हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 62 – अनोखा रिश्ता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अनोखा रिश्ता।)

☆ लघुकथा # 62 – अनोखा रिश्ता ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

 

“रवि आज सुबह-सुबह कहां जा रहे हो इतनी जल्दी-जल्दी तैयार होकर?” पत्नी  सुनंदा ने पूछा।

“तुम भी तैयार हो जाओ। आज हमें वृद्धा आश्रम चलना है। मां को घर लेकर आना है। विदेश से आए एक महीना हो गया है।”

“तुम जाओ मैं नहीं जाऊंगी?”

रवि ने वृद्धाश्रम पहुंचकर अपनी मां के बारे में पूछा तो पता चला कि उसकी मां यहां आई थी पर थोड़ी देर के बाद ही चली गई थी ?

“हमने आपके नंबर पर फोन करके आपको सूचित तो किया था। क्या आपको पता नहीं चला? आपने कभी कोई खबर भी नहीं की इन दो सालों में?”

“लेकिन मेरी पत्नी तो मां की खबर लेती थी और पैसे भी भेजती थी!”

“देखिए आप झूठ मत बोलिए ? हम लोगों को रखते हैं और सुविधा देते हैं तो पैसे लेते हैं। आप कोई रसीद हो तो दिखाइए? आप अपने मां-बाप को संभाल नहीं पाते हो और हमारे ऊपर इल्जाम लगा रहे”

वह अपने पुराने घर जाता है जिसे उसने बेच दिया था। वहां उसे अपनी मां नजर आती है और वह उसे घर में काफी खुश दिख रही थी।

उसे मकान मालिक (अजय) ने उसे अपने घर के अंदर घुसने से मना कर दिया और कहा कि-  “जब तुम यह घर बेचकर चले गए तो यहाँ क्यों आए हो?”

उसने कहा “मां को लेने के लिए…।“

“बरसों बाद तुम्हें मां की कैसे याद आई?  तुम्हारी मां अब तुम्हारी नहीं हैं? घर के साथ-साथ अब यह मेरी मां हो गई। हमें तो पता ही नहीं था कि आपकी मां है यह बेचारी इस घर के बाहर बैठे रो रही थी। पड़ोसियों से पता चला कि इस घर की मालकिन है। हमने अपने घर में  रहने दिया। वे  पूरे घर का काम कर देती थी और तरह-तरह के अचार पापड़ भी बना देती थी। हम इसे अपने रिश्तेदार और पड़ोसी को बेचने लगे। इतना मुनाफा कमाया जो कुछ भी है यह सब इनके कारण ही है। तुमने इन्हें बेसहारा कर दिया था और हम बेसहारों को मां मिल गई। अच्छा है कि मां को कुछ याद नहीं रहता। मुझे ही अपना बेटा मानती  है। भगवान की कृपा से मुझे यह अटूट रिश्ता मिला है। तुम्हें सब कुछ मिला था पर तुमने खो दिया लालच में अब तुम जा सकते हो।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – ज़िम्मेदारी ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम और विचारणीय लघुकथा ज़िम्मेदारी )

☆ लघुकथा – ज़िम्मेदारी ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

वह लड़की तीन साल से वहाँ रहकर संस्कृति पर शोध कर रही थी। वह एक घर में किराए पर रहती थी। वृद्ध मकान मालिक और मालकिन उससे बहुत प्यार करते थे। उसका काम उन्हें समझ में नहीं आता था, पर वे बहुत बार उसे चुपचाप मुग्ध दृष्टि से देखते रहते थे। धर्मांध लड़ाके जब देश की सत्ता पर क़ाबिज़ हो गए तो लड़की डर गई। वह देश से बाहर निकल जाने के प्रयास में थी कि उसके मकान मालिक की हत्या कर दी गई। ग़म में डूबी मकान मालकिन ने उससे कहा, “तुम जल्दी इस नरक को छोड़ दो।”

“लेकिन आप अकेली हैं और बीमार भी। ऐसे में…”

“तुम मेरी चिंता मत करो। तुम जवान हो, तुम्हारे सामने पूरी ज़िंदगी पड़ी है, भाग जाओ।”

“मेरी वजह से आपको कोई ख़तरा हो तो मैं चली जाती हूँ वरना अब जो भी हो, मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी।”

वृद्धा ने लड़की को गले लगा लिया। बहुत देर तक दोनों एक दूसरे से चिपकी रहीं। जब वे अलग हुईं तो दोनों के भीतर ज़रा सा भी खौफ नहीं बचा था।

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क – 406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – लघुकथा – जीवन की परिभाषा – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय दार्शनिक लघुकथा “– अनजान प्रदेश –” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ — जीवन की परिभाषा — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मैंने यूँ ही सीख लिया हो संभल कर और सतर्क रह कर अपना जीवन जिया करूँ। आज अचानक मेरे मन में प्रश्न पैदा हुआ क्या मैंने ऐसा किया हो? मैंने किया हो, लेकिन पूर्ण रूप से नहीं। पर जितना किया वह मेरे जीवन के लिए पर्याप्त रहा। यह ऐसा है आधा गिलास भरा देखूँ, आधा गिलास खाली नहीं। मुझे लगता है यह तो मैं संसार को बाँच रहा हूँ। कौन इस सिद्धांत को झूठ कह सकता है।

— समाप्त  —

© श्री रामदेव धुरंधर

06 – 03 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : [email protected]

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – कसक ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – कसक ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

वह घर आया और रूठ कर दादी के पास पहुच गया। उसकी बाजू पकड कर बोला- दादी , फोन पर मेरी पापा से बात करवा दे।

– क्यों ?

– दादी , कहां रहता है , मेरा पापा ?

– वो तो काम के लिए दूर रहता है ।

– बुला उसे अभी ।

– क्यों ?

– मैं अभी जाॅय के साथ खेल रहा था । उसका पापा आया और हम दोनों को कार में घुमाने ले गया ।

– फिर क्या हुआ ?

– जब मेरे पापा के पास गाड़ी है, तो मैं जाॅय के पापा की गाडी में सैर क्यों करूं ?

