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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संतुलन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )    ☆ संजय दृष्टि  –  संतुलन ☆   लालसाओं का अथाह सिंधु, क्षमताओं का चिमुक भर चुल्लू, सिंधु और चुल्लू का संतुलन तय करता है सिमटकर आदमी का ययाति रह जाना या विस्तार पाकर अगस्त्य हो जाना!   ©  संजय भारद्वाज, पुणे ☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ मोबाइल– 9890122603 writersanjay@gmail.com ...
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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 18 ☆ मत का दान ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे ((सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की पर्यावरण और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित एक भावप्रवण कविता  “मत का दान"।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 18 ☆ ☆ मत का दान☆ मत का दान दे उनको जो करें मत का राज। मत का दान न देना उनको जो करें मन का राज। गरीब को भी जी जाने दो ऊँगली में स्याही लगने दो। ना मस्तवाल का राज हो जी भर जीवन जीने दो। गणतंत्र का राज हो वाणी अधिकार मिलने दो। राम राज्य अब आ जाए हर जीवन में खिलने दो। © सुजाता काळे, पंचगनी, महाराष्ट्र, मोब – 9975577684...
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हिन्दी साहित्य – साहित्य निकुंज # 24 ☆ कविता ☆ अनुरागी ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  उनकी कविता  'अनुरागी'। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 24  साहित्य निकुंज ☆ ☆ अनुरागी ☆   प्रीत की रीत  है न्यारी देख उसे वो लगती प्यारी कैसे कहूं इच्छा मन की है बरसों जीवन की अब तो हो गए हम विरागी वाणी हो गई तपस्वी भाव जगते तेजस्वी हो गये भक्ति में लीन साथ लिए फिरते सारंगी बीन। देख तुझे मन तरसे झर-झर नैना बरसे अब नजरे है फेरी मन की इच्छा है घनेरी मन तो हुआ उदासी लौट पड़ा वनवासी। देख तेरी ये कंचन काया कितना रस इसमें है समाया अधरों की  लाली है फूटे दृष्टि मेरी ये देख न हटे बार -बार मन को समझाया जीवन की हर इच्छा त्यागी हो गए हम विरागी भाव प्रेम के बने पुजारी शब्द न उपजते श्रृंगारी पर मन तो है अविकारी कैसे कहूं इच्छा मन की मन तो...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 15 ☆ नजरिया ☆ – श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”   (आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष”  की अगली कड़ी में प्रस्तुत है उनकी एक सामायिक कविता  “नजरिया ”. आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़  सकते हैं . )  ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 15 ☆ ☆ नजरिया ☆ कल अचानक मानवाधिकार संगठन के पदाधिकारी से बात हो गई .! हमने पूछा आपकी मानवता बेटियों पर कहाँ सो गई..? सुनकर थोड़ा झुंझलाए.! फिर थोड़ा करीब आये..!! बोले हम तो शिकायत पर काम करते हैं.! साबित होने पर हिदायत तमाम करते हैं..!! हमने कहा आपको निर्भया, प्रियंका के साथ घटित घटना का इल्म है..? झट बोले हां ये तो बहुत बड़ा जुल्म है..! हमने बात आगे बढ़ाई..! कुछ आगे भी बोलो भाई..! जुल्म तो सबको पता है.! पर उस बेटी के पास कुछ न बचा है..!! बोला हम...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – बीज ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )    ☆ संजय दृष्टि  –  बीज ☆   जलती सूखी ज़मीन, ठूँठ से खड़े पेड़, अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा करती पीली घास, लू के गर्म शरारे, दरकती माटी की दरारें, इन दरारों के बीच पड़ा वह बीज..., मैं निराश नहीं हूँ, यह बीज मेरी आशा का केंद्र  है, यह जो समाये है विशाल संभावनाएँ वृक्ष होने की, छाया देने की, बरसात देने की, फल देने की, फिर एक नया बीज देने की, मैं निराश नहीं हूँ यह बीज मेरी आशा का केंद्र है..!   ©  संजय भारद्वाज, पुणे प्रात: 6.11 बजे, 30.11.2019   ☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 3 ☆ गीत – आज माँ हैं साथ मेरे ☆ – डॉ. राकेश ‘चक्र’

