हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “खुदगर्ज़ दुनिया से अब दूर जाने का वक्त आ गया है” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “खुदगर्ज़ दुनिया से अब दूर जाने का वक्त आ गया है” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

खुदगर्ज़ दुनिया से अब दूर जाने का वक्त आ गया है,

भीड़ में रहते-रहते खुद को पहचानने का वक्त आ गया है।

*

हर रिश्ता मतलब से तौला, हर मुस्कान उधार मिली,

अब मौन की गहराइयों में सच को जानने का वक्त आ गया है।

*

जहाँ अपने ही सौदे करते, भावनाओं की बोली लगती,

उस बाज़ार से निकलकर मन को बचाने का वक्त आ गया है।

*

थक गया हूँ बनकर आईना, सबको चेहरा दिखाते हुए,

अब टूटे हुए शीशे से खुद को निहारने का वक्त आ गया है।

*

जो साथ चले थे नाम के लिए, राह कठिन होते ही छूट गए,

अब अकेले अपने पथ पर दृढ़ कदम बढ़ाने का वक्त आ गया है।

*

न शिकायत शेष है कोई, न अपेक्षाओं का बोझ रहा,

खुद से वादा करने, खुद को निभाने का वक्त आ गया है।

*

जो खोया था शोर-शराबे में, वो शांति अब बुलाती है,

खुदगर्ज़ दुनिया से अब दूर जाने का वक्त आ गया है।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका जयपुर, राजस्थान

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६३ – ज्ञान दादा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – भावप्रवण कविता – ज्ञान दादा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६३ ☆

☆ कविता – ज्ञान दादा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

जड़ जमीं में जमी जिसकी

वट वही थे ज्ञान दादा।

उड़ न पाए पतंगों से

इसलिए कट भी न पाए।

दे सके थे छाँव सबको

बन सके थे गाँव सबका।

पहल करते आप ही थे

टहल कर वे कहानी में।

मन रमा करता हमेशा

काव्य में या जवानी में।

बुढ़ा पाए थे नहीं वे

यदपि था वार्धक्य साथी।

जन्मना परिपक्व थे वे

सच कहूँ अंधों के हाथी।

थाह किसने कभी पाई

नापने जो भी चले थे।

अंत में यह ही बताया

सभी नापों से परे थे।

वाग्देवी सदय थीं पर

तोलकर वे बोलते थे।

मन न सबके सामने वे

छले जाने खोलते थे।

विचारों के धनी थे पर

थोपते उनको न देखा।

जिंदगी जी भर जिए वे

व्यर्थ करते थे न लेखा।

क्या मिला, क्या दिया

पाया-खो दिया से मुक्त थे वे।

चित्रगुप्ती सभ्यता से

बिन कहे संयुक्त थे वे।

मौज-मस्ती, नेह निर्मल 

जिया था उनमें कबीरा।  

बिन लबादा, बिना चोगा

मन मिला उनको फकीरा।

गए जाकर भी नहीं वे

जी रहे हैं साथियों में।

जी रहे रचनाओं में वे

जी रहे अनुगामियों में।

मैं न मैं, मुझमें बसे थे,

हैं, रहेंगे ज्ञान दादा।

जड़ जमीं में जमी जिसकी

वट वही थे ज्ञान दादा।  

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – निर्वाण से आगे ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – निर्वाण से आगे ? ?

असीम को जानने की

अथाह प्यास लिए,

मैं पार करता रहा

द्वार पर द्वार,

अनेक द्वार,

अनंत द्वार,

अंतत: आ पहुँचा

मुक्तिद्वार…,

प्यास की उपज

मिटते नहीं देख सकता मैं,

चिरंजीव जिज्ञासा लिए

उल्टे कदम लौट पड़ा मैं,

मुक्ति नहीं तृप्ति चाहिए मुझे,

निर्वाण नहीं सृष्टि चाहिए मुझे!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९२ ☆ गीत – ।। मामूली से ऊपर उठ लोगों को खास बनते देखा है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९२ ☆

☆ गीत ।। मामूली से ऊपर उठ लोगों को खास बनते देखा है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

