हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 119 ☆ ग़ज़ल – “दिखते जो है बड़े उन्हें वैसा न जानिये…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक ग़ज़ल – “दिखते जो है बड़े उन्हें वैसा न जानिये…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।) 

☆ काव्य धारा #119 ☆  ग़ज़ल  – “दिखते जो है बड़े उन्हें वैसा न जानिये…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

अब आ गई है दुनिया ये ऐसे मुकाम पै

जो खोखला है, बस टिका है तामझाम पै।।

दिखते जो है बड़े उन्हें वैसा न जानिये

कई तो बहुत ही बौने हैं पैसे के नाम पै।।

युनिवर्सिटी में इल्म की तासीर नहीं है

अब बिकती वहाँ डिग्रियाँ सरेआम दाम पै।।

आफिस हैं कई काम पै होता नहीं कोई

कुछ लेन देन हो तो है सब लोग काम पै।।

बाजारों में दुकानें है पर माल है घटिया

कीमत के हैं लेबल लगे ऊँचे तमाम पै।।

नेता है वजनदार वे रंगदार जो भी है

रंग जिनका सुबह और है, कुछ और शाम पै।।

तब्दीलियों का सिलसिला यों तेज हो गया

विश्वास बदलने लगे केवल इनाम पै।

सारी पुरानी बातें तो बस बात रह गई

अब तो सहज ईमान भी बिकता है दाम पै।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “महाशिवरात्रि” पर विशेष – हे! औघड़दानी ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

 

☆ कविता ☆ “महाशिवरात्रि” पर विशेष – हे! औघड़दानी ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

औघड़दानी, हे त्रिपुरारी, तुम भगवन् स्वमेव ।

पशुपति हो तुम, करुणा मूरत, हे देवों के देव ।।

तुम फलदायी, सबके स्वामी,

तुम हो दयानिधान।

जीवन महके हर पल मेरा,

दो ऐसा वरदान।।

आदिपुरुष तुम, पूरणकर्ता, शिव, शंकर महादेव।

नंदीश्वर तुम, एकलिंग तुम, हो देवों के देव ।।

तुम हो स्वामी, अंतर्यामी,

केशों में है गंगा।

ध्यान धरा जिसने भी स्वामी,

उसका मन हो चंगा।।

तुम अविनाशी, काम के हंता, हर संकट हर लेव।

भोलेबाबा, करूं वंदना, हे देवों के देव  ।।

उमासंग तुम हर पल शोभित,

अर्ध्दनारीश कहाते।

हो फक्खड़ तुम, भूत-प्रेत सँग,

नित शुभकर्म रचाते।।

परम संत तुम, ज्ञानी, तपसी, नाव पार कर देव ।

महाप्रलय ना लाना स्वामी, हे देवों के देव ।।

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – घरवापसी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

हम श्रावणपूर्व 15 दिवस की महादेव साधना करेंगे। महादेव साधना महाशिवरात्रि तदनुसार 18 फरवरी तक सम्पन्न होगी।

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा, साथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि –  घरवापसी ??

हरे-भरे वनों का कटना,

काँक्रीट के जंगलों का उगना,

कुछ ऐसा ही है,

सरलता का विलुप्त होना,

कृत्रिमता का बेतहाशा बढ़ना,

बस इसीलिए,

सदा पौधे लगाता हूँ,

घरवापसी के लिए

सरलता की राह बनाता हूँ…!

© संजय भारद्वाज 

12:01 बजे रात्रि, 16 फरवरी 2023

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #169 ☆ गीत – धरा ने ओढ़ी है… ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण गीत धरा ने ओढ़ी है।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 169 – साहित्य निकुंज ☆

☆ गीत – धरा ने ओढ़ी है…

धरा ने ओढ़ी है धानी चुनरिया ,

हर्षित हुआ मोरा मन तो सांवरिया

 

बौराई है आज देखो  अमवा की डाली ।

गेहूं की झूम रही खेतों में बाली।

लहलहा उठी अब  तो मोरी डगरिया

धरा ने ओढ़ी है धानी चुनरिया

हर्षित हुआ मोरा मन तो सांवरिया।।

 

चहक रहे विहाग आज भाव से भरे

गा रही बयार आज सुगंध को धरे

झूम उठी अब तो  मोरी    नगरिया

धरा ने ओढ़ी है  धानी     चुनरिया

 

