(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।)
आज प्रस्तुत है आपकी लॉकडाउन के दौर में पलायन पर आधारित विचारणीय कविताएँ।)
☆ पलायन: कुछ कविताएँ ☆ श्री हरभगवान चावला ☆
दो साल पहले अचानक घोषित लॉकडाउन के बाद जिस तरीक़े से मज़दूरों का पलायन हुआ, वह दिल दहला देने वाला था। कौन मनुष्य होगा जो इस हौलनाक पलायन को देखकर विचलित नहीं हुआ होगा। उसी दौरान लिखी गईं ये कविताएँ प्रस्तुत हैं –
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। श्री सुरेश पटवा जी ‘आतिश’ उपनाम से गज़लें भी लिखते हैं । प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ आतिश का तरकश।आज प्रस्तुत है आपकी ग़ज़ल “इंतज़ार…”।)
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री वीरेंद्र प्रधान जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन (कवि, लघुकथाकार, समीक्षक)। प्रकाशित कृति – कुछ कदम का फासला (काव्य-संकलन), प्रकाशनाधीन कृति – गांव से बड़ा शहर। साहित्यकारों पर केन्द्रित यू-ट्यूब चैनल “प्रधान नामा”का संपादन। )
☆ कविता ☆ तन-मन पर छा जाओ ☆ श्री वीरेंद्र प्रधान ☆
(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित एक भावप्रवण ग़ज़ल “जिनकों हमने था चलना सिखाया…”। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। )
☆ काव्य धारा 75 ☆ गजल – जिनकों हमने था चलना सिखाया… ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
है हवा कुछ जमाने की ऐसी, लोग मन की छुपाने लगे हैं।
दिल में तो बात कुछ और ही है, लब पै कुछ और बताने लगे हैं।
ये जमाने की खूबी नहीं तो और कोई बतायें कि क्या है ?
जिसको छूना भी था पहले मुश्किल, लोग उसमें नहाने लगे हैं।
कौन अपना है या है पराया, दुनियाँ को ये बताना है मुश्किल
जिनको पहले न देखा, न जाना, अब वो अपने कहाने लगे हैं।
जब से उनको है बागों में देखा, फूल सा मकहते मुस्कुराते
रातरानी की खुशबू से मन के दरीचे महमहाने लगे हैं।
बालों की घनघटा को हटा के चाँद ने झुक के मुझकों निहारा
डर से शायद नजर लग न जाये, वे भी नजरें चुराने लगे हैं।
रंग बदलती ’विदग्ध’ ऐसा दुनियाँ कुछ भी कहना समझना है मुश्किल
जिनकों हमने था चलना सिखाया, अब से हमको चलाने लगे हैं।
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं नवरात्रि पर्व पर विशेष “मुक्तक देवी के”। )
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत हैं एक भावप्रवण रचना “फागुन लायो रंग हजार…”। आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे ।
आज प्रस्तुत है आपका एक सार्थक एवं भावप्रवण कविता “मेरा प्यारा गीत गया”.
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 104 ☆
☆ मेरा प्यारा गीत गया ☆
दुख-सुख-प्रत्याहार मिला, लेकिन सब कुछ बीत गया।
कभी धूप ने झुलसाया, कभी लहर-सा शीत गया।।
कुछ हैं नौका खेने वाले, कुछ हैं उसे डुबोने वाले।
कुछ हैं गौर वर्ण मानस के, कुछ हैं कपटी, नकली ,काले।
कुछ की आँखें खुली हुई हैं, कुछ के मुख पर स्वर्णिम ताले।
कभी हार का स्वाद चखा, कभी- कभी मैं जीत गया।।
अनगिन स्वप्न सँजोए हमने, पूरे कभी नहीं होते हैं।
कालचक्र के हाथों खुद ही, फँसे हुए हँसते-रोते हैं।
वीर जागते सीमाओं पर, कुछ तो आलस में सोते हैं।
करूँ सर्जना आशा की, फिर भी मन का मीत गया।।
दर्प, मदों में डूबे हाथी, झूम-झूम कर कुछ चलते हैं।
बनते दुर्ग खुशी में झूमें, ढहते हाथों को मलते हैं।
जिसका खाते, उसी बाँह में, बनकर सर्प सदा पलते हैं।
भूल रहा हूँ मैं हँसकर, रोकर, किन्तु अतीत गया।।
संग्रह हित ही पूरा जीवन, भाग रहा भूखे श्वानों-सा।
ढहता रहा आदमी खुद ही, जर्जर हो गहरी खानों-सा।
कभी आँख ने धोखा खाया, कभी अनसुना कर कानों-सा।
कभी बेसुरे गीत सुना, कभी छोड़ संगीत गया।।
क्रूर नियति से छले गए हैं, सुंदर -सुंदर पुष्प सदा ही।
कभी अश्रु ने वस्त्र भिगोए, और भाग्य का खेल बदा ही।
नग्न बदन अब चलें अप्सरा, प्रश्न उठें अब यदा-कदा ही।