हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 81 – दोहे ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 81 –  दोहे ✍

प्यार- प्यार की याद में, आकुल होता प्यार।

प्यार -प्यार की आंख से, ढुलक पढ़ा लो प्यार।।

 

शब्द नहीं मुख से कहे, सिसक रही है सांस ।

प्रेमिल अनुभूति यों, मिसरी की फांस।।

 

रेशम -रेशम तो कहा, हुई रेशमी शाम।

रेशम- रेशम सुन कहा, रेशम किसका नाम।।

 

किसे बताएं कौन अब, किसका क्या संबंध।

 हृदय बसे हो इस तरह, सुमन ज्यों सुमनों गंध।।

 

मन मोती यों चुन लिया, जैसे चुने मराल।

ह्रदय सम्हाला इस तरह, ज्यों पूजा का थाल।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव-गीत #84 – “लम्बा बहुत सफर …” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण अभिनवगीत – “लम्बा बहुत सफर …।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 84 ☆।। अभिनव-गीत ।। ☆

☆ || “लम्बा बहुत सफर”|| ☆

तल्ले फटे हुये जूतों के

लम्बा बहुत सफर।।

आखिर कहाँ- कहाँ

तक पसरा मेरा नया शहर।।

 

माथे से रिसने आ बैठी

धार पसीने की।

अटकी जैसे खरचे को

 तनख्वाह महीने की।

 

मोहरी  पर कीचड़ का

कब्ज़ा घुटनो चीकट  है।

देह काँपती  चलने में

ज्यों उखड़ी चौखट है।

 

औ’ किबाड़  सी छाती

काँपा करती है हरदम।

साँकल खुली अगर तो

बहने आतुर खडी नहर।।

 

मिला नहीं आटा 

अब तक केवल दो रोटी  का।

भूखा पेट दुख रहा

कल से  बेटी छोटी का।

 

समाचार में सुना सही था

मुफ्त अन्न बटना ।

राशन कार्ड बिना,

लावारिश को यह दुर्घटना।

 

नहीं अनाज दिला पाये

सारे प्रयास झूठे ।

सरकारों की तरह गई

यह जनजन उठी लहर ।।

 

मुझ पर नहीं सबूत कि

मैं अब तक भी हूँ जिन्दा ।

पटवारी प्रमाण को चाहे

होकर शर्मिन्दा ।

 

बिना प्रमाण नहीं जिन्दा

कर सकता पटवारी।

आखिर सरकारी बन्दा

होता है सरकारी ।

 

मैं चुपचाप उठा कर झोली

चला गया आगे ।

नहीं झेल पाया हूँ मैं

अब यह निर्दयी कहर।।

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

14-03-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #74 ☆ # बचपन # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय एवं भावप्रवण कविता “# बचपन #”) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 74 ☆

☆ # बचपन # ☆ 

मै और मेरा पोता

जो चार बरस का है छोटा

जब बगीचे में घूमते हैं

रंग बिरंगी चिड़ियों को देख

मन ही मन झूमते हैं

जब वो मुझसे

बाल सुलभ प्रश्न

पूछता है

तब मैं कुछ प्रश्नों के उत्तर

दे पाता हूं।

कुछ का उत्तर

मुझे भी नहीं सूझता है,

तब मैं उसे चाकलेट खिलाता हूँ

और चुप हो जाता हूँ।

 

उसे देख मुझे अपने

बचपन के दिन

याद आते हैं

मानस पटल पर

वो दृश्य लहराते हैं

वो गांव का छोटा सा

मिट्टी का घर

नीम के पेड़ों की छाया

रहती दिनभर

वो घर के पेड़ों के स्वादिष्ट जाम

वो ललचाते रसभरे आम

वो जामुन काली काली

निंबूओं की झुकी हुई डाली

वो मीठे मीठे बेर

सुबह सुबह लगते थे ढेर

गुलाब और चमेली के

फुलों की सुगंध

खुशबू लिए बहता

पवन मंद मंद

हमें खेलकूद की

पूरी आजादी थी

छुपने के लिए

कभी मां की गोद

तो कभी दादी थी।

 

और अब-

मेरा पोता नींद से

उठ भी नहीं पाता है

पर रोज नर्सरी में

जाता है

उसके सेहत की

हालत खस्ता है

पीठ पर उसके

बड़ा सा बस्ता है

खेल कूद उससे

छूट गया है

जैसे बचपन

उससे रूठ गया है

शिक्षा के व्यावसायिकरण का

यह एक खेल है

मासूम बच्चों के लिए

तो यह एक जेल है

क्या हम बच्चों के चेहरों पर

नैसर्गिक मुस्कान ला पाएंगे ?

या यह मासूम फूल

यूँ ही मुरझाते जाएंगे ?/

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 15 (1-5)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #15 (1 – 5) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -15

सीता का परित्याग कर राम रहे महिपाल।

सागर वेषिृत धरा का ही बस रखा खयाल।।1।।

 

लवणासुर से युद्ध में देख बड़े उत्पात।

यमुनातट वासी मुनि आये राम के पास।।2।।

 

रक्षक राजा राम थे, अतः था बड़ा सुयोग।

मुनि रक्षक बिन शांति से करते मंत्र-प्रयोग।।3।।

 

यज्ञ विध्न के नाश हित किया राम ने ध्यान।

धर्म सुरक्षा हेतु ही आते हैं भगवान।।4।।

 

लवणासुर की मृत्यु का प्रभु को दिया उपाय।

शूल-हीन हो बाण जब उस को मारा जाय।।5।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 85 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 85 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 85) ☆

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc. in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

हम ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए आदरणीय कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी के “कविता पाठ” का लिंक साझा कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें।

फेसबुक पेज लिंक  >>  कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी का “कविता पाठ” 

☆ English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 85☆

?  Unfaithful  ?

मैं तेरे बाद कोई

तेरे जैसा ढूँढता हूँ,

जो बेवफ़ाई करे

पर बेवफ़ा न लगे…

After you, I’ve been looking

for someone like you only,

Who is unfaithful but does

not appear disloyal at all…!

?  Accusation  ?

☆ 

फिक्र है सबको, खुद को

सही साबित करने की,

जैसे ये ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं,

संजीदा इल्जाम है कोई…!

Everybody is anxiously worried

to prove himself right,

As if, life is not just the life,

but some serious allegation…!

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 86 ☆ गीत – नदी मर रही है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा रचित  गीत – नदी मर रही है ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 85 ☆ 

☆ गीत – नदी मर रही है ☆

नदी नीरधारी, नदी जीवधारी,

नदी मौन सहती उपेक्षा हमारी

नदी पेड़-पौधे, नदी जिंदगी है-

भुलाया है हमने नदी माँ हमारी

नदी ही मनुज का

सदा घर रही है।

नदी मर रही है

*

नदी वीर-दानी, नदी चीर-धानी

नदी ही पिलाती बिना मोल पानी,

नदी रौद्र-तनया, नदी शिव-सुता है-

नदी सर-सरोवर नहीं दीन, मानी

नदी निज सुतों पर सदय, डर रही है

नदी मर रही है

*

नदी है तो जल है, जल है तो कल है

नदी में नहाता जो वो बेअकल है

नदी में जहर घोलती देव-प्रतिमा

नदी में बहाता मनुज मैल-मल है

नदी अब सलिल का नहीं घर रही है

नदी मर रही है

*

नदी खोद गहरी, नदी को बचाओ

नदी के किनारे सघन वन लगाओ

नदी को नदी से मिला जल बचाओ

नदी का न पानी निरर्थक बहाओ

नदी ही नहीं, यह सदी मर रही है

नदी मर रही है

*

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१२.३.२०१८

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ प्रेमा के प्रेमिल सृजन – होली ☆ श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ ☆

श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ 

(ई-अभिव्यक्ति में साहित्यकार श्रीमति योगिता चौरसिया जी का हार्दिक स्वागत है। प्रतिष्ठित समाचार पत्रों/पत्र पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में सतत प्रकाशन। कई साझा संकलनों में प्रकाशन। राष्ट्रीय / अंतरराष्ट्रीय मंच / संस्थाओं से 150 से अधिक पुरस्कारों / सम्मानों से सम्मानित। साहित्य के साथ ही समाजसेवा में भी सेवारत। हम समय समय पर आपकी रचनाएँ अपने प्रबुद्ध पाठकों से साझा करते रहेंगे।)  

☆ प्रेमा के प्रेमिल सृजन – होली ☆ श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ ☆

(विधा-कुण्डलिया)

होली आई साजना, बिखरे रंग गुलाल ।

मुझको कब ये रंग दे, तरसे मेरे गाल ।।

तरसे मेरे गाल, सजा के प्रेमिल आना ।

बाट जोहती प्रीत, सजन अब जीवन लाना ।।

कहती प्रेमा आज, योगिता जोगन भोली ।

नैन निहारे राह, कहे जो आई होली ।।1!!

 

होली के त्यौहार में, खेले सब जन रंग ।

है पौराणिक यह कथा, है प्रहलाद प्रसंग ।

है प्रहलाद प्रसंग, होलिका बनी सयानी ।

 भस्म करे जो आग, बनी है देख कहानी  ।।

कहती प्रेमा आज, कपट की जलती डोली ।

हुआ मगन मन आज, खेलती खुल के होली ।।2!!