आपके कर्म एक दिनआपकी, पहचान बना जाते हैं।

आपके बोल हर दिल पर एक, यूटी निशान बना जातें हैं।।

जो मुश्किल में हार नहीं, मानते जीवन में कभी भी।

वह जमीन से ऊपर उठ खुद, कोआसमान बना जाते हैं।।

=2=

जीने को तो यहाँ जिंदगी, हर कोई जी ही लेता है।

हार से घबरा कर बस घूंट, गम के पी ही लेता है।।

लेकिन जो जिंदगी के, इम्तिहान को रहते तैयार।

वह अपनी  किश्ती   तूफानों, में निकाल लेता है।।

=3=

आत्म  विश्वास   मानव की, सर्वोत्तम पूंजी होती है।

निरंतर अभ्यास लगन, सफलता की कुंजी होती है।।

परिश्रम से राह के काटें भी, फूल बन खिलते हैं जाते।

नीचे रह फिर भी उनकी, अंतिम छलांग ऊंची होती है।।

=4=

इन आँखों ने   लोगों को, इतिहास बनते देखा है।

अपने कर्मों   से सफल, बेहिसाब बनते देखा है।।

मंजिल आँखों से   ओझल, देखा है उसको पाते।

मामूली से ऊपर उठकर, उनको खास बनते देखा है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १९ – कविता – दिन में तारे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “दिन में तारे“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १९ ?

? कविता – दिन में तारे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

चाँद समझकर लाया जिसको, वो दिन में तारे दिखलाये

शीतल झील सी थीं जो आँखें, अब वो अंगारे बरसाये

=2=

तू-तू मैं-मैं खिट-पिट ताने, जब देखो लड़ने की ठाने

नख़रे एटीट्यूड खौफ़ से, मायके की नित धौंस दिखाए

=3=

फ़रमाइश उसकी बहुतेरी, शब्द-बाण उफ़ ज्यों रण-भेरी

ब्याह का लड्डू यारा हमने, खाये और बहुत पछताए

=4=

जो थी पहले आज्ञाकारी, नारी वही अब मुझ पर भारी

इस बेलनधारी की दहशत, से मुझको कोई बेल दिलाये

=5=

शाम को जाऊँ भटका-भूला, मिले सदा मुँह उसका फूला

फ़ौरन यह फ़रमान कि तुमने, धनिया-मिर्ची क्यों न लाए

=6=

सुकूँ भरी अब रैन नहीं है, घर-दफ़्तर में चैन नहीं है

मार्केट मॉल सिनेमा शॉपिंग, चलूँ संग थैला लटकाए

=7=

एक तो अपनी तनख़ा छोटी, ऊपर से ये इतनी मोटी

बोझ तले ‘राजेश’ बेचारा, दिन-ब-दिन क्यों न मुरझाये??

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८९० ⇒ सूरज को अरज ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूरज को अरज।)

?अभी अभी # ८९० ⇒ आलेख – सूरज को अरज ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जगत भर की रोशनी के लिए

करोड़ों की जिंदगी के लिए

सूरज रे, जलते रहना

सूरज रे, जलते रहना…

जो खुद जलते रहते हैं और पूरे जगत को रोशन करते रहते हैं, इनके जलवों का क्या कहना। मन तो करता है, इन आदित्यनाथ की आरती उतारें, लेकिन वह तो सूरज को एक तरह से दीपक दिखाना ही हुआ।

इसमें कोई शक नहीं कि ऊपर वाले की सरकार और हमारी दिल्ली सरकार में ज्यादा अंतर नहीं, कहीं मुफ्त बिजली तो कहीं मुफ्त प्रकाश। लगता है आसमान में भी चुनाव होने वाले हैं। चुनाव हों अथवा ना हों, कोई फर्क नहीं पड़ता, सब जानते हैं, स्वर्ग का राजा तो इंद्र को ही रहना है। वैसे भी ज्यादा फर्क नहीं हमारे मंत्रिमंडल और उनके तारामंडल में। काम कोई भी करे, मेवा तो नवग्रह को ही मिलना है।।

