हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 216 – कथा क्रम (स्वगत)… ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपका भावप्रवण कविता – कथा क्रम (स्वगत)।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 216 – कथा क्रम (स्वगत)… ✍

(नारी, नदी या पाषाणी हो माधवी (कथा काव्य) से )

क्रमशः आगे…

ऋषिवर

गालव,

जानते हो

गुरु दक्षिणा देने के

हठाग्रह ने

विस्फोटित किया

ज्वालामुखी

और

उसके लावे में

बह गई

तुम्हारी पवित्रता ।

तार-तार हो गई

संस्कृति

छिन्न-भिन्न हो गई

मर्यादा

दफन हो गया

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते

का पुण्य घोष ।

यानी

नारी को

माता को, बहिन, बेटी को

निर्वस्त्र कर

नीलाम पर चढ़ा दिया

भरे बाजार में।

चार बार ।

क्यों किया

यह हठाग्रह तुमने?

क्या ज्ञात नहीं थीं तुम्हें

© डॉ राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 216 – “लौट कर आया नहीं…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत लौट कर आया नहीं...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 216 ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “लौट कर आया नहीं...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

मैं नयनका बोझ था

कैसे तुम्हारा

गिर गया तो कह रहे

आँसू हमारा

 

रोज के सपने तुम्हें

सोने न देते

अगर मुमकिन तो

समय अनुमान लेते

 

साथ में छल अनिश्चय

लेकर चले तो

डिग गया सम्बंध का

निश्चल सहारा

 

लौट कर आया नहीं

था राह में पर

टूटता ही रहा था

परवाह से घर

 

और था मुश्किल

तुम्हारा साथ लेकिन

जान पाया था जिसे

मैं दिशाहारा

 

यदि तुम्हारे प्रेम

का पर्याय होता

तो अभी तक

आँख में मैं बसा होता

 

और सब चेतन जगत

के असंतोषों का

बना होता कहीं

छोटा सा किनारा

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

24-11-2024

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जीत की मशाल… ☆ डॉ प्रेरणा उबाळे ☆

डॉ प्रेरणा उबाळे

☆ कविता – जीत की मशाल…  ☆  डॉ प्रेरणा उबाळे 

जीत की मशाल हूँ मैं

जीत की मशाल हूँ

*

तप्त ज्वाला जगा दें

अभिशप्त को मार दें

भीगी क्यों तेरी मशाल रे

जीत की मशाल हूँ मैं

*

चमका दो शिखर तरू

काट दे जहर को तू

भीगी क्यों तेरी मशाल रे

जीत की मशाल हूँ मैं

*

मृदंग-सा ताल पकड़

सृजन का आगाज कर

भीगी क्यों तेरी मशाल रे

जीत की मशाल हूँ मैं

*

ठिठकना तू छोड़ दें

लय, गति तेज कर दें

भीगी क्यों तेरी मशाल रे

जीत की मशाल हूँ मैं

*

स्वर्ण कडा पहन तू

बंद मुट्ठी खोल तू

भीगी क्यों तेरी मशाल रे

जीत की मशाल हूँ मैं

*

हाथ उठा आसमान तक

खींच ला सूरज भी अब

भीगी क्यों तेरी मशाल रे

जीत की मशाल हूँ मैं

*

तिलक लगेगा माथे पर

सुनहरी होगी तेरी राह

जला ले पुनः मशाल अब

जीत की मशाल हूँ मैं

जीत की मशाल हूँ l

■□■□■

© डॉ प्रेरणा उबाळे

रचनाकाल  : 24 नवंबर 2024

सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभागाध्यक्षा, मॉडर्न कला, विज्ञान और वाणिज्य महाविद्यालय (स्वायत्त), शिवाजीनगर,  पुणे ०५

संपर्क – 7028525378 / [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 200 ☆ # “मेरा आत्मसम्मान चाहिए…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता मेरा आत्मसम्मान चाहिए…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 200 ☆

☆ # “मेरा आत्मसम्मान चाहिए…” # ☆

इस पल पल बदलती दुनिया में

मुझे आत्म गौरव, मान चाहिए

मुझे जीने के लिए बस

मेरा आत्मसम्मान चाहिए

 

कब तक जिएगा कोई

बैसाखियों के सहारे

वो हर बार ही जीते

हम हर बार ही हारे

चौसठ खानों की बिसात पर

शतरंज तुम्हारी, मोहरे भी तुम्हारे

इस शह और मात की बाजी में

सच्चाई और इमान चाहिए

मुझे जीने के लिए बस

मेरा आत्मसम्मान चाहिए

 

कितने उद्दंड है

बहते हुए धारे

डुबोने बेचैन है

कश्ती को हमारे

कश्ती भले ही जीर्ण हो

हममें जुनून है

पहुंचा ही देंगे

हम कश्ती को किनारे

दरिया के पानी में

बस एक तूफान चाहिए

मुझे जीने के लिए बस

मेरा आत्मसम्मान चाहिए

 

यह कैसा पाखंड है

हम बट रहे खंड खंड है

यह किस गुनाह का

मिल रहा दंड है

वहशी हवाओं में

वेग प्रचंड है

इस प्रलय को रोक सके

ऐसा एक इन्सान चाहिए

मुझे जीने के लिए बस

मेरा आत्मसम्मान चाहिए /

 

कविता

 

” जीवन चक्र  “

 

जीने के लिए हम

क्या क्या नहीं करते हैं

रोज जीते हैं

रोज मरते हैं

दो जून की रोटी के लिए

क्या क्या नहीं करते हैं

चाहे दिन हो या रात

ठंड हो, गर्मी हो

या हो बरसात

किसी भी मौसम में

खुद की परवाह नहीं करते हैं

सुबह घर से निकलते हैं

दौड़ लगाते हैं

भीड़ का हिस्सा

बन जाते हैं

परिश्रम करते हैं

पसीना बहाते हैं

तब –

दो रोटी का

परिवार के लिए

इंतजाम हो पाता है

कुछ पल के लिए

आदमी सो पाता है

रोज अपने परिवार

की जरूरते

जो अनंत हैं

पर जरूरी हैं

उसे पूरा करना

हर शख्स की

मजबूरी है

 

यह ऐसी जंग है

जिसका अलग ही रंग है

इससे हर कोई लड़ता है

एक एक कदम

आगे बढ़ता है

किसी के भाग्य का

सितारा चमकता है

तो वो नया इतिहास

गढ़ता है

और कोई

हर रोज संघर्ष करता है

पर निराश है

बेकारी, भूख , गरीबी

उसके पास है

झूठे वादे

अंधविश्वास ही

उसको रास है

वो जीवित तो है पर

एक जिंदा लाश है

 

जो तूफानों से टकराता है

आंधियों से नहीं घबराता है

वो भवसागर पार

कर जाता है

और

जो डरता है

हिम्मत हारता है

वो टूटकर

बिखर जाता है

जीवन चक्र में

अनजाना सा

मर जाता है

यही जीवन का

 अकाट्य सत्य है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ – बूंद की कथा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता बूंद की कथा…।)

☆ कविता – बूंद की कथा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

********

एक नन्ही सी बूंद जल की,

आशा की किरण लिए मन में,

कितने अरमान संजोये थे,

जब छुपी मेघ के अंचल में,

नन्हे दिल में बड़े प्रेम से,

साहस का अंकुर बोया,

कीर्ति रहे इस जग में,

यह अरमान संजोया,

आखिर वह दिन भी आया,

  स्वजनों से जब किया किनारा,

रोया दिल भीगे नैनों से,

बहने लगी अश्रु की धारा,

यादें धूमिल हो गई,

सामने भविष्य था

आस निराशा के घेरे में,

अनंत का रहस्य था,

वायु के उज्जवल रथ पर,

अश्व जुते जिसमें सपनों के,

पल पल थी वह सोच रही,

क्यों दामन छूटे अपनों के,

सोचा किसी सीप में गिर,

मैं मोती बन जाऊंगी,

किसी हार में लगा कर फिर,

  दुल्हन के गले लग जाऊंगी,

रूप सौंदर्य की वृद्धि करके,

जीवन सफल बनाऊंगी,

प्यार करूंगी हर पल से,

हर पल को सुखद बनाऊंगी,         

  किसी नवेली दुल्हन की,

 मांग में जा छुप जाऊंगी,

कृतार्थ करूंगी अपने को,

मांग का मान बढ़ाऊंगी,

दुखद बिदा की बेला में,

नैनो के आंसू बन जाऊंगी,

स्वजनों की आंखों में भरकर,       

 डोली का मान बढ़ाऊंगी,

या फिर मंदिर में जाकर,

ईश को शीश झुकाऊंगी,

ईश के चरणों में गिरकर,

चरणामृत कहलाऊंगी,

भक्त जनों की अंजलि में जा,

प्रेम की प्यास बुझाऊंगी,

शांति मिले मन को ऐसी,

भक्ति भाव बढ़ाऊंगी,

फिर सोचा कि जब मजदूर,

कार्य से बोझिल थक कर चूर,

अपने घर जब वापस आता,

जल पीने को जी ललचाता,

इतने में गृह लक्ष्मी भी,

जल लुटिया ले बाहर आती,

बूंद सोच में पड़ी कि वह भी,        

 लुटिया के जल में मिल जाती,     

  प्यासे श्रमिक की प्यास बुझा,   

  यह जीवन सफल बना जाती,    

  फिर बदला नन्हा सा दिल,

सुन,पपीहे की पुकार उदास,

गिर जाऊं इसके मुंह में तो,

बुझ जाए इसकी भी प्यास,

क्रूर काल का खेल ये कैसा,

हाय विधाता की माया,

नन्हा सा दिल टूट गया,

स्वप्न न पूरा हो पाया,

कालचक्र फिर जर्जर सा,

मंद गति से चला

रोम रोम भी कांप उठा,

आशंका से दिल दहला,

आस ना पूरी हो पाई,

राज,आ गई कैसी घड़ी,

अंतिम सांसें ले रही,

बूंद कीचड़ में पड़ी,

कली पुष्प ना बन पाई,

निशि की छाया आ गई,

जीवन भी ना मिल पाया,

मृत्यु कहीं से आ गई… 

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #256 – कविता – ☆ नफरतों के बीज बो दिए… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा  रात  का चौकीदार”   महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “नफरतों के बीज बो दिए…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #256 ☆

☆ नफरतों के बीज बो दिए… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

थी जरा सी बात इसलिए

नफरतों के बीज बो दिए।।

 

लिया सूर्य से उबाल, चंदा से चतुराई

तारों के बहुमत से, उर्वर कुमति पाई,

धरती ने पोषित कर

पुष्पित पल्लवित किये

नफरतों के बीज बो दिए।

 

खरपतवारों ने, दायें-बायें साथ दिया

ईर्ष्यालु वायु के, झोंकों का नशा नया,

मदमाते लहराते

गर्वीले घूँट पिये

नफरतों के बीज बो दिए।

 

बीज सबल स्वस्थ उन्हें,अलग-अलग बाँट दिया

प्राकृत फसलों ने, आपस में प्रतिघात किया,

धरती की शुष्क दरारों को

अब कौन सिये

नफरतों के बीज बो दिए।।

 

खेतों में नई-नई, मेढ़ों की भीड़ बढ़ी

उपजाऊ माटी पर, अलगावी पीर चढ़ी,

संकट में नई पौध

कैसे निर्द्वन्द्व जिये

नफरतों के बीज बो दिए।।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # 80 ☆ अकेलापन… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “अकेलापन…” ।

✍ जय प्रकाश के नवगीत # 80 ☆ अकेलापन… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

मौन ही

करते रहे हैं बात

मेरे अकेलेपन में।

 

दूर ढलती साँझ

मादल के स्वरों पर

सूर्य रक्तिम सा

खड़ा परछाइयों में

घाटियों में उतर

आया है अँधेरा

दीप जलता है

कहीं वीरानियों में

 

सुलगती

है अँगीठी सी रात

गहरे निस्तब्ध वन में।

 

पहरुए सा समय

काँधे पर धरे दिन

जोतता अँधियार

बोता भोर उजली

कातता है चाँद

भूरे बादलों सँग

चाँदनी के तार

लेकर स्वप्न तकली

 

झील भी

ले कँवल की सौग़ात

आँजती काजल नयन में।

 

उड़े पंछी गगन

नापे पर क्षितिज से

चहकते जंगल

नहाती धूप आँगन

मंज़िलों पर जा

रुके हारे थके से

पाँव आ ठहरे

लिए आशा के सगुन

 

उम्र भर

पढ़ते रहे हालात

बैठकर अपने भुवन में।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – यह आदमी मरता क्यों नहीं है? ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शब्दयुद्ध-आतंक के विरुद्ध  ? ?

(26 नवंबर 2019 को प्रकाशित >> ☆ संजय दृष्टि  –  शब्दयुद्ध- आतंक के विरुद्ध ☆  अपने आप में विशिष्ट है। ई-अभिव्यक्ति परिवार के सभी सम्माननीय लेखकगण / पाठकगण श्री संजय भारद्वाज जी एवं श्रीमती सुधा भारद्वाज जी के इस महायज्ञ में अपने आप को समर्पित पाते हैं। मेरा आप सबसे करबद्ध निवेदन है कि इस महायज्ञ में सब अपनी सार्थक भूमिका निभाएं और यही हमारा दायित्व भी है। – हेमन्त बावनकर) 

श्री संजय भरद्वाज जी के ही शब्दों में – “आम आदमी की अदम्य जिजीविषा को समर्पित यह कविता *’शब्दयुद्ध- आतंक के विरुद्ध’* प्रदर्शनी और अभियान में चर्चित रही। विनम्रता से आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ। यदि आप किसी महाविद्यालय/ कार्यालय/ सोसायटी/ क्लब/ बड़े समूह के लिए इसे आयोजित करना चाहें तो आतंक के विरुद्ध  जन -जागरण के इस अभियान में आपका स्वागत है।”

सर्वप्रथम 26/11 और देश भर में अलग-अलग आतंकी घटनाओं में प्राण गंवाने वाले आम आदमी और आतंकियों से मुकाबला करते हुए बलिदान देनेवाले सुरक्षाकर्मियों की स्मृति को सादर नमन। 26/11 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद श्री संजय भारद्वाज जी एवं श्रीमति सुधा भारद्वाज जी द्वारा शब्दयुद्ध-आतंक के विरुद्ध अभियान आरम्भ किया गया। 16 वर्ष से यह अभियान अनवरत जारी है।

शब्दयुद्ध-आतंक के विरुद्ध में सम्मिलित रचना ‘यह आदमी मरता क्यों नहीं है’ का जन्म 26 से 28 नवम्बर 2008 के बीच कभी हुआ था। सामान्य आदमी की असामान्य जिजीविषा को समर्पित इस रचना को पाठकों और श्रोताओं ने अपूर्व समर्थन दिया। आम आदमी के इसी अदम्य साहस को समर्पित है शब्दयुद्ध-आतंक के विरुद्ध अभियान।

? यह आदमी मरता क्यों नहीं है? ?

💐 नागरिकों की रक्षा के लिए आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए सशस्त्र बलों के सैनिकों और आतंकी वारदातों में प्राण गंवाने वाले  नागरिकों को श्रद्धांजलि💐

हार क़ुबूल करता क्यों नहीं है,

यह आदमी मरता क्यों नहीं है?

 

कई बार धमाकों से उड़ाया जाता है,

गोलीबारी से

परखच्चों में बदल दिया जाता है,

ट्रेन की छतों से खींचकर

नीचे पटक दिया जाता है,

अमीरज़ादों की ‘ड्रंकन ड्राइविंग’

के जश्न में कुचल दिया जाता है,

 

कभी दंगों की आग में

जलाकर ख़ाक कर दिया जाता है,

कभी बाढ़ राहत के नाम पर

ठोकर दर ठोकर

कत्ल कर दिया जाता है,

कभी थाने में उल्टा लटका कर

दम निकलने तक

बेदम पीटा जाता है,

कभी बराबरी की ज़ुर्रत में

घोड़े के पीछे बांधकर खींचा जाता है,

 

सारी ताकतें चुक गईं,

मारते-मारते खुद थक गईं,

न अमरता ढोता न कोई आत्मा है,

न ईश्वर, न अश्वत्थामा है,

फिर भी जाने इसमें क्या भरा है,

हज़ारों साल से सामने खड़ा है,

मर-मर के जी जाता है,

सूखी ज़मीन से

अंकुर-सा उग आता है,

 

ख़त्म हो जाने से डरता क्यों नहीं है,

यह आदमी मरता क्यों नहीं है..?

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥  मार्गशीर्ष साधना 16 नवम्बर से 15 दिसम्बर तक चलेगी। साथ ही आत्म-परिष्कार एवं ध्यान-साधना भी चलेंगी💥

 🕉️ इस माह के संदर्भ में गीता में स्वयं भगवान ने कहा है, मासानां मार्गशीर्षो अहम्! अर्थात मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। इस साधना के लिए मंत्र होगा-

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

  इस माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा को दत्त जयंती मनाई जाती है। 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 84 ☆ बोझ तुम मान  के बेटी नहीं रुखसत करना… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “बोझ तुम मान  के बेटी नहीं रुखसत करना“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 84 ☆

✍ बोझ तुम मान  के बेटी नहीं रुखसत करना… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

क्या रखा दर्प में छोड़ो ये फ़ज़ीयत करना

चाह इज्जत की है तो सीख ले इज्जत करना

 *

हर इबादत का शरफ़ दोस्त मिलेगा तुझको

दरमन्दों से गरीबों से मुहब्बत करना

 *

पहले कर लेना हुक़ूमत से गुज़ारिश फिर भी

कान पर जूं न जो रेंगें तो बगावत करना

 *

एक हद तक ही मुनाफे को कहा है जायज़

दीन को ध्यान में रखके ही तिज़ारत करना

 *

आसतीनों के लिए नाग भी बन जाते हैं

आदमी देख के ही आज रफाक़त करना

 *

हम सफ़र उंसके हो लायक जो उसे दे सम्मान

बोझ तुम मान  के बेटी नहीं रुखसत करना

 *

दोसती करके निभाना है अरुण मुश्किल पर

कितना आसान किसी से भी अदावत करना

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सजन… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कविता ?

☆ सजन☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

(डमरू घनाक्षरी)

तरसत मन अब, सजन जलत मन

असफल हर पल, पवन करत छल ।।

*

डगर डगर पर, सहज नजर धर

इधर उधर सब, बहत नयन जल ॥

*

जहर अधर पर, कहत कपट कर

दरस हरस कब, भटकत जल थल ॥

*

 बहकत पग अब, खबर नगर भर

सरस सबल मन, पनघट पर चल ॥

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- [email protected]

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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