हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ११४ – गीत – सृष्टि का आधार नारी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम गीत – सृष्टि का आधार नारी…।

? रचना संसार # ११४ ?

☆ गीत – सृष्टि का आधार नारी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

नारी की पूजा करिए सब,

वह परमेश्वर का वरदान।

तन -मन करती सदा समर्पित,

जननी प्रज्ञा  को दो मान।।

*

है आधार सृष्टि की नारी,

करो सदा उसका सत्कार।

दुर्गा काली है रणचंडी,

नारी देवी का  अवतार।।

रानी लक्ष्मीबाई साहस ,

पराक्रमी दुर्गा पहचान।

त्यागमूर्ति है वह करुणा की ,

बसती बच्चों में है जान।।

*

जगजननी माता है नारी,

पावन गंगा की है धार।

प्रेम त्याग की वह  है मूरत ,

जीवन का अनुपम शृंगार।।

नारी धरती का है गौरव,

देती सबको दुर्लभ ज्ञान।

शत- शत नमन करो नारी को,

नित करना उसका जयगान।।

*

लक्ष्मी देवी नारी घर की,

नहीं रही वह अबला आज।

पुरुषों से भी वह है बढ़कर ,

उससे उन्नत लोक समाज।।

जान देशरक्षा में देतीं ,

करती रहती हैं बलिदान।

राह दिखाती है विकास की,

सत्कर्मों की लौकिक खान।।

 *

चीर-हरण रोको नारी का,

करते क्यों हो अत्याचार।

नारी हिंसा उत्पीड़न का,

करो सजग मन से प्रतिकार।।

उठा शस्त्र दानव को मारो,

करना स्थापित नया विधान।

चक्र सुदर्शन कृष्ण चला अब,

करो सुरक्षा और निदान।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संभावना… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – संभावना… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

एक रोज़

आँखों को ढककर

कोहनियों से,

खुली आँखों से

मैं देखने लगा अंधेरा,

तब जाना-

अंधेरे में भी टिमटिमाते रहते हैं

जुगनू-से कुछ सितारे,

कहीं उठती दिखती है एक लौ,

लौ के आलोक में कालापन,

कभी फ़िरोज़ी, कभी हरा,

कभी नीला-सा हो जाता है, 

कभी सूर्योदय की रंगत,

कभी सूर्यास्त की संगत,

बदलते रंगों में

किसी न किसी रोशनदान से

भेदा जाता रहता है अंधेरा,

इतना स्याह नहीं होता समय

कि परिश्रम से मिला

निवाला हड़प पाए,

ध्यान रहे-

अंधेरा कभी इतना घुप्प नहीं होता

कि उजाले की संभावना को

निगल जाए..!

?

© संजय भारद्वाज   

1713 बजे, 3.10.2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ दि. 11 अक्टूबर 2026 से नवरात्रि साधना आरम्भ होगी। 🕉️

💥

इस साधना के लिए देवीमंत्र इस प्रकार होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

💥

💥 इसके साथ ही महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का एक पाठ नियमित रूप से करने का प्रयास करें। तथापि जो लोग किन्हीं कारणों से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् न कर पाएँ, वे कम से कम इसे सुनें अवश्य।

अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे।

सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा मौन साधना तो साथ चलेंगी ही। 💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३४१ ☆ भजन – नवरात्रि ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भजन – नवरात्रि।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३४१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भजन – नवरात्रि ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं,

खुशियों के दीप जले घर-घर, मैया के भक्त आए हैं।

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए है।

* 

ओढा दो माँ को तुम चुनरी, फूलों के हार चढ़ाए हैं,

बजे है ढोल-नगाड़े माँ, भक्तों ने भजन सुनाए हैं।

गूंजेगी जयजयकार तो, माँ के दर्शन पाए हैं,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं।

 *

मैंने मनमंदिर में माँ को, लाखों दीप जलाए हैं,

जिसने भी माँ को है पुकारा, किरपा माँ की पाई है।

तेरे चरणों में माँ हमने, अपना शीश झुकाया है,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं। 

 *

नहीं लौटे कोई खाली, भरी झोली बहुत सारी,

तुझे देखूं लगे प्यारी, चुनरी मैया की लगे न्यारी ।

तेरी ज्योत जगाने हम, दौड़े तेरे दर पर आए हैं,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं।

