पाश्चिमात्य संशोधकांनी उलगडले की संस्कृत मंत्र लक्षात ठेवणारी मुले मोठी झाल्यावर अति हुशार का होतात ?
कठोरपणे लक्षात ठेवणे मेंदूला किती मदत करू शकते हे न्यूरोसायन्स दाखवते. ‘संस्कृत इफेक्ट’ ही संज्ञा न्यूरोसायंटिस्ट जेम्स हार्टझेल यांनी तयार केली होती, ज्यांनी व्यावसायिक पात्रता असलेल्या २१ संस्कृत पंडितांचा अभ्यास केला होता. त्यांनी शोधून काढले की वैदिक मंत्रांचे स्मरण केल्याने अल्प आणि दीर्घकालीन स्मृतीसह संज्ञानात्मक कार्याशी संबंधित मेंदूच्या क्षेत्रांचा आकार वाढतो. हा शोध भारतीय परंपरेच्या श्रद्धेला पुष्टी देतो, ज्यामध्ये असे मानले जाते की मंत्रांचे स्मरण करणे आणि पाठ करणे स्मरणशक्ती आणि विचार वाढवते.
डॉ. हार्टझेलच्या अलिकडील अभ्यासात असा प्रश्न निर्माण झाला आहे की अशाप्रकारच्या प्राचीन ग्रंथांचे स्मरण अल्झायमर आणि इतर स्मरणशक्तीवर परिणाम करणाऱ्या रोगांचे विनाशकारी आजार कमी करण्यासाठी उपयुक्त ठरू शकते का? वरवर पाहता, भारतातील आयुर्वेदिक डॉक्टर असे सुचवतात, आणि संस्कृतमध्ये अधिक संशोधनासह भविष्यातील अभ्यास नक्कीच केले जातील.
आपल्या सर्वांना सजगता आणि ध्यान पद्धतींचे फायदे माहित असताना, डॉ हार्टझेलचे निष्कर्ष खरोखरच नाट्यमय आहेत. कमी होत चाललेल्या लक्षांच्या जगात, जिथे आपल्याला दररोज माहितीचा पूर येतो आणि मुले लक्ष वेधून घेणारे अनेक विकार दाखवतात, तिथे प्राचीन भारतीय शहाणपणामध्ये पश्चिमेला (आणि पूर्वेकडील त्यांच्या ‘आधुनिक’ बौद्धिक सेवकांना) शिकवण्यासारखे बरेच काही आहे.
गायत्री मंत्रासारख्या सामान्य संस्कृत मंत्रांचे थोडय़ा प्रमाणात जप आणि पठण करूनही आपल्या सर्व मेंदूवर आश्चर्यकारक परिणाम होऊ शकतो.
रानातून आलेल्या तात्यांनी घराच्या मागच्या बाजूला असणाऱ्या गोठयात वैरणीचा भारा टाकला आणि तिथंच डाव्या बाजूला अळू, कर्दळ आणि केळी जवळ असणाऱ्या दगडावर उभा राहून हातपाय धुतले. तोंडावर पाणी मारले आणि पायात वहाणा सरकवून खांद्यावरच्या टॉवेलने तोंड पुसत मागच्या दाराने घरात न येता बाजूच्या बोळकांडीतून पुढे आले. तीन पायऱ्या चढून वर सोप्यात आल्यावर उजव्या बाजूला भिंतीकडे पायातल्या वहाणा काढल्या आणि सोप्यातल्या खांबाला टेकून बसत बायकोला, लक्ष्मीला हाक मारली.
गोठ्यात वैरणीचा भारा टाकला तेंव्हाच लक्ष्मीला तात्यांच्या येण्याची चाहूल लागली होती. त्यांनी वैलावरचा चहा उतरवला. दोन कपात गाळला आणि चुलीतील लाकडे बाहेर ओढून त्या चहा आणि पाण्याचा तांब्या घेऊन बाहेर आल्या. तात्यांच्या हातात तांब्या देताच त्यांनी वरूनच चार घोट पाणी प्यायले आणि तांब्या बाजूला ठेवला. त्यांनी तात्यांच्या हातात चहाचा भरलेला कप दिला आणि स्वतः तिथंच शेजारी पायरीवर पाय सोडून जोत्यावर बसल्या.
तात्या चहा पीत असतानाच त्यांना तो ही वैरणीचा भारा घेऊन येताना दिसला. तो तात्यांच्या हद्दीत पायही पडणार नाही याची काळजी घेत त्याच्या हद्दीवरून वळला. वैरणीचा भारा गोठयाच्या बाहेरच्या बाजूला उभ्या उभ्याच फेकला. तात्यांकडे रागाचा कटाक्ष टाकून तोंडातल्या तोंडात पुटपुटत त्याच्या घरात गेला.
तात्यांना पाहिले किंवा काही मनाविरुद्ध झाले तर त्याचे सळसळते रक्त उसळून यायचे, तो चिडायचाच अन एकदा चिडला की मग मात्र त्याचा स्वतःवर ताबा राहत नसे. त्यात वडील गेल्यापासून तर त्याच्यावर वचक असा कुणाचाच राहिला नव्हता. आई बिचारी त्याच्या वडिलांच्या अकाली मृत्यूमुळे मनाने खचलेली, थकलेली. ती त्याला सारखे सांगत राहायची, समजावत राहायची.
आईच्या समजवण्यावरही तो उसळून तावातावाने ,रागाने, चिडून आणि शेजारी तात्यांच्या घरात ऐकू जाईल असे म्हणायचा.
त्याच्या मनात आपल्या शेजाऱ्यांच्याबद्दल, तात्यांच्याबद्दल खूप राग होता. शेजारच्या तात्यांचा आणि त्याच्या कुटुंबीयांचा हद्दीवरून वाद होता, ही गोष्ट खरी होती पण हा वाद काही आत्ताचा नव्हता. मागील तीन चार पिढ्यांपासूनचा वाद होता. त्याची ही चौथी पिढी. वाद होता तरीही त्यांची कुटुंबे शेजारी-शेजारी नांदली होती.
गुण्यागोविंदाने नांदली होती असे म्हणता येणार नाही पण कारणपरत्वे होणारे, घडणारे भांडण वगळले, एकमेकांशी असणारा अबोला वगळता, खरंच ती शेजारी नांदली होती. सुख-दुःखाच्या क्षणी,काही दिवसांकरिता का होईना, हा अबोला विरघळून जायचा. पण त्याच्या वडिलांचे अकाली निधन झाल्यावर मात्र शेजारच्या काकू, तात्यांची बायको, आईचा आधार झाली होती. दुपारच्या निवांत वेळी परड्यात काहीतरी काम करता करता त्या तिच्याशी बोलत असत. कधीतरी घरात काही केलेला पदार्थ त्याच वेळी इकडून तिकडे जात येत असे.
आधीही भांडणे नियमित अशी नव्हतीच कधीतरी कारण परत्वे होत.. ती मात्र कडाक्याची, हमरीतुमरीवर येऊन होत. पण त्याच्या वडिलांच्या मृत्युनंतर तात्यांकडून कधीच भांडण झाले नव्हते.. त्यांच्या कडून भांडणाची धार बोथट झाली होती. त्याचे वडील गेल्यावर पुन्हा पुन्हा काही दिवसांनी तात्या त्यांच्या घरी आलेूपच वाईट झाले. आपल्या दोन्ही कुटुंबात वाद-विषय आहेच पण ते सारे विसरून काहच पण ते सारे विसरून काहीही अडले-नडले तर सांगा. “
तात्या त्याच्या आईला म्हणाले होते. त्यांच्या मनालाही त्याच्या वडिलांचा मृत्यु चटका लावून गेला होता.
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक विचारणीय कथा ‘मर्ज़ ’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 167 ☆
☆ कथा – कहानी ☆ मर्ज़ ☆
प्रसाद साहब के घर में सुबह से ही तनाव है, उस वक्त से जब से हार के गायब होने का पता चला है। श्रीमती प्रसाद तब से ही खोज-बीन में लगी हैं। थोड़ी देर बैठती हैं, फिर दुबारा चीज़ों को उलट-पलट करने में लग जाती हैं। जहाँ-जहाँ भी संभावना थी वहाँ की खोज-बीन हो चुकी है, लेकिन हार का पता नहीं चला।
प्रसाद साहब कपार पर हाथ धरे सोफे पर बैठे हैं और, जैसा कि अमूमन होता है, वे सवेरे से कई बार पत्नी की लानत-मलामत कर चुके हैं। यह दीगर बात है कि वे खुद खासे भुलक्कड़ हैं और अक्सर छोटी-मोटी चीज़ें खोते रहते हैं। अभी श्रीमती प्रसाद सिद्धदोष हैं और इसलिए प्रसाद साहब को उन पर हावी होने का भरपूर मौका मिला है। अभी तक किश्तों में जो भाषण प्रसाद साहब दे चुके हैं उसका लब्बोलुआब यह है कि श्रीमती प्रसाद आदतन लापरवाह हैं और पति के इतने साल लगातार समझाने के बावजूद उनकी लापरवाही में कोई सुधार नहीं हुआ है।
श्रीमती प्रसाद पर दुहरी मार है। एक तो डेढ़ दो तोले का ज़ेवर जाने का दुख, दूसरा पतिदेव और परिवार के दूसरे सदस्यों की बातें। वे आश्चर्यचकित भी हैं कि घर से अचानक चीज़ गायब कैसे हो गयी। वे इस्तेमाल में आने वाले ज़ेवरों को अलमारी में एक छोटे बैग में रखती थीं। उसकी चाबी अलबत्ता वे कहीं भी रख देती थीं, क्योंकि घर में कोई ऐसा नहीं था जिस पर भरोसा न हो। बेटा मनोज अठारह साल का है और उस से छोटी बेटियाँ हैं, रिंकी और पिंकी। इनके अलावा बस नौकर बिस्सू है जो अभी तेरह चौदह साल का है और पिछले सात-आठ महीने से घर में है। उसकी आदत घर की किसी चीज़ को बिना पूछे छूने की नहीं है। प्रसाद साहब उसके माँ-बाप को तरह-तरह के सब्ज़बाग दिखाकर उसे ले आये थे।
श्रीमती प्रसाद को वैसे तो चीज़ के खोने का पता ही नहीं चलता। उस दिन संयोग से वे आम का अचार डालने में लग गयीं और उन्होंने हाथ की दोनों अँगूठियों को बैग में डाल देने की सोची। तभी उनका ध्यान गया कि हार अपनी जगह पर नहीं है। जानकारी होने पर उन्होंने पहले अपने वश भर बिना किसी को बताये ढूँढ़-खोज की ताकि पतिदेव को जानकारी होने से पहले चीज़ मिल जाए, लेकिन उनका दुर्भाग्य कि सारी कोशिशों के बावजूद चीज़ मिली नहीं और बात पतिदेव के कान तक पहुँच गयी। तभी से वे पूरे घर को सिर पर उठाये हैं।
हार कर जी हल्का करने के लिए श्रीमती प्रसाद पड़ोसियों को भी इस नुकसान की बात बता चुकी हैं और घंटे भर में ही ज़ुबान पर चढ़कर बात कॉलोनी के ज़्यादातर घरों में पहुँच चुकी है। कॉलोनी के नीरस जीवन में थोड़ा रस-प्रवाहित हुआ है और लोगों को दिन भर चर्चा करने का विषय मिल गया है।
खबर पाकर शहर में प्रसाद साहब के भाई-बंधु कैफियत लेने और हमदर्दी जताने आने लगे हैं। श्रीमती प्रसाद के लिए यह सुविधाजनक है, क्योंकि संबंधियों के लिहाज में वे पतिदेव के शब्द-बाणों से बची रहती हैं।
रिश्तेदारों के बीच यह कयास लगाया जा रहा है कि यह काम कौन कर सकता है। जब अलमारी अक्सर बन्द रहती थी तो चीज़ गायब कैसे हो गयी? क्या घर के ही किसी आदमी का हाथ है? घर में कौन हो सकता है?
प्रसाद साहब का भतीजा बंटी भी आया है। खूब स्मार्ट, नये फैशन के टी-शर्ट और जींस, कलाई में एकदम मॉडर्न ब्रेसलेट, रंगे हुए बाल, नई बाइक्स को दौड़ाने का शौकीन। उसकी नज़र बार-बार सब की सेवा में लगे बिस्सू का पीछा करती है। प्रसाद साहब से कहता है, ‘चाचा, कहीं इस लौंडे ने तो हाथ नहीं मारा?’