डॉ. राकेश ‘चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा एक लाख पचास हजार के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि डॉ राकेश ‘चक्र’ जी ने  ई- अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से अपने साहित्य को हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर लिया है। इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं उनका एक गीत   “आज माँ हैं साथ मेरे”.) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 3 ☆ ☆  आज माँ हैं साथ मेरे ☆    मैं अकेला ही चला हूँ सज सँवरकर काफिले की क्या जरूरत आज माँ हैं साथ मेरे   पाप पुण्यों को समेटे रख लिया है...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ अंतर्मन की व्यथा ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “ (सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी”  जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है।  आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की एक भावप्रवण  एवं सामयिक कविता अंतर्मन की व्यथा .)   ☆ कविता - अंतर्मन की व्यथा  ☆   एक नदी बह रही है भीतर कहीं लेकिन भीगती नहीं है अंतर्मन की जमीं। तुम हर बार एक नया कंकर फेंक कर जगा देते हो मेरे भीतर की खामोशी   छेड़ते रहे हो हाहाकार की धुन और तब इस अंतः सलिला के उफनते भंवर--प्रवाह लील लेना चाहते हैं मेरी संपूर्णता - मेरा   - - समन्वय,मेरा सृजन,मेरा जुड़ाव।   कर देना चाहते हैं बंटवारा मेरी जिंदगी का वे बुलबुले - - जो पल-पल बनते बिगड़ते हैं अंतर्मन में उदासी दया सहानुभूति संवेदन आर्त शोक के आदिम बहुरूपी...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 24 – कुर्सी जब भी नई बनाई है ☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ (अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  एक  विचारोत्तेजक कविता   “कुर्सी जब भी नई बनाई है”। )   ☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 24 ☆   ☆ कुर्सी जब भी नई बनाई है ☆     कुर्सी जब भी नई बनाई है पेड़ की  ही, हुई  कटाई है।   बांस सीधा खड़ा जो जंगल में मौत  पहले, उसी की आई है।   उछलने कूदने वालों के हैं दिन पढ़े लिखों को, समझ आई है।   जान सकता वो दर्द को कैसे पांव में  तो,  मेरे  बिवाई  है।   रोटी दिखलाते हुए, भूखों को फोटो  गमगीन हो, खिंचाई है।   बाढ़ नीचे, वो आसमानों पर देख लो  कितनी, बेहयाई है।   दस्तखत, पहले दवा देने के ट्रायलों पर, टिकी कमाई...
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हिन्दी साहित्य – नर्मदा परिक्रमा – द्वितीय चरण – कविता # 8 ☆ उल्लू ☆ – श्री प्रयास जोशी

श्री प्रयास जोशी (श्री प्रयास जोशी जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आदरणीय श्री प्रयास जोशी जी भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स  लिमिटेड भोपाल से सेवानिवृत्त हैं।  आपको वरिष्ठ साहित्यकार  के अतिरिक्त भेल हिंदी साहित्य परिषद्, भोपाल  के संस्थापक सदस्य के रूप में जाना जाता है।  ई- अभिव्यक्ति में हमने सुनिश्चित किया था कि – इस बार हम एक नया प्रयोग  करेंगे ।  श्री सुरेश पटवा जी  और उनके साथियों के द्वारा भेजे गए ब्लॉगपोस्ट आपसे साझा  करने का प्रयास करेंगे।  निश्चित ही आपको  नर्मदा यात्री मित्रों की कलम से अलग अलग दृष्टिकोण से की गई यात्रा  अनुभव को आत्मसात करने का अवसर मिलेगा। इस यात्रा के सन्दर्भ में हमने यात्रा संस्मरण श्री सुरेश पटवा जी की कलम से आप तक पहुंचाई एवं श्री अरुण कुमार डनायक जी  की कलम से आप तक सतत पहुंचा रहे हैं।  हमें प्रसन्नता है कि  श्री प्रयास जोशी जी ने हमारे आग्रह को स्वीकार कर यात्रा  से जुडी अपनी कवितायेँ  हमें,  हमारे  प्रबुद्ध पाठकों  से साझा करने का अवसर दिया है। इस कड़ी में प्रस्तुत है उनकी कविता  “उल्लू ”।  ☆ नर्मदा...
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हिन्दी साहित्य – ☆ ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 2 ☆ कविता ☆ कृष्णा के दोहे ☆ – श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’   ( श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है इस  कड़ी में  आपके दोहे  “कृष्णा के दोहे ”।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य  # 2 ☆ ☆ कविता – कृष्णा के दोहे  ☆  चंचला द्युति भर चंचल चंचला,  दमक रही पुर जोर। रिमझिम बरसे घन-घटा, पुरवा दे झकझोर। पिपीलिका चलती सदा पिपीलिका, मिलजुल साध कतार। धैर्य कभी खोती नहीं, मन में साहस धार।। वागीश भानु दृष्टि भी कम पड़े, देखें जो वागीश। अक्षर-अक्षर देव के, रखते पग रज शीश। राघव आत्मसात कर लिजिए, राघव के सब त्याग। वनवासी सिय-राम ने, निर्मित किये प्रयाग।। कुंचन घने केश कुंचन किये, चली चंचला गाँव। कितनीआँखें तक रहीं, लिए सुरुचि सा ठाँव।   © श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘ अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश ...
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