 *

भरो झोली आशीषों की करूँ तुझसे  मै अरदास,

तेरे चरणों में जीना है, बस इतनी-सी है आस।

लगाते तेरा जयकारा, गूँजे है सारी  दिशाएँ हैं,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३२२ ☆ नवरात्रि विशेष ☆ नवरात्रि पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक विषय पर एक कविता  – नवरात्रि पर दोहे… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३२२ ☆

☆ नवरात्रि विशेष ☆ नवरात्रि पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

शैलपुत्री माँ प्रथम दिन, पूजा करिए आप

गौ घृत खीर चढ़ाइए, मिटें शोक संताप

*

दिवस दूसरा पूजिये, ब्रम्हचारिणी मात

मिश्री चीनी भोग का, दें माँ को सौगात

*

चन्द्रघंटा माँ नमन है, पूजिये दिवस तृतीय

दूध-मलाई चढ़ा कर, बोलें जय रमणीय

*

चतुर्थ दिवस कुष्मांडा, जपिये माँ का नाम

मालपुये का भोग लगे, हरतीं रोग तमाम

*

आरती माँ स्कन्द की, हरे विषम आघात

केला भोग लगाइए, पंचम दिवस सुहात

*

छठवें दिन कात्यायनी, ममता का हैं रूप

करें ग्रहण माता शहद, धरें दीप अरु धूप

*

कालरात्रि माँ सप्तमी, करतीं मोक्ष प्रदान

गुड़ मेवे का भोग पा, करें सदा कल्यान

*

महागौरी माँ नमस्तु, चढ़े नारियल पान

भोजन कन्या अष्टमी, खूब कीजिये दान

*

सिद्धिदात्री नवम दिवस, चढता तिल अरु अन्न

दया करो माँ सभी पर, होवें सभी प्रसन्न

*

नवरात्रि के व्रत रखें, मिले सुखद संतोष

पहुँचे जो माँ की शरण, उसके हरतीं दोष

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

☆ नवरात्रि विशेष ☆ नवरात्रि पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गीत – आओ! मातारानी के द्वार चलें ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गीत ☆

☆ आओ! मातारानी के द्वार चलें ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

न और उदास हों, न अब और स्वयं को खलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

*

अंधकार में और न भटकें, पावन पथ पर कदम बढ़ाएँ।

कंटक राहों के मत देखें, पुष्पों से  उपवन महकाएँ।

अब तो रीति-नीति के नग़मे, अपने अधर सजाएँ।

मानवता के काम करें हम, इस जग को महकाएँ।।

न व्यर्थ कुछ सोचें, न ही व्यर्थ निज हाथ मलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

*

सब विकार भीतर के मारें, कर लें रोशन राहें।

सच्चाई को आज साध लें, भरें न यूँ ही बाहें।।

जन्म जो पाया मानव का तो, कुछ मानव-सा हो।

पाना है कुछ तुझको तो तू, अच्छा ही अब बो।।

क्यों नहीं अब नवल चेतना के भाव हृदय पलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

*

आशाओं के सावन में अब, पावनता बरसाएँ।

मातारानी की करुणा से, जीवन-सुमन खिलाएँ।।

हम बदलेंगे जग बदलेगा, होगा कुछ चोखा।

धर्म-कर्म में रखें श्रेष्ठता, नहीं रचें धोखा।।

तज दें सब बैर, न ही किंचित डाह में और जलें।

मिलेगा सुफल, आओ! मातारानी के द्वार चलें।।

 ☆

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

आज़ाद वार्ड-चौक, मंडला, मप्र, मो. 9425484382 ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ४२ – कविता – भ्रम / सत्य… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘भ्रम / सत्य…‘।)

☆ शशि साहित्य # ४२ ☆

? कविता – भ्रम / सत्य…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

बहुत भरम में थी मैं,

खुशी को बाहर ढूंढ रही मैं…

*

अंतर मन में युद्ध चल रहा,

उसको शांत करूं कैसे मैं…

*

प्रीत लगाऊं प्रीतम से मैं,

मीरा बन सब त्यागूं मैं,

*

राधा से भी प्रीत करे वो,

यह कैसे स्वीकार करूं मैं…

*

नहीं चाहिए अब कोई मुझको,

नहीं ढूंढ सकी, कोई, मुझसा, मैं…

*

नहीं चाहिए कोई इंद्रधनुष,,

अब अपने रंग में खुश हूं मैं…

*

भीतर, बाहर रणक्षेत्र बना है,

क्यों ना बिगुल, युद्ध का फूंकूं मैं…

*

बहुत भरम में थी मैं,

खुद को बाहर ढूंढ रही मैं…

*

जब से तेरी शरण में आई !!!