 झूम झूम के गीत गा रहा है गगन

 खिल रही है प्यार से उषा की किरण

बसंती रंग में भीगी मोरी चदरिया

धरा ने ओढ़ी है धानी चुनरिया

हर्षित हुआ मोरा मन तो सांवरिया।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #155 ☆ “प्रेम…” ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण रचना  “प्रेम। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 155 ☆

☆ प्रेम ☆ श्री संतोष नेमा ☆

 

जिन्हें   रोशनी   की  तलाश   है

उसे  ही   प्रेम   की   प्यास     है

जो अंधेरे में रहने  का  हो  आदि

वो  जरूर  नफरत  का  दास है

दुनिया चलती  प्रेम  से, प्रेम जगत का सार

प्रेम परस्पर सब रखें, यही जगत व्यवहार

खड़ी फसल जब देखता, आती तब मुस्कान

सपने  देखे  कृषक  तब, मिले  खुशी सम्मान

सोना रहा न आम अब, हुआ पहुँच से दूर

आसमान  पर  कीमतें, सपने हुए सब चूर

जागृत होकर अब कृषक,  मांग रहा अधिकार

नाप-तौल   कर   दे  रही,  उसे  आज  सरकार

कुसुम-कली  जब  खिल उठे, महक उठें जब बाग

झूम   रहे    रसपान   कर,    लिपटे   पदम   पराग

ऋतु बसंत मन भावनी, उपजा मन अनुराग

धरा  सुहानी  लग  रही, कोयल   गाती   राग

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दो कविताएं ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ कविता ☆ दो कविताएं ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

[1]

☆ स्त्री कभी हारती नहीं ☆

स्त्री 

कभी हारती नहीं। 

 

किसी हताश क्षण में

वह चाहती है  

थोडा सा समय

अपना सा कंधा कोई। 

 

चाहती है वह

अपना एक अदद

खाली कोना कोई 

या फिर 

अपना बिस्तर

और ज़रा सी रुलाई। 

 

कभी चाहती है 

गरम चाय की प्याली

या एक पुरा दिन खाली। 

 

फिर है वह उठती

ताकत से दुगुनी 

और है निकलती

लड़ने जंग एक नयी। 

 

चाय, कोना, कंधा

बिस्तर या रुलाई

कमज़ोरी नही उसकी 

यहां से पाती है वह

ऊर्जा एक नयी। 

[2]

☆ विशेषण ☆ 

उन्होंने दिया है

हमें एक विशेषण

मजबूत और सशक्त

उनको लगता है

हमें नहीं होती है ज़रूरत किसी की

हम सबकुछ सहन कर सकती हैं

सब पर जीत हासिलकर कर लेंगी

वे तलाशते हैं हमें उनको सुनने

या उनका सलीब उठाने

उन्हें नहीं लगता कि कभी

हमें भी सुना जाय शिद्दत से

पूछा जाया कभी कि

हम थकी हैं, दुखी हैं चिंतित या घबरायी..

गृहित लिया जाता है हमें

समुद्र के पानी में घिरी चट्टान सा

या कोहरे में प्रकाशस्तम्भ सा।

हमारी एक अदद गलती की माफी नहीं होती

गुस्से में यदि हम अपना आप खो देती हैं

तो हिस्टेरिक हैं,

या अपना काबू खो देती हैं

तो कमज़ोर,

हमारी पल भर की गैरहाजिरी नोट की जाती है

और उपस्थिति सामान्य होती है,

बहुत दोगला है तुम्हारा नज़रिया

थोडा बदलिए ..हम मज़बूत हैं

हर दिन जुटाती हैं हिम्मत हम

तुम्हारी सोच का, तुम्हारी नज़रों

का सामना करने।

पर हैं तो इन्सान

आँसू निकलते हैं हमारे भी

और आह भी उठती है

चाहती हैं हम कि महसूस किया जाय

हमारा होना और ना होना भी।

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 147 ☆ बाल गीत – भारत के सपूत नेताजी… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’… ☆

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक 122 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिया जाना सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ (धनराशि ढाई लाख सहित)।  आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 147 ☆

☆ बाल गीत – भारत के सपूत नेताजी… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

भारत के सपूत नेताजी

मिलकर हम गुणगान करें।

देश की खातिर अमर हो गए

आओ सभी प्रणाम करें।।

 

