हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 586 ⇒ पुण्य का कारोबार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पुण्य का कारोबार।)

?अभी अभी # 586 ⇒ पुण्य का कारोबार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

राम नाम के साथ अगर पुण्य की भी लूट लगी हो तो क्या यह सोने में सुहागा नहीं। क्या आप दान और पुण्य को अलग कर सकते हैं। दान से ही तो पुण्य कमाया जाता है। कलयुग नाम अधारा तो यक़ीनन है ही लेकिन इसके साथ साथ दान पुण्य का कारोबार भी चलता रहना चाहिए।

१४४ वर्ष बाद एक ऐसा महा अवसर आया है, जहां कम से कम ४० करोड़ श्रद्धालु महाकुंभ में स्नान कर महा पुण्य के भागी बनेंगे। बिना दान के पुण्य नहीं कमाया जाता। आप यूं भी कह सकते हैं, बिना दान के पुण्य का कारोबार नहीं चलता। अगर आप यजमान हो तो भी दान करेंगे और अगर आप सरकार हो, तब भी सभी संत और श्रद्धालुजन को सभी तरह की सुविधा प्रदान करेंगे। पुण्य में लाभ ही होता है, कभी नुकसान नहीं होता, इसीलिए दान दिया जाता है, और बदले में पुण्य स्वत: ही अर्जित हो जाता है।।

जब कोई धार्मिक महोत्सव होता है तो उसका प्रचार प्रसार भी होता है और बाजार की निगाहें भी उधर उठ ही जाती है। जहां मंदिर है, वहां आसपास दुकानें भी होंगी और बाजार भी। आखिर हर व्यक्ति कुछ कमा ही रहा है। धर्म की कमाई ही पुण्य की कमाई कहलाती है।

इस महाकुंभ में तो बस कमाई ही कमाई है। जो मूरख इस महाकुंभ में धर्मलाभ ले, अमृत स्नान का पुण्य नहीं लूटता, वह तो अभागा ही हुआ।

महाकुंभ इस कलयुग की एक महा इवेंट है। क्या साधु संत, गृहस्थ और कारोबारी, सभी इसका पुण्य लाभ लेना चाहते हैं, अपने तन, मन और धन के योगदान से इसका हिस्सा बनना चाहते हैं।

फूल खिलेगा तो महकेगा और जहां सेवा और दान पुण्य होगा, वहां उसका नाम भी होगा। फिर ऐसे अवसर पर अडानी हों अथवा इस्कॉन, क्या देसी और क्या विदेशी सभी अपनी मार्केटिंग प्रतिभा के साथ पुण्य के इस अखाड़े में कूद पड़े हैं।।

ऐसे में मीडिया और सोशल मीडिया भी क्यों न बहती गंगा में पुण्य की डुबकी मार ही ले। इतने भव्य और दिव्य आयोजन की मनोरम छवि छन छनकर उन करोड़ों श्रद्धालुओं को भी लाभान्वित कर रही है, जो किसी कारण इस महाकुंभ का हिस्सा नहीं बन सके।

जहां बाबा होंगे, वहां योग साधना भी होगी और चमत्कार भी होंगे। एक आयआयटीअन अभय सिंग साधु क्या बन गए, मीडिया में बुरी तरह वायरल हो गए। अगर पढ़े लिखे प्रभावित हो गए तो स्थापित बाबा उनसे नाराज हो गए। हमारे अखाड़े में तुम्हारा क्या काम है।।

डर है कहीं आयआयटी और आयआयएम भी भविष्य में इंजीनियर और प्रबंधन की जगह बाबा बनने की ट्रेनिंग नहीं देने लग जाए। जो भी हो, जितना बन सके, इस अवसर पर जितना पुण्य लूट सकें, लूटें। आखिर सरकार भी तो इस महाकुंभ से कम से कम दो लाख करोड़ कूटने जा रही है। इसे कहते हैं, सफल धार्मिक प्रबंधन के साथ साथ पुण्य लाभ भी।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 229 ☆ इस राह के राही अनेक… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “इस राह के राही अनेक। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 229 ☆ इस राह के राही अनेक…

बहुत से लोगों की आदत  काम को टालने की होती है, वे अपने कार्यों के प्रति उत्तरदायी नहीं होते, बस परिणाम शत प्रतिशत चाहिए, सोचिए ऐसा कैसे होगा? जब तक हम पल- पल का सदुपयोग नहीं करेंगे तब तक ऐसा ही चलता रहेगा। जहाँ वर्तमान को गुरु मानकर जीवन जीने वाले हमेशा सफलता का परचम फहराते हैं तो वहीं दूसरी ओर कल पर टालने की आदत आपको असफल बना कर कहीं का नहीं छोड़ती। कारण साफ है जब कल आता ही हीं तो आपको उसका लाभ कैसे मिल सकता है।

जिस प्रकार से अच्छे कार्य हमेशा सुखद परिणाम देते हैं वैसे ही यदि हम सतत सक्रिय रहे तो निश्चय ही परिणाम आशानुरूप होगा। वक्त रेत के ढेर की तरह फिसलता जा रहा है,  कर्मयोगी तो इसे अपने वश में कर लेते हैं परन्तु जो कुछ नहीं करते वे दूसरों के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप करने में ही समय व्यतीत करते रह जाते हैं। इस दुनिया में सबसे मूल्यवान समय  है, वही आपको रंक से राजा बनाएगा।आप जिस भी क्षेत्र में कार्य करते हों  वहाँ पर ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वाहन करें यदि वो भी न बनें तो कम से कम आलोचक न बनें क्योंकि निंदक नियरे राखिए आज भी प्रासंगिक है पर वो  सार्थक तभी होगा जब निंदक ज्ञानी हो, उसमें निःस्वार्थ का भाव हो, सच्चा निंदक ही मार्गदर्शक का कार्य करता है।