 

होली खेले आज जो, कृष्ण राधिका देख ।

रास रचाये ग्वाल भी, करते हैं उल्लेख ।।

करते हैं उल्लेख, बनी जोड़ी है प्यारी ।

प्रीत सिखाती रीत, कहे जो दुनिया सारी ।।

कहती प्रेमा आज, बनी रसिकों की टोली ।

लिए सीख मनुहार, खेलते प्रेमिल होली ।।3!!

© श्रीमति योगिता चौरसिया ‘प्रेमा’ 

मंडला, मध्यप्रदेश 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 14 (81-87)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #14 (81 – 87) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -14

संध्यावंदन बाद सिया ने किया कुटी-निवास।

शैया थी मृगचर्म की, इंगुदि दीप प्रकाश।।81।।

 

कर नियमित स्नान, विधि, पूज अतिथि सत्कार।

कंद-मूल-फल खा, किया जीवन का उपचार।।82।।

 

लक्ष्मण ने कहा राम से सिया कथा विस्तार।

शायद करे वह राम के मन पै कठिन प्रहार।।83।।

 

हुआ बात सुन राम के मन पै एक आघात।

पौष-चंद्र सम कर चले नयन अश्रु बरसात।।84अ।।

 

क्योंकि लोक-निंदा से था सीता का परित्याग।

मन में निर्मल प्रेम था, धधक रही थी आग।।84ब।।

 

धर्म-धुरंधर राम ने किया समन्वित राज।

शोक संयमित रख किया सात्विक हर एक काज।।85।।

 

राम थे जिनने किया निज प्रिय पत्नी का त्याग।

राज-लक्ष्मी का रहा नित उन पर अति अनुराग।।86।।

 

त्याग सीता को, न सोचा राम ने फिर ब्याह को

स्वर्ण प्रतिमा गई बनाई धर्म के निर्वाह को।

सुन के यह वृत्तांत सीता ने भी दुख सब कुछ सहा

एक पत्नी व्रत की भी होती है एक महिमा महा।।87।।

 

चौदहवां  सर्ग समाप्त

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ #135 – आतिश का तरकश – ग़ज़ल-21 – “मौत आती है मगर नहीं आती…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। श्री सुरेश पटवा जी  ‘आतिश’ उपनाम से गज़लें भी लिखते हैं । प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ आतिश का तरकशआज प्रस्तुत है आपकी ग़ज़ल “मौत आती है मगर नहीं आती…”)

? ग़ज़ल # 21 – “मौत आती है मगर नहीं आती…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ?

मौत आती है मगर नहीं आती,

ठीक से क्यूँ एक बार नहीं आती।

 

खैर मनाती  ज़िंदगी तब तक,

आहट तेरी जब तक नहीं आती।

 

दिल से दिल लगाती है बेवफ़ा,

सिर पर चढ़ क्यों नहीं आती।

 

झलक दिखा कर छुप जाती है,

रास्ता देखे महबूब नहीं आती।

 

दिन किसी तरह कट जाता है,

नीद मगर रात भर नहीं आती।

 

हो रहे सभी परेशान घर बाहर,

मुसीबत एक बारगी नहीं आती।

 

एक दिन तेरा तो पक्का ठहरा है,

काश तड़पा-तड़पा के नहीं आती।

 

आ जाए अगर एक बार ठीक से,

आतिश को फिर याद नहीं आती।

 

© श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा#74 ☆ गजल – ’’कुछ याद रहे दिन वे…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक भावप्रवण  ग़ज़ल  “कुछ याद रहे दिन वे…”। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। ) 

☆ काव्य धारा 74 ☆ गजल – ’कुछ याद रहे दिन वे… ’’ ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

दिन से भी कहीं ज्यादा रातें हमें प्यारी हैं

क्योंकि ये सदा लातीं  प्रिय याद तुम्हारी हैं।

मशगूल बहुत दिन हैं, मजबूर बहुत दिन है

रातों ने ही तो दिल की दुनियाँ  ये सॅंवारी हैं।

सूरज के उजाले में परदा किया यादों ने

दिन तो रहे दुनियाँ के, रातें पै हमारी है।

कुछ याद रहे दिन वे भड़भड़ में गुजारे जो

है याद मगर रातें तनहाँ जो गुजारी हैं।

कोई ’विदग्ध’ बोले, दिन में कहाँ मिलती है ?

रातों के अँधेरों में जो मीठी खुमारी है।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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