हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 77 ☆ # मुक्ति की नई सुबह # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय एवं भावप्रवण कविता “# मुक्ति की नई सुबह #”) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 77 ☆

☆ # मुक्ति की नई सुबह # ☆ 

इस क्रांति सूर्य  ने

नयी रोशनी लाई है

“बाबा” ने हम सबको

जीने की राह दिखाई है

 

तू तोड़ दें बेड़ियां पावों की

तू मत कर आशा इनसे छावों की

इन्होंने ही तों हमें

सदियों से छला है

हमारा समाज, हर पल

हर दिन जला है

अब हमने इन जंजीरों कों

तोड़ने की कसम खाई है

बाबा ने हम सबको

जीने की राह दिखाई है

 

तू कब से अंधकार में सोया है

तूने सब कुछ इसलिए तो खोया है

तू जाग जा अभी भी वक्त है

माना रास्ते बड़े कठिन

और सख्त हैं

वो पिछड़ गया

जिसने देर लगाई है

बाबा ने हम सबको

जीने की राह दिखाई है

 

तू निर्भीक होकर चला

तो चांद तारे साथ चलेंगे

एक सूर्य क्या पथिक

अनेक सूर्य राह में जलेंगे

रोशनी ही रोशनी होगी

तेरे पथ पर

कांप जायेगी यह कायनात

जब तू सवार होगा रथ पर

तू आवाज बुलंद कर

तेरा रूप देख धरती भी थर्राई है

बाबा ने हम सबको

जीने की राह दिखाई है

 

यह “नीली” रोशनी जब

घर घर में जल जायेगी

आभामंडल में दूर तलक

नयी उमंग, नयी चेतना लायेगी

टुकड़े टुकड़े में बिखरे हुए साथी भी

जब साथ में आ जायेंगे

भटके हुए सभी साथी लोग

जब एक हो हाथ मिलायेगें

तब देखना-

इस नयी सुबह ने,

मुक्ति की नई

ज्योत जलाई है

बाबा ने हम सबको

जीने की राह दिखाई है

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ आधुनिक समाज… ☆ काव्य नंदिनी ☆

 ? आधुनिक समाज… ☆ काव्य नंदिनी ?

इस समाज का कौन सा आकार है?

छोटा ना बड़ा बस सिमटा सा आकार है।

ना कहीं खिली धूप ना कहीं ठंडी छांव है।  

ऐसा लगता है इंसान के कट गए पांव है।

क्या जाने कौन सा पंख लगा और रहा इंसान है

जिसमें ना धैर्य, शिक्षा और संस्कार है

इस समाज का कौन सा आकार है?

 

नारी की बातों का क्या कहना

कभी थी लज्जा शील उनका गहना

अब स्वतंत्रता के नाम पर

तोड़ रही मर्यादा की दीवार है

इस समाज का कौन सा आकार है ?

 

संतान अब वह संतान नहीं

जो अपनों क्या

गैरों का भी करते थे आदर

अब तो प्रतिस्पर्धा में भूल गए

अपने मां-बाप क्या

अपनी जिंदगी के उपकार भी

इस समाज का कौन सा आकार है ?

 

जाने कौन दिशा में जा रहा समाज है

किसी को किसी की सुनाई नहीं देती आवाज है

जिसमें मंजिल की तो तलाश है

लेकिन उस तलाशी का कोई नहीं गवाह है

इस समाज का कौन सा आकार है ?

 

मानव छोटा ना बड़ा बस सिमटा आकार है

इस समाज का कौन सा आकार है ?

 

© काव्य नंदिनी

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 16 (6-10)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #16 (6 – 10) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -16

 

जो बंद घर में आ, दर्पण में छाया सी, भासित हुई अचानक एक नारी।

श्रीराम के पुत्र कुश उससे विस्मित, शयन छोड़ उठ बैठे, बिन कोई तैयारी।।6।।

 

घुस आई तुम घर में धर रूप छाया सा, पर कोई दिखती नहीं योग माया।

योगी तो होते हैं निश्चिंत, निर्भय, मन में तुम्हारे है पर दुख समाया।।7।।

 

हिमाहत कुमुदिनी सी तुम दुखी दिखती, अचानक प्रविश बंद घर में यहाँ पर।

हो कौन तुम? किसकी पत्नी हो? मुझ पत्नी व्रतवान से चाहती क्या हो आकर?।।8।।

 

उसने कहा जिस अयोध्या से ले साथ गये राम बैकुण्ठ, मैं वहाँ की हूँ।

अयोध्या की हूँ मैं अधिष्ठात्री देवी, अनाथिन सी हो, अब जो यों दिख रही हूँ।।9।।

 

जो अधिक संपन्न अलकापुरी से थी, जब राम राजा थे, है वह अब यों सूनी।

तुम सम यशस्वी नृपति के भी होते, है आज निस्तेज वैभव-विहूनी।।10।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 88 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

?  Anonymous Litterateur of Social Media # 88 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 88) ?

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc. in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

हम ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए आदरणीय कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी के “कविता पाठ” का लिंक साझा कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें।

फेसबुक पेज लिंक  >>  कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी का “कविता पाठ” 

? English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 88 ?

☆☆☆☆☆

Shattered Ego…

 

वो मुझसे हारा पर मेरी

पीठ थपथपा के गया

मेरा गुरूर, मेरी जीत

सब मिटा के गया…!

He lost to me but his pat

on my back shattered…

My ego, my victory

to the smithereens…!

☆☆☆☆☆ 

 Split Personality

हर आदमी में होते हैं

दस-बीस आदमी…

जिसको भी देखिये

कई बार देखिये…!!

There are ten-twenty men

inside every man,

Watch carefully whoever

you see, many a time…

☆☆☆☆☆ 

Last Page of the Life

इंतज़ार है मुझे ज़िंदगी के

आखिरी पन्ने का,

सुना है आख़िर में

सब कुछ ठीक हो जाता है…

Just waiting for the

last page of my life,

Heard that in the end

everything becomes fine…!

☆☆☆☆☆

Your fragrance

ये कैसी महक है जो बस

गई है मेरे अहसास में

कोई भी ख़ुशबू लगाऊँ मैं

तो तेरी ही खुशबू आए …

What kind of fragrance is this…

that prevails in my existence

What ever perfume I wear,

Your smell only pervades…!

☆☆☆☆☆

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 88 ☆ नवगीत: करो बुवाई… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा रचित नवगीत: करो बुवाई…।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 88 ☆ 

☆ नवगीत: करो बुवाई… 

खेत गोड़कर

करो बुवाई…

*

ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.

मँहगाई जी-जाल बड़ी है.

सच मुश्किल की आई घड़ी है.

नहीं पीर की कोई जडी है.

अब कोशिश की

हो पहुनाई.

खेत गोड़कर

करो बुवाई…

*

उगा खरपतवार कंटीला.

महका महुआ मदिर नशीला.

हुआ भोथरा कोशिश-कीला.

श्रम से कर धरती को गीला.

मिलकर गले

हँसो सब भाई.

खेत गोड़कर

करो बुवाई…

*

मत अपनी धरती को भूलो.

जड़ें जमीन हों तो नभ छूलो.

स्नेह-‘सलिल’ ले-देकर फूलो.

पेंगें भर-भर झूला झूलो.

घर-घर चैती

पड़े सुनाई.

खेत गोड़कर

करो बुवाई…

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१०-४-२०१०

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 16 (1-5)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #16 (1 – 5) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -16

फिर सात भ्राताओं ने ज्येष्ठ कुश को जो थे गुणी-रत्न, स्वामी बनाया।

क्योंकि ये भ्रातृत्व, रघुकुल प्रथा से था उन सबके तन और मन में समाया।।1।।

 

कृषिकार्य, गजबंध औ सेतु निर्माण, के हेतु सक्षम सभी भाइयों में।

पारंपरिक राज्य सीमाओं को कभी लाँघा नहीं, रह उदधि सम, परिधि में।।2।।

 

उन आठों दानी नृपों से हुआ राम का वंश विस्तृत, सफल और नामी।

जैसे कि मदवाही सुरदिग्गजों का सामवेद उद्भूत था अग्रगामी।।3।।

 

तब मध्य निशि में जग, कुश ने अपने शयन कक्ष में शांत दीपों के जलते।

देखी वियोगिनि अजग नारि को जो थी उस वेश में पति विरह में सी जलते।।4।।

 

उसने खड़े होके उस कुश के आगे, कि जो राज्य-स्वामी थे औ’ बंधुवाले।

तथा जिसने थे शक्र सम शत्रु जीते, के जय-घोष कर नमन हित कर सम्हाले।।5।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आतिश का तरकश #138 – ग़ज़ल-24 – “आजकल मिलते नहीं…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। श्री सुरेश पटवा जी  ‘आतिश’ उपनाम से गज़लें भी लिखते हैं । प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ आतिश का तरकशआज प्रस्तुत है आपकी ग़ज़ल “आजकल मिलते नहीं …”)

? ग़ज़ल # 24 – “आजकल मिलते नहीं …” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ?

पीड़ाएं जितनी मिली खामोश ही सहता रहा हूँ।

सुवह  हँसने  के लिये  रात  भर रोता रहा हूँ।

 

खामोशी मेरी बेहतर कुछ समय ही साथ रही है,

घुटती साँसों के दामन आहों से सीता रहा हूँ।

 

आजकल मिलते नहीं यारों के कंधे उधार में भी,

आदतन मैं अपने दर्द खुद घूँट-घूँट पीता रहा हूँ।

 

ज़िंदगी की तकलीफ़ें जुड़ी रही शुरुआत से ही,

हरेक इंसान कहता मिला हमेशा जीतता रहा हूँ।

 

पूरी ज़िंदगी जुगाड़ने में बहुत मशगूल रहा हूँ,

जीवन चलाने ज़हर ज़िंदगी का पीता रहा हूँ।

 

आतिश चैन की नींद बिस्तर में कभी न आई,

अक्सर तकलीफ़ों के तकिए लगा सोता रहा हूँ।

 

© श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता – युद्ध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – कविता – युद्ध ??

किसीका अहंकार

युद्ध का कारण बना,

अहंकार तोड़ने किसीने

युद्ध का चक्रव्यूह रचा,

 

हथियारों की मंडी

कोई खोल रहा,

विनाश की विभीषिका

कोई बेच रहा,

 

मानवता के समर्थन में,

या मानवता के विरुद्ध,

अपराध से अधिक, अब

व्यापार हो चला है युद्ध..!

©  संजय भारद्वाज

(अपराह्न 1:59 बजे, 15 अप्रैल 2022)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सृजन शब्द – कविता ☆ श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ ☆

श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ 

(साहित्यकार श्रीमति योगिता चौरसिया जी की रचनाएँ प्रतिष्ठित समाचार पत्रों/पत्र पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में सतत प्रकाशित। कई साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय मंच / संस्थाओं से 150 से अधिक पुरस्कारों / सम्मानों से सम्मानित। साहित्य के साथ ही समाजसेवा में भी सेवारत। हम समय समय पर आपकी रचनाएँ अपने प्रबुद्ध पाठकों से साझा करते रहेंगे।)  

☆ सृजन शब्द – कविता ☆ श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ ☆

(विधा-कुण्डलिया)

कविता रचती जब चलूँ, शब्द पिरोती माल ।

भावों को संचित करू, शारद शोभित भाल ।।

शारद शोभित भाल, कृपा बरसा माँ दानी ।

कलम लिखे शुचि सार, बनूँ तब ही संज्ञानी ।।

कहती प्रेमा आज, काव्य रस बनकर सरिता ।

मन में जागे भाव, सृजित होती तब कविता ।।1!!

 

कविता लेखन तब सरल, छंदों का हो ज्ञान ।

नियम सूत्र सब हो पता, लिखे तभी रख ध्यान ।।

लिखे तभी रख ध्यान, जगत की प्यारी बेटी ।

दिखलाती है मर्म, जहाँ में सबसे भेटी ।।

कहती प्रेमा आज, गढ़े जब कोई नविता ।

रहते भाव  प्रधान, सजे तब प्रेमिल कविता ।।2!!

 

कविता मेरी तब सजी, अविरल धार प्रवाह ।

सुंदर मुखड़ा कृष्ण का, काव्य सजाती चाह ।।

काव्य सजाती चाह, योगिता होती  मोहित ।

मोर मुकुट जो शीश, अधर में बंसी शोभित ।।

कहती प्रेमा आज, रहे अंतस जो सविता ।

कर ऊर्जा  निर्माण, लिखूँ शृंगारित कविता ।।3!!

 

© श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ 

मंडला, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा#76 ☆ गजल – ’’झुलसती सी जा रही है…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक भावप्रवण  ग़ज़ल  “झुलसती सी जा रही है…”। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। ) 

☆ काव्य धारा 76 ☆ गजल – झुलसती सी जा रही है…  ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

विश्वका परिदृश्य तेजी से बदलता जा रहा है

समझ पाना कठिन है कि क्या जमाना आ रहा है।

दुनियाँ के हर देश में है त्रस्त जन, शासक निरंकुश

बढ़ रहे संघर्ष दुःखों का अंधेरा छा रहा है।

प्रेम औ’ सद्भाव की दिखती नहीं छाया कहीं भी

तपन के नये तेज से हर एक पथिक घबरा रहा है।

झुलसती सी जा रही है शांति-सुख की कामनायें

बढ़ रहा आतंक का खतरा, सत्त मंडरा रहा है।

भूख प्यास की मार से घुट सा रहा है दम सबों का

लगता है नई आपदाओं का बवण्डर आ रहा है।

तरसते है नयन लखने हरित् सरिता के किनारे

दृश्य पर मरूभूमि का ही देखने में आ रहा है।

बढ़ रहीं है आदमी में राक्षसी नई वृत्तियाँ नित

अपने आप विनाश का सामान मनुज जुटा रहा है।

सूखती दिखती निरन्तर प्रेम की पावन मधुरता

नित ’विदग्ध’ नया प्रबल संदेह बढ़ता जा रहा हैं।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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