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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल – 46 – Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.) Spirituality is a certain way of being. If you cultivate your body, mind, emotions and energies to a certain level of maturity, something blossoms within you – that is what is spirituality. LifeSkills Courtesy – Shri Jagat Singh Bisht, LifeSkills, Indore ...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – शहर में टहलने का आनन्द – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार शहर में टहलने का आनन्द (प्रस्तुत है  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी का  एक बेहतरीन व्यंग्य। ) उस दिन डॉक्टर को दिखाने गया तो उन्होंने बड़ी देर तक ठोक-बजा कर देखा,फिर बोले, 'आपने अपने इस लाड़ले शरीर को बैठे बैठे खूब खिलाया पिलाया है। अब कुछ टहलना-घूमना, हाथ-पाँव चलाना शुरू कर दीजिए, वरना किसी दिन बिना नोटिस दिये यमराज आपका जीव समेटने के लिए आ जाएंगे।' मेरा फिलहाल दुनिया छोड़ने का मन नहीं था। अभी धंधा उठान पर चल रहा था।घर धन-धान्य से भर रहा था।पत्नी-संतानें प्रसन्न थीं।ऐसे में दुनिया छोड़ना घाटे का सौदा होगा।दुनिया तभी छोड़ना चाहिए जब धंधा मंदी की तरफ चलने लगे और पत्नी-संतानें सदैव मुँह फुलाये रहें। डॉक्टर की बात से घबराकर मैंने सबेरे टहलने के लिए अपनी कमर कस ली।दूसरे दिन सबेरे उठकर दीर्घकाल बाद सूर्य भगवान के दर्शन किये, फिर यह देखने लगा कि मुहल्ले का कौन सरफिरा सबेरे सबेरे घूमने निकलता है ताकि एक से भले दो हो जाएं।जल्दी ही मुझे सामने बैरागी जी दिख गये। बैरागी...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – कोहरे की लफड़ेबाजी – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

जय प्रकाश पाण्डेय कोहरे की लफड़ेबाजी  (प्रस्तुत है श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी  का यह विचारणीय व्यंग्य) गांव की सर्द कोहरे वाली सुबह में बाबू फूंक फूंक कर चाय पी रहा था और उधर गांव भर में हल्ला मच गया कि कोहरे के चक्कर में गंगू की बहू बदल गई। शादी के बाद बिदा हुई और चार रात बाद अब जाके शर्माते हुए गंगू ने ये बात अपने बाबू को बतायी। बाबू सुनके दंग रह गए बाबू को याद आया कोहरे के चक्कर में सब गाड़ियां बीस - बाईस घंटे लेट चल रहीं थीं कई रद्द हो गई थीं स्टेशन पर धकापेल भीड़ और आठ - दस बरातों के बराती....... भड़भड़ा के गाड़ी आ गई थी तो जनरल बोगी में रेलमपेल भीड़ के रेले में घूंघट काढ़े तीन चार बहूएं भीड़ में फंस गई और गाड़ी चल दी, दौड़ कर गंगू बहू को पकड़ कर शौचालय के पास बैठा दिया और खुद बाबू के पास बैठ गया। चार स्टेशन के बाद गंगू की बारात...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – अब हम सब रिजर्व – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव अब हम सब रिजर्व (प्रस्तुत है श्री विवेक  रंजन  श्रीवास्तव जी  का  एक सामयिक , सटीक एवं सार्थक व्यंग्य।) रिजर्वेशन से अपना पहला परिचय तब हुआ था जब हम बहुत छोटे थे और ट्रेन की टिकिट पुट्ठे की, सच्ची की टिकिट की तरह की छोटी सी टिकिट ही होती थी.  मेरे जैसे सहेजू बच्चे सफर के बाद उसका संग्रह किया करते थे. यात्रा की तारीख उस टिकिट पर पंच करके बिना स्याही के केवल इंप्रेशन से अंकित की जाती थी.  