(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ आलेख ☆ सुप्रसिद्ध लेखिका ममता कालिया को उदयराज सम्मान – अभिनंदन ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
सुप्रसिद्ध लेखिका श्रीमती ममता कालिया को प्रतिष्ठित उदयराज सम्मान प्रदान किया जायेगा। फोन पर बधाई देते समय जब मैंने ममता जी की प्रतिक्रिया जाननी चाही तब उन्होंने कहा कि पूरे सात साल बाद उन्हें कोई पुरस्कार मिलेगा। सात साल पहले व्यास सम्मान मिला था । इस तरह मेरे घर व जीवन में बारिश के छींटे पड़े हैं ।
श्रीमती ममता कालिया ने कहा कि अब तो पत्र पत्रिकाओं से पहले जैसा पारिश्रमिक भी नहीं आता । पुरस्कारों और पारिश्रमिक पर जैसे धूल पड़ गयी हो ।
श्रीमती ममता कालिया ने स्वर्गीय उदयराज को भी स्मरण करते कहा कि मैं उनसे सन् 1970 में पटना में आयोजित एक समारोह में मिली थी । मैं मुम्बई से समारोह में भाग लेने आई थी और आयोजकों ने एक साधारण सी धर्मशाला में रहने की व्यवस्था कर रखी थी
मेरी दुविधा देखते हुए उदयराज जी मुझे अपने घर ले गये, जहां दूसरे लेखक भी पहुंच गये और माथे पर बिना शिकन डाले उन्होंने सभी का आतिथ्य किया।
पुरस्कार की घोषणा नई धारा, पटना के संपादक डाॅ प्रमथराज ने की, जोकि नई धारा के स्वामी व कुलपति भी हैं । श्री प्रमथराज ने बताया कि सम्मान स्वरूप ममता कालिया को एक लाख रुपये व स्मृति चिन्ह प्रदान किये जायेंगे। उन्होंने बताया कि डाॅ रामदरश मिश्र की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय समिति ने श्रीमती ममता कालिया का चयन किया।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। आज प्रस्तुत है स्व राजुरकर राज जी पर आपका आलेख ।)
(२७ सप्टेंबर १९६१ – १५ फेब्रुवारी २०२३)
आलेख ☆ स्मृति शेष राजुरकर राज : एक ज़िद्दी स्वप्न दृष्टा ☆ श्री सुरेश पटवा
हमारा वीर सिपाही इस बात को जानता था कि स्वप्न देखना आसान है लेकिन उसे सच की ज़मीन पर उतरना अत्यंत दुष्कर काम होता है। नामचीन साहित्यकारों की पांडुलिपियाँ, दैनिक उपयोग की चीजें, आवाजों के नमूने और न जाने क्या-क्या समेटने के जुनून ने घर में चीजों का ढेर लगाना शुरू कर दिया, और घर भी क्या डेढ़ कमरे का मकान जिसमें बैठक, शयन कक्ष, रसोई, गुसलख़ाना सब कुछ शामिल। चीजों का ढेर लगता जा रहा था। पति-पत्नी दोनों नौकरीशुदा। घर-गृहस्थी सम्भालना मुश्किल होता है तो इन बाहरी चीजों का ढेर लगाना झुँझलाहट और तकरार को जन्म देता था।
राजुरकर जानते थे कि स्वप्न वह नहीं जो सोते हुए नींद में देखे जाते हैं, बल्कि स्वप्न वह होता है जो आपकी नींद ही उड़ा दे। वे रात-रात भर जाग कर बहुमूल्य चीजों को व्यवस्थित करते। उन्हें इस तरह देखते जैसे कोई माँ अपने सोते बच्चे के मासूम चेहरे को निहार कर गर्व से भर जाती है।
उसके लिए संघर्ष का एक लम्बा रास्ता तय करना था। गृहस्थी और नौकरी की परेशानियाँ के बीच रास्ता आसान नहीं था। इसमें कदम-कदम पर कठिनाइयाँ उनका स्वागत करतीं। वास्तव में रास्ता तनावभरा होता। वो जानते थे कि जो इन रास्तों पर चलते हैं, उनकी राह में मुश्किलें आती ही हैं, पर उन्हें आसान रास्ता कतई पसंद नहीं था। वे सदैव नए रास्तों की तलाश में होते। यह जानते हुए भी कि यह नया रास्ता तनाव भरा होगा, फिर भी वे चल पड़ते अपना रास्ता स्वयं बनाते हुए एक तयशुदा मंजिल की ओर….। राजुरकर राज उन्हीं विरले लोगों में से हैं, जिन्हें अपना रास्ता स्वयं तलाशने और बनाने की ज़िद होती है, उन्हें उसी में आनंद आता था।
इस मुश्किल राह पर उनका साथ देने आये अशोक निर्मल। जिनकी अध्यक्षता में एक अनौपचारिक समिति गठित हुई। उन्हें दुष्यंत कुमार जी की पत्नी श्रीमति राजेश्वरी त्यागी जी का सहयोग मिलने लगा। दुष्यंत जी से जुड़ी चीजें क़रीने से रखी जाने लगीं। उन्होंने उस डेढ़ कमरे के मकान में “दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय” नाम का पौधा रोप दिया। दोनों उस पौधे को देखते, उसकी नाज़ुक पत्तियों की सहलाते, उसे धूप और पानी देते और बारिश में अति पानी और गर्मी के दिनों में धूल से बचाते। जब चीजों को सहेजने हेतु कमरा छोटा पड़ने लगा तो बड़ा मकान लेने की बात पर विचार हुआ। उन्होंने सितम्बर 1999 में नेहरू नगर स्थित उद्धवदास मेहता परिसर में एक मकान ले लिया। घर के सामान के साथ संग्रहालय भी नये आवास में घर के सदस्य की भाँति छोटे ट्रक पर लद कर पहुँच गया। नये आवास में घर के बाक़ी सदस्य अपनी-अपनी चीजों को व्यवस्थित करके बैठ गए। संग्रहालय की चीजों का ढेर राजुरकर राज का मुँह चिढ़ाता रहा। उन्होंने रात-रात भर जागकर चीजों को क़रीने से ज़माना शुरू किया। जगह की क़िल्लत ने झिकझिक और तकरार को जन्म दिया। लेकिन स्वप्न दृष्टा अडिग था। अपनी बनाई राह पर चलता रहा।
समिति का पंजीयन कराया। कार्यकारिणी गठित की। यह सब आसान नहीं होता। समिति का विधान बनाना, नियमित बैठक करना, सरकारी महकमे को प्रतिवेदन भेजना, आवश्यक धन की व्यवस्था करना और समिति में उपजते अंतर्विरोधों को सुलझाना, विघ्नसंतोषियों की चालों को काटना, ग़लत आलोचनाओं और निंदा को अनदेखा करना। राजुरकर की ज़िद अशोक निर्मल का साथ मिलने से इन सबका सामना करते हुए तय मंज़िल की तरफ़ बढ़ती रही।
यह एक छोटा-सा पौधा था, जिसे सपनों ने रोपा और जिसे अपनों का सम्बल मिला, वह आज सघन बटवृक्ष बन गया है। ढेर सारी उपलब्धियों के बीच राजुरकर भले ही अपने स्वास्थ्य को लेकर धीमे कदमों से चलते रहे, पर सच तो यह है कि उनके कदम सधे हुए थे। अपनी मिलनसारिता के चलते दोस्तों के साथ गति बनी रही। इस दौरान कई आपदाएँ भी आई, सभी का बहादुरी से सामना किया।
कितना बलिदान, कितना श्रम, कितना धन, कितनी पीड़ा व कितना समर्पण, इन सबसे गुजरकर राजुरकर ने अपना तन मन धन अर्पित कर अपने भीतर संजोये स्वप्न को ग्लेशियर के पिघलने की गति से साकार किया। अपने दो कमरे के आवास का एक कमरा “संग्रहालय“ बना दिया था। बाक़ी पूरा परिवार एक कमरे में गुज़ारा करता था।
राजुरकर राज के इस कार्य में प्रमुख रूप से सहयोग करने वालों में कुछ नाम का उल्लेख वो हमेशा करते थे, अशोक निर्मल, बाबूराव गुजरे, घनश्याम मैथिल, आर एस तिवारी, श्रीमती करुणा राजुरकर। बाद में पुत्रवत संजय राय आ जुड़े। जिनके सहयोग के बिना ये दुष्कर कार्य संभव नहीं हो सकता था।
कई साथी इस सफर में शामिल हुए, तो कई बिछुड़ भी गए। मिलने और बिछुड़ने के इस क्रम में भाई राजुरकर का स्वास्थ्य भी उनका साथ छोड़ने लगा था। अपनों का प्यार और कुछ कर गुज़रने मी ज़िद उन्हें वापस अपने कर्मपथ पर ले आता था। दुर्लभ, अनोखी और अनमोल धरोहर के बीच राजुरकर भी अनमोल होते चले गए। उनके ख़्वाब को पंख तो लग गये लेकिन मुश्किलें कम नहीं थीं। 1997 से यह सफर शुरू हुआ, 2023 तक न जाने कितने पड़ाव तय किए। सबका लेखा जोखा नहीं किया जा सकता।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लडुअन का भोग…“।)
अभी अभी # 493 ⇒ लडुअन का भोग… श्री प्रदीप शर्मा
बधाई हो बधाई
जन्मदिन पे तुमको
तुम्हारी होगी शादी
मिलेंगे लड्डू हमको…
हमें अच्छी तरह याद है प्रयागराज वाले शुक्ल जी के यहां, उनके सुपुत्र के शुभ विवाह के मंगल प्रसंग के अवसर पर, उनके द्वारा भेजे गए प्रेम रस से सराबोर लड्डुओं का हमने यहां सुदूर, इंदौर में आस्वादन किया था।
उन्हें शायद पता था, लड्डू हमारी कमजोरी है। लड्डू पेड़े की जोड़ी बहुत पुरानी है। हर खुशी के मौके पर लड्डू बांटे जाते हैं। लड्डू की महिमा इतनी विचित्र है, कि कभी कभी तो बिना खाए ही मन में लड्डू फूटने लगते हैं।।
पकवान कोई भी हो, बिना दूध और घी के नहीं बनता। घी भी एक तरह से मिल्क प्रोडक्ट ही तो है।
हर प्रकार के दूध में कम अथवा ज्यादा मात्रा में एनिमल फैट होता है जिसे बोलचाल की भाषा में फैट कहा जाता है। दूध पीने से बच्चे ताकतवर बनते हैं।
मां के दूध का कोई विकल्प नहीं।
मैं बचपन से ही भैंस को दूध पीता चल रहा हूं, क्योंकि भैंस के दूध में ज्यादा मलाई आती है। अक्ल बड़ी कि भैंस ? हो सकता है, भैंस के दूध से मुझे कम अक्ल आए, लेकिन फिर भी मेरी अक्ल कभी घास चरने नहीं गई।।
मलाई दूध की हो अथवा दही की, बिल्ली के मुंह मारने के पहले मैं चट कर जाता हूं। रबड़ी शब्द सुनकर तो आज भी मेरे मुंह में पानी आ जाता है।
मुझे डालडा घी से एलर्जी है। असली घी अगर मिलावट वाला हुआ तो मेरी खैर नहीं, एकदम सांस चलने लगती है, इसलिए बहुत सोच समझ कर कम मात्रा में ही दूध और शुद्ध घी से बने पदार्थों का सेवन करना पड़ता है। दूध की अधिक मलाई से घर में ही डेयरी खुल जाती है, असली घी, मक्खन और छाछ आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
