हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “आज़ादी का आंदोलन और उर्दू पत्रकारिता” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपकी एक  ज्ञानवर्धक आलेख “आज़ादी का आंदोलन और उर्दू पत्रकारिता” पर चर्चा।

☆ आलेख ☆ आज़ादी का आंदोलन और उर्दू पत्रकारिता ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

भूमिका

देश केवल भूगोल नहीं होता, बल्कि वह अपने नागरिकों की चेतना, सोच और संघर्ष से बनता है। मनुष्य और राष्ट्र एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं। किसी भी देश में राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में वहाँ के सामाजिक हालात और साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता, विशेषकर उर्दू पत्रकारिता, ने जनमानस को जागृत करने, राजनीतिक चेतना को विकसित करने तथा औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए जनता को मानसिक रूप से तैयार करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

1857 की क्रांति के संदर्भ में यदि उस समय की परिस्थितियों का अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि उर्दू समाचार पत्रों ने उच्च और निम्न—दोनों वर्गों के भारतीयों को एक साझा मंच प्रदान किया और राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की।

1857 का विद्रोह और उर्दू पत्रकारिता

अतीक सिद्दीकी ‘इंडियन न्यूज़पेपर’ की समीक्षा करते हुए ‘नटराज’ के हवाले से लिखते हैं कि उन्नीसवीं सदी का छठा दशक ब्रिटिश भारत के इतिहास में अत्यंत निर्णायक था। 1757 की प्लासी की लड़ाई से आरंभ हुआ अंग्रेज़ी प्रभुत्व 1856 में अवध के विलय के साथ अपने चरम पर पहुँच गया। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में 1857 का महासंग्राम फूटा, जिसे अंग्रेज़ों ने “ग़दर” कहा, जबकि भारतीयों के लिए यह स्वतंत्रता का प्रथम संगठित प्रयास था।

1857 की असफलता के पश्चात् अनेक उर्दू समाचार पत्रों की नीति में अस्थायी नरमी आई। कुछ पत्रों ने राजनीति के स्थान पर पश्चिमी कला और संस्कृति पर ध्यान केंद्रित किया, किंतु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही। ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित होने के बाद भी भारतीयों का असंतोष कम नहीं हुआ।

विद्रोह की पृष्ठभूमि और अख़बारों की भूमिका

ब्रिटिश शासन की धोखेबाज़ नीतियों से भारतीय सैनिक और जनता अत्यंत क्षुब्ध थे। विद्रोह की निश्चित तिथि 31 मई तय की गई थी, परंतु मेरठ में घटनाएँ पहले ही भड़क उठीं। मंगल पांडे द्वारा बैरकपुर में अंग्रेज़ अधिकारी पर गोली चलाना विद्रोह का संकेत बन गया। इस घटना से पहले ही उर्दू अख़बार जनता को मानसिक रूप से तैयार कर चुके थे।

लॉर्ड कैनिंग ने स्वयं स्वीकार किया कि देशी अख़बारों ने जनता को विद्रोह के लिए उकसाया। उनके अनुसार,

“देशी समाचार पत्रों ने जानबूझकर ऐसी खबरें प्रकाशित कीं, जिनसे भारतीय जनता विद्रोह के लिए प्रेरित हुई।”

प्रमुख उर्दू समाचार पत्र और पत्रिकाएँ

1857 और उसके बाद अनेक उर्दू पत्र-पत्रिकाएँ पूरी तरह राजनीतिक स्वरूप में सामने आईं। इनमें प्रमुख थे—

  • दिल्ली उर्दू अख़बार (मौलाना मोहम्मद बाकर)
  • सहर सामरी (1856)
  • अवध अख़बार (मुंशी नवल किशोर)
  • तरक़ीब-ए-बगावत
  • शोला-ए-तूर
  • दबदबा-ए-सिकंदरी
  • अख़बार आलमताब, खैरख़्वाह-ए-ख़लक, शम्स-उल-अख़बार आदि

इन सभी का स्वर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अंग्रेज़-विरोधी था। इन पत्रों ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया और स्वतंत्रता के लिए जन-भावना को सशक्त बनाया।

दिल्ली उर्दू अख़बार और मौलाना मोहम्मद बाकर

‘दिल्ली उर्दू अख़बार’ उस समय का सर्वाधिक प्रभावशाली समाचार पत्र था। इसके संपादक मौलाना मोहम्मद बाकर न केवल पत्रकार थे, बल्कि सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी भी थे। 1857 की असफलता के बाद अंग्रेज़ों ने अख़बार बंद कर दिया और मौलाना मोहम्मद बाकर को गोली मार दी गई।

इमदाद साबरी लिखते हैं कि मौलाना बाकर ने कलम और तलवार—दोनों से अंग्रेज़ों का मुकाबला किया। बहादुर शाह ज़फर ने इस अख़बार का नाम ‘अख़बार-ए-ज़फर’ रखने का प्रस्ताव भी दिया था।

अवध अख़बार की ऐतिहासिक भूमिका

लखनऊ से प्रकाशित अवध अख़बार उस दौर का एक अत्यंत प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्र था। इसमें राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक और आर्थिक विषयों पर गंभीर लेख प्रकाशित होते थे। यह अख़बार कुशासन की आलोचना करता था और देशभक्तों के बलिदान को उजागर करता था।

रतननाथ सरशार, मिर्ज़ा हैरत देहलवी, सैयद अहमद शेहरी जैसे प्रतिष्ठित लेखक इससे जुड़े थे। अवध अख़बार ने राष्ट्रप्रेम की भावना को व्यापक रूप से फैलाया।

विद्रोह के बाद दमन और पत्रकारों का संघर्ष

1857 के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन नीति अपनाई। विशेषकर मुसलमानों को निशाना बनाया गया। ‘शोला-ए-तूर’ जैसे अख़बारों ने इन अत्याचारों का हृदयविदारक विवरण प्रकाशित किया। नवाब जिया उद्दोला की त्रासदी इसका उदाहरण है, जिनकी पूरी संपत्ति जब्त कर ली गई और परिवार को नष्ट कर दिया गया।

बीसवीं सदी और उर्दू पत्रकारिता

बीसवीं सदी के प्रारंभ में राजनीतिक आंदोलन तेज़ हो गए। बंगाल विभाजन, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, होम रूल आंदोलन आदि ने उर्दू पत्रकारिता को नई दिशा दी।

‘वतन’, ‘तर्रक़ी’, ‘ज़माना’, ‘मुख़बीर-ए-आलम’, ‘उर्दू-ए-मौल्ला’, ‘हिंदुस्तानी’, ‘ज़मींदार’ और ‘आज़ाद’ जैसे पत्रों ने स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक समर्थन दिया।

हसरत मोहानी की ‘उर्दू-ए-मौल्ला’ ने स्वदेशी आंदोलन का खुला समर्थन किया और कांग्रेस तथा वामपंथी विचारधारा के प्रति सहानुभूति दिखाई।

ज़मींदार और राष्ट्रवादी चेतना

‘ज़मींदार’ पत्रिका मौलाना ज़फर अली खान के संपादन में जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुई। इसने विदेशी शासन का भय दूर किया और निर्भीक राजनीतिक पत्रकारिता की मिसाल कायम की। यह पत्रिका कांग्रेस और संयुक्त राष्ट्रवाद की समर्थक रही।

निष्कर्ष

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उर्दू पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं थी, बल्कि वह प्रतिरोध, बलिदान और राष्ट्रीय चेतना का सशक्त उपकरण थी। उर्दू पत्रकारों ने कठोर दमन, फाँसी और संपत्ति की जब्ती के बावजूद अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया। उनकी कलम ने भारतीय जनता को संघर्ष के लिए प्रेरित किया और स्वतंत्रता की नींव मजबूत की।

उर्दू पत्रकारिता का यह योगदान भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।

© श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९१३ ⇒ छुप गया कोई रे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छुप गया कोई रे…“।)

?अभी अभी # ९१३ ⇒ आलेख – छुप गया कोई रे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। निकलकर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान..। ‘ पंत ‘

प्रेम और भक्ति दोनों में जितना महत्व संयोग का है, उससे थोड़ा अधिक ही महत्व विरह और वियोग का है। हैं सबसे मधुर वो गीत, जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं।

सुर तो खैर संगीत और साधना का विषय है, लेकिन दर्द का सुर तो ईश्वर ने हर प्राणी को दिया है। आह को चाहिए, एक उम्र असर होने तक। कब किस वक्त, किस मूड में, कौन सा गीत, अनायास ही आपके कानों में पड़े, और आप उसे गुनगुनाने लगें, उसमें इतने डूब जाएं, कि वक्त ठहर जाए।।

कई बार सुना होगा फिल्म चंपाकली(1957) के इस अमर

गीत को आपने भी। अहसास तो हम सबको होता है, लेकिन जब हमारे दर्द की अभिव्यक्ति कुछ इस तरह होती है, तो शब्द हृदय के अंदर तक उतर जाते हैं ;

छुप गया कोई रे, दूर से पुकार के

दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के ..

हमारी यादों की परछाइयों में भी बहुत कुछ ऐसा है, जो इन शब्दों को सुनते ही अनायास ही प्रकट हो जाता है।

आज हैं सूनी सूनी, दिल की ये गलियाँ

बन गईं काँटे मेरी, खुशियों की कलियाँ

प्यार भी खोया मैने, सब कुछ हार के

दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के …

खोना और पाना, कांटों और खुशियों के बीच ही तो हम अपना जीवन गुजारते चले आ रहे हैं। प्यार अगर जीवन का सबसे खूबसूरत उपहार है, तो प्यार में हारने का दुख भी उतना ही पीड़ादायक है।

क्या पीड़ा में भी सुख होता है। इस दर्द भरे गीत में ऐसा क्या है, जो एक सुधी श्रोता को बांधे रखता है।

शायद राजेंद्र कृष्ण की कलम है, अथवा हेमंत कुमार का मधुर संगीत। लेकिन लगता है, लता की आवाज का ही यह कमाल है। जब लता ने यह गीत गाया होगा, तो अवश्य ही डूबकर गाया होगा। अगला अंतरा देखिए ;

अँखियों से नींद गई, मनवा से चैन रे

छुप छुप रोए मेरे, खोए खोए नैन रे

हाय यही तो मेरे, दिन थे सिंगार के

दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के …

जो शब्द और सुर आपको पूरी तरह झंझोड़ दे, तो अवश्य ही वह राग झिंझोटी होगा। मैं नहीं जानता, इस गीत में ऐसा क्या है, जो मैं इसे आप तक पहुंचाने के लिए बाध्य हो गया।

अपना नहीं, इस जहां का नहीं, दो जहां का दर्द शामिल है इस गीत में। जब यह गीत मैं सुनता हूं तो कई ऐसे चेहरे मेरे सामने आ जाते हैं, जो इस दौर से गुजर चुके हैं। और उनमें कुछ चेहरे तो ऐसे हैं, जो यह दुनिया ही छोड़ चुके हैं। उन सबके लिए और आपके लिए भी समर्पित है यह गीत। बस, सुनिए, गुनगुनाइए, डूब जाइए, और मन करे तो दो आंसू भी बहाइए क्योंकि ;

छुप गया कोई रे

दूर से पुकार के।

दर्द अनोखे हाय

दे गया प्यार के।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६५ – देश-परदेश – सोने को पंख लग गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६५ ☆ देश-परदेश – सोने को पंख लग गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆

सोने के भाव दिन दोगुने और रात चौगुने बढ़ते आ रहे हैं। इस प्रकार की चर्चा सुनते सुनते कई दशक बीत गए। बचपन से आरंभ सफर से बुढ़ापे की दहलीज तक पहुंचते सोने के लिए ये ही सब सुनते आ रहे हैं।

विगत कुछ समय से लोग कह रहे है, सोने के तो अब पंख लग गए हैं। पंख लगे पक्षियों के लिए ऊंचाई मायने नहीं रखती हैं। असमान से भी ऊपर पहुंचने की दम रखते हैं।

तिजोरियों में बंद सुरक्षित सोना भी क्या सोचता होगा, कि वो तो सौ तालों में बंद रहता है, दुनिया झूठी है, और कहती है, कि सोने के तो अब पंख लग गए हैं।

राजस्थान के छोटे से कस्बे डेगाना जिला नागौर में एक सुनार की दुकान से एक कबूतर ने सोने की एक चेन लेकर उड़ान भर ली थी। फिर क्या था ? पूरे कस्बे के लोग कबूतरों के पीछे पीछे दौड़ने लग गए, क्या पता कौन सा कबूतर उड़ा कर ले गया हो। जब कोई व्यक्ति कीमती वस्तु को उठा कर भागता है, तो भी तो सब उसके पीछे भागने लग जाते हैं।

कस्बे के बुजुर्ग कहने लगे, किसी ने कबूतरों को ट्रेनिंग करवा कर ये काम करवाया होगा। इतिहास में भी ये जानकारी है, कि राजकुमारियों के प्रेम पत्र का आदान प्रदान कबूतर ही करते थे।

हमारे समय में तो गली मोहल्ले के आशिकों को भी कबूतर का दर्जा मिला हुआ था। वो तो पंजाबी के प्रसिद्ध गायक दलेर मेहंदी ने “कबूतरबाजी” में गैर कानूनी कमाई करी तब से कबूतर शब्द से ही लोग गुरेज करने लग गए हैं।

डेगाना कस्बे के भोले भाले कबूतर ने सोने की चेन उसके मालिक को जल्दी लौटा कर, पक्षियों की ईमानदारी प्रमाणित कर दी है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९१२ ⇒ वाइन और अजवाइन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वाइन और अजवाइन…“।)

?अभी अभी # ९१२ ⇒ आलेख – वाइन और अजवाइन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आप चाहें इसे स्वदेशी और विदेशी इलाज कहें, औषधि और शराब कहें, अथवा दवा दारू कहें, एक ही बात है। बीमार होने पर दवा दारू तो सभी को लेनी पड़ती है। यह अलग बात है, कुछ लोग दवा से ठीक हो जाते हैं तो कुछ लोग दारू पीकर बीमार। वाइन किसी के लिए दवा है और किसी के लिए दारू। एलोपैथी में सभी बीमारियों का हल, कम अल्कोहल।

आपने छोटे बच्चों को देखा होगा। उन्हें तो चम्मच से दवा भी पिलाना मुश्किल हो जाता है। वे दवा के नाम से ही इतने डरे हुए होते हैं, मानो कोई उनके मुंह में जबर्दस्ती शराब की कुछ बूंदें डाल उन्हें बिगाड़ रहा है। उनकी नाक बंद कर, रोते हुए उनके मुंह में दवा का घूंट पहुंचाया जाता है। भले ही बड़ा होकर वह पूरी बोतल डकार जाए।।

अगर आप वाइन को शराब कहेंगे तो हम अजवाइन को औषधि कहेंगे। आपके दर्द की दवा अगर वाइन है तो हमारे पेट दर्द की दवा अजवाइन है। यह अगर सच है कि हमारी सरकार आपके लिए देशी और विदशी शराब की दुकानें खुलवाती हैं, तो इससे बड़ा सच यह है कि हमारी अजवाइन नमक की तरह, हर किराने की दुकान पर आसानी से उपलब्ध है।

यह दवा ही नहीं, हमारे रसोई घर की मसालदानी का श्रृंगार भी है।

एक फिल्म अमर प्रेम आई थी, जिसमें कॉमेडियन ओमप्रकाश पानी पूरी में पानी की जगह पताशे में शराब भरकर पीते थे। हम लोग बेसन के पकौड़ों में अजवाइन का प्रयोग करते हैं। वाइन का कोई पौधा नहीं होता, अजवाइन का होता है। कौन सुबह सुबह मुंह कड़वा करे, हम तो अजवाइन से मुखशुद्धि करते हैं। मुंह भी साफ और पेट भी साफ।।

दवा के रूप में अजवाइन उपलब्ध है मगर फिर भी इंसान वाइन के पीछे भागता है। एक ओर वाइन के विज्ञापन पर विदेशी और देशी कंपनियां इतना खर्च करती है, सरकार शराब के ठेकों से रेवेन्यू कमाती है और दूसरी ओर हमारी अजवाइन पूरी तरह स्वदेशी और आत्म निर्भर है। हमारी अजवाइन की सरकार सिर्फ दादी मां के अचूक नुस्खों पर ही चल रही है।

वाइन कड़वी होती है, लेकिन अजवाइन इतनी कड़वी भी नहीं होती। सुनते हैं, वाइन में नशा होता है। याद आते हैं वे दिन, जब मां के हाथ के मोटे मोटे गद्दे और गड्ढों वाले अजवाइन के घी वाले गर्मागर्म पराठों के साथ कभी घर का निकाला मक्खन तो कभी दही और सर्दियों में जब चाय का प्याला साथ आता था, तो वह नशा अजवाइन का था, या मां के हाथ का, कुछ पता ही नहीं चलता था।

आज मां की जगह हाथ किसी का भी हो, अजवाइन का स्वाद और नशा वही है।

जहां अजवाइन के साथ मां की याद भी जुड़ी हो, वहां सेहत ही सेहत है, स्वाद ही स्वाद है, नशा ही नशा है। मेरी हमेशा की हमसफर, डिवाइन अजवाइन।

बड़ा अच्छा लगता है, जब वाइन एंड डाइन फूड रेस्तरां से निकलते वक्त काउंटर पर, ट्रे में रखी सिकी सौंफ, दालचीनी, तिल्ली और अजवाइन पर, ग्राहकों को संतुष्टि से, हाथ मारते देखता हूं। वाइन है जहां, अजवाइन भी है वहां।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२३ – आलेख – दरवाज़े – ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२३ ☆ दरवाज़े… ?