देखो खुद से, खुद ही मिल गई मैं…

*

नहीं रचा तूने खुद सा कोई…

तुझ में ही अब रम गई मैं…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आह्वान… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आह्वान… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

(कविता संग्रह ‘योंही’ से)

कह दो उनसे,

संभाल लें

मोर्चे अपने-अपने,

जो खड़े हैं

ताक़त से मेरे ख़िलाफ़,

कह दो उनसे,

बिछा लें बिसातें

अपनी-अपनी,

जो खड़े हैं

दौलत से मेरे ख़िलाफ़,

हाथ में

क़लम उठा ली है मैंने

और निकल पड़ा हूँ

अश्वमेध के लिए…!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ दि. 11 अक्टूबर 2026 से नवरात्रि साधना आरम्भ होगी। 🕉️

💥

इस साधना के लिए देवीमंत्र इस प्रकार होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

💥

💥 इसके साथ ही महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का एक पाठ नियमित रूप से करने का प्रयास करें। तथापि जो लोग किन्हीं कारणों से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् न कर पाएँ, वे कम से कम इसे सुनें अवश्य।

अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे।

सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा मौन साधना तो साथ चलेंगी ही। 💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “आने वाले समय की कहानी” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – आने वाले समय की कहानी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

युग युग बीते

वो ऊपर जाती सीढ़ियां

कभी खत्म ही नहीं होतीं

जैसे किसी पिरामिड पर हो

चट्टानों को लेकर चढ़ना

और, जिस्म पर हमेशा

समय के हंटर का चलना

एक समय उभरेगा

प्रयासों के स्मारक बन जाएंगे

लेकिन पीढ़ियों को फुरसत नहीं होगी

कभी पलकों में दो आंसू लिये

यहाँ भ्रमण करने की

ये भी एक युग बन कर बीत जाएगा

फर्श से अर्श तक की चढ़ाई का

फिर कोई इतिहास क्यों बने

जैसे बीते अध्यायों पर

अब कोई लकीरें, आकृतियां

उकेरे जाने का सिलसिला,

समाप्तप्राय हो चला है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३१३ ☆ बाल गीत – बच्चे बनकर हम तो खेले… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३१३ ☆ 

☆ बाल गीत – बच्चे बनकर हम तो खेले…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

हमने सुख-दुख हँसकर झेले।

सच ने देखे बड़े झमेले।

* 

जिनको कहते थे हम अपना

जीते जी वे लगे पराए।

संबंधों की बदली भाषा

जुल्म उन्होंने जब-तब ढाए।

 *

अपने से ही बातें कर-कर

नहीं लगे हम रहे अकेले।

 **

इच्छा और अपेक्षाएँ गुमसुम

हम निष्काम बने योगी।

मन का घोड़ा कसा तभी से

रोती रहीं इन्द्रियाँ भोगी।

 *

नहीं बुढ़ापा हमें सताए

रहते हैं सदैव नवेले।

 **

हर कोई है सुख का साथी

दुख में काम नहीं आएं।

भय संशय में लोग रहें अब

कब वे अपना प्रेम लुटाएं।

 *

सबकी चाहत धन दौलत है

बच्चे बनकर हम तो खेले।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६६ – बुन्देली कविता – ”उनखें सत्ता, शासन चइये ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६६ ☆

☆  बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

उनखें सत्ता, शासन चइये 

हमखें उन्ना, राशन चइये 

 *

हमें चाउने खरी मजूरी 

लबरे हमें न भाषन चइये 

 *

किसना कौ मन जिनमें रीझत 

गौयें, ग्वालें, ग्वालन चइये 

 *

जौ फिसले ईमान हमाओ 

धन की काइ न फिसलन चइये 

 *

छप्पन भोग न चाहे कान्हा 

प्रेम भरो दधि-माखन चइये 

 *

हम दाइज कौ पाप न लादें 

हमखौं बस कन्या धन चइये 

 *

तीन लोक से न्यारो अपनो 

‘भगवत’ बो बिंद्राबन चइये

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares