबसे बड़ा गुण है। इससे बाह्य धन-संपदा ही नहीं मिलती; आंतरिक सुख, शांति व आत्म-संतोष भी प्राप्त होता है और मानव की दुष्प्रवृत्तियों का स्वत: अंत हो जाता है। वह संसार उसे अपनाव खुशहाल नज़र आता है। सो! ज़िंदगी उसे दु:खालय नहीं भासती; उत्सव प्रतीत होती है, जिस में रंजोग़म का स्थान नहीं; खुशियां ही खुशियां हैं; जो देने से, बांटने से विद्या रूपी दान की भांति बढ़ती चली जाती हैं। इसलिए कहा जाता है–’जिसे इस जहान में आंसुओं को पीना आ गया/ समझो! उसे जीना आ गया।’ सो! जो मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ कर प्रसन्नता से स्वीकार करें, ग़िला-शिक़वा कभी मत करें। कल, भविष्य जो अनिश्चित है; कभी आएगा नहीं…उसकी चिंता में वर्तमान को नष्ट मत करें… यही ज़िंदगी है और लम्हों की सौग़ात है।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 2 ☆ इंसानियत का दुर्लभ उदाहरण : आज सक्षम लोगों द्वारा जरूरतमंदों की सहायता करना ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। आज से आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सकारात्मक आलेख  ‘इंसानियत का दुर्लभ उदाहरण : आज सक्षम लोगों द्वारा जरूरतमंदों की सहायता करना’।)

☆ किसलय की कलम से # 2 ☆

☆ इंसानियत का दुर्लभ उदाहरण : आज सक्षम लोगों द्वारा जरूरतमंदों की सहायता करना ☆

गरीब, जरूरतमंद, भिखारी अथवा कृपाकांक्षी होना अक्सर किसी का स्वभाव या प्रवृत्ति नहीं होती, अपितु यह किसी सामान्य इंसान का अंतिम रास्ता या परिस्थिति होती है। समाज भी इसे सम्मानजनक नहीं मानता। विश्व में कर्म को प्रधानता प्राप्त है, तब अकर्मण्यता आखिर क्यों सम्मानित होगी? भले ही वह विषम परिस्थितियों अथवा विवशता में अपनाई जाए, घर की दो सूखी रोटियाँ भली इसीलिए कहीं गई हैं। एक साधारण  बात है जो चीज मेहनत, बल, बुद्धि और समय खपाकर प्राप्त की जाती है, उसे यूँ ही खैरात में बाँटने का साहस एक सामान्य मानव नहीं कर पाता या जब वह किसी अकर्मण्य को किसी दूसरे के पसीने की कमाई लुटाते या उपभोग करते देखता है तो उसके हृदय में न चाहते हुए भी कसक होती ही है।

दरवाजे पर आए भिखारियों और राह चलते माँगने वालों को हम सभी ने दुत्कारते और मना करते देखा है। आखिर इस मानसिकता के पृष्ठभाग में क्या छुपा है? इसमें सच्चाई यही है कि अधिकतर ये भिखारी या जरूरत का आडंबर ओढ़े लोग अपनी दिन भर की कमाई को उदरपोषण और बचत करने के बजाय दारुखोरी, जुए और अन्य व्यसनों में ज्यादा उड़ा देते हैं। इनमें ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें वास्तव में दान या सहयोग का सुपात्र कहा जाये। एक और सच्चाई है कि यह जानते हुए कि याचक हमारी दया का पात्र है फिर भी हम अपनी मेहनत की कमाई देने का मन नहीं बना पाते। दान, परोपकार व सहयोग की भावना तब बलवती होती है, जब सामने वाली की मुसीबतें, लाचारी, असलियत और अवस्था प्रदाता की अंतरात्मा को द्रवित करती है। इस भावना के वशीभूत होकर जब इंसान परपीड़ा, परोपकार, दान या सहयोग करता है तब ही वह परमानंद पाता है जो आत्मसंतुष्टि तो देता ही है, अतुलनीय भी होता है। मानव को प्राप्त हुए इस परमानंद के लिए याचक और दानदाता दोनों के मन साफ होना आवश्यक है। याचक की लालची प्रवृत्ति के पता चलने पर दाता जहाँ ठगे जाने का अनुभव करता है, वहीं सुपात्र याचक भी कभी-कभी दाता द्वारा अनिच्छा पूर्वक दिए दान से दुखी भी होते हैं। आदिकाल के हरिश्चंद्र, मोरध्वज या दानवीर कर्ण की दानवीरता से कौन परिचित नहीं है। परमार्थ हमारे संस्कारों तथा भारतीयता के मूल में है। सभी चाहते हैं कि उनकी संतान संस्कारवान बने और सुकृति हो, पर आज के बदलते परिवेश और एकल पारिवारिक जीवनशैली ने हमारी परंपराओं, रिश्तों और सद्भावना की दुर्गति बना दी है। कहते हैं कि आग राख  के अंदर विद्यमान रहती है। हमारे संस्कार बाह्याडंबर और चकाचौंध में भले ही सिमट जाएँ लेकिन अनुकूल वातावरण में वे पुनर्जीवित हो जाते हैं।

हम आज का ही उदाहरण लें, कोविड-19 महामारी से सारा विश्व ग्रसित और भयाक्रांत है, हर आदमी घर में ही दुबके रहना चाहता है, लेकिन हमारा मन घर तक सीमित भला कैसे रहेगा? मन तो घर-परिवार से आगे देश-दुनिया के बारे में भी सोचता रहता है। हम ठीक हैं, क्या और सभी ठीक हैं? पड़ोसी कैसा है? रिश्तेदार कैसे हैं? आसपास की आँखों देखी, रेडियो, टेलीविजन, प्रिंट मीडिया, अंतरजाल आदि पर पढ़ी-लिखी-सुनी बातों पर ये मन चिंतन तो करेगा ही।

इन दिनों प्रायः सभी ने यह देखा है कि एक बहुत बड़ा ऐसा तबका है जो दिहाड़ी पर निर्भर है या किसी कारणवश उसके पास खाद्यान्न का अभाव है। अनेक माध्यमों से बहुतायत में हम तक ये खबरें पहुँच रही हैं कि मुसीबत के इन क्षणों में इस तबके के लोगों को भूखे सोने तक की नौबत आ गई है। आज पत्थर दिल इंसान का भी दिल पिघल रहा है। उद्योगपति, धनाढ्य, उच्चवर्ग, मध्यमवर्ग, यहाँ तक कि उदारमना निम्नवर्ग भी इन दिनों “किसी को भूखा नहीं सोने देंगे” वाक्य को चरितार्थ करने में यथायोग्य सहायक बन रहा है। सरकार के सकारात्मक कार्यों की सराहना आज हर कोई कर रहा है लेकिन उससे कहीं अधिक जनसामान्य और निजी तौर पर किए जा रहे प्रयास भी प्रणम्य हैं। एक बड़े अंतराल के बाद ये परोपकारिता के दुर्लभ दृश्य दिखाई पड़ रहे हैं। आज मोहल्ला, गाँवों, कस्बों और शहरों के कोने-कोने में व्यक्तिगत रूप से, समूहों व संस्थाओं के माध्यम से जरूरतमंदों को दिल खोलकर भोजन व खाद्य सामग्री पहुँचाई जा रही है। व्यक्तिगत, समूहों व संस्थाओं के सदस्य अपनी जान जोखिम में डालकर चौबीसों घंटे मदद हेतु तत्पर हैं। उनका सेवाभाव देखते ही बनता है। इसी तरह सहयोगकर्ताओं की अंतहीन सहायता युगों बाद दिखाई दे रही है। इन सहयोगियों, दानदाताओं और इस पुण्य कार्य में कर्त्तव्यस्थ व्यक्तियों के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु शब्द कम पड़ रहे हैं। मेरा मानना है कि इन लोगों को देखकर जहाँ अन्य लोग भी प्रेरित हो रहे हैं, वहीं अनजाने में ही सही ये परहित के संस्कार हम अपनी संतानों में डाल रहे हैं। शायद अगली पीढ़ी और आने वाला समय ज्यादा सहृदय और सदाचारी हो।

आज हमें जरूरतमंदों के प्रति जो सेवाभाव देखने मिल रहा है। आवारा जानवरों, बंदरों, कुत्ते-बिल्लियों को तक लोग भोजन दे रहे हैं, ऐसा पूर्व में कभी नहीं दिखा। कोविड-19 महामारी का सबसे बड़ा खतरा है ही, बावजूद इसके आज सक्षम और परोपकारियों द्वारा जरूरतमंदों की सहायता करना इंसानियत का दुर्लभ उदाहरण भी बन रहा है। लगभग 500 वर्ष पूर्व तुलसीदास जी द्वारा लिखा सूत्र-

परहित सरिस धरम नहिं भाई

परपीड़ा सम नहिं अधमाई

आज वास्तव में हमारे समाज के लोगों ने इसे चरितार्थ किया है। ऐसे वृहद स्तर व लंबी अवधि तक जरूरतमंदों को भोजन व खाद्यान्न आपूर्ति का ऐसा दृश्य मानवता की मिसाल ही कहा जाएगा। वक्त निकल जाएगा, महामारी चली जाएगी, पर काफी लंबे समय तक ये क्षण, ये बातें, ये परोपकार की कहानियाँ बार-बार दोहराई जाती रहेंगी।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : [email protected]

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हिन्दी साहित्य- आलेख ☆ इंसानियत शर्मसार ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल

डॉ कुंवर प्रेमिल

(डॉ कुंवर प्रेमिल जी  जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में लगातार लेखन का अनुभव हैं। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन। वरिष्ठतम नागरिकों ने उम्र के इस पड़ाव पर आने तक कई महामारियों से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है। आज प्रस्तुत है उनका  एक समसामयिक एवं सकारात्मक आलेख  “इंसानियत शर्मसार” जिसमें  उनके व्यक्तिगत विचार उनकी मनोभावनाओं के रूप में प्रदर्शित हो रहे हैं। )

☆ आलेख – इंसानियत शर्मसार ☆  

जब से दुनिया बनी लगभग तभी से आदमी बना. तभी से  बीमारियां भी बनी होंगी. यह अलग बात है कि तब प्रदूषण कम रहा होगा. बीमारियां भी कम रही होंगी.

रोग ग्रस्त होने पर आदमी ने पेड़ों के पत्ते, जड़े,  मिट्टी का  लेप लगाकर रोगों से छुटकारा पा लिया होगा. उनमें से कोई  विशेष योग्यता पाकर वैद्य और वैद्य शिरोमणि तक जा पहुंचा होगा. खुद का  बचाव करते हुए समाज,   परिवारों की भी बीमारियां दूर करने लगा होगा, धनवंतरी व सुखेन वैद्य संभवतः इन्हीं वैद्य शिरोमणि में होंगे.

राम रावण एवं महाभारत के युद्धों में बड़ी संख्या में लड़ाके घायल हुए थे. वैदयों द्वारा ऐसे-ऐसे लेप एवं औषधियां दी गई जिससे वे दूसरे दिन फिर तरोताजा होकर लड़ाई के मैदान में जा पहुंचते. वर्तमान में हमारे पास कई-कई पैथियां  है जिससे कोई बीमारी बचकर निकल ही नहीं सकती.  भारत के विभिन्न शोध संस्थानों में इस पर कार्य भी चल रहा है। एक दिन हमारा देश ही कोरोना वायरस की दवा/टीका ईजाद करेगा- ऐसा मेरा विश्वास है.

एकाएक समय बदला. परिस्थितियां बदल गई.  हम आशा करते हैं कि यह नकारात्मक एवं मानवता के विरुद्ध अतिमहत्वाकांक्षी शक्तियों का कार्य नहीं होगा. यदि ऐसा नहीं है और यह प्रकृति का प्रकोप है तो निश्चित ही इसके लिए हम ही ज़िम्मेवार होंगे और यह प्रकृति के विरूद्ध जाने का दुष्परिणाम होगा. इस समय पूरे विश्व में आपाधापी का मंजर है. सारी इंसानियत इसकी कीमत चुका रही है. हमारी पीढ़ी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को लेकर चिंतित है.