वर्तमान कब भूत में बदल जाता है पता  नहीं चलता पर अभी भी बहुत से लोग पुराना राग अलाप रहे हैं, आज के तकनीकी युग में जब हर पल स्टेटस व डी पी बदली जा रही है तब व्यवहार कैसे न बदले पर कुछ भी हो नेकी व सच्चाई नहीं छोड़नी चाहिए  हम सबको अपने कर्तव्यों के प्रति जागरुक रहना चाहिए।

तेजी से बदलती दुनिया में कुछ भी तय नहीं रह सकता …

कल के ही अखबार आज नहीं चलते ये बात  सुविचार की दृष्टि से, प्रतियोगी परीक्षार्थी  की दृष्टि से तो सही है परन्तु व्यवहार यदि पल- पल बदले तो उचित नहीं कहा जा सकता है।

खैर जिसको जो राह सही लगती है वो उसी पर चल पड़ता है कुछ ठोकर खा कर संभल जाते हैं, कुछ दोषारोपण करके अलग राह पर चल पड़ते हैं।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 585 ⇒ गोदान और भूदान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गोदान और भूदान।)

?अभी अभी # 584 ⇒ गोदान और भूदान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दान तो खैर दान होता है, फिर भले ही वह गोदान हो अथवा भूदान। दान का शाब्दिक अर्थ है – ‘देने की क्रिया’। सभी धर्मों में सुपात्र को दान देना परम् कर्तव्य माना गया है। हिन्दू धर्म में दान की बहुत महिमा बतायी गयी है। आधुनिक सन्दर्भों में दान का अर्थ किसी जरूरतमन्द को सहायता के रूप में कुछ देना है।

यह भी सच है कि भूदान जैसा कोई यज्ञ अथवा आन्दोलन गोदान के लिए नहीं चला लेकिन एक समय था जब हमारे देश में गोधन ही सर्वश्रेष्ठ धन माना जाता था और दान अथवा दहेज में गायों की ही प्राथमिकता होती थी।

इस सृष्टि में एक ही नंद हुए हैं और एक ही गोपाल।।

कहते हैं, द्वापर काल में नंद बाबा के पास सबसे अधिक ८४ लाख गायें थीं। जहां घी दूध की नदियां बहेंगी, वहीं तो माखनचोर नंदलाल पैदा होंगे। कलयुग में तो हमें सब ओर चारा चोर और चंदा चोर ही नज़र आएंगे, चित चोर नहीं।

हमने बचपन में सिर्फ गाय पर निबंध लिखा है और मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास गोदान भर पढ़ा है। साबरमती के संत की तरह ही एक और संत पैदा हुए हैं, आचार्य विनोबा भावे, जिन्होंने भूदान आंदोलन की नींव डाली। पहले भूमिहीन को भूमि तो मिल जाए, गऊ सेवा तो बाद में भी हो जाएगी। हमारा समाज सिर्फ आदर्श की बात करता है। गांधीजी का चरखा हो अथवा विनोबा भावे का भूदान आंदोलन, व्यावहारिक रूप से ना तो सफल हो पाया और ना ही तत्कालीन नेतृत्व में ऐसे आदर्श के प्रति कोई निष्ठा अथवा पॉलिटिकल विल ही देखी गई। ।

आज भूदान का स्थान भू माफिया ने ले लिया है। जर, जोरू और जमीन के विवाद से क्या हम कभी ऊपर उठ पाए। फिर भी इस वातावरण में अगर हम बुरा देखने जाएंगे, तो कबीर की भाषा में, अपने आप से बुरा हमें कोई नहीं मिलेगा क्योंकि अच्छाई कभी नहीं मरती। सड़कों से आवारा पशु की तरह घूमता गो धन फिर से गौशालाओं में सम्मानपूर्वक स्थान पा रहा है। लगता है, खोई गैया को फिर से उसका गोपाल मिल गया है।

लोग मंदिर, अस्पताल, गौशाला और ओल्ड एज होम्स के लिए मुक्त हस्त से दान कर रहे हैं, कितनी पारमार्थिक संस्थाएं और एनजीओ’ज़ देश के आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए एकजुट हैं, पहले राम मंदिर और अब प्रयाग राज का महाकुंभ इसका जीता जागता उदाहरण है।

नेक इरादे और शुभ संकल्प कभी मरते नहीं। समाज में बुराई अगर आटे में नमक जितनी हो, तो चलेगा, लेकिन अगर नमक में आटा मिला हो, तो फिर तो सबका रामजी भला करे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 584 ⇒ शौकीन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शौकीन।)

?अभी अभी # 584 ⇒ शौकीन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ लोग मीठे के शौकीन होते हैं, कुछ नमकीन के ! सन् १९८१ में बसु चटर्जी की एक फिल्म आई थी शौकीन, जिसमें उत्पल दत्त, अशोक कुमार, रति अग्निहोत्री और मिथुन चक्रवर्ती जैसे मंजे हुए कलाकार थे। ऋषिकेश मुखर्जी और बसु चटर्जी अक्सर पारिवारिक हल्की फुल्की, मनोरंजक स्वस्थ फिल्में बनाते हैं। मैं यह फिल्म नहीं देख पाया। मैं तब सठियाया नहीं था, फिर भी सठियाए लोगों की उल्टी सीधी हरकतें मुझे न तब पसंद थी, न आज हैं।

पसंद अपनी अपनी, खयाल अपना अपना की तरह ही लोगों के अपने अपने शौक होते हैं। अच्छी आदत को शौक समझा जाता है और बुरी आदत को लत। आदत और तबीयत में बड़ा महीन फर्क होता है। जो शौकीन तबीयत के लोग होते हैं उनमें से कुछ केवल पान का शौक रखते हैं तो कुछ के अन्य शौकों में पान भी शामिल होता है। वैसे पान का शौक संगीत रसिकों और भोजन प्रिय लोगों को भी होता है। पान खाएं सैंया हमार। ।

कहते हैं, समय बड़ा कीमती होता है। फिर भी हर व्यक्ति अपने कीमती समय में से कुछ समय अपने शौक के लिए निकाल ही लेता है। इसे अंग्रेजी में hobby हॉबी कहते हैं। सेलिब्रिटीज और विशिष्ट व्यक्तियों से यह सवाल अवश्य पूछा जाता है, आप फुर्सत के वक्त में क्या करते हैं। जब से लोगों के हाथ में मोबाइल आया है, फुर्सत के कीमती पल, पलक झपकते ही निकल जाते हैं।

शौक का संबंध रुचि से होता है। सुरुचि से सृजन होता है। शौक जब passion बन जाता है तब कलाकार मुखर हो उठता है। कलम और कूची रंग लाती है। पेशे और शौक में बड़ा अंतर होता है। पेशा अगर पैसा देखता है तो शौक सिर्फ जुनून और मस्ती देखता है। ।

कुछ लोगों को खतरों से खेलने का शौक होता है। यह खतरा अगर रोमांच अथवा एडवेंचर तक सीमित है, तो ठीक, लेकिन अगर यह जीवन को एक विपरीत अथवा नकारात्मक दिशा की ओर ले जा रहा है, तो यह एक खतरे का संकेत है। ऐसे शौक से तौबा, ऐसे खतरे से बचना और किसी को बचाना ही बेहतर।

जीवन में अरुचि ना हो। रुचि टेस्ट को कहते हैं। आप इसे जीवन मूल्य भी कह सकते हैं। सुरुचि, रस, मिठास, कोमलता एवं सहजता कुछ ऐसे गुण हैं, जो शौक से आजमाए जा सकते हैं। अच्छा खाएं, अच्छा पहनें, अच्छा बोलें। अपने शौक़ को एक दिशा दें, हो सकता है, वह आपकी दशा बदल दे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 583 ⇒ संकल्पों का संविधान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संकल्पों का संविधान।)

?अभी अभी # 583 ⇒ संकल्पों का संविधान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

नया वर्ष, नया संकल्प, जितने वर्ष, उतने संकल्प। संकल्प के प्रति इतनी निष्ठा, मानो संकल्प नहीं संविधान हो। संकल्प और संविधान में कोई अंतर ही नहीं रह गया। आम आदमी संकल्प और संविधान दोनों से अनजान होता है। शायद अब उसे बाइबल और रामायण की तरह संविधान का भी पाठ करना पड़े। जागो, नागरिक जागो।

मेरी और संविधान की उम्र लगभग बराबर ही है। हिंदी में कहें तो ” मैं भी ७५ भाग रहा हूं। ” (I am also running 75 .)

संकल्प को तोड़ने की संविधान में कोई सजा नहीं है, लेकिन संविधान का पालन अनिवार्य है। संविधान में अगर कर्तव्य है तो अधिकार भी। संकल्प में केवल आपका विवेक काम करता है, शुभ संकल्प से बड़ा कोई नव वर्ष का उपहार नहीं।।

वैसे तो संकल्प विकल्प मन ही करता है, लेकिन संकल्प मन की लगाम को कसने का एक स्थूल प्रयास है। मन के घोड़े बड़े चंचल होते हैं, और वे किसी चाबुक अथवा लगाम के गुलाम नहीं। यह निर्मोही मन खुद ही हमें मोह के जाल में फांस लेता है और संकल्प की काट, कोई ना कोई सुविधाजनक विकल्प ढूंढ ही लेता है।

आत्मा की तरह मन भी शरीर में कहीं दिखाई नहीं देता। नित्य, शुद्ध और अजर अमर होते हुए भी, जिस तरह जीव के संपर्क में आकर यह जीवात्मा हो जाती है, ठीक उसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ और मोह के संस्कारों में पड़कर हमारा शुद्ध और पवित्र मन भी मैला हो जाता हैं।।

घर की मैली चादर तो फिर भी आसानी से धोई, सुखाई जा सकती है, लेकिन मन का मैल साफ करने का कोई सर्फ अथवा डिटर्जेंट अभी ईजाद नहीं हुआ। बस दही की तरह मन को मथकर पहले मक्खन और बाद में उसे तपाकर ही शुद्ध चित्त वाला घी प्राप्त हो सकता है। मन को मथना और फिर उसे तपाना ही तो शुभ संकल्प का विधान है।

जिस तरह बूंद बूंद से घड़ा भरता है, उसी तरह छोटे छोटे संकल्पों से ही मन रूपी दैत्य पर काबू किया जा सकता है। संकल्प का कोई पल नहीं होता, कोई शुभ मुहूर्त नहीं होता।।

जिस तरह संविधान में अनुच्छेद होते हैं और संविधान की आत्मा को चोट पहुंचाए बिना भी समय और परिस्थिति अनुसार उसमें संशोधन किया जा सकता है, ठीक उसी प्रकार संकल्पों में भी विकल्पों का प्रावधान भी है। आपने एक जनवरी को ही संकल्प ले लिया कि आज से पूरे वर्ष सुबह ठंडे पानी से स्नान करूंगा, लेकिन अगर दो रोज बाद ही अगर जुकाम और बुखार आ जाए, तो संकल्प में भी संशोधन का विधान है। आपातस्थिति में गर्म पानी से भी स्नान किया जा सकता है।

कहीं कहीं तो संकल्पों में भी मध्यम मार्ग ढूंढ लिया जाता हैं, यह चित्त ही कई अगर और मगर लगा लिया करता है। कुछ लोग प्रवास के दौरान सभी संकल्प त्याग देते हैं, तो कुछ लोग विवाह जैसे मंगल कार्य के लिए अपने आपको संकल्प मुक्त कर देते हैं। इस तरह संकल्प के संविधान के सभी अनुच्छेदों में आपको छेद ही भले ही मिल जाएं, लेकिन फिर भी वे कभी संकल्पों की आत्मा के साथ खिलवाड़ नहीं करते। जिस तरह पंडित जी जल के आचमन के साथ कुछ संकल्प लेने को कहते हैं, वे स्वत: ही जल के साथ, आपात धर्म के दौरान, लिया हुआ संकल्प भी छोड़ देते हैं। आखिर संकल्प भी हमारे मन की खेती ही तो है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 116 – देश-परदेश – ठंड बहुत है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 116 ☆ देश-परदेश – ठंड बहुत है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

इन शब्दों के उपयोग से हम अपनी लेट लतीफी पर पर्दा डालने का कार्य करते हैं। मौसम को हथियार बनाना सब से आसान जो होता हैं।

कुछ दिन पूर्व जयपुर से दिल्ली प्रातः काल टैक्सी से यात्रा करनी थी। जयपुर से जाने वाले वर्तमान में परिचितों के लिए मिठाई के स्थान पर विश्व प्रसिद्ध कचौरी चाहे प्याज,कोटा या दाल वाली को ही प्राथमिकता देते हैं। मेजबान भी मीठे के नाम से परहेज करते हैं।

घर के पास के कचौरी निर्माता को फोन पर जानकारी प्राप्त की कितने बजे कचौरी उपलब्ध हो जाएगी। उसने साढ़े सात पर सभी वैरायटी की गारंटी ली। सुबह जब आठ बजे उसके यहां पहुंचे तो बोला अभी तो आधा घंटा और लगेगा। उसने भी ठंड का हवाला दे कर हमारे गुस्से को ठंडा कर दिया। हमने भी तर्क दिया क्या ठंड अचानक आ गई है ? वो हंसते हुए बोला इतनी देरी तो स्वाभाविक हैं। रात को दुकान बंद करने के समय बहुत देरी हो जाती हैं। आजकल लोग निशाचर हो गए हैं। स्विगी वाले “कचोरीखोरों” को रात्रि ग्यारह बजे तक घर पहुंच सेवा देने में तत्पर रहते हैं। आप जैसे बुजुर्ग ही सुबह सुबह हमारी दुकान पर आकर बहस कर दिमाग खाते हैं।

हमारी समझ में आ गया, इसे अवश्य बस कंडक्टर और सेवानिवृत आई ए एस के थप्पड़/ झगड़े वाली कहानी की जानकारी होगी। हम भी आधे घंटे तक इंतजार कर कचौरी ले कर आ गए। अब ठंड बहुत बढ़ गई, मोबाइल पर उंगलियां नहीं चल रहीं हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 582 ⇒ बैंड बाजा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बैंड बाजा।)

?अभी अभी # 582 ⇒ बैंड बाजा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बैंड बाजा और बैंड बजने में ज़मीन आसमान का अंतर है! हम आज उस बैंड की बात करने जा रहे हैं, जिसे बच्चे बाजा कहते हैं, और जिसके बिना बारात नहीं निकलती।

किसी भी बैंड बाजे की सबसे बड़ी खूबी होती है, बैंड वालों की यूनिफॉर्म, जो अक्सर लाल, पीली, नीली, और फौजी रंग की होती है। हर इंसान की ऊंच – नीच को, रंग -रूप और जात पात को अगर कोई मिटा सकता है, तो वह है यूनिफॉर्म। यूनिफॉर्म को वर्दी भी कह सकते हैं। वर्दी ही इंसान को अगर एक पुलिस वाला बनाती है, तो वर्दी ही उसे एक फौजी भी बनाती है। वर्दी में अनुशासन है। वर्दी का रंग एक है, अमीर क्या, गरीब क्या।।

बाजा, एक बहुत पुराना वाद्य है ! बैंड का इतिहास अंग्रेज़ो के ज़माने से जुड़ा है। पुराने समय में भी जब विजय घोष होता था, ढोल धमाका होता था, विवाह की शहनाइयां बजती थीं, नगाड़े बजाएं जाते थे। मंगलगान गाए जाते थे। पुष्पहारों से स्वागत किया जाता था।