एक समय था जब लोगों के घरों के दरवाज़े दिन भर खुले रहते थे। समय के साथ विचार बदले, स्थितियाँ बदलीं और अब अधिकांश घरों के दरवाज़े बंद रहने लगे हैं।

सुरक्षा की दृष्टि से दरवाज़ा बंद रखना समकालीन आवश्यकता हो सकता है। तथापि स्थूल का प्रभाव, सूक्ष्म पर भी होता है।

एक प्रसंग सुनाता हूँ। एक धनी व्यक्ति एक महात्मा के पास आया। धनी का महल आलीशान था। उसके मन में इच्छा हुई कि अपना महल महात्मा को दिखाए। बहुत ना-नुकर के बाद महात्मा उसका महल देखने के लिए राजी हो गए। धनी ने जब अपना महल महात्मा को दिखाया तो वे हँस पड़े। धनी आश्चर्यचकित हुआ। फिर तनिक नाराज़गी के साथ बोला, ” महात्मन! यह दुनिया का सबसे सुरक्षित महल है।” महात्मा ने पूछा, “कैसे?” धनी बोला,” मैंने इसके सारे दरवाज़े चुनवा दिये हैं। इसमें केवल एक ही दरवाज़ा रखा है जिसके चलते शत्रु का भीतर प्रवेश करना असंभव-सा हो चला है।” इस बार महात्मा ठहाका लगाकर हँसे। फिर बोले, ” यह एक दरवाज़ा भी क्यों छोड़ दिया? यदि इसे भी बंद कर दो तो शत्रु का तुम तक पहुँचना असंभव-सा नहीं अपितु असंभव ही होगा।”  धनी ने महात्मा के ज्ञान के कई प्रसंग लोगों से सुने थे। उसे लगा, सारे प्रसंग झूठे हैं। महात्मा तो सामान्य बात भी समझ नहीं पाते। सो चिढ़कर बोला, “महात्मन, यदि यह एकमात्र दरवाज़ा भी बंद कर दिया तब तो मेरे प्राण जाना निश्चित है। ऐसी सूरत में यह महल, महल न रहकर कब्र में बदल जाएगा।”  इस बार  गंभीर स्वर में महात्मा बोले, ” जब तुझे बात का भान है कि एक दरवाज़ा बंद करने से तेरी मृत्यु हो जाएगी तो इतने सारे दरवाज़े बंद करके कितनी बार मर चुका है तू?”

ध्यान देनेवाली बात है कि  दरवाज़े सर्वदा बंद रखने के लिए होते तो बनाये ही क्यों जाते? उनके स्थान पर भी दीवारें ही खड़ी की जातीं।

दरवाज़े बार-बार खुलते रहने चाहिएँ, ताज़ा हवा का झोंका भीतर आते रहना चाहिए। खुले दरवाज़ों से नयापन और ताज़गी भीतर आते रहते हैं, प्रफुल्लता बनी रहती है।

…अंतिम बात,  घर के हों या मन के, यह सूत्र दोनों प्रकार के दरवाज़ों पर लागू होता है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९११ ⇒ बुद्धिजीवी और विलासिता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुद्धिजीवी और विलासिता…“।)

?अभी अभी # ९११ ⇒ आलेख – बुद्धिजीवी और विलासिता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यहाँ हम बुद्धि-विलास की बात नहीं कर रहे। बुद्धि और विलासिता की बात कर रहे हैं। किसी के पास अगर बुद्धि है, और पैसा नहीं है, तो वह कहाँ का बुद्धिजीवी। क्या बुद्धिजीवी झुग्गी -झोपड़ी अथवा पंचम की फेल में रहता है।

खुदा जब हुस्न देता है, तो नज़ाकत आ ही जाती है। बहुत से पैसे वालों को यह कहते सुना है, पैसा कमाने में अकल लगती है ! पैसे झाड़ पर नहीं उगते। हमारा पैसा है, हम उड़ा रहे हैं, तुम्हारे पेट में क्यूँ दर्द हो रहा है।।

वैसे अक्लमंद को बुद्धिजीवी नहीं कहते। एक बुद्धिमान व्यक्ति और बुद्धिजीवी में अंतर करना इतना आसान भी नहीं होता। जो अंतर चाय और कॉफ़ी में होता है, वही अंतर एक अक्लमंद और बुद्धिजीवी में होता है। चाय सड़क किनारे किसी भी ठेले पर पी जा सकती है, कॉफ़ी के लिए कॉफ़ी हाउस है न !

कॉफ़ी हाउस में केवल कॉफी नहीं पी जाती, बहुत कुछ होता है। राजनीति पर, मार्क्स, लेनिन पर, गर्मागर्म बहस होती है। प्याले में तूफान उठता है, कॉफ़ी के खत्म होते ही थम जाता है।

अगर कॉफ़ी खत्म नहीं होती, तो अब तक कई क्रांतियाँ हो चुकी होती।।

बुद्धि और ज्ञान का भी पूरब और पश्चिम का संग है। बुद्धि हमें पश्चिम की ओर ले जाती है और ज्ञान पश्चिम को पूरब की ओर वापस खींचता है। योग से भोग की राह पश्चिम है, और भोग से योग की राह पूरब। बुद्धि का स्वामी विद्वान भी कहलाता है, और संस्कृत का जानकार प्रकांड विद्वान। विद्यालंकार जैसे नाम अपने आप में अलंकार होते हैं।

बुद्धि को आप रस और विलास से जुदा नहीं कर सकते। विद्वान रसिक होते हैं, और बुद्धिजीवी विलासी। हो सकता हो, विद्वान और बुद्धिजीवी में हिंदी अंग्रेज़ी का भेद हो। बुद्धिजीवी को अंग्रेज़ी आती है और ग़ज़ब की आती है।।

जहाँ बुद्धिजीवी है, वहाँ हेमिंग्वे के शब्दों में wining, dining, concubining है। एक प्रेरणा होती है, जिसे प्रेमिका कहा जाता है, बुद्धिजीवी रखैल जैसे घटिया शब्द पसंद नहीं करते। मी टू में सब कुछ बयां हो जाता है।

न जाने क्यूँ, बुद्धि को सृजन से जोड़ दिया गया है और सिगरेट और शराब को सृजन से। जहाँ धुआं है, वहाँ आग है, सीने में जलन है। यही आग, यही जलन सृजन है। एक बुद्धिजीवी का आदर्श काफ़्का, सार्त्र, नीत्शे और मार्क्सहै। कुंठा, संत्रास और शून्यता का अहसास ही बुद्धिजीविता है। यहाँ सूरज की रोशनी में नहीं, अंधेरे बंद कमरों में सृजन होता है, यहाँ के सूरजमुखी अंधेरों में खिलते हैं। एक चिथड़ा सुख ही उसकी नियति है। यहाँ सभी अपने अपने अजनबी हैं, बंद गली का आखरी मकान ही बुद्धिजीवी का असली मुकाम है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९१० ⇒ शिलान्यास, उद्घाटन और लोकार्पण ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शिलान्यास, उद्घाटन और लोकार्पण…“।)

?अभी अभी # ९१० ⇒ आलेख – शिलान्यास, उद्घाटन और लोकार्पण ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शिलान्यास उसे कहते हैं, जब किसी भी निर्माण के पहले एक शिला पर किसी गणमान्य व्यक्ति का नाम अंकित होता है, तिथि और तारीख के साथ। इससे एक संकेत ज़रूर हो जाता है, कि यहाँ निर्माण अवश्य होगा। शिलान्यास कोई साधारण व्यक्ति का, आम भूमि-पूजन नहीं होता, एक असाधारण घटना होती है, जिसकी खबर अखबारों तक में स्थान पा जाती है। शिलान्यास, विकास का प्रथम सोपान है।

शिलान्यास और निर्माण के बीच कई प्रशासनिक बदलाव आ जाते हैं, मंत्री, अफसर, यहाँ तक कि ठेकेदार भी बदल जाते हैं। फिर भी कभी द्रुत गति से तो कभी कछुए की चाल से, निर्माण कार्य का शुभारंभ हो ही जाता है। सरकारी बजट और ठेकेदार के बजट के सहारे विकास की इमारत बुलंद हो, उद्घाटन के लिए तैयार हो ही जाती है।।

बड़े काम के लिए बड़े व्यक्तियों को ही याद किया जाता है। मज़दूर का पसीना बह चुका, जितना पैसा बहना था, बह चुका, अब जनता की चीज़ जनता को समर्पित होना है, जो किसी प्रमुख सेवक का फर्ज बनता है कि वह फीता काटकर, उद्घाटन की औपचारिकता पूरी करे।

उद्घाटन और लोकार्पण में वही अंतर है जो हार फूल से स्वागत, और माल्यार्पण में है। इसे लोकतंत्र की भाषा में तेरा तुझको अर्पण कहते हैं। लोकहित में जो भी विकास अथवा महत निर्माण कार्य होता है, उसका लोकार्पण भी कोई विकास पुरुष ही करता है।।

ये सभी कार्य एक आम आदमी, मज़दूर अथवा समाज के किसी गणमान्य व्यक्ति से भी करवाए जा सकते हैं, लेकिन राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री के रहते यह कार्य किसी और से कैसे करवाया जा सकता है। कुछ परम्पराएं हैं, मान्यताएँ हैं, भाषण देने की, सरकार की नीतियों की व्याख्या करने की, जो न तो एक आदमी समझ सकता है, न अपने शब्दों में व्यक्त कर सकता है। राजनैतिक सूझबूझ का तकाजा है कि सामान्य व्यक्ति पर यह भारी भरकम ज़िम्मेदारी न सौंपी जाए।

बड़ा कष्ट होता है जब हमारे प्रधान सेवक इन महत्वपूर्ण कार्यों के सम्पादन के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक चंद घंटों में पहुँच कर अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते हैं। खून-पसीना एक होता है, तब जाकर एक लोकार्पण सम्पन्न होता है। यह कोई बच्चों का खेल नहीं कि एक फीता काटा, और खेल खतम।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०८ ☆ स्वार्थ-नि:स्वार्थ… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख  स्वार्थ-नि:स्वार्थ। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०८ ☆

☆ स्वार्थ-नि:स्वार्थ… ☆

‘बिना स्वार्थ आप किसी का भला करके देखिए; आपकी तमाम उलझनें ऊपर वाला सुलझा देगा।’ इस संसार में जो भी आप करते हैं; लौटकर आपके पास आता है। इसलिए सदैव अच्छे कर्म करने की सलाह दी जाती है। परन्तु आजकल हर इंसान स्वार्थी हो गया है। वह अपने व अपने परिवार से इतर सोचता ही नहीं तथा परिवार पति-पत्नी व बच्चों तक ही सीमित नहीं रहे; पति-पत्नी तक सिमट कर रह गये हैं। उनके अहम् परस्पर टकराते हैं, जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ की बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने व प्रतिशोध लेने हेतु कटघरे में खड़ा करने का भरसक प्रयास करते हैं। विवाह नामक संस्था चरमरा रही है और युवा पीढ़ी ‘तू नहीं, और सही’ में विश्वास करने लगी हैं, जिसका मूल कारण है अत्यधिक व्यस्तता। वैसे तो लड़के आजकल विवाह के नाम से भी कतराने लगे हैं, क्योंकि लड़कियों की बढ़ती लालसा व आकांक्षाओं के कारण वे दहेज के घिनौने इल्ज़ाम लगा पूरे परिवार को जेल की सीखचों के पीछे पहुंचाने में तनिक भी संकोच नहीं करतीं। कई बार तो वे अपने माता-पिता की पैसे की बढ़ती हवस के कारण वह सब करने को विवश होती हैं।

स्वार्थ रक्तबीज की भांति समाज में सुरसा के मुख की भांति बढ़ता चला जा रहा है और समाज की जड़ों को खोखला कर रहा है। इसका मूल कारण है हमारी बढ़ती हुई आकांक्षाएं, जिन की पूर्ति हेतु मानव उचित-अनुचित के भेद को नकार देता है। सिसरो के मतानुसार ‘इच्छा की प्यास कभी नहीं बझती, ना पूर्ण रूप से संतुष्ट होती है और उसका पेट भी आज तक कोई नहीं भर पाया।’ हमारी इच्छाएं ही समस्याओं के रूप में मुंह बाये खड़ी रहती हैं। एक के पश्चात् दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है तथा समस्याओं का यह सिलसिला जीवन के समानांतर सतत् रूप से चलता रहता है और मानव आजीवन इनके अंत होने की प्रतीक्षा करता रहता है; उनसे लड़ता रहता है। परंतु जब वह समस्या का सामना करने पर स्वयं को पराजित व असमर्थ अनुभव करता है, तो नैराश्य भाव का जन्म होता है। ऐसी स्थिति में विवेक को जाग्रत करने की आवश्यकता होती है तथा समस्याओं को जीवन का अपरिहार्य अंग मानकर चलना ही वास्तव में जीवन है।

समस्याएं जीवन की दशा व दिशा को तय करती हैं और वे तो जीवन भर बनी रहती है। सो! उनके बावजूद जीवन का आनंद लेना सीखना कारग़र है। वास्तव में कुछ समस्याएं समय के अनुसार स्वयं समाप्त हो जाती हैं; कुछ को मानव अपने प्रयास से हल कर लेता है और कुछ समस्याएं कोशिश करने के बाद भी हल नहीं हो पातीं। ऐसी समस्याओं को समय पर छोड़ देना ही बेहतर है। उचित समय पर वे स्वत: समाप्त हो जाती हैं। इसलिए उनके बारे में सोचो मत और जीवन का आनंद लो। चैन की नींद सो जाओ; यथासमय उनका समाधान अवश्य निकल आएगा। इस संदर्भ में मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहती हूं कि जब तक हृदय में स्वार्थ भाव विद्यमान रहेगा; आप निश्चिंत जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते और कामना रूपी भंवर से कभी बाहर नहीं आ सकते। स्वार्थ व आत्मकेंद्रिता दोनों पर्यायवाची हैं। जो व्यक्ति केवल अपने सुखों के बारे में सोचता है, कभी दूसरे का हित नहीं कर सकता और उस व्यूह से मुक्त नहीं हो पाता। परंतु जो सुख देने में है, वह पाने में नहीं। इसलिए कहा जाता है कि जब आपका एक हाथ दान देने को उठे, तो दूसरे हाथ को उसकी खबर नहीं होनी चाहिए। ‘नेकी कर और कुएं में डाल’ यह सार्थक संदेश है, जिसका अनुसरण प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। यह प्रकृति का नियम है कि आप जितने बीज धरती में रोपते हैं; वे कई गुना होकर फसल के रूप में आपके पास आते हैं। इस प्रकार नि:स्वार्थ भाव से किए गये कर्म असंख्य दुआओं के रूप में आपकी झोली में आ जाते हैं। सो! परमात्मा स्वयं सभी समस्याओं व उलझनों को सुलझा देता है। इसलिए हमें समीक्षा नहीं, प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित के बारे में हम से बेहतर जानता है तथा वही करता है; जो हमारे लिए बेहतर होता है।

‘अच्छे विचारों को यदि आचरण में न लाया जाए, तो वे सपनों से अधिक कुछ नहीं हैं’ एमर्सन की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है। स्वीकारोक्ति अथवा प्रायश्चित सर्वोत्तम गुण है। हमें अपने दुष्कर्मों को मात्र स्वीकारना ही नहीं चाहिए; प्रायश्चित करते हुए जीवन में दोबारा ना करने का मन बनाना चाहिए। वाल्मीकि जी के मतानुसार संत दूसरों को दु:ख से बचाने के लिए कष्ट सहते हैं और दुष्ट लोग दूसरों को दु:ख में डालने के लिए।’ सो! जिस व्यक्ति का आचरण अच्छा होता है, उसका तन व मन दोनों सुंदर होते हैं और वे संसार में अपने नाम की अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

दूसरी ओर दुष्ट लोग दूसरों को कष्ट में डालकर सुक़ून पाते हैं। परंतु हमें उनके सम्मुख झुकना अथवा पराजय स्वीकार नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वीर पुरुष युद्ध के मैदान को पीठ दिखा कर नहीं भागते, बल्कि सीने पर गोली खाकर अपनी वीरता का प्रमाण देते हैं। सो! मानव को हर विषम परिस्थिति का सामना साहस-पूर्वक करना चाहिए। ‘चलना ही ज़िंदगी है और निष्काम कर्म का फल सदैव मीठा होता है। ‘सहज पके, सो मीठा होय’ और ‘ऋतु आय फल होय’ पंक्तियां उक्त भाव की पोषक हैं। वैसे ‘हमारी वर्तमान प्रवृत्तियां हमारे पिछले विचार- पूर्वक किए गए कर्मों का परिणाम होती हैं।’ स्वामी विवेकानंद जन्म-जन्मांतर के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। सो! झूठ आत्मा के खेत में जंगली घास की तरह है। अगर उसे वक्त रहते उखाड़ न फेंका जाए, तो वह सारे खेत में फैल जाएगी और अच्छे बीज उगने की जगह भी ना रहेगी। इसलिए कहा जाता है कि बुराई को प्रारंभ में ही दबा दें। यदि आपने तनिक भी ढील छोड़ी, तो वह खरपतवार की भांति बढ़ती रहेगी और आपको उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देगी; जहां से लौटने का कोई मार्ग शेष नहीं दिखाई पड़ेगा।

