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हिन्दी साहित्य – कविता – * रौशनाई * – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा रौशनाई (सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी की  एक  भावप्रवण कविता।)   ये क्या हुआ, कहाँ बह चली ये गुलाबी पुरवाई? क्या किसी भटके मुसाफिर को तेरी याद आई?   बहकी-बहकी सी लग रही है ये पीली चांदनी भी, बादलों की परतों के पीछे छुप गयी है तनहाई!   क्या एक पल की रौशनी है,अंधेरा छोड़ जायेगी? या फिर वो बज उठेगी जैसे हो कोई शहनाई?   डर सा लगता है दिल को सीली सी इन शामों में, कहीं भँवरे सा डोलता हुआ वो उड़ न जाए हरजाई!   ज़ख्म और सह ना पायेगा यह सिसकता लम्हा, जाना ही है तो चली जाए, पास न आये रौशनाई!  ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * तलाशी * – सुश्री निशा नंदिनी

सुश्री निशा नंदिनी (आज  प्रस्तुत है सुदूर पूर्व की सम्मानित लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी की  सर्वश्रेष्ठ भावप्रवण कविता "तलाशी"। ) तलाशी        मेरे पीछे से ली गई तलाशी मेरी बखिया उधेड़ उधेड़ कर कुछ इधर से कुछ उधर से कोई अंग छूट न जाए चारों कोने खंगाल लिए गए पर मिला क्या पुराने कागजों का बंडल भर प्यार ख्वाबों के टूटे तार सेलोटेप से जुड़ी लेखनी घुटने के दर्द की मरहम दवाइयों के कुछ चमकीले रेपर टूटे चश्मे से झांकती बूढ़ी आंखें जवानी के रंगीन सपनों से भरे उनके खत दो पैरों की दुरंगी चप्पल माचीस की डिब्बी में पड़े चंद सिक्के डायरी में बिखरे कुछ सूखे फूल पुरानी यादों के कपड़ों की पोटली मुट्ठी भर जमीन गज भर आकाश एक दूसरे का हाथ थामें कुछ लघु कथाएं बिना हैंडिल का मग सहारा देती खुरदुरी लाठी टूटी खिड़कियों से कपकपाती ठंड क्रेक हुई दीवारों का मानचित्र कुछ रोशनाई मां का दिया संस्कार पिता का प्यार कुछ चाय में भीगे सूखे बिस्कुट एक कोना कुछ गीला दिखा जहां पड़े थे ढेर सारे भूत भविष्य और वर्तमान के कुछ छोटे कुछ मोटे आंसू।   © निशा नंदिनी तिनसुकिया, असम...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * पुरानी दोस्त * – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा पुरानी दोस्त (जीवन के कटु सत्य को उजागर करती सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी की  एक  भावप्रवण कविता।) कभी वो तुम्हारी पक्की सहेली हुआ करती होगी, एक दूसरे का हाथ थामे हुए तुम दोनों साथ चला करते होगे, ढलती शामों में तो अक्सर तुम उसके कंधों पर अपना सर रख उससे घंटों बातें किया करते होगे, और सीली रातों में उसकी साँसों में तुम्हारी साँस घुल जाया करती होगी...   तब तुम्हें यूँ लगता होगा तुम जन्मों के बिछुड़े दीवाने हो और बिलकुल ऐसे जैसे तुम दोनों बरसों बाद मिले हो तुम उसे अपने गले लगा लिया करते होगे...   तुम उसे दोस्त समझा करते थे, पर वो तुम्हारी सबसे बड़ी दुश्मन थी!   यह तो अब तुमने बरसों बाद जाना है कि तनहाई का कोई अस्तित्व था ही नहीं, ये तो तुम्हारे अन्दर में बसी थी और तुम्हारे कहने पर ही निकलती थी...   सुनो, एक दिन तुम उठा लेना एक तलवार और उसके तब तक टुकड़े करते रहना जब तक वो पूरी तरह ख़त्म नहीं हो जाए...   उसके मरते ही तुम्हारे ज़हन में जुस्तजू जनम लेगी और तब तुम्हें तनहाई नामक उस पुरानी सहेली की याद भी नहीं आएगी...   © नीलम सक्सेना चंद्रा (सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा सुप्रसिद्ध हिन्दी...
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हिन्दी साहित्य – ग़ज़ल – डॉ हनीफ