कोई भी शहर, गांव, कस्बा हो, शुभ कार्य पर, भजन कीर्तन, सुन्दरकाण्ड पर, ढोलक की आवाज़ अवश्य गूंजती थी। लोक गीत, विवाह गीत भी कहीं बिना ढोलक के गाए जाते हैं। शादी पर अगर बैंड बाजा न हो, तो बारात वापस चली जाती है। तीन चार महीने पहले से बैंड बाजे की बुकिंग करनी पड़ती है। ढोलची तो फिर भी कम समय में उपलब्ध हो जाता है।।

मेरे शहर के व्यस्त खजूरी बाज़ार में कभी इनकी दुकानें हुआ करती थी, जहां बैंड वाले प्रैक्टिस के रूप में धुन निकाला करते थे। इनके नाम भी कुछ अजीब ही होते थे। मालवा दरबार बैंड, नौशाद बैंड, गंभीर बैंड, के अलावा भी अन्य कई तरह के बैंड अनंत चतुर्दशी के उत्सव में देखे जा सकते थे।

15 अगस्त और 26 जनवरी की परेड के वक्त मिलिट्री बैंड की धुन हम सन 1947 से सुनते आ रहे हैं। याद कीजिए मन्ना डे का वह देशभक्ति पूर्ण गीत ;

बिगुल बज रहा आजादी का

गगन गूंजता नारों से

कहनी है यह बात मुझे

देश के पहरेदारों से

संभल के रहना

अपने घर के

छुपे हुए गद्दारों से।।

बात वही, लेकिन कितने सालों पहले, कितनी खूबसूरती से कही ! बिगुल से याद आया, हां, तो हम बैंड बाजे की बात कर रहे थे। किसी भी व्यक्तियों के समूह को भी बैंड कहते हैं। चूंकि बैंड बैठकर नहीं बजाया जाता, इसलिए इनके वाद्य देसी नहीं होते। एक बैंड मास्टर होता है, जो पहले क्लारेनेट से धुन निकालता है, फिर वन, टू, थ्री के बाद बाजा शुरू हो जाता है। कम से कम पंद्रह की संख्या एक बैंड का रूप ले लेती है। छोटे मोटे बिगुल और बड़े बड़े ढोल, बिना ड्रम, ट्रम्पेट और ढपली के भी कहीं बैंड बजा है।

एच एम वी के भोंगे की तरह थोथा सूंड जैसा भोंगा, और बड़े बड़े ढोल। सिर्फ फूंक मारने और ठोकने के लिए ही होते हैं, उनसे कोई धुन नहीं निकाली जा सकती। किसी एक ऊंघते हुए इंसान के हाथों में बड़ा सा झुनझुना टाइप वाद्य पकड़ा दिया जाता है, लेकिन बैंड की शान वे ही लोग होते हैं।।

क्या दिन थे वे भी ! बारात के साथ गैस बत्ती वाले पेट्रोमेक्स सर पर उठाकर चलने वाले मजदूर, बारात को रोशन किया करते थे, और नशे में झूमते हुए बाराती नाचते वक्त जब एक एक, दो दो के नोट न्यौछावर करते थे, तो बेचारे बैंड वाले उन्हें या तो हाथ से छीना करते थे, या ज़मीन से उठा लिया करते थे।

कुछ उद्दंड किस्म के लंबे लफंगे, अपना हाथ इतना ऊंचा कर लेते थे, कि बेचारा बाजे वाला, उनके हाथ तक नहीं पहुंच पाता था। एक पैशाचिक संतुष्टि के पश्चात ही वह नोट का टुकड़ा, बाजे वाले के हाथ में सौंपता था।

आज बारात अत्याधुनिक हो गई है, और बैंड बाजे भी। एक बड़ी कार में कुछ गायक कान फाड़ू डी जे के उपकरणों के साथ विराजमान हो जाते हैं, सबसे पीछे एक डीजल का जेनरेटर आवाज़ करता हुआ, और प्रदूषण फैलाता हुआ चलता है, तो ट्यूब लाइट और चमचमाती झालरों के बीच कुछ बैंड वाले आगे आगे चलते हैं, और उनके पीछे पूरी बारात। बारात को पूरी रात छोटी पड़ती है, सड़क पर नाचने, आतिशबाजी छोड़ने और शोर प्रदूषण फैलाने के लिए।।

प्याज कितना भी महंगा हो जाए, शादियों की फिजूलखर्ची एक आवश्यक बुराई है, सामाजिक व्यवस्था है, लाखों के मैरिज गार्डन में अगर छप्पन तरह के व्यंजन न परोसे जाएं, तो काहे की शादी। ढोल, धमाका और नाच गाना ही तो शादी का मकसद होता है। जो बाराती बैंड बाजे की धुन में सड़क पर नहीं नाचा, वह काहे का बाराती। कभी किसी बैंड बाजे वाले इंसान की निजी जिंदगी में न झांके, आपकी खुशियों का बैंड बज जाएगा।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 274 – अपरिग्रह ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 274 अपरिग्रह-… ?

नये वर्ष के आरंभिक दिवस हैं। एक चित्र प्राय: देखने को मिलता है। कोई परिचित  डायरी दे जाता है। प्राप्त करनेवाले को याद आता है कि बीते वर्षों की कुछ डायरियाँ ज्यों की त्यों कोरी की कोरी पड़ी हैं। लपेटे हुए कुछ कैलेंडर भी हैं। डायरी, कैलेंडर जो कभी प्रयोग ही नहीं हुए। ऐसा भी नहीं है कि यह चित्र किसी एक घर का ही है। कम या अधिक आकार में हर घर में यह चित्र मौज़ूद है।

मनुष्य से अपेक्षित है अपरिग्रह। मनुष्य ने ‘बाई डिफॉल्ट’ स्वीकार कर लिया अनावश्यक  संचय। जो अपने लिये भार बन जाये वह कैसा संचय?

विपरीत ध्रुव की दो घटनाएँ स्मरण हो आईं। हाउसिंग सोसायटी के सामने की सड़क पर रात दो बजे के लगभग दूध की थैलियाँ ले जा रहा ट्रक पेड़ से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। भय से ड्राइवर भाग खड़ा हुआ। आवाज़ इतनी प्रचंड हुई कि आसपास के 500 मीटर के दायरे में रहनेवाले लोग जाग गये। आवाज़ से उपजे भय के वश कुत्ते भौंकने लगे। देखते-देखते इतनी रात गये भी भीड़ लग गयी।  सड़क दूध की फटी थैलियों से पट गयी थी। दूध बह रहा था। कुछ समय पूर्व भौंकने वाले चौपाये अब दूध का आस्वाद लेने में व्यस्त थे और दोपाये साबुत बची दूध की थैलियाँ हासिल करने की होड़ में लगे थे। जिन घरों में रोज़ाना आधा लीटर दूध ख़रीदा जाता है, वे भी चार, छह, आठ जितना लीटर हाथ लग जाये, बटोर लेना चाहते थे। जानते थे कि दूध नाशवान है, टिकेगा नहीं पर भीतर टिक कर बैठा लोभ, अनावश्यक संचय से मुक्त होने दे, तब तो हाथ रुके!

खिन्न मन दूसरे ध्रुव पर चला जाता है। सर्दी के दिन हैं। देर रात फुटपाथ पर घूम-घूमकर ज़रूरतमंदों को यथाशक्ति कंबल बाँटने का काम अपनी संस्था के माध्यम से हम करते रहे हैं। उस वर्ष भी मित्र की गाड़ी में कंबल भरकर निकले थे। लगभग आधी रात का समय था। एक अस्पताल की सामने की गली में दाहिने ओर के फुटपाथ पर एक माई बैठी दिखी। एक स्वयंसेवक से उन्हें एक कंबल देकर आने के लिए कहा। आश्चर्य! माई ने कंबल लेने से इंकार कर दिया। आश्चर्य के निराकरण की इच्छा ने मुझे सड़क का डिवाइडर पार करके उनके सामने खड़ा कर दिया था। ध्यान से देखा। लगभग सत्तर वर्ष की अवस्था। संभवत: किसी मध्यम परिवार से संबंधित जिन्होंने जाने किस विवशता में फुटपाथ की शरण ले रखी है।… ‘माई! आपने कंबल नहीं लिया?’ वे स्मित हँसी। अपने सामान की ओर इशारा करते हुए साफ भाषा में स्नेह से बोलीं, ‘बेटा! मेरे पास दो कंबल हैं। मेरा जीवन इनसे कट जायेगा। ज़्यादा किसलिये रखूँ? इसी सामान का बोझ मुझसे नहीं उठता, एक कंबल का बोझ और क्यों बढ़ाऊँ? किसी ज़रूरतमंद को दे देना। उसके काम आयेगा!’

ग्रंथों के माध्यम से जिसे समझने-बूझने की चेष्टा करता रहा, वही अपरिग्रह साक्षात सामने खड़ा था। नतमस्तक हो गया मै!

कबीर ने लिखा है, “कबीर औंधि खोपड़ी, कबहुँ धापै नाहि/ तीन लोक की सम्पदा, का आबै घर माहि।”

पेट भरा होने पर भी धापा हुआ अथवा तृप्त अनुभव न करो तो यकीन मानना कि अभी सच्ची यात्रा का पहला कदम भी नहीं बढ़ाया है। यात्रा में कंबल ठुकराना है या दूध की थैलियाँ बटोरते रहना है, पड़ाव स्वयं तय करो।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 मकर संक्रांति मंगलवार 14 जनवरी 2025 से शिव पुराण का पारायण महाशिवरात्रि तदनुसार बुधवार 26 फरवरी को सम्पन्न होगा 💥

 🕉️ इस वृहद ग्रंथ के लगभग 18 से 20 पृष्ठ दैनिक पढ़ने का क्रम रखें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 581 ⇒ पुरानी फिल्मों का संगीत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पुरानी फिल्मों का संगीत।)

?अभी अभी # 581 ⇒ पुरानी फिल्मों का संगीत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

रेडियो सीलोन के पुराने श्रोता जानते हैं, सुबह ७.३० का समय पुरानी फिल्मों के गीतों का होता था, जिसका समापन हर रोज के.एल.सहगल के गीत से ही होता था। ८ बजे का समय लोमा टाइम होता था, जिसके पश्चात् आप ही के गीत शुरू हो जाते थे।

तब रेडियो पर पिताजी का ही एकाधिकार होता था। आठ बजते ही सभी रेडियो सेट्स पर एक ही आवाज़ आती थी, ये आकाशवाणी है, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिए।।