कतरा – कतरा लहू तुम्हारा

काम देश के आया था।

इसीलिए तो आजादी का

झंडा भी फहराया था।

 

वतन कर रहा याद आपको

हम शुभ – शुभ सारे काम करें।

देश की खातिर अमर हो गए

आओ सभी प्रणाम करें।।

 

गोरों को भी खूब छकाया

जोश नया दिलवाया था।

ऊँचा रखकर शीश धरा का

शान – मान करवाया था।

 

कुर्बानी को याद रखें हम

राष्ट्र की ऊँची शान करें।

देश की खातिर अमर हो गए

आओ सभी प्रणाम करें।।

 

नेताजी उपनाम आपका

सब श्रद्धा से हैं लेते।

नेता आज नई पीढ़ी के

बीज घृणा के हैं देते।

 

भेदभाव का जहर मिटाएँ

सदा ऐक्य का मान करें।।

देश की खातिर अमर हो गए

आओ सभी प्रणाम करें।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #169 – तन्मय के दोहे – धूप छाँव टिकती कहाँ… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा  रात  का चौकीदार”   महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं तन्मय के दोहे – “धूप छाँव टिकती कहाँ…”)

☆  तन्मय साहित्य  #169 ☆

☆ तन्मय के दोहे – धूप छाँव टिकती कहाँ 

बदतमीज  मौसम  हुआ,  हवा हुई है आग।

बीज  विषैले हो गए, फसलों  में  है  दाग।।

धूप  कभी  अच्छी  लगे, कभी लगे संताप।

मन के जो अनुरूप हो, वैसे भरे अलाप।।

धूप छाँव टिकती कहाँ, एक ठिकाने ठौर।

जैसे  टिके न पेट में,  मुँह से खाया  कौर।।

वे  पढ़ पाते  हैं   कहाँ, जो  लिखते  हैं  आप।

सुबह-शाम मन में चले, बस रोटी का जाप।।

सीधे-सादे  श्रमजीवी,  रहते आधे  पेट।

हरदम होती ही रहे, पीठ पेट की भेंट।।

रोज   रोपते  रोटियाँ, रोज  काटते  खेत।

इनको एक समान है, सावन भादौ चैत।।

भादौ में छप्पर चुए, जेठ  सताये घाम।

ठंडी में ठिठुरे यहाँ, कष्ट चले अविराम।।

थाली नित  खाली रहे, पेट  रहे  बीमार।

आँख दिखाए सेठ जी, सिर पर ठेकेदार।।

पेट पीठ में  मित्रता, रोटी  के  मन  बैर।

रोज रात सँग भूख के, करें स्वप्न में सैर।।

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलमा की कलम से # 55 ☆ कविता – बेचारी… ☆ डॉ. सलमा जमाल ☆

डॉ.  सलमा जमाल 

(डा. सलमा जमाल जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। रानी दुर्गावती विश्विद्यालय जबलपुर से  एम. ए. (हिन्दी, इतिहास, समाज शास्त्र), बी.एड., पी एच डी (मानद), डी लिट (मानद), एल. एल.बी. की शिक्षा प्राप्त ।  15 वर्षों का शिक्षण कार्य का अनुभव  एवं विगत 25 वर्षों से समाज सेवारत ।आकाशवाणी छतरपुर/जबलपुर एवं दूरदर्शन भोपाल में काव्यांजलि में लगभग प्रतिवर्ष रचनाओं का प्रसारण। कवि सम्मेलनों, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी । विभिन्न पत्र पत्रिकाओं जिनमें भारत सरकार की पत्रिका “पर्यावरण” दिल्ली प्रमुख हैं में रचनाएँ सतत प्रकाशित।अब तक 125 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार/अलंकरण। वर्तमान में अध्यक्ष, अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति, पाँच संस्थाओं की संरक्षिका एवं विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन।

आपके द्वारा रचित अमृत का सागर (गीता-चिन्तन) और बुन्देली हनुमान चालीसा (आल्हा शैली) हमारी साँझा विरासत के प्रतीक है।

आप प्रत्येक बुधवार को आपका साप्ताहिक स्तम्भ  ‘सलमा की कलम से’ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “बेचारी…”।

✒️ साप्ताहिक स्तम्भ – सलमा की कलम से # 55 ✒️

?  कविता – बेचारी…  ✒️  डॉ. सलमा जमाल ?

यौवनावस्था  में  पुरुष, कमाने को लेकर रौब जमाते हैं ।

कर्तव्य परायणता को नकार कर, भगवान बन जाते हैं ।।

माता पिता  हृदय  थामकर, आश्चर्य  से  देखते  रह जाते हैं ।

बच्चे चिड़िया के बच्चों की तरह, पंख आने पर उड़ जाते हैं ।।

बहू को बेटी बनाने की होड़ में सदा, ससुर प्रथम आते हैं ।

बेटे बहू की आड़ लेकर संगिनी का, अनादर करवाते हैं ।।

वृद्धावस्था में आकर शरीर मन विचारों से, शिथिल हो जाते हैं ।

पति के सानिध्य को तरसती पत्नी के, सारे सपने खो जाते हैं ।।

क्या  समर्पित  त्यागमयी  नारी  के, जीवन  की  यही  थाती  है ।

फिर क्यों कहते हैं लोग कि, पति और पत्नी दीया और बाती हैं ।।

फंड – पेंशन के कारण बच्चे, पिता के आसपास मंडराते हैं ।

मां को नकारते हुए अनजाने में ही, पिता  के  गुण  गाते हैं ।।

भीगे तरल  नेत्र  बच्चों  के  चेहरों को, निहारते रह जाते हैं ।

तब ममता की मारी मां को, बचपन के दिन याद आते हैं ।।

जीवन की सांझ में विचारी पत्नी, पति के साथ को तरसती है ।

एकाकी  जीवन  में  चारों  ओर  घोर  निराशा ही बरसती है ।।

बीमार पत्नी को अकेला छोड़ पति, अलग कमरे में सो जाता है ।

पति  के  होते  हुए  पत्नी  का हाल विधवा नारी सा हो जाता है ।।

तब उसे मंदा, नंदा,गीता, इंद्रा विधवा सखियां, याद आती हैं ।

ह्रदय  वेदना  से  फटने  लगता  है  और  आंखें  भीग जाती हैं ।।

© डा. सलमा जमाल

298, प्रगति नगर, तिलहरी, चौथा मील, मंडला रोड, पोस्ट बिलहरी, जबलपुर 482020
email – [email protected]

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शब्द- दर-शब्द ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

हम श्रावणपूर्व 15 दिवस की महादेव साधना करेंगे। महादेव साधना महाशिवरात्रि तदनुसार 18 फरवरी तक सम्पन्न होगी।

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा, साथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि – शब्द- दर-शब्द ??

शब्दों के ढेर सरीखे

रखे हैं, काया के

कई चोले मेरे सम्मुख,

यह पहनूँ, वो उतारूँ

इसे रखूँ , उसे संवारूँ..?

 

तुम ढूँढ़ते रहना

चोले का इतिहास

या तलाशना व्याकरण,

परिभाषित करना

चाहे अनुशासित,

अपभ्रंश कहना

या परिष्कृत,

शुद्ध या सम्मिश्रित,

कितना ही घेरना

तलवार चलाना,

ख़त्म नहीं कर पाओगे

शब्दों में छिपा मेरा अस्तित्व!

 

मेरा वर्तमान चोला

खींच पाए अगर,

तब भी-

हर दूसरे शब्द में,

मैं रहूँगा..,

फिर तीसरे, चौथे,

चार सौवें, चालीस हज़ारवें और असंख्य शब्दों में

बसकर महाकाव्य कहूँगा..,

 

हाँ, अगर कभी

प्रयत्नपूर्वक

घोंट पाए गला

मेरे शब्द का,

मत मनाना उत्सव

मत करना तुमुल निनाद,

गूँजेगा मौन मेरा

मेरे शब्दों के बाद..,

 

शापित अश्वत्थामा नहीं

शाश्वत सारस्वत हूँ मैं,

अमृत बन अनुभूति में रहूँगा

शब्द- दर-शब्द बहूँगा..,

 

मेरे शब्दों के सहारे

जब कभी मुझे

श्रद्धांजलि देना चाहोगे,

झिलमिलाने लगेंगे शब्द मेरे

आयोजन की धारा बदल देंगे,

तुम नाचोगे, हर्ष मनाओगे

भूलकर शोकसभा

मेरे नये जन्म की

बधाइयाँ गाओगे..!

 

‘शब्द ब्रह्म’ को नमन। आपका दिन सार्थक हो।

© संजय भारद्वाज 

(कविता संग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता।’)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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