खाद्य पदार्थों में मिलावट एक दंडनीय अपराध तो है ही लेकिन करोड़ों लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ पाप की श्रेणी में आता है। अपराधियों को दंड तो खैर कानून दे ही देगा लेकिन जो पाप के भागी हैं, उनका हिसाब तो ऊपर वाला ही करेगा। एक आस्थावान भक्त तो सिर्फ प्रायश्चित ही कर सकता है।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मक्खी, मच्छर, खटमल…“।)
अभी अभी # 492 ⇒ मक्खी, मच्छर, खटमल… श्री प्रदीप शर्मा
हमारे युग ने भले ही डायनासोर की प्रजाति को ना देखा हो, लेकिन जुरासिक पार्क तो देखा है, मक्खी मच्छर से तो हमारा रोज पाला पड़ता है लेकिन खटमल की तो अब केवल याद ही शेष रह गई हैं।
आज भी मक्खी को उड़ाया जाता है और मच्छर को मारा जाता है, क्योंकि मक्खी गंदगी फैलाती है और मच्छर मलेरिया चिकनगुनिया और डेंगू जैसी जानलेवा बीमारियां। जो प्रबुद्ध नागरिक बढ़ती जनसंख्या और स्वास्थ्य के प्रति सजग होते हैं, वे छोटे परिवार के साथ ही पेस्ट कंट्रोल द्वारा अपने परिवार की बीमारियों से रक्षा करते हैं।
मक्खी मच्छरों को गंदगी बहुत पसंद होती है। जहां तहां रुके हुए पानी और गंदे नालों में इनकी आबादी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रहती है। मक्खी तो सुना है, जहां बैठती है वहीं अंडे देना शुरू कर देती है। जीव: जीवस्य भोजनम् के सिद्धांत के अनुसार ये कीट पतंग भी किसी का भोजन हैं, इसीलिए ये जीव समुद्र की मछली की तरह थोक में पैदा होते हैं। ।
आज की पीढ़ी ने शायद खटमल का सिर्फ नाम ही सुना होगा देखा नहीं होगा। ये जीव अपने आप में चलते-फिरते ब्लड बैंक होते थे, क्योंकि हमारा खून ही इनका भोजन होता था। जो लोग इन खटमलों के दौर से गुजरे हैं वे जानते हैं, यह गीत उनके लिए ही लिखा गया था ;
करवटें बदलते रहे
सारी रात हम
आपकी कसम
आपकी कसम
घर की कुर्सियों में, खाट में, अलमारी में, दीवारों के गड्ढे में, कहां नहीं होते थे ये खटमल। रात होते ही ये अपने घरों से निकल पड़ते थे इंसान का खून पीने।
घासलेट यानी केरोसिन इनका दुश्मन था। अब आप बिस्तर में तो घासलेट नहीं छिड़क सकते ना। इसलिए रात रात भर जागकर, एक पानी की कटोरी में इन्हें गिरफ्तार किया जाता था, तब जाकर इंसान रात में चैन की नींद सो पाता था।
सुना है जिन देशों में मच्छर नहीं है वहां मलेरिया भी नहीं है। काश खटमल की तरह यह मच्छर की प्रजाति भी हमारा पीछा छोड़ दे तो हम कितनी जान लेवा बीमारियों से बच सकते हैं। कहते हैं, Prevention is better than cure, यानी रोकथाम, इलाज से बेहतर है। बढ़ती जनसंख्या की तरह ही, गंदगी भी अभिशाप है। ।
सफाई और बदबू का आपस में क्या मेल ? ऐसा क्यों होता है कि हमें आसपास सफाई तो नजर आ जाती है लेकिन फिर भी ना जाने कहां से, नाक में बदबू भी प्रवेश कर ही जाती है। तामसी और सड़ा हुआ भोजन बहुत जल्दी बदबू फैलाता है।
इंपोर्टेड परफ्यूम और डिओडरेंट का प्रचलन बाजार में यूं ही नहीं है।
मच्छरों से लड़ने के लिए हमारे पास बहुत हथियार हैं, ऑल आउट, ऑडोमास और काला हिट। बाजार में खुली मिठाइयों पर मक्खियों का राज होता है। कटे फल और देर तक रखा हुआ सलाद भी इनकी नजर से बच नहीं सकता। मक्ख महारानी गंदे नाले से निकलकर आती है, और भोजन पदार्थ पर बैठकर अंडे देकर चली जाती है। हमारे पास कहां माइक्रोस्कोप है। सुरक्षा और सावधानी ही इसका एकमात्र विकल्प है।
याद आती है, वह धुएं की मशीन, जो डीडीटी छिड़ककर कभी मोहल्ले से मच्छरों का सफाया करती थी। ।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हिंदी पखवाड़ा…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 215 ☆हिंदी पखवाड़ा… ☆
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सागर में मिलती धाराएँ, हिन्दी सबकी संगम है।
शब्द, नाद, लिपि से भी आगे, एक भरोसा अनुपम है। ।
गंगा कावेरी की धारा, साथ मिलाती हिन्दी है।
पूरब- पश्चिम, कमल- पंखुरी, सेतु बनाती हिन्दी है। ।
– गिरजा कुमार माथुर
हिन्दी का गुणगान करती हुयी अद्भुत पंक्ति अपने आप में सबके हृदय की भावनाओं का उद्गार ही है जो कवि गिरजा कुमार माथुर जी की लेखनी से प्रस्फुटित हुआ।