क्या आप जानते हैं, ऊपर वाले की सरकार इतने वर्षों से टिकी क्यों हुई है, अजी सब कुछ मुफ्त मिल रहा है, हवा पानी, राशन, प्रकाश ! और इधर हमारी सरकारें है, उसका न केवल उपभोग करती है, विकास और कल्याण के नाम पर उन सुविधाओं की कीमत भी वसूल कर लेती है। अश्वशक्ति को हमने हॉर्स पावर बना दिया और आपकी शक्ति को सोलर एनर्जी। दोनों की मिलीभगत और सांठगांठ से धरती और स्वर्ग की सरकारें चल रही हैं। आप चाहें तो कह सकते हैं nexus between Man and the God.

एक आम आदमी आजकल सिर्फ उपभोक्ता नहीं होता, वह सरकार का भक्त भी होता है। अपनी सरकार के लिए वह जी जान लगा भी सकता है और नाराज होने पर तख्ता पलट भी सकता है।

चुनाव के वक्त जनता में जितनी शक्ति होती है, चुनाव के पश्चात उसकी सारी शक्ति चुने हुए प्रतिनिधियों में प्रवेश कर जाती है। कल तक जो दाता था, वह भिखारी बन जाता है। भगत के बस में है भगवान गाने वाला, बहुत ही जल्द, तू दाता मैं भिखारी बन जाता है।।

हम जानते हैं हमारी आवाज में इतना दम नहीं कि उस सर्वशक्तिमान की मर्जी के खिलाफ आवाज उठाएं, लेकिन एक भक्त और मतदाता, दोनों के कुछ अधिकार होते हैं, इस कारण दिनकर, उर्फ भास्कर, उर्फ भानुप्रकाश उर्फ आदित्यनाथ यानी सूर्यदेव से हम इतनी विनती तो कर ही सकते हैं कि भैया चुनाव के बाद नेता की तरह ठंड के मौसम में, बादलों में मत छुप जाया करो।

हे सूर्यदेव गर्मी में तो आपको उगने की बड़ी जल्दी मची रहती है तो ठंड में क्या हो जाता है। शाम को भी जल्दी बोरिया बिस्तर समेट लेते हो जब कि गर्मी में ओवरटाइम भी कर लेते हो। क्या यह आपकी मनमानी नहीं।।

हमारे लिए आप कोई हाड़ मांस के अवसरवादी नेता नहीं, साक्षात भगवान हो।

हम सुबह सबसे पहले आपको नमस्कार करते हैं, अपनी औकात अनुसार जल भी चढ़ाते हैं, चतुर्थी की ही तरह छठ का व्रत रखते हैं, और अर्घ्य भी चढ़ाते हैं। बस ठंड के दिनों में जरा हमारे बाल बच्चों का खयाल रख लिया करो। बेचारों को ठंड में भी स्कूल भागना पड़ता है।

हम जानते हैं अनशन, भूख हड़ताल और बंद जैसी गीदड़ भभकियों से आपका बाल भी बांका नहीं होना, अतः केवल अरज है, ठंड में थोड़ा अपने यूनिवर्सल हीटर का रेगुलेटर बढ़ा दिया करो और समय पर आ जाया करो। क्या आप भी इसे अपना सरकारी दफ्तर समझने लगे। कौन कहता है आप भी किसी की देखा देखी में १८ – १८ घंटे काम करो लेकिन क्या करें,

काटे नहीं कटते दिन रात ये। इसलिए सूरज रे, जलते रहना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५५ ☆ कविता – सबके भगवान तो एक ही हैं… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सबके भगवान तो एक ही हैं…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५५ 

सबके भगवान तो एक ही हैं…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दुनियाँ है बड़ी बिखरी सी कड़ी, पर सबकी बनावट एक सी है