आखिर हमने या किसी ने तो इंसानियत के अमन चैन में सेंध लगाने की कोशिश की है जिसके लिए इंसानियत शर्मसार होती रहेगी.

 

© डॉ कुँवर प्रेमिल
एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मोबाइल 9301822782

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 30 – बापू के संस्मरण-4 प्रतिज्ञा वापस नहीं ली जाती ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण – प्रतिज्ञा वापस नहीं ली जाती”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 29 – बापू के संस्मरण – 4- प्रतिज्ञा वापस नहीं ली जाती ☆ 

एक बार कस्तूरबा गांधी बहुत बीमार हो गईं । जल-चिकित्सा से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ दूसरे उपचार किये गये उनमें भी सफलता नहीं मिली । अंत में गांधीजी ने उन्हें नमक और दाल छोड़ने की सलाह दी परन्तु इसके लिए बा तैयार नहीं हुईं । गांधीजी ने बहुत समझाया, पोथियों से प्रमाण पढ़कर सुनाये, लेकर सब व्यर्थ ।

बा बोलीं, “कोई आपसे कहे कि दाल और नमक छोड़ दो तो आप भी नहीं छोड़ेंगे” । गांधीजी ने तुरन्त प्रसन्न होकर कहा,”तुम गलत समझ रही हो मुझे कोई रोग हो और वैद्य किसी वस्तु को छोड़ने के लिये कहें तो तुरन्त छोड़ दूंगा और तुम कहती हो तो मैं अभी एक साल के लिए दाल और नमक दोनों छोड़ता हूं, तुम छोड़ो या न छोडो, ये अलग बात है” ।

यह सुनकर बा बहुत दुखी हुईं बोलीं, “आपका स्वभाव जानते हुए भी मेरे मुंह से यह बात निकल गई अब मैं दाल और नमक नहीं खांऊगी आप प्रतिज्ञा वापस ले लें” गांधीजी ने कहा, “तुम दाल और नमक छोड़ दोगी, यह बहुत अच्छा होगा उससे तुम्हें लाभ ही होगा, लेकिन की हुई प्रतिज्ञा वापिस नहीं ली जाती । किसी भी निमित्त से संयम पालन करने पर लाभ ही होता है मुझे भी लाभ ही होगा इसलिए तुम मेरी चिन्ता मत करो” । गांधीजी अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहे ।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #49 ☆ देह से हूँ ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # देह से हूँ ☆

समय के प्रवाह के साथ एक प्रश्न मनुष्य के लिए यक्षप्रश्न बन चुका है। यह प्रश्न पूछता है कि जीवन कैसे जिएँ?

इस प्रश्न का अपना-अपना उत्तर पाने का  प्रयास हरेक ने किया। जीवन सापेक्ष है, अत: किसी भी उत्तर को पूरी तरह खारिज़ नहीं किया जा सकता। तथापि एक सत्य यह भी है कि अधिकांश उत्तर भौतिकता तजने या उससे बचने का आह्वान करते दीख पड़ते हैं।

मंथन और विवेचन यहीं से आरम्भ होता है।   स्मार्टफोन या कम्प्युटर के प्रोसेसर में बहुत सारे इनबिल्ट प्रोग्राम्स होते हैं। यह इनबिल्ट उस सिस्टम का प्राण है।  विकृति, प्रकृति और संस्कृति मनुष्य में इसी तरह इनबिल्ट होती हैं। जीवन इनबिल्ट से दूर भागने के लिए नहीं, इनबिल्ट का उपयोग कर सार्थक जीने के लिए है।

मनुष्य पंचेंद्रियों का दास है। इस कथन का दूसरा आयाम है कि मनुष्य पंचेंद्रियों का स्वामी है। मनुष्य पंचतत्व से उपजा है, मनुष्य पंचेंद्रियों के माध्यम से जीवनरस ग्रहण करता है। भ्रमर और रसपान की शृंखला टूटेगी तो जगत का चक्र परिवर्तित हो जाएगा, संभव है कि खंडित हो जाए। कर्म से, श्रम से पलायन किसी प्रश्न का उत्तर नहीं होता। गृहस्थ आश्रम भी उत्तर पाने का एक तपोपथ है। साधु होना अपवाद है, असाधु रहना परम्परा। सब साधु होने लगे तो असाधु होना अपवाद हो जाएगा। तब अपवाद पूजा जाने लगेगा, जीवन उसके इर्द-गिर्द अपना स्थान बनाने लगेगा।

एक कथा सुनाता हूँ। नगरवासियों ने तय किया कि सभी वेश्याओं को नगर से निकाल बाहर किया जाए। निर्णय पर अमल हुआ। वरांगनाओं को जंगल में स्थित एक खंडहर में छोड़ दिया गया। कुछ वर्ष बाद नगर खंडहर हो गया जबकि खंडहर के इर्द-गिर्द नया नगर बस गया।

समाज किसी वर्गविशेष से नहीं बनता। हर वर्ग घटक है समाज का। हर वर्ग अनिवार्य है समाज के लिए। हर वर्ग के बीच संतुलन भी अनिवार्य है समाज के विकास के लिए। इसी भाँति संसार में देह धारण की है तो हर तरह की भौतिकता, काम, क्रोध, लोभ, मोह, सब अंतर्भूत हैं। परिवार और अपने भविष्य के लिए भौतिक साधन जुटाना कर्म है और अनिवार्य कर्तव्य भी।

जुटाने के साथ देने की वृत्ति भी विकसित हो जाए तो भौतिकता भी परमार्थ का कारण और कारक बन सकती है। मनुष्य अपने ‘स्व’ के दायरे में मनुष्यता को ले आए तो  स्वार्थ विस्तार पाकर परमार्थ हो जाता है।

इस तरह का कर्मनिष्ठ परमार्थ, जीवनरस को ग्रहण करता है। जगत के चक्र को हृष्ट-पुष्ट करता है। सृष्टि से सृष्टि को ग्रहण करता है, सृष्टि को सृष्टि ही लौटाता है। सांसारिक प्रपंचों का पारमार्थिक कर्तव्यनिर्वहन उसे प्रश्न के सबसे सटीक उत्तर के निकट ले आता है।

प्रपंच में परमार्थ, असार में सार, संसार में भवसार देख पाना उत्कर्ष है। देह इसका साधन है किंतु देह साध्य नहीं है। गर्भवती के लिए कहा जाता है कि वह उम्मीद से है। मनुष्य को अपने आप से निरंतर कहना चाहिए, ‘देह से हूँ पर देह मात्र नहीं हूँ। ‘ विदेह तो कोई बिरला ही हो सकेगा पर  स्वयं को  देह मात्र मानने को नकार देना, अस्तित्व के बोध का शंखनाद है। इस शंखनाद के कर्ता, कर्म और क्रिया तुम स्वयं हो।

#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

©  संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 44 – दृष्टि ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “दृष्टि। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 44 ☆

☆ दृष्टि 

 मैं अब आपको स्वर योग के विषय में कुछ बताता हूँ । सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को अनुभव करने का प्रयत्न कीजिए । देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है । स्वर योग के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा । इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से श्वास निकलता अनुभव हो तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा । श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वर योग का आधार हैं । सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है । इसका रंग काला है । यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है । इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं ओर स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी ओर अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर । सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः जब दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा ।

गांधार नाड़ी नाक में, हस्तिजिह्वा दाहिनी आंख में, पूषा दाये कान में, यशस्विनी बायें कान में, अलंबुसा मुख में, कुहू लिंग प्रदेश में और शंखिनी गुदा में जाती है । हठयोग में नाभिकंद अर्थात कुंडलिनी का स्थान गुदा से लिंग प्रदेश की ओर दो अंगुल हटकर मूलाधार चक्र में माना गया है । स्वर योग में कुंडलिनी की यह स्थिति नहीं मानी जाती है। स्वर योग शरीर शास्त्र से संबंध रखता है और शरीर की नाभि गुदामूल में नहीं, वरन उदर मध्य ही हो सकती हैं । इसीलिए यहाँ नाभिप्रदेश का तात्पर्य उदर भाग मानना ही ठीक है । श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष संबंध उदर से ही है । स्वर योग इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य को नाभि तक पूरी साँस लेनी चाहिए । वह प्राण वायु का स्थान फेफड़ों को नहीं, नाभि को मानता है । गहन अनुसंधान के पश्चात अब शरीर शास्त्री भी इस बात को स्वीकारते हैं कि वायु को फेफड़ों में भरने मात्र से ही श्वास का कार्य पूरा नहीं हो जाता । उसका उपयुक्त तरीका यह है कि उससे पेड़ू तक पेट सिकुड़ता और फैलता रहे एवं डायफ्राम का भी साथ-साथ संचालन हो । तात्पर्य यह कि श्वास का प्रभाव नाभि तक पहुँचना जरूरी है । इसके बिना स्वास्थ्य खराब होने का खतरा बना रहता है । इसीलिए सामान्य श्वास को स्वर योग में अधूरी क्रिया माना गया है । इससे जीवन की प्रगति रुकी रह जाती है । इसकी पूर्ति के लिए योग के आचार्यों ने प्राणायाम जैसे अभ्यासों का विकास किया ।

तो वास्तव में हम प्रकृति और ब्रह्मांड में बाहरी परिवर्तन के साथ हमारे आंतरिक शरीर और मस्तिष्क के परिवर्तनों को समझ सकते हैं ।

 

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 47 ☆ आज ज़िंदगी : कल उम्मीद ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख आज ज़िंदगी : कल उम्मीद।  इस आलेख की एक पंक्ति ‘दुनिया की सबसे अच्छी किताब हम स्वयं हैं… ख़ुद को समझ लीजिए; सब समस्याओं का अंत स्वत: हो जाएगा’ अपने आप में महत्वपूर्ण है।  इस आलेख में इस तरह के कई महत्वपूर्ण कथन हमें विचार करने के लिए उद्वेलित करते हैं। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 47 ☆

☆ आज ज़िंदगी : कल उम्मीद

‘ज़िंदगी वही है, जो हम आज जी लें। कल जो जीएंगे, वह उम्मीद होगी’ में निहित है… जीने का अंदाज़ अर्थात् ‘वर्तमान में जीने का सार्थक संदेश’ …क्योंकि आज सत्य है, हक़ीकत है और कल उम्मीद है, कल्पना है, स्वप्न है, जो संभावना-युक्त है। इसीलिए कहा गया है कि ‘आज का काम कल पर मत छोड़ो,’ क्योंकि ‘आज कभी जायेगा नहीं, कल कभी आयेगा नहीं।’ सो! वर्तमान श्रेष्ठ है, आज में जीना सीख लीजिए अर्थात् कल अथवा भविष्य के स्वप्न संजोने का कोई महत्व-प्रयोजन नहीं तथा वह कारग़र व उपयोगी भी नहीं। इसलिए ‘जो भी है, बस यही एक पल है, कर ले पूरी आरज़ू’ अर्थात् भविष्य अनिश्चित है। कल क्या होगा… कोई नहीं जानता। कल की उम्मीद में अपना आज अर्थात् वर्तमान नष्ट मत कीजिए। उम्मीद पूरी न होने पर मानव केवल हैरान-परेशान ही नहीं, हताश भी हो जाता है, जिसका परिणाम सदैव निराशा-जनक होता है।

हां! यदि हम इसके दूसरे पहलू पर प्रकाश डालें, तो मानव को आशा का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि यह वह जुनून है, जिसके बल पर वह कठिन से कठिन अर्थात् असंभव कार्य भी कर गुज़रता है। उम्मीद भविष्य में फलित होने वाली कामना है, आकांक्षा है, स्वप्न है; जिसे साकार करने के लिए मानव को निरंतर अनथक परिश्रम करना चाहिए। परिश्रम सफलता की कुंजी है तथा निराशा मानव की सफलता की राह में अवरोध उत्पन्न करती है। सो! मानव को निराशा का दामन कभी नहीं थामना चाहिए और उसका जीवन में प्रवेश निषिद्ध होना चाहिए। इच्छा, आशा, आकांक्षा…उल्लास है,  उमंग है, जीने की तरंग है– एक सिलसिला है ज़िंदगी का; जो हमारा पथ-प्रदर्शन करता है, हमारे जीवन को ऊर्जस्वित करता है…राह को कंटक-विहीन बनाता है…वह सार्थक है, सकारात्मक है और हर परिस्थिति में अनुकरणीय है।

