हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 280 – छत्रछाया ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 280 ☆ छत्रछाया… ?

प्रातः भ्रमण के बाद पार्क में कुछ देर व्यायाम करने के लिए बैठा। व्यायाम के एक चरण में दृष्टि आकाश की ओर उठाई। जिन पेड़ों के तनों के पास बैठकर व्यायाम करता हूँ, उनकी ऊँचाई देखकर आँखें फटी की फटी रह गईं। लगभग 70 से 80 फीट ऊँचे, विशाल पेड़ एवम उनकी घनी छाया। हल्की-सी ठंड और शांत वातावरण, विचार के लिए पोषक बने। सोचा, माता-पिता भी पेड़ की तरह ही होते हैं न! हम उन्हें उतना ही देख-समझ पाते हैं जितना पेड़ के तने को। तना प्रायः हमें ठूँठ-सा ही लगता है। अनुभूत होती इस छाया को समझने के लिए आँखें फैलाकर ऊँचे, बहुत ऊँचे देखना होता है। हमें छत्रछाया देने के लिए निरंतर सूरज की ओर बढ़ते और धूप को ललकारते पत्तों का अखण्ड संघर्ष समझना होता है। दुर्भाग्य यह कि अधिकांश मामलों में छाया समाप्त हो जाने पर ही समझ आता है, माँ-बाप का साया सिर पर होने का महत्व ! …

अँग्रेज़ी की एक लघुकथा इसी सार्वकालिक सार्वभौम दर्शन का शब्दांकन है। छह वर्ष का लड़का सामान्यत: कहता है, ‘माई फादर इज़ ग्रेट।’ बारह वर्ष की आयु में आते-आते उसे अपने पिता के स्वभाव में ख़ामियाँ दिखने लगती हैं। उसे लगता है कि उसके पिता का व्यवहार  विचित्र है। कभी बेटे की आवश्यकताएँ पूरी करता है, कभी नहीं। किशोर अवस्था में उसे अपने पिता में एक गुस्सैल पुरुष दिखाई देने लगता है। युवा होने पर सोचता है कि मैं अपने बच्चों को दुनिया से अलग, कुछ हटकर-सी परवरिश दूँगा।…फिर उसकी शादी होती है। जीवन को देखने की  दृष्टि बदलने लगती है। वह पिता बनता है। पिता होने के बाद  अपने पिता का दृष्टिकोण उसे समझ आने लगता है। दस-बारह साल के बच्चे की हर मांग पूरी करते हुए भी कुछ छूट ही जाती हैं। यह विचार भी होता है कि यदि जो मांगा, उपलब्ध करा दिया गया तो बच्चा ज़िद्दी और खर्चीले स्वभाव का हो जायेगा। बढ़ते खर्च के साथ वह विचार करने लगता है कि उसके पिता सीमित कमाई में सारे भाई-बहनों की पढ़ाई का खर्च कैसे उठाते थे! उधर उसका बेटा/ बेटी भी उसे लगभग उसी तरह देखते-समझते हैं, जैसे उसने अपने पिता को देखा था। आगे चलकर युवा बेटे से अनेक बार अवांछित टकराव होता है। फिर बेटे की शादी हो जाती है। …चक्र पूरा होते-होते बचपन का वाक्य, काल के परिवर्तन के साथ, जिह्वा पर लौटता है, वह बुदबुदा उठता है, ‘माई फादर वॉज़ ग्रेट।’

अनुभव हुआ, हम इतने बौने हैं कि पेड़ हों या माता-पिता, लंबे समय तक गरदन उठाकर उनकी ऊँचाई निहार भी नहीं सकते, गरदन दुखने लगती है। गरदन दुखना अर्थात अनुभव ग्रहण करना। यह ऊँचाई इतने अधिक अनुभव की मांग करती है कि ‘इज़’ के ‘वॉज़’ होने पर ही दिखाई देती है।

…ईश्वर सबके सिर पर यह ऊँचाई और छत्रछाया लम्बे समय तक बनाये रखें।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️💥 श्री शिव महापुराण का पारायण सम्पन्न हुआ। अगले कुछ समय पटल पर छुट्टी रहेगी। जिन साधकों का पारायण पूरा नहीं हो सका है, उन्हें छुट्टी की अवधि में इसे पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। 💥 🕉️ 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 622 ⇒ माला जपना  ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचवटी।)

?अभी अभी # 622 ⇒  माला जपना  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आपने कभी माला जपी है ? मैं नहीं जानता, आप कितने प्रतिशत आस्तिक अथवा नास्तिक हैं, आप माला जपें, ना जपें, मुझे इससे क्या। मैं तो अपनी बात कर रहा हूं। यह तो अपनी बात कहने का बस एक तरीका है।

मैं बचपन से माला जपता आ रहा हूँ, लेकिन मुझे ही यह बात अभी तक पता नहीं थी। सभी जानते हैं, माला जपना क्या होता है। क्या बिना हाथ में माला लिए, माला जपी जा सकती है। आप इसे रहस्य कहें अथवा कोई गूढ़ ज्ञान, लेकिन आपको बताए बिना कैसे रहा जा सकता है।।

हुआ यह कि रोज की तरह जब सुबह चाय समय पर नहीं आई, तो मैंने पूछने की हिम्मत कर ली, क्या बात है, आज अभी तक चाय नहीं बनी। किसका मूड सुबह सुबह कैसा है हमें क्या पता, क्योंकि हमारा खुद का मूड ही चाय से जो बनता है। कहीं से कानों में कर्कश आवाज आई, क्या यह सुबह सुबह चाय की माला जपने लगे, रात की गर्मी से दूध फट गया है, अभी चाय नहीं बनेगी।

अचानक हमारे ज्ञान चक्षु खुल गए। हमारी हिम्मत नहीं हुई आगे पूछने की, अभी अखबार वाला आया कि नहीं। नहीं तो शायद यही सुनने को मिलता, लो जी, चाय की माला खतम, तो अखबार की शुरू। इनके पास बस माला जपने के अलावा कोई काम नहीं। यह तो नहीं कि सुबह कुछ देर भगवान का नाम ही ले लें।।

हम बचपन से नाम ही तो जपते आ रहे हैं, और वह भी बिना माला के। जब भी भूख लगी, पिताजी की मार पड़ी, स्कूल में डांट पड़ी, हमने घर आकर अम्मा के नाम की ही तो माला जपी। मां मां कहते किसी बच्चे की कभी जुबां नहीं थकती। मां के नाम की माला में यहीं स्वर्ग है, यहीं वैकुंठ है, आज जब मां नहीं है, फिर भी उसी के नाम की तो माला जप रहा हूं। रब मुझे माफ करे।

माला जपना भी तो किसी का स्मरण करना ही है। मन को पहले मनकों में रमाना, फिर नाम स्मरण में। एक सौ आठ मनके मिलाकर एक माला। किसी शब्द अथवा मंत्र की पुनरावृत्ति ही जाप है। अपने इष्ट का स्मरण हो, या फिर ; जप जप जप जप जप रे जप ले प्रीत की माला।।

सदगुरु का संकल्पित बीज मंत्र और माला का बीज मिलकर ही तो साधक में आध्यात्मिक शक्ति का विकास करता है। मन को भटकने से रोकती है माला ऐसा कहा जाता है। लेकिन कहा तो ऐसा भी जाता है, राम राम जपना, पराया माल अपना।

हमें किसी के कहने से क्या ! माला का बीज मंत्र सिर्फ यही है हम लगातार जिसका नाम लेते हैं, स्मरण करते हैं, वह हमारे चित्त में निवास करने लगता है। अगर दिन भर राग द्वेष और नफरत की माला जपते रहे, तो मन को शांति कहां से मिलेगी। अगर जपना है तो प्रेम की माला ही जपें ;

बसों मेरे नैनन में नंदलाल

मोहिनी मूरत, सांवरी सूरत

उर वैजंती माल।।

हनुमान जी ने मोतियों की माला तोड़ दी, क्योंकि उनके हृदय में साक्षात प्रभु श्रीराम विराजमान थे, हमें भी किसी माला की आवश्यकता नहीं, हमारे लक्ष्मी नारायण हमारे हृदय में विराजमान हैं। सुबह सुबह हम उनका भी ध्यान करते हैं, उनकी माला जपते हैं। हमारी माला की शक्ति देखिए, अभी अभी हमारे हृदय के नारायण प्रकट होना चाहते हैं।

फेसबुक साक्षी है। आप भी किसी की माला जपें, शायद वह भी प्रकट होना चाहता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष – समग्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समग्र ? ?

“चर और अचर के, जीव और जीवन के हर आयाम का समग्रता से प्राप्त अनुभव ही ज्ञान कहलाता है,” एक वक्ता ज्ञान को परिभाषित कर रहे थे।

मेरी आँखों के आगे तैरने लगे वे असंख्य चेहरे, जो नारी से परे रहकर जगत की दृष्टि में ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुँचे थे। विचार उठा, आधी दुनिया को तजकर अधूरी दुनिया से प्राप्त अनुभव समग्र कैसे हो सकता है?