हर रोज छटा नई होती है पर धरती की सजावट एक सी है।।

जलथल नभ ताप पवन मौसम सारी दुनियाँ में एक से हैं

रोना गाना खुशियाँ औ गम, हर देश में सबके एक से हैं ।।

पूरब पश्चिम हो देश कोई इन्सान की सूरत एक सी है

गति मति रति चाल चलन जीवन की जरूरत एक सी है।।

दिन रात सुबह और शाम कहीं भी हों, सब होते एक से हैं

सब सूरज, चाँद सितारों के संग जगते और सोते एक से हैं।।

संसार में हर एक प्राणी की अपनी सक्रियता एक सी है

है साफ इसी से इस सारी दुनियाँ का रचियता एक ही है ।।

है तथ्य यही है तत्व वही उसे राम कहो या रहीम कहो

रब, वाहे गुरु, अल्लाह, मसीह, जरश्रुस्त या कृष्ण, करीम कहो ।।

जो जैसा चाहे ध्यान करे, पूजा अर्चन या याद करे

मंदिर मस्जिद गिरजा गुरुद्वारे में जाके अरदास करे।।

जब तत्व है एक तो भेद कहाँ ? उसका सन्मान तो एक ही है

साकार हो या आकार रहित जग का भगवान तो एक ही है ।।

 *

अपने अज्ञान के चक्कर में, हम अलग नाम ले फूले हैं

रंग रूप धर्म या बोली के फिरकों में बँट कर भूले हैं ।।

भूले राही अब राह पै आ जग के इन्सान तो एक ही हैं

हमने ही उसे कई नाम दिये सबके भगवान तो एक ही हैं।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – उनींदापन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – उनींदापन ? ?

आदमी ने स्वप्न देखा,

स्वप्न में

अपना ऊँचा कद देखा,

सपना जारी रहा-

ऊँचे कद को

मध्यम और

मध्यम को

बौना होते देखा,

नींद से

हड़बड़ा कर

उठा आदमी,

अपने खिलाफ

की जा रही

साजिशों पर

बेलौस उतारने लगा

अपनी भड़ास आदमी,

 

जच्चा वॉर्ड में

एक मासूम की

किलकारी गूँजी,

श्मशान जाती यत्र में

राम नाम सत्य है

का सामूहिक आलाप,

जन्म और मृत्यु

के बीच की

सपनीली दुनिया में

अपनी ही आँखों में

पलते

बढ़ते

घटते कद के

सच को

काश समझ पाता

उनींदा आदमी!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 10ः21, दि. 16 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ यही समय है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – यही समय है…!

☆ ॥ कविता॥ यही समय है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सनातन की पुनर्स्थापना का,

यही समय है, सही समय है।

दुर्जनों के अंत का,बसंत का,

यही समय है, सही समय है।

*

गगनभेदी मंत्रोच्चार हो रहे हैं,

जाग उठे हैं वो, जो सो रहे हैं।

धर्म-संस्कृति के उत्थान का,

यही समय है, सही समय है।

*

सदियों  तक गुलामी में जिए,

अपमान  का कालकूट पिए।

स्वतंत्रता के अमृत काल का,

यही समय है, सही समय है।

*

अतीत का गौरव स्मरण करें,

हृदय में धर्म को धारण करें।

जन के, मन के जागरण का,

यही समय है, सही समय है।

*

देश में हर तरफ हाहाकार है,

विषैले साँप रहे फुंफकार हैं।

अपनी आन की जंग के लिए,

यही समय है, सही समय है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०६ ☆ कैसे कहूं? ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – कैसे कहूं?)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०६– साहित्य निकुंज ☆

☆ कैसे कहूं? ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

भाव मन में 

बहने लगे 

अनायास

कैसे कहूं।

 

कुछ न आता समझ

व्यक्त कैसे करूं

मन की बातें

कैसे कहूं।

 

दिल पर 

छाई है उदासी

बेवजह

कैसे कहूं।

 

उनके शब्दों में

 है जान 

मिलती है प्रेरणा

कैसे कहूं।

 

बिखरे शब्द 

लगे समिटने

मिला आकर

कैसे कहूं।

 

आयेगा वो पल

 चमकेगी किस्मत

समझोगे तब

कैसे कहूं।

 

है मंजिल सामने

वहीं है खास

हो जाती हूं नि:शब्द

कैसे कहूं।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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