प्रसाद साहब प्रतिवाद करते हैं, ‘अरे नहीं, लड़का सीधा-सादा है। वह ऐसा नहीं कर सकता।’
बंटी जवाब देता है, ‘आपको तो सब सीधे-सादे नज़र आते हैं। चेहरे से क्या पता चलता है। आज सवेरे से यह कहीं बाहर गया था क्या?’
प्रसाद जी जवाब देते हैं, ‘रोज़ ही जाता है। कुछ न कुछ लाना ही पड़ता है।’
बंटी बोला, ‘तब तो माल दूर निकल गया। ऐसे लड़के दूसरों से मिले होते हैं। वे माल मिलते ही लंबे निकल जाते हैं।’
थोड़ी देर में उसे कुछ सूझता है। बाइक से एक रबर का बड़ा छल्ला निकाल कर लाता है जिससे वह ‘स्ट्रैचिंग’ की कसरत करता है। फिर बिस्सू का हाथ पकड़कर उसे कमरे में ले जाकर दरवाज़ा भीतर से बन्द कर लेता है। थोड़ी देर ऊँचे स्वर में बातचीत की आवाज़ सुनायी पड़ती है, फिर ‘सप’ ‘सप’ की आवाज़ और बिस्सू का आर्तनाद। घर में सब मौन साधे सुनते हैं।
कुछ देर में दरवाज़ा खोल कर बंटी बाहर निकलता है। पीछे थर-थर काँपता, हिचकी लेता बिस्सू है। बंटी के निकलते ही उसके पिता, यानी प्रसाद साहब के छोटे भाई, उस पर बरस पड़ते हैं, ‘बेवकूफ, यह कहीं एससी एसटी हुआ तो तू सीधे जेल जाएगा। ज़मानत भी नहीं होगी।’
बंटी चेहरे का पसीना पोंछकर कहता है, ‘यह तो दूसरी ही कहानी बताता है।’
सब प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी तरफ देखते हैं। बंटी कहता है, ‘यह बताता है कि हार मनोज ने अलमारी से निकालकर अपने दराज़ में रख लिया था। इसने देख लिया तो इसे धमकी दी कि अगर बताया तो बहुत मारेंगे।’
अब घर में फिर सन्नाटा है। लोग घूम कर देखते हैं तो पाते हैं कि मनोज अंतर्ध्यान हो गया है। प्रसाद साहब एक बार फिर पत्नी पर बरसते हैं, ‘यह सब तुम्हारे लाड़ प्यार का नतीजा है। मैंने कहा था कि लड़के पर नज़र रखो।’
पत्नी और बेटियाँ मनोज की खोज में गायब हो गयी हैं। थोड़ी देर में खबर मिलती है कि हार मिल गया है। लेकिन अब घर में शर्म और असमंजस का वातावरण है।
प्रसाद साहब फिर सिर पकड़े बैठे हैं। करुणा-विगलित स्वर में कहते हैं, ‘मेरा बेटा और चोरी करे! हमारे खानदान में ऐसा कभी नहीं हुआ। डूब मरने की बात है।’
सब मौन,उनके चेहरे की तरफ देखते खड़े हैं।
थोड़ी देर में उनके भाई उनके कंधे पर हाथ रखकर कहते हैं, ‘भाई साहब, हम इज़्जतदार लोग हैं। हमारे बच्चे चोरी नहीं कर सकते। दरअसल यह एक दिमागी बीमारी है जिसे क्लैप्टोमैनिया कहते हैं। हम मनोज को काउंसिलिंग के लिए ले चलेंगे। ठीक हो जाएगा। परेशान मत होइए।’
उनकी बात सुन कर घर में सबका जी हल्का हो जाता है। चोरी की आदत नहीं, क्लैप्टोमैनिया है। प्रसाद साहब के मन से बोझ उतर जाता है। दोनों बेटियाँ ‘क्लैप्टोमैनिया’ ‘क्लैप्टोमैनिया’ बुदबुदाती घर में घूमती हैं। फिर उसे कॉपी में नोट कर लेती हैं। एक नया शब्द मिला है।
श्रीमती प्रसाद बेटे को समझाने चल देती हैं कि वह शर्मिन्दा न हो क्योंकि वह चोर नहीं, एक मर्ज़ का शिकार है।
☆ माझ्या नजरेतून बदलती दुबई – भाग – ३ ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆
अबुधाबीची संगमरवरी मॉस्क हे २०१४ चे आकर्षण होते. पांढरा शुभ्र संगमरवर वापरलेली ती माॅस्क उन्हामध्ये अक्षरशः चमचमत होती. जास्त ऊन असेल तर डोळ्याला त्रास होईल इतकी ! माॅस्कमध्ये प्रवेश करताना पूर्ण पायघोळ ड्रेस लागतो. आत प्रवेश केला की, तेथील अतिप्रचंड गालिचा आपले लक्ष वेधून घेतो ! बाप रे ! केवढा मोठा आणि सुंदर, रंगीत डिझाईनचा गालिचा ! थक्क होऊन गेलो आम्ही ! सगळीकडे संगमरवर आणि त्यावर अतिशय उत्तम रंगीत चित्रकाम ! अप्रतिम ! येथील टॉयलेट सुद्धा बघत रहावी अशी सुंदर संगमरवरी ! अतिशय समृद्ध अशी दुबई, अबुधाबी ही ठिकाणे ! अबुधाबीचे कॉर्निशसुद्धा लोकांना फिरण्यासाठी उत्तम ठिकाण आहे…
पण एक ऑफ साईट ठिकाण आम्ही पाहिले ते म्हणजे फ्लेमिंगो रिझाॅर्ट ! तिथे राहण्यासाठी छोटे छोटे बंगले आहेत. जावयांनी तेथील बुकिंग केले होते. खरंतर समुद्रासारखे खेळणारे पाणी तिथे नाही. पण रेझाॅर्टसमोर मुलांना खेळायला जागा, सगळीकडे वाढवलेली हिरवीगार झाडे आणि रेझाॅर्टच्या व्हरांड्यात बसून समोर शांत दिसणारे पाणी पाहत बसायला खूप आवडले ! विशेष म्हणजे जाई जुईसारख्या वासाच्या फुलांचे वेल प्रत्येक बंगलीजवळ होते. एक दोन दिवस घालवायला खूपच सुंदर ठिकाण होते.
अशीच ‘ मिरॅकल गार्डनची ट्रिप ! एका वर्षी आम्ही मिरॅकल गार्डनला गेलो होतो. तिथे विविध रंगांची फुले आणि विविध आकारात तयार केलेल्या फुलांच्या व झाडांच्या आकृत्या यामुळे मिरॅकल गार्डन हे दुबईजवळचं खरोखरच मिरॅकल आहे. तिथेही वासाची फुले नाहीत, पण वेगवेगळ्या बोगन वेली आणि इतर रंगीत फुले, पाने यांनी ट्रेन, प्राण्यांचे,पक्षांचे आकार बनवून बाग सुशोभित केली आहे.
पाहता पाहता मुलीला दुबईमध्ये जाऊन पंधरा-सोळा वर्षे झाली. दरवर्षी आम्ही बदलती दुबई पहात होतो हेही विशेषच ! २०१९ मध्ये शेवटची दुबई ट्रिप झाली.. या ट्रिपमध्ये ” दुबई फ्रेम ” हे नवीन ठिकाण पाहिले. दुबई फ्रेम खूपच उंच आहे. दोन्ही बाजूंनी लिफ्ट आहे. एका लिफ्टने चढणे आणि दुसरीकडून उतरणे ! या दोन्हींना जोडणारा मोठा काचेचा मार्ग आहे, त्यावरून लोक फिरत असतात. काचेतून खाली पाहिले की माणसे, वाहने, इमारती, खेळण्यातल्या सारखी छोटी दिसतात ! मनात आलं, हे जग म्हणजेच कॅलिडोस्कोप आहे ! जितकं फिरू तितक्या विविध आकाराच्या, रंगांच्या, प्रतिमा बघायला मिळतात. दुबई हे चिमुकलं राज्य ! पूर्व आणि पश्चिम दोन्हीकडच्या वैशिष्ट्यांनी बनलेले ! भारताला जवळचे आणि हिंदी वातावरण असल्याने आपलेसे वाटणारे ! तिथे टुरिझमची जाणीवपूर्वक वाढ केलेली आहे. येथील कायदेकानू कडक असल्याने गुन्हेगारी तशी कमी आहे. इथे वाळूत फारसे काही पिकत नाही, त्यामुळे बरेचसे खाद्यपदार्थ परदेशातूनच येतात. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणे आणि आधुनिक गोष्टींचा पुरेपूर उपयोग केलेला आहे. अशी ही दुबईची रंगीबेरंगी दुनिया आहे ! आमच्या दुबईच्या कमीत कमी पंधरा-वीस ट्रिप्स झाल्या असतील ! जून, जुलैचा ऐन उन्हाळा सुद्धा दुबईत अनुभवला आहे ! लेक – जावयामुळे आमचे दुबई वास्तव्य अगदी सुखाचे असते. २०१९ साली दुबईहून १२ मार्चला पुण्यात आलो, तेव्हा कोरोनाचा प्रभाव सगळीकडे दिसत होता. गेली दोन वर्षे ” दुबई बहोत दूर है ” म्हणत गेली. पण आठवणींच्या कप्प्यात असलेली दुबई कशी कशी बदलत गेली, याचे हे माझ्या अल्पमतीने केलेले निरीक्षण !
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
🕉️ श्रीमहालक्ष्मी साधना 🌻
दीपावली निमित्त श्रीमहालक्ष्मी साधना, कल शनिवार 15 अक्टूबर को आरम्भ होकर धन त्रयोदशी तदनुसार शनिवार 22 अक्टूबर तक चलेगी।इस साधना का मंत्र होगा-
ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः।
आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
……फार आग्रह केल्यानंतर वरदक्षिणा म्हणून फक्त चरखा मागणारे शास्त्रीजी .
…. परिवहन मंत्री असताना भारतातल्या पहिल्या महिला कंडक्टर ची नेमणूक करणारे शास्त्रीजी .
……गृहमंत्री म्हणून काम करताना लाठीऐवजी पाणी वापरण्यास सांगणारे शास्त्रीजी .
……वयाच्या दीड वर्षी वडील गमावल्यानंतर कित्येक मैल भर दुपारी अनवाणी चालत काॅलेजला जाणारे शास्त्रीजी .
……पुस्तके डोक्यावर बांधून दररोज दोन वेळा नदी पोहून शाळेत जाणारे शास्त्रीजी .
….. एका रेल्वे अपघातात अनेक जणांना जीव गमवावा लागल्यामुळे स्वत:ला जबाबदार ठरवत रेल्वेमंत्री पदाचा राजीनामा देणारे शास्त्रीजी .
……गरीब लोकांची घरे पाडावी लागू नये म्हणून घरी पायी जाणारे पंतप्रधान शास्त्रीजी .
……पंतप्रधान असताना मुलाच्या काॅलेज अर्जावर आपला हुद्दा ‘ सरकारी कर्मचारी ‘ असे लिहिणारे शास्त्रीजी .
……पाकिस्तानला सर्वात प्रथम पाणी पाजणारे, ‘ जय जवान जय किसान ‘ जयघोष करत सैनिकांसाठी पूर्ण देशासोबत दर सोमवारी उपवास करणारे शास्त्रीजी .
……पंतप्रधान असताना खासगी कामासाठी सरकारी गाडी वापरल्यावर लगेच त्याचे पैसे सरकारी तिजोरीत जमा करणारे शास्त्रीजी .
— मृत्यूनंतर त्यांच्या नावावर घर जमीन मालमत्ता काहीच नव्हते. होते फक्त फियाट घेण्यासाठी घेतलेले कर्ज. आणि बँकेने ते कर्ज शास्त्रीजींच्या पश्चात त्यांच्या पत्नीकडून वसूल केले.
म. गांधीजींच्या जयंतीच्या गदारोळात त्यांचा हा कर्मयोगी शिष्य नेहमी झाकोळला जातो.
असे साध्या पण निग्रही, मृदु स्वभावाचे पण कर्तव्यकठोर वृत्तीचे, सगळ्यात कमी कालावधीत मोठा प्रभाव टाकणारे आपले दुसरे पंतप्रधान लाल बहादूर शास्त्रीजी …..
…. त्यांना अनंत दंडवत….
संग्राहिका : सुश्री प्रभा हर्षे
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है “भावना के दोहे…श्री राम”।)