हिन्दी साहित्य – कविता ☆ तीन कविताएँ  – सूखा…  ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

 ☆ विश्व जल दिवस पर – तीन कविताएँ  – सूखा…  ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

22 मार्च विश्व जल दिवस है। मेरे 2005 में प्रकाशित पहले काव्य संग्रह ‘कोई अच्छी ख़बर लिखना’ में जल पर बहुत सी कविताएँ शामिल थीं। उनमें से तीन कविताएँ प्रस्तुत हैं।

– हरभगवान चावला 

सूखा-1

‘कितना दूर है पंजाब’

एक भेड़ पूछती है

और मर जाती है

‘हम कितना तेज़ दौड़ें

कि तुरंत पहुँच जाएँ पंजाब’

एक और भेड़ पूछती है

और गिर जाती है

सब भेड़ों की आँखों में

अनदेखा पंजाब है

जहाँ पानी से लबालब

नदियाँ बहती हैं

हर रोज़ छोटा होता जाता है

पंजाब जाता काफ़िला

एक दिन पूछती है

एक बहुत छोटी भेड़ –

‘जब तक हम पहुँचेंगे पंजाब

क्या तब तक भी बचा रहेगा

पंजाब के दरियाओं में पानी।’

 

सूखा-2

सारा-सारा दिन

दरकी धरती की दरारों में

कोई कीड़ा ढूँढ़ती थी चिड़िया

और पाताली कुओं में चोंच भर पानी

चिड़िया हर रोज़

बारिश का इन्तज़ार करती थी

एक रात हताश चिड़िया ने

अपने भूखे-प्यासे बच्चों से कहा-

‘चलो

हम किसी दरिया के किनारे बसेंगे’

चिड़िया के नन्हें बच्चे

तुरंत उड़ना सीख गये।

 

सूखा-3

बूढ़े ने

समय से पहले दम तोड़ चुके

खेत की अस्थियों को बटोरा

और कहा-

‘कहीं मिला जल

तो प्रवाहित करूँगा तुम्हें’

फिर बूढ़े ने

खूँटों से बँधी गायों की

रस्सियाँ खोल दीं

और अर्राती गायों से कहा-

‘कभी लौटकर इस गाँव में न आना’

फिर बूढ़े ने

अपने घर का दरवाज़ा बंद किया

देर तक दीवारों को देखता रहा

दीवार पर बने मोर को सहलाया

और कहा-

‘ज़िंदगी रही तो मिलेंगे ज़रूर’

फिर बूढ़ा

पानी के सफ़र पर चल दिया

उसने सुन्न आसमान को देखा

और सहसा महसूस किया

उसकी आँखों का पानी नहीं सूखा है

सब कुछ सूख जाने के बाद भी।

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क – 406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दृष्टिहीन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – दृष्टिहीन? ?

(2013 में प्रकाशित कवितासंग्रह ‘योंही’ से)

मैं देखता हूँ रोज़

दफ़्न होता एक बच्चा,

मैं देखता हूँ रोज़

टुकड़े-टुकड़े मरता एक बच्चा,

पीठ पर वज़नी बस्ता लटकाए,

बोझ से कंधे-सिर झुकाए,

स्कूल जाते, स्कूल से लौटते,

दूसरा बस्ता टांकते;

ट्यूशन जाते, ट्यूशन से लौटते,

घर-समाज से

किताबें चाटते रहने की हिदायतें पाते,

टीवी देखते परिवार से

टीवी से दूर रहने का आदेश पाते

रास्ते की टूटी बेंच पर बैठकर 

ख़त्म होते बचपन को निहारते,

रोज़ाना की डबल शिफ्ट से जान छुड़ाते,

शिफ्टों में खेलने-कूदने के क्षण चुराते,

सुबह से रात, रात से सुबह

बस्ता पीठ से नहीं हटता,

भरसक कोशिश करता

दफ़्न होना नहीं रुकता,

क्या कहा-

आपने नहीं देखा..!

