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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 83 ☆ चाँदनी ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण  कविता “चाँदनी”। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 84 – साहित्य निकुंज ☆ ☆ चाँदनी  ☆ आज चाँदनी रात है तुझसे मुलाकात है। चाँद छुपा है चाँदनी के आगोश में चहूँ ओर फैली है चाँदनी बिखर रही रूप की रागिनी तेरा रूप देखकर हूँ मैं खामोश उड़ गये हैं होश चाँदनी रात में निखरा तेरा श्रृंगार लगता है तेरे रोम-रोम से फूट रहा मेरा प्यार । तभी नजर पड़ी चाँद पर वह चाँदनी से कह रहा हो तुम दूर न जाना मेरे साथ ही रहना तेरे साथ ही मेरा वजूद है। तुझमें डूबना चाहता हूँ तुझमें समाना चाहता हूँ। तुझसे मेरा श्रृंगार है। तू ही मेरा जन्मों का प्यार है। तभी निहारा अपने चाँद को उसने नजरे झुका ली सार्थक हुई मुलाकात प्रतीक बन गई चाँदनी रात।   © डॉ.भावना शुक्ल सहसंपादक…प्राची प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307 मोब  9278720311...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 73 ☆ संतोष के दोहे☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष” (आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत हैं  “संतोष के दोहे”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।) ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 73 ☆ ☆ संतोष के दोहे  ☆ बुरा वक्त ही कराता,  अपनों की पहचान संकट में जो साथ दे, उसको अपना जान   वक्त बदलता है सदा, लें धीरज से काम नई सुबह के साथ ही, मिलता है आराम   चलें वक्त के साथ हम, करें वक्त सम्मान वक्त किसी का सगा नहिं, चलिए ऐसा मान   वक्त बदलते बदल गई, सबकी सारी सोच नजर हटते ही हटा, नजरों का संकोच   वक्त बहुत बलवान...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “मेघदूतम्” श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद # मेघदूत ….पूर्वमेघः ॥१.६३॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆ “मेघदूतम्” श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद # मेघदूत ….पूर्वमेघः ॥१.६३॥ ☆   उत्पश्यामि त्वयि तटगते स्निग्धभिन्नाञ्जनाभे सद्यः कृत्तद्विरददशनच्चेदगौरस्य तस्य शोभाम अद्रेः स्तिमितनयनप्रेक्षणीयां भवित्रीम अंसन्यस्ते सति हलभृतो मेचके वाससीव॥१.६३॥   होगी वहाँ , तीर पहुंचे तुम्हारी कज्जल सृदश श्याम स्निग्ध शोभा ताजे तराशे द्विरददंत सम गौर गिरि वह वहाँ और अति रम्य होगा तो कल्पना में बँधी टक नयन से मधुर रम्य दृष्टव्य शोभा तुम्हारी मुझे दीखती , ज्यों गहन नील रंग की लिये स्कंध पर शाल बलराभ भारी   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अहं ब्रह्मास्मि ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ संजय दृष्टि – अहं ब्रह्मास्मि  ☆ यात्रा में संचित होते जाते हैं शून्य, कभी छोटे, कभी विशाल, कभी स्मित, कभी विकराल.., विकल्प लागू होते हैं सिक्के के दो पहलू होते हैं- सारे शून्य मिलकर ब्लैकहोल हो जाएँ और गड़प जाएँ अस्तित्व या मथे जा सकें सभी निर्वात एकसाथ पाए गर्भाधान नव कल्पित, स्मरण रहे- शून्य मथने से ही उमगा था ब्रह्मांड और सिरजा था ब्रह्मा का अस्तित्व, आदि या इति स्रष्टा या सृष्टि अपना निर्णय, अपने हाथ अपना अस्तित्व, अपने साथ!   ©  संजय भारद्वाज ( प्रात:...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 96 ☆ कविता – बसन्त की बात ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  समसामयिक विषय पर आधारित एक भावप्रवण कविता  ‘बसन्त की बात'। इस सार्थक सामयिक एवं विचारणीय आलेख के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 96☆ बसन्त की बात लो हम फिर आ गये बसन्त की बात करने ,रचना गोष्ठी में   जैसे किसी महिला पत्रिका का विवाह विशेषांक हों , बुक स्टाल पर ये और बात है कि बसन्त सा बसन्त ही नही आता अब अब तक बसन्त बौराया तो है , पर वैसे ही जैसे ख़ुशहाली आती है गांवो में जब...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 78 – हाइबन- सबसे बड़ा पक्षी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है  “हाइबन- सबसे बड़ा पक्षी”। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 78☆ ☆ हाइबन- सबसे बड़ा पक्षी ☆ मैं सबसे बड़ा पक्षी हूं। उड़ नहीं पाता हूं इस कारण उड़ान रहित पक्षी कहलाता हूं। मेरे वर्ग में एमु, कीवी पक्षी पाए जाते हैं। चुंकि मैं सबसे बड़ा पक्षी हूं इसलिए सबसे ज्यादा वजनी भी हूं। मेरा वजन 120 किलोग्राम तक होता है। अंडे भी सबसे बड़े होते हैं। मैं शाकाहारी पक्षी हूं । झुंड में रहता हूं। एक साथ 5 से 50 तक पक्षी एक झुंडमें देखे जा सकते हैं। मैं संकट के समय, संकट से बचने के लिए जमीन पर लेट कर अपने को बचाता हूं । यदि छुपने की जगह ना हो तो 70...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 62 ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – द्वितीय अध्याय ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे ।  आज से हम प्रत्येक गुरवार को साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत डॉ राकेश चक्र जी द्वारा रचित श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें । आज प्रस्तुत है प्रथम अध्याय। फ्लिपकार्ट लिंक >> श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 63 ☆ ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – द्वितीय अध्याय ☆  स्नेही मित्रो श्रीकृष्ण कृपा से सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत गीता का अनुवाद मेरे द्वारा दोहों में किया गया है। आज आप पढ़िए द्वितीय अध्याय का सार। आनन्द उठाएँ। – डॉ...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “मेघदूतम्” श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद # मेघदूत ….पूर्वमेघः ॥१.६१॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆ “मेघदूतम्” श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद # मेघदूत ….पूर्वमेघः ॥१.६१॥ ☆   प्रालेयाद्रेर उपतटम अतिक्रम्य तांस तान विशेषान हंसद्वारं भृगुपतियशोवर्त्म यत क्रौञ्चरन्ध्रम तेनोदीचीं दिशम अनुसरेस तिर्यग आयामशोभी श्यामः पादो बलिनियमनाभ्युद्यतस्येव विष्णोः॥१.६१॥ हिमवान गिरि के किनारे सभी रम्य स्थान औ" तीर्थ के पार  जाते भृगुपति सुयश मार्ग को "क्रौंचरन्धम्" या "हंसद्वारम्" जिसे सब बताते से कुछ झुके विष्णु के श्याम पद सम बलि दैत्य बन्धन लिये जो बढ़ा था होकर प्रलंबित सुशोभित वहाँ से दिशा उत्तरा ओर हे घन चढ़ा जा   शब्दार्थ  क्रौंचरन्धम् व हंसद्वारम्  ... स्थानो के नाम © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 84 – भीतर का बसन्त सुरभित हो…. ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ (वरिष्ठ साहित्यकार एवं अग्रज श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी स्वास्थ्य की जटिल समस्याओं से  सफलतापूर्वक उबर रहे हैं। इस बीच आपकी अमूल्य रचनाएँ सकारात्मक शीतलता का आभास देती हैं। इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना भीतर का बसन्त सुरभित हो….। ) ☆  तन्मय साहित्य  #84 ☆ भीतर का बसन्त सुरभित हो …. ☆ पतझड़ हुए स्वयं, बातें बसन्त की करते ऐसा लगता है- अंतिम पल में ज्यों दीपक कुछ अधिक चमकता है।   ऋतुएं तो आती-जाती है क्रम से अपने पर पागल मन देखा करता झूठे सपने, पहिन फरेबी विविध मुखौटे खुद को ठगता है। ऐसा लगता है.......   बचपन औ' यौवन तो एक बार ही आये किन्तु बुढापा अंतिम क्षण तक साथ निभाये, भूल इसे क्यों  मन अतीत में व्यर्थ भटकता है। ऐसा लगता है..........   स्वीकारें अपनी वय को मन और प्राण से क्यों भागें डरकर हम अपने वर्तमान से यौवन के भ्रम में जो मुंह का थूक निगलता है ऐसा लगता है..........   भीतर का बसन्त सुरभित हो जब मुस्काये सुख,-दुख में मन समरसता के गीत सुनाए, आचरणों में जहाँ शील, सच औ' शुचिता है। तब ऐसा लगता है।।   स तरह सीप में रत्न पलता रहा। सिलसिला भोर तक यूं ही चलता रहा।।   © सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जबलपुर/भोपाल,...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विवेक की कविता – बसन्त… अभी अभी ☆ श्री विवेक चतुर्वेदी

श्री विवेक चतुर्वेदी  ☆  कविता ☆ विवेक की कविता - बसन्त... अभी अभी ☆ श्री विवेक चतुर्वेदी ☆  अभी अभी...धूल में लोट गए हैं शरीफ बच्चे आम के पेड़ से बोल उठा है एक अनाम शकुन्त धूप में किसी ने हथेली की ओट ली है आ गिरी है छत पर न जाने किस पते की अधरंगा* हवा में उड़ती दो चोटियां मुरम की सड़क से होकर गुजर गई हैं बसन्त आया है इस नगर में... अभी अभी।।- विवेक * अधरंगा- दो रंगों की पतंग के लिए इस अंचल में प्रचलित संज्ञा © श्री विवेक चतुर्वेदी जबलपुर (मध्य प्रदेश) ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈ ...
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