हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #276 – कविता – ☆ खोज रहा सुख को दर-दर है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता खोज रहा सुख को दर-दर है…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #276 ☆

☆ खोज रहा सुख को दर-दर है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

कैसे बने संतुलन मन का

कभी इधर तो कभी उधर है

अस्थिर-चंचल-विकल, तृषित यह

खोज रहा सुख को दर-दर है।

*

ठौर ठिकाना सुख का कब

बाहर था जो ये मिल जायेगा

यहाँ-वहाँ  ढूँढोगे कब तक

हाथ नहीं कुछ भी आयेगा,

रुको झुको झाँको निज भीतर

अन्तस् में ही सुख का घर है,

खोज रहा सुख को दर-दर है।

*

अगर-मगर में बीता दिवस

सशंकित सपने दिखे रात में

लाभ लोभ की लिये तराजू

गुणा-भाग प्रत्येक बात में

कितना तुला, तुलेगा कितना

इसकी कुछ भी नहीं खबर  है,

खोज रहा सुख को दर-दर है।

*

सत्ता सुख ऐश्वर्य प्रतिष्ठा

कीर्ति यश सम्मान प्रयोजन

चलते रहे प्रयास निरंतर

होते रहे नव्य आयोजन,

सुख संतोष प्रेम पा जाते

पढ़ते यदि ढाई आखर है,

खोज रहा सुख को दर-दर है।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # 100 ☆ जाएँ तो कहाँ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “जाएँ तो कहाँ?” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # 100 ☆ जाएँ तो कहाँ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

हम परिन्दों के लिए

डालते रहे दाना और पानी

और वे बिछाते रहे जाल

फँसाते रहे हैं सदा मछलियाँ

चुगते रहे हैं सबका दाना

बुन लिया गया है

उनके द्वारा ऐसा ताना-बाना

जिस तरह बुनती है मकड़ी

अपना जाल

और जब कोई कीट उलझता है

उस चक्रव्यूहनुमा जाल में

तब होता है शुरु शोषण

तब हम चाह कर भी नहीं निकल पाते

यह एक ऐसा व्यामोह है

जिसे ओढ़कर विवश हैं हम

और आने वाली पीढ़ियाँ

जीवन के इस संघर्ष में अपनी

जिजीविषा को लेकर जाएँ तो कहाँ?

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दृष्टिहीन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – दृष्टिहीन ? ?

(2013 में प्रकाशित कवितासंग्रह ‘योंही’ से)

मैं देखता हूँ रोज़

दफ़्न होता एक बच्चा,

मैं देखता हूँ रोज़

टुकड़े-टुकड़े मरता एक बच्चा,

पीठ पर वज़नी बस्ता लटकाए,

बोझ से कंधे-सिर झुकाए,

स्कूल जाते, स्कूल से लौटते,

दूसरा बस्ता टांकते;

ट्यूशन जाते, ट्यूशन से लौटते,

घर-समाज से

किताबें चाटते रहने की हिदायतें पाते,

टीवी देखते परिवार से

टीवी से दूर रहने का आदेश पाते

रास्ते की टूटी बेंच पर बैठकर 

ख़त्म होते बचपन को निहारते,

रोज़ाना की डबल शिफ्ट से जान छुड़ाते,

शिफ्टों में खेलने-कूदने के क्षण चुराते,

सुबह से रात, रात से सुबह

बस्ता पीठ से नहीं हटता,

भरसक कोशिश करता

दफ़्न होना नहीं रुकता,

क्या कहा-

आपने नहीं देखा..!

हर नेत्रपटल

दृश्य तो बनाता है,

संवेदना की झिल्ली न हो

तो आदमी देख नहीं पाता है..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 12 अप्रैल 2025 से 19 मई 2025 तक श्री महावीर साधना सम्पन्न होगी 💥  

🕉️ प्रतिदिन हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमन्नाष्टक का कम से एक पाठ अवश्य करें, आत्मपरिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अपनी दौलत, शोहरत पे गुरूर न करना… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक ग़ज़ल – अपनी दौलत, शोहरत पे गुरूर न करना।)

✍ अपनी दौलत, शोहरत पे गुरूर न करना… ☆ श्री हेमंत तारे  

राहों की तीरगी को मिटाते रहना

चराग़ रखा है साथ जलाते रहना

*

कोई रूठे अपना तो ग़ज़ब क्या है

उसे मनाना, मनाना, मनाते रहना

*

फ़िर बरपा है कहर तपिश का यारों

तुम परिंदों को  पानी पिलाते रहना

*

तनकीद के पहले गिरेबां में झांक लेना

आसां नही इतना सही राह बताते रहना

*

अपनी दौलत, शोहरत पे गुरूर न करना

रब से डरना,  फकीरों को खिलाते रहना

*

मिल जाए गर कोई नाख़ुश, नाउम्मीद तुम्हें

हमदर्द हो जाना और होंसला दिलाते रहना

*

सीखने को बहुत कुछ है ‘हेमंत’ जमाने में

बदकिस्मत हैं वो जो सीखे हैं रुलाते रहना

(तीरगी = अंधकार, तनकीद = उपदेश देना)

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # 103 ☆ दौलते और शुहरतें सब हैं… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण ग़ज़ल “दौलते और शुहरतें सब हैं“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # 103 ☆

✍ दौलते और शुहरतें सब हैं… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

बादलों जैसे कभी आवारगी अच्छी नहीं

नौजवानों की हवा से दोसती अच्छी नहीं

 *

ख़ुश नहीं होता  शिवाले वो सजाने से कभी

मार के हक़ गैर का ये रोशनी अच्छी नहीं

 *

ढाई ग़ज़ हो चाहिए आख़िर ज़मीं इंसान को

चाहतें दुनिया की दौलत की कभी अच्छी नहीं

 *

ये बढाती रक्त का है चाप ये सच मानिए

हर समय मुझसे तेरी नाराज़गी अच्छी नहीं

 *

हर कली पर रीझना औ तोड़ने की सोचना

यार ऐसी हुस्न की दीवानगी अच्छी नहीं

 *

दौलते और शुहरतें सब हैं न अपनापन मगर

गांव से इस शहर की ये ज़िन्दगी अच्छी नहीं

 *

 ये गुज़ारिश औरतों से सख़्त  अपना दिल करें

दिल के दुखते आँख में होना  नमी अच्छी नहीं

 *

दौरे हाजिर के मसाइल ज़ीस्त की लिख कशमकश

सागरो मीना हरम पर शायरी अच्छी नहीं

 *

हारकर तक़दीर से दुनिया से नाता तोड़ना

कुछ न हासिल हो अरुण ये बेख़ुदी अच्छी नहीं

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # 97 – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – 3 ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # 97 – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – 3 ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

महापुराण कहानी दादी, 

हैं ममतालु सुहानी दादी, 

इनकी सेवा मंगलकारी, 

शुभ चिन्तक वरदानी दादी।

0

सबल भुजा का बल भाई है, 

धड़कन की हलचल भाई है, 

देता है खुशियों की फसलें 

धरा, गगन, बादल भाई है।

0

हरा-भरा परिवार जहाँ है, 

ममता प्यार दुलार जहाँ है, 

सुख का सिन्धु वहीं लहराता 

बच्चों का संसार जहाँ है।

0

बेटी है वरदान सरीखी, 

संस्कृति की पहचान सरीखी, 

माता-बहनें पूज्य रही हैं 

भारत में भगवान् सरीखी।

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पुजारी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पुजारी ? ?

मैं और वह

दोनों काग़ज़ के पुजारी,

मैं फटे-पुराने,

मैले-कुचले,

जैसे भी मिलते

काग़ज बीनता, संवारता,

करीने से रखता,

वह इंद्रधनुषों के पीछे भागता,

रंग-बिरंगे काग़ज़ों के ढेर सजाता,

दोनों ने अपनी-अपनी थाती

विधाता के आगे धर दी,

विधाता ने

उसके माथे पर अतृप्त अमीरी

और मेरे भाल पर

समृद्ध संतुष्टि लिख दी..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

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💥 12 अप्रैल 2025 से 19 मई 2025 तक श्री महावीर साधना सम्पन्न होगी 💥  

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 171 – महावीर जयंती विशेष – जैन धर्म में है बसा…  ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है महावीर जयंती  पर आपकी एक  कविता “जैन धर्म में है बसा…” । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 171 – महावीर जयंती विशेष – जैन धर्म में है बसा… ☆

जैन धर्म में है बसा, जीवों का कल्यान।

भारत ने सबको दिया, जीने का वरदान।।

 *

राम कृष्ण गौतम हुए, महावीर की भूमि।

योग धर्म अध्यात्म से, कौन रहा अनजान।।

 *

धर्मों की  गंगोत्री, का है  भारत केन्द्र।

जैन बौद्ध ईसाई सँग, मुस्लिम सिक्ख सुजान।

 *

ज्ञान और विज्ञान का, भरा यहाँ भंडार।

सबको संरक्षण मिला, हिन्दुस्तान महान।। 

 *

चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को, जन्मे कुंडल ग्राम।

वैशाली के निकट ही, मिला हमें वरदान।।

 *

राज पाट को छोड़कर, वानप्रस्थ की ओर।

सत्य धर्म की खोज कर,किया जगत कल्यान।।

 *

सन्यासी का वेषधर, निकल चले अविराम।

छोड़ पिता सिद्धार्थ को, कष्टों का विषपान।। 

 *

प्राणी-हिंसा देख कर, हुआ बड़ा संताप।

मांसाहारी छोड़ने, शुरू किया अभियान।।

 *

अहिंसा परमोधर्म का, गुँजा दिया जयघोष।

जीव चराचर अचर का, लिया नेक संज्ञान।।

 *

मूलमंत्र सबको दिया , पंचशील सिद्धांत।

दया धर्म का मूल है, यही धर्म की जान।

 *

हिंसा का परित्याग कर, अहिंसा अंगीकार।

प्रेम दया सद्भाव को, मिले सदा सम्मान।।

 *

चौबीसवें  तीर्थंकर, माँ त्रिशला के पुत्र।

महावीर स्वामी बने, पूजनीय भगवान।।

 *

वर्धमान महावीर जी, बारम्बार प्रणाम ।

त्याग तपस्या से दिया, सबको जीवन दान।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बैसाखी पर्व विशेष – फिर सबकी बैसाखी है… ☆ डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक ☆

डॉ जसप्रीत कौर फ़लक

☆ बैसाखी पर्व विशेष – फिर सबकी बैसाखी है… ☆  डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक 

महक उठा है गुलशन-गुलशन

महुआ टपके महके चंदन

यह उन की बैसाखी है…

*

लतायें महकी मृदुल- मृदुल

हुईं हवाएं चंचल – चंचल

यह उन की बैसाखी है…

*

प्रकृति का हर काम है जारी

रात दिन आयें बारी – बारी

यह उन की बैसाखी है…

*

धुंध छटी सब गहरी गहरी

गेहूँ की बाली हुई सुनहरी

यह उन की बैसाखी है….

*

जो क़ुदरत की मौज में रहते

दुख – सुख दोनों हँसकर सहते

यह उन की बैसाखी है…

*

याद करो गुरुओं की वाणी

सुखी बसे हर एक प्राणी

फिर सब की बैसाखी है…

*

खेतों से दाने घर आएं

खुशी से दामन सब भर जाएं

फिर सब की बैसाखी है…

*

नफ़रत के बुझ जाएं चिराग़

प्यार से महके हर इक बाग़

फिर सब की बैसाखी है…

 डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक

संपर्क – मकान न.-11 सैक्टर 1-A गुरू ग्यान विहार, डुगरी, लुधियाना, पंजाब – 141003 फोन नं – 9646863733 ई मेल – [email protected]

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of social media # 231 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain (IN) Pravin Raghuvanshi, NM

? Anonymous Litterateur of social media # 231 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 231) ?

Captain Pravin Raghuvanshi NM—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. An alumnus of IIM Ahmedabad was involved in various Artificial and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’. He is also the English Editor for the web magazine www.e-abhivyakti.com

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc.

Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi. He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper. The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his Naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Awards and C-in-C Commendation. He has won many national and international awards.

He is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves writing various books and translation work including over 100 Bollywood songs for various international forums as a mission for the enjoyment of the global viewers. Published various books and over 3000 poems, stories, blogs and other literary work at national and international level. Felicitated by numerous literary bodies..! 

? English translation of Urdu poetry couplets of Anonymous litterateur of Social Media # 231 ?

☆☆☆☆☆

चार दिन भी लोगों की आंखो में

नमी ना होगी,

मैं फ़ना भी हो जाऊं

तो किसे क्या कमी होगी…!

☆☆

No one’s eyes will well up with tears,

even for four days,

And, no one will notice,

even if I perish…

☆☆☆☆☆

कौन सा ग़म था जो तरोताज़ा न था

इतना ग़म मिलेगा, ये भी अंदाज़ा न था,

आपकी झील सी आंखों का क्या क़ुसूर

डूबने वाले को ही गहराई का अंदाजा न था…

☆☆

No melancholy is new, yet

I didn’t expect this depth of anguish.

What fault do your ocean-like eyes hold?

Only the drowned ones couldn’t fathom the depth…

☆☆☆☆☆

फना होने वाले तो

बिना बताए ही चले जाते हैं,

रोज तो वो मरते है

जो खुद से ज्यादा किसी और को चाहते हैं…!

☆☆

Those who leave the world,

depart without warning,

The ones who love someone more than life itself,

die daily…

☆☆☆☆☆

कितना अकेला रह जाता है वो शख्स

जिसे जानते तो तमाम लोग हैं,

मगर समझता कोई नही…

☆☆

How lonely is my soul

Known by many,

yet understood by none?”

☆☆☆☆☆

~ Pravin Raghuvanshi

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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