हर नेत्रपटल

दृश्य तो बनाता है,

संवेदना की झिल्ली न हो

तो आदमी देख नहीं पाता है..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 15 मार्च से आपदां अपहर्तारं साधना आरम्भ हो चुकी है 💥  

🕉️ प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, श्रीराम स्तुति, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना कर साधना सम्पन्न करें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 244 ☆ बाल गीत – नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक कुल 148 मौलिक  कृतियाँ प्रकाशित। प्रमुख  मौलिक कृतियाँ 132 (बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य) तथा लगभग तीन दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित। कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्यकर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित पाँच दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

 आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 244 ☆ 

☆ बाल गीत – नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

 नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।

दुश्मन के छक्के छुड़वाऊँ

ध्वज का मान बढ़ाऊँगा।

खूब पढ़ूँगा मैं मेहनत से

सबका कहना मानूँगा।

मात – पिता की सेवा करके

लक्ष्य सदा मैं ठानूँगा।

 *

काम समय से पूरा कर लूँ

नहीं कभी घबराऊँगा।

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।।

 *

तूफानों से नहीं डरूँगा

जीवन सफल बनाऊँ मैं।

हर मुश्किल आसान करूँगा

प्रेमिल पाठ पढ़ाऊँ मैं।

 *

सदा सत्य को मैं अपनाकर

शुचिता , शान बढ़ाऊँगा।

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।।

 *

मीठा – मीठा बोलूँगा मैं

सबसे मधु व्यवहार करूँ।

सीमाओं की रक्षा करके

दुश्मन से मैं नहीं डरूँ।

 *

प्राण देश के खातिर दे दूँ

कभी न पीठ दिखाऊँगा।

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #273 – कविता – ☆ गीतिका – जलती रही चिताएँ… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गीतिका गीतिका – जलती रही चिताएँ” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #273 ☆

☆ गीतिका – जलती रही चिताएँ… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

बने रहो आँखों में ही, मैं तुम्हें प्यार दूँ

नजर, मिरच-राईं से, पहले तो उतार दूँ ।

*

दूर रहोगे तो, उजड़े-उजड़े पतझड़ हम

अगर रहोगे संग-संग, सुरभित बयार दूँ।

*

जलती रही चिताएँ, निष्ठुर बने रहे तुम

कैसे नेह भरे जीवन का, ह्रदय हार दूँ।

*

सुख वैभव में रमें,रसिक श्री कृष्ण कन्हाई

जीर्ण पोटली के चावल, मैं किस प्रकार दूँ।

*

चुका नहीं पाया जो, पिछला कर्ज बकाया

माँग रहा वह फिर, उसको कैसे उधार दूँ।

*

पानी में फेंका सिक्का, फिर हाथ न आया

कैसे मैं खुद को, गहरे तल में उतार दूँ ।

*

दायित्वों का भारी बोझ  लिए  काँधों पर

चाह यही हँसते-हँसते, जीवन गुजार दूँ।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # 97 ☆ जंगल अंगार हो गया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “जंगल अंगार हो गया”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # 97 ☆ जंगल अंगार हो गया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

टेसू क्या फूल गए

जंगल अंगार हो गया।

 

सज गई धरा

नवल वधू सी

वृक्षों ने पहने

परिधान राजसी

 

सरसों पर मस्त मदन

पीत वसन डाल सो गया।

 

महुआ रस गंध

बौराया आम

नील फूल कलसी

भेजती प्रणाम

 

सेमल के सुर्ख गाल

अधरों पर प्यार बो गया ।

 

थिरक रही हवा

घाघरा उठाकर

चहक रहे पंछी

बाँसुरी बजाकर

 

तान फागुनी सुनकर

मौसम गुलज़ार हो गया।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कर्मण्येवाधिकारस्ते ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कर्मण्येवाधिकारस्ते ? ?

भीड़ का जुड़ना,

भीड़ का छिटकना,

इनकी आलोचनाएँ,

उनकी कुंठाएँ,

विचलित नहीं करतीं

तुम्हें पथिक..?

पथगमन मेरा कर्म,

पथक्रमण मेरा धर्म,

प्रशंसा निंदा से

अलिप्त रहता हूँ,

अखंडित यात्रा पर

मंत्रमुग्ध रहता हूँ,

पथिक को दिखते हैं

केवल रास्ते,

इसलिए प्रतिपल

कर्मण्येवाधिकारस्ते!

?

© संजय भारद्वाज  

11:07 बजे , 3.2.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 101 ☆ सादगी बेहिस हुई है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सादगी बेहिस हुई है “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 101 ☆

✍ सादगी बेहिस हुई है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

सबको अपनी ही पड़ी है शहर में

हाय दिल की मुफ़लिसी है शहर में

*

रात पूनम सी कही पर तीरगी

किस तरह की रोशनी है शहर में

*

बिल्डिंगों के साथ फैलीं झोपडीं

साथ दौलत के कमी है शहर में

*

शानो-शौक़त का दिखावा बढ़ गया

सादगी बेहिस हुई है शहर में

*

हर गली में एक मयखाना खुला

मयकशी ही मयकशी है शहर में

*

जुत रहा दिन रात औसत आदमी

यूँ मशीनी ज़िंदगी है शहर में

*

नाम पर तालीम के सब लुट रहे

फीस आफ़त हो रही है शहर में

*

सभ्य वासी बन रहे पर सच यही

नाम की कब आज़ज़ी है शहर में

*

है अरुण सुविधा मयस्सर सब मगर

कब फ़ज़ा इक गाँव सी है शहर में

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ वो बेवफ़ा था चला गया… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक ग़ज़ल – वो बेवफ़ा था चला गया।)

✍ वो बेवफ़ा था चला गया… ☆ श्री हेमंत तारे  

जब जानते हो ग़लत है तो फिर करते क्यों हो

शिकस्त के ग़म में दिन – रात झुलसते क्यों हो

*

गर पाना है खोया प्यार तो ऐलान ऐ जंग करो

ज़माने  से लढो,  यलगार भरो,  डरते क्यों हो

*

वो बेवफ़ा था चला गया, राब्ते में न रहा

तुम बेदार रहो, उसे पाने को तडपते क्यों हो

*

मय का कारोबारी मयखोर हो जरूरी तो नही

वो बाहोश रहता है,  उसे रिंद समझते क्यों हो

*

दौलत- शोहरत का नशा तारी हो उससे पेशतर

कुछ ज़र्फ़ तो पैदा करो, यूं अकडते क्यों हो

*

उसकी फितरत है वो तो गलत बयानी ही करेगा

तुम तो दानिशवर हो,  बहकावे मे आते क्यों हो

*

तमन्ना है ‘हेमंत’, के वो छम्म से आ जाये अभी

आ जाये तो बता देना तुम संजीदा रहते क्यों हो

(एहतिमाम = व्यवस्था, सिम्त = तरफ, सुकूँ = शांति, एज़ाज़ = सम्मान , शै = वस्तु, सुर्खियां = headlines, आश्ना = मित्र, मसरूफियत = व्यस्तता)

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सदाहरी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सदाहरी ? ?

तपता मरुस्थल,

निर्वसन धरती,

सूखा कंठ,

झुलसा चेहरा,

चिपचिपा बदन,

जलते कदम,

दूर-दूर तक

शुष्क और

बंजर वातावरण..,

अकस्मात

मेरी बिटिया हँस पड़ी,

अब, लबालब

पहाड़ी झरने हैं,

आकंठ तृप्ति है,

कस्तूरी-सा तन है

तलवों में मखमल है,

उर्वरा हर रजकण है,

धरा पर श्रावण है..!

 ?

© संजय भारद्वाज  

11:07 बजे , 3.2.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 168 –सजल – मानवता से बड़ा न कुछ भी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – मानवता से बड़ा न कुछ भी…” । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 168 – सजल- मानवता से बड़ा न कुछ भी… ☆

(समांत – अनापदांत – है, मात्रा भार – 16)

स्वाभिमान अब बहुत घना है।

भारत उन्नत देश बना है।।

माना सदियों रही गुलामी।

शोषण से हर हाथ सना है।।

 *

सद्भावों के पंख उगाकर।

दिया बसेरा बड़ा तना है।।

 *

आक्रांताओं ने भी लूटा।

इतिहासों का यह कहना है।।

 *

झूठ-फरेबी बहसें चलतीं।

कहना सुनना नहीं मना है।।

 *

रहें सुर्खियों में हम ही हम।

समाचार शीर्षक बनना है।।

 *

मानवता से बड़ा न कुछ भी।

इसी मार्ग पर ही चलना है।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

25/3/25

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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