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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – नकार☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ आपदां अपहर्तारं ☆ 🕉️ नवरात्र  साधना सम्पन्न हुई 🌻 आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #153 ☆ भावना के दोहे… आँखें ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  “भावना के दोहे…आँखें”।)  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 153 – साहित्य निकुंज ☆ ☆ भावना के दोहे… आँखें ☆ ☆ तिनका लगता आँख में, होती है जब पीर। आँखों के इस दर्द से, बहता है जब नीर।। ☆ आँखों के इस दर्द का, न है कोई इलाज। नीर-नीर बहता रहे, दर्द है लाइलाज । ☆ आँखें तेरी देखकर, है सुख का आभास। बहे कभी भी नीर तो, रहूँ सदा मैं पास ।। ☆ आँखों-आँखों  ने कहा, तू है मेरा कौन। अनुरागी संकेत से, आँखें होती मौन।। ☆ आँखों ने अब पढ़ लिया, तू है मेरा मीत। कैसे तुझसे कब मिलूँ, झरता है संगीत।। ☆ © डॉ भावना शुक्ल सहसंपादक… प्राची प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307 मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी)...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #140 ☆ संतोष के दोहे – भ्रष्टाचार ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष” (आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  “संतोष के दोहे – भ्रष्टाचार”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।) ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 140 ☆  ☆ संतोष के दोहे – भ्रष्टाचार ☆ श्री संतोष नेमा ☆ नैतिकता जब सुप्त हो, जागे भ्रष्टाचार बेईमानी भरी तो, बदल गए आचार   हरड़ लगे न फिटकरी, खूब करें वे मौज अब के बाबू भ्रष्ट हैं, इनकी लम्बी फ़ौज   कौन रोकता अब किसे, शासक, नेता भ्रष्ट अंधा अब कानून है, जनता को बस कष्ट   हुआ समाहित हर जगह, किसको दें हम दोष बन कर पारितोषिक वह, दिला रहा...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – रतौंध☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ आपदां अपहर्तारं ☆ 🕉️ नवरात्र  साधना सम्पन्न हुई 🌻 आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 130 ☆ भक्तिपरक दोहे ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘ चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक 122 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिया जाना सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ (धनराशि ढाई लाख सहित)।  आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें  संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 130 ☆ ☆ भक्तिपरक दोहे ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆ ☆  वागीशा लिखवा रहीं, जीवन का मकरंद। छंद रचें मनहर सुखद , पुष्पित हो आनंद।। ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य#152 ☆ विजयदशमी पर्व विशेष – पहले खुद को पाठ पढ़ाएँ… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ (सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा  “रात  का  चौकीदार”   महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत है विजयदशमी पर्व पर विशेष रचना  “पहले खुद को पाठ पढ़ाएँ...”) ☆  तन्मय साहित्य # 152 ☆ ☆ विजयदशमी पर्व विशेष - पहले खुद को पाठ पढ़ाएँ... ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆ पर्व दशहरा तमस दहन का करें सुधार, स्वयं के मन का। पहले खुद को पाठ पढ़ाएँ फिर दूजों को हम समझाएँ।   संस्कृति औ' संस्कार हमारे प्रेम शांति के बोल उचारे, पर्वोत्सव ये परम्पराएँ   खूब ज्ञान की, बातें कर ली लिख-लिख कई पोथियाँ भर ली, नेह भाव खुद भी अपनाएँ   "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" नहीं काम के, तेरे - मेरे, यही सीख तो हमें सिखाए।   प्रवचन औ' उपदेश चले हैं पर खुद स्वारथ के पुतले हैं, जनसेवा को कदम बढ़ाएँ   रावण आज, जलेंगे काले मन में व्यर्थ, भरम ये पाले, मन के कलुषित भाव जलाएँ   कल से वही कृत्य फिर सारे मिटे नहीं,...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलमा की कलम से # 41 ☆ नवरात्र पर्व विशेष – कविता – कुष्मांडा देवी-… ☆ डॉ. सलमा जमाल ☆