प्यार व सम्मान दो ऐसे तोहफ़े हैं, अगर देने लग जाओ तो बेज़ुबान भी झुक जाते हैं। सो! लफ़्ज़ों को सदैव चख कर व शब्द संभाल कर बोलिए। ‘शब्द के हाथ ना पांव/ एक शब्द करे औषधि/ एक शब्द करे घाव।’ कबीर जी की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है। शब्द यदि सार्थक हैं, तो प्राणवायु की तरह आपके हृदय को ऊर्जस्वित कर सकते हैं। यदि आप अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, तो दूसरों के हृदय को आहत करते हैं। इसलिए सदैव मधुर वाणी बोलिए। यह आप्त मन में आशा का संचरण करती है। निगाहें भी व्यक्ति को घायल करने का सामर्थ्य रखती हैं। दूसरी ओर जब कोई अनदेखा कर देता है, तो बहुत चोट लगती है। अक्सर रिश्ते इसलिए नहीं सुलझ पाते, क्योंकि लोग ग़ैरों की बातों में आकर अपनों से उलझ जाते हैं और जब कोई अपना दूर चला जाता है, तो बहुत तकलीफ़ होती है। परंतु जब कोई अपना पास रहकर भी दूरियां बना लेता है, तो उससे भी अधिक तकलीफ़ होती है। इसलिए जो जैसा है; उसी रूप में स्वीकारें; संबंध लंबे समय तक बने रहेंगे। अपने दिल में जो है; उसे कहने का साहस और दूसरे के दिल में जो है; उसे समझने की कला यदि आप में है, तो रिश्ते टूटेंगे नहीं। हां इसके लिए आवश्यकता है कि आप वॉकिंग डिस्टेंस भले रखें, टॉकिंग डिस्टेंस कभी मत रखें, क्योंकि ‘ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुक़ाम/ वे फिर नहीं आते।’ इसलिए किसी से अपेक्षा मत करें, बल्कि यह भाव मन में रहे कि हमने किसी के लिए किया क्या है? ‘सो! जीवन में देना सीखें; केवल तेरा ही तेरा का जाप करें– जीवन में आपको कभी कोई अभाव नहीं खलेगा।’

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

2.2.26

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९०९ ⇒ पढ़े-लिखे लोग ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पढ़े-लिखे लोग…“।)

?अभी अभी # ९०९ ⇒ आलेख – पढ़े-लिखे लोग ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे समाज में तीन तरह के लोग रहते है ! काला अक्षर, साक्षर और पढ़ा-लिखा। काला अक्षर को आप निरक्षर भी कह सकते हैं। आरंभ में सभी काला अक्षर होते हैं। अक्षर ज्ञान होते ही वे साक्षर हो जाते हैं। जब वे पढ़ना और लिखना सीख जाते हैं, तो पढ़े-लिखे कहलाते हैं।

यह पढ़ना और लिखना इतना आसान भी नहीं ! बिना पढ़े लिखना नहीं आता। अ के साथ अनार और अं के साथ अंगूर देखकर अक्षर ज्ञान होता है। जो पढ़ा है, वह लिखकर भी बताना पड़ता है। जो पढ़ा है, उसकी परीक्षा लिखकर देनी होती है। उत्तीर्ण होने पर पढ़ाई जारी रहती है। अनुत्तीर्ण होने पर पढ़ाई रुक जाती है। आदमी पढ़ा-लिखा कहलाने से वंचित हो जाता है।।

जो पढ़-लिख कर आगे बढ़ जाते हैं, वे पढ़े-लिखे इंसान कहलाते हैं। जो पढ़-लिखकर भी आगे नहीं बढ़ पाते, लोग उन्हें पढ़ा-लिखा मानने से इंकार कर देते हैं। इतनी पढ़ाई-लिखाई किस काम की, इससे तो घास ही छीलते, तो अच्छा था। वैसे राग दरबारी में घास छीलने को पीएचडी करना कहा गया है, लेकिन आजकल पीएचडी करना, घास छीलना जितना आसान भी नहीं।

एक पढ़े-लिखे इंसान से लोग दुनिया भर की उम्मीदें लगाए बैठे होते हैं, यह ये कर लेगा, यह वो कर लेगा। इसको देखो, उसको देखो। कोशिश करने वाले की कभी हार नहीं होती। जब तक वह कुछ कमाता-धमाता नहीं, लोग उसे पढ़ा-लिखा मानने से इंकार कर देते हैं, लानत है ! पढ़े-लिखे हो, कुछ करते क्यों नहीं !और जैसे ही उसकी एक अच्छी नौकरी लगी, वह एक अच्छा पढ़ा- लिखा, काबिल इंसान बन जाता है।।

जो ज़्यादा पढ़-लिख नहीं पाते, लेकिन किसी पुश्तैनी धंधे में महारत हासिल कर लेते हैं, अच्छा पैसा कमा लेते हैं, वे पढ़े-लिखे लोगों के लिए आदर्श साबित होते हैं। तुमने पढ़-लिखकर, इतने साल की नौकरी में क्या तीर मार लिया। महेश को देखो, एक कपड़े की दुकान से आज छः दुकानें खड़ी कर ली।

