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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #3 ☆ कुछ नहीं बदला ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।   साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी कविता  “कुछ नहीं बदला ”।    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ - डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # ☆   ☆ कुछ नहीं बदला ☆   दशहरे के पर्व पर जला दिया गया रावण हर वर्ष की भांति परंतु कहां मिट पाई आम जन की भ्रांति क्या अब नहीं होंगे अपहरण के हादसे नहीं लूटी जाएगी चौराहे पर किसी मासूम की अस्मत न ही दांव पर लगाई जाएगी किसी द्रौपदी की इज़्ज़त शतरंज की बिसात पर   रावण लंका में सिर्फ़ एक ही था… परंतु अब तो हर घर में गली-गली में,चप्पे-चप्पे पर काबिज़ हैं अनगिनत कार्यस्थल हों या शिक्षा मंदिर नहीं उसके प्रभाव से वंचित   पति, भाई, पिता के सुरक्षा दायरे में मां के आंचल के साये में यहां तक कि मां के भ्रूण में भी वह पूर्णत: असुरक्षित   पति का घर जिसे वह सहेजती सजाती, संवारती वहां भी समझी जाती वह आजीवन अजनबी सदैव परायी दहशत से जीती और मरणोपरांत भी उस घर का दो गज़ कफ़न नहीं उसे मयस्सर   © डा....
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हिन्दी साहित्य- कविता – ☆ मुखौटा ☆ – सुश्री रक्षा गीता

सुश्री रक्षा गीता    (सुश्री रक्षा गीता जी का e-abhivyakti में स्वागत है।  आपने हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर किया है एवं वर्तमान में कालिंदी महाविद्यालय में तदर्थ प्रवक्ता हैं । आज  प्रस्तुत है उनकी कविता  "मुखौटा"।) संक्षिप्त साहित्यिक परिचय  एम फिल हिंदी- 'कमलेश्वर के लघु उपन्यासों का शिल्प विधान पीएचडी-'धर्मवीर भारती के साहित्य में परिवेश बोध धर्मवीर भारती का गद्य साहित्य' नामक पुस्तक प्रकाशित   ☆ मुखौटा ☆   मेरे चेहरे पर स्वयं मुखौटा चढ़ जाता है, मन घबरा जाता है, पूरी आत्मीयता से जब मुस्कुराता है, उसे देख कर , नफरत तो नहीं जिससे, मगर प्रेम भी तो नहीं । मुखौटा हंसता है ! मन कहीं रोता है , ऐसा कहीं होता है! मगर सोच कर जरा भी- हैरान नहीं होता है। जबकि सब ओर चढ़े हैं मुखौटे !! पल-पल बदलते हैं सामने  मुख़ौटे के हिसाब से रंग रूप रंग लेते हैं मुखौटा पर ये मुखौटा ? सच्चा है ? रंग रूप में कच्चा है। चेहरों को देख , डर से घबरा जाता है बदल लेता है राह कभी रंग रूप पककर सख्त हो जाएंगें इस चेहरे पर भी कई मुखौटे चढ़ जाएंगे फिर ना डरेगा ना घबराएगा ना बदलेगा राह।   © रक्षा गीता ’ दिल्ली  ...
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हिन्दी साहित्य- कविता – ☆ सवाल ☆ – सुश्री मालती मिश्रा ‘मयंती’

सुश्री मालती मिश्रा ‘मयंती’   (प्रस्तुत है सुश्री मालती मिश्रा  जी  की  एक अतिसुन्दर भावप्रवण कविता।)   ☆ सवाल ☆   ये दिल मेरा कितना खाली है पर इसमें सवाल बेहिसाब हैं मैं जवाब की तलाश में दर-दर भटक रही हूँ पर मेरे दिल की तरह मेरे जवाबों की झोली भी खाली है। ये दिल मेरा.... भरा है माता-पिता के प्रति कृतज्ञता से भाई-बहनों के प्रति प्यार और दुलार से माँ की दी हुई सीख से पिता के दिए हुए ज्ञान से दादा-दादी के दुलार से सबने सिखाया तरह-तरह से अलग-अलग ढंग से बस एक ही सीख औरों के लिए जीना औरों की खुशी में खुश रहना बहुत सा ज्ञान भरा है मेरे उर में पर फिर भी ये दिल मेरा..कितना खाली है वो दिल... जिसमे परिवार के लिए प्यार भरा है पत्नी का त्याग भरा है माँ की ममता का सागर हिलोरें लेता है बहू के कर्तव्यों से भरा है अहर्निश की अनवरत खुशियाँ बाँटने का प्रयास भरा है फिर भी.... ये मेरा दिल.. कितना खाली है... इस खाली दिल में बच्चों के टिफिन की खुशबू उनकी पुस्तकों के हरफ भरे हैं पति की फाइलों को करीने से रखने की फिक्र ससुर जी की दवाइयों की उड़ती गंध और सासू माँ के घुटनों की मालिश के तेल की चिकनाहट भरी है देवर ननद के इस्त्री...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ बस देखते देखते …. ☆ – डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव    ☆ बस देखते देखते ....  ☆   न तुमने मुझको धोखा दिया न मैंने तुमको धोखा दिया बस देखते देखते हम फ़ना हो गए।   न तुमने मुझसे कोई वादा किया न मैंने तुमसे कोई वादा किया बस रफ्ता रफ्ता हम जुदा हो गए।   न तुमने मुझको खोजा कभी न मैंने तुमको खोजा कभी बस देखते ही देखते हम खो गए।   न तुमने मुझको बुलाया कभी न मैंने तुमको बुलाया कभी बस देखते देखते अलविदा हो गए।   © डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #2 ☆ औरत की ज़िन्दगी ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।   साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी कविता  “औरत की ज़िन्दगी ”।    ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – #2 ☆   ☆ औरत की ज़िन्दगी ☆   औरत की ज़िन्दगी कोल्हू के बैल की मानिंद खूंटे से बंधी गुज़रती उसके चारों ओर चक्कर लगाती वह युवा से वृद्ध हो जाती   बच्चों की किलकारियों से घर-आंगन गूंजता परन्तु वह सबके बीच अजनबी-सम रहती और उसके रुख्सत हो जाने के पश्चात् एकसूत्रता की डोर टूट जाती   घर मरघट-सम भासता जहां उल्लू और चमगादड़ मंडराते वहां बिल्ली,कुत्तों व अबाबीलों के रोने की आवाज़ें मन को उद्वेलित कर सवालों और संशयों के घेरे में खड़ा कर जातीं   © डा. मुक्ता पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ तुम्हारे चिर चले जाने का मातम मैं मनाऊं ☆ – डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव    ☆ तुम्हारे चिर चले जाने का मातम मैं मनाऊं ☆   तुम्हें अपना न बना पाने का दुख मैं मनाऊं, या किसी अन्य संग रहने का सुख मनाऊं। तुम्हारे चिर चले जाने का मातम मैं मनाऊं, या तुम्हारे उर में बसे रहने का सुख मनाऊं।। तुम्हारे - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - मनाऊं।   तुम्हारे संग बिताई मैं स्मृतियों जीवंत कर लूँ, या तुम्हारे बिन बिताए पलों को भूल जाऊं। तुम्हारे रूप का पान मैं जीवन पर्यंत कर लूँ, या तुम्हारे नेह सुरा की विस्मृति में डूब जाऊँ।। तुम्हारे - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - मनाऊं।   तुम्हारे मृगनयनों की वारूणी में मैं डूब जाऊं, या तुम्हारी मोह माया से बाहर निकल आऊं। मैं तुम्हारे प्रणय जाल में फंस तिलमिला जाऊं, या कनखियों से देखती तेरी आंखें भूल जाऊं।। तुम्हारे - - - - - - - - - - - - - - - - - -...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य #1 – तुम्हें सलाम ☆ – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय   (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । उन्होने यह साप्ताहिक स्तम्भ "जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य" प्रारम्भ करने का आग्रह स्वीकार किए इसके लिए हम हृदय से आभारी हैं। प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की प्रथम कड़ी में उनकी एक कविता  "तुम्हें सलाम"। अब आप प्रत्येक सोमवार उनकी साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचना पढ़ सकेंगे।) ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य #1 ☆   ☆ तुम्हें सलाम ☆   दुखते कांधे पर भोतरी कुल्हाड़ी लेकर  ,   पसीने से तर बतर फटा ब्लाऊज पहिनकर ,   बेतरतीब बहते हुए आंसुओं को पीकर,   भूख से कराहते बच्चों को छोड़कर ,   जब एक आदिवासी महिला निकल पड़ती है जंगल की तरफ ,   कांधे में...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ तू चल, चल लक्ष्य की ओर…..!! ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे (प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी  की  एक  प्रेरक कविता । )    तू चल, चल लक्ष्य की ओर.....!!     तू कर प्रयास और पा सफलता न मिले सफलता तो तू कर प्रयास अर्जुन बन कर तू भेद चक्षु को मत्स्य की ओर समर्पण कर जा तू चल, चल लक्ष्य की ओर.....!!   तू भेद बाणों की वर्षा से और खींच प्रंत्यचा साहस से एकलव्य बन तू भेद आकाश जब तक लगे ना घाव वहाँ कोई मिले ना गुरू यहाँ तू चल, चल लक्ष्य की ओर.....!!   ©  सौ. सुजाता काळे  पंचगनी, महाराष्ट्रा। 9975577684...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हे मातृ भूमि ! ☆– श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”

श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”   ☆ हे मातृ भूमि! ☆    है क्यों घमासान? तेरे आँचल में, सभी तेरे लाल हैं, फिर क्यों है, कोई हरा, कोई नीला, कोई भगवे रूप में, कभी,  सभी...., तेरे लिए लड़ते थे, अब, सभी आपस में लड़ते हैं, बदनाम तेरे आँचल को करते हैं, तेरे पुत्र नहीं, कुछ पराये से लगते हैं, पैदा कर कुछ ऐसा भूचाल, हो जायें सारे आडम्बरी बेहाल, दुनिया सारी अचंभित हो जाये, पड़ोसी भी थर्रा जाये, वीरों का खून भी, अब खौलता है, सफेदपोश भी, बे-तुका सा बोलता है, हे मातृ भूमि, क्युं अब कोई...... महात्मा जैसा, क्युं अब कोई....... अम्बेडकर जैसा, क्युं अब कोई........ टैगौर जैसा, क्युं अब कोई.......... पटेल जैसा, जन्म नही लेता, तेरी कोख से, हे मातृ भूमि, कर दे कुछ ऐसा, सभी में हो, देश भक्ति भाव, एक जैसा......वंदे मातरम.....!   © माधव राव माण्डोले “दिनेश”, भोपाल  (श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”, दि न्यू इंडिया एश्योरंस कंपनी, भोपाल में सहायक प्रबन्धक हैं।)...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #1 ☆ अनचीन्हे रास्ते ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  हम डॉ.  मुक्ता जी  के  हृदय से आभारी हैं , जिन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ  "डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य" के लिए हमारे आग्रह को स्वीकार किया।  अब आप प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनों से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी कविता  "अनचीन्हे रास्ते"। डॉ मुक्ता जी के बारे में कुछ  लिखना ,मेरी लेखनी की  क्षमता से परे है।  )   डॉ. मुक्ता जी का संक्षिप्त साहित्यिक परिचय - राजकीय महिला महाविद्यालय गुरुग्राम की संस्थापक और पूर्व प्राचार्य "हरियाणा साहित्य अकादमी" द्वारा श्रेष्ठ महिला रचनाकार के सम्मान से सम्मानित "हरियाणा साहित्य अकादमी "की पहली महिला निदेशक "हरियाणा ग्रंथ अकादमी" की संस्थापक निदेशक पूर्व राष्ट्रपति महामहिम श्री प्रणव मुखर्जी जी द्वारा ¨हिन्दी  साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार" से सम्मानित ।  डा. मुक्ता जी इस सम्मान से सम्मानित होने वाली हरियाणा की पहली महिला हैं। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में...
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