राष्ट्र निर्माण का कार्य हमारे शिक्षक बखूबी करते हैं। भारत के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन जी के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाकर हम सभी अपने शिक्षकों को नमन करते हुए उनके दिखाए रास्तों को याद कर उस पर चलने हेतु हर वर्ष संकल्प लेते हैं।
हिन्दी को जब तक हम बोलचाल, लेखन, कार्यालयीन व अध्ययन में शामिल नहीं करेंगे तब तक इसे राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित होने के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा। हमें प्रान्तवाद से ऊपर उठ कर देशहित में चिंतन करना चाहिए। जहाँ के निवासी अपनी भाषा व बोली का सम्मान नहीं करते उनका विकास वहीं रुक जाता है।
हम सबको एक जुट होकर संकल्प लेना चाहिए कि केवल हिन्दी को ही बढ़ावा देंगे। विश्व गुरु बनने की चाहत मातृ हिन्दी के प्रयोग से ही संभव हो सकती है।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख– “बाल साहित्यकार कैसा हो?”)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 188 ☆
☆ जो बच्चों को जाने वही बाल साहित्यकार : जो बच्चों को दुनिया की सैर कराएं ☆
क्या सच में सिर्फ बच्चे को जानने वाला ही बाल साहित्यकार हो सकता है?
यह एक दिलचस्प सवाल है जिसके जवाब में हमें बाल साहित्य की गहराइयों में उतरना होगा। क्या बाल साहित्य सिर्फ मनोरंजन का माध्यम है या इससे कहीं ज्यादा है? क्या एक बाल साहित्यकार का काम सिर्फ बच्चों को कहानियां सुनाना है या उनका मन और मस्तिष्क भी विकसित करना है?
बाल साहित्य: सिर्फ कहानियां नहीं
बाल साहित्य बच्चों के लिए एक खिड़की की तरह होता है, जिसके ज़रिए वे दुनिया को देखते हैं। यह उनके मन को समृद्ध करता है, उनकी कल्पना शक्ति को बढ़ाता है और उन्हें जीवन के मूल्यों से परिचित कराता है। एक अच्छा बाल साहित्यकार न केवल बच्चों को मनोरंजन करता है बल्कि उन्हें सोचने, समझने और सवाल करने के लिए प्रेरित भी करता है।
बच्चों को जानना जरूरी, लेकिन काफी नहीं
हाँ, यह सच है कि एक बाल साहित्यकार को बच्चों की मनोदशा, उनकी रुचियों और उनकी भाषा को अच्छी तरह समझना चाहिए। लेकिन सिर्फ इतना ही काफी नहीं है। एक सफल बाल साहित्यकार को एक अच्छे लेखक की तरह होना भी जरूरी है। उसे कहानी कहने की कला आनी चाहिए, पात्रों को जीवंत बनाना आना चाहिए और भाषा पर पकड़ होनी चाहिए। वह क्या लिखकर क्या संदेश भेज देना चाहता है? यह सब बातें उसे आनी चाहिए।
बच्चे जिस चीज के बारे में नहीं जानते हैं उस अज्ञात चीजों को बातें करके उनकी रूचि और जिज्ञासा को बढ़ाया जा सकता है। उदाहरण के लिए हम रूडयार्ड किपलिंग का उदाहरण लें। उन्होंने ‘जंगल बुक’ जैसी कहानियों के माध्यम से बच्चों को प्रकृति और जानवरों के बारे में बहुत कुछ सिखाया। चूँकि बच्चे उनके बारे में नहीं जानते हैं इसलिए ऐसी कहानी पढ़ने में उनकी बहुत जरूरी रहती है। ऐसी कहानियों को आनंद के साथ पढ़ते हैं।
एक अच्छा बाल साहित्यकार वह होता है जो:
बच्चों की भाषा में लिखता है: वह ऐसी भाषा का प्रयोग करता है जिसे बच्चे आसानी से समझ सकें।
कल्पना शक्ति को बढ़ाता है: वह बच्चों की कल्पना शक्ति को उड़ान देने के लिए नए-नए विचारों और कहानियों का प्रयोग करता है।
सकारात्मक मूल्यों को बढ़ावा देता है: वह बच्चों में सत्य, अहिंसा, प्रेम और करुणा जैसे गुणों को विकसित करने के लिए प्रेरित करता है।
बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित करता है: वह बच्चों को सवाल करने और अपनी राय बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
बच्चों के हितों को ध्यान में रखता है: वह ऐसी कहानियाँ लिखता है जो बच्चों को पसंद आती हैं और उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं।
निष्कर्ष
बाल साहित्यकार होना सिर्फ एक बच्चे को जानने से कहीं ज्यादा है। यह एक कला है, एक शिल्प है, एक भाव और एक जिम्मेदारी भी है। एक अच्छा बाल साहित्यकार बच्चों के लिए एक मित्र, एक गुरु, एक पालक और एक मार्गदर्शक होता है। वह बच्चों के मन में बीज बोता है जो पूरे जीवन भर फलते-फूलते रहते हैं।
अंत में, यह कहना गलत होगा कि सिर्फ बच्चे को जानने वाला ही बाल साहित्यकार हो सकता है। एक सफल बाल साहित्यकार वह होता है जो बच्चों को जानने के साथ-साथ एक अच्छा लेखक भी होता है।
आप क्या सोचते हैं? क्या आप सहमत हैं इस बात से कि सिर्फ बच्चे को जानने वाला ही बाल साहित्यकार हो सकता है?
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक आलेख – “कृषि और देश की सुरक्षा को बराबर महत्व देने वाले हमारे दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 306 ☆
आलेख – कृषि और देश की सुरक्षा को बराबर महत्व देने वाले हमारे दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
2 अक्टूबर को महात्मा गांधी के जन्मदिन के साथ-साथ स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन है। जब दूसरे भारत पाकिस्तान युद्ध के समय हमे अपनी खाद्य जरूरतों के लिए अमेरिका का मुंह देखना पड़ा तो स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का महत्वपूर्ण नारा दिया था। उन्होंने देश व्यापी उपवास को अपना अस्त्र बनाया। जनता में देश के लिए उत्सर्ग का आचरण प्रदर्शित किया। आम लोगों ने उनके आव्हान पर आगे बढ़कर प्रधानमंत्री सहायता कोष में अपने गहने दान किए। सदैव अपने परिश्रम, कर्तव्य और आचरण से ईमानदारी और सादगी की एक अनुकरणीय मिसाल उन्होंने बनाई । छोटी उम्र में ही उनने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया था, और कई लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने।
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन, मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एक स्कूल शिक्षक थे। जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। तब उनकी माँ रामदुलारी देवी अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर मिर्जापुर जाकर बस गईं। यहीं पर शास्त्री जी का पालन पोषण हुआ और उनकी प्राथमिक शिक्षा शुरू हुई। कहा जाता है कि उस छोटे-से शहर में शास्त्री जी की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही उन्होंने वहाँ काफी विषम परिस्थितियों में शिक्षा हासिल की। वहीं उन्हें स्कूल जाने के लिए रोजाना मीलों पैदल चलना और नदी पार करनी पड़ती थी। बड़े होने के साथ ही शास्त्री जी ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए देश के संघर्ष में रुचि रखने लगे। वे भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से अत्यंत प्रभावित हुए थे। शास्त्री जी जब केवल ग्यारह वर्ष के थे तब से ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था। शास्त्री जी स्वतंत्रता के पहले आजादी की लड़ाई के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता थे। वे स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लेते थे। आंदोलन के लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई से भी समझौता किया। वर्ष 1930 में शास्त्री जी को कांग्रेस कमेटी के स्थानीय इकाई का सचिव बनाया गया था। शास्त्री जी स्वतंत्रता आंदोलन के उन क्रांति कारी नेताओ में शामिल हैं जिन्हें 1942 में ब्रिटिश गर्वेमेंट द्वारा जेल में बंद किया गया था। देश के आजाद होने के बाद उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वो आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में पुलिस मंत्री भी रहे थे। इसके बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें केंद्र में रेल मंत्री का पद दिया। पर शास्त्री जी के लिए नैतिकता सबसे उपर थी, 1956 में हुई एक रेल दुर्धटना के कारण उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद वे एक बार फिर 1957 में परिवहन और संचार मंत्री बने। इसके बाद 1961 में वे गृह मंत्री बनाए गए। वर्ष 1925 में काशी विद्यापीठ से ग्रेजुएट होने के बाद उन्हें “शास्त्री” की उपाधि दी गई थी। ‘शास्त्री’ शब्द एक ‘विद्वान’ या एक ऐसे व्यक्ति को इंगित करता है जिसे शास्त्रों का अच्छा ज्ञान हो। काशी विद्यापीठ से ‘शास्त्री’ की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा सरनेम ‘श्रीवास्तव’ हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया। 