पढ़ाई के साथ इंसान में दिमाग भी होना चाहिए। आर्थिक रूप से सम्पन्न होना एक पढ़े-लिखे इंसान की पहली शर्त है। लोग डॉक्टर, इंजीनियर और चार्टर्ड अकाउंटेंट को अधिक पढ़ा-लिखा मानते हैं। प्रोफेसर, पत्रकार और लेखक भी पढ़े-लिखों की जमात में ही आते हैं।

राजनीति और समाज सेवा एक आदर्श प्लेटफार्म है, जिस पर बिना भेदभाव और ऊंच-नीच के कोई भी व्यक्ति, साधारण शिक्षा के बल पर भी, अपना स्थान बना सकता है। मोदीजी, बाबा आमटे, अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और कैलाश सत्यार्थी जैसे कई ज्वलंत उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने जन-जागरण और सामाजिक उत्थान में अपना अमूल्य योगदान दिया है।।

एक पढ़े-लिखे इंसान से यह उम्मीद भी होती है कि वह समझदार और ईमानदार भी हो। समझदारी और ईमानदारी की कोई डिग्री नहीं होती, कोई यूनिवर्सिटी नहीं होती। समाज में विसंगतियों के लिए जितना एक कम पढ़ा-लिखा जिम्मेदार है, उतना ही एक अधिक पढ़ा-लिखा भी। आज समाज को जितना खतरा चोर-डाकुओं से नहीं, उससे अधिक खतरा भ्रष्ट और बेईमानों से है।

एक पढ़ा-लिखा आदमी अगर रिश्वत लेता और देता है, एक व्यापारी अगर मिलावट और बेईमानी से पैसा कमाता है, तो

दोनों ही देश के दुश्मन हैं। ईमानदारी ही देशभक्ति है, राष्ट्रीयता है। अगर आप ईमानदार हैं तो पढ़े लिखे, समझदार हैं, अन्यथा जाहिल गँवार और देशद्रोही हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७६ ☆ जहाँ गिरते पत्ते रचते हैं: नया बसंत… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “जहाँ गिरते पत्ते रचते हैं: नया बसंत…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७६ ☆ जहाँ गिरते पत्ते रचते हैं: नया बसंत… ☆

वह घर किसी बंद गली में नहीं था। लोग आते-जाते रहते थे, आवाज़ें भी थीं, हलचल भी। फिर भी वह घर अपने आप में बहुत पुराना और ठहरा हुआ-सा था—जैसे समय ने उसे धीरे-धीरे संभालकर रखा हो। उसके आँगन में एक विशाल नीम का पेड़ खड़ा था। कोई ठीक से नहीं जानता था कि वह कितना पुराना है—बस इतना तय था कि घर बनने से बहुत पहले भी वह वहीं था, और हम सबकी कई पीढ़ियों से पहले के लोग भी उसे वैसे ही देखते आए थे।

वह पेड़ सिर्फ़ पेड़ नहीं था—वह परिवार का ही एक सदस्य था। उसकी छाँव में बैठना, उसके नीचे लेटना, उसके पत्तों को गिरते देखना—सब कुछ जीवन का हिस्सा था। जब वह बहुत घना हो जाता, तो उसे थोड़ा कटवा दिया जाता। कटी हुई टहनियाँ दो-तीन दिन आँगन में पड़ी रहतीं, और उन्हीं के बीच हम बच्चे छोटे-छोटे घर बनाकर खेलते। आज भी वह दृश्य कहीं भीतर ज्यों का त्यों रखा है।

हर साल ऋतुएँ आती-जाती रहीं। तब हमें बस इतना पता था कि कभी नीम के पत्ते झरते हैं, और कुछ समय बाद वह फिर से हरा-भरा हो जाता है। बसंत आता, तो उसकी डालियाँ नई कोपलों से भर जातीं। और जब पत्ते गिरते, तो आँगन जैसे धीरे-धीरे एक सुनहरी चादर ओढ़ लेता—जैसे पेड़ अपनी थकान उतार रहा हो।

उस घर में एक स्त्री रहती थी, जिसने जीवन में बहुत कुछ खोया था—कुछ सपने, कुछ भरोसे, और कुछ अपने लोग भी। जब-जब पत्ते झरते, उसे लगता जैसे उसका अपना ही जीवन कहीं झर रहा हो। वह रोज़ आँगन बुहारती, गिरे पत्तों को हटाती—मानो अपने दुःख के निशान मिटा रही हो।

एक दिन उसने ध्यान दिया—जहाँ पत्ते सबसे ज़्यादा गिरे थे, वहीं की मिट्टी कुछ अलग ही नरम और ज़िंदा-सी लग रही थी। कुछ हफ्तों बाद, उसी जगह छोटी-छोटी हरी कोंपलें फूट आईं। वह ठिठक गई। जिन पत्तों को वह अब तक बोझ समझकर हटाती रही थी, वही तो इस नई हरियाली की खाद बन गए थे।

उस दिन उसे समझ आया—कुछ चीज़ें जीवन से गिरती नहीं हैं, वे हमें आगे के लिए तैयार करती हैं।

जो टूटता है, वही भीतर कहीं कुछ नया रचता है।

जो छूटता है, वही आने वाले समय के लिए जगह बनाता है।

अगले बसंत में वह नीम का पेड़ पहले से ज़्यादा हरा था। और वह स्त्री? वह भी। उसके भीतर कोई चमत्कार नहीं हुआ था—बस एक गहरी शांति जन्म ले चुकी थी। यह जानकर कि हर पतझड़ हार नहीं होता, और हर गिरता पत्ता किसी नए बसंत की भूमिका लिख रहा होता है।

अब वह आँगन रोज़ बुहारती नहीं थी।

वह गिरे पत्तों को देख मुस्कुरा देती थी—

और आज, जहाँ कहीं भी उसे नीम का पेड़ दिख जाता है,

उसके भीतर वही पुराना सुकून उतर आता है।

क्योंकि उसे पता है—

यहीं कहीं, यहीं से,

एक नया बसंत रचा जा रहा है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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