डॉ हनीफ   (डॉ हनीफ का e-abhivyakti में स्वागत है। डॉ हनीफ स प महिला  महाविद्यालय, दुमका, झारखण्ड में प्राध्यापक (अंग्रेजी विभाग) हैं । आपके उपन्यास, काव्य संग्रह (हिन्दी/अंग्रेजी) एवं कथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।) गजल  देख तस्वीर उनकी, उनकी याद आ गई छुपी थी जो तहरीर उनकी,उनकी याद आ गई।   कहते हैं शीशे में कैद है उनकी जुल्फें दफ़न हुए कफ़न कल की,उनकी याद आ गई।   क़मर छुप गया देख तसव्वुर महक की खिली धूप में खिली हुई,उनकी याद आ गई।   लम्हें खता कर हो गई गाफिल फिर आरजू आंखों में लिपटी रही,फ़क़त उनकी याद आ गई।   तन्हाइयों में भी तन्हा साये में खोई सी दर्द जब इंतहा से गुजरी,उनकी याद आ गई।   खार चुभी जब जिगर में उनके गुजरने की,उनकी याद आ गई। उनकी यादों के आंचल में हुई परवरिश,क़ज़ा हुई तो उनकी याद आ गई।   © डॉ हनीफ ...
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हिन्दी साहित्य- कविता – * कलम की नोक पर तलवार थी * – डॉ उमेश चन्द्र शुक्ल

डॉ उमेश चन्द्र शुक्ल   कलम की नोक पर तलवार थी (प्रस्तुत है  डॉ उमेश चंद्र शुक्ल जी की बेहतरीन गजल । ) हमारी लाश का यूँ जश्न मनाया जाए, सियासतदारों की गलियों में घुमाया जाये ॥ यही वह आदमी है जिसने उन्हें बेपर्द किया, जल्द फिर लौटेगा ये उनको चेताया जाये॥ लोग मर जाते हैं आवाज नहीं मारती कभी, गूंज रुकती नहीं कितना भी दबाया जाए॥ किसी खुद्दार के खुद्दारीयत का नामों निशां, कभी मिटता नहीं कितना भी मिटाया जाये॥ किसी का पद, कोई रुतबा, किसी हालात से यह, कभी डरता नहीं था कितना भी डराया जाये॥ कलम की नोक पर तलवार थी रक्खी इसने, सदा बेखौफ था उन सबको बताया जाये ॥ वह निगहबान है सड़क से संसद तक 'उमेश', उसके ऐलान को उन सब को सुनाया जाये॥ ©  डॉ उमेश चन्द्र शुक्ल...
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हिन्दी साहित्य – कविता – “दुर्गावती” – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    दुर्गावती   (प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा लिखित  वीर क्षत्राणी रानी दुर्गावती की कालजयी ओजस्वी कविता ‘दुर्गावती '। )    गूंज रहा यश कालजयी उस वीरव्रती क्षत्राणी का दुर्गावती गौडवाने की स्वाभिमानिनी रानी का।   उपजाये हैं वीर अनेको विध्ंयाचल की माटी ने दिये कई है रत्न देश को माँ रेवा की घाटी ने   उनमें से ही एक अनोखी गढ मंडला की रानी थी गुणी साहसी शासक योद्धा धर्मनिष्ठ कल्याणी थी   युद्ध भूमि में मर्दानी थी पर ममतामयी माता थी प्रजा वत्सला गौड राज्य की सक्षम भाग्य विधाता थी   दूर दूर तक मुगल राज्य भारत मे बढता जाता था हरेक दिशा मे चमकदार सूरज सा चढता जाता था   साम्राज्य विस्तार मार्ग में जो भी राज्य अटकता था बादशाह अकबर की आँखों  में वह बहुत खटकता था   एक बार रानी को अकबर ने स्वर्ण करेला भिजवाया राज सभा को पर उसका कडवा निहितार्थ नहीं भाया   बदले मेे रानी ने सोने का एक पिंजन बनवाया और कूट संकेत रूप मे उसे आगरा पहुॅचाया   दोनों ने समझी दोनों की अटपट सांकेतिक भाषा बढा क्रोध अकबर का रानी से न...
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हिन्दी साहित्य – कविता – सच, झूठ और जिंदगी  – श्री दीपक तिवारी ‘दिव्य’