🍁 अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।🍁

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© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष – “व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष ☆

?  आलेख – व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

विश्व की आबादी आठ सौ करोड़ पार होने को है, कमोबेश इसमें महिलाओ की संख्या पचास प्रतिशत है. यद्यपि भारत में स्त्री पुरुष के इस अनुपात में स्त्रियों की सँख्या अपेक्षाकृत कम है. पितृसत्तात्मक समाज होने के चलते प्रायः सभी क्षेत्रों में लंबे समय से पुरुष स्त्री पर हावी रहा है. सिमोन द बोउवार का कथन है, “स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है”, समाज अपनी आवश्यकता के अनुसार स्त्री को ढालता आया है. उसके सोचने से लेकर उसके जीवन जीने के ढंग को पुरुष नियंत्रित करता रहा है और आज भी करने की कोशिश करता रहता है. किंतु अब महिलाओ को पुरुषों के बराबरी के दर्जे के लिये लगातार संघर्षरत देखा जा रहा है. विश्व में नारी आंदोलन की शुरुवात उन्नीसवीं शताब्दि में हुई. नारी आंदोलन लैंगिक असमानता के स्थान पर मानता है कि स्त्री भी एक मनुष्य है. वह दुनिया की आधी आबादी है. सृष्टि के निर्माण में उसका भी उतना ही सहयोग है जितना कि पुरुष का. स्त्री सशक्तिकरण, स्त्री विमर्श से जन चेतना जागी हैं. अब जल, थल, नभ, अंतरिक्ष हर कहीं महिलायें पुरुषों से पीछे नहीं रही हैं.

विभिन्न भाषाओ के साहित्य में भी महिला रचनाकारों ने महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया है. अनेक महिला रचनाकारों को नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं. 2022 का नोबल फ्रेंच लेखिका एनी एनॉक्स को मिला है. 82 वर्षीय एनॉक्स साहित्य का नोबेल पाने वाली सत्रहवीं महिला हैं. पूरी दुनियां में हर साल आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. हरिशंकर परसाई जी के व्यंग्य की पंक्ति है कि “दिवस कमजोरों के मनाए जाते हैं, मजबूत लोगों के नहीं. “ सशक्त होने का आशय केवल घर से बाहर निकल कर नौकरी करना या पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलना भर नहीं है. वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता साहित्य और खास कर किसी पर व्यंग्य कर सकने की क्षमता और स्वतंत्रता में निहित है. भारत में ऐसी ढ़ेर विसंगतियां हैं जिनसे सीधे तौर पर महिलायें प्रभावित होती हैं, उदाहरण के लिये सबरीमाला या अन्य धर्म के स्थलों पर महिलाओ के प्रवेश पर रोक, धर्म-जाति के गठजोड़, रूढ़ि व अंधविश्वास ने महिलाओं को लगातार शोषित किया है. इन मसलों पर जिस तीक्ष्णता से एक महिला व्यंग्यकार लिख सकती है पुरुष नहीं. कहा गया है जाके पांव न फटे बिवाई बा क्या जाने पीर पराई. किंतु विडम्बना है कि लम्बे समय तक व्यंग्य पर पुरुषों का एकाधिकार रहा है. यह और बात है कि लोक जीवन और लोकभाषा में व्यंग्य अर्वाचीन है. सास बहू, ननद भौजाई के परस्पर संवाद या, बुन्देलखण्ड, मिथिला, भोजपुरी में बारात की पंगत को सुस्वादु भोजन के साथ हास्य और व्यंग्य से सम्मिश्रित गालियां तक देने की क्षमता महिलाओ में ही रही है. हिमाचल में ये विवाह गीत सीठणी काहे जाते हैं जिनमें यहि भाव भंगिमा और व्यंग्य सजीव होता है. साहित्यिक इतिहास में भक्ति आंदोलन के समय में महिला रचनाकारों ने खूब लिखा, मीरा बाई की रचनाओ में व्यंग्य के संपुट ढ़ूंढ़े भी जा सकते हैं.

आज साहित्य में व्यंग्य स्वतंत्र विधा के रूप में सुस्थापित है. समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार, सामाजिक शोषण अथवा राजनीति के गिरते स्तर की घटनाओं पर अप्रत्यक्ष रूप से तंज किया जाता है. लघु कथा की तरह संक्षेप में घटनाओं पर व्यंग्य होता है, जो हास्य, और आक्रोश भी पैदा करता है. विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल से ही साहित्य में व्यंग्य की उपस्थिति मिलती है. चार्वाक के ‘यावद जीवेत सुखं जीवेत, ॠणं कृत्वा घृतम् पिवेत् ’ के माध्यम से स्थापित मूल्यों के प्रति प्रतिक्रिया को इस दृष्टि से समझा जा सकता है. सर्वाधिक प्रामाणिक व्यंग्य की उपस्थिति कबीर के ‘पात्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार’ तथा ‘ कांकर पाथर जोड़ कर मस्जिद दयी बनाय ता चढि़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा भया खुदाय’ आदि के रूप में देखी जा सकती है. हास्य और व्यंग्य का नाम साथ साथ लिया जाता है पर उनमें व्यापक मौलिक अंतर है. साहित्य की शक्तियों अभिधा, लक्षणा, व्यंजना में हास्य अभिधा, यानी सपाट शब्दों में हास्य की अभिव्यक्ति के द्वारा क्षणिक हंसी तो आ सकती है, लेकिन स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकती. व्यंजना के द्वारा प्रतीकों और शब्द-बिम्बों के द्वारा किसी घटना, नेता या विसंगितयों पर प्रतीकात्मक भाषा द्वारा जब व्यंग्य किया जाता है, तो वह अपेक्षकृत दीर्घ कालिक प्रभाव छोड़ता है. श्रेष्ठ साहित्य में व्यंग्य की उपस्थिति महत्वपूर्ण है. व्यंग्य सहृदय पाठक के मन पर संवेदना, आक्रोश एवं संतुष्टि का संचार करता है. स्वतंत्रता पूर्व व्यंग्य लेखन की सुदीर्घ परंपरा मिलती है.

भारतेंदु हरिशचंद्र, महावीर प्रसाद व्दिवेदी, बालकृष्ण भट्ट तथा अन्य लेखकों का बड़ा व्यंग्य समूह था, इनमें बाबू बालमुकुंद गुप्त के धारावाहिक ‘शिव शंभू के चिट्ठे’ युगीन व्यंग्य के दिग्दर्शक हैं. वायसराय के स्वागत में उस समय उनका साहस दृष्टव्य है- “माई लार्ड, आपने इस देश में फिर पदार्पण किया, इससे यह भूमि कृतार्थ हुई. विद्वान, बुद्धिमान और विचारशील पुरुषों के चरण जिस भूमि पर पड़ते हैं, वह तीर्थ बन जाती है. आप में उक्त तीन गुणों के सिवा चौथा गुण राज शक्ति का है. अतः आपके श्रीचरण स्पर्श से भारत भूमि तीर्थ से भी कुछ बढ़कर बन गई. भगवान आपका मंगल करे और इस पतित देश के मंगल की इच्छा आपके हृदय में उत्पन्न करे. ऐसी एक भी सनद प्रजा-प्रतिनिधि शिव शंभु के पास नहीं है, तथापि वह इस देश की प्रजा का, यहां के चिथड़ा पोश कंगालों का प्रतिनिधि होने का दावा रखता है. गांव में उसका कोई झोंपड़ा नहीं, जंगल में खेत नहीं…. हे राज प्रतिनिधि, क्या उसकी दो-चार बातें सुनिएगा?”. . . इसमें अंतर्निहित कटाक्ष व्यंग्य की ताकत हैं. रचना के इस व्यंग्य कौशल को आधुनिक व्यंग्य काल में परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, शंकर पुणतांबेकर, नरेंद्र कोहली, गोपाल चतुर्वेदी, विष्णुनागर जैसे लेखको ने आगे बढ़ाया है.

डा शैलजा माहेश्वरी ने एक पुस्तक लिखी है ” हिंदी व्यंग्य में नारी” इस किताब की भूमिका सुप्रसिद्ध व्यंग्य लेखक और संपादक यशवंत कोठारी ने लिखी है. इस भूमिका आलेख में उन्होंने आज की सक्रिय महिला व्यंग्यकारो का उल्लेख किया है. डा प्रेम जनमेजय व्यंग्य पर सतत काम कर रहे हैं, उन्होने पत्रिका “व्यंग्य यात्रा” का जनवरी से मार्च २०२३ अंक ही ” हिन्दी व्यंग्य में नारी स्वर ” पर केंद्रित किया है. मैं लंबे समय से पुस्तक चर्चा करता आ रहा हूं और विगत कुछ वर्षो में प्रकाशित व्यंग्य की प्रायः किताबें मेरे पास हैं, इन सीमित संदर्भों को लेकर कम शब्दों में आज सक्रिय व्यंग्य लेखिकाओ के कृतित्व के विषय में लिखने का यत्न है. यद्यपि मेरा मानना है कि व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप और अवदान पर शोध ग्रंथ लिखा जा सकता है. जिन कुछ सतत सक्रिय महिला नामों का लेखन पत्र, पत्रिकाओ, सोशल मीडिया में मिलता रहा है उनकी किताबों के आधार पर संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत करने का प्रयास है.

