हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 15 (81-85)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #15 (81 – 85) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -15

 

‘‘माँ धरती ले गोद में, हूँ मैं यदि निष्पाप।

पति प्रति अर्पित रहे नित तन-मन कार्यकलाप।।81।।

 

इतना सुन धरती फटी, निकली प्रभा महान।

करने को सीता को लय निज में बातें मान।।82।।

 

शेष नाग के शीश पर सिंहासन आसीन।

सिंधु मेखला भूमि माँ प्रकटी दुखी मलीन।।83।।

 

सीता थी श्रीराम को एकटक रही निहार।

राम ने रोका, धरा संग गई पर तज संसार।।84।।

 

राम को यह सब देख था क्रोध और सन्ताप।

भाग्य प्रबल कह ऋषि ने धैर्य बँधाया आप।।85।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 29 – सजल – पीढ़ियों को दे रहा जो फल निरंतर… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है दोहाश्रित सजल “पीढ़ियों को दे रहा जो फल निरंतर… । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 29 – सजल – पीढ़ियों को दे रहा जो फल निरंतर… 

समांत- अना

पदांत- – है

मात्राभार- 21

 

आंँधियों से जूझ कर ही वह तना है।

काटना उस वृक्ष को बिल्कुल मना है।।

 

छा गईं हरियालियाँ देखो चतुर्दिक

जिंदगी को साँस देने तरु बना है ।

 

पीढ़ियों को दे रहा जो फल निरंतर,

वह कुल्हाड़ी देखकरअब अनमना है।

 

तप रही धरती उबलते तापक्रम से

रोपना है पौधों को बस कामना है।

 

जब धरा की गोद का शृंगार होगा,

स्वस्थ होगी यह प्रकृति सद्भावना है।

 

घूमने जाते हैं पर्यटक देश में,

बिखरी सभी विरासतें सहेजना है ।

 

वृक्षों से वरदान जगत को है मिला ,

मिली सम्पदा ईश की समेटना है।

 

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

30 अगस्त 2021

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)-  482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता – आत्मघात ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – कविता – आत्मघात  ??

उसके भीतर

ठंडे पानी का

एक सोता है,

दुनिया जानती है..,

 

उसके भीतर

खौलते पानी का

एक सोता भी है,

वह जानता है..,

 

मुखौटे ओढ़ने की

कारीगरी

खूब भाती है उसे,

गर्म भाप को कोहरे में

ढालने की कला

बखूबी आती है उसे..,

 

धूप-छाँव अपना

स्थान बदलने को हैं

जीवन का मौसम

अब ढलने को है..,

 

जैसा है यदि

वैसा रहा होता

शीतोष्ण का अनुपम

उदाहरण हुआ होता..,

 

अपनी संभावनाएँ

आप ही निगल गया

गंगोत्री-यमुनोत्री

होते हुए भी

ठूँठ पहाड़ ही रह गया…!

©  संजय भारद्वाज

(सांझ 4:52 बजे, 13.5.2021)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆  ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 15 (76-80)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #15 (76 – 80) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -15

 

शुद्ध ऋचा सावित्री ज्यों जाती रवि के पास।

त्यों मुनि सीता सहित सुत पहुँचे रामनिवास।।76।।

 

सजल नयन भगवा वसन शील-राशि, गुणखान।

शांत भाव लख सभी ने किया शुद्ध अनुमान।।77।।

 

जैसे खुद जाती है झुक पकी धान की बालि।

झुक गई आँखें सभी की दोषारोपन वाली।।78।।

 

मुनि बोले- ‘‘पुखी सिया सबका तुम पर नेह –

पति समक्ष जन-मन बसा, दूर करो संदेह’’।।79।।

 

सीता ने कर आचमन पावन जल ले हाथ।

जो ला शिष्यों ने दिया बोली सात्विक बात।।80।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 83 – दोहे ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 83 –  दोहे ✍

बादल आकर ले गए, उजली उजली धूप ।

अंधियारे में चमकते, यादों के स्तूप ।।

 

हिरन सरीखी याद है, भरती खूब कुलांच।

 चूक जरा – सी यदि हुई ,गड़े पांव में कांच ।।

 

याद हमारी आ गई, या कुछ किया प्रयास ।

अपना तो यह हाल है, यादें बनी लिबास ।।

 

फूल तुम्हारी याद के, जीवन का अहसास।

वरना है यह जिंदगी जंगल का रहवास।।

 

पैर रखा है द्वार पर, पल्ला थामें पीठ।

कोलाहल का कोर्स है, मन का विद्यापीठ।।

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव-गीत #86 – “सारी रात देख कर सपने…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण अभिनवगीत – सारी रात देख कर सपने…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 86 ☆।। अभिनव-गीत ।। ☆

☆ || “सारी रात देख कर सपने…”|| ☆

छींके पर थीं तीन रोटियाँ

रखीं मटेली* में ।

जो ब्यालू से बचीं

निहित थीं इसी पहेली में।।

 

दरसल बँटवारे में आयीं

तीन-तीन रोटीं ।

किन्तु बच रही एक कि

जिस पर बात हुई खोटी ।

 

अत: तय किया दो-दो

खा कर ,रखें तीन रोटीं।

खायेंगे हम सुबह फूस

की इसी हवेली में ।।

 

ऐसा किये विचार सो गये

दोनों पति -पतनी।

आले में रख कर वे भूले

इमली की चटनी ।

 

बहुत प्रयासों बाद गिरा पायी भूरी रोटी ।

खायी छक उद्दंड बिलैया

पकड़ हथेली में।।

 

सारी रात देख कर सपने

दम्पति जब जागे ।

चकित रह गये देख तमाशा

विधना के आगे ।

 

फिर  हो कर हैरान विचारों में खोये खोये।

डाल दिया चिन्ता में प्रभु

क्यों नई-नवेली में ।

*मटेली=रोटी रखने का मिटटी का बर्तन

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

11-03-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 76 ☆ # क्षमा # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय एवं भावप्रवण कविता “# क्षमा  #”) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 76 ☆

☆ # क्षमा  # ☆ 

मैंने तुम्हारा दिल

कितनी बार दुखाया है

बहते आंसुओं को

गालों पर सुखाया है

तुम्हारे प्रणय निवेदन को

ठुकराकर

कितनी बार रूलाया है

तुम्हारे निश्चल प्रेम की

सदैव उपेक्षा किया हूँ 

संकट की घड़ी में

ना कभी रक्षा किया हूँ

याचक बन तुम मेरे

कदमों में पड़ी रही

पर मैंने ना कभी

भिक्षा दिया हूँ

माना कि तुम बला की

खूबसूरत हो

किसी पुजारी के

मंदिर की मूरत हो

हर कोई यहाँ है

तुम्हारा मतवाला

हर किसी की जैसे

तुम जरूरत हो

पर मुझे तुम्हारे प्रेम की

चाह नहीं है

मेरी तुमसे मिल सकें

ऐसी राह नहीं है

मेरे हृदय में बहुत है

सम्मान तुम्हारा

पर तुम्हें चाहूँ 

ऐसा कोई भाव नहीं है

गर हो सके तो

तुम मुझे माफ करना

मेरी गुस्ताखिंयों से

अपना मन साफ करना

समय चक्र के भंवर में

फँसा हुआ हूँ मै

क्षमा कर सको तो बस

मुझे क्षमा करना /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 15 (71-75)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #15 (71 – 75) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -15

कवि ने कहा ये तनय है सीता-प्राणाधार।

आत्मज दोनों आपके, इन्हें करें स्वीकार।।71।।

 

राम ने कहा तात तव वधू सिय परम पवित्र।

जनता के संदेह का कारण असुर चरित्र।।72।।

 

जन मन का संदेह यदि सिया करे निर्मूल।

तो स्वागत करता महल सिया सहित दो फूल।।73।।

 

पाकर स्वीकृति राम की मुनि ने शिष्यों साथ।

बुलावाया सीता वहाँ आश्रम से कह बात।।74।।

 

अगले दिन दरबार में करने अनुसंधान।

नगर-वासियों मध्य मुनि आये सहित विधान।।75।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 87 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

?  Anonymous Litterateur of Social Media # 87 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 87) ?

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc. in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

हम ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए आदरणीय कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी के “कविता पाठ” का लिंक साझा कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें।

फेसबुक पेज लिंक  >>  कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी का “कविता पाठ” 

? English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 87 ?

☆☆☆☆☆

तुम हमेशा ही महकती

रहती हो आस पास…

जिन्दगी शायद

तुम्हे ही कहते हैं…

 

Your fragrance is 

ubiquitously present…

Probably that’s why

you’re known as life

☆☆☆☆☆

ये जो निगाहों से हमारे

दिल को हलाल करते हो

करते  तो  वैसे  जुर्म  हो

लेकिन कमाल करते हो…

 

Slaughtering of my heart

that you do with your eyes

Though a crime but must say 

an amazing one you do!

☆☆☆☆☆

ये बात और है कि

सजदे नहीं कुबूल उसे

मगर वो शख्स हमारा

ख़ुदा तो आज भी है…

 

It is another matter he doesn’t

accept prostrating salutations,

but that person still remains

our God, even today…!

☆☆☆☆☆

हर आदमी में होते हैं

दस-बीस  आदमी…

जिसको  भी  देखिये

कई  बार  देखिये…!

 

There are ten-twenty men

inside every man

Watch carefully whoever

you see, many a time…!

☆☆☆☆☆

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नवरात्रि विशेष ☆☆ नवरात्रि पर दोहे…☆☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं. आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. आज प्रस्तुत है नवरात्रि पर्व पर आपके द्वारा रचित “नवरात्रि पर दोहे…”. आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं.)

☆ नवरात्रि विशेष ☆ नवरात्रि पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

शैलपुत्री माँ प्रथम दिन, पूजा करिए आप

गौ घृत खीर चढ़ाइए, मिटें शोक संताप

 

दिवस दूसरा पूजिये, ब्रम्हचारिणी मात

मिश्री चीनी भोग का, दें माँ को सौगात

 

चन्द्रघंटा माँ नमन है, पूजिये दिवस तृतीय

दूध-मलाई चढ़ा कर, बोलें जय रमणीय

 

चतुर्थ दिवस कुष्मांडा, जपिये माँ का नाम

मालपुये का भोग लगे, हरतीं रोग तमाम

 

आरती माँ स्कन्द की, हरे विषम आघात

केला भोग लगाइए, पंचम दिवस सुहात

 

छठवें दिन कात्यायनी, ममता का हैं रूप

करें ग्रहण माता शहद, धरें दीप अरु धूप

 

कालरात्रि माँ सप्तमी, करतीं मोक्ष प्रदान

गुड़ मेवे का भोग पा, करें सदा कल्यान

 

महागौरी माँ नमस्तु, चढ़े नारियल पान

भोजन कन्या अष्टमी, खूब कीजिये दान

 

सिद्धिदात्री नवम दिवस, चढता तिल अरु अन्न

दया करो माँ सभी पर, होवें सभी प्रसन्न

 

नवरात्रि के व्रत रखें, मिले सुखद संतोष

पहुँचे जो माँ की शरण, उसके हरतीं दोष

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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