बात पुरानी फिल्मों के गीतों की हो रही थी। कुंदनलाल सहगल केवल ४३ वर्ष की उम्र में सन् १९४७ में कई यादगार गीत छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कह गए। सहगल के अलावा तलत महमूद, सी. एच.आत्मा, के. सी. डे., रफी, मुकेश और किशोर भी लोगों की जुबान पर चढ़ चुके थे। कौन भूल सकता है सुरैया श्याम की अनमोल घड़ी, आवाज दे कहां है, और नूरजहां और सुरेंद्र का कलजयी गीत, तू मेरा चांद तू मेरी चांदनी और उमा देवी की दर्द भरी आवाज, अफसाना लिख रही हूं।

आज इन गायकों में से कोई भी हमारे बीच मौजूद नहीं है, और ना ही है रेडियो सीलोन का ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन, लेकिन श्रोता हैं कि आज भी रेडियो सीलोन को यू ट्यूब पर भी सुने जा रहे हैं। हम एक अच्छे श्रोता जरूर हैं लेकिन ऐसे अंध भक्त भी नहीं। समय के साथ सब कुछ बदलता रहता है, इसलिए हमने भी समझौता एक्सप्रेस में सवार हो, कई वर्ष पहले ही आकाशवाणी के पचरंगी प्रोग्राम विविध भारती से समझौता कर लिया है और मजबूरी में ही सही, रोज सुबह सात बजे प्रसारित पुरानी फिल्मों के प्रोग्राम, भूले बिसरे गीत, सुनना शुरू कर दिया है।।

आज के रेडियो और टीवी पर पहला अधिकार विज्ञापन का है और अगर वह आकाशवाणी है तो उस पर दूसरा अधिकार समाचार का है। मनोरंजन का स्थान तो इनके बाद ही आता है। आइए विविध भारती सुनें।

सुबह की सभा प्रातः ६ बजे, मंगल ध्वनि से शुरू होती है, और समाचारों के पश्चात् चिंतन और भजनों का प्रोग्राम वंदनवार, जिसमें एक भजन भारत रत्न लता जी का तय है। अक्सर सभी भजन सुने हुए होते हैं और गैर फिल्मी होते हैं। ६.२० बजे देशभक्ति के गीत के साथ भजनों का कार्यक्रम  समाप्त हो जाता है। पंद्रह मिनट के लिए रामचरित मानस का पाठ होता है और उसके बाद नियमित प्रोग्राम संगीत सरिता, जिसमें अधिकांश प्रोग्राम पुराने ही रिपीट किए जा रहे हैं।।

लिजिए सुबह के सात बज गए और अब भूले बिसरे गीत शुरू होने जा रहे हैं।

एक विज्ञापन के बाद मुश्किल से दो गीत आप सुन पाएंगे और प्रादेशिक समाचार शुरू हो जाएंगे।

समाचार की शुरुआत भी विज्ञापन से ही होती है और उसका समापन भी विज्ञापन से ही होता है। बड़ी मुश्किल से खींच तानकर दो अथवा साढ़े दो/ढाई भी नहीं, और भूले बिसरे गीतों का समय समाप्त हो जाता है।

विविध भारती के पास पुराने मनोरंजक प्रोग्रामों का कुबेर का खजाना है, जिसे वह आजकल विज्ञापनों के जरिए प्रचारित करता रहता है।

नौशाद, मीनाकुमारी और जीवन से इस बहाने दिन में हमारी बीस पच्चीस बार मुलाकात हो जाती है।

आखिर विविध भारती को भी अपने मन की बात कहने का पूरा पूरा अधिकार जो है।।

बात भूले बिसरे गीतों और पुरानी फिल्मी गीतों की हो रही थी। क्या पुरानी फिल्मों के सभी गीत भूले बिसरे होते हैं। जो गीत ज्यादा पॉपुलर होता है, वह अधिक बजता है और बेचारे कुछ गीत समय के साथ भुला दिए जाते हैं।

जब कि कुछ गीत सदाबहार होते हैं और वक्त का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। रफी साहब को गुजरे अब ४५ वर्ष हो गए। इस हिसाब से तो इनके सभी गीत पुराने ही हो जाना चाहिए लेकिन क्या दिल तेरा दीवाना, दिल देके देखो अथवा प्रोफेसर, पारसमणि, आरजू, सूरज और गाइड के गीत सुनकर आपको लगता है कि हम कुछ पुराना अथवा भूला बिसरा सुन रहे हैं।।

ओल्ड इज गोल्ड। कुछ गीत वाकई सदाबहार होते हैं और समय की धूल उन पर कभी जमा नहीं होती।

फिर चाहे वे गीत लता जी ने गाए हों अथवा आशा जी ने। हमारे कुछ संगीतकार भी इसी श्रेणी में आते हैं, जिनमें प्रमुख हैं, ओ पो नय्यर, उषा खन्ना और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, जिनकी पहली फिल्म का गीत भी ऐसा लगता है, मानो आज पहली बार सुन रहे हैं।

संगीत के बारे में हर श्रोता के अपने अपने आग्रह और पूर्वाग्रह होते हैं। अच्छे सदाबहार गीत बताना तो बहुत आसान है, लेकिन सबसे मुश्किल होता है, सबसे खराब गीत के बारे में एक आम राय रखना। हां अगर गायक और संगीतकार से पूछा जाए, तो वह जरूर ईमानदारी से बताएगा।

जैसे लता जी ने फिल्म संगम के गीत, हाय का करूं राम, के बारे में अपनी राय जाहिर करी थी। यह गीत उन्होंने बेमन से गाया था, क्योंकि यह उनकी रुचि से मेल नहीं खाता था।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 580 ⇒ साहिर और महेन्द्र कपूर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “साहिर और महेन्द्र कपूर।)

?अभी अभी # 580 ⇒ साहिर और महेन्द्र कपूर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वैसे तो साहिर अपनी मर्जी के शायर थे और किसी खूंटे से बंधे नहीं थे, लेकिन फिल्म नया दौर से, वक्त तक, बी आर चोपड़ा से उनकी जोड़ी खूब जमी। नया दौर में अभिनेता दिलीपकुमार थे, और इस फिल्म के सभी हिट गीतों को जहां मोहम्मद रफी ने अपना स्वर दिया था, वहीं ओ पी नैय्यर ने इन्हें अपने मधुर संगीत में ढाला था।

लेकिन बी आर चोपड़ा, ओ पी नैय्यर और साहिर लुधीयानवी की तिकड़ी और रफी साहब की आवाज का यह करिश्मा आगे चल नहीं पाया। बी आर चोपड़ा चाहते थे कि मोहम्मद रफी केवल उनकी फिल्मों के लिए ही गीत गाएं, जो कि रफी साहब को मंजूर नहीं था। उनका मानना था कि उनकी आवाज सभी संगीतकारों के लिए बनी है, वे कोई दरबारी गायक नहीं हैं।।

बस यही बात चोपड़ा साहब को चुभ गई और उन्होंने प्रण कर लिया कि वे एक और मोहम्मद रफी खड़ा करेंगे और इसके लिए उन्होंने रफी साहब के ही शागिर्द महेन्द्र कपूर को चुना। वैसे भी मुकेश, किशोर कुमार और रफी साहब के चलते महेन्द्र कपूर साहब को फिल्में कम ही मिलती थी, फिर भी उपकार फेम मनोज कुमार भी उन पर पूरी तरह से मेहरबान थे, जिस कारण कल्याण जी आनंद जी के भी वे प्रिय हो चले थे। याद कीजिए, दिलीप कुमार की फिल्म गोपी के रफी साहब के एक भजन को छोड़कर, सभी गीत महेन्द्र कपूर ने ही गाये थे।

अधिक विषयांतर ना करते हुए हम साहिर और महेन्द्र कपूर के साथ के बारे में चर्चा करते हैं। फिल्म गुमराह के गीतों को ही ले लीजिए। चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। यहां संगीतकार ओ पी नैय्यर नहीं हैं, रवि हैं। श्रोता को समझ भी नहीं आता, वह शब्दों में खो गया है, अथवा आवाज की मिठास में। इसी फिल्म के एक और गीत, इन हवाओं में, इन फिज़ाओं में, में आशा भोंसले का कंठ अधिक मधुर है अथवा महेन्द्र कपूर का, आप ही बताइए।।

गुमराह(1963) के बाद वक्त(1965) और हमराज(1967) गीत संगीत के हिसाब से सफल रही, जहां साहिर और महेन्द्र कपूर अपने जलवे बिखेरते नजर आए। इसके बाद की तीन फिल्में क्रमशः धुंध, (1973)इंसाफ का तराजू(1980) और निकाह(1982) बॉक्स ऑफिस पर चली जरूर लेकिन तब तक चोपड़ा साहब का एक और रफी तैयार करने का सपना चूर चूर हो चला था। फिल्म वक्त में थक हारकर उन्हें वापस रफी साहब की ही आवाज लेनी पड़ी। आदमी को चाहिए, वक्त से डरकर रहे, कौन जाने किस घड़ी, वक्त का बदले मिजाज़।।

फिल्म हमराज़ के तीनों गीत, नीले गगन के तले, तुम अगर साथ देने का वादा करो अथवा किसी पत्थर की मूरत से, जब मैं सुनता हूं, तो मुझे महेन्द्र कपूर की सूरत में साहिर की सीरत नजर आती है।

इतनी सॉफ्ट मखमली आवाज से वे शुरू करते हैं, लेकिन अपनी रेंज में रहते हुए खूबसूरत आलाप भी बखूबी ले लेते हैं। वे कहीं भी बेसुरे नजर नहीं आते। साहिर और महेन्द्र कपूर के सर्वश्रेष्ठ गीतों का एल्बम अगर बनेगा तो उसमें ये गीत अवश्य शामिल होंगे।

साहिर और महेंद्र कपूर की सबसे यारी रही। गुरुदत्त की प्यासा हो या कागज़ के फूल, साहिर ने अगर संगीतकार रवि के लिए गीत लिखे तो चित्रगुप्त और लक्ष्मी प्यारे के लिए भी। बस शायद नौशाद और शंकर जयकिशन को कभी साहिर की याद नहीं आई। एक के पास अगर शकील थे तो दूसरे के हाथ में दो दो लड्डू, शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी।।

साहिर और महेन्द्र कपूर का ही एक गीत है, संसार की हर शै का, इतना ही फसाना है, एक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है। एक और शायर कैफ़ी आज़मी गुरुदत्त के लिए भी कह गए, जो हम सब पर लागू होता है,

देखी जमाने की यारी, बिछड़े सभी बारी बारी।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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