 स्नेहलता पाठक. . . शंकर नगर, रायपुर की निवासी स्नेहलता पाठक की व्यंग्य की किताबें ” सच बोले कौआ काटे”, द्रौपदी का सफरनामा, एक दीवार सौ अफसाने, प्रजातंत्र के घाट पर, बाकी सब ठीक है, बेला फूले आधी रात, लोनम् शरणम् गच्छामी, व्यंग्यकार का वसीयतनामा, उन्होने उपन्यास लाल रिबन वाली लड़की भी लिखा है, और “व्यंग्य शिल्पी लतीफ घोंघी” किताब का संपादन भी किया है. उन्हें छत्तीसगढ़ की पहली गद्य व्यंग्य लेखिका सम्मान मिल चुका है. वे निरंतर स्तरीय लेखन में निरत दिखती हैं.

सूर्य बाला जी ने बहुत व्यंग्य लिखे हैं, उनकी व्यंग्य की पुस्तकें ” यह व्यंग्य कौ पन्थ”, ‘अजगर करे न चाकरी’, ‘धृतराष्ट्र टाइम्स’, ‘देशसेवा के अखाड़े में’, ‘भगवान ने कहा था’, ‘झगड़ा निपटारक दफ़तर’, आदि चर्चित हैं. वे बड़ी कहानीकार हैं और इतनी ही ज़िम्मेदारी तथा गम्भीरता से व्यंग्य भी लिखती हैं. कलम के पैनेपन से उन्होंने व्यंग्य को भी तराशा है वे व्यंग्य की सारी शर्तों को, अपनी ही शर्तों पर पूरा करनेवाली मौलिकता का दामन किसी भी व्यंग्य रचना में कभी नहीं छोड़तीं. उनका सफल कहानीकार होना उनको एक अलग ही क़िस्म का व्यंग्य शिल्प औज़ार देता है. व्यंग्य के परम्परागत विषय भी सूर्यबाला के क़लम के प्रकाश में एकदम नये आलोक में दिखाई देने लगते हैं। विशेष तौर पर, तथाकथित महिला विमर्श के चालाक स्वाँग को, लेखिकाओं का इसके झाँसे में आने को तथा स्वयं को लेखन में स्थापित करने के लिए इसका कुटिल इस्तेमाल करने को उन्होंने बेहद बारीकी तथा साफ़गोई से अपनी कई व्यंग्य रचनाओं में अभिव्यक्त किया है.

शांति मेहरोत्रा ने भी काफी लिखा है. वे पिछली सदी के पाँचवें-छठे दशक में सामने आईं कवयित्री, कथाकार, लघुकथा और व्यंग्य की सशक्त हस्ताक्षर रही हैं. ठहरा हुआ पानी उनका नाटक है

सरोजनी प्रीतम की हंसिकाएं काव्य भी खूब पढ़ी गयीं. लौट के बुद्धू घर को आये, श्रेष्ठ व्यंग्य, सारे बगुले संत हो गये आदि उनकी चर्चित पुस्तके हैं.

समीक्षा तैलंग. . मुझे स्मरण है तब मैं अपने पहले वैश्विक व्यंग्य संग्रह ” मिली भगत” पर काम कर रहा था. इंटरनेट के जरिये अबूधाबी में समीक्षा तैलंग से संपर्क हुआ. फिर जब उन्होंने उनकी पहली किताब छपवाने के लिये पान्डुलिपि तैयार की तो ” जीभ अनशन पर है ” यह नामकरण करने का श्रेय मुझे ही मिला, इस किताब में मेरी टीप उन्होने फ्लैप पर भी ली है. उसके बाद उनकी दूसरी किताब व्यंग्य का एपीसेंटर, संस्मरण की किताब कबूतर का केटवाक आदि आई हैं. वे निरंतर उत्तम लिख रही हैं.

मीना अरोड़ा हल्द्वानी से हैं. उन्होने पुत्तल का पुष्प बटुक व्यंग्य उपन्यास लिखा है, जिसकी चर्चा करते हुये मैने लिखा है कि “पुत्तल का पुष्प वटुक ” बिना चैप्टर्स के विराम के एक लम्बी कहानी है. जो ग्रामीण परिवेश, गांव के मुखिया के इर्द गिर्द बुनी हुई कथा में व्यंग्य के संपुट लिये हुये है. उनकी कविताओ की किताबें “शेल्फ पर पड़ी किताब” तथा ” दुर्योधन एवं अन्य कवितायें ” पूर्व प्रकाशित तथा पुरस्कृत हैं. मीना अरोड़ा की लेखनी का मूल स्वर स्त्री विमर्श है.

डा अलका अग्रवाल सिंग्तिया, का “मेरी तेरी सबकी” व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है, इसके सिवा अनेक सहयोगी संग्रहों में उन्होने शिरकत की है, उनका उल्लेख इस दृष्टि से महत्व रखता है कि उन्होने हाल ही परसाई पर पी एच डी मुम्बई विश्व विद्यालय से की है.

अनिला चारक जम्मू कश्मीर से हैं. जम्मू कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी ने इनके कविता संग्रह ‘नंगे पांव ज़िन्दगी’ को बेस्ट बुक के अवार्ड से सम्मानित किया है. इनकी व्यंग्य की पुस्तक ‘मास्क के पीछे क्या है’ प्रकाशित हुई है.

अनीता यादव का व्यंग्य संग्रह ” बस इतना सा ख्वाब है ” आ चुका है, इसके सिवा कई संग्रहो मे सहभागी हैं तथा फ्री लांस लिखती हैं.

चेतना भाटी – साहित्य की विभिन्न विधाओ व्यंग्य – लघुकथा – कहानी – उपन्यास, कविता में लिखने वाली श्रीमती चेतना भाटी की अब तक कई कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं. जिनमें व्यंग्य संग्रह – दिल है हिंदुस्तानी, दुनिया एक सरकारी मकान है, विक्रम – बेताल का ई – मेल संवाद प्रमुख हैं. इसके सिवाय कहानी संग्रह – एक सदी का सफरनामा, नए समीकरण, जब तक यहाँ रहना है, ट्रेडमिल पर जिंदगी, एवं लघुकथा संग्रह – उल्टी गिनती, सुनामी सड़क, खारी बूँदें और उपन्यास – चल, आ चल जिंदगी, चंद्रदीप, बिग बॉस सीजन कोरोना प्रकाशित है.

सुनीता शानू. . . एक व्यंग्य संग्रह. “फिर आया मौसम चुनाव का(प्रभात प्रकाशन-1915)”, एक कविता संग्रह. . . मन पखेरू फिर उड़ चला (हिंद युग्म-1913), कई सांझा कविता एवं व्यंग्य संग्रह, वे पुरानी हिन्दी ब्लागर हैं.

डा नीरज सुधांशु. . आप वनिका प्रकाशन की संस्थापिका हैं. लिखी तो व्यथा कही तो लघुकथा आदि उनकी कृतियां हैं, मूलतः लघुकथा लिखती हैं जिनमें व्यंग्य के संपुट पढ़ने मिलते हैं. वे पेशे से डाक्टर हैं.

सीमा राय मधुरिमा का व्यंग्य संग्रह ” खरी मसखरी”, ” ब्लाटिंग पेपर” डायरी लेखन और कविता संग्रह मुखर मौन तथा मैं चुनुंगी प्रेम आ चुके हैं.

डा शशि पाण्डे, किताबें हैं चौपट नगरी अंधेर राजा (संग्रह), मेरी व्यंग्य यात्रा (संग्रह), व्यंग्य की बलाएं (संपादन), बकैती गंज ( हास्य साक्षात्कार संपादन)

नीलम कुलश्रेष्ठ. . महिला चटपटी बतकहियाँ (व्यंग्य संग्रह) के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करती हैं.

कीर्ति काले का संग्रह “ओत्तेरेकी” तैंतीस व्यंग्य लेखों का संकलन है. वे व्यंग्य जगत में जानी पहचानी लेखिका हैं.

वीणा वत्सल सिंह प्रतिलिपि डाट काम पर जाना पहचाना सक्रिय नाम हैं वे कहानियां लिखती हैं और अपने लेखन में व्यंग्य प्रयोग करती हैं.

नुपुर अशोक. . . पचहत्तर वाली भिंडी उनका व्यंग्य संग्रह है और मेरे मन का शहर उनकी कविता की प्रकाशित पुस्तकें हैं.

आरिफा एविस अपने व्यंग्य उपन्यास नाकाबन्दी के संदर्भ में लिखती हैं ” पिछले दिनों कश्मीर में जो हुआ उसे लेकर भारतीय मीडिया की अलग-अलग राय है. ऐसे में कश्मीर के जमीनी हालात को करीब से देखना, जहाँ फोन नेटवर्क बंद हो, कर्फ्यू लगा हुआ हो एक मुश्किल काम था. मैं कश्मीर की मौजूदा स्थिति पर लेख, व्यंग्य, कहानी लिखने की सोच रही थी लेकिन उपरोक्त माध्यमों से पूरी बात कहना बड़ा ही मुश्किल था. इसलिए मैंने कश्मीर के नये हालात और उनसे उपजी कश्मीर की राजनीतिक, आर्थिक और मनोस्थिति बयान दर्ज करते हुए इसे उपन्यास की शक्ल में लिखा है. मास्टर प्लान उनका एक और उपन्यास है. राजनीतिक होली, जांच जारी है उनके व्यंग्य संग्रह हैं.

अनीता श्रीवास्तव का व्यंग्य संग्रह – बचते- बचते प्रेमालाप, कविता संग्रह- जीवन वीणा, कहानी संग्रह- तिड़क कर टूटना, बालगीत संग्रह- बंदर संग सेल्फी छप चुके हैं. वे संभावनाशील व्यंग्यकार हैं.

अंशु प्रधान का व्यंग्य संग्रह हुक्काम को क्या काम, उपन्यास रक्कासा और कहानी संग्रह कफस प्रकाशित है.

इंद्रजीत कौर का संग्रह ” चुप्पी की चतुराई” प्रकाशित है, मठाधीशी और कठमुल्लापन के विरोध में लिखना साहस पूर्ण होता है. वे स्वयं सिक्ख धर्म से होते हुये भी अपने ही धर्म की कमियों पर बहुत साहस के साथ पंजाबी पत्रिका ‘पंजाबी सुमन ‘ में स्तम्भ लिखती रहीं हैं. उन्होंने एक अन्य व्यंग्य संग्रह ईमानदारी का सीजन, तथा पंचतंत्र की कथायें भी लिखे हैं.

अनामिका तिवारी जबलपुर से हैं. . . उन का प्रकाशित व्यंग्य संग्रह एक ही है ‘ दरार बिना घर सूना ‘ 2005 में दिल्ली शिल्पायन से प्रकाशित हुआ था. नाटक ‘ शूर्पनखा ‘ भी उन्होंने लिखा है.

अलका पाठक की पुस्तक – किराये के लिए खाली है.

पल्लवी त्रिवेदी पुलिस अधिकारी हैं. उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं—‘अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा’ (व्यंग्य-संग्रह); ‘तुम जहाँ भी हो’ (कविता-संग्रह)। उनकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं। लेखन के अतिरिक्त वे यात्राओं, संगीत व फ़ोटोग्राफ़ी का शौक रखती हैं. ‘तुम जहाँ भी हो’ पुस्तक के लिए उन्हें 2020 में मध्यप्रदेश के ‘वागीश्वरी सम्मान’ से सम्मानित किया गया.

साधना बलवटे ने समिक्षात्मक कृति “शरद जोशी व्यंग्य के आर पार ” लिखी है. उनका व्यंग्य संग्रह ” ना काहू से दोस्ती हमरा सबसे बैर ” सदयः प्रकाशित है.

अर्चना चतुर्वेदी का व्यंग्य उपन्यास गली तमाशे वाली बहू चर्चित है.

कांता राय मूलतः लघुकथायें लिखती हैं. जिनमें वे व्यंग्य का सक्षम प्रयोग करती हैं. उनकी विभिन्न विधाओ की कई किताबें प्रकाशित हैं.

शेफाली पाँडे, दलजीत कौर, सक्रिय बहुपठित लेखिकायें हैं. सुषमा व्यास राजनिधि की यद्यपि व्यंग्य केंद्रित किताब अब तक नहीं है पर वे व्यंग्य मंचो पर सक्रिय रहती हैं, मेधा झा स्फुट व्यंग्य लिखती हैं, वे अनेक संग्रहों में सहभागी हैं. सारिका गुप्ता स्फुट व्यंग्य लिख रही युवा व्यंग्यकार हैं, वे कानूनी विषय पर एक किताब लिख चुकी हैं. डा. शांता रानी ने हिंदी नाटकों में हास्य तत्व पुस्तक लिखी है. लक्ष्मी शर्मा मूलतः व्यंग्यकार नहीं हैं पर उनके उपन्यास, एकांकी में व्यंग्य की झलक है. सिधपुर की भक्तिनें, स्वर्ग का अंतिम उतार, उपन्यास, कथा संग्रह आदि लिखे हैं.

डा शैलजा माहेश्वरी ने ” हिंदी व्यंग्य में नारी ” किताब लिखी है. यह पुस्तक हिंदी व्यंग्य में नारी के योगदान पर गंभीर समालोचनात्मक कृति है. बीकानेर की मंजू गुप्ता के संपादन में भी एक पुस्तक व्यंग्य समालोचना पर आई है. जबलपुर में महाविद्यालय में हिन्दी की विभागाध्यक्ष डा स्मृति शुक्ल ने व्यंग्य आलोचना सहित, साहित्यिक समालोचना के क्षेत्र में बहुत काम किया है. उन्हें म प्र साहित्य अकादमी से आलोचना पर पुरस्कार भी मिल चुका है. उन्होंने ” विवेक रंजन के व्यंग्य समाज के जागरुख पहरुये के बयान ” शोध आलेख लिखा है. स्वाति शर्मा, जबलपुर डा नीना उपाध्याय के निर्देशन में विवेक रंजन के व्यंग्य के सामाजिक प्रभाव पर जबलपुर विश्वविद्यालय से शोध कार्य कर रही हैं. आशा रावत की पुस्तक – हिंदी निबंध-स्वतंत्रता के बाद शीर्षक से प्रकाशित है जिसमें महिला व्यंग्य समालोचना पर भी लिखा गया है.

दीपा गुप्ता ने अब्दुल रहीम खानखाना पर विस्तृत कार्य किया है. उनकी कई किताबें प्रकाशित हैं. यद्यपि व्यंग्य केंद्रित पुस्तक अभी तक नहीं आई है. इसके अतिरिक्त भारती पाठक, गरिमा सक्सेना, पूजा दुबे, ऋचा माथुर, आदर्श शर्मा, अनीता भारती, विभा रश्मि, जयश्री शर्मा, पुष्प लता कश्यप, निशा व्यास, मीरा जैन, प्रभा सक्सेना, रेनू सैनी, डा निर्मला जैन, उषा गोयल, पूनम डोगरा, नीलम जैन, ललिता जोशी, अर्चना सक्सेना, कुसुम शर्मा, सीमा जैन, विदुषी आमेटा, दीपा स्वामिनाथन, आदि लेखिकायें राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय सोशल मीडीया प्लेटफार्मस् एवं पत्र पत्रिकाओ में जब तब स्फुट रूप से सक्रिय मिलती हैं. भले ही इनमें से कई पूर्णतया व्यंग्य संधान नहीं कर रही किन्तु अपनी विधा कविता, कहानी, ललित लेख, लघु कथा आादि में व्यंग्य प्रयोग करती हैं.

 व्यंग्य-लोचन पुस्तक में डा. सुरेश महेश्वरी ने रीतिकालीन कवियों के मार्फत उपालम्भ के रूप में महिलाओं द्वारा किये जाने वाले व्यंग्य को विस्तार दिया है. इसी प्रकार व्यंग्य चिन्तना और शंकर पुणताम्बेकर विषयक पुस्तक में भी काफी विस्तार से महिला व्यंग्य की चर्चायें की गई है. डा. बालेन्दु शेखर तिवारी ने भी महिला व्यंग्य लेखन पर अपने विचार दिए हैं.

अस्तु, सीमित संदर्भों को लेकर कम शब्दों में आज सक्रिय व्यंग्य लेखिकाओ के कृतित्व के विषय में यह आलेख एक डिस्क्लैमर चाहता है, मैने यह कार्य निरपेक्ष भाव से महिला व्यंग्य लेखन को रेखांकित करने हेतु सकारात्मक भाव से किया है, उल्लेख, क्रम, कम या ज्यादा विवरण मात्र मुझे सुलभ सामग्री के आधार पर है, त्रुटि अवश्यसंभावी है जिसके लिये अग्रिम क्षमा. कई नाम जरूर छूटे होंगे जिनसे अवगत कराइये ताकि यह आलेख और भी उपयोगी संदर्भ बन सके.

महिला व्यंग्य लेखन स्वच्छंद रुप से विकसित हो रहा है, और संभावनाओ से भरपूर है. महिला व्यंग्यकार राजनीती, घर परिवार, मोहल्ला, पड़ोस, रिश्ते नाते, बच्चे, परिवेश, पर्यावरण, स्त्री विमर्श, लेखन, प्रकाशन, सम्मान की राजनीति आदि सभी विसंगतियों पर लिख रही हैं. महिला लेखन में विट है ह्यूमर है, आइरनी है, कटाक्ष, पंच आदि सब मिलता है. हर लेखिका की रचनाओं का कलेवर उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता और अनुभव के अनुरूप सर्वथा विशिष्ट है. व्यंग्य लेखन को ये लेखिकायें पूरी संजीदगी से निभाती नजर आती हैं. सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि महिला व्यंग्य लेखन में कहीं प्राक्सी नहीं है जैसा महिलाओ को लेकर अन्य क्षेत्रो मे प्रायः होता दिखता है उदाहरण के लिये गांवों में महिला सरपंच की जगह उनके पति भले ही सरपंचगिरी करते मिेलें किन्तु संतोष है कि महिला व्यंग्य लेखन में पूर्ण मौलिकता है. महिलायें व्यंग्य के पंच की अपने आप में सक्षम सरपंच स्वयं हैं.