– बेटे , तेरे पापा नहीं आ सकते ।

– कह दे फिर मैं उनसे बात नहीं करूंगा ।

-नहीं बेटे, ऐसे नहीं कहते ।

– बस फिर, करवा दे मेरी बात। वह अपनी जिद्द पूरी करके ही माना । उसके बाद सपनों में खो गया और पापा की गाड़ी में सैर करने निकल गया ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क : 1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ कथा-कहानी – पापा – गुजराती लेखिका – सुश्री निमिषा मजुमंदार ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆

श्री राजेन्द्र निगम

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेंद्र निगम जी ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में प्रबंधक के रूप में सेवाएँ देकर अगस्त 2002 में  स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके बाद लेखन के अतिरिक्त गुजराती से हिंदी व अँग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद कार्य में प्रवृत्त हैं। विभिन्न लेखकों व विषयों का आपके द्वारा अनूदित 14  पुस्तकें प्रकाशित हैं। गुजराती से हिंदी में आपके द्वारा कई कहानियाँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखों का गुजराती व उड़िया में अनुवाद हुआ है। आज प्रस्तुत है आपके द्वारा सुश्री निमिषा मजुमंदार जी की कथा का हिन्दी भावानुवाद “आश्रय”।)

☆  कथा-कहानी –  पापा – गुजराती लेखिका – सुश्री निमिषा मजुमंदार ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆

आकाश से बरसतीं अग्नि-ज्वालाएँ मानो कम हों, इसलिए वाहनों का धुआँ और साथ ही हार्न की कर्कश आवाजें… मनुष्य की सहनशक्ति की भी कोई सीमा तो होगी ! ट्राफिक सिग्नल की लाल रोशनी देखकर नेहा का पैर ब्रेक पर चला गया | ‘ओह, एक सौ अस्सी सेकण्ड… और अहमदाबाद की यह गर्मी…!’

सिर पर बँधे दुपट्टे को उतारो तो दिमाग और मन दोनों को उबाल के लिए मजबूर करनेवाली गर्मी… और गोगल्स का बिल्कुल भी लिहाज रखे बगैर आँख में अँगारें को आँज देनेवाली दुपहर की धूप…! ‘अब बरसात हो जाए तो अच्छा !’ तब बेचैनी पसीना बनकर बह रही थी |

वैसे तो वह कल शाम से ही व्याकुल थी | समीर ने अल्टीमेटम दे दिया था, “नेहा, तुम्हें दो-तीन महीने का वक्त देता हूँ, निर्णय कर लेना | अब और अधिक राह नहीं देख सकते | हम चार वर्ष से साथ घूम रहे हैं | अब या तो विवाह कर लें या फिर अलग हो जाएँ| मेरे मम्मी-पापा अब जल्दी कर रहे हैं | तुम्हें तो किसी से कुछ पूछना नहीं है, मात्र एक निर्णय ही लेना है !”

नेहा उसे किस तरह समझाए कि वह एक निर्णय लेना ही तो बहुत जटिल है न ! पापा को ‘आनंद सीनियर सिटीजन्स केयर सेंटर’ में रखने के लिए उसने उनका नाम तो दर्ज करवा दिया था | दो बार वह अचानक गई थी, यह देखने के लिए कि वे बुजुर्गों की देखरेख किस प्रकार करते हैं | छह वर्ष पहले निदान हुआ था कि पापा को अल्झाइमर हुआ है और तब यह मानने में ही नहीं आ रहा था कि पूरी जिंदगी सक्रिय रहे पापा को यह रोग कैसे हो सकता है ? निवृत्त होने के बाद भूलने की शुरुआत घर के रास्ते को भूलने से हुई थी | और फिर भूलना बढ़ता गया और धीरे-धीरे वे सब कुछ भूलते गए |

जिस पापा को उनकी दोनों बेटियों नेहा-निराना के बचपन की मील के पत्थर जैसे सभी दिनांक ठीक से याद रहते थे, कि किस तारीख को कब वह उल्टी पड़ी, कब घुटने के बल चलने लगी, किस तारीख को पहला कदम रखा, आज उन्हीं पापा को आज का दिनांक मालूम नहीं है ! अपने हाथों नन्हीं नेहा को कौर खिलानेवाली पापा को आज उनके स्वयं के मुँह में डाले गए कौर को चबाने का ध्यान भी नहीं है ! नेहा के स्कूल के स्पोर्ट्स डे, पेरेंट्स-टीचर मीटिंग के बारे में कभी न भूलनेवाले उसके प्रिय पापा नेहा को ही नहीं पहचान रहे हैं !

नेहा की माँ जब तक थी, तब तक परेशानी नहीं थी, लेकिन दो वर्ष पहले कोरोना के दौरान वे गुजर गईं और तब से ही नेहा की जवाबदारी बढ़ गई | नेहा ऑफिस जाती, उतने समय के लिए केयर-टेकर रमेशभाई आते थे, लेकिन शेष समय पापा नेहा पर ही पूर्ण रूप से अवलंबित थे | परिस्थिति इतनी खराब हो गई थी कि घर पर यदि ताला न लगाया हो और नेहा बाथरूम जाकर वापिस आए, तब तक पापा बाहर निकलकर किसी भी दिशा में चले जाते| नेहा दौड़ती-दौड़ती सब रास्तों पर तलाश करती, तब कहीं जाकर वे मिलते | उन्हें साथ लेकर कहीं जाना तो पूरी तरह असंभव था |

डॉक्टर ने कहा था कि ऐसे रोगी बहुत अधिक जीवित नहीं रह सकते हैं | समीर के साथ परिचय बढ़ा, तब मम्मी थी, लेकिन अब उनकी गैर-मौजूदगी में पापा तो नेहा की ही जवाबदारी में थे | विवाह के बाद वह ससुराल जाए, तो वहाँ समीर के मम्मी-पापा थे, इसलिए पापा को साथ ले जाना संभव नहीं था | शायद समीर भी इस जिम्मेदारी को उठाने की तैयारी नहीं थे और साथ ही नेहा को भी भावी वैवाहिक जीवन के संबंध में उसके रंगीन सपने थे और उसमें पापा कहीं फिट नहीं बैठते थे | समीर उसे बहुत पसंद था | उसे गँवाने के बारे में तो वह स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी | अब तक नेहा विवाह की बात को किसी तरह आगे बढ़ाती रही, लेकिन समीर अब प्रतीक्षा करने के लिए तैयार नहीं था |

दीदी ने इस उलझन को ऐसे सुलझाया कि पापा को ‘आनंद केयर सेंटर’ में छोड़ दिया जाए | बेचारी दीदी ! वह इस सलाह के अतिरिक्त और कुछ कर भी नहीं सकती थी | उसके घर में वृद्ध सास-ससुर और दो बालक, ऐसे में वह पापा की सँभाल कैसे करें ! इस समाधान को उसने मजबूरी में स्वीकार तो कर लिया, लेकिन वह जानती थी कि यह बोलने में जितना सहज लग रहा है, वैसा यह है नहीं !