श्री दीपक तिवारी 'दिव्य' सच, झूठ और जिंदगी  (श्री दीपक तिवारी 'दिव्य' जी की जीवन के सच और झूठ को उजागर करती एक कविता।) मुझे सच्चाई का शौक नहीं खुदा का खौफ नहीं झूठ की दुकान सजाता हूं झूठ लिखता हूं झूठ पढ़ता हूं झूठ ओढ़ता हूं झूठ बिछाता हूं तभी सर उठाकर चल पाता हूं इस दुनिया में जो सच्चाई का दंश झेलते हैं ना जाने कैसे वह जीते हैं जहां झूठी तोहमतें हैं आरोप भी झूठे हैं पर इनके बल पर मिलने वाली जिल्लतें सच्ची होती हैं इसके दम पर मिलने वाली सजा सच्ची होती है। वही उनका पारिश्रमिक है यहां तक कि सत्य से मिलने वाला अंदर का सुकून भी तब कचोटने लगता है जब बाहर के हालात बद से बदतर और भी भयावह होते चले जाते हैं और मैं कुछ नहीं कर पाता इसलिए मैं झूठ भेजता हूं लोग खरीदते हैं और मैं जीता हूं यही तरीका सिखाया है मुझे इस दुनिया ने जिंदगी जीने का...... © श्री दीपक तिवारी 'दिव्य'...
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हिन्दी साहित्य – कविता – सरस्वती वन्दना– प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध'  सरस्वती वन्दना (यह संयोग ही नहीं मेरा सौभाग्य ही है कि - ईश्वर ने वर्षों पश्चात मुझे अपने पूर्व प्राचार्य  श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी (केंद्रीय विद्यालय क्रमांक -1), जबलपुर से सरस्वती वंदना  के रूप में माँ वीणा वादिनी का आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। अपने गुरुवर द्वारा लिखित 'सरस्वती वंदना' आप सबसे साझा कर गौरवान्वित एवं कृतार्थ अनुभव कर रहा हूँ।)    शुभवस्त्रे हंस वाहिनी वीण वादिनी शारदे , डूबते संसार को अवलंब दे आधार दे !   हो रही घर घर निरंतर आज धन की साधना , स्वार्थ के चंदन अगरु से अर्चना आराधना आत्म वंचित मन सशंकित विश्व बहुत उदास है, चेतना जग की जगा मां वीण की झंकार दे !   सुविकसित विज्ञान ने तो की सुखों की सर्जना बंद हो पाई न अब भी पर बमों की गर्जना रक्त रंजित धरा पर फैला धुआं और और ध्वंस है बचा मृग मारिचिका से , मनुज को माँ प्यार दे   ज्ञान तो बिखरा बहुत पर, समझ ओछी हो गई बुद्धि के जंजाल में दब प्रीति...
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हिन्दी साहित्य – कविता – मन तो सब का होता है – डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ मन तो सब का होता है   मन तो सब का होता है बस, एक पहल की जरूरत है।   निष्प्रही, भाव - भंगिमा चित्त में,मायावी संसार बसे कैसे फेंके यह जाल, मछलियां खुश हो कर, स्वयमेव  फंसे, ताने-बाने यूं चले, निरन्तर शंकित  मन  प्रयास  रत है बस एक पहल की जरूरत है।   ये, सोचे, पहले  वे  बोले दूजा सोचे, मुंह ये, खोले जिह्वा से दोनों मौन, मुखर -भीतर एक-दूजे को तोले रसना कब निष्क्रिय होती है उपवास, साधना या व्रत है बस एक पहल की जरूरत है।   रूकती साँसे किसको भाये स्वादिष्ट लालसा, रोगी को रस, रूप, गंध-सौंदर्य, करे -मोहित,विरक्त-जन, जोगी को ये अलग बात,नहीं करे प्रकट वे अपने मन के, अभिमत हैं बस एक पहल की जरूरत है।   आशाएं,  तृष्णाएं  अनन्त मन में जो बसी, कामनायें रख इन्हें, लिफाफा बन्द किया किसको भेजें, न समझ आये नही टिकिट, लिखा नहीं पता कहाँ पहुंचे यह ,बेनामी खत है बस एक पहल की जरूरत है। © डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’...
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हिन्दी साहित्य- कविता – गांधी फिर आवाज़ दो, काफिला हो जाऊंगा – डॉ उमेश चन्द्र शुक्ल

डॉ उमेश चन्द्र शुक्ल   गांधी फिर आवाज़ दो, काफिला हो जाऊंगा  (e-abhivyakti पर डॉ उमेश चंद्र शुक्ल जी का स्वागत है। गंगा-जमुनी तहजीब को याद दिलाती सामयिक रचना को सादर नमन। )   अपने हर एक दर्द का, खुद ही दवा हो जाऊंगा, लफ्जों से तुम बाँट दो, फिर से खड़ा हो जाऊंगा ॥1॥   आईने को कितना तुम छलते हो, यूँ छलते रहो, जिंदगी के रास्ते पर, चल खरा हो जाऊंगा ॥2॥   सब्ज बागों के कसीदे, नारों से संवाद हैं, अपने हर एक लफ्ज का, खुद आईना हो जाऊंगा ॥3॥   उर्धगामी चेतना, संस्कार की थाती सजो, तुम गिराने पर तुले हो, तुल बड़ा हो जाऊंगा ॥4॥   हम न हिन्दू-सिक्ख-मुस्लमा, गंगा-जमुनी तहजीब हैं, खींच न दीवार, सवालों में सजा हो जाऊंगा ॥6॥   माँ के आँचल पर, न स्याही-खून के छींटे ‘उमेश’ गांधी फिर आवाज़ दो, काफिला हो जाऊंगा ॥7॥   ©  डॉ उमेश चन्द्र शुक्ल...
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