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #268 ☆ कलम से अदब तक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख कलम से अदब तक। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 268 ☆

☆ कलम से अदब तक… ☆

अदब सीखना है तो कलम से सीखो; जब भी चलती है, सिर झुका कर चलती है।’ परंतु आजकल साहित्य और साहित्यकारों की परिभाषा व मापदंड बदल गए हैं। पूर्वोत्तर परिभाषाओं के अनुसार…साहित्य में निहित था…साथ रहने, सर्वहिताय व सबको साथ लेकर चलने का भाव, जो आजकल नदारद हो गया है। परंतु मेरे विचार से तो ‘साहित्य एहसासों व जज़्बातों का लेखा-जोखा है; भावों और संवेदनाओं का झरोखा है और समाज के कटु यथार्थ को उजागर करना साहित्यकार का दायित्व है।’

साहित्य और समाज का चोली-दामन का साथ है। साहित्य केवल समाज का दर्पण ही नहीं, दीपक भी है और समाज की विसंगतियों- विश्रृंखलताओं का वर्णन करना, जहां साहित्यकार का नैतिक दायित्व है; उसके लिए समाधान सुझाना व उपयोगिता दर्शाना भी उसका प्राथमिक दायित्व है। परंतु आजकल साहित्यकार अपने दायित्व का निर्वाह कहां कर रहे है…अत्यंत चिंतनीय है, शोचनीय है। महान् लेखक मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि ‘कलम तलवार से अधिक शक्तिशाली होती है.. ताक़तवर होती है’ अर्थात् जो कार्य तलवार नहीं कर सकती, वह लेखक की कलम की पैनी धार कर गुज़रती है। इसीलिए वीरगाथा काल में राजा युद्ध-क्षेत्र में आश्रयदाता कवियों को अपने साथ लेकर जाते थे और उनकी ओजस्विनी कविताएं सैनिकों का साहस व उत्साहवर्द्धन कर उन्हें विजय के पथ पर अग्रसर करती थीं। रीतिकाल में भी कवियों व शास्त्रज्ञों को दरबार में रखने की परंपरा थी तथा उनके बीच अपने राजाओं को प्रसन्न करने हेतु अच्छी कविताएं सुनाने की होड़ लगी रहती थी। श्रेष्ठ रचनाओं के लिए उन्हें स्वर्ण मुद्राएं भेंट की जाती थी। बिहारी का दोहा ‘नहीं पराग, नहीं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काल/ अलि कली ही सौं बंध्यो, आगे कौन हवाल’ द्वारा राजा जयसिंह को बिहारी ने सचेत किया गया था कि वे पत्नी के प्रति आसक्त होने के कारण, राज-काज में ध्यान नहीं दे रहे, जो राज्य के अहित में है और विनाश का कारण बन सकता है। इसी प्रकार भक्ति काल में कबीर व रहीम के दोहे, सूर के पद, तुलसी की रामचरितमानस के दोहे- चौपाइयां गेय हैं, समसामयिक हैं, प्रासंगिक हैं और प्रात:-स्मरणीय हैं। आधुनिक काल को भी भक्तिकालीन साहित्य की भांति विलक्षण और समृद्ध स्वीकारा गया है।

सो! सत्-साहित्य वह कहलाता है, जिसका प्रभाव दूरगामी हो; लम्बे समय तक बना रहे तथा वह  परोपकारी व मंगलकारी हो; सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् के विलक्षण भाव से आप्लावित हो। प्रेमचंद, शिवानी, मनु भंडारी, मालती जोशी, निर्मल वर्मा आदि लेखकों के साहित्य से कौन परिचित नहीं है? आधुनिक युग में भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, निराला, बच्चन, नीरज, भारती आदि का सहित्य अद्वितीय है, शाश्वत है, समसामयिक है, उपादेय है। आज भी उसे भक्तिकालीन साहित्य की भांति उतनी तल्लीनता से पढ़ा जाता है; जिसका मुख्य कारण है…साधारणीकरण अर्थात् जब पाठक ब्रह्मानंद की स्थिति तक पहुंचने के पश्चात् उसी मन:स्थिति में रहना पसंद करता है तथा उस स्थिति में उसके भावों का विरेचन हो जाता है…यही भाव-तादात्म्य ही साहित्यकार की सफलता है।

साहित्यकार अपने समाज का यथार्थ चित्रण करता है; तत्कालीन  समाज के रीति-रिवाज़, वेशभूषा, सोच, धर्म आदि को दर्शाता है…उस समय की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक परिस्थितियों का दिग्दर्शन कराता है… वहीं समाज में व्याप्त बुराइयों को प्रकाश में लाना तथा उनके उन्मूलन के मार्ग दर्शाना…उसका प्रमुख दायित्व होता है। उत्तम साहित्यकार संवेदनशील होता है और वह अपनी रचनाओं के माध्यम से, पाठकों की भावनाओं को उद्वेलित व आलोड़ित करता है। समाज में व्याप्त बुराइयों की ओर उनका ध्यान आकर्षित कर जनमानस  के मनोभावों को झकझोरता, झिंझोड़ता व सोचने पर विवश कर देता है कि वे ग़लत दिशा की ओर अग्रसर हैं, दिग्भ्रमित हैं। सो! उन्हें अपना रास्ता बदल लेना चाहिए। सच्चा साहित्यकार मिथ्या लोकप्रियता के पीछे नहीं भागता; न ही अपनी कलम को बेचता है; क्योंकि वह जानता है कि कलम का रुतबा संसार में सबसे ऊपर होता है। कलम सिर झुका कर चलती है, तभी वह इतने सुंदर साहित्य का सृजन करने में समर्थ है। इसलिए मानव को उससे अदब व सलीका सीखना चाहिए तथा अपने अंतर्मन में विनम्रता का भाव जाग्रत कर, सुंदर व सफल जीवन जीना चाहिए…ठीक वैसे ही जैसे फलदार वृक्ष सदैव झुक कर रहता है तथा मीठे फल प्रदान करता है। इन कहावतों के मर्म से तो आप सब अवगत होंगे… ‘अधजल गगरी, छलकत जाए’ तथा ‘थोथा चना, बाजे घना’ मिथ्या अहं भाव को प्रेषित करते हैं। इसलिए नमन व मनन द्वारा जीवन जीने के सही ढंग व महत्व को प्रदर्शित दिया गया है। मन से पहले व मन के पीछे न लगा देने से विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न नहीं होती, बल्कि नमन व मनन एक- दूसरे के पूरक हो जाते हैं। वैसे भी इनका चोली-दामन का साथ है। एक के बिना दूसरा अस्तित्वहीन है। यह सामंजस्यता के सोपान हैं और सफल जीवन के प्रेरक व आधार- स्तंभ हैं।

प्रार्थना हृदय का वह सात्विक भाव है; जो ओंठों तक पहुंचने से पहले ही परमात्मा तक पहुंच जाती है… परंतु शर्त यह है कि वह सच्चे मन से की जाए। यदि मानव में अहंभाव नहीं है, तभी वह उसे प्राप्त कर सकता है। अहंनिष्ठ व्यक्ति स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है, केवल अपनी-अपनी हांकता है तथा दूसरे के अस्तित्व को नकार उसकी अहमियत नहीं स्वीकारता। सो! वह आत्मजों, परिजनों व परिवारजनों से बहुत दूर चला जाता है। परंतु एक लंबे अंतराल के पश्चात् समय के बदलते ही वह अर्श से फ़र्श पर पर आन पड़ता है और लौट जाना चाहता है…अपनों के बीच, जो सर्वथा संभव नहीं होता। अब उसे प्रायश्चित होता है… परंतु गुज़रा समय कब लौट पाया है? इसलिए मानव को अहं को त्याग, किसी भी हुनर पर अभिमान न करने की सीख दी गई है, क्योंकि पत्थर की भांति अहंनिष्ठ व्यक्ति भी अपने ही बोझ से डूब जाता है, परंतु निराभिमानी मनुष्य संसार में श्रद्धेय व पूजनीय हो जाता है।

‘विद्या ददाति विनयम्’ अर्थात् विनम्रता मानव का आभूषण है और विद्या हमें विनम्रता सिखलाती है… जिसका संबंध संवेदनाओं से होता है। संवेदना से तात्पर्य है… सम+वेदना… जिसका अनुभव वही व्यक्ति कर सकता है, जिसके हृदय में स्नेह, प्रेम, करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, करुणा, त्याग आदि भाव व्याप्त हों…जो दूसरे के दु:ख की अनुभूति कर सके। परंतु यह बहुत टेढ़ी खीर है…दुर्लभ व दुर्गम मार्ग है तथा उस स्थिति तक पहुंचने के लिए वर्षों की साधना अपेक्षित है। जब तक व्यक्ति स्वयं को उसी भाव-दशा में अनुभव नहीं करता; उनके सुख-दु:ख में अपनत्व भाव व आत्मीयता नहीं दर्शाता …अच्छा इंसान भी नहीं बन सकता; साहित्यकार होना, तो बहुत दूर की बात है; कल्पनातीत है।

आजकल समाजिक व्यवस्था पर दृष्टिपात करने पर लगता है कि संवेदनाएं मर चुकी हैं, सामाजिक सरोकार अंतिम सांसें ले रहे हैं और इंसान आत्म-केंद्रित होता जा रहा है। त्रासदी यह है कि वह निपट स्वार्थी इंसान अपने अतिरिक्त किसी अन्य के बारे में सोचता ही कहां है? सड़क पर पड़ा घायल व्यक्ति जीवन-मृत्यु से संघर्ष करते हुए सहायता की ग़ुहार लगाता है, परंतु संवेदनशून्य व्यक्ति उसके पास से नेत्र मूंदे निकल जाता हैं। हर दिन चौराहों पर मासूमों की अस्मत लूटी जाती है और दुष्कर्म के पश्चात् उन्हें तेज़ाब डालकर जला देने के किस्से भी आम हो गए हैं। लूटपाट, अपहरण, फ़िरौती, देह-व्यापार व मानव शरीर के अंग बेचने का धंधा भी खूब फल-फूल रहा है। यहां तक कि चंद सिरफिरे अपने देश की सुरक्षा बेचने में भी कहां संकोच करते हैं?

परंतु कहां हो रहा है… ऐसे साहित्य का सृजन, जो समाज की हक़ीकत बयान कर सके तथा लोगों की आंखों पर पड़ा पर्दा हटा सके। आजकल तो सबको पद-प्रतिष्ठा, नाम-सम्मान व रूतबा चाहिए, वाहवाही सबकी ज़रूरत है; जिसके लिए वे सब कुछ करने को तत्पर हैं, आतुर हैं अर्थात् किसी भी सीमा तक झुकने को तैयार हैं। यदि मैं कहूं कि वे साष्टांग दण्डवत् प्रणाम तक करने को प्रतीक्षारत हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

सो! ऐसे आक़ाओं का धंधा भी खूब फल-फूल रहा है, जो नये लेखकों को सुरक्षा प्रदान कर, मेहनताने के रूप में खूब सुख-सुविधाएं वसूलते हैं। सो! ऐसे लेखक पलक झपकते अपनी पहली पुस्तक के प्रकाशित होते ही बुलंदियों को छूने लगते हैं, क्योंकि उन आक़ाओं का वरद्-हस्त नये लेखकों पर होता है। सो! उन्हें फर्श से अर्श पर आने में समय लगता ही नहीं। आजकल तो पैसा देकर आप राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय अथवा अपना मनपसंद सम्मान खरीदने को स्वतंत्र हैं। सो! पुस्तक के लोकार्पण करवाने की भी बोली लगने लगी है। आप पुस्तक मेले में अपने मनपसंद सुविख्यात लेखकों द्वारा अपनी पुस्तक का लोकार्पण करा कर प्रसिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। अनेक विश्व-विद्यालयों द्वारा पीएच•डी• व डी•लिट्• की मानद उपाधि प्राप्त कर, अपने नाम से पहले डॉक्टर लगाकर, वर्षों तक मेहनत करने वालों के समकक्ष या उनसे बड़ी उपलब्धि प्राप्त कर उन्हें धूल चटा सकते हैं; नीचा दिखा सकते हैं। परंतु ऐसे लोग अहंनिष्ठ होते हैं। वे कभी अपनी ग़लती कभी स्वीकार नहीं करते, बल्कि दूसरों पर आरोप-प्रत्यारोप लगा कर अहंतुष्टि कर सुक़ून पाते हैं। यह सत्य है कि जो लोग अपनी ग़लती नहीं स्वीकारते, किसी को अपना कहां मानेंगे? सो! ऐसे लोगों से सावधान रहने में ही सब का हित है।

जैसे कुएं में उतरने के पश्चात् बाल्टी झुकती है और भरकर बाहर निकलती है…उसी प्रकार जो इंसान झुकता है; कुछ लेकर अथवा प्राप्त करने के पश्चात् ही जीवन में पदार्पण करता है। यह अकाट्य सत्य है कि संतुष्ट मन सबसे बड़ा धन है। परंतु ऐसे स्वार्थी लोग और…और…और की चाह में अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। वैसे बिना परिश्रम के प्राप्त फल से आपको क्षणिक प्रसन्नता तो प्राप्त हो सकती है, परंतु उससे संतुष्टि व स्थायी संतोष प्राप्त नहीं हो सकता। इससे भले ही आपको पद-प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाए; परंतु सम्मान नहीं मिलता। अंतत: सत्य व हक़ीक़त के उजागर हो जाने के पश्चात् आप दूसरों की नज़रों में गिर जाते हैं।

‘सत्य कभी दावा नहीं करता कि मैं सत्य हूं और झूठ सदा शेखी बघारता हुआ कहता है कि ‘मैं ही सत्य हूं। परंतु एक अंतराल के पश्चात् सत्य लाख परदों के पीछे से भी सहसा प्रकट हो जाता है।’ इसलिए सदैव मौन रह कर आत्मावलोकन कीजिए और तभी बोलिए; जब आपके शब्द मौन से बेहतर हों। सो! मनन कीजिए, नमन स्वत: प्रकट हो जाएगा। जीवन में झुकने का अदब सीखिए; मानव-मात्र के हित के निमित्त समाजोपयोगी लेखन कीजिए…सब के दु:ख-दर्द की अनुभूति कीजिए। वैसे संकट में कोई नज़दीक नहीं आता, जबकि दौलत के आने पर दूसरों को आमंत्रण देना नहीं पड़ता…लोग आप के इर्दगिर्द मंडराने लगते हैं। इनसे बच के रहिए…प्राणी-मात्र के हित में सार्थक सृजन कीजिए…यही ज़िंदगी का सार है; जीने का मक़सद है। सस्ती लोकप्रियता के पीछे मत भागिए …इससे आप की हानि होगी। इसलिए सब्र व संतोष रखिए, क्योंकि वह आपको कभी भी गिरने नहीं देता… सदैव आपकी रक्षा करता है। ‘चल ज़िंदगी नयी शुरुआत करते हैं/ जो उम्मीद औरों से थी/ ख़ुद से करते हैं’… इन्हीं शब्दों के साथ अपनी लेखनी को विराम देती हूं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 620 ⇒ पहलवान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पहलवान।)

?अभी अभी # 620 ⇒ पहलवान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पहलवान धनवान भले ही ना होता हो, बलवान ज़रूर होता है। बिना पहल किए, कोई पहलवान नहीं बन सकता। वर्जिश और मालिश ही एक इंसान को पहलवान बनाती है। बाहर भले ही वह एक साधारण इंसान नजर आता हो, अखाड़े में वह भगवान होता है। जहां स्वर्ग है वहां भगवान है। जहां अखाड़ा है, वहां पहलवान है।

एक बार धनवान बनना आसान है, लेकिन पहलवान नहीं ! एक लॉटरी का टिकट, बाप दादा की वसीयत अथवा चार चार ऑप्शन, लाइफ लाइन और भाग्य के भरोसे, आप के बी सी के करोड़पति भी भले ही बन जाएं, लेकिन पहलवान बनने के लिए आपको कस कर कसरत तो करनी ही पड़ती है। किसी उस्ताद को गुरु बनाना पड़ता है, गंडा बांधना पड़ता है, अखाड़े की मिट्टी को सर से लगाना पड़ता है। बदन को तेल पिलाना पड़ता है, दंड बैठक लगानी पड़ती है।।

केवल रुस्तमे हिंद दारासिंह एक ऐसे पहलवान निकले जिन्होंने अभिनय के क्षेत्र में भी अपने दांव आजमाए। मुमताज जैसी अभिनेत्री के पर्दे पर नायक बने। कुछ भक्तों को जब हनुमान जी दर्शन देते हैं तो बिल्कुल दारासिंह नजर आते हैं और अरुण गोविल, प्रभु श्रीराम।

अखाड़े में राजनीति के दांव पेंच काम नहीं आते। पहलवानों की कुश्ती में राजनीतिज्ञों की तरह कसम, वादे और नारों से काम नहीं बनता। यहां जनता को मोहरा नहीं बनाया जाता। यहां दर्शक सिर्फ आपका हौंसला बढ़ाते हैं, ज़ोर आजमाइश तो आपको ही करनी पड़ती है। वोट की भीख, और जोड़ तोड़ से कुश्ती नहीं जीती जाती, यहां दांव लगाए जाते हैं, सामने वाले के पेंच ढीले किए जाते है। कुश्ती का फैसला अखाड़े में ही होता है, इसका कोई एक्जिट पोल नहीं होता।

राजनीति की तरह अखाड़े में भी झंडा और डंडा होता है। लेकिन झंडा अखाड़े की पताका होता है, उस्ताद के नाम से अखाड़े का नाम होता है। डमरू उस्ताद, छोगालाल उस्ताद, रुस्तम सिंह, चंदन गुरु और झंडा सिंह की व्यायामशालाएं होती हैं, जहां किसी गुरुकुल की तरह ही पहलवानी की शिक्षा दीक्षा प्रदान की जाती है।।

पहलवान कभी घुटने नहीं टेकते। लेकिन यह भी सच है कि उम्र के साथ साथ जैसे जैसे वर्जिश कम होती जाती है, घुटने जवाब देने लग जाते है। कहा जाता है कि पहलवान का दिमाग घुटने में होता है लेकिन किसी भी रेडियोलॉजिकल जांच में इसका कोई प्रमाण आज तक उपलब्ध नहीं हो पाया है इसलिए किसी पहलवान के सामने ऐसी बे सिर पैर की बातें नहीं करनी, चाहिए, अन्यथा आपका दिमाग और घुटना एक होने का अंदेशा ज़रूर हो सकता है। वैसे भी राजनीतिज्ञों की तरह सातवें आसमान में रखने से अच्छा है, दिमाग को घुटने में ही रखा जाए। पांच साल में एक बार तो ये नेता भी जनता के सामने घुटनों के बल चलकर ही आते हैं।

कुछ पहलवान मालिश से हड्डी और मांसपेशियों के दर्द का इलाज भी करते हैं। इनका तेल, मलहम और सधी हुई उंगलियों की मालिश से मरीज को फायदा भी होता है। आम आदमी जो महंगे इलाज नहीं करवा पाता, इनकी ही शरण में जाता है। जहां दर्द से छुटकारा मिले, वही तो दवाखाना है।।

अब कहां वे अखाड़े और कहां वे पहलवान। लेकिन कुश्तियां फिर भी ज़िंदा हैं। आज की पीढ़ी भले ही जिम जाकर सिक्स पेक तैयार कर ले, ओलंपिक में तो आज भी पहलवानों का ही राज है। हो जाए इस बात पर इस गुलाबी ठंड में थोड़ी दंड बैठक..!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 234 ☆ उम्मीद के द्वारे, नेह निहारे…… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना उम्मीद के द्वारे, नेह निहारे। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 234 ☆ 

☆ उम्मीद के द्वारे, नेह निहारे

साथ में जब आपका, विश्वास मिलने लग गया।

आसरा उम्मीद वाला, भाव हिय में जग गया। ।

नेह का बंधन अनोखा, जुड़ गए जिससे सभी।

प्रीत की चलना डगर पर, भावनाएँ शुभ तभी। ।

कर्म का फल अवश्य सम्भावी है, ये बात गीता में कही गयी है। और इसी से प्रेरित हो लोग निरन्तर कर्म में जुटे रहते हैं, बिना फल की आशा किए। कोई उम्मीद न रखना   तो सही है किन्तु इसका परिणाम क्या होगा ये चिन्तन न करना कहाँ की समझदारी होगी।

अक्सर लोग ये कहते हुए पल्ला झाड़ लेते हैं कि मैंने तो सब कुछ सही किया था, पर  लोगों का सहयोग नहीं मिला  जिससे सुखद परिणाम  नहीं आ सके। क्या इस बात का मूल्यांकन नहीं होना चाहिए कि लोग क्यों  कुछ  दिनों में ही दूर हो जाते हैं …? क्या सभी स्वार्थी हैं या जिस इच्छा से वे जुड़े  वो  पूरी नहीं हो  सकती इसलिए मार्ग बदलना  एकमात्र उपाय बचता है।

कारण चाहे कुछ भी हो पर इतना तो निश्चित है कि सही योजना द्वारा ही लक्ष्य मिला है केवल परिश्रम किसी परिणाम को सुखद  नहीं बना सकता उसके लिए सही राह,श्रेष्ठ विचार व नेहिल भावना की महती आवश्यकता होती है।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 339 ☆ आलेख – “महिलाओ में है नव निर्माण की ताकत…” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 339 ☆

?  आलेख – महिलाओ में है नव निर्माण की ताकत…  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

एक अदृश्य शक्ति, जिसे आध्यात्मिक दृष्टि से हम परमात्मा कहते हैं, इस सृष्टि का निर्माण कर्ता, नियंत्रक व संचालक है. स्थूल वैज्ञानिक दृष्टि से इसी अद्भुत शक्ति को प्रकृति के रूप में स्वीकार किया जाता है. स्वयं इसी ईश्वरीय शक्ति या प्रकृति ने अपने अतिरिक्त यदि किसी को नैसर्गिक रूप से जीवन देने तथा पालन पोषण करने की शक्ति दी है तो वह महिला ही है.

समाज के विकास में महिलाओ की महति भूमिका निर्विवाद एवं महत्वपूर्ण है.

समाज, राष्ट्र की इकाई होता है और समाज की इकाई परिवार, तथा हर परिवार की आधारभूत अनिवार्य इकाई महिला ही होती है. परिवार में पत्नी के रूप में, महिला पुरुष की प्रेरणा होती है. वह माँ के रूप में बच्चों की जीवन दायिनी, ममता की प्रतिमूर्ति बनकर उनकी परिपोषिका तथा पहली शिक्षिका की भूमिका का निर्वाह करती है. इस तरह परिवार के सदस्यों के चरित्र निर्माण व बच्चों को सुसंस्कार देने में घर की महिलाओ का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष योगदान स्वप्रमाणित है.

विधाता के साकार प्रतिनिधि के रूप में महिला सृष्टि की संचालिका है, सामाजिक दायित्वों की निर्वाहिका है, समाज का गौरव है। महिलाओं ने अपने इस गौरव को त्याग से सजाया और तप से निखारा है, समर्पण से उभारा और श्रद्धा से संवारा है. विश्व इतिहास साक्षी है कि महिलाओं ने सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विभिन्न क्षेत्रों में सर्वांगीण विकास किया है, एवं निरंतर योगदान कर रहीं हैं. बहुमुखी गुणों से अलंकृत नारी समाज के महाप्रासाद की अविचल निर्माता है. नारी चरित्र, शील, दया और करूणा के साथ शक्ति और चातुर्य का समग्र सवरूप है.

कन्या भ्रूण हत्या, स्तनपान को बढ़ावा देना, दहेज की समस्या, अश्लील विज्ञापनों में नारी अंग प्रदर्शन, स्त्री शिक्षा को बढ़ावा, घर परिवार समाज में महिलाओ को पुरुषों की बराबरी का दर्जा दिया जाने का संघर्ष, सरकार में स्त्रियों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित करना आदि वर्तमान समय की नारी विमर्श से सीधी जुड़ी वे ज्वलंत सामाजिक समस्यायें हैं, जो यक्ष प्रश्न बनकर हमारे सामने खड़ी हैं. इनके सकारात्मक उत्तर में आज की पीढ़ी की महिलाओ की विशिष्ट भूमिका ही उस नव समाज का निर्माण कर सकती है, जहां पुरुष व नारी दो बराबरी के तथा परस्पर पूरक की भूमिका में हों.

पौराणिक संदर्भो को देखें तो दुर्गा, शक्ति का रूप हैं. उनमें संहार की क्षमता है तो सृजन की असीमित संभावना भी निहित है. जब देवता, महिषासुर से संग्राम में हार गये और उनका ऐश्वर्य, श्री और स्वर्ग सब छिन गया तब वे दीन-हीन दशा में भगवान के पास पहुँचे। भगवान के सुझाव पर सबने अपनी सभी शक्तियॉं एक साथ समग्रता में समाहित करने से शक्ति स्वरूपा दुर्गा उत्पन्न हुई. पुराणों में दुर्गा के वर्णन के अनुसार, उनके अनेक सिर हैं, अनेक हाथ हैं. प्रत्येक हाथ में वे अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुये हैं. सिंह, जो साहस का प्रतीक है, उनका वाहन है. ऐसी शक्ति की देवी ने महिषासुर का वध किया. वे महिषासुर मर्दनी कहलायीं. यह कथा संगठन की एकता का महत्व प्रतिपादित करती है. शक्ति, संगठन की एकता में ही है. संगठन के सदस्यों के सहस्त्रों सिर और असंख्य हाथ हैं. साथ चलेंगे तो हमेशा जीत का सेहरा बंधेगा. देवताओं को जीत तभी मिली जब उन्होने अपनी शक्ति एकजुट की. दुर्गा, शक्तिमयी हैं, लेकिन क्या आज की महिला शक्तिमयी है ? क्या उसका सशक्तिकरण हो चुका है? शायद समाज के सर्वांगिणी विकास में सशक्त महिला और भी बेहतर भूमिका का निर्वहन कर सकती हैं. वर्तमान सरकारें इस दिशा में कानूनी प्रावधान बनाने हेतु प्रयत्नशील हैं, यह शुभ लक्षण है. प्रतिवर्ष ८ मार्च को समूचा विश्व महिला दिवस मनाता है, यह समाज के विकास में महिलाओं की भूमिका के प्रति समाज की कृतज्ञता का ज्ञापन ही है.

ममता है माँ की, साधना, श्रद्धा का रूप है

लक्ष्मी, कभी सरस्वती, दुर्गा अनूप है

नव सृजन की संवृद्धि की एक शक्ति है नारी

परमात्मा और प्रकृति की अभिव्यक्ति है नारी

नारी है धरा, चाँदनी, अभिसार, प्यार भी

पर वस्तु नही, एक पूर्ण व्यक्ति है नारी

आवश्यकता यही है कि नारी को समाज के अनिवार्य घटक के रूप में बराबरी और सम्मान के साथ स्वीकार किया जावे. समाज के विकास में महिलाओ का योगदान स्वतः ही निर्धारित होता आया है, रणभूमि पर विश्व की पहली महिला योद्धा रानी दुर्गावती हो, रानी लक्ष्मी बाई का पहले स्वतंत्रता संग्राम में योगदान हो, इंदिरा गांधी का राजनैतिक नेतृत्व हो या विकास का अन्य कोई भी क्षेत्र अनेकानेक उदाहरण हमारे सामने हैं. आगे भी समाज के विकास की इस भूमिका का निर्वाह महिलायें स्वयं ही करने में सक्षम रहेंगी.

कल्पना” हो या “सुनीता” गगन में, “सोनिया” या “सुष्मिता”

रच रही वे पाठ, खुद जो, पढ़ रही हैं ये किशोरी लड़कियां

बस समाज को नारी सशक्तिकरण की दिशा में प्रयत्नशील रहने, और महिलाओ के सतत योगदान को कृतज्ञता व सम्मान के साथ अंगीकार करने की जरूरत है.

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 619 ⇒ सबक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सबक।)

?अभी अभी # 619 ⇒  सबक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 सीखने और सिखाने को सबक कहते हैं ! बच्चे बहुत ज़ल्दी सीखते हैं। बचपन में स्कूल में जो भी सबक दिया जाता है, उसे उन्हें सीखना पड़ता है। अगर सबक ठीक से याद नहीं हुआ, तो गुरु जी को सबक सिखाना भी आता है। पढ़ा हुआ सबक भले ही हम बड़े होकर भूल जाएं, लेकिन वह सबक ज़रूर याद रहता है, जिसमें बेंत से हथेलियां गर्म हो जाया करती थीं, और मुर्गा बनाकर पीठ पर डस्टर रख दिया जाता था।

सबक को पाठ भी कहते हैं ! पाठशाला शब्द भी पाठ से ही बना है। वैसे बच्चे की पहली पाठशाला तो उसकी माँ ही होती है। माँ सा प्यार देने वाली माँ मासी कहलाती है और मदर-सा पाठ पढ़ाने वाली संस्था मदरसा कहलाती है। काश ! सभी मदरसों में मदर-सा पाठ पढ़ाया जाता, तो किसी भी कौम को सबक सिखलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।।

जो सबक हमारे लिए सबक है, एक पाठ है, वही अंग्रेज़ी का lesson है। आज की पीढ़ी सबक याद नहीं करती, पाठ नहीं पढ़ती, वह lesson याद करती है। अगर lesson याद नहीं होता, तो कांवेंटी मेम बच्चे को उनकी भाषा में punish करती है, कुछ इस तरह – I will teach you a lesson. और बालक वह lesson ज़िन्दगी भर नहीं भूलता।

सबक ठीक से याद करने से ज़िन्दगी बन जाती है। जो सबक इंसान अपनी ज़िंदगी में सीखता है, वही सबक वह दूसरों को सिखाता है। गुरु-शिष्य संबंध भी सीखने सिखाने का ही रिश्ता है।

अगर अपना भविष्य उज्जवल बनाना है तो पाठशाला और मदरसे से कुछ नहीं होता, कोचिंग संस्थान की शरण भी लेनी पड़ती है।।

आश्चर्य तो तब होता है, जब ज़िन्दगी के सभी सबक एक तरफ हो जाते हैं, और सास दाँतों तले उंगली दबा कहती है – बहू ने न जाने कैसी पट्टी पढ़ा दी है कि बबलू हाथ से ही निकल गया। फ़िल्मी भाषा में शायद इसे ही प्यार का सबक कहते हैं।

कितनी विचित्र बात है ! हमारे समय में सबक की शुरुआत पट्टी से ही होती थी। एक पट्टी पेम ही हमारा बस्ता होता था। जो अक्षर और अंक हमने बचपन में पट्टी पर लिख लिखकर सीख लिए, उससे ज़िन्दगी की एक इबारत बन गई। या तो ज़िन्दगी का गणित सुलझ गया या उलझ गया। किसी ने एक शब्द प्यार सीख लिया तो वह मसीहा बन गया और किसी ने अगर ज़िहाद सीख लिया तो वह आतंकी बन गया।।

अच्छा सबक ज़िन्दगी देता है, ज़िन्दगी बनाता है। जो हमें एक नेक इंसान बनाये, वही शिक्षा ! अगर हर पढ़ा लिखा इंसान नेक बन जाता तो क्या आज संसार में अमन चैन नहीं होता ? दुर्योधन, कंस, रावण, हिटलर और लादेन को ऐसी क्या घुट्टी पिलाई गई कि वे मानवता के लिए कलंक साबित हुए।

एक समझदार कौम वही, जो ग़लतियों से सबक ले ! किसी एक हैवान के जुनून से बर्बाद जापान जैसे देश ने दुनिया को जतला दिया कि दृढ़ संकल्प, परिश्रम, निष्ठा और देश के प्रति समर्पण से कितना ऊपर उठा जा सकता है। हमें किसी से सबक सीखना भी है, और किसी को सबक सिखलाना भी है। यह संसार वाकई एक पाठशाला है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 618 ⇒ गया और बोधगया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गया और बोधगया ।)

?अभी अभी # 618 ⇒  गया और बोधगया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मैं कभी गया नहीं गया, बोधगया नहीं गया। सुना है दोनों जगह ऐसी हैं, जहां मुक्ति मिलती है।

जो चला गया, उसे भी और जिसे जीवन का बोध हो गया, उसे भी। जिसे बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया। इसी स्थान पर बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी, वह बोधिवृक्ष यहीं है।

आखिर यह कैसा बोध है जो बोधगया में ही होता है। आप चाहें तो इसे आत्मबोध कहें, आत्म साक्षात्कार कहें, सेल्फ रियलाइजेशन कहें, यह होता तो हमारे अंदर ही है। यह बोधिवृक्ष भी हमारे अंदर ही है। अंदर की खोज के लिए बाहर का आलंबन तो लेना ही पड़ता है। चारों धाम की यात्रा अंतर्यात्रा के बिना कभी पूरी नहीं होती।।

मैं इतना अभागा, कभी प्रयागराज भी नहीं गया। गया हो या बोधगया, बद्रीनाथ धाम हो या हर की पेढ़ी, मुक्ति का द्वार तो गंगा ही है और गंगा, जमना और सरस्वती, तीनों नदियों का संगम भी प्रयागराज ही में है। हो गया न महाकुंभ। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की प्रतीक ही तो हैं ये तीनों नदियां। जिसमें सरस्वती यानी वैराग्य तो लुप्त है। बिना वैराग्य के कहां मुक्ति। बुद्ध का वैराग्य ही बोधगया है।

हां मैं कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद रॉक मेमोरियल जरूर गया हूं, कुछ समय के लिए ध्यानमग्न हो विवेकानंद भी बना, फिर वापस चला आया। काश विक्रमादित्य के सिंहासन की तरह बोधिवृक्ष के नीचे बैठने से ही बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाए तो जीवन कितना आसान हो जाए। लेकिन यहां गुडविल नहीं, स्ट्रांग विल काम आती है। वैराग्य कोई जागीर नहीं, कि वसीयतनामे के जरिए चाहे जिसके नाम कर दी जाए।।

कबीर अक्सर ताने बाने की बात करते हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की बात करते हैं। इड़ा, पिंगला को आप चाहें तो सूर्य चंद्र नाड़ी समझें अथवा प्रतीक रूप में ज्ञान और भक्ति रूपा गंगा जमना, लेकिन सुषुम्ना तो अदृश्य वही सुप्त नाड़ी है, जो वैराग्य रूपी सरस्वती नदी की प्रतीक है। तीनों का संगम ही महाकुंभ है जो इसी शरीर में सहस्रार है। जिसे अमृत कहा जाता है, वह वह मुक्ति है जो हमें जन्म मरण के बंधन से मुक्त करती है। देव असुर दोनों मूर्ख थे, जो मुक्त होने की अपेक्षा, स्वर्ग प्राप्ति के लिए, और अमर होने के लिए, अमृतपान करना चाहते थे।

कबीर को भी इसका बोध था और बुद्ध को भी। जीते जी जिसे इसका बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया, अमर हो गया वर्ना लगाते रहो डुबकी ज्ञान और भक्ति की गंगा में, बिना वैराग्य भाव के, करते रहो अमृत पान। जब छूटेंगे प्रान, यहीं गया में ही होगा पिंड दान।।

काश मुक्ति इतनी आसान होती ! काशी मरणोन्मुक्ति। काशी में तो केवल प्राण त्यागने से ही मुक्ति मिल जाती है। इस कोरोना ने भी इस बार काशी में कई को मुक्त कराया। मैं मति का मारा तो कभी काशी भी नहीं गया। सोचता हूं, जीते जी ही एक बार काशी हो आऊं, प्रयागराज के संगम में स्नान करके बोधगया भी हो आऊं। मन में यह मलाल तो नहीं रहेगा, जीते जी मैं कहीं भी नहीं गया ; न गया, न बोधगया ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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