हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 122 ☆ ~ सॉनेट ~ तुलसी ~ ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा रचित “~ सॉनेट ~ तुलसी ~”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 122 ☆ 

☆ सॉनेट ~ तुलसी ~ ☆

*

तुलसी जग कल्याणिका।

रामा-श्यामा रूप मनोहर।

पति हितकारी साधिका।।

आत्मशक्ति की लिए धरोहर।।

*

छली विश्वपालक कर दंडित।

देह त्याग हो गई अमर है।

है त्रिलोक में महिमामंडित।।

चढ़ी छली के भी सिर पर है।।

*

भाव-भक्तिमय जीवन अनुपम।

अंग हरेक रोग उपचारक।।

तन-मन स्वस्थ्य करे यह माँ सम।

दिव्यौषधि शत-शत गुणधारक।।

*

शीश चढ़ा हर आत्मा हुलसी।

काल हलाहल अमरित तुलसी।।

*

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१८-१२-२०२२, ७•३२, जबलपुर

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आतिश का तरकश #171 – 57 – “चेहरा मोहरा पहनावा सजधज महज़ छल…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। श्री सुरेश पटवा जी  ‘आतिश’ उपनाम से गज़लें भी लिखते हैं ।प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ आतिश का तरकशआज प्रस्तुत है आपकी ग़ज़ल “चेहरा मोहरा पहनावा सजधज महज़ छल…”)

? ग़ज़ल # 57 – “चेहरा मोहरा पहनावा सजधज महज़ छल…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ?

ख़ैरात  बँट  रही  है  सियासत के नाम पर।

लूट मची अब  केवल रियायत के नाम पर।

चेहरा मोहरा  पहनावा सजधज महज़ छल,

चलता खेल हवस का मोहब्बत के नाम पर।

खुलकर बोल न देखे जो यहाँ कुछ हुआ ग़लत,

चुप मत रह  तू  अब यहाँ शराफ़त के नाम पर।

अपनो  की  बेरुख़ी  तन्हा  बद  है  सरेआम,

यह बचता अब मेरे पास दौलत के नाम पर।

पाबंदियां     पामालियां    मक्कारियां    फ़रेब,

क्या कर रहे हैं आतिश अब सत्ता के नाम पर।

© श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 48 ☆ मुक्तक ।। जिंदगी चल कि अभी कुछ कर्ज़ चुकाना बाकी है।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस”☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

(बहुमुखी प्रतिभा के धनी  श्री एस के कपूर “श्री हंस” जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। आप कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। साहित्य एवं सामाजिक सेवाओं में आपका विशेष योगदान हैं।  आप प्रत्येक शनिवार श्री एस के कपूर जी की रचना आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण मुक्तक ।। जिंदगी चल कि अभी कुछ कर्ज़ चुकाना बाकी है ।।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 48 ☆

☆ मुक्तक  ☆ ।। जिंदगी चल कि अभी कुछ कर्ज़ चुकाना बाकी है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆ 

[1]

जिंदगी अभी  चल  प्रभु  कर्ज चुकाना बाकी है।

अपने पराये का भी कुछ दर्द मिटाना बाकी है।।

टूटे  रिश्तों  की  तुरपाई   करनी  है  मिल  कर।

ईश्वर  शुकराने  को  भी सिर झुकाना बाकी  है।।

[2]

किसीके भूख की अग्नि अभी बुझाना बाकी है।

नई  पीढ़ी  को  भी  सही  राह सुझाना बाकी है।।

बहुत  काम  कर  लिया  जीवन के  इस सफर में।

फिर भी कुछऔर नया करके दिखाना बाकी है।।

[3]

जीवन मोड़ों में पड़ी गाँठेअभी सुलझाना बाकी है।

किसी  का अभी  रूठना मनाना हंसाना बाकी है।।

जो  छूट  गया पीछे  जीवन  की   इस  भाग दौड़ में।

तिनका तिनका जोड़ उसको फिर जुटाना बाकी है।।

[4]

अधूरी  बात  अभी  भी  सबको  सुनाना  बाकी  है।

किसी  रोते  हुए को  भी  अभी  हँसाना बाकी  है।।

जो मिली  अनमोल वरदान  सी  यह  इक  जिंदगी।

उस जिंदगी का बाकी फ़र्ज़ अभी निभाना बाकी है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली

ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com

मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जर्जर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

श्री भास्कर साधना आरम्भ हो गई है। इसमें जाग्रत देवता सूर्यनारायण के मंत्र का पाठ होगा। मंत्र इस प्रकार है-

💥 ।। ॐ भास्कराय नमः।। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि – जर्जर ??

कौन कहता है

निर्जीव वस्तुएँ

अजर होती हैं,

घर की कलह से 

घर की दीवारें

जर्जर होती हैं..!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 114 ☆ ग़ज़ल – “जलने वाले दीपों की व्यथा…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक ग़ज़ल – “जलने वाले दीपों की व्यथा …” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।) 

☆ काव्य धारा #114 ☆  ग़ज़ल  – “’जलने वाले दीपों की व्यथा…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

बहुतों को जमाने में अपनी किस्मत से शिकायत होती है

क्योंकि उनका उल्टा-सीधी करने की जो आदत होती है।।

 

जलने वाले दीपों की व्यथा लोगों की समझ कम आती है

सबको अपनी औ’ अपनों की ही ज्यादा हिफाजत होती है।।

 

नापाक इरादों को अपने सब लोग छुपाये रखते हैं

औरों की सुहानी दुनियां को ढाने की जहालत होती है।।

 

अनजान के छोटे कामों की तक खुल के बड़ाई की जाती

पर अपने रिश्तेदारों से अनबन व अदावत होती है।।

 

कई बार किये उपकारों तक का कोई सम्मान नहीं होता

पर खुद के किये गुनाहों तक की बढ़चढ़ के वकालत होती है।।

 

अपनी न बता औरों की सदा ताका-झांकी करते रहना

बातों को बताना बढ़चढ़ के बहुतों की ये आदत होती है।।

 

केवल बातों ही बातों से बनती है कोई बात नहीं

बनती है समय जब आता औ’ ईश्वर की इनायत होती है।।

 

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारों में जाने से मिला भगवान कहाँ ?

मिलते हैं अकेले में मन से जब उनकी इबादत होती है।।

 

जो लूटते औरों को अक्सर एक दिन खुद ही लुट जाते हैं

दौलत तो ’विदग्ध वहाँ बसती जिस घर में किफायत होती है।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ स्त्री की हंसी ☆ श्री रामस्वरूप दीक्षित ☆

श्री रामस्वरूप दीक्षित

(वरिष्ठ साहित्यकार  श्री रामस्वरूप दीक्षित जी गद्य, व्यंग्य , कविताओं और लघुकथाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। धर्मयुग,सारिका, हंस ,कथादेश  नवनीत, कादंबिनी, साहित्य अमृत, वसुधा, व्यंग्ययात्रा, अट्टाहास एवं जनसत्ता ,हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, राष्ट्रीय सहारा,दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, नईदुनिया,पंजाब केसरी, राजस्थान पत्रिका,सहित देश की सभी प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । कुछ रचनाओं का पंजाबी, बुन्देली, गुजराती और कन्नड़ में अनुवाद। मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन की टीकमगढ़ इकाई के अध्यक्ष। हम समय समय पर आपकी सार्थक रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास करते रहते हैं।

☆ कविता  – स्त्री की हंसी ☆ श्री रामस्वरूप दीक्षित ☆

स्त्री की हंसी में

शामिल है

उन सबकी हंसी

जिनके लिए हंसना

एक ऐसा अवसर है

जो हर बार चला जाता चुपके से

उन्हें रोते रहने को छोड़कर

 

स्त्री की हंसी में

शामिल है

कचरे के ढेर में

जूठन तलाशते बच्चों

देह बेचकर पेट भरने को

अभिशप्त स्त्रियों

दूसरों के लिए अन्न उगाकर

खुद अन्न को तरसते किसानों

पसीने में शरीर का नमक बहाते

मजदूरों से

छीन ली गई हंसी

 

स्त्री की हंसी में

शामिल है

उदास जंगलों

अनमने पहाड़ों

कलपती नदियों

और खिलने से पहले ही

मसले गए फूलों की हंसी

 

स्त्री बेसब्री से करती है

हंसने का इंतजार

वह हंसकर उड़ा देना चाहती है

उदासी की चादर

तकलीफों के तिनकों

और दुखों के गुबार को

 

स्त्री की हंसी में

हंसती हैं वक्त की उम्मीदें

© रामस्वरूप दीक्षित

सिद्ध बाबा कॉलोनी, टीकमगढ़ 472001  मो. 9981411097

ईमेल –[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – हो सकता है… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

श्री भास्कर साधना आरम्भ हो गई है। इसमें जाग्रत देवता सूर्यनारायण के मंत्र का पाठ होगा। मंत्र इस प्रकार है-

💥 ।। ॐ भास्कराय नमः।। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि – हो सकता है… ??

जाने क्या है;

इन दिनों

कविताएँ उपजती नहीं..,

हो सकता है;

विसंगतियाँ कम हो रही हों,

स्थितियाँ अनुकूल हो रही हों..,

पर संभावना की पीठ पर

आशंका सदा गुदी होती है,

हो सकता है;

मनुष्यता भरभरा रही हो,

संवेदना पथरा रही हो…!

© संजय भारद्वाज 

17.9.21, प्रात: 10.09 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #163 ☆ भावना के दोहे – मीरा ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  “भावना के दोहे – मीरा ।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 163 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मीरा ☆

धुन मुरली की बज रही, दिल में बजते साज।

मैं मीरा घनश्याम की, झूम रही है आज।।

नाच रही हूं मगन मैं, उर में है बस श्याम।

बजती है बस श्याम धुन, छाए है घन श्याम।।

मैं मोहन की माधुरी, मुरली की  मैं जान।

रोम रोम में बस रहे, मनमोहन में प्रान।।

जादू है घन श्याम का, चहुं ओर है उमंग।

मीरा रहती श्याममय, मन में उठी तरंग।।

कैसे तुझसे क्या कहूँ, हूँ तुझमें मैं लीन।

मैं मीरा राधा नहीं, मैं हूँ श्याम विलीन

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #150 ☆ एक पूर्णिका – “हमने देखे हैं अश्क़ तेरी आँखों में…” ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक पूर्णिका – “हमने देखे हैं अश्क़ तेरी  आँखों में…। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 150 ☆

☆ एक पूर्णिका – हमने देखे हैं अश्क़ तेरी  आँखों में… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

बोल कर झूठ आँख चुराता क्यों है

मुझसे खफा है तो छुपाता क्यों है

वक्त के  साथ लोग  बदल जाते हैं

ये  जानते हैं मगर  बताता  क्यों है

रोशनी  जिससे  हो रही है  दिल में

चिराग वफ़ा का यूँ बुझाता क्यों  है

अगर डर है तुझको  इस जमाने से

तो दिल हमसे फिर लगाता  क्यों है

हमने देखे हैं  अश्क़ तेरी  आँखों में

छुपा के  गम तू  मुस्कराता  क्यों  है

पास रहके न पहचान सके जिसको

देख कर दूर से हाथ हिलाता क्यों है

जो करते  हैं  नाटक खुद  सोने  का

उनको  “संतोष”  तू  जगाता क्यों  है

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अपरिमेय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

श्री भास्कर साधना आरम्भ हो गई है। इसमें जाग्रत देवता सूर्यनारायण के मंत्र का पाठ होगा। मंत्र इस प्रकार है-

💥 ।। ॐ भास्कराय नमः।। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि – अपरिमेय  ??

संभावना क्षीण थी

आशंका घोर,

बायीं ओर से उठाकर

आशंका के सारे शून्य,

धर दिये संभावना के

दाहिनी ओर..,

गणना की

संभावना खो गई,

संभावना

अपरिमेय हो गई..!

© संजय भारद्वाज 

25.12.2021, सुबह 11:35 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares