हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ऐसी भी सिखलाई ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि –  ऐसी भी सिखलाई ? ?

बाल्यावस्था से ही शिक्षा-दीक्षा में माँ सरस्वती की अनुकम्पा रही। संभवत: स्वभाव कुछ शांत रहा होगा। परिणामस्वरूप घर-परिवार और विद्यालय में प्रेम ही प्रेम मिला। पिता जी स्नेह, तार्किकता, स्वाभिमान, अध्ययन और विशाल हृदय की मूर्ति थे। क्रोधित होते थे पर उनका क्रोध क्षणिक था। अपवादात्मक स्थिति में ही हाथ उठाते थे। अत: पिटाई या कुटाई द्वारा सिखलाई की नौबत कभी नहीं आई। उनका जीवन ही मेरे लिए सिखलाई रहा।

एक घटना का उल्लेख यहाँ करना चाहता हूँ। इस घटना में न डाँट है, न फटकार, न पिटाई न कुटाई पर सिखलाई अवश्य है।

वर्ष 1986 की बात है। बड़े भाई का विवाह निश्चित हो गया था। विवाह जयपुर से करना तय हुआ। जयपुर में हमारा मकान है जो सामान्यत: बंद रहता है। पुणे से वहाँ जाकर पहले छोटी-मोटी टूट-फूट ठीक करानी थी, रंग-रोगन कराना था। पिता जी ने यह मिशन मुझे सौंपा। मिशन पूरा हुआ।

4 दिसम्बर का विवाह था। कड़ाके की ठंड का समय था। हमारे मकान के साथ ही बगीची (मंगल कार्यालय) है। मेहमानों के लिए वहाँ बुकिंग थी पर कुटुम्ब और ननिहाल के सभी  सभी परिजन स्वाभाविक रूप से घर पर ही रुके। मकान लगभग 2700 स्क्वेअर फीट है, सो जगह की कमी नहीं थी पर इतने रज़ाई, गद्दे तो घर में हो नहीं सकते थे। अत: लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित सुभाष चौक से मैंने 20 गद्दे, 20 चादरें और 20 रज़ाइयाँ किराये पर लीं।

उन दिनों साइकिल-रिक्शा का चलन था। एक साइकिल-रिक्शा  पर सब कुछ लादकर बांध दिया गया। कुछ नीचे की ओर ‘लेग-स्पेस’ पर रखे गए जहाँ सवारी पैर रखती है। दो फुट ऊँचा रिक्शा, उस पर लदे गद्दे-रज़ाई, लगभग दस फीट का पहाड़ खड़ा हो गया। जीवन का अधिक समय पुणे में व्यतीत होने के कारण इतनी ऊँचाई तक सामान बांधना मेरे लिए कुछ असामान्य था।

…पर असली असामान्य तो अभी मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।  रिक्शेवाला साइकिल पर सवार हुआ और मेरी ओर देखकर कहा, ‘भाईसाब बेठो!” मेरी मंथन चल रहा था कि इतना वज़न यह अकेली जान केसे हाँकेगा! वैसे भी रिक्शा में तो तिल रखने की भी जगह नहीं थी सो मैं रिक्शा के साथ-साथ पैदल चलूँगा। दोबारा आवाज़ आई, “भाईसाब बेठो।” इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से मैं आश्चर्यचकित हो गया। ” कहाँ बैठूँ?” मैंने पूछा। “ऊपरली बेठ जाओ”, वह ठेठ मारवाड़ी में बोला। फिर उसने बताया कि वह इससे भी ऊँचे सामान पर ग्राहक को बैठाकर दस-दस किलोमीटर गया है। यह तो एक किलोमीटर है। “भाईसाब डरपो मनि। कोन पड्स्यो। बेठो तो सही।” मैंने उसी वर्ष बी.एस्सी. की थी। उस आयु में कोई चुनौती दे, यह तो मान्य था ही नहीं। एक दृष्टि डाली और उस झूलते महामेरु पर विराजमान हो गया। ऊपर बैठते ही एक बात समझ में आ गई कि चढ़ने के लिए तो मार्ग मिल गया, उतरने के लिए कूदना ही एकमात्र विकल्प है।

रिक्शावाले ने पहला पैडल लगाया और मेरे ज्ञान में इस बात की वृद्धि हुई कि जिस रज़ाई को पकड़कर मैं बैठा था, उसका अपना आधार ही कच्चा है। अगले पैडल में उस कच्ची रस्सी को थामकर बैठा जिससे सारा जख़ीरा बंधा हुआ था। जल्दी ही आभास हो गया कि यह रस्सी जितनी  दिख रही है, वास्तव में अंदर से है उससे अधिक कच्ची। उधर गड्ढों में धंसी जिस सड़क पर रिक्शा किसी तरह डगमग चल रहा था, उस पर भी समाजवाद  छाया हुआ था। फलत: गड्ढे से उपजते झटकों से समरस होता मैं अनन्य यात्रा का अद्भुत आनंद अनुभव कर रहा था।

यात्रा में बाधाएँ आती ही हैं। कुछ लोगों का तो जन्म ही बाधाएँ उत्पन्न करने के लिए हुआ होता है। ये वे विघ्नसंतोषी हैं जिनका दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर ने मनुष्य को टांग  दूसरों के काम में अड़ाने के लिए ही दी है। साइकिल-रिक्शा  मुख्य सड़क से हमारे मकानवाली गली में मुड़ने ही वाला था कि गली से बिना ब्रेक की साइकिल पर सवार एक विघ्नसंतोषी प्रकट हुआ। संभवत: पिछले जन्म में भागते घोड़े से गिरकर सिधारा था। इस जन्म में घोड़े का स्थान साइकिल ने ले लिया था। हमें बायीं ओर मुड़ना था। वह गली से निकलकर दायीं ओर मुड़ा और सीधे हमारे साइकिल-रिक्शा के सामने। अनुभवी रिक्शाचालक के सामने उसे बचाने के लिए एकसाथ दोनों ब्रेक लगाने के सिवा कोई विकल्प नहीं था।

मैंने बी.एस्सी. की थी। जड़त्व का नियम पढ़ा था, समझा भी था पर साक्षात अनुभव आज किया। नियम कहता है कि प्रत्येक पिण्ड तब तक अपनी विरामावस्था में  एकसमान गति की अवस्था में रहता है जब तक कोई बाह्य बल उसे अन्यथा व्यवहार करने के लिए विवश नहीं करता। ब्रेक लगते ही मैंने शरीर की गति में परिवर्तन अनुभव किया। बैठी मुद्रा में ही शरीर विद्युत गति से ऊपर से नीचे आ रहा था। कुछ समझ पाता, उससे पहले चमत्कार घट चुका था। मैंने अपने आपको साइकिल-रिक्शा  की सीट पर पाया। सीट पर विराजमान रिक्शाचालक, हैंडल पर औंधे मुँह गिरा था। उसकी देह बीच के डंडे पर झूल रही थी।

साइकिल-रिक्शा  आसन्न संकट की गंभीरता समझकर  बिना ब्रेक की गति से ही निकल लिया। मैं उतरकर सड़क पर खड़ा हो गया। यह भी चमत्कार था कि मुझे खरोंच भी नहीं आई थी…पर आज तो चमत्कार जैसे सपरिवार ही आया था। औंधे मुँह गिरा चालक दमखम से खड़ा हुआ। साइकिल-रिक्शा और लदे सामान का जायज़ा लिया। रस्सियाँ फिर से कसीं। अपनी सीट पर बैठा। फिर ऐसे भाव से कि कुछ घटा ही न हो, उसी ऊँची जगह को इंगित करते हुए मुझसे बोला,” बेठो भाईसाब।”

भाईसाहब ने उसकी हिम्मत की मन ही मन दाद दी लेकिन स्पष्ट कर दिया कि आगे की यात्रा में सवारी पैदल ही चलेगी। कुछ समय बाद हम घर के दरवाज़े पर थे। सामान उतारकर किराया चुकाया। चालक विदा हुआ और भीतर विचार चलने लगे।

जिस रज़ाई पर बैठकर मैं ऊँचाई अनुभव कर रहा था, उसका अपना कोई ठोस आधार नहीं था। जीवन में एक पाठ पढ़ा कि क्षेत्र कोई भी हो, अपना आधार ठोस बनाओ। दिखावटी आधार औंधे मुँह पटकते हैं और जगहँसाई का कारण बनते हैं।

आज जब हर क्षेत्र विशेषकर साहित्य में बिना परिश्रम, बिना कर्म का आधार बनाए रातों-रात प्रसिद्ध होने या पुरस्कार कूटने की इच्छा रखनेवालों से मिलता हूँ तो यह सिखलाई और बलवत्तर होती जाती है।

अखंडित निष्ठा, संकल्प, साधना का आधार सुदृढ़ रहे तो मनुष्य सदा ऊँचाई पर बना रह सकता है। शव से शिव हो सकता है।

© संजय भारद्वाज  

संध्या 7:28 बजे, 12.5.2020

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रवण मास साधना में जपमाला, रुद्राष्टकम्, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना करना है 💥 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 438 ⇒ मैने लखनऊ नहीं देखा… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मैने लखनऊ नहीं देखा ।)

?अभी अभी # 438 ⇒ मैने लखनऊ नहीं देखा? श्री प्रदीप शर्मा  ?

निभायी अपनी आन भी

बढ़ायी दिल की शान भी

हैं ऐसे महरबान भी

ये लख़नौउ की सर-ज़मीं …

ये लख़नौउ की सर-ज़मीं ..

मैने लखनऊ नहीं देखा, मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि मुंबई की तरह लखनऊ में भी मरीन ड्राइव और ताज़ होटल है। यूं होने को तो आगरा में ताजमहल भी है, लेकिन हमने तो वह भी नहीं देखा।

लेकिन हमारे देखने, ना देखने से क्या फर्क पड़ता है। लखनऊ की जुबां और तहजीब के किस्से आम हैं। फिर पहले आप, पहले आप में, भले ही ट्रेन छूट जाए और यहां की तहज़ीब जिसे हम बोलचाल की भाषा में तमीज अथवा मैनर्स कहते हैं, उसका तो यह हाल है, मानो जीभ पर तहज़ीब की तह जमा दी हो। मजाल है कोई आपकी शान में गुस्ताखी कर दे।।

लखनऊ को अंग्रेजी में Lucknow लिखा जाता है। लखनऊ से केवल १५० km दूर ही तो है अवध, यानी राम जी की अयोध्या। हमने कुछ वर्ष पूर्व अयोध्या में रामलला के दर्शन तो कर लिए, लेकिन उनके भाई लखन की नगरी लखनऊ को देखने की हमारी आस मन में ही रह गई। Hard luck now, good luck next time. और तब तक, राम जी करे, शायद लखनऊ का नाम भी लखनपुर अथवा लक्ष्मणपुर हो जाए।

गोमती नगर में गोमती नदी से सटी सड़क की एक खूबसूरत पट्टी है। तहजीब और शान शौकत के इस शहर में, हाल ही में बरसते पानी में मरीन ड्राइव पर कुछ मनचलों द्वारा जो उपद्रव मचाया गया, उसने पूरे लखनऊ शहर की सभ्यता पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है। कलंक की कालिख प्रशासन की त्वरित सख्त कार्यवाही से कितनी कम होगी, कहा नहीं जा सकता। क्या इस घटना को सिर्फ भीड़ का मनोविज्ञान कहकर भुलाया जा सकता है।।

गुंडों को पहचाना जाएगा, पकड़ा जाएगा, दोषी अधिकारियों पर तो गाज गिर ही चुकी है। बारिश थम चुकी है, मरीन ड्राइव फिर से संयत हो, खुद को झाड़ पोंछकर सब कुछ भूल जाने की कोशिश करेगा। आह ताज फिर से वाह ताज बन चुका होगा। शुक्र है, मैने लखनऊ नहीं देखा..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 437 ⇒ आत्म-समर्पण… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आत्म-समर्पण।)

?अभी अभी # 437 ⇒ आत्म-समर्पण? श्री प्रदीप शर्मा  ?

समर्पण शब्द से ही आत्म-समर्पण शब्द अस्तित्व में आया है। समस्त का अर्पण ही समर्पण है। समर्पण किसी ध्येय, आदर्श, व्यक्ति अथवा ईश्वर के प्रति भी हो सकता है। मातृ -भूमि के लिए समर्पण सर्वश्रेष्ठ है।

समर्पण को अधिकतर सकारात्मक अर्थ में ही लिया जाता है। इसमें जब अतिशयोक्ति होती है, तो टोटल सरेंडर अर्थात पूर्ण समर्पण का भाव होता है। पत्नी का प्रति के पति समर्पण, एक श्रवणकुमार का अपने माता-पिता के प्रति समर्पण, आराध्य का अपने इष्ट के प्रति और शिष्य का सद्गुरु के प्रति समर्पण, समर्पण का आदर्श स्वरूप है। ।

एक समर्पण अपराधी का होता है ! उसे आत्म-समर्पण क्यों कहते हैं, यह भी एक पहेली है।

स्वयं या खुद के लिए, “आत्म ” का प्रयोग होता है। यही “आत्म” जब सन्तुष्टि के साथ प्रयुक्त होता है, तो एक सकारात्मक संदेश प्रेषित करता है, लेकिन समर्पण के साथ आत्म जुड़ते ही, इसका अर्थ से अनर्थ कैसे हो जाता है, यह समझ से बाहर का मामला है।

अंग्रेज़ी भाषा में समर्पण सिर्फ सरेंडर है, वहाँ self-सरेंडर जैसा कोई प्रावधान नहीं है। आपका सरेंडर सकारात्मक है या दण्डात्मक, यह परिस्थितिजन्य है। हाँ ! दया शब्द के साथ यह भाषा उदार व दयालु हैं। वहाँ भी आत्म-दया की तरह, self pity मौजूद है। जहाँ अगर कंट्रोल है, तो सेल्फ-कन्ट्रोल भी है। ।

कोई अपराधी जब आत्म-समर्पण करता है, तब वह मज़बूरी में होता है या आत्मा की आवाज़ पर होता है ?आज के आर्थिक अपराधियों के पास जब कोई विकल्प नहीं बच रहता, तब वे आत्म-समर्पण करते हैं। उनकी आत्मा को बड़ा कष्ट होता है, जब उनका पासपोर्ट तक ज़ब्त कर लिया जाता है। आत्मा जब कष्ट पाती है, तो शरीर भी व्याधियुक्त हो जाता है। हर आत्म-समर्पण वाले अपराधी की आत्मा एक बार एम्स (AIMS) में प्रवेश के बाद ही संतुष्ट होती है।

जिनकी आत्मा निष्पाप होती है वे विजय माल्या और नीरव जैसी महान शख्सियत होती हैं, जो इस भ्रष्टाचार-युक्त भारत-भूमि में छटपटाती है और इस भूमि से पलायन कर एक रणछोड़ सा आत्म-संतोष प्राप्त करती है।

विदेशों का द्वार ही उनकी द्वारका होता है। ।

समर्पण बुरा नहीं, आत्म-समर्पण भी बुरा नहीं ! काश ! हम अपने आत्म के साथ खिलवाड़ न करें ! शरीर नश्वर है, और आत्मा अमर। इस नश्वर शरीर के पीछे अपनी आत्मा को यहाँ-वहाँ अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए गिरवी ना रखें। सारी स्विस बैंक का पैसा भी इस आत्मा को ऋणानुबंध से मुक्त नहीं कर सकता।

थोड़ा शरीर का कष्ट भोग लें !

मन को भौतिकवाद की मैराथन से अलग कर लें। सीमित संसाधनों में अपनी आत्मा को अपराध-बोध से मुक्त ही रखें।

तब आपका समर्पण सच्चा आत्म-समर्पण होगा, जो आपके स्वयं के समक्ष होगा। प्रायश्चित ही उसका दण्ड होगा, आत्म-बल और विवेक उसे सत्य, शिव और सुंदर की ओर प्रेरित करेंगे।

हर दिन नया होगा, हर रात नई होगी। एक नई रौशनी अन्तस् से प्रकट होगी। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 95 – देश-परदेश – खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

 

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 95 ☆ देश-परदेश – खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

देश की राजधानी दिल्ली में कुछ दिन पूर्व एक दुखद घटना में तीन युवा भूतल स्थित ग्रंथालय में अध्ययन करते हुए पानी भर जाने से अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए थे।

इस घटना के मुआवजे की अभी घोषणा भी नहीं हुई थी, उससे पूर्व राजस्थान प्रांत की राजधानी जयपुर याने कि गुलाबी शहर में भी भीषण वर्षा हो जाने से तीन गरीब जो कि भूतल के अंदर स्थित भूतल में पानी भर जाने से मृत्यु को प्राप्त हुए। चूंकि वो गरीब मजदूर तबके से थे, इसलिए राष्ट्रीय चैनल्स पर चर्चा के पात्र नहीं थे।

कोचिंग संस्था ने तो तीनों छात्रों को पचास पचास लाख के मुआवजे में से पच्चीस लाख की राशि दे देने की घोषणा कर दी है। शेष राशि का भुगतान उनके मालिक की जेल वापसी के बाद होगा। पैसे वाले भी गज़ब की चालें चलते हैं।

कल पानी भरी सड़क से धीमी गति से कार चलाते हुए हमने कुछ छीटें एक व्यक्ति पर क्या उछाले, हमें तो भीड़ ने घेर कर पुलिस की धमकी तक दे दी थी। पीड़ित व्यक्ति ने बीच बचाव करते हुए कहा कि वो स्वयं जल्दी में थे। अच्छा हुआ वो हमारे बैंक के ग्राहक था और हमें पहचान भी गया, जान बची तो लाखों पाए।

आज प्रातः किसी की कार से कुछ छीटें हमारे घर की बाहरी दीवार पर लग गए, हमने भी उस कार के मालिक को लपक कर हर्जाने की लंबी सी मांग रख दी। दीवार पर एशियन पेंट करवाकर देने का दबाव तक बना दिया। उसने भी मुस्कराते हुए कहा ठीक है, पेंट करवा लो हम पैसे दे देंगे, लेकिन पेंट के खाली डिब्बे उनको चाहिए होंगे।

इसके बाद हंसते हुए बोले, अब वो दिल्ली वाले कार मालिक को कोर्ट ने जेल से रिहाई के आदेश दे दिए हैं, जिसको बेसमेंट में पानी भरने के लिए दोषी मानकर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ मित्रता दिवस = मित्र – एक ऐसा रिश्ता जो सभी रिश्तों से बढ़कर… ☆ सुश्री रुचिता तुषार नीमा ☆

सुश्री रुचिता तुषार नीमा

☆ कविता ☆ मित्रता दिवस = मित्र – एक ऐसा रिश्ता जो सभी रिश्तों से बढ़कर ☆ सुश्री रुचिता तुषार नीमा ☆

युग युगांतर से मनुष्य के जीवन में मित्र, दोस्त, सखा का एक विशेष स्थान रहा है। प्रभु श्री राम की निषादराज और सुग्रीव से मित्रता हो या श्री कृष्ण की सुदामा, उद्धव, अर्जुन और द्रोपदी से। ये दोस्ती की वो खुबसूरत मिसाल है,जिनके उदाहरण आज भी दिए जाते हैं ।युग बदलते रहे, लेकिन इस रिश्ते की खूबसूरती हमेशा वैसे ही बरकरार रही। एक ऐसा रिश्ता जो खून के संबंधों से भी बढ़कर ,दिल के करीब रहा हमेशा। जिसमें कभी जात पात, ऊंच नीच, स्त्री पुरुष का भेद नहीं हुआ। बस मित्र, सदा मित्र ही रहा।जिससे मन की हर अच्छी बुरी बात निसंकोच पूर्ण विश्वास के साथ कही जा सके। जो आपको सही राह बताए, संबल प्रदान कर सके।एक ऐसा रिश्ता जो हर स्वार्थ, हर सीमा से परे रहा।

लेकिन आज के भौतिक युग में जब सभी रिश्ते व्यापारिक तौर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। सच्ची मित्रता का सौंदर्य खतम होता जा रहा। सोशल प्लेटफार्म पर कहने को तो आपके हजारों मित्र मिल जाते हैं, लेकिन जो दिल से साथ निभाए, ऐसा शायद ही कोई होता हैं।

इसलिए आपके सच्चे मित्र, जो बचपन से आपके साथ है, हर परिस्थिति में जिन्होंने प्रत्यक्ष, या अप्रत्यक्ष आपको सहयोग दिया है, ऐसे मित्रों को सहेज कर रखें।

मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। 

ऐसे ही मित्रों के नाम ये कुछ पंक्तियां;

 

मित्र शब्द है जाना पहचाना सा,

दिल के क़रीब कोई अपना सा,

जिससे नहीं हो कोई भी सम्बन्ध,

पर हो दिल के गहरे बंधन

तो वह है मित्र..

 

जो बिन कहे सब समझ जाएं

जिसे देख दर्द भी सिमट जाए,

जिसे देखकर ही आ जाये सुकून

और सब तनाव हो जाये गुम.

तो वह है मित्र ….

 

जब मुश्किलों से हो रहा हो सामना,

और लगे कि अब किसी को है थामना

उस वक्त जो सबसे पहले आए

बिन कहे जो हाथ बढ़ाये

तो वह है मित्र……

 

निःस्वार्थ, निश्छल, सब सीमाओं से पार

जैसे हो कृष्ण और सुदामा,

जहाँ बीच में न आए कोई भाषा,

 न कोई उम्मीद, न कोई आशा

बस यही है मित्रता की परिभाषा

© सुश्री रुचिता तुषार नीमा

इंदौर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 436 ⇒ स्वर्ग और नरक… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्टोव्ह ।)

?अभी अभी # 437 ⇒ स्वर्ग और नरक? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो चीज बिना मरे नहीं अनुभव की जा सकती, उसकी कल्पना हम जीते जी ही कर लेते हैं। मरना तो आपको एक दिन है ही, अगर आपने अच्छे कर्म किए और पुण्यों को संचित किया तो आपका स्वर्ग में स्थान शर्तिया पक्का, अथवा अगर केवल झूठ बोलकर बुरे काम ही करते रहे, तो चित्रगुप्त आपको नर्क में भेजने में तनिक भी संकोच नहीं करेंगे। तीसरा कोई विकल्प उपलब्ध है ही नहीं।

इतना ही नहीं, मनुष्य जन्म लेकर ज्यादा इतराने और खुश होकर यह कहने की जरूरत भी नहीं कि, बड़े भाग मानुस तन पायो, क्योंकि आपके जन्म के साथ पिछले जन्म की पाप पुण्य की गठरी भी तो आपके सर पर है। शायद इसीलिए ऐसा कहा जाता होगा ;

ले लो, ले लो,

दुआएं मां बाप की।

सर से उतरेगी गठरी

पाप की।।

जब किसी सच्चे, मेहनती और ईमानदार इंसान के सर पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है, तो सज्जन पुरुष तो यही कहते हैं, ईश्वर की लीला अपरम्पार है, जरूर पिछले जन्म के पापों का फल भोग रहा होगा।।

स्वर्ग नरक और पाप पुण्य की इस मान्यता से परे जीवन का एक सत्य यह भी है ;

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।

केवल मेहनत, परिश्रम और पुरुषार्थ से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं, भाग्य भरोसे बैठे रहने से कभी किसी को कुछ हासिल नहीं होता।

जब पाप और पुण्य की परिभाषा ही बदल जाती है, तो स्वर्ग और नरक दोनों ही पृथ्वी पर उतर आते हैं।

सच और झूठ का अंतर मिट जाता है, पाप की दो नंबर की कमाई को, एक नंबर की बनाकर, पुण्य भी कमाया जा सकता है।।

इश्वर को मानने वाले और भाग्यवादी भले ही खुश होते रहें, ईश्वर सब देख रहा है, उसकी लाठी में आवाज नहीं होती। जब कि सच तो यही है कि उसके यहां भी जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला सिद्धांत ही लागू है।

आप स्वर्ग क्यों जाते हैं, क्या आपको इस धरती पर जीता जागता स्वर्ग नजर नहीं आता। अतुल राधिका की प्रीवेडिंग और बाद में शादी देखकर भी क्या आपको यह नहीं लगा, मानो पूरा स्वर्ग ही इस धरती पर उतर आया हो।

क्या आपने वहां पूरी दुनिया को नतमस्तक नहीं देखा। क्या नेता और क्या राजनेता, वहां अप्सराएं भी थीं और बॉलीवुड के सभी देवता भी। पूरा संत समाज वहां आशीर्वाद समारोह में अपनी आभा बिखेर रहा था, जिनमें सभी योगगुरु, महामंडलेश्वर ऑर स्वयं शंकराचार्य भी शामिल थे।

आज की यह दुनिया किसी स्वर्ग से कम। फिर भी जिन्हें मरने के बाद भी स्वर्ग की चाह है वे जीवन में अंबानी की राह पर ही चलें और नरक जाने से बचें। हम क्यों स्वर्ग की ओर चलें, क्यों न स्वर्ग हमारे कदमों तले हो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 251 – शिवोऽहम्… (2) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 251 ☆ शिवोऽहम्… (2) ?

शिवोऽहम् के संदर्भ में आज निर्वाण षटकम् के दूसरे श्लोक पर विचार करेंगे।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः

न वा सप्तधातुः न वा पंचकोशः।

न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पंचप्राणों में से कोई हूँ। न मैं सप्त धातुओं में से कोई हूँ, न ही पंचकोशों में से कोई। न मैं वाणी, हाथ, अथवा पैर हूँ, न मैं जननेंद्रिय या मलद्वार हूँ। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के इस अद्भुत आत्मपरिचय को यथासंभव समझने का प्रयास जारी रखेंगे।

वैदिक दर्शन में प्राण को ही प्रज्ञा भी कहा गया। शाखायन आरण्यक का उद्घोष है,

यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः

अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्राण, वायु के माध्यम से शरीर में संचरित होता है। संचरण करने वाली वायु पाँच स्थानों पर मुख्यत: स्थित होती है। इन्हें पंचवायु कहा गया है। पंचवायु में प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान समाविष्ट हैं।

स्थूल रूप से समझें तो प्राणवायु का स्थान नासिका का अग्रभाग माना गया है। यह सामने की ओर गति करने वाली है। प्राणवायु देह तथा प्राण की अधिष्ठात्री है। अपान का अर्थ है नीचे जाने वाली। अपान वायु गुदा भाग में होती है। मूत्र, मल, शुक्र आदि को शरीर के निचले भाग की ओर ले जाना इसका कार्य होता है। समान वायु संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका स्थान आमाशय बताया गया है। भोजन का समुचित पाचन इसका दायित्व है। व्यान वायु शरीर में सर्वत्र विचरण करती है। इसका स्थान हृदय माना गया है। रक्त के संचार में इसकी विशेष भूमिका होती है। उदान का अर्थ ऊपर ले जाने वाली वायु है। अपने उर्ध्वगामी स्वभाव के कारण यह कंठ, उर, और नाभि में स्थित होती है। वाकशक्ति मूलरूप से इस पर निर्भर है।

इसी तरह त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि एवं मज्जा, शरीर की सप्तधातुएँ हैं। इनमें से किसी एक के अभाव में मानवशरीर की रचना दुष्कर है। शरीर में इनका संतुलन बिगड़ने पर अनेक प्रकार के विकार जन्म लेते हैं।

अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय, शरीर के पंचकोश हैं। हर कोश का नामकरण ही उसे परिभाषित करने में सक्षम है। विभिन्न कोशों द्वारा चेतन, अवचेतन एवं अचेतन की अनुभूति होती है।

जगद्गुरु उपरोक्त श्लोक के माध्यम से अस्तित्व का विस्तार प्राण, पंचवायु, सप्तधातु, पंचकोश से आगे ले जाते हैं। तीसरी पंक्ति में वर्णित वाणी, हाथ, पैर, जननेंद्रिय अथवा गुदा तक, स्थूल या सूक्ष्म तक आत्मस्वरूप को सीमित रखना भी हाथी के जितने भाग को स्पर्श किया, उतना भर मानना है।

विवेचन करें तो मनुष्य को ज्ञात सारे आयामों से आगे हैं शिव। शिव का एक अर्थ कल्याण होता है। चिदानंदरूप शिव होना मनुष्यता की पराकाष्ठा है। इस पराकाष्ठा को प्राप्त करना, हर जीवात्मा का लक्ष्य होना चाहिए।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रवण मास साधना में जपमाला, रुद्राष्टकम्, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना करना है 💥 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ‘अंदाज़-ए-बयां करें आप और बेहाल हों हम’ ☆ डाॅ. मीना श्रीवास्तव ☆

डाॅ. मीना श्रीवास्तव

☆ आलेख ☆ ‘अंदाज़-ए-बयां करें आप और बेहाल हों हम’ ☆ डाॅ. मीना श्रीवास्तव

मौसम विभाग के सभी विशेषज्ञों को एवं उनके पूर्वानुमानों को अति उत्साह से सुनने वाले आप सबको मेरे शत-शत नमन!

मौसम का हाल-ए-दिल आजमाने वाले मौसम विभाग से हमने पूछा, “हाल कैसा है मौसम का?” तो आज उन्होंने कुछ अलग तरह से ही बात की, “क्या ख़याल है आपका?” कारण? सुनिए (मेरा मतलब है पढ़िए!) हमारे समय में ऐसा नहीं था! एक पपीहा ही था, जो रटता रहता था कि अब आवेगी बारिश। यदि आप अधिक काव्यात्मक मूड में हैं तो पेश है आकाश की ओर देख कहीं हल्की सी गरज और लरज सुनकर अद्भुत रीति से नाचता हुआ मोर! उस वक्त उसका मनमोहक नृत्य फोटू में कैप्चर करने को लालायित दर्शक गण उसे चाहे कितनी भी बार ‘वन्स मोअर’ दें, वह किसी मूडी कलाकार की तरह फोटो देने के लिए साफ़ मना कर देता था। मित्रों, इन पुरानी धारणाओं को तोड़ते हुए विश्व के मौसम विज्ञानियों ने ऐसी तकनीक विकसित की है कि, हर मिनट की गणना पर आधारित हवा की नमीं, उनकी दिशा, दशा और गति आदि का सूक्ष्म मूल्यांकन करके प्रति घंटा बारिश का पूर्वानुमान व्यक्त किया जाता है। और तो और, एक नहीं बल्कि कई निजी एजेंसियां इसमें कूद पड़ी हैं और उनकी वेधशालाएं सक्रिय मोड में आ गईं हैं। कुछ ने सोचा कि अगर इन सबका औसत निकाला जाए तो सटीक अनुमान मिल जाएगा, लेकिन उनका अंदाज एकदम गलत साबित हुआ।

कृषि कार्य, दुकानें, फेरीवालों का कारोबार तो ऐसे अनुमानों से भ्रमित, चकित और अवाक् रहा| नुकसान के आंकड़े भांपते हुए लोगों की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और नौबत यहाँ तक आ गई कि, दिन में तारे नजर आने लगे| अब कल की ही कहानी सुनिए मुंबई की! सरकार, नगर निगम आदि प्रतिष्ठित संस्थाओं ने वेधशाला की नवीनतम रिपोर्ट पर आधारित वायु गति से आदेश दे दिये| वे उससे अधिक गतिमान होकर स्कूल-कॉलेजों में पहुंच गए| दोपहर में बच्चों के पार्सल घर लाते-लाते अभिभावक और बसवालों को थकान आ गई| इन नन्हे मुन्ने चूजों को घोंसले में रखते रखते, बारिश की धारा कम हो गई।        

इस बीच पुणे (पुणे में स्थित) की वेधशाला ने सटीक अवलोकन के साथ हल्की से मध्यम बारिश की भविष्यवाणी की थी। लेकिन ये मुई बारिश बड़ी ही चालाक निकली| पुणे में रहकर पुणे की संस्था का घोर अपमान करने का ऐसा दुस्साहस! ऐसी बरस पड़ी कि, ३२ सालों का रिकॉर्ड तोड़कर ही मानी! बांध जल से लबालब थे, पानी एकता का सन्देश कन्धों पर लिए हर घर में घुस गया| बेचारी जनता ने कौन सा अपराध किया? बस बारिश का पूर्वानुमान सुना और उसपर विश्वास जताया | आज की तारीख में हर कोई बाउंड्री पर उत्तीर्ण होना चाहता है| तभी तो ये बारिश एक शरारती छात्र की भांति व्यवहार कर रही है| पता नहीं क्यों वेधशाला के अध्यापकों का कहना बिलकुल मानती नहीं है!

कल को (बीते हुए) जाने दो, क्योंकि (किसीने कहा है), उसके बारे में सोचना समय की बर्बादी है! कल (बीते हुए) हर जगह बारिश का जोरदार डिस्को डांस देखकर सभी प्रमुख सरकारी संस्थानों ने कड़ी मेहनत की और सबक सीखा। हमारे ठाणे और पुणे (मुंबई नहीं) और अन्य इलाकों में कल शाम अति तत्परता दिखाते हुए एहतियात के तौर पर आज के लिए स्कूल और कॉलेज बंद रखने के आदेश दे दिए गए। लेकिन इस ढीठ बारिश की शरारतों का जवाब नहीं| आज बड़े सवेरे से गायब ही हो गई है, न जाने कहाँ छिपी बैठी है। शायद वह भी आराम करना चाहती हो| लेकिन हमारी फिर से शिकायत है, इसमें संदेह की गुंजाइश है कि, क्या उसने सम्मानित संस्थाओं के आदेशों की अवहेलना करने की शपथ ली थी, क्योंकि यह सब कांड सुबह के शुरुआती घंटों में हुआ| बच्चों की आज की विभिन्न परीक्षाएं स्थगित होने से वे नाराज हैं सो अलग! इस बारिश के कारण उनके वीक एन्ड के प्लान पानी में बह गए!

मुझे तो लगता है कि यह बारिश ‘टीन एज सिंड्रोम’ से संक्रमित है! वे कैसे अपने बड़ों के कहने पर बिल्कुल उलटा करते हैं। अब एक प्रयोग करने की मेरी अंतरिम सलाह। वेधशालाओं को उनका आकलन कर ठीक उसके विपरीत रिपोर्ट सरकार और जनता को सौंपनी चाहिए। लेकिन एक संदेह है, वर्षारानी को इस साजिश की खबर हुई और वह अपनी ‘नीली छतरी’ को उल्टा कर गई तो? उसकी बजाय मौसम विभाग की तमाम वेधशालाओं के अनुमान को दिल में संजोये हुए, वर्षा के आगमन और निकास का स्वागत करें| अबोध बच्चों से सीखने के लिए बहुत कुछ है। चाहे बारिश हो या न हो, ‘नो स्कूल’ का आनंद लेने वाले इन निरीह आत्माओंके के खेलों में कोई खलल नहीं होती।

प्रिय पाठकगण, अब हास परिहास का सत्र ख़त्म करें|                 

आलेख के अंत में, कई तूफानों की गहन और सटीक भविष्यवाणी करके लाखों लोगों की जान बचाने के लिए सभी मौसम विज्ञानियों को बहुत-बहुत धन्यवाद! साथ ही, भारी बारिश में नालियों, सड़कों और सीवरों की अनवरत सफाई करने वाले नगर निगम के कर्मचारियों और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में हजारों नागरिकों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाले एनडीआरएफ के बहादुर जवानों को भी विशेष धन्यवाद!

दिनांक २६ जुलाई २०२४ (समय प्रातः ११ बजे)

© डॉक्टर मीना श्रीवास्तव

ठाणे

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – [email protected]

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 435 ⇒ सितमगर… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सितमगर।)

?अभी अभी # 435 ⇒ सितमगर? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सितमगर कोई स्मगलर अथवा बर्गलर नहीं होता। सितमगर अन्याय करने वाले अथवा अत्याचारी को कहते हैं !

सिकदर भी आये कलदार भी आये

न कोई रहा है न कोई रहेगा

है तेरे जाने की बारी विदेशी

ये देश आज़ाद हो के रहेगा

मेरा देश आज़ाद हो के रहेगा। इन विदेशियों में आप बाबर अकबर के समूचे मुगल वंश और फिरंगी आततायियों को भी शामिल कर सकते हैं।

आई हैं बहारें मिटे ज़ुल्म-ओ-सितम

प्यार का ज़माना आया

दूर हुए ग़म।

राम की लीला रंग लाई

श्याम ने बंसी बजाई। ।

तो क्या ज़ुल्मो सितम इतनी आसानी से खतम ?

जी नहीं जनाब, सितम तो अब शुरू होने वाले हैं ;

तीर आँखों के जिगर के

पार कर दो यार तुम

जान ले लो या तो जान को

निसार कर दो यार तुम।

सिर्फ तीर ही नहीं, अभी तो बिजलियां भी गिरेंगी, देखते जाइए ;

शोख़ नज़र की बिजलियाँ,

दिल पे मेरे गिराए जा

मेरा ना कुछ ख़याल कर,

तू यूँ ही मुस्कराए जा।।

जी हां, यही सब सितम ढाने के तरीके हैं। लेकिन अगर जुल्मी जब अपना सांवरिया ही हो, तो बस यही कहा जा सकता है ;

ज़ुल्मी हमारे सांवरिया हो राम

कैसे गुजरेगी हमरी

उमरिया हो राम ;

जब प्यार में सितम होता है, तो वह इंतकाम नहीं, एक इम्तहान होता है। अंतिम बानगी देखिए ;

सितम या करम

हुस्न वालों की मर्ज़ी

यही सोच कर

कोई शिकवा ना करना।

सितमगर सलामत

रहे हुस्न तेरा

यही उस को मिटने से पहले दुआ दे

जो उन की तमन्ना है, बरबाद हो जा ..

अगर आप भी शौक रखते हैं तो ;

इधर आ सितमगर ..

हुनर आजमाएं ….

तू तीर आजमा…..

हम जिगर आजमाएं…!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #243 ☆ सच्चे दोस्त : अनमोल धरोहर… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सच्चे दोस्त : अनमोल धरोहर… । यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 243 ☆

सच्चे दोस्त : अनमोल धरोहर… ☆

साझेदारी करो, तो किसी के दर्द की करो, क्योंकि खुशियों के दावेदार तो बहुत हैं। जी हां! ज़माने में हंसते हुए व्यक्ति का साथ देने वाले तो बहुत होते हैं, परंतु दु:खी इंसान का साथ देना कोई पसंद नहीं करता। ‘सुख के सब साथी दु:ख में न कोई/ मेरे राम! एक तेरा नाम सांचा/ दूजा न कोय’ गीत की पंक्तियां उक्त भाव को पुष्ट करती हैं। सो! सच्चा दोस्त वही है, जो दु:ख व ग़म के समय उसका दामन थाम ले। परंतु ऐसे दोस्त बड़ी कठिनाई से मिलते हैं और ऐसा साथी जिसे मिल जाता है; पथ की बाधाएं-आपदाएं उसका बाल भी बांका नहीं कर सकतीं। सागर व सुनामी की लहरें उसे अपना निवाला नहीं बना सकतीं; आंधियां बहा कर नहीं ले जा सकतीं, क्योंकि सच्चा मित्र अमावस के अंधकार में जुगनू की भांति उसका पथ आलोकित करता है। जी• रेण्डोल्फ का यह कथन ‘सच्चे दोस्त मुश्किल से मिलते हैं; कठिनाई से छूटते हैं और भुलाए से नहीं भूलते। किसी दुश्मन की गाली भी इतनी तकलीफ़ नहीं देती, जितनी एक दोस्त की खामोशी।’ सच्चा दोस्त आपका साथ कभी नहीं छोड़ता और आप उसकी स्मृतियों से भी कभी निज़ात नहीं पा सकते।’ इसलिए कहा जाता है कि आप दुश्मन की उन ग़लतियों को तो आसानी से सहन कर सकते हो, परंतु दोस्त की खामोशी को नहीं। यदि किसी कारणवश वह आपसे गुफ़्तगू नहीं करता, तो आप परेशान हो उठते हैं और तब तक सुकून नहीं पाते; जब तक उसके मूल कारण को नहीं जान पाते। शायद! इसीलिए इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि ‘खामोशियां बोलती हैं। वे अहसास हैं, जज़्बात हैं, हृदय की पीड़ा हैं, मुखर मौन हैं, जो सबके बीच अकेलेपन का अहसास कराती हैं।’

वैसे तो आजकल हर इंसान भीड़ में अकेला है… अपने-अपने द्वीप में कैद है, क्योंकि उसे किसी से कोई संबंध-सरोकार नहीं रहता। वह केवल मैंं, मैं के राग अलापता है; स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है और ऐसे लोगों के संगति से भी डरता है, क्योंकि उनके साये में वह कभी भी पनप नहीं सकता। जैसे एक पौधे को विकसित होने के लिए अच्छी आबो-हवा, रोशनी व खाद की आवश्यकता होती है; वैसे ही एक इंसान के सर्वांगीण विकास के लिए अच्छे, स्वच्छ व स्वस्थ वातावरण, सच्चे दोस्त व सुसंस्कारों की दरक़ार होती है, जो हमें माता-पिता व गुरुजनों द्वारा प्राप्त हो सकते हैं। वैसे भी कहा गया है कि दुनिया में माता-पिता से बड़ा हितैषी, तो कोई हो ही नहीं सकता। सो! हमें सदैव उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए; उनके संदेशों को ग्रहण कर जीवन में धारण करना चाहिए, क्योंकि वे वेद-पुराण के समान हैं; जो हमें सुसंस्कारों से पल्लवित करते हैं। इसी भांति सच्चे दोस्त भी हमें ग़लत राह पर चलने से बचाते हैं और हमारा पथ-प्रदर्शन करते हैं। यदि हम पर दु:खों व ग़मों का पर्वत भी टूट पड़ता है, तो भी वे हमारी रक्षा करते हैं; धैर्य बंधाते हैं और अच्छे डॉक्टर की भांति रोग की नब्ज़ पकड़ते हैं। इसलिए मानव को दु:खी व्यक्ति के दर्द को अवश्य बांटना चाहिए, क्योंकि दु:ख बांटने से घटता है और खुशी बांटने से बढ़ती है। वैसे भी मानव की यह प्रवृत्ति है कि वह सुख अकेले में भोगना चाहता है और दु:खों को बांट कर अपनी पीड़ा कम करना चाहता है।

परमात्मा भाग्य नहीं लिखता, परंतु जीवन के हर कदम पर आपकी सोच, दोस्त व कर्म आपका भाग्य लिखते हैं। जीवन में बहुत से सौदे होते हैं।  अधिकांश लोग सुख बेचने वाले होते हैं, परंतु दु:ख खरीदने वाले नहीं मिलते– यही है जीवन का सार व सत्य है। सो! हमें सदैव अच्छे दोस्त बनाने चाहिएं। सकारात्मक सोच के अनुकूल श्रेष्ठ कर्म करने चाहिएं, क्योंकि जहां सत्संगति होगी;  वहां सोच तो नकारात्मक हो ही नहीं सकती। यदि सोच अच्छी है, तो कर्म भी उसके अनुकूल सबके लिए मंगलकारी होंगे। सो! ग़लत राहों पर चलने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यदि आप जीवन में खुश रहना चाहते हैं, तो अपने फैसले परिस्थिति को देखकर कीजिए। इसलिए जो भी दूसरों की प्रभुसत्ता से आकर्षित होकर फैसले करते हैं; वे सदैव दु:खों के सागर में अवगाहन करते रहते हैं। इसलिए मानव को समय व परिस्थिति के अनुकूल निर्णय लेने चाहिएं; न कि लोगों की खुशी के लिए, क्योंकि ज़िंदगी में सबको खुश रखना असंभव होता है। यह तो सर्वविदित है कि ‘चिराग जलते ही अंधेरे रूठ जाते हैं।’ इसलिए जीवन में जो भी आपको उचित लगे; आत्म-संतोष हित वही करें, क्योंकि यदि सोच सकारात्मक व खूबसूरत होगी, तो सब अच्छा ही अच्छा नज़र आयेगा, अन्यथा सावन के अंधे की भांति सब हरा ही हरा दिखाई पड़ेगा।

जीवन में दोस्तों से कभी उम्मीद मत रखना, क्योंकि उम्मीद मानव को दूसरों से नहीं, ख़ुद से करनी चाहिए। यदि दूसरे साथ न दें, तो बुरा मत मानिए, क्योंकि यदि स्वप्न आपके हैं, तो कोशिश भी आपकी होनी चाहिए। अपेक्षा व उपेक्षा दोनों मानव के लिए हानिकारक होती हैं। यदि आप किसी से अपेक्षा अर्थात् उम्मीद रखते हैं, तो उसके टूटने पर आपको अत्यंत दु:ख होता है। यदि दूसरे आपकी उपेक्षा करते हैं, तो उस स्थिति में आप ग़मों के सागर में डूबने के पश्चात् उबर नहीं पाते। सो! इनके जंजाल से सदैव ऊपर उठिए और किसी पर भी अधिक विश्वास न कीजिए, क्योंकि जब विश्वास टूटता है, तो बहुत दु:ख होता है, पीड़ा होती है। संबंध तभी क़ायम रह पाते हैं, यदि दोनों ओर से निभाए जाते हैं, क्योंकि एक तरफ से तो रोटी भी सेंक कर नहीं बनाई जा सकती।

संबंध अर्थात् सम रूप से बंधा हुआ अर्थात् जहां वैषम्य नहीं, सम्यक् भाव हो। वैसे संबंध भी बराबरी वालों के साथ निभाए जा सकते हैं। जैसे जीवन रूपी गाड़ी को सुचारू रूप से चलाने के लिए दो समान व संतुलित पहियों की अहम् आवश्यकता होती है, वैसे ही यदि दो विपरीत मन:स्थिति, सोच व स्टेट्स के लोगों के मध्य संबंध होता है, तो वह स्थायी नहीं रह पाता; जल्दी खण्डित हो जाता है। इसलिए दोस्ती भी बराबर वालों में शोभती है। वैसे भी ज़िंंदगी तभी चल सकती है; यदि मानव में यह धारणा हो कि ‘मैं भी सही और तू भी सही।’ यदि मैं सही हूं और वह गलत है, तो भी संबंध कायम रह सकते हैं। परंंतु यदि मैं ही सही हूं, तो वह ग़लत है और वह सोच जीवन में बरक़रार रहती है; तो वह सोच अनमोल रिश्तों को दीमक की भांति चाट जाती है। सो! जीवन में मनचाहा बोलने के लिए अनचाहा सुनने की ताकत भी होनी चाहिए। रिश्ते बोल से नहीं, सोच से बनते हैं। अक्सर लोग सलाह देने में विश्वास रखते हैं; सहायता देने में नहीं। रिश्तों के वज़न को तोलने के लिए कोई तराजू नहीं होता। संकट के समय सहायता व परवाह बताती है, कि रिश्तों का पलड़ा कितना भारी है। इसलिए जो इंसान आपके शब्दों का मूल्य नहीं समझता; उसके समक्ष मौन रहना ही बेहतर है, क्योंकि क्रोध हवा का वह झोंका है, जो बुद्धि रूपी दीपक को तुरंत बुझा देता है।

आपके शब्दों द्वारा आपके व्यक्तित्व का परिचय मिल जाता है। इसलिए मानव को यथा-समय व यथा-परिस्थिति बोलने का संदेश दिया गया है, क्योंकि जब तक मानव मौन रहता है, उसकी मूर्खता उजागर नहीं होती। हम एक-दूसरे के बिना कुछ भी नहीं– यही रिश्तों की खूबसूरती है। वैसे भ्रम रिश्तों को बिखेरता है और प्रेम से बेग़ाने भी अपने बन जाते हैं। बदलता वक्त व बदलते लोग किसी के नहीं हुआ करते… ऐसे लोगों से बच कर अर्थात् सावधान रहना चाहिए, क्योंकि वे गिरगिट की भांति रंग बदलते हैं। वे विश्वास के क़ाबिल नहीं होते, क्योंकि वे पल-भर में तोला और पल-भर में माशा हो जाते हैं। वे रिश्तों में सेंध लगाने में माहिर होते हैं अर्थात् अपने बन, अपनों को छलते हैं। उनसे वफ़ा की उम्मीद रखना वाज़िब नहीं।

आइए! मन रूपी दीपक को जलाएं। अच्छे-बुरे व सच्चे-झूठे की पहचान कर, एक-दूसरे के प्रति विश्वास बनाए रखें। सुख-दु:ख में साथ निभाएं। दूसरों पर दोषारोपण करने से पूर्व अपनी अंतरात्मा में झांकें व आत्मविश्लेषण करें। दूसरों को कटघरे में खड़ा करने से पूर्व स्वयं को उस तराज़ू में रख कर तोलें तथा उन्हें पूर्ण अहमियत दें। सदैव मधुर वाणी में बोलें और कभी कटाक्ष न करें। ज़िंदगी दोबारा नहीं मिलती। इसलिए नीर-क्षीर-विवेकी बन ‘सबका मंगल होय’ की कामना करें।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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