हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 16 (46-50)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #16 (46 – 50) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -16

 

शैवालिनी सीढ़ियों से उतर नीचे, गृहवापी जल कमर भर रह गया

खिलते जहाँ के कमल वहाँ अब मान, डण्ठल ही सूखा खड़ा रह गया है।।46।।

 

वन में खिले मल्लिका पुष्प की गंध से खिंच कली-कली के पास जाकर।

गुंजार करता भ्रमर, गणना सी करता है दीखता मधुर रस में लुभाकर।।47।।

 

खिसक कान से कामिनी के सिरस पुष्प भी अचानक नीचे गिरने न पाता।

क्योंकि पसीने से तर दंतक्षत पर कपोलों के ही वह चिपक सहज जाता।।48।।

 

धनी-मानी जन भर के चन्दन का जल फुहारों से छिड़ककर बिताते हैं रातें।

ठंडी शिला के पलंगों पै लेटे न जब, नींद आती हो करते हैं बातें।।49।।

 

जो काम अपने सखा वसंत के बिन, निबल और निस्तेज सा हो है जाता।

वही मल्लिका पुष्प गुंफित अलकगंध पा स्नात नारी की, बल है दिखाता।।50।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 85 – दोहे ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 85 –  दोहे ✍

नहीं प्रेम की व्याख्या, नहीं प्रेम का रूप।

कभी चमकती चांदनी, कभी दहकती धूप।।

 

प्रेम किया जाता नहीं, लगता औचक तीर।

 अनदेखे से घाव हों, मीठी मीठी पीर।।

 

स्वाति बिंदु -सा प्रेम है, पाते हैं बड़भाग।

प्रेम सुधा संजीवनी, ममता और सुहाग।।

 

बांच  सको तो बांच लो, आंखों का अखबार।

प्रथम पृष्ठ से अंत तक, लिखा प्यार ही प्यार।।

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव-गीत #88 – “बाहर हाँफ रही गौरैया …” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण अभिनवगीत – “बाहर हाँफ रही गौरैया…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 88☆।। अभिनव-गीत ।। ☆

☆ || “बाहर हाँफ रही गौरैया…”|| ☆

एक सकोरा पानी-दाना

रक्खा करती माँ

औरों की खातिर चिड़ियों

सी उड़ती रहती माँ

 

छाती में दुनिया-जहान की

लेकर पीड़ायें

आँचल भर उसको सारी

जैसे हों क्रीड़ायें

 

आगे खिडकी में

आँखों के चित्र कई टाँगे

पीड़ा को कितनी आँखों से

देखा करती माँ

 

बाहर हाँफ रही गौरैया

उस मुँडेर तोती

जहाँ उभरती   दिखे

सभी को आशा की धोती

 

गर्मी गले-गले तक आकर

जैसे सूख गई

इंतजार में हरी-भरी सी

दिखती रहती माँ

 

लम्बे-चौड़े टीम-टाम है

बस अनुशासन के

जहाँ टैंकर खाली दिखते

नागर प्रशासन के

 

वहीं दिखाई देती सबकी

सजल खुली आँखें

इन्हीं सभी में भरे कलश

सी छलका करती माँ

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

17-04-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सूत्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – सूत्र ??

घर पर ही हो,

कुछ नहीं घटता,

कुछ करना भी नहीं पड़ता

इन दिनों..,

बस यही अवसर है,

खूब लिखा करो,

क्या बताऊँ,

लेखन का सूत्र

कैसे समझाऊँ?

साँस लेना ज़रूरी है

जीने के लिए..,

कुछ घटना, कुछ करना,

अनिवार्य हैं लिखने के लिए !

(दो वर्ष पूर्व लॉकडाउन के दौरान लिखी)

© संजय भारद्वाज

संध्या 7:50, 21.4.2020

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विश्व पुस्तक दिवस विशेष – किताबें – स़फदर हाशमी ☆ संकलनकर्ता – श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

☆ कविता ☆ विश्व पुस्तक दिवस विशेष – किताबें – स़फदर हाशमी ☆ संकलनकर्ता – श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆

किताबे कुछ कहना चाहती है।

तुम्हारे पास रहना चाहती है।

किताबों में चिड़ियाँ चहचहाती है।

किताबों में खेतियाँ लहलहाती है।

किताबों में झरने गुनगुनाते है।

परियों के किस्से सुनाते है।

किताबों में राकट का राज है।

किताबों में सायन्स की आवाज है।

किताबों में कितना बड़ा संसार है।

किताबों में ज्ञान की भरमार है।

क्या तू इस संसार में

नहीं जाना चाहोगे?

किताबे कुछ कहना चाहती है।

तुम्हारे पास रहना चाहती है।

 

किताबे करती है बाते

बिते जमानों की

दुनिया की, इंसानों की,

आज की, कल की

एक एक पल की

खुशियों की, गमों की

फूलों की, बमों की

जीत की, हार की

प्यार की, मार की

क्या तुम नहीं सुनोंगे

इन किताबों की बाते?

 

 – स़फदर हाशमी

संकलनकर्ता – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

मो. 9403310170,   e-id – [email protected]  

संपर्क -17 16/2 ‘गायत्री’ प्लॉट नं. 12, वसंत दादा साखर कामगारभावन के पास , सांगली 416416 महाराष्ट्र 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 78 ☆ # चलते चलते जीवन में # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय एवं भावप्रवण कविता “# चलते चलते जीवन में #”) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 78 ☆

☆ # चलते चलते जीवन में # ☆ 

चलते चलते जीवन मे

कुछ मोड़ ऐसे आते हैं

कुछ मंजिल तक पहुंचाते हैं

कुछ राह से भटकाते हैं

 

जब दो-राहे पर खड़ा पथिक

असमंजस मे होता है

स्वयं के विवेक से निर्णय कर

अपना धैर्य नहीं खोता है

वही पाता है अपना लक्ष्य

जिसके पैरों में छाले आते हैं

 

तूफानों से क्या घबराना

उनका जोर है तबाही लाना

बसे बसाए आशियाने को

ताकत के बल पर उड़ा ले जाना

मर्द कहते हैं उन्हें

जो उजड़े आशियाने को बसाते हैं

 

फूलों की चाहत है सबको

कांटों का क्या दोष है

सदा फूलों की रक्षा करते

चुभते हैं पर निर्दोष हैं

उपवन का सौंदर्य तो

कांटे ही बचाते हैं

 

अनेक मिलते हैं राहों में

जो अपने सपने बुनते हैं

सपनों को साकार करने

किसी सहचर को चुनते हैं

जब बिछड़ जाता है वो

उसकी यादों से दिल बहलाते हैं /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 16 (41-45)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #16 (41 – 45) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -16

गज-वाजि-धन-विपणि-प्रासाद से भर अयोध्या हुई सुसज्जित कामिनी सी।           

हर अंग में जिसके छाई हो शोभा, दिखी रूपसी अलंकृता भामिनी सी।।41।।

 

रहते अयोध्या में फिर से सजी जो, कुश सीतासुत ने सदा शांति चाही।

स्पर्धा न की कमी भी इंद्रपद की न ही कुबेर की अलका की कामना की।।42।।

 

फिर प्रिया को, वक्ष पै तरल माला, औ’ ओढ़नी रत्न शोभी सुहाई।

भीने वसन श्वाँस से हित उठें जो, पहनना सिखाने को ज्यों ग्रीष्म आई।।43।।

 

उत्तर दिशा, सूर्य के पास आने से लगी हिम गलित प्रेम आँसू बहाने।

दक्षिण दिशा छोड़ अगस्त्य का क्षेत्र, सूरज लगा हिमालय पास आने।।44।।

 

संतप्त दिन लंबे औ’ छोटी रातें, परस्पर विरोधी प्रणयकोप कारण।

पति-पत्नी विपरीत व्यवहार से हो दुखी दिखे मन में तरसते अकारण।।45।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 89 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

?  Anonymous Litterateur of Social Media # 89 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 89) ?

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc. in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

हम ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए आदरणीय कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी के “कविता पाठ” का लिंक साझा कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें।

फेसबुक पेज लिंक  >>  कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी का “कविता पाठ” 

? English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 89 ?

☆☆☆☆☆

इन निष्कर्षों का अवगुंठन,

वैचारिक भ्रम में उलझ रहा…

न मिलने से उत्पन्न वजह,

वाणी से अंतस बादल रहा…!

 

Facade of these inferences,

Kept entangled in ideological maze…

Cause for not getting solution,

Kept changing the psyche with voice…!

☆☆☆☆☆

बहुत मुश्किल है

उस शख़्स को गिराना,

जिसको चलना

ठोकरों ने सिखाया हो…

 

It’s very difficult to knock

down that person,

whom, stumbling blocks

have taught the walking

☆☆☆☆☆

 गुजर जाते हैं खूबसूरत लम्हें

यूँ ही मुसाफ़िरों की तरह

यादें वहीं खड़ी रह जाती हैं

रुके हुए रस्तों की तरह…! 

 

Beautiful moments keep passing

just like the travellers,

Memories remain rooted there only

like the stationary pathways…!

☆☆☆☆☆

हम भी दरिया हैं, हुजूर

अपना हुनर मालूम है हमें,

जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे,

रास्ता खुद-बख़ुद बन जाएगा

 

We are also river only,

We know our skills well

Whichever side we go,

the way gets crafted…!

☆☆☆☆☆

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 89 ☆ बुंदेली नवगीत – राम रे! ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

 

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा रचित बुंदेली नवगीत – राम रे!।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 89 ☆ 

☆ बुंदेली नवगीत – राम रे! 

राम रे!

तनकऊ नई मलाल???

*

भोर-साँझ लौ

गोड़ तोड़ रै

काम चोर बे कैते

पसरे रैत

ब्यास गादी पे

भगतन संग लपेटे

काम-पुजारी

गीता बाँचे

हेरें गोप निहाल।

आँधर ठोकें ताल

राम रे!

बारो डाल पुआल।

राम रे!

तनकऊ नई मलाल???

*

झिमिर-झिमिर-झम

बूँदें टपकें

रिस रए छप्पर-छानी

मैली कर दई रैटाइन की

किन्नें धोती धानी?

लज्जा ढाँपे

सिसके-कलपे

ठोंके आप कपाल

मुए हाल-बेहाल

राम रे!

कैसा निर्दय काल?

राम रे!

तनकऊ नई मलाल???

*

भट्टी-देह न देत दबाई

पैले मांगें पैसा

अस्पताल मा

घुसे कसाई

ठाणे-अरना भैंसा

काले कोट

कचैरी घेरे

बकरा करें हलाल

नेता भए बबाल

राम रे!

लूट बजा रए गाल

राम रे!

तनकऊ नई मलाल???

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख – आत्मानंद साहित्य #119 ☆ सद्गुरू महिमा ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” ☆

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य# 119 ☆

☆ ‌सद्गुरू महिमा ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” ☆

(ॐ  शिव गुरू नारायण – अर्थात् शिव ही गुरु और नारायण स्वरूप हैं)

दोहा-

दोउ कर जोरे नाई सिर, बिनती करौं मैं तोर।

दया दृष्टि नित राखियो, दास भगत मैं तोर।।१।।

 मो पर बाबा दया करो, करिओ  पूरन काज।

सदगुरु महिमा लिख रहा, तुम्हरी कृपा से आज।।२।।

 

चौपाई –

जै जै सदगुरु ज्ञानी दाता।

जो भी सरन तुम्हारी आता।।

श्रद्धा भक्ति से शीश झुकाता।

सुख शांति सब कुछ पा जाता।।

दुखिया दुख में तुम्हें पुकारे।

किन्ह सहाय दुःख सब टारे।।

तुम प्रभु हो करूणा के सागर।

तुम हो राधा के नट नागर।।

शिव स्वरूप मैं तुमको ध्याऊं।

तुम्हारी किर्ती सदा मैं गांऊं।

करत बखान मन नहीं अघाता।

धरत ध्यान सुख शांति पाता।।

ज्योति रूप प्रभु आप अनंता।

गावत चरित भगत सब संता।।

जब छायो मन में अंधियारा।

आरत मन से तुम्हें पुकारा।।

 बिनती सुनि प्रभु आयो धाई।

सब भगतन को कींन्ह सहाई।।

भगतन के सब काज नेवारो।

हनुमत रूप कष्ट सब टारो।।

राम रूप धरि रावण मारा।

कृष्ण रूप में दनुज संहारा।।

शिव बिरंचि ध्यावहि नित ध्याना।

रामकृष्ण सेवहि बिधि नाना।।

तेज अपार बरनि नहिं जाई।

तुम्हारी किर्ति कहां लौं गाई।।

प्रकटी ज्योति हृदय ऊंजियारा।

तुम्हारी महिमा अपरंपारा।।

वेद पुराण नित करत बखाना।

तुम्हरो चरित को अंत न जाना।।

संत जनन भगतन हितकारी।

सुनि लीजै  प्रभु अरज हमारी।।

जन जन काज नर रूप तुम धारे।

 सब भगतन के काज संवारे।।

नर नारी जो महिमा गावहिं।

नाना बिधि सुख संपति पावहिं।।

आत्मानंद करहि नित गाना।

तुम्हारी किर्ति न जाइ बखाना।।

 

दोहा-

पूरन  सदगुरु महिमा भई, भयो मुदित मन आज।

दया-दृष्टि नित राखियो, हे! सतगुरु महराज।।

चरन कमल नित पूज कर, बिनती कर, कर जोरि।

 धन्य भइ मम लेखनी, लिख कर महिमा तोरि।।

 महिमा पढ़त अघात मन, पावत कृपा तुम्हार।।

 सब में तूं ही रम रहा, तूं ही जीवन सार।।

गुरु पिता गुरू मातु है,  गुरू ही सखा सुजान।

गुरु ईश्वर गुरु ज्ञान है, इसको सच तूं मान।।

ॐ  श्री बंगाली बाबाय अर्पणमस्तु

© सूबेदार  पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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