“मेडम… ओ मेडम…”, कान में पड़े ये शब्द बिल्कुल नजदीक से बोले गए थे, लेकिन विचारमग्न नेहा का ध्यान खींचने में वे सक्षम नहीं थे |

पुनः आवाज आई | इस बार संबोधन कुछ अलग था, “दीदी, मात्र दो सौ रुपयों की जरूरत है, दे दो न !” इस वाक्य ने नेहा का ध्यान खींचा | उसने देखा कि एक नौ-दस वर्ष का बालक स्कूटर के पास हाथ लंबा कर खड़ा हुआ था | बहुत समय से बिना धुला, अच्छे बड़े माप का सफेद बुशर्ट और खाकी चड्डी, जो उजागर कर रहे थे कि वे शायद उतरे हुए किसी अन्य से मिले होंगे | नाड़े की डोरी से सलाई जैसी कमर पर बाँधी हुई चड्डी के बाहर शर्ट का एक भाग लटक रहा था | पीछे ‘फटा या फटेगा’ जैसे बेकपेक पुस्तकों का अनिच्छापूर्वक भार झूल रहा था | पैर में स्लीपर थे,मानो दो-तीन मालिकों के उपयोग के बाद वे लिए गए हों | इस पूरे निस्तेज चित्र से अलग दो पानीदार आँखों ने नेहा को किसी चुंबक की तरह खींचा |

कुछ मजाक के सुर में और कुछ उसको वहाँ से खदेड़ देने के आशय से नेहा के मुँह से निकला, “अरे, तुम तो ऐसे माँग रहे हो, मानो मैं पिछले जन्म की तुम्हारी देनदार हूँ ! कोई माँगता है तो दो-पाँच रुपए माँगता है | इस तरह कोई दो सौ रुपए माँगता है ? कुछ होश भी है ? चलो भागो |”

लड़के की भागने की तैयारी बिल्कुल भी नहीं थी, “दीदी, मेरी दादी बहुत बीमार है | यह देखो, डॉक्टर की पर्ची | उसकी दवाई लाने के लिए चाहिए | सच कह रहा हूँ |”

उसके हाथ में वास्तव में डॉक्टर की पर्ची थी | ट्राफिक सिग्नल की रोशनी हरी होने ही वाली थी | नेहा को उस पर दया आई |

कुछ अधिक पूछताछ के मकसद से उसने पूछा, “सिविल अस्पताल जाओगे तो मुफ्त में दवाई मिल जाएगी !”

वह लाचार मुँह ऊँचाकर बोला, “दीदी, सिविल अस्पताल की दवाई लागू नहीं होती, वह गर्म पड़ती है | दादी को इस डॉक्टर की दवाई ही माफिक रहती है | प्लीज, जल्दी दो न ! मुझे स्कूल में जाने की देरी हो रही है !”

“तुम्हारे मम्मी-पापा ?”

“वे तो मजदूरी पर गए हैं | वे काम न करें, तो हम खाएँ क्या ?”

नेहा का हाथ अनायास ही पर्स में चला गया | उसने पचास रुपए दिए | उसके हाथ में जैसे ही रुपए आए, वह तो पैरों में पंख आएँ हो, उस तरह उड़ गया | तब ही ट्राफिक की हरी रोशनी हो गई, इसलिए वह किस ओर गया, यह देखने का वक्त ही नहीं रहा |

नेहा उसके स्वयं के जंजाल में ही इतनी उलझी हुई रहती थी कि वह लड़का शायद उसे याद भी नहीं आता, लेकिन सप्ताह के बाद ऑफिस जाते समय वह फिर ट्राफिक सिग्नल पर रुक गई | नेहा का चेहरा दुपट्टे से ढँका हुआ था और वह लड़का शायद उसे भूल गया होगा, इसलिए उसके पास आकर उसी तरह से उसने पुनः दो सौ रुपए माँगे | इस बार भी वही… दादी की बीमारी का बहाना ! उस विभूति को भूल जाएँ, ऐसी वह कहाँ थी ! नेहा उसे तुरंत पहचान गई |

अब मन में शंका का कीड़ा उभरा, ‘इस लड़के को हर वक्त दो सौ रुपए जैसी बड़ी रकम की जरूरत ही क्यों पड़ती है ? यह कोई उल्टा-पुल्टा धंधा तो नहीं करता होगा ? जुआ… या फिर ड्रग्स…? वैसे तो लगता है कि पढ़ने के लिए जाता है, तो फिर…? इसके माँ-बाप को मालूम होगा ? इतनी कम उम्र में ऐसे उल्टे-पुल्टे धंधे करता हो तो, किसी को तो इसे रोकना चाहिए, नहीं तो इसकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी ! आज तो देखना ही पड़ेगा कि यह इन रुपयों का क्या करता है !’

नेहा, “तुम्हें मैं पैसे तो दूँगी, लेकिन तुम मुझे तुम्हारे घर ले जाओ, तुम्हारी दादी के पास !”

लड़का एक पल के लिए रुका और फिर तुरंत बोला, “हाँ,चलिए | आपको मुझ पर विश्वास नहीं हो रहा है न ? आप खुद ही देख लिजिए |”

आगे वह लड़का दौड़ रहा था और पीछे था, नेहा का स्कूटर… कुछ दूर एक बहुत  गंदी झोपडपट्टी के आगे वे पहुँचे |

“अब आगे स्कूटर नहीं जाएगा, इसे दीदी, यहीं रख दो |”

दुपहर का वक्त था, इसलिए इक्के-दुक्के व्यक्ति के अलावा वहाँ ख़ास कोई बस्ती दिखाई नहीं दे रही थी | कुछ अधनंगे लड़के खेल रहे थे और वे कुतूहल से नेहा को ताक रहे थे | उस नजर से परेशान होकर उसे वापिस लौटने की इच्छा हुई, लेकिन फिर मन कड़ाकर वह आगे बढ़ी | कुछ कदम चलकर वे लोग एकदम एक जीर्णशीर्ण झोंपड़ी के पास पहुँचे | लड़के के इशारा करने पर नेहा ने अंदर नजर घुमाई, झोंपड़ी जैसी ही जीर्ण खाट पर उम्र के पड़ाव पर पहुँची एक वृद्धा हाथ-पैर समेटकर औंधी पड़ी हुई खाँस रही थी | शरीर में सिर्फ हड्डियाँ और चमड़ी ही थे | यदि वे खाँसती न होती, तो शंका होती कि वे जीवित भी है या नहीं | पास रखी हुई मेज के तीन पाए थे और चौथे के लिए ईंटो के थप्पे का सहारा था | मेज पर दवाई की एक खाली बोतल और एक पीतल का ग्लास रखा हुआ था | नेहा की नजर जल्दी से झोंपड़ी में घूम गई | खूँटी पर दो-चार चीथंडे, एक बगैर घाट की पतरे की पेटी और कोने में ढक्कनवाले बगैर टींचे हुए दो-तीन डिब्बे, बस इतना ही माल असबाब था | ‘इसमें चार व्यक्ति किस तरह रहते होंगे ? अरे ! इससे तो मवेशियों को बाँधकर रखने का स्थान भी अच्छा होता है !’

लड़के पर शंका करने के कारण नेहा को स्वयं पर इतनी शर्म आई कि वह एक भी अक्षर बोले बगैर वहाँ से निकल गई |

पूरे रास्ते मन पर वह लड़का ही छाया रहा | रिसेस में रीना और शिल्पा के साथ लंच लेते समय भी नेहा उसकी ही बात करती रही | “रीना, लोग इतने गरीब होते हैं, वह यदि मैंने आज अपनी नजरों से नहीं देखा होता, तो मुझे मालूम ही नहीं होता ! क्या खाते होंगे और वे कैसे जीते होंगे ? ईश्वर ने हमें भरपूर दिया है ! हमें कुछ करना चाहिए ?”

रीना के पहले शिल्पा कूदी, “यार, तुम कितने लोगों के लिए करोगी ? ऐसे तो इस देश में लाखों लोग हैं ! हम पूरे बिक जाएँ, तब भी उनके पूरे खाने का इंतजाम नहीं कर सकते हैं | उसे भूल जाओ और इस समाजसेवा के भूत को सिर से उतार दो !”

लेकिन नेहा का भूत भला जल्दी उतरनेवाला कहाँ था ! उसके मन पर तो साक्षात् दरिद्रनारायण की मूर्ति हावी हो गई थी | अब तो रीना भी साथ आने के लिए तैयार हो गई थी | करीब तीन दिन के बाद शाम को एक थैला भरकर कपड़े, एक बड़े बैग में किराने का सामान और कुछ फल आदि लेकर वे दोनों झोंपडपट्टी के पास पहुँच गई | इस वक्त सायंकाल था, इसलिए बहुत लोग दिखाई दे रहे थे | वहाँ पहुँचकर उन्होंने आवाज लगाईं, “कोई है ?” यह सुनकर एक दुबली-पतली करीब चालीस वर्ष की एक बाई बाहर आई |

“किसका काम है ?” के जवाब में नेहा ने उस लड़के की बात की | यह भी कहा कि वह यहाँ पहले आई थी | उस बाई के चेहरे पर अबूझ भावों का आन-जाना होता रहा | पूरी बात हो गई तब नेहा ने यह और कहा कि ये सब वस्तुएँ उन्हें और विशेष तो उनके लड़के को देने के लिए आई है |

अब उस महिला के चेहरे पर दया-मिश्रित मुस्कान आ गई, “अरे बहन, वह शनिया आपको बना गया | आपके जैसी पढ़ी-लिखी उसकी बातों में आ जाती हैं और मुआ वह अच्छा रुपए बना लेता है | वह कोई मेरा लड़का नहीं है… वह तो मगपरा के झोंपड़े में रहता है… वह तो मेरी बुढ़िया के बहाने… सब से रुपया लेता रहता है | दिन में तो मैं मजदूरी पर जाती हूँ, इसलिए वह उसका मनपसंद कुछ करता रहता है | यह तो अब कैसे मालूम कि उसने कितनों से कितने रुपए लिए होंगे ?”

नेहा तो आघात से वहीं ढेर जैसी हो गई | ‘इतना-सा लड़का उन्हें बना गया ? ऐसी मूर्ख तो वह कभी बनी नहीं थी ! उसने वे सब वस्तुएँ उस बाई को दे दीं | बाई तो खुशी से पागल ही हो गई | वह नेहा को खुश करने के लिए शनिया को गालियाँ देती रहीं… लेकिन नेहा वह सब सुनने की हालत में नहीं थी, मौन रहते हुए वह रीना का हाथ खींचकर चल दी|

समीर को कहा तो वह हँस दिया, “नेहा, वह इतना-सा बच्चा, तुम्हें उल्लू बना गया !”

वास्तव में उल्लू बना गया ! नेहा को स्वयं पर बेहद गुस्सा आ रहा था | नेहा की तो हालत अब ऐसी थी कि रास्ते पर उस लड़के जैसा कोई नजर आए, तो उसके पैर अपनेआप स्कूटर के ब्रेक पर चले जाएँ ! नेहा को यह विचार सतत बेचैन करता था कि ‘लड़का आखिर उस पैसे का क्या करता होगा ? उसे जब वह याद आता तो साथ ही इतना गुस्सा भी आता कि यदि वह नजर आ जाए, तो उस पर दो झापट लगाकर उसे सीधा कर दे !

नेहा को अधिक राह नहीं देखनी पड़ी ! पंद्रह दिन भी नहीं गुजरे थे कि वह नेहा की नजर के सामने चौराहे पर दिखाई दिया | वह तो पूरी घटना से अनजान था, इसलिए नेहा को देखते ही अन्य सब स्कूटरवालों को छोड़कर नेहा के पास पहुँच गया | वही निर्दोष चेहरा और करुणामय आवाज, “दीदी, अच्छा हुआ, आप मिल गईं | डॉक्टर ने दादी को नई दवाई लिखी है | सिर्फ दो सौ रुपए चाहिए, दो न ?”

नेहा को गुस्सा तो ऐसा आ रहा था कि उसे एक जोरदार थप्पड़ लगा दे, लेकिन उसने शांति बनाए रखी | सिग्नल खुलने में अभी कुछ सेकंड की देर थी और उसने पर्स में से दो सौ रुपए उसे दिए | वह दौड़ा | नेहा ने भी स्कूटर दौड़ाया, लेकिन ट्राफिक के कारण उसे कुछ देर हो गई और वह आँख से ओझल हो गया | नेहा की बेचैनी पराकाष्ठा पर पहुँची, ‘अब उसे कहाँ ढूँढना ?’ अचानक उसे याद आया कि वह मगपरा की झोंपडपट्टी में रहता है और वह स्कूटर उस ओर ले गई | वह दूर से ही दिखाई दिया… हाथ में एक कागज की पुड़िया लेकर वह दौड़ता हुआ जा रहा था | उसने स्कूटर रोका और सुरक्षित अंतर रखते हुए वह उसके पीछे पहुँच गई | एक कच्चे कमरे जैसे मकान के पास की बिल्कुल संकड़ी नाली से लगी जैसी जगह में वह घुस गया | नेहा छिपती हुई, उसके पीछे पहुँच गई |