पहले टिकिट विंडो से खरीदी गई  फिर काले कोट वाले टी सी साहब को वह दिखाकर पापा ने बर्थ रिजर्व करवाई थी. और हम लोग बड़े ठाठ से आरक्षित डब्बे में अपनी आरक्षित सीट पर सफर के लिये बैठे थे. वैसे जब मेरी बड़ी भांजी छोटी  सी थी तो, उसे हर बच्चे की तरह नानी मामा के पास बहुत अच्छा लगता था, जब भी वह कोई शैतानी करती तो मेरी माँ  उसे डराने के लिये मुझसे कहती कि इसका रिजर्वेशन करवाओ, वापसी का...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – मेरे घर विश्व हिन्दी सम्मेलन  – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव  मेरे घर विश्व हिन्दी सम्मेलन  (विश्व हिन्दी दिवस 2018 पर विशेष) (श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी का e-abhivyakti में स्वागत है। प्रस्तुत है श्री विवेक जी का विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसे आयोजनों  पर एक सार्थक व्यंग्य।) इन दिनो मेरा घर ग्लोबल विलेज की इकाई है. बड़े बेटी दामाद दुबई से आये हुये हैं , छोटी बेटी लंदन से और बेटा न्यूयार्क से. मेरे पिताजी अपने आजादी से पहले और बाद के अनुभवो के तथा अपनी लिखी २७ किताबो के साथ हैं . मेरी सुगढ़ पत्नी जिसने हिन्दी माध्यम की सरस्वती शाला के पक्ष में  मेरे तमाम तर्को को दरकिनार कर बच्चो की शिक्षा कांवेंट स्कूलों से करवाई  है, बच्चो की सफलता पर गर्वित रहती है. पत्नी का उसके पिता और मेरे श्वसुर जी के महाकाव्य की स्मृतियो को नमन करते हुये अपने हिन्दी अतीत और अंग्रेजी के बूते दुनियां में सफल अपने बच्चो के वर्तमान पर घमण्ड अस्वाभाविक नही है.  मैं अपने बब्बा जी के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सेदारी की...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – आंख है भरी भरी – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

जय प्रकाश पाण्डेय आंख है भरी भरी (श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी यह व्यंग्य  आपको  आँख मारने की कला  एवं  बीमारी  के परिणाम और दुष्परिणाम  दोनों की तह तक ले जाएंगे । ) गंगू बेचारा पोस्ट आफिस के काउंटर की लाइन में चुपचाप खड़ा है एक घंटे से। गंगाजल की बोतल खरीदने आया है। अचानक एसडीएम साहब की सुंदर सी बीबी बिना लाइन में लगे, काउंटर पर हाथ डाल देती है, एक घंटे से लाइन में लगे गंगू का नंबर आया और ये सुंदर सी महिला ने  लाइन में लगे गंगू का हाथ बाहर कर अपना हाथ डाल दिया। गंगू ने गुस्से से देखा तो आंख फड़क गई, महिला और उसके साथ आये गार्ड को लगा कि गंगू ने जानबूझकर आंख मारी है। मामला गड़बड़ा गया, महिला ने पति को फोन कर दिया और आंख मारने की बात बता दी। पति एसडीएम था अहंकार से चूर तुरंत पुलिस फोर्स भिजवा दी। इस देश में यही खराबी है कोई बड़ा आदमी आंख मार देता है...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – मन तेरा प्यासा – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय मन तेरा प्यासा रिमझिम रिमझिम बरसात हो रही है,फिर भी प्यास लगी है। गर्मागर्म पकोड़े बन रहे हैं , और बेरोजगारों की प्यास बढ़ती जा रही है।  श्रीमती जी मोबाइल से  ये गाना बार बार सुना रही है......... "रिमझिम बरसे बादरवा, मस्त हवाएं आयीं, पिया घर आजा.. आजा.. " बार बार फोन आने से गंगू नाराज होकर बोला - देखो  श्रीमती जी अभी डिस्टर्ब नहीं करो बड़ी मुश्किल से गोटी बैठ पायी है। अभी गेटवे आफ इण्डिया में समंदर के किनारे की मस्त हवाओं का मजा लूट रहे हैं, तुम बार बार मोबाइल पर ये गाना सुनवा कर डिस्टर्ब कर रही हो ,........ यहां तो और अच्छी सुहावनी रिमझिम बरसात चल रही है और मस्त हवाएं आ रहीं हैं और जा रहीं हैं। फेसबुक फ्रेंड मनमोहनी के साथ रिमझिम फुहारों का मजा आ रहा है। भागवान चुपचाप सो जाओ.. इसी में हमारी और तुम्हारी भलाई है, नहीं तो लिव इन रिलेशनशिप के लिए ताजमहल होटल सामने खड़ी है... अब बोलो क्या...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – पोथी पढ़ि पढ़ि : ढ़ाई से तीन होते अक्षर – श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन  पोथी पढ़ि पढ़ि : ढ़ाई से तीन होते अक्षर (प्रस्तुत है श्री शांतिलाल जैन जी का नवीन व्यंग्य जिसमें सभ्यता के विकास  के नवीनतम दौर में युवा डेटिंग के तीन अक्षर पढ़कर पंडित हो रही बिंदास और बेफ़िक्र युवा  पीढ़ी की विचारधारा को परत दर परत उघाड़ा है। ) ये सभ्यता के विकास का नवीनतम दौर है जिसमें युवा डेटिंग के तीन अक्षर पढ़कर पंडित हो रहे हैं – बिंदास और बेफ़िक्र “अंकल मैं परसों नहीं आ पाऊंगा. मेरी डेट है.” “रविवार को कौनसी कोरट कचहरी खुली रहती है जो तुम्हारी डेट है ?” “वो नहीं अंकल – लव वाली डेट. आई ऐम गोइंग ऑन डेट विथ माय न्यू डेट.” – भतीजे आर्यन का ये कथन यमक अलंकार का अंग्रेजी प्रयोग नहीं है श्रीमान. यहाँ पहला डेट शब्द रोमांस के लिए प्रयोग किया गया है और दूसरा श्रेया के लिए. मैंने कहा – “अगले रविवार को चले जाना. घर में सत्यनारायण की कथा रखी है और तुम नहीं आओगे ?” “नहीं ना अंकल. बड़ी मुश्किल से श्रेया...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – कचरा बड़े काम की चीज  – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय कचरा बड़े काम की चीज  एक समय गंगा तीरे व्यंग्य - कुम्भ की एक मढ़ैया के पास कचरे का ढेर लग गया। मढ़ैयाधारी संत पुराण पढ़ रहे थे और सूत जी सुन रहे थे, अचानक कचरे में बम की खबर से सब भागने लगे और चारों तरफ हवा में अफवाह फैल गई...." कचरे में बम बम.... । खबर सुनकर कुछ नागा बाबा गा - गा कर नाचने लगे............ " सिर्फ़ तुम्हारे हैं हम, सह लेंगे सारे गम, चाहे कचरे का बम, " श्री सूत जी बाहर धूनी जमाकर बैठ गए। कचरे की लकड़ियों को धो-पौंछकर धूनी जलने लगी। कचरे में बम बम करते अघोरी बाबा लोग कचरे में बैठकर चिलम का मजा लेने लगे, कुछ अघोरी उसी कचरे को जलाकर मांस भूनने लगे जब मांस मदिरा पेट में चली गई तो धूनी की राख तन में मली गई शरीर के बाल कचरे में बम बम करते दिखे तो राम रहीम और आशा बापू याद आ गये। सब मस्ती से बैठ गए तो सूत...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – जीडीपी आगे नागरिक पीछे – श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन  जीडीपी आगे नागरिक पीछे (प्रस्तुत है श्री शांतिलाल जैन जी का व्यंग्य  जीडीपी आगे नागरिक पीछे आपको जीडीपी की सांख्यिकीय  बाजीगरी के खेल और साधारण नागरिक की व्यथा पर विचार करने के लिए अवश्य मजबूर कर देगा।) अश्विन एक नंबर से फेल हो गया. आधे नंबर का सवाल गलत हुआ और आधा नंबर माइनस मार्किंग में चला गया. नौकरी में भर्ती की प्रतियोगितात्मक परीक्षा. सीधा, सिंपल, स्ट्रेट जीके का सवाल. तीसरी तिमाही में भारत की जीडीपी दर कितनी थी ?सुबह के अखबारों में 6.8  प्रतिशत थी. परीक्षा देकर बाहर निकला तब तक दोपहर के अख़बारों में 7.2 प्रतिशत बताई गई थी. कॉपी चेक हुई उस दिन 9.7 प्रतिशत का आंकड़ा सामने आया. वही समयकाल, वही सांख्यिकी संस्थान, वही अर्थशास्त्री.मीडिया भी वही, श्रेय लेने वाला जननायक भी वही मगर आंकड़ा बदल गया. जीडीपी की गुगली से अश्विन अकेला आउट नहीं है – आप भी तो हैं. देश चीन से आगे निकल गया और आप हैं कि पान की गुमटी से आगे नहीं...
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