हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५२ ☆ सुलगती रात ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “सुलगती रात” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५२ ☆

सुलगती रात ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

धुआँ उठा है

कहीं रात सुलगी होगी।

 

तस्वीरों में

ओढ़े बैठे

कुछ नक़ली असली चेहरे

अभिव्यक्ति की

आजादी पर

बिठा रहे हैं बस पहरे

कौन सगा है

किस पर मूठ दगी होगी।

 

धार नदी के

सँग-सँग बहना

क्या बस नियति हुई ऐसी

घबराहट में

मौन सुलगते

स्थितियाँ मूक बधिर जैसी

कहाँ उगा है

सूरज,रात ठगी होगी।

 

ठोकर खाना

खाकर गिरना

गिर-गिर कर चलना दस्तूर

लिए विरासत

काँधे लादे

पग-पग उम्र हुई मजबूर

कहीं दगा है

कहीं रार उमगी होगी।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ चुभते तीर # ११२ – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें।)  

☆  चुभते तीर # १११ – कथा कहानी – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कमरे का तापमान ठीक सोलह डिग्री पर लॉक था। इस कमरे में न धूप आती थी, न हवा, बस एक सफेद सी रोशनी थी जो चौबीसों घंटे जागती रहती थी ताकि मौत को आने में कोई गलतफहमी न हो। बेड नंबर चार पर लेटे सत्तर साल के दीनानाथ जी के मुंह पर लगे ऑक्सीजन मास्क पर हर तीन सेकेंड बाद भाप जमती और पिघल जाती। यही उनके जिंदा होने का इकलौता सबूत था, जिसे देखकर बगल की कुर्सी पर बैठी नर्स सिस्टर मैरी अपनी डायरी में कुछ नोट कर रही थीं।

रात के ठीक दो बज रहे थे। यह वह वक्त होता है जब अस्पताल के गलियारों में सन्नाटा इतना गहरा हो जाता है कि ग्लूकोज की टपकती बूंदों की आवाज भी किसी टाइम बम के टिक-टिक जैसी सुनाई देती है। सिस्टर मैरी ने अपनी घड़ी देखी। वह जानती थीं कि दीनानाथ जी के पास अब कुछ ही घंटे बचे हैं। डॉक्टर आनंद ने शाम को ही राउंड पर कह दिया था कि मल्टीपल ऑर्गन फेलियर है, बस सुबह का सूरज देखना मुश्किल है।

अचानक दीनानाथ जी की उंगलियों में थोड़ी हरकत हुई। उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना मास्क एक तरफ सरकाया। उनकी आवाज में एक अजीब सी घबराहट थी, “मैरी… वो… वो आ गया क्या?”

मैरी ने उनके ठंडे पड़ रहे हाथ को अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “कौन दीनानाथ जी? यमराज? अरे, अभी उनका सर्वर डाउन है, इतनी जल्दी नहीं आते वो।”

मैरी का यह व्यंग्य दीनानाथ के चेहरे पर एक सूखी सी हंसी छोड़ गया। इस हॉस्पिस केयर यानी मरणासन्न मरीजों के आखिरी घर का यही नियम था यहाँ दर्द को दवाओं से ज्यादा चुटकुलों से सुखाया जाता था। दीनानाथ जी पिछले दो महीने से यहाँ थे। उनके फेफड़े जवाब दे चुके थे, पर उनकी आँखें हर रोज दरवाजे पर टिकी रहती थीं। वह किसी का इंतजार कर रहे थे। एक ऐसा इंतजार जो इस कमरे की सफेद दीवारों से भी ज्यादा पथरीला था।

“मैरी, मेरी वसीयत… सब ठीक है न? कोर्ट का वो आदमी सुबह आएगा?” दीनानाथ ने हांफते हुए पूछा।

“हाँ बाबा, सब तैयार है। आपके वकीलों ने आपके कहे अनुसार सब कुछ कर दिया है। बस आप सुबह तक दिल थाम के बैठिए,” मैरी ने उनके माथे से पसीना पोंछते हुए कहा। उनके लहजे में एक कड़वा मजाक था, जो दीनानाथ की अमीरी पर नहीं, बल्कि उस लाचारी पर था जो करोड़ों रुपये होने के बाद भी एक-एक सांस के लिए भीख मांग रही थी।

तभी दरवाजे पर किसी के कदमों की आहट हुई। भारी बूटों की आवाज। मैरी चौंक गई। इतनी रात गए कौन आ सकता था? दरवाजा धीरे से खुला। एक लंबा, सूट-बूट पहने नौजवान अंदर दाखिल हुआ। चेहरे पर थकावट से ज्यादा एक अजीब सी जल्दबाजी थी। उसने सीधे दीनानाथ के बेड की तरफ रुख किया।

दीनानाथ की आँखों में जैसे बुझते हुए दीये की आखिरी लौ चमक उठी। उन्होंने कांपते होंठों से कहा, “अविनाश… तुम आ गए बेटा! मुझे मालूम था, तुम अपनी नौकरी, अपना लंदन का सब काम छोड़कर अपने बूढ़े बाप के आखिरी वक्त में जरूर आओगे।”

अविनाश ने अपनी महंगी घड़ी पर वक्त देखा और बिना कोई जज्बात दिखाए सीधे मैरी से मुखातिब हुआ, “सिस्टर, डॉक्टर कहाँ हैं? ये कुछ जरूरी  कागजात हैं, जिन पर इनके दस्तखत चाहिए। सुबह की मेरी लंदन की फ्लाइट है, बोर्ड मीटिंग मिस नहीं कर सकता। क्या ये होश में हैं?”

कमरे का सन्नाटा जैसे और नुकीला हो गया। सिस्टर मैरी ने अविनाश को ऊपर से नीचे तक देखा। उस महंगे सूट की चमक के पीछे छुपा हुआ जो गिद्ध था, वह मैरी को साफ दिख रहा था। चिकित्सा विज्ञान ने भले ही इंसान को अमर बनाने की दवा न खोजी हो, पर ऐसे रिश्तों को जिंदा रखने का वेंटिलेटर जरूर ढूंढ लिया था।

मैरी ने एक गहरी सांस ली और कहा, “हाँ सर, आपके पिता बिल्कुल होश में हैं। वो पिछले दो महीने से सिर्फ आपकी इस बोर्ड मीटिंग के लिए ही अपनी आखिरी सांसें रोककर बैठे थे। मेडिकल साइंस भी हैरान है कि जो इंसान बिना ऑक्सीजन के दो मिनट नहीं रह सकता, वो बेटे के मोह में दो महीने कैसे जी गया।”

अविनाश को इस व्यंग्य की चुभन महसूस तो हुई, पर उसके पास रीढ़ की हड्डी नहीं थी जो वो सीधा खड़ा हो पाता। उसने तुरंत अपने बैग से लीगल पेपर्स निकाले और दीनानाथ के सामने रख दिए, “डैड, प्लीज यहाँ साइन कर दीजिए। इसके बाद आपको इस दर्द से मुक्ति मिल जाएगी। डॉक्टर्स वैसे भी कह रहे हैं कि अब कोई उम्मीद नहीं है।”

दीनानाथ ने कांपते हाथों से पेन थामा। उनकी आँखों से बहता हुआ पानी उस वसीयत के सफेद कागज पर गिरा और स्याही थोड़ी सी फैल गई। उन्होंने बिना पढ़े, अपने जीवन की आखिरी ऊर्जा समेटकर उस कागज पर दस्तखत कर दिए। जैसे ही दस्तखत पूरे हुए, अविनाश ने झपट्टा मारकर वो कागज अपनी फाइल में सुरक्षित किए और एक राहत की सांस ली।

“थैंक यू डैड। अब मैं चलता हूँ। एयरपोर्ट के लिए लेट हो रहा हूँ। सिस्टर, इनका ख्याल रखिएगा,” अविनाश ने बिना मुड़े दरवाजे की तरफ कदम बढ़ा दिए। उसे अपने बाप के ठंडे होते शरीर को छूने तक का परहेज था, शायद मौत की छूत उसकी करोड़ों की डील को न लग जाए।

“अविनाश…” दीनानाथ की एक दबी हुई चीख कमरे में गूंजी। लेकिन अविनाश तब तक कॉरिडोर पार कर चुका था। उसकी परछाईं भी गायब हो चुकी थी।

कमरे में फिर वही ‘टिक-टिक’ की आवाज लौट आई। दीनानाथ की आँखें अब छत को ताक रही थीं। मॉनिटर पर चलती हुई हरी लकीरें अब धीरे-धीरे सीधी होने की तरफ बढ़ रही थीं। बीप की आवाज की रफ्तार कम हो रही थी।

सिस्टर मैरी ने चुपचाप उनके पास आकर बेडसाइड टेबल पर रखा एक लिफाफा उठाया। यह वह लिफाफा था जो दीनानाथ ने एक हफ्ते पहले मैरी को इस शर्त पर दिया था कि जब अविनाश आएगा, तब इसे खोला जाए।

“दीनानाथ जी, आपका बेटा तो चला गया। क्या मैं अब इसे खोलूं?” मैरी की आवाज में एक भारीपन था।

दीनानाथ ने बस धीरे से अपनी पलकें झुका दीं।

मैरी ने लिफाफा खोला। उसके भीतर एक और कानूनी दस्तावेज था, जिस पर भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की सील थी। जैसे ही मैरी ने उस कागज की इबारत पढ़ी, उसके हाथ कांपने लगे। उसकी आँखों से आंसू टपक कर उस कागज पर गिर पड़े।

उस कागज पर लिखा था कि दीनानाथ जी ने अपनी सारी संपत्ति, सारी फैक्ट्रियाँ और बैंक बैलेंस तीन महीने पहले ही अनाथ बच्चों के एक ट्रस्ट के नाम कर दिया था। और जो कागज अभी अविनाश दस्तखत करवा कर ले गया था, वह दरअसल संपत्ति की वसीयत नहीं थी। वह नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट  था, जिसके तहत दीनानाथ जी ने मरने के बाद अपनी दोनों आँखें, लिवर और दिल उस अनाथालय के बीमार बच्चों के लिए डोनेट करने की मंजूरी दी थी। और उस एनओसी के लिए सगे वारिस के तौर पर अविनाश के गवाह वाले दस्तखत जरूरी थे, जो वो अपनी हड़बड़ी में बिना पढ़े कर गया था।

कागज के नीचे दीनानाथ के हाथ से लिखी एक छोटी सी लाइन थी: “बेटा, तुमने मुझे जीते जी कभी अपना वक्त नहीं दिया, लेकिन तुम्हारे इस अनजाने दस्तखत की वजह से आज मेरी मौत किसी और को जिंदगी दे जाएगी। मैंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सौदा कर लिया है… तुम्हारी बेरुखी के बदले, कुछ बच्चों की सांसें खरीद ली हैं।”

मैरी ने सिर उठाकर बेड की तरफ देखा। मॉनिटर की स्क्रीन पर अब एक सीधी हरी रेखा खिंच चुकी थी और एक लंबी, अंतहीन ‘बीप’ की आवाज कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी। दीनानाथ जी के चेहरे पर एक ऐसी शांत, तीखी और मुकम्मल मुस्कान थी, जिसने दुनिया के सबसे बड़े बाजारू रिश्ते को हमेशा-हमेशा के लिए हरा दिया था। मैरी ने रोते हुए उनके चेहरे पर सफेद चादर डाल दी, पर उस चादर के भीतर से भी वह व्यंग्य साफ चमक रहा था जो एक मरते हुए बाप ने अपनी आखिरी सांस से इस मतलबी दुनिया पर किया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३०) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३०)  ? ?

-कुछ कहो,

तुम्हारी चुप्पी

बरदाश्त नहीं होती,

मैंने कोरा काग़ज़

मोड़कर थमा दिया,

-पढ़ लो, सारा कुछ

इस पर लिख दिया है,

…ज़िंदगी भी

एक करवट ले चुकी,

उसका बाँचना

बदस्तूर जारी है,

सोचता हूँ

इतना ज़्यादा तो

नहीं लिखा था मैंने!

 

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, 12:25 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७१ ☆ मेरे पापा मिले क्या? ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “मेरे पापा मिले क्या?“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७१ ☆

✍ कविता – मेरे पापा मिले क्या? ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे पापा मिले क्या?

एक बेटी के ये शब्द

सबको आहत करते रहे ,

और आहत मन से ही

बचाव कार्य में जुटे

पुलिस कर्मी

एनडीआरएफ जवान

नम आंखों से

बचाव कार्य में लगे रहे।

मेरा भाई मिला

मेरे पति मिले

प्रश्नों के अंबार लगे

उत्तर किसी के न मिले।

परिजनों की भीगी आंखें

गिरे हुए कचरे के पहाड़ को

ताकती हैं

निरखती परखती हैं।

 

पूरे शहर के निवासी

कितना कचरा उत्पन्न करते हैं

कि उसका पहाड़ बन जाए,

और जब गिरे तो

तीन मंजिला भवन को ढहा जाए।

कचरे के ढेर में दबे लोगों के

प्राण कैसे, कितने तड़पे होंगे

शरीर से कैसे निकले होंगे

क्या कचरे से बाहर आये होंगे

या कचरे में विचरण करते होंगे।

 

कौन जाने ?

जिस कचरे में रह नहीं सकते

उसमें दबने पर क्या

तकलीफ़ हुई होगी

कौन जाने?

मोशी पिंपरी चिंचवड़ पुणे

इसके साक्षी हैं।

और परिजनों की नम  आँखें

व सिसकियाँ

साक्षी हैं।

पर बेटी का प्रश्न गूंजता रहेगा

मेरे पापा मिले क्या?

 

प्रश्न तो अंतस् में यह भी उठता है

कि इतना कचरा

क्यों और कहाँ से आता है

पहले भी लोग रहते थे

पर इतना कचरा नहीं होता था।

घर से कचरा बहुत कम निकले

यह सोचना होगा

बेटी के प्रश्न का उत्तर

देना होगा

और सबको मिलकर

देना होगा।

नहीं तो हर कान में गूँजता रहेगा

मेरे पापा मिले क्या?

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५९ ☆ सारा कमाल इश्क़ का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सारा कमाल इश्क़ का“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५९ ☆

✍ सारा कमाल इश्क़ का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मौला करम किया वही क़ीमत बनी रहे

अज़दाद जो बनाये वो इज़्ज़त बनी रही

 *

सारा कमाल इश्क़ का तेरे किया हुआ

दरिया को मोड़ने की जो हिम्मत बनी रही

 *

रख्खी हर एक याद हिफाज़त से ज़ह्न में

अपने तमाम दोस्त से निस्बत बनी रही

 *

ये माँ की परवरिश का करिश्मा है देखिए

झूठों के बीच रहके सदाक़त बनी रही

 *

ग़ुरबत में हाथ में न जो फैलाया था कभी

मेरे ख़ुदा की मुझपे इनायत बनी रही

 *

अल्लाह ने दी नेक वो औलाद है मुझे

दस्तार मेरे सर की सलामत बनी रही

 *

इंसान बन मशीन गया दौरे- हाल में

घर को न वक़्त दे ये शिकायत बनी रही

 *

बचपन में जिसके साथ में खेले छुपा छुपी

ताउम्र उससे मिलने की चाहत बनी रही

 *

अहसास का न धागा कभी टूटने दिया

रिश्तों में वो हमारे थी लज्ज़त बनी रही

 *

मैंने अरुण हराम समझ घूस ली नहीं

इस दौर में भी घर मेरे बरक़त बनी रही

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लोग छुपे रुस्तम हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – लोग छुपे रुस्तम हैं…!

☆ ॥ कविता॥ लोग छुपे रुस्तम हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

तिनके जिद को ठाने हैं,

खुद  को  खुदा  माने हैं।

*

शमाँ की लौ पर मंडराते,

मरने पर तुले परवाने हैं।

*

दुनिया में जितने इंसां हैं,

सबके  अपने फ़साने हैं।

*

बात-बात पर शत्रुन की,

विष  उगलती ज़ुबानें हैं।

*

शौक शहंशाहों के पाले,

खाने  को  नहीं  दाने हैं।

*

जिसको  हम घर समझे,

दर-अस्ल सरायखाने हैं।

*

लोग  बड़े छुपे रुस्तम हैं,

मन  के कई तहखाने हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६३ – बहेलिया… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बहेलिया।)

☆ हेमंत साहित्य # ६३ ☆

✍ बहेलिया… ☆ श्री हेमंत तारे  

अभी, अभी

बांस के इसी झुरमुट में,

सुनी थी सरसराहट,

और

देखी थी कुछ गौरैया,

आपस में कर रही थी,

चुहलबाजी,अठखेलियाँ,

फुर्र हो गयी पलक झपकते,

शायद समझ बैठी मुझे

बहेलिया |

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९३ – सूरज नहीं दिया…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  सूरज नहीं दिया।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९३ ☆

☆ –  सूरज नहीं दिया ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

कब्रगाहों में सुरक्षित रखा जा रहा है

एक जिन्दा और भरा-पूरा देश ।

शीऽऽशी, आहिस्ता बोलो,

शोर करोगे तो

कब्रिस्तान में मंडरा रहे गिद्ध

पहिन लेंगे बगुलों के वस्त्र

और देने लगेंगे

अजान…

हे भगवान !

शबनमी इलाके में

शोले चहलकदमी कर रहे हैं।

भेड़ियों की पदचापों से

गुलाबों के खेत-दर-खेत

उजड़ रहे हैं।

बारूद की गद्दीनशीनी पर

कर दिया गया है

अगरुगंध को निष्कासित,

और आँसुओं में डूबे दिल

हो रहे हैं

जड़ यंत्र द्वारा शासित ।

आखिर क्या है

इस मुश्किल का हल,

क्या कोई भी उपाय

नहीं हो सकता सफल ?

तो आओ,

हम सहयोगी बनें

और करें इस साजिश को विफल,

मगर, यह तब होगा

जबकि हिमालय

हिमालय रहे

न हो पाये विन्ध्याचल

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९० – “अश्रु जल का विरल सा…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत अश्रु जल का विरल सा...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “अश्रु जल का विरल सा...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

 उसकी औखे थीं  या बस

दो फूल थे ॥

जिनमे सपनो के कई

स्कूल थे ॥

 

बहुत सी आँखे टिकी

रहती उन्ही पर ।

खोजती आलम्ब व

धीरज उन्हीं पर ।

 

जहाँ काजल लगा

यूनीफार्म जैसा –

दृष्टि के बच्चे प्रणय

का मूल थे ॥

 

जहाँ चेहरे के

प्रगत जनतंत्र में ।

लोक -जीवन बसा था

जिस मंत्र में ॥

 

जो निरंतर उड़रही

जुल्फें बताती –

हमीं तो सौन्दर्य के

अनुकूल थे ॥

 

सदा जिनमें निगाहों

की नाव थी बस ।

अश्रु जल का विरल

सा ठहराव थी बस।

 

पाल खोले पलक के

जो झुक रही थीं –

उसी के गर्वित हुये

मस्तूल थे ।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

12-07-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – बारिश ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बारिश  ? ?

देखी तो होगी

तुमने बारिश,

सारा गर्द

झाड़-पोंछकर

प्रकृति का

मूल शृंगार लौटाती;

उसे हरा बनाती,

बस कुछ इसी तरह है

मेरी आँख का पानी

और उसका बरसना..,

सारा गर्द धोकर

फिर भर देता है

पुतलियों में अनंत स्वप्न,

सपने देखने की अभीप्सा,

और यथार्थ कर सकने की

अदम्य जिजीविषा..!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:45 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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