दीवार के कोने के पीछे से उसने एक नजर डाली तो पीछे खुले बाड़े में, डोरी से बँधा हुआ एक मध्यम वय का पुरुष नारियल की डोर से बनी खाट पर बैठा हुआ दिखाई दिया | मैले-कुचेले कपड़े, बढे हुए बाल और दाढ़ी ! उसके हाथ और चेहरे के हावभाव से ही लगता था कि वह मानसिक रूप से अस्थिर है | वह… हाँ शनिया… यही नाम था न उसका ! उसने, “पापा, ये जलेबी… आप सुबह याद करते थे न ! सब आपकी है, हँ !” ऐसा कहते हुए उसने पुड़िया खोल दी और उस व्यक्ति के सामने रख दी और वह किसी भुखमरे की तरह उस पर टूट पड़ा | एक गले से नीचे उतरती भी नहीं थी और वह मुँह में दूसरी ठूँस देता था | उसके हाथ, मुँह, कपड़ा सब चासनी में लथपथ हो गए थे, लेकिन उस बंदे को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था | “पापा, धीमे-धीमे खाओ | यह देखो चासनी ढुल रही है | चीटियाँ आएँगी | आपको नहलाना पड़ेगा तो माँ नाराज होंगी |” यह कहते हुए वह प्रेम से उनके हाथ- मुँह पोंछ रहा था |

इस विचित्र दृश्य में डूबी नेहा को यह याद ही नहीं रहा कि वह वहाँ क्यों खड़ी थी ! उसके कंधे पर किसी का हाथ अड़ा | पीछे देखा तो एक स्त्री थी | नेहा के चेहरे के भाव मानो वह समझ गई हो, इसलिए वह बोली, “यह मेरे शनिया का बाप है | पागल है | बाँधकर रखना पड़ता है, नहीं तो कहीं चला जाए | इसे खाने के अलावा और किसी बात का मालूम नहीं पड़ता है | खाने का बहुत शौकीन है | रोज कुछ नया खाने के लिए चाहिए | वह जब कमाता था, तब रोज शाम को आते समय पुडिया बँधवाता और दोनों बाप-बेटे खाते; लेकिन अब…? मैं तो रोटी का इंतजाम करूँ या ये सब शौक ? इसलिए शनिया उसके बाप के लिए माँग कर ले आता है | बाप के मुँह से जो निकल जाए, वह हाजिर कर देता है | आपसे भी रुपए माँगे होंगे | इसीलिए आई हैं न !”

नेहा को क्या बोलना है, यही समझने में उसे कुछ वक्त लगा | मूल काम याद आया| “लेकिन इतना सब झूठ…? दादी बीमार है… इतना सब किस लिए… यह तो मुझे किसी बीमार माँजी के पास ले गया था ! यह लोगों को मूर्ख बनाकर पैसे बनाता है !”

वह हँसी, “वह यदि सच बोलकर माँगे, तो बहनजी आप देंगी ? सच कहना, पागल इन्सान को मिठाई खिलाने के लिए कोई रुपए देगा ? शनिया को उसके बाप से बहुत प्यार है | बाप की इच्छा पूरी करने के लिए वह कुछ भी कर के रुपिए ले आता है | वह चोरी नहीं करता है, माँग कर लाता है और इसलिए मैं उसे रोकती नहीं हूँ |”

सुन्न हो गए मन के साथ, नेहा के पैर अपने आप वहाँ से चलने लगे | स्कूटर के पास पहुँचकर, उसने पर्स में से मोबाईल निकालने का पहला काम किया | पलकों की पाल पर इकट्ठे आँसुओं को सुनाई दिया, “समीर, मैं तुम्हें मेरी ओर से मुक्त करती हूँ | तुम्हें बहुत चाहती हूँ, लेकिन मुझे माफ़ करना, जब तक पापा हैं, तब तक अपना विवाह संभव नहीं है |”

 ♦ ♦ ♦ ♦

मूल गुजराती लेखिका – सुश्री निमिषा मजुमंदार

संपर्क – जूना पावर हाउस सोसायटी, रोटरी भवन के पीछे, जेलरोड, मेहसाणा, 384002 – मो. 9898322931

हिंदी भावानुवाद  – श्री राजेन्द्र निगम,

संपर्क – 10-11 श्री नारायण पैलेस, शेल पेट्रोल पंप के पास, झायडस हास्पिटल रोड, थलतेज, अहमदाबाद -380059 मो. 9374978556

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 148 ☆ बाँटने से बढ़ता है ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय बाल लघुकथा – बाँटने से बढ़ता है। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 148 ☆

☆ बाल लघुकथा – बाँटने से बढ़ता है ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

ओंकार प्रतिदिन सूर्योदय के पहले ही उठ जाता और उगते हुए सूरज को प्रणाम करता था।उसके माता – पिता ने समझाया था कि ‘हमें प्रकृति के तत्वों – धरती, सूर्य, चंद्रमा, नदी, समुद्र, पेड़-पौधों सबकी रक्षा करनी चाहिए। हमें इनका आभार मानना चाहिए क्योंकि ये ही प्राणियों के जीवन को स्वस्थ तथा सानंद बनाते हैं। जब सर्दियों में धूप नहीं निकलती तब हमें कैसा लगता है? बारिश नहीं होती तो किसानों के खेत सूखने लगते हैं, तब हम सब कितना परेशान होते हैं।‘ 

ओंकार सातवीं कक्षा में पढ़ता था। उसने अपने मित्रों को भी ये बातें बताई, सब खुश हो गए। सबने तय कि कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे पर्यावरण को हानि पहुँचे।

ओंकार रोज सुबह होते ही घर की छत पर पहुँच जाता। सुबह की ताजी हवा उसे बहुत भाती।ऐसा लगता मानों ऑक्सीजन सीधे फेफड़ों में भर रही हो। सूरज निकलने तक वह पूरब दिशा की ओर मुँह करके, हाथ जोड़कर खड़ा रहता। आकाश में सूरज की लालिमा झलकने लगती। सूर्योदय का दृश्य बड़ा ही मनमोहक होता है। सफेद – नीला आकाश और उसमें सूर्य – किरणों की लालिमा ! रंगों का कैसा सुंदर मेल ,ऐसा लगता मानों किसी कलाकार ने सिंदूरी रंग आकाश में बिखेर दिया हो। पल भर में ही सूरज का प्रकाश पूरे आकाश में पसर जाता। तेज रोशनी से धरती जगमगा उठती है। चिड़िया चहचहाने लगतीं। पशु – पक्षी मनुष्य सभी उत्साहपूर्वक काम में लग जाते। वह अक्सर सोचता – ‘सूर्य भगवान के पास प्रकाश का भंडार है क्या ? संपूर्ण विश्व को प्रकाश देते हैं पर रोज सुबह वैसे ही चमचमाते आकाश में विराजमान | तेज इतना कि सूरज की ओर आंख उठाकर देखना भी कठिन |’

एक दिन ओंकार ने सूरज से पूछ ही लिया – “आपके पास इतना प्रकाश, इतना तेज कहाँ से आता है? चंद्रमा घटता – बढ़ता रहता है लेकिन आप तो रोज एक जैसे ही दिखते हो?”

सूर्यदेव मुस्कुराए – बड़े प्रेम से अपनी सुनहरी किरणों से ओंकार के सिर पर मानों हाथ फेरते हुए बोले –“बेटा! मेरा प्रकाश बाँटने से बढ़ता है। यह संपूर्ण विश्व के प्राणियों को जीवन देता है,उनमें चेतना जगाता है। जब मैं बादलों से ढंका रहता हूँ तब भी तुम सबके पास ही रहता हूँ। प्रकाश, तेज, ज्ञान, विद्या, इन्हें नाम चाहे कुछ भी दो,ये ऐसा धन है जो बाँटने से बढ़ता है। जितना ज़्यादा  दूसरों के काम आता है उतना बढ़ता जाता है।“

ओंकार प्रफुल्लित हो गया। सूर्य के प्रकाश के भंडार का राज उसे समझ में आ गया था। ओंकार ने यह बात गाँठ बाँध ली थी कि ‘हमें जीवन में खूब मेहनत से ज्ञान प्राप्त कर समाज की सेवा करनी चाहिए, जैसे सूरज करता है अनंत काल से पृथ्वी की |”

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – [email protected]  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ बाल कथा – बिट्टी का जूता ☆ सुश्री रजनी सेन ☆

सुश्री रजनी सेन 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री रजनी सेन जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। आज प्रस्तुत है आपकी बाल कथा “बिट्टी का जूता)

☆ बाल कथा – बिट्टी का जूता ☆ सुश्री रजनी सेन

बिट्टी जिस दिन से आई है कहीं नहीं गई, फिर उसका जूता कैसे खो सकता है। यह सवाल 6 साल के जादू के दिमाग में ततैये की तरह भिन-भिन कर रहा था। बिट्टी जिस दिन से घर में आई थी, लकड़ी के छोटे से सिंगारदान पर बैठे-बैठे पूरे घर को निहारती रहती थी। बिट्टी को देख जादू सोचता कि इस गुड़िया में मम्मी को ऐसा क्या नज़र आया जो इसे इतना प्यार करती हैं। किसी को उसे हाथ तक नहीं लगाने देतीं और आते-जाते उसे ऐसे निरख कर जाती हैं जैसे जादू फ्रिज में छिपाई हुई चॉकलेट को चुपके -चुपके देखता है। बिट्टी कपड़े की एक गुड़िया थी जिसके बाल जादू को किसी झाड़ू की तरह लगते, आंखें बटन की तरह और सबसे गजब बात थी कि उस बिट्टी की भी तीन गुड़ियां थीं जिन्हें उसने अपनी जेब में रखा था। मम्मी सबको बड़े इतराकर बतातीं –यह है बिट्टी और यह तीनों हैं बिट्टी की गुड़िया सिट्टी, पिट्टी और गुम। सुनने वाले खूब हसंते और जादू कुढ़ कर रह जाता। सच तो यह था कि बिट्टी के आने से उसकी घर में पूछ-परख कुछ नहीं तो पाव भर तो कम हो ही गई थी क्यूंकि सबकी नज़र आते ही बिट्टी पर पड़ती और सब उसी के बारे में पूछने लग जाते। मम्मी को भी समझ तो आने लगा था कि बिट्टी से जादू की बनती नहीं है सो बिट्टी का जूता खोने का पहला शक जादू पर ही जाता था। मम्मी ने पूछा –‘ जादू सच सच बताओ कहां छिपाया है बिट्टी का जूता’ तो जादू ने मासूमियत से कहा

..मैंने नहीं छिपाया, आपकी बिट्टी ही रात को सिंड्रैला की तरह पार्टी में गई होगी और अपना जूता छोड़ आई होगी।

– जादू ने मम्मी से सिंड्रैला की कहानी सुन रखी थी। लेकिन मम्मी को संतोष न हुआ। सर्दियां ज़ोर की पड़ने लगी थीं और बिट्टी का एक जूता खो जाने का दुख उन्हें सोने नहीं देता..जब भी मोज़ा पहनतीं दुखियाने लगतीं….पता नहीं कहां गया मेरी बिट्टी का जूता। दरअसल मम्मी को एक दुख और भी था। म्मी बिट्टी के लिए ऊनी मौज़े बुनना चाहती थीं पर उन्हं बुनना आता ही नहीं था। दुख से कहतीं- काश पढ़ाई –लिखाई के साथ थोड़ा सिलाई-बुनाई भी सीख लिया होता उस पर से बड़े भाई आदू ने आग में घी डालते हुए कहा

मम्मी इसी जादू ने छिपाया है बिट्टी का जूता, इसे पसंद नहीं है न बिट्टी

जादू ने तपाक से कहा- पसंद तो तू भी नहीं है पर तेरा जूता छिपाया क्या ?

बात में दम था …..आदू -जादू राम लखन नहीं थे ….दोनों में ज़रा नहीं बनती थी लेकिन फिर भी एक दूसरे का जूता कभी नहीं छिपाया। अजीब गुत्थी थी। पूरे घर में ढूंढ़ लिया गया। सोफा खिसका कर, अलमारी सरकाकर, पलंग के नीचे, दीवान के पीछे ….जूता आखिर गया कहां। दो दिन बाद पापा टूर से वापस आए तो उनसे भी पूछा गया उन्होंने झल्लाकर कहा

तुम्हारी बिट्टी का जूता मेरे पैर में तो आने से रहा और जादू क्यूं छिपाएगा, उसे क्या दुश्मनी बिट्टी से। यहीं कहीं खोया होगा ध्यान से देखो। आधी से ज़्यादा चीज़ें तो तुम्हें देख कर भी नहीं दिखतीं। याद है, उस दिन हाथ में ही मोबाइल लेकर, मोबाइल ढूढ़ रही थीं। चित्त लगाकर ढूढ़ों।

समझाइश देकर पापा फुटबॉल देखने लगे। अल क्लासिको मैच था …जादू और आदू की मुंडी भी टी.वी .में गड़ी थी दोनों फुटबॉल के बहुत बड़े दीवाने थे और मैच जब रोनाल्डो और मेसी के बीच हो तो दोनों पगला जाते थे। टी.वी के ठीक नीचे बुक शेल्फ पर बिट्टी बैठी थी एक जूता पहने और जादू को लग रहा था कि जैसे वो उससे कह रही हो कि, मेरा जूता ढूंढ़ दो वर्ना मैं रोने लगूंगी। जादू सोचने लगा कि जूते कितनी ज़रूरी चीज़ हैं अगर मैच से ठीक पहले रोनाल्डो का एक जूता खो जाए तो वो क्या करेगा। एक जूता तो किसी काम का नहीं। उसका दिल भर आया और उसने फैसला ले लिया कि वो बिट्टी का जूता ढूंढ़ कर रहेगा। दो दिन बाद क्रिसमस था। सामने ऑलिव आंटी के घर में क्रिसमस की तैयारियां चल रही थीं। अचानक जादू के मन में विचार कौंधा