‘जीवन में जो हम चाहते हैं, वह होता नहीं; हम वह करते हैं, जो हम चाहते हैं। परंतु होता वही है, जो परमात्मा चाहता है अथवा मंज़ूरे-ख़ुदा होता है।’ फिर भी मानव सदैव जीवन में अपना इच्छित फल पाने के लिए प्रयासरत रहता है। यदि वह प्रभु में आस्था व विश्वास नहीं रखता, तो तनाव की स्थिति को प्राप्त हो जाता है। यदि वह आत्म-संतुष्ट व भविष्य के प्रति आश्वस्त रहता है, तो उसे कभी भी निराशा रूपी सागर में अवग़ाहन नहीं करना पड़ता। परंतु यदि वह भीषण, विपरीत व विषम परिस्थितियों में भी उसके अप्रत्याशित परिणामों से समझौता नहीं करता, तो वह अवसाद की स्थिति को प्राप्त हो जाता है… जहां उसे सब अजनबी-सम अर्थात् बेग़ाने ही नहीं, शत्रु नज़र आते हैं। इसके विपरीत जब वह उस परिणाम को प्रभु-प्रसाद समझ, मस्तक पर धारण कर, हृदय से लगा लेता है; तो चिंता, तनाव,  दु:ख आदि उसके निकट भी नहीं आ सकते। वह निश्चिंत व उन्मुक्त भाव से अपना जीवन बसर करता है और सदैव अलौकिक आनंद की स्थिति में रहता है… अर्थात् अपेक्षा के भाव से मुक्त, आत्मलीन व आत्ममुग्ध।

हां! ऐसा व्यक्ति किसी के प्रति उपेक्षा भाव नहीं रखता … सदैव प्रसन्न व आत्म-संतुष्ट रहता है, उसे जीवन में कोई भी अभाव नहीं खलता और उस संतोषी जीव का सानिध्य हर व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है। उसकी ‘औरा’ दूसरों को खूब प्रभावित व प्रेरित करती है। इसलिए व्यक्ति को सदैव निष्काम कर्म करने चाहिएं, क्योंकि फल तो हमारे हाथ में है नहीं। ‘जब परिणाम प्रभु के हाथ में है, तो कल व फल की चिंता क्यों?

वह सृष्टि-नियंता तो हमारे भूत-भविष्य, हित-अहित,  खुशी-ग़म व लाभ-हानि के बारे में हमसे बेहतर जानता है। चिंता चिता समान है तथा चिंता व कायरता में विशेष अंतर नहीं… कायरता का दूसरा नाम ही चिंता है। यह वह मार्ग है, जो मानव को मृत्यु के मार्ग तक सुविधा-पूर्वक ले जाता है। ऐसा व्यक्ति सदैव उधेड़बुन में मग्न रहता है…विभिन्न प्रकार की संभावनाओं में खोया, सपनों के महल बनाता-तोड़ता रहता है और चिंता रूपी दलदल से, वह लाख चाहने पर भी निज़ात नहीं पा सकता। दूसरे शब्दों में वह स्थिति चक्रव्यूह के समान है, जिसे भेदना मानव के वश की बात नहीं। इसलिए कहा गया है कि ‘आप अपने नेत्रों का प्रयोग संभावनाएं तलाशने के लिए करें; समस्याओं का चिंतन-मनन करने के लिए नहीं, क्योंकि समस्याएं तो बिन बुलाए मेहमान की भांति किसी पल भी दस्तक दे देती हैं।’ सो! उन्हें दूर से सलाम कीजिए, अन्यथा वे ऊन के उलझे धागों की भांति आपको भी उलझा कर अथवा भंवर में फंसा कर रख देंगी और आप उन समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए छटपटाते और संभावनाओं को तलाशते रह जायेंगे।

सो! समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए संभावनाओं की दरक़ार है। हर समस्या के समाधान के केवल दो विकल्प ही नहीं होते…अन्य विकल्पों पर दृष्टिपात करने व अपनाने से समाधान अवश्य निकल आता है और आप चिंता-मुक्त हो जाते हैं। चिंता को कायरता का पर्यायवाची कहना भी उचित है, क्योंकि कायर व्यक्ति केवल चिंता करता है, जिससे उसके सोचने- समझने की शक्ति कुंठित हो जाती है तथा उसकी बुद्धि पर ज़ंग लग जाता है। इस मनोदशा में वह उचित निर्णय लेने की स्थिति में न होने के कारण गलत निर्णय ले बैठता है। सो! वह दूसरे की सलाह मानने को भी तत्पर नहीं होता, क्योंकि सब उसे शत्रु -सम भासते हैं। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है तथा किसी अन्य पर विश्वास नहीं करता। ऐसा व्यक्ति पूरे परिवार व समाज के लिए मुसीबत बन जाता है और गुस्सा हर पल उसकी नाक पर धरा रहता है। उस पर  किसी की बातों का प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि वह सदैव अपनी बात को उचित स्वीकार, उसे कारग़र सिद्ध करने में प्रयासरत रहता है।

‘दुनिया की सबसे अच्छी किताब हम स्वयं हैं… ख़ुद को समझ लीजिए; सब समस्याओं का अंत स्वत: हो जाएगा।’ ऐसा व्यक्ति दूसरे की बातों व नसीहतों को अनुपयोगी व अनर्गल प्रलाप तथा अपने निर्णय को सर्वदा उचित उपयोगी व श्रेष्ठ ठहराता है। वह इस तथ्य को स्वीकारने को कभी भी तत्पर नहीं होता कि दुनिया में सबसे अच्छा है–आत्मावलोकन करना; अपने अंतर्मन में झांक कर आत्मदोष-दर्शन व उनसे  मुक्ति पाने के प्रयास करना… इन्हें जीवन में धारण करने से मानव का आत्म-साक्षात्कार हो जाता है और तदुपरांत दुष्प्रवृत्तियों का स्वत: शमन हो जाता है; हृदय सात्विक हो जाता है और उसे पूरे विश्व में चहुं और अच्छा ही अच्छा दिखाई पड़ने लगता है… ईर्ष्या-द्वेष आदि भाव उससे कोसों दूर जाकर पनाह पाते हैं। उस स्थिति में हम सबके तथा सब हमारे नज़र आने लगते हैं।

इस संदर्भ में हमें इस तथ्य को समझना व इस संदेश को आत्मसात् करना होगा कि ‘छोटी सोच शंका को जन्म देती है और बड़ी सोच समाधान को … जिसके लिए सुनना व सीखना अत्यंत आवश्यक है।’ यदि आपने सहना सीख लिया, तो रहना भी सीख जाओगे। जीवन में सब्र व सच्चाई ऐसी सवारी हैं, जो अपने शहसवार को कभी भी गिरने नहीं देतीं… न किसी की नज़रों में, न ही किसी के कदमों में। सो! मौन रहने का अभ्यास कीजिए तथा तुरंत प्रतिक्रिया देने की बुरी आदत को त्याग दीजिए। इसलिए सहनशील बनिए; सब्र स्वत: प्रकट हो जाएगा तथा सहनशीलता के जीवन में पदार्पण होते ही आपके कदम सत्य की राह की ओर बढ़ने लगेंगे। सत्य की राह सदैव कल्याणकारी होती है, जिससे सबका मंगल ही मंगल होता है। सत्यवादी व्यक्ति सदैव आत्म-विश्वासी तथा दृढ़-प्रतिज्ञ होता है और उसे कभी भी, किसी के सम्मुख झुकना नहीं पड़ता। वह कर्त्तव्यनिष्ठ और आत्मनिर्भर होता है और प्रत्येक कार्य को श्रेष्ठता से अंजाम देकर सदैव सफलता ही अर्जित करता है।

‘कोहरे से ढकी भोर में, जब कोई रास्ता दिखाई न दे रहा हो, तो बहुत दूर देखने की कोशिश व्यर्थ है।’ धीरे-धीरे एक-एक कदम बढ़ाते चलो, रास्ता खुलता चला जाएगा’ अर्थात् जब जीवन में अंधकार के घने काले बादल छा जायें और मानव निराशा के कुहासे से घिर जाए; उस स्थिति में एक-एक कदम बढ़ाना कारग़र है और उसका मंज़िल पर पहुंचना अवश्यंभावी हो जाएगा। उस विकट परिस्थिति में आपके कदम लड़खड़ा अथवा डगमगा तो सकते हैं; परंतु आप गिर नहीं सकते। सो! निरंतर आगे बढ़ते रहिए…एक दिन मंज़िल पलक-पांवड़े बिछाए आपका स्वागत अवश्य करेगी। हां! एक शर्त है कि आपको थक-हार कर बैठना नहीं है। मुझे स्मरण हो रही हैं, स्वामी विवेकानंद जी की पंक्तियां … ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक तुम्हें लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।’ यह पंक्तियां पूर्णत: सार्थक व अनुकरणीय हैं। यहां मैं उनके एक अन्य प्रेरक प्रसंग पर प्रकाश डालना चाहूंगी–’एक विचार लें। उसे अपने जीवन में धारण करें; उसके बारे में सोचें, सपना देखें तथा उस विचार पर ही नज़र रखें। मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों व आपके शरीर के हर हिस्से को उस विचार से भरे रखें और अन्य हर विचार को छोड़ दें… सफलता प्राप्ति का यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।’ सो! उनका एक-एक शब्द प्रेरणा- स्पद है व ऊर्जस्वित करता है और जो भी इस राह का अनुसरण करता है; उसका सफल होना नि:संदेह नि:शंक है; निश्चित है; अवश्यंभावी है।

हां! आवश्यकता है—वर्तमान में जीने की, क्योंकि वर्तमान में किया गया हर प्रयास हमारे भविष्य का निर्माता है। जितनी लगन व निष्ठा के साथ आप अपना कार्य संपन्न करते हैं; पूर्ण तल्लीनता व पुरुषार्थ से प्रवेश कर आकंठ डूब जाते हैं तथा अपने मनोमस्तिष्क में किसी दूसरे विचार के प्रवेश को निषिद्ध रखते हैं; आपका अपनी मंज़िल पर परचम लहराना निश्चित हो जाता है। इस तथ्य से तो आप सब भली-भांति अवगत होंगे कि ‘क़ाबिले तारीफ़’ होने के लिए ‘वाकिफ़-ए-तकलीफ़’ होना पड़ता है। जिस दिन आप निश्चय कर लेते हैं कि आप विषम परिस्थितियों में किसी के सम्मुख पराजय स्वीकार नहीं करेंगे और अंतिम सांस तक प्रयासरत रहेंगे; तो आपका अपनी मंज़िल पर पहुंचना अवश्यंभावी है, क्योंकि यही है… सफलता प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग। परंतु विपत्ति में अपना सहारा ख़ुद न बनना व दूसरों से सहायता की अपेक्षा करना… करुणा की भीख मांगने के समान है। सो! विपत्ति में अपना सहारा स्वयं बनना श्रेयस्कर है और दूसरों से सहायता- सहयोग की उम्मीद रखना स्वयं को छलना है,क्योंकि वह व्यर्थ की आस बंधाता है। यदि आप दूसरों पर विश्वास करके अपनी राह से भटक जाते हैं और अपनी आंतरिक शक्ति व ऊर्जा पर भरोसा करना छोड़ देते हैं, तो आपको असफलता को स्वीकारना ही पड़ता है। उस स्थिति में आपके पास प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य कोई भी विकल्प शेष रहता ही नहीं।

सो! दूसरों से अपेक्षा करना महामूर्खता है, क्योंकि सच्चे मित्र बहुत कम होते हैं। अक्सर लोग विभिन्न सीढ़ियों का उपयोग करते हैं… कोई प्रशंसा रूपी शस्त्र से प्रहार करता है, तो अन्य निंदक बन आपको पथ-विचलित करता है। दोनों स्थितियां कष्टकर हैं और उनमें हानि भी केवल आपकी होती है। सो! स्थितप्रज्ञ बनिए; व्यर्थ के प्रशंसा रूपी प्रलोभनों में मत भटकिए और निंदा से विचलित मत होइए। इसलिये ‘प्रशंसा में अटकिये मत और निंदा से भटकिये मत’ और हर परिस्थिति में सम रहना मानव के लिए श्रेयस्कर है। आत्मविश्वास व दृढ़-संकल्प रूपी बैसाखियों से आपदाओं का सामना करने व अदम्य साहस जुटाने पर ही, सफलता आपके सम्मुख सदैव नत-मस्तक रहेगी। सो! ‘आज ज़िंदगी है और कल अर्थात् भविष्य उम्मीद है… जो अनिश्चित है, जिसमें सफलता-असफलता दोनों भाव निहित हैं।’ सो! यह आप पर निर्भर करता है कि आपको किस राह पर अग्रसर होना चाहते हैं।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 1 ☆ ये समय है सकारात्मक सोच के क्रियान्वयन का ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। आज से आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक सकारात्मक आलेख  ‘ये समय है सकारात्मक सोच के क्रियान्वयन का’।)

☆ किसलय की कलम से # 1 ☆

☆ ये समय है सकारात्मक सोच के क्रियान्वयन का ☆

ईश्वर साक्षी है, जिसने समय से सबक नहीं लिया वह सदा ही मुसीबत में पड़ा है। समय सबको एक बार पूर्वाभास अवश्य कराता है, लेकिन अपने में मशगूल आज के इंसान को अच्छे या बुरे वक्त की आहट या दस्तक सुनाई ही नहीं पड़ती। समय जब बुरे वक्त की दस्तक देता है तब हम दुनियादारी के शोर में कुछ सुन नहीं पाते, चिंतन-मनन की बात तो बहुत दूर की है। इसी तरह जब अच्छे वक्त की आहट होती है तब भी हम सुनना नहीं चाहते। उन अच्छे दिनों को ईशकृपा मानने के बजाय स्वयं की उपलब्धि मान बैठते हैं, जबकि यह अच्छा वक्त केवल आपके कर्मों का फल नहीं होता। इसमें हमारे परिवार, हमारे समाज एवं हमारी प्रकृति की भी भागीदारी होती है। यदि इंसान इस सत्सूत्र को जान ले तो वह सभी प्राणियों व प्रकृति से मित्रवत व्यवहार करने लगेगा, इस प्रकार ‘जियो और जीने दो’  वाक्य के चरितार्थ होने देर नहीं लगेगी।

हमने देखा है कि किसी कार्य के प्रारंभ होने से पूर्व ही उस कार्य की परिणति के विचार मानस पटल पर उभरने लगते हैं। ज्ञानवान तो इन विचारों की बारीकियों को पकड़ लेते हैं लेकिन आम आदमी का पूरा ध्यान सफलता के आभासी उत्स में ही डूबा रहता है। वह कमियों को सिरे से नकारता रहता है। यही भ्रम उस कार्य के परिणाम पर भी प्रभाव डालता है।

पेड़-पौधों व जंगलों के घटते क्षेत्रफल से उत्पन्न पानी का अभाव, गर्मी का प्रकोप, शुद्ध वायु की कमी, वन्यजीवों की घटती संख्या एवं पृथ्वी के हठात दोहन से आज प्राकृतिक असंतुलन की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अब तो आदमी परेशानी महसूस करने लगा है। बुरे वक्त की दस्तकों व चेतावनी  सुनकर हमने कोई संतोषजनक कदम नहीं उठाए। बढ़ते कांक्रीट जंगलों, असंयत खानपान की वजह से बीमारियाँ तथा स्वास्थ्यगत कमजोरियाँ बढ़ती जा रही हैं, बावजूद इन सबके इन दस्तकों से किसी ने जीवन शैली में सुधार करने की कोशिश नहीं की।

आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व की ही बात करें तो क्या इतनी भयानक और आधिक्य में बीमारियाँ होती थीं। आज तो हम न बीमारियों के नाम और न ही डॉक्टरों के प्रकार गिन पाते। और तो और उस समय के इंसान ने आज पाई जाने वाली बीमारियों की कल्पना तक नहीं की होगी कि ऐसी भी कोई बीमारियाँ हो सकती हैं, जो चमगादड़, सूअर, घोड़े, कुत्ते, बिल्ली या साँप-बिच्छू के खाने से भी होंगी। सोचते भी कैसे, क्योंकि हमने कभी सुना भी नहीं था कि लोग इन जीव-जंतुओं को कच्चा भी खाते होंगे। हमारे देश में तो ‘अहिंसा परमोधर्मः’ पर चलने वाले लोग वनस्पतियों तक को अनावश्यक क्षति पहुँचाने को  हिंसा मानते थे, लेकिन आज ये सब अतीत की बातें हो गई हैं।

वक्त ने दस्तक दी हिंसा बुरी बात है, पर क्या सांप्रदायिक दंगे और आतंकवाद कम हुए? वक्त ने दस्तक दी-प्रेम भाईचारे की, क्या ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के भाव जगे। इसके विपरीत विश्व के विभिन्न देश आज लड़ाई-झगड़े और अपने वर्चस्व की खातिर इंसानियत की हद भी पार करने से नहीं चूक रहे। आज परमाणु युद्ध और स्पेसवार के आगे भी व्यापार युद्ध,पानीयुद्ध और सबसे बड़े युद्ध ‘वायरस वार’ की दस्तक और सुगबुगाहट हम सुन पा रहे है। क्या यह इंसान के लिए अत्यंत संवेदनशील एवं विचारणीय समय नहीं है? आज राष्ट्रीय सीमाओं और हीन विचारों से ऊपर उठकर प्राकृतिक संतुलन को पुनः स्थापित करने का वक्त है। आज कोविड-19 नामक विश्वव्यापी महामारी के चलते जब सारी दुनिया थम सी गई है। आज जैसे हर घर में एक अजीब सा मौन पसरा हुआ है। लोगों की मनःस्थिति का पता लगाना मुश्किल हो गया है। ये  ‘किंकर्त्तव्यविमूढ़’ जैसी स्थिति है, परंतु इन दिनों हमारे पास पर्याप्त समय है जब हम मानव जीवन की उपादेयता, शांतिपूर्ण सामाजिक वातावरण तथा प्रकृति से निकटता स्थापित करने विषयक कुछ सकारात्मक चिंतन-मनन कर सकते हैं। कहा भी गया है कि इंसान को दुख या मुश्किल के क्षणों में ही अच्छा-बुरा, सत्य-असत्य, लाभ-हानि कुछ ज्यादा ही दिखाई देने लगता है। विगत जीवन की अनेकानेक यादें स्मृत हो उठती हैं।

अतः ये समय है सकारात्मक सोच के क्रियान्वयन का। हम समय निकालकर अपने जीवन की उपादेयता व सामाजिक सद्भावना पर चिंतन-मनन करें और उस पर अमल करना आज से ही प्रारंभ करें। मुझे विश्वास है इससे हमारे मन निर्मल होंगे और मानव समाज निश्चित रूप से सकारात्मक दिशा में अग्रसर होगा।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : [email protected]

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 29 – बापू के संस्मरण-3 मेरे घर में यह कलह नहीं चल सकता ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण – मेरे घर में यह कलह नहीं चल सकता”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 29 – बापू के संस्मरण – 3- मेरे घर में यह कलह नहीं चल सकता ☆ 

गांधीजी डरबन में वकालत करते थे । उनके मुंशी भी प्राय: उन्हीं के साथ रहते थे । उसमें हिन्दू, ईसाई, गुजराती, मद्रासी सभी धर्म और प्रान्तों के व्यक्ति होते थे । गांधीजी उनके साथ किसी तरह का भेद-भाव नहीं रखते थे उन्हे अपने परिवार के रुप में ही मानते थे । जिस घर में वह रहते थे, उसकी बनावट पश्चिमी ढंग की थी, कमरों में नालियां नहीं थी, पेशाब के लिए खास तरह के बरतन रखे जाते थे, उन्हें नौकर नहीं उठाते थे, यह काम घर के मालिक और मालकिन करते थे । जो मुंशी घर में घुल-मिल जाते थे, वें अपने बरतन स्वयं ही उठा ले जाते थे । एक बार एक ईसाई मुंशी उनके घर में रहने के लिये आया उसका बरतन घर के मालिक और मालकिन को ही उठाना चाहिए था लेकिन कस्तुरबा गांधी ने इस मुंशी का बरतन उठाने से इंकार कर दिया।  वह मुंशी पंचम कुल में पैदा हुआ था उसका बरतन बा कैसे उठाती! गांधीजी स्वयं उठावें, यह भी वह नहीं सह सकती थीं । इस बात को लेकर दोनों में काफी झगड़ा हुआ बा बरतन उठाकर ले तो गई, लेकिन क्रोध और ग्लानि से उनकी आंखे लाल हो आई । गांधीजी को इस तरह बरतन उठाने से संतोष नहीं हुआ वह चाहते थे कि बा हंसते-हंसते बरतन ले जायें, इसलिये उन्होंने ऊंचे स्वर में कहा, “मेरे घर में यह कलह नहीं चल सकता” ।  ये शब्द बा के हृदय में तीर की तरह चुभ गये वह तड़प-कर बोलीं, “तो अपना घर अपने पास रखो मैं जाती हूँ” । गांधीजी भी कठोर हो उठे क्रोध में भरकर उन्होंने बा का हाथ पकड़ा और दरवाजे तक खींचकर ले गये । वह उन्हें बाहर कर देना चाहते थे, लेकिन जैसे ही उन्होंने दरवाजा खोला अश्रुधारा बहाती हुई बा बोलीं, “तुमको तो शर्म नहीं है, लेकिन मुझे है जरा तो शर्माओ मैं बाहर निकलकर कहाँ जाऊं यहाँ मेरे मां-बाप भी नहीं हैं, जो उनके घर चली जाऊं । मैं स्त्री ठहरी तुम्हारी धौंस मुझे सहनी होगी अब शर्म करो और दरवाजा बंद कर दो कोई देख लेगा तो दोनों का ही मुंह काला होगा” । यह सुनकर मन-ही-मन गांधीजी बहुत लज्जित हुए उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया सोचा–अगर पत्नी मुझै छोड़कर कहीं नहीं जा सकती तो मैं भी उसे छोड़कर कहाँ जानेवाला हूँ ।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ शिक्षा – दीक्षा ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆  शिक्षा – दीक्षा

जो धान बोता है, उसके खेत में धान लहलहाता है। गेहूँ बोने वाला, गेहूँ की फसल पाता है। जिसने चना रोपा, उसने चना काटा। आम उगाने वाला आम का स्वामी हुआ। दीक्षा, जीवन को सरलता और सहजता प्रदान करती है। सरल और सहज के घर आनंद वास करता है।

शिक्षित ईर्ष्या बोता है, सम्मान काटना चाहता है। षड्यंत्र रोपता है, यश उगा देखने की इच्छा करता है। पैसा, पद, जुगाड़ से बनी अपनी अस्थायी स्थिति से स्थायी लाभ लेना चाहता है। बीज के तत्व और कोख में होनेवाली प्रक्रिया परिवर्तित करने की विफल कुचेष्टा, कुंठा और अवसाद को घर करने देती है।

सुना है कि सरकार बच्चों के ऑनलाइन अध्ययन अभियान का नामकरण ‘दीक्षा’ करने जा रही है। काश सारे शिक्षित, दीक्षित हो सकें!

कृपया घर में रहें, सुरक्षित रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

( कविता-संग्रह *चुप्पियाँ* से।)
( 2.9.18, प्रातः 6:59 बजे )

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

[email protected]

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