16 मई 1928 में शास्त्री जी का विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता जी से हुआ। उनके क्रान्ति कारी सामाजिक विचार इसी से समझे जा सकते हैं की उन्होंने अपनी शादी में दहेज लेने से इनकार कर दिया था। लेकिन अपने ससुर के बहुत जोर देने पर उन्होंने कुछ मीटर खादी का दहेज लिया था। गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए देशवासियों से एकजुट होने का आह्वान किया था, उस समय शास्त्री जी केवल सोलह वर्ष के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था। वर्ष 1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा शुरू की। इस प्रतीकात्मक सन्देश ने पूरे देश में एक तरह की क्रांति ला दी। शास्त्री जी विह्वल ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता के इस संघर्ष में शामिल हो गए। उन्होंने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया एवं कुल सात वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में रहे। आजादी के इस संघर्ष ने उन्हें पूर्णतः परिपक्व बना दिया। स्वतंत्रता संग्राम के जिन जन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें वर्ष 1921 का ‘असहयोग आंदोलन’, वर्ष 1930 का ‘दांडी मार्च’ तथा वर्ष 1942 का ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ महत्वपूर्ण है। लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे उससे पहले जब नेहरू जी बीमार थे वे बिना विभाग के मंत्री के रूप में सारा काम देख ही रहे थे। नेहरू जी मृत्यु के 13 दिनों बाद उन्होंने प्रधानमंत्री का पद संभाला। अन्न संकट के कारण तब देश भुखमरी की स्थिति से गुजर रहा था। वहीं 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था। उसी दौरान अमरीकी राष्ट्रपति ने शास्त्री जी पर दबाव बनाया कि अगर पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई बंद नहीं की गई तो हम गेहूँ के आयात पर प्रतिबंध लगा देंगे। यह वो समय था जब भारत गेहूँ के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था इसलिए शास्त्री जी ने देशवासियों को सेना और जवानों का महत्व बताने के लिए ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था। इस संकट के काल में शास्त्री जी ने अपनी तनख्वाह लेना भी बंद कर दिया था और देशवासियों से कहा कि हम हफ़्ते में एक दिन का उपवास करेंगे। पाकिस्तान के साथ वर्ष 1965 का युद्ध खत्म करने के लिए वह समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान से मिलने गए थे लेकिन इसके ठीक एक दिन बाद 11 जनवरी 1966 को अचानक खबर आई कि हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई है। हालांकि उनकी मृत्यु पर वर्तमान समय में भी संदेह है। भारत सरकार ने वर्ष 1966 में लाल बहादुर शास्त्री को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित कर उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन किया था। उनके सिद्धांत आज भी प्रेरक और प्रासंगिक हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मुफ्त हुए बदनाम…“।)
अभी अभी # 491 ⇒ मुफ्त हुए बदनाम… श्री प्रदीप शर्मा
सस्ता रोये बार बार, महंगा रोये एक बार, और अगर मुफ़्त हुआ तो मुफ़्त में हुए बदनाम ! लो जी, यह क्या बात हुई। मुफ़्त में सांस ले छोड़ रहे हैं, 24 x 7 मुफ़्त की हवा खा रहे हैं, तब किसी का पेट नहीं दुखता, नेता लोग मुफ़्त में भाषण टिका जाते हैं, लोग घर आकर चाय भी पी जाते हैं और ऊपर से नॉन स्टॉप कविताएं भी मुफ़्त में सुना जाते हैं, लेकिन हमने कभी उफ नहीं की, किसी को बदनाम नहीं किया और सड़ी सी ₹ 21.43 पैसे की गैस सब्सिडी के पीछे मुफ्तखोरी का इल्ज़ाम ? हमने क्या राइटिंग में लिखके दिया था कि हमको सब्सिडी दो।
हां, हमने यह गलती जरूर की कि एक जागरूक मतदाता की तरह आपको मुफ्त में हमारा कीमती वोट जरूर दे दिया।
हम जानते हैं, माले मुफ्त बेरहम क्या होता है। हम इतने रहमदिल हैं कि किसी को मुफ्त में सलाह भी नहीं देते। लेकिन लोग हैं कि यह तो कह जाते हैं कि हमने लाख रुपए की बात कह दी, लेकिन उनकी जेब से बदले में फूटी कौड़ी तक नहीं निकलती। भलाई का जमाना नहीं होते हुए भी, हम भलाई करने से नहीं चूकते। ।
मुफ़्त को अंग्रेजों की भाषा में फ्री कहते हैं। और शायद इसीलिए कुछ लोग यह मान बैठे हैं कि हमें आजादी भी फ्री में ही मिली है। Freedom at midnight को जब मैने लोगों को, मध्यरात्रि को मुफ्त में मिली आजादी कहते सुना, तो मुझे बड़ा बुरा लगा। ऐसे में मुझे अपना खुद्दार शायर साहिर याद आ गया, जो कह गया, जिंदगी भीख में नहीं मिलती, जिंदगी बढ़के छीनी जाती है। हमने आजादी के लिए भी कुर्बानियां दी हैं। हम आजादी लड़ के लेते हैं लेकिन दुआ सदा मुफ्त में ही देते हैं ;
कर चले हम फिदा जानो तन साथियों
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों …
वैसे मुफ्त का भी मनोविज्ञान होता है। कवि शैलेंद्र तो कह गए हैं, ज्यादा की नहीं लालच हमको, थोड़े में गुजारा होता है, लेकिन हकीकत में, थोड़े में ज्यादा का लालच, तो सबको होता ही है। एक हमारा समय था, जब २५-५० रुपए की सब्जी की खरीदी में सब्जी वाला खुशी से हरा धनिया अपनी ओर से डाल देता था। उसने एक ओर तो हमारी आदत बिगाड़ी और आज अगर हम दो तीन सौ की सब्जी लें, और मुफ्त में थोड़ा सा हरा धनिया मांगें तो वह हमें घूरने लगता है। बाबू साब, दो सौ रुपए किलो है धनिया। दस रूपए का पचास ग्राम। ।
एक तो एक के साथ एक फ्री के लालच में हम वैसे ही कई अनावश्यक वस्तुएं घर उठा लाते हैं और फिर किसी ऐसे आयोजन की राह देखते रहते हैं जिस अवसर पर उसे उपहार के रूप में एडजस्ट कर लिया जाए। बिना लिफाफे अथवा गिफ्ट के क्या कहीं कोई जाता है। बड़ी बड़ी गिफ्ट के आगे आजकल लिफाफा बहुत छोटा नजर आने लगता है। फिर शुरू होता है लिफाफा वसूली का दौर। लोग भोजन पर ऐसे टूट पड़ते हैं, मानो दो साल से कोविड के कारण बाहर का कुछ खाया ही न हो। अपनी छोटी सी प्लेट में छप्पन दुकान सजाने का शौक सबको होता है। कुछ खाया, कुछ कूड़ेदान के हवाले किया। जब जूठा छोड़ने पर उतने भोजन की कीमत पेनल्टी स्वरूप वसूल की जाने लगेगी तब ही हमें अन्न का महत्व पता चलेगा। मुफ्तखोरी से बड़ा अपराध चीजों का अपव्यय है, जूठा छोड़ना क्या अन्न का अपमान नहीं।
आजकल किसी का नाम यूं ही नहीं होता। लोग नाम के लिए दान पुण्य करते हैं, धर्मशाला, गौशाला बनवाते हैं, समाज सेवा करते हैं। बिना कीमत के नाम भले ही न हो, बदनामी तो आज भी मुफ्त में ही मिल जाती है। मुफ्त हुए बदनाम, हाय किसी से दिल को लगा के। ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चार्जर और रिचार्ज…“।)
अभी अभी # 490 ⇒ चार्जर और रिचार्ज… श्री प्रदीप शर्मा
हम सांस लेते हैं इसलिए जिंदा है, जब तक सांस है तब तक आस है। मोबाइल खेत में पैदा नहीं होते उन्हें फैक्ट्री में बनाया जाता है। हार्डवेयर सॉफ्टवेयर के चक्कर में अगर ना भी पड़ें तो एक मोबाइल में बैटरी और सिम दोनों जरूरी है। बैटरी चार्ज करने के लिए अगर चार्जर है तो जिस कंपनी की सिम है वही उसे यथायोग्य शुल्क पर रिचार्ज करती है। यानी आपको अपने मोबाइल को चार्ज भी करते रहना है भी करना है और रिचार्ज भी।
कुछ नई पीढ़ी के युवा फोन का इतना उपयोग करते रहते हैं कि उनका मोबाइल हमेशा चार्जिंग पर ही लगा रहता है। मोबाइल चार्ज भी हो रहा है और वे बातें भी करते जा रहे हैं। ट्रेन में यह दृश्य आसानी से देखा जा सकता है। बैटरी चार्ज करते समय मोबाइल का उपयोग किसी खतरे को आमंत्रण देना है लेकिन कौन सुनता है, समझते सब हैं।।
हमारे शरीर की बैटरी भी खाने-पीने और व्यायाम करने से ही चलती है। उसे समय-समय पर आराम भी देना पड़ता है। जब बैटरी डाउन होती है तो उसे रिचार्ज करना पड़ता है, एक गर्मागर्म चाय का प्याला छोटा रिचार्ज और दही की लस्सी यानी 2 घंटे की छुट्टी।
मेरा मोबाइल ज्यादा पुराना नहीं उसकी उम्र मुश्किल से 3 वर्ष की होगी। अच्छा खाता पीता मोबाइल है रोज चार्ज होता है। एकाएक एक दिन चार्जर ने हाथ खड़े कर दिए। घर में लाइट भी है फिर भी मोबाइल चार्ज नहीं हो रहा। मोबाइल की सांस थम चुकी है, स्क्रीन पर बैटरी जीरो दर्शा रही है। ।
भले ही मेरे मोबाइल में दो जिस्म है यानी दो सिम हैं लेकिन जान तो एक ही है न। हम दोनों पति-पत्नी के बीच केवल एक ही मोबाइल है। पत्नी के लिए अलग से लैंडलाइन फोन की व्यवस्था है। मेरी आस्था अगर फेसबुक में है तो उसकी आस्था टीवी के धार्मिक चैनल में है। उसके संस्कार सत्संग के और मेरे संस्कार मुख्य पोथी और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के।
उसका टीवी पर सत्संग देर रात तक चला करता है और मेरी सुबह कुछ जल्दी ही हो जाती है। यह आदत अभी-अभी की नहीं है बहुत पुरानी है।
जिनके घरों में एक से अधिक मोबाइल होते हैं उनके पास चार्जर भी बहुत होते हैं। मुझ एक मोबाइल धारक के पास दूसरा चार्जर कहां से आएगा। बिना मोबाइल के मेरा पत्ता भी नहीं हिलता। जल्दबाजी में एक लोकल चार्जर खरीदा जिसने घर में कदम रखते ही मोबाइल चार्ज करने से मना कर दिया। उसे तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और सबसे पहले एक ऐसे पड़ोसी की सेवाएं ली गई, जिसके पास एक्स्ट्रा चार्जर उपलब्ध था। कभी पड़ोसी से एक कटोरी चाय और शक्कर मांगी जाती थी और आज एक अदद चार्जर मांगना पड़ रहा है। मोबाइल को हंड्रेड परसेंट चार्ज कर दिया और चार्जर वापस पड़ोसी को लौटा दिया गया। फोन की बैटरी ऑफ कर दी गई ताकि काम के समय फोन चालू किया जाए और बाद में वापस बैटरी ऑफ कर दी जाए। यानी पहली बार मोबाइल को भी थोड़ा आराम मिला। ।
वैसे रात को सोते वक्त भी मैं मोबाइल को आराम करने देता हूं बैटरी ऑफ कर देता हूं लेकिन बेचारा सवेरे बहुत जल्दी काम पर लग जाता है। अगर दिन में मोबाइल अधिक समय के लिए बंद कर दिया जाए तो लोगों को चिंता हो जाती है। वैसे कोई चिंता नहीं करता लेकिन जब फोन नहीं लगता तो न जाने कहां से चिंता प्रकट हो जाती है।
फिलहाल तीन महीने की गारंटी पर एक लोकल चार्जर उपलब्ध हुआ है बहुत जल्द किसी अच्छी कंपनी का चार्जर ऑर्डर कर दिया जाएगा। मोबाइल का साथ मेरा दस पंद्रह साल पुराना है।
अकेले में यही दोस्त है यही रहबर है। इसी के कारण तो हमारा आपका भी साथ हुआ है। रिश्तों का रिचार्ज भी कितना जरूरी है आजकल। धन्यवाद चार्जर, आप हैं तो रिचार्ज है, आप हैं तो मोबाइल है। ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पिता का घर…“।)
अभी अभी # 489 ⇒ पिता का घर… श्री प्रदीप शर्मा
मेरी मां का मायका अगर मेरा ननिहाल हुआ तो मेरी पत्नी का मायका मेरा ससुराल। मेरे पिता का घर तो खैर मेरा ही हुआ लेकिन उनका भी एक पैतृक गांव था जिसे वे बचपन में ही छोड़कर अपनी बड़ी बहन, यानी मेरी बुआ के घर इंदौर आ गए थे। हमारा पैतृक गांव सेमरी हरचंद था, जो इंदौर और पचमढ़ी सड़क मार्ग पर होशंगाबाद और सोहागपुर के बीच स्थित है।
सेमरी से २१ km की दूरी पर ही ग्राम बाबई स्थित है। हमारे काका, बाबा का भी पैतृक स्थान सेमरी हरचंद और बाबई ही रहा। बाबई, एक भारतीय आत्मा, दद्दा माखनलाल चतुर्वेदी का भी जन्म स्थान रहा है। इसीलिए आजकल बाबई तो माखन गांव भी कहा जाने लगा है। ।
सेमरी हरचंद के हमारे घर के सामने एक पंचायती मंदिर था, जहां के पुजारी कभी हमारे दादा परदादा ही थे। जब कभी पिताजी गांव जाते थे तो वहां से उनकी चिट्ठीयां आया करती थी जिन पर नाम के साथ पता लिखा रहता था, पंचायती मंदिर के सामने, सेमरी हरचंद, जिला होशंगाबाद।
पिताजी के बड़े भाई, जिन्हें हम बाबा साहब कहते थे, के देहावसान के पश्चात् हमारे पिताजी अधिकांश समय सेमरी में ही रहे।
वहां उन्होंने पुराने मकान का जीर्णोद्धार किया और उसका कुछ हिस्सा अपने पास रखकर शेष को किसी कोऑपरेटिव बैंक को किराए से दे दिया। मेरी अपने पुश्तैनी गांव में कोई रुचि नहीं थी, क्योंकि तब गांव के अधिकांश लोग बीड़ी पीते थे। या कहें मुझ में एक शहरी के संस्कार पड़ चुके थे। ।
पिताजी के बाद हमने गांव की जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा और मकान भी कौड़ियों के मोल बेच दिया, क्योंकि घर का कोई भी सदस्य इस स्थिति में नहीं था कि वह गांव में रहकर मकान की देखभाल कर सके।
आज मेरे ननिहाल में भी कोई नहीं और मेरे पैतृक गांव में भी हमारा नाम लेने वाला कोई नहीं। एक बार शहर से जुड़ने के बाद तो मानो हम अपनी जड़ से ही उखड़ गए। अपनी पुरानी पहचान खो देने के बाद हम अपने आप में ही अजनबी हो गए हैं। गांव के स्वर्ग को छोड़कर शहर के जंगल में जीना आज हमारी मजबूरी भी है और एक कड़वा सच भी।।
खुशनसीब हैं वे लोग जो आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। उनका अपना ननिहाल है और अपना पैतृक स्थान। ढलती उम्र में समय भी कितना बदल जाता है। ना आप अपने को बदल सकते ना समय को।
जिस तेजी से गांवों का शहर में विलय हो रहा है, कहीं ऐसा ना हो, हमें असली गांव देखने को ही ना मिले। शायद इसीलिए गुडगांव को आजकल गुरुग्राम कहा जाने लगा है, जहां गुड़ और गांव जैसा कुछ नहीं।।