मम्मा अगर हम सैंटा से कहें तो वो बिट्टी के लिए जूता ला देंगे न। मम्मी काम छोड़कर जादू को देखने लगीं। क्या सचमुच ऐसा हो सकता है, मम्मी भी सोच में पड़ गईं लेकिन तभी उन्हें याद आया कि वो मम्मी हैं जादू नहीं और सेंटा सच में नहीं होता जैसे ही उन्हें अपने बड़े ने का ख़याल आया वो चुपचाप अपने काम में लग गईं। उधर जादू का पूरा ध्यान बिट्टी के जूते पर था। उसने पेंसिल और काग़ज़ लिया और सोचने लगा कि घर में कौन-कौन आया था और किस-किस ने बिट्टी को उठाया था फिर उसने यह भी लिखा कि घर में कौन-कौन सी जगह हैं जहां बिट्टी जा सकती है। उसे पूरा विश्वास था कि बिट्टी रात में कहां न कहीं तो जाती है। उसने रसोई से शुरू किया …बिस्कुट के डब्बे में देखा फिर पूजा घर में कान्हा जी के झूले में, आदू के बस्ते में, मम्मी के गहनों के डब्बे में, पापा के दाढ़ी के डब्बे में। जूता कहीं नहीं मिला। जादू दो दिन तक ढूंढ़ता रहा। तीसरे दिन था क्रिसमस। जिंगल बेल, केक और दोस्तों के साथ मौज के शोर में जादू जूते की बात भूल गया। उसने मम्मी से कहा -मम्मी मेरे सारे दोस्तों ने सैंटा वाली टोपी लगाई है मुझे भी दे दो। मम्मी काम में व्यस्त थीं बोली पापा की अलमारी में नीचे वाली दराज़ में रखी होगी देख लो।

जादू ठुमकते- ठुमकते गया और जैसे ही उसने दराज़ खोली उसकी आंखें हैरानी से बड़ी होती गईं। उस दराज़ में थे मटर के छिल्के, गोभी के डंठल, अखबार की कुतरन, जादू की ड्राइंग कॉपी के टुकड़े, पेंसिल की छीलन, मम्मी की टूटी लिपस्टिक और बिट्टी का जूता

जादू ज़ोर से उछला –मम्मी, पापा, आदू मिल गया, बिट्टी का जूता मिल गया। …..मम्मी ने आकर देखा तो हैरान रह गईं चूहे महाराज ने हफ्तों की तपस्या से अपनी गृहस्थी बसा ली थी उस छोटी सी दराज़ में। ज़रूरत का हर सामान। खाने के लिए सब्ज़ियां, मेकअप के लिए लिपिस्टिक, बोर हो जाओ तो पेंसिल और चित्रकला की किताब और घूमना हो तो बिट्टी का जूता। लेकिन इन साज़ो-सामान के बीच बिट्टी का जूता वहां कैसे पहुंचा इस सवाल को जवाब दो ही लोग दे सकते थे या तो ख़ुद चूहा महाराज या ख़ुद बिट्टी और दोनों ही बोलना नहीं जानते थे। लेकिन जादू बहुत खुश था क्यूंकि उसने मम्मी की प्यारी बिट्टी का जूता खोज लिया था। उसने बड़े प्यार से बिट्टी को उसका जूता पहनाया और बोला- अब मत खोना बिट्टी, बड़ी कठिनाई से ढूंढ़ा है। तभी जादू को ऐसा लगा जैसे बिट्टी कह रही हो- मैरी क्रिसमस जादू, तुम्हारा शुक्रिया। उस दिन से बिट्टी और जादू दोस्त बन गए और मम्मी का भरोसा नहीं टूटा कि सैंटा सच में होता है। पड़ोस में ऑलिव भाभी के घर में बज रहा था जिंगल बेल, जिंगल बेल ..जिंगल ऑल द वे

© सुश्री रजनी सेन 

नई दिल्ली 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 61 – अनमोल… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अनमोल।)

☆ लघुकथा # 61 – अनमोल श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“मां ये घर कितना गंदा है तुम साफ सफाई क्यों नहीं करती? कोई कामवाली  क्यों नहीं रख लेती ?”

आज मायके आई कविता ने  सफाई करते हुए अपनी मां से कहा – “तुम्हारे घर में बैठने की भी जगह नहीं है। तुम कैसे रहती हो?”

मां कमला ने कहा – “बस किसी तरह दिन काट रही हूं? अब तुम लोगों के बिना घर-घर नहीं है?”

“मां यह तो पुरानी लालटेन और डिबरी है जिसमे हम तेल डालकर जलाया करते थे बचपन में।  डिबरी कितनी सुंदर-सुंदर मिलती थी आज भी तुमने इसे संभाल के रखा है।”

देखते ही कविता पुरानी यादों में खो गई।

बत्ती गुल हो जाती थी तब मां कितने प्यार से कहती – “बिट्टी डिबरी/लालटेन साफ कर लो और जला लो।”

“मां लालटेन में कितनी सुंदर डिजाइन बनी है?”

तभी माँ ने कहा- “अरे ! मैं कब से आवाज लगा रही थी नाश्ता कर ले ।”

“ये क्या काम में लगी हो?”

“अपने बच्चों को भी अपने जमाने की चीज दिखाऊंगी? आजकल यह सब घरों में लोग बड़े शौक से रखते और सजाते हैं।”

मां ने कहा – “ठीक है ले जाना।”

कविता ने कहा “मै इसे अपने साथ ले जाऊंगी, मेरे लिए ये लालटेन अनमोल है।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मेरी डायरी के पन्ने से # 47 – लघुकथा – डी.एन.ए.  ☆ सुश्री ऋता सिंह ☆

सुश्री ऋता सिंह

(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार। आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से …  लघुकथा – डी.एन.ए. ।)

? मेरी डायरी के पन्ने से # 47 – लघुकथा –  डी.एन.ए.  ?

जय के कमरे की बत्ती जल रही थी। दरवाज़े का अधिकांश हिस्सा भिड़ाया हुआ ही था पर एक सीधी रोशनी की लकीर टेढ़ी होकर मेरे कमरे की फ़र्श पर पड़ रही थी। तो क्या वह भी अनिद्रा का शिकार है?

मैं उसके दर्द को समझ रहा था क्योंकि मैं स्वयं भुग्तभोगी था। अल्पायु में रुक्मिणी का सर्वस्व त्यागकर अचानक मेरे जीवन से रूठकर चली जाना मेरे लिए असह्य था।

रुक्मिणी मेरी केवल पत्नी या जीवन संगिनी ही नहीं थी। वह मेरी शक्ति थी। एक विचारधारा थी। वह सोच थी। किसी शिक्षक की भाँति मार्गदर्शन किया करती थी। विवाह के एक लंबे अंतराल के बाद हमें माता -पिता बनने का आनंद मिला था। शायद जय के रूप में मुझे खुशी देने के लिए ही वह जीती रही। उसके अचानक देहावसान से मैं टूट गया था। मरने का मन करता था पर मेरे सामने एक लक्ष्य था। जय को पालना था।

सबने कहा था, अपनों ने समझाया था, घरवालों ने सलाह दी, ससुरालवालों ने इच्छा व्यक्त की कि पुनर्विवाह कर लो पर मैं रुक्मिणी का स्थान किसी को न दे सका। वह मेरी रूह बन मुझ में ही समा गई थी।

मेरे चेहरे पर एक उदासी छाई रहती थी। नेत्र सदैव तरल रहते। मेरा चीत्कार करने को मन करता था पर जय को देख अपने भावों का दमन करता चला गया। मित्रों की संख्या घटती गई। निरंतर उदास रहनेवाला मित्र भला किसे भाता! जो सच्चे मित्र थे वे सदैव साथ रहते थे। मैंने भी समय के साथ समझौता कर लिया। दुख की चादर सदा के लिए ओढ़ ली। वह दुख की चादर जो रुक्मिणी के विरह से मिली थी। मैं ऐसा करके सदैव यही प्रतीत करता कि वह मेरे आस पास ही है। उसका स्नेहसिक्त व्यक्तित्व ही ऐसा था।

ममता, स्नेह वात्सल्य का वह एक अनोखा मिसाल थी। जय को अपनी गोद में लिटाकर जब वह लोरी सुनाती तो वह ऐसे पलकें बंद कर लेता मानों परियों की दुनिया में सैर कर रहा हो। अभागा बेचारा! वात्सल्य की छाया समय से पहले ही छूट गई। मैं जय को कभी भी लोरी न सुना सका। सुनाता भी कैसे भला, मेरे कंठ ही वेदना से अवरुद्ध हो जाते और अश्रु की धार बहने लगती। जय के कपोल टपकती बूँदों से तर हो जाते। नन्हे सुकोमल हाथ उन्हें पोंछने लगते।

मैंने सब सह लिया, विरह की वेदना में झुलसता रहा और जय को रुक्मिणी की स्मृतियों के सहारे पाल ही लिया। जय बड़ा हुआ विवाह के बाद उसने घर बसाया पर मेरे भीतर धधकती वेदना के स्पंदन से वह कभी अनभिज्ञ न रहा।

फिर यह क्या हुआ? मेरे दुर्भाग्य के तार उसके भाग्य से क्यों जुड़ गए? मेरे व्यथित हृदय के झंकृत वेदना उसकी भी वेदना क्यों बन गई?

मैं वार्द्धक्य की सीमा पर हूँ वह जवानी में ही अकेला क्यों हो गया! मेरे सामने जय था, एक सशक्त ज़िम्मेदारी थी, पर जय? क्या वह

राधा का इस तरह अचानक जाना सहन कर पाएगा? क्या वह राधा से विरह सह पाएगा ? डरता हूँ वह उत्तेजित होकर कहीं कुछ कर न ले….

दरवाज़े से छनकर आती रोशनी बंद हो गई। जय ने कमरे की बत्ती बुझा दी। द्वार खुला और एक छाया मेरे सामने खड़ी हो गई। मेरी शांत पड़ी देह पर चादर ओढ़ा गई। मेरे माथे को चूमकर वह लौट गया।

अपने कमरे के दरवाज़े तक पहुँचकर उसने कहा, ” सो जाइए बाबूजी, अभी ज़िंदगी भर कई रातें जागनी होंगी हमें। फ़िक्र न करें मैं भी विरह सह लूँगा। उसकी छाया में ही तो पला हूँ न! मैं आत्महत्या नहीं करूँगा। “

मैं स्तंभित हो गया। पिता की व्यथा से परिपूर्ण विचार क्या पुत्र को डी.एन.ए में मिलते हैं?

© सुश्री ऋता सिंह

फोन नं 9822188517

ईमेल आई डी – ritanani[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 219 – कोख परीक्षा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “कोख परीक्षा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 219 ☆

🌻लघु कथा🌻 🩺कोख परीक्षा🩺

आज के इस भागती दौड़ती तेज रफ्तार की दुनिया जहाँ  माँ – बाप, संवेदना, ममता, दया, सेवा, मानवता, बधाई, दुख – सुख यहाँ तक कि किराए की कौख भी मिलने लगी है।

किसे अपना कहा जाए किसे नकारा जाए समझ नहीं आता। नारी से नारी के लिए कोख परीक्षा मातृत्व पर सवाल खड़ी कर रही है।

परंतु फिर भी जमाना चल रहा है। अब तो आप जिस चेहरे की काया कृति चाहते हैं डॉक्टर वह भी कोख में बनाते चले जा रहे हैं।

जाने भविष्य क्या होगा। परंतु जो भी हो नारी की मातृत्व शक्ति को सृष्टि भी नहीं बदल सकती।

ईशा को कोख परीक्षा के लिए ले जाया जा रहा था। पतिदेव का सख्त आदेश और निर्णय बेटा ही वंश का वारिस होगा।

सफेद पड़ा शरीर, आँखें चेहरे पर धँसी, मानो कई रातों से सोई नहीं।

पता चला कोख में एक नहीं जुड़वा बेटी है। बस फिर क्या था!!!! अस्पताल से गाड़ी सीधे ईशा के मायके की ओर बढ़ चली। कारण सिर्फ इतना कि ईशा ने अपना कोख गिराने से मना कर दिया।

गाड़ी से उतरते समय ईशा ने पतिदेव के पैरों पर शीश रखते कहा– मैं उस दिन का इंतजार करूंगी। जब आपको लेकर कोई गाड़ी किसी वृद्धा आश्रम के सामने रुके। बेटों से वंश – – – – गहरी सांस छोड़ते।

मेरी बेटियाँ, आज नहीं कल कोख का महत्व समझ जाएंगी। परंतु किराए का बेटा क्या कोख परीक्षा समझ पाएगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares