श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत हैं भावप्रवण रचना “नीको लगे यह ब्रज हमारो”। आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 120 ☆
☆ नीको लगे यह ब्रज हमारो ☆
कन कन में बसते मन मोहन, मोहक राज दुलारो
ब्रज की रज चंदन सी महके, वृंदावन है प्यारो
जित बसते हों राधेरमना, सुख मिलतो है सारो
रहे कबहुँ न दुख को अंधेरों, पास रहे उजियारो
ब्रज की बोली बड़ी रसीली, प्रेम पाग उचारो
ब्रज की रज “संतोष” लपेटें, कहते प्रभु अब तारो
© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
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