डॉ.  सलमा जमाल  (डा. सलमा जमाल जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। रानी दुर्गावती विश्विद्यालय जबलपुर से  एम. ए. (हिन्दी, इतिहास, समाज शास्त्र), बी.एड., पी एच डी (मानद), डी लिट (मानद), एल. एल.बी. की शिक्षा प्राप्त ।  15 वर्षों का शिक्षण कार्य का अनुभव  एवं विगत 25 वर्षों से समाज सेवारत ।आकाशवाणी छतरपुर/जबलपुर एवं दूरदर्शन भोपाल में काव्यांजलि में लगभग प्रतिवर्ष रचनाओं का प्रसारण। कवि सम्मेलनों, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी । विभिन्न पत्र पत्रिकाओं जिनमें भारत सरकार की पत्रिका “पर्यावरण” दिल्ली प्रमुख हैं में रचनाएँ सतत प्रकाशित।अब तक 125 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार/अलंकरण। वर्तमान में अध्यक्ष, अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति, पाँच संस्थाओं की संरक्षिका एवं विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन। आपके द्वारा रचित अमृत का सागर (गीता-चिन्तन) और बुन्देली हनुमान चालीसा (आल्हा शैली) हमारी साँझा विरासत के प्रतीक है। आप प्रत्येक बुधवार को आपका साप्ताहिक स्तम्भ  ‘सलमा की कलम से’ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ सलमा जमाल जी द्वारा नवरात्र पर्व पर रचित विशेष रचना  “कुष्मांडा देवी... ”। साप्ताहिक स्तम्भ – सलमा...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 53 – मनोज के दोहे…. ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  द्वारा आज प्रस्तुत है  “मनोज के दोहे। आप प्रत्येक मंगलवार को श्री मनोज जी की भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। मनोज साहित्य # 53 – मनोज के दोहे….  ☆ 1 कृतार्थ मन कृतार्थ तब हो गया, मिला मित्र संदेश। याद किया परदेश में, मिला सुखद परिवेश।। 2 कलकंठी कलकंठी-आवाज सुन, दिल आनंद विभोर। वन-उपवन में गूँजता, नाच उठा मन मोर।। 3 कुंदन दमक रहा कुंदन सरिस, मुखड़ा चंद्र किशोर। यौवन का यह रूप है, आत्ममुग्ध चहुँ ओर।। 4 गुंजार चीता का सुन आगमन, भारत में उन्मेश। कोयल की गुंजार से, झंकृत मध्य प्रदेश।। 5 घनमाला घनमाला आकाश में, छाई है चहुँ ओर। बरस रहे हैं भूमि पर, जैसे आत्मविभोर।। ©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” 24-9-2022 संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)-  482002 मो  94258 62550 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नवरात्र विशेष – कल्याणी ☆ श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ ☆

श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’  (साहित्यकार श्रीमति योगिता चौरसिया जी की रचनाएँ प्रतिष्ठित समाचार पत्रों/पत्र पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में सतत प्रकाशित। कई साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय मंच / संस्थाओं से 150 से अधिक पुरस्कारों / सम्मानों से सम्मानित। साहित्य के साथ ही समाजसेवा में भी सेवारत। हम समय समय पर आपकी रचनाएँ अपने प्रबुद्ध पाठकों से साझा करते रहेंगे।)   ☆ कविता ☆ नवरात्र विशेष - कल्याणी  ☆ श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ ☆ (विधा-कुण्डलियाँ) ☆ कल्याणी नौ रूप रख, करती है उपकार । जग जननी ममता मयी, महिमा अपरम्पार ।। महिमा अपरम्पार, ज्ञान की ज्योति जलाती । अंतस जागृत श्रेष्ठ, शरण में लाज बचाती ।।  जपे योगिता नित्य,करे जयकारा वाणी । रहे समर्पित भाव, सदा माने कल्याणी ।।1!! ☆ हे  कल्याणी कर कृपा, माता ब्रह्म  स्वरूप । अद्भुत दिखती तेज मय, सुंदर रूप अनूप ।। सुंदर रूप अनूप, योगिता मोहित चरणन । अष्टभुजी है मात, कृपा कर जगदम्बें जन ।। पूजे प्रेमा भाव, कहे माँ जग की त्राणी । भजते आठों याम, हृदय बस हे कल्याणी ।।2!! ☆ कल्याणी माँ शारदा, देना इक वरदान । भक्ति- शक्ति अरु ज्ञान दें,...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अजातशत्रु ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ आपदां अपहर्तारं ☆ आज की साधना (नवरात्र साधना) इस साधना के लिए मंत्र इस प्रकार होगा- या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। देवीमंत्र की कम से कम एक माला हर साधक करे। अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे। मंगल भव। 💥 आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास...
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