हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विस्तार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विस्तार ? ?

?

परिणाम को लेकर

विवाद व्यर्थ है,

जो संचित किया

वही विस्तृत हुआ,

मैंने पौधा रोपा

फलत: पेड़ पनपा,

तुमने काँक्रीट बोया

नतीज़ा बंजर रहा…!

?

© संजय भारद्वाज  

6:48 बजे संध्या, 21 फरवरी 2023

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 दीपावली निमित्त श्री लक्ष्मी-नारायण साधना,आश्विन पूर्णिमा (गुरुवार 17 अक्टूबर) को आरम्भ होकर धन त्रयोदशी (मंगलवार 29 अक्टूबर) तक चलेगी 💥

🕉️ इस साधना का मंत्र होगा- ॐ लक्ष्मी नारायण नम: 🕉️ 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ फर्श पर चाँद… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कविता ☆ 🌏🌜🔴फर्श पर चाँद🔴🌛🌎 ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

फर्श पर

पड़ा हुआ है

पूनम का चाँद।

खिड़की की जाली की

परछाई के बीच-

 

तैर रहा है

एक टुकड़ा

आकाश समन्दर में।

बड़ा सुहाना मंज़र है।

 

पर इससे काम नहीं 

बनेगा

बिजली का लट्टू

जलाना ही होगा

रोटियां सेंकनी ही होंगी

धरती सी गोल गोल

टकटकी बांधे हैं थालियां

डाइनिंग टेबल पर

फैली हुई

प्रतीक्षा को समेटकर

चुकाना होगा सांसों का

मोल, अनमोल  ।

 

ऐसे में एक कील ठोंककर

चाँद को दीवार पर

टांग देना ही

बेहतर है,

ताकि वह

घटना बढ़ना भूल जाए।

अमावस में काम आए।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 136 ☆ मुक्तक – ।।दीपावली।।रोशनी का अलौकिक पर्व।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # 136 ☆

☆ मुक्तक – ।।दीपावली।।रोशनी का अलौकिक पर्व।। 🪔 ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

[1]

दीपावली   का   पर्व मानों कि  दीपों  की  कतार  है।

उमंगों   की   लौ   में  सजा   हर    कोना   बाजार   है।।

ज्योति पर्व की रोशनी और लक्ष्मी गणेश का पूजन।

अमावस्या  के  अन्धकार को मिटाने का त्यौहार है।।

[2]

दीवाली   रात   हज़ारों   नई    उम्मीदें   जगाती   है।

हमारी    ऊर्जा  चमक  को   कई  गुना  बढ़ाती   है।।

हर       दर     हर     कोना     हो     जाता       रोशन।

अपनों   को   अपनों   के   ही   करीब   ले   आती है।।

[3]

हर    कोना   गुलज़ार   हो    हर   जगह  हो   चमकती।

पटाखों    के    शोर   में  मिलन  की  आवाज़ धमकती।।

लक्ष्मी  गणेश   आशीर्वाद   लाए   खुशियों   की सौगात।

हर   चेहरे   पर   खिल   जाए   नई   रोशनी   दमकती।।

[4]

अंधकार    से    केवल    प्रकाश    की   ओर   जाना   है।

हर    स्थान    से   बस    तम    को    ही   मिटाना   है।।

यह    दीप    पर्व     करे    बुद्धि    विवेक   का   उन्नयन।

इस   दीपावली   सम्पूर्ण   राष्ट्र   आलोकित   कराना  है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेलीईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 200 ☆ मनुज-मन भावों का एक अनुपम खजाना है… ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “मनुज-मन भावों का एक अनुपम खजाना है…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # 200 ☆ मनुज-मन भावों का एक अनुपम खजाना है…  ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

मनुज भावों कर एक अनुपम खजाना है.

दुर्विचारों से सदा जिसको बचाना है

सुख-दुखों का स्रोत मन के भाव ही तो हैं-

जिसे सद्‌भावों से हर दिन खुद सजाना है।

 *

मन अगर है शांत, संतोषी तो नित सुख है

अगर मैला है तो मैला हर ठिकाना है।

 *

झलक मन ही उसके सब व्यवहार देते हैं

कठिन होता मनोभावों को छुपाना है।

 *

प्रेम-पागे भाव सबको सदा भाते हैं।

भले भावों का प्रशंसक यह जमाना है।

 *

प्रिय कल्पना शुभ भावना ही नित सहेली हैं

दोनों का रिश्ता सतत सदियों पुराना है। ४॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दीवाली की कुंडलिया ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ दीवाली की कुंडलिया  ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

(1)

दीवाली का आगमन, छाया है उल्लास।

सकल निराशा दूर अब, पले नया विश्वास।।

पले नया विश्वास, उजाला मंगल गाता।

दीपक बनकर दिव्य, आज तो है मुस्काता।।

नया हुआ परिवेश, दमकती रजनी काली।

करे धर्म का गान, विहँसती है दीवाली।।

(2)

अँधियारे की हार है, जीवन अब खुशहाल।

उजियारे ने कर दिया, सबको आज निहाल।।

सबको आज निहाल, ज़िन्दगी में नव लय है।

सब कुछ हुआ नवीन, नहीं थोड़ा भी क्षय है।।

जो करते संघर्ष, नहीं वे किंचित हारे।

आलोकित घर-द्वार, बिलखते हैं अँधियारे।।

(3)

दीवाली का पर्व है, चलते ख़ूब अनार।

खुशियों से परिपूर्ण है, देखो अब संसार।।

देखो अब संसार, महकता है हर कोना।

अधरों पर अब हास, नहीं है बाक़ी सोना।।

दिन हो गये हसीन, रात लगती मतवाली।

बेहद शुभ, गतिशील, आज तो है दीवाली।।

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #27 – गीत – भारी है माथे की बिंदी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – भारी है माथे की बिंदी 

? रचना संसार # 2 – गीत – भारी है माथे की बिंदी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

निष्ठुर प्रीति जलाती मुझको,

आग लगी है कौन बुझाए।

विरह-वेदना बढ़ती रहती,

नित प्रियतम की याद सताए।।

 *

भारी है माथे की बिंदी

अँसुवन की बहती मधुशाला।

मन वीणा के स्वर अनुकंपित,

पी अधरों ने जैसे हाला।।

गीत नशीले ये सावन के,

अल्हड़ हिय को कौन सुनाए।

 *

धरा प्रणय की सेज बिछाकर,

नील गगन को नित्य पुकारे।

सकुचाई ये धवल चाँदनी,

दर्पण शशि प्रतिबिंब निहारे।

अवगुंठन खोले कलियों का,

भ्रमर निगोड़ा मन ललचाए।।

 *

करती हूँ मैं नित्य प्रतीक्षा,

लगे दिग्भ्रमित बौराई- सी।

सम्मोहित हो कामदेव से,

चंचल रति ये शरमाई -सी।।

वेद ऋचा – सी प्रीति पावनी,

नित्य मिलन की आस लगाए।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- [email protected], [email protected]

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #236 ☆ यही तो वह संस्कारधानी है… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  कविता यही तो वह संस्कारधानी है… आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

 ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 236 ☆

☆ यही तो वह संस्कारधानी है… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

जीवन  में   कुछ  करके  जाना

दुख  औरों   के  हर  के  जाना

पुत्र  हो  सपूत   या  हो  कपूत

तो अब क्या फिर धर के जाना

*

विनोबा भावे ने  जिसे  मानी  है

हां यही तो वह  संस्कारधानी  है

पर किसी ने कहा गुंडों का शहर

ये बात हमें गलत कर दिखानी है

*

माना कि शहर में अपराध बहुत है

पर धार्मिकता भी अगाध बहुत  है

मिल कर  मनाते हैं सभी पर्व यहां

लोगों में  आपसी सौहार्द  बहुत है

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दीपावली ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – दीपावली 🪔🏮 ? ?

?

अमावस बन

अँधेरा मुझे डराता रहा,

हर अँधेरे के विरुद्ध

एक दीप मैं जलाता रहा,

उजास की मेरी मुहिम

शनै:-शनै: रंग लाई,

अनगिन दीयों से

रात झिलमिलाई,

सिर पर पैर रख

अँधेरा पलायन कर गया

और इस अमावस

मैंने दीपावली मनाई!

🏮महापर्व दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएँ। 🪔

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 दीपावली निमित्त श्री लक्ष्मी-नारायण साधना,आश्विन पूर्णिमा (गुरुवार 17 अक्टूबर) को आरम्भ होकर धन त्रयोदशी (मंगलवार 29 अक्टूबर) तक चलेगी 💥

🕉️ इस साधना का मंत्र होगा- ॐ लक्ष्मी नारायण नम: 🕉️ 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 225 ☆ बाल गीत – दीवाली पर दीप जलाएँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक कुल 148 मौलिक  कृतियाँ प्रकाशित। प्रमुख  मौलिक कृतियाँ 132 (बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य) तथा लगभग तीन दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित। कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्यकर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित पाँच दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

 आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 225 ☆ 

बाल गीत – दीवाली पर दीप जलाएँ… 🪔 ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

दीप-दीप से आभा बिखरे,

दीवाली पर दीप जलाएँ।

अच्छी सोच, कर्म से अपने,

घर-घर को हम स्वच्छ बनाएँ।

या 

तन-मन-घर को स्वच्छ बनाएँ।

 *

राम अयोध्या लौटे इस दिन,

दुष्टों का संहार किया था।

हर्षित हुए, मनी दीवाली,

अतिशय सबने प्यार दिया था।

 *

आराध्य देव राम हैं अपने,

उनके गुण हम सब अपनाएँ।

 *

युगों-युगों से मने दिवाली,

लक्ष्मी जी भी प्रकट हुईं थीं।

पूजा करें भाव से उनकी,

जगमग-जगमग निशा हुई थी।

 *

पाँच दिनी सनातनी उत्सव,

धूमधाम से सभी मनाएँ।

 *

बम-पटाखे करें प्रदूषण,

इनसे हमको बचना होगा।

हरित पटाखे लाएं हम सब,

वायु को स्वच्छ रखना होगा।

 *

काम करेंगे सोच -समझकर

फूलो-सा जीवन महकाएँ।

 *

आत्मोथान तभी है होता,

जब हम मन के शत्रु पछाड़ें।

ईर्ष्या, द्वेष, वैर को अपने,

प्रेम, सत्य को उर में धारें।

*

दान, दया के दीपक लेकर,

हम संतुष्टि के भाव जगाएँ।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # 76 ☆ बालगीत – गाँधी जी ने… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय बालगीत  “गाँधी जी ने…” ।

✍ जय प्रकाश के नवगीत # 76 ☆ बालगीत – गाँधी जी ने… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पीछे मुड़कर नहीं देखना

हरदम आगे ही बढ़ना है

यही सिखाया गाँधी जी ने।

नहीं बोलना बुरा

और न ही सुनना है

नहीं देखना बुरा

यही मंतर गुनना है

यही पढ़ाया गाँधी जी ने।

सत्य अहिंसा का पथ

सदा हमें चुनना है

अपने कर्तव्यों से पीछे

कभी नहीं हटना है

यही रटाया गाँधी जी ने।

बुनियादी शिक्षा के चलते

खुद निर्भर बनना है

संस्कृति और सभ्यता वाले

पाठ हमें पढ़ना है

यही बताया गाँधी जी ने।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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