हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ कोहरा – भाग -1 ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

☆ कथा-कहानी ☆ कोहरा – भाग -1 ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆

(यह कहानी ‘साहित्य अकादमी’ द्वारा ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में पूर्व प्रकाशित  हुई थी।)

विजयेंद्र सुबह की सैर से लौटे, तब साढ़े सात बज चुके थे। आज लौटने में देर हो गई थी। सुबह, जब वे घूमने निकले थे, तब घना कोहरा था। देह पर लिपटे वस्त्रों-सा लिपटकर शरीर से एक रूप हो रहा था। उन्हें लगा, शरीर के छिद्रों से कोहरा अंदर रिस रहा है। वे उनकी हमेशा की राह से ही जा रहे थे। हमेशा की तरह टीले पर चढ़कर लौटनेवाले थे। लेकिन आज उन्हें महसूस हो रहा था, मानो किसी अज्ञात मार्गसे किसी रहस्य की ओर जा रहे हैं। पीछे छूट गए परिचित निशान कोहरे की वजह से मिट गए थे। क़रीब के निशान धुँधले हो रहे थे। अनजाने-से लग रहे थे। पहाड़ी चढ़ते हुए उन्हें लगा, कोहरा आक्रामक होकर उन पर हावी हो रहा है।

विजयेंद्र को बचपन याद आया, जब वे रतनगढ़ रियासत में थे! कोहरे में घोड़ा दौड़ाते हुए तेज़ रफ़्तार से जाना उन्हें पसंद था। जब वे थके-हारे लौटते, तब मार्ग में मोहना के सुर सुनाई देते, बड़ी दूर से आते प्रतीत होते। ऐसा लगता, मानो सुरों का आवरण बुना जा रहा है। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते जा रहे हैं, आवरण का एक-एक रेशमी रेशा खुलता जा रहा है!

कोहरा झीना होता जा रहा है। वह पारदर्शी पटल मानो सूरज की कोमल किरणों से उजास ले रहा है। नज़ाकत से झीने होते कोहरे से पेड़ों की फुनगियाँ, घरों की छत, दूर की पहाड़ी ऐसे खिलते जा रहे हैं, जैसे पौधे पर कली खिलती है। सूरज में यदि चाँद की शीतलता का अनुभव करना हो तो ऐसे घने कोहरे में सूरज को देखना चाहिए।

अपने दिल की चौखट में अंकित प्रकृति का यह रूप काग़ज़ पर साकार करना चाहिए। दिल में बहुत कुछ छलक रहा है। हाथ सुरसुरा रहे हैं। ब्रश हाथ में लेकर मन में उभरकर आई तसवीर चित्रित करने के लिए बेताब हुए।

विजयेंद्र जल्दी लौटे थे, फिर भी देर हो ही हुई थी। साढ़े-सात बज चुके थे। अब समाचार-पत्र पढ़ना, फिर स्नान, नाश्ता करके एक बार ऊपर की मंज़िल पर अपने स्टुडियो में गए कि उन्हें आवाज़ देने की हिम्मत किसी में नहीं होती थी। वे अपने साम्राज्य में गए कि उनकी मर्ज़ी से ही लौटेंगे। खाने-पीने के लिए भी बुलाना उन्हें पसंद नहीं था।

विजयेंद्र ने समाचार-पत्र पर नज़र डाली, लेकिन उन्हें न समाचार दिखाई दे रहे थे, न शब्द! सुबह का नज़ारा ही बार-बार नज़रों के सामने आ रहा था। मानो पूरा अख़बार कोहरे से ढक गया था। पीछे की ओर सुनहरी झलक, पेड़-पौधे कोहरे में छिपे हुए थे। यह सब चित्रित करने की उन्हें जल्दी थी।

विजयेंद्र अपने स्टुडियो में आए। उन्होंने स्टेंड पर फलक लगाया और वे रंग घोलने लगे। आज उन्हें चित्रित करना हैं छोटे-बड़े पेड़, नज़दीक से, दूर से, घर की छत, दूर की पहाड़ी के शिखर, जिनका अस्तित्व महसूस हो रहा है लेकिन रंग रूप का सुडौल एहसास कहीं खो गया है। इन सबके अस्तित्व को घेरकर बैठा हुआ कोहरा… घना कोहरा! विनाशी… फिर भी इस पल वही एक चिरंतन सत्य है, इस बात का एहसास दिलानेवाला कोहरा… उस कोहरे से दूर से भरकर आनेवाली हलकी पीली किरण… वैसी ही, जैसे मोहना के सुर दूर से आनेवाले कोहरे की तरह लिपटनेवाले… वो सामने नहीं आते, फिर भी उस पल चिरंतन सत्य प्रतीत होनेवाले सुर!

कोहरा देखकर विजयेंद्र की रतनगढ़ की यादें जाग उठीं! वे जब भी कोहरा देखते हैं, उन्हें रतनगढ़ याद आता है। रतनगढ़ जंगल से घिरा था। वहाँ कोहरा घना होता था। कोहरे से गुज़रते हुए पीछे मुड़कर देखते। कोहरे का परदा फिर से जुड़ जाता। घुड़सवारी करके लौटते समय मोहना के सुर सुनाई देते। दूर तक चले आते। हवेली तक साथ देते। वैसे तो उसके सुर आज भी, यहाँ भी, आसपास मौजूद हैं। अपनी ही नहीं, औरों की ज़िंदगी में भी इन सुरों ने ख़ुशियाँ भर दी है। आज यह दुनिया की मशहूर गायिका बन गई है। उसके हज़ारो, नहीं लाखों रिकॉर्ड्स बने हैं। अपने संग्रह में भी उसके कई रिकॉर्ड्स हैं। लेकिन अपने दिल में उसकी वह बचपन की आवाज़ ही बसी है। और उसकी वह मासूम ख़ूबसूरती!

काग़ज़ पर चित्र उभर रहा था। दूर की पहाड़ी, घर, पेड़ मानो हाथ में आ गए थे! इन सबको घेरकर बैठा हुआ कोहरा, बूँद-बूँद से काग़ज़ पर उतर रहा था।

स्टुडियो की कॉलबेल बज उठी। विजयेंद्र नाराज़ हुए। चित्र पूरा करके ही, वे नीचे जाना चाहते थे। लेकिन मिलने आनेवाले आदमी का काम भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होगा, वरना विद्यागौरी बेल ना बजाती। उन्होंने ब्रश धोकर रखे और नीचे आ गए।

विजयेंद्र की आते देख, हॉल में बैठे हुए लोग उठकर खड़े हो गए। ‘‘बैठिए बैठिए! हमारे आते ही आप बुज़ुर्ग खड़े हो जाएँ ऐसे अब हम कौन रह गए हैं भई!” विजयेंद्र ने कहा। चित्रकारिता में गतिरोध आने से विजयेंद्र नाराज़ हुए थे, लेकिन जो लोग मिलने आए थे, उन्हें देककर उनकी नाराजगी दूर हो गई। आज सुबह सैर करते हुए उन्हें रतनगढ़ की याद आई थी, और अब रतनगढ़ के लोग सामने खड़े हैं। 

‘‘हाँ, कहिए, कैसे आना हुआ? कोई खास बात?” विजयेंद्र ने पूछा।

‘‘इस वर्ष, बड़े महाराज महेंद्रनाथ जी की पुण्यतिथि के मौक़े पर मोहना देवी के गाने के कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।”

‘‘यह अच्छी बात है। बड़े महाराज उनकी सराहना करते थे।”

‘‘कार्यक्रम भारत सांस्कृतिक संचनालय की ओर से किया जाएगा। उनसे बात हो चुकी है।” देसाई जी ने कहा।

‘‘इसी बहाने मोहना देवी का सम्मान करने का इरादा है। भारत सरकार ने उन्हें ‘स्वर शारदा’ उपाधि प्रदान की है। कल ही घोषणा हुई है।”

‘‘हाँ!”

कल टी.वी. पर समाचार सुनने के बाद, मोहना को बधाई देने के लिए विजयेंद्र ने पाँच-छह बार फ़ोन किया था, लेकिन फ़ोन व्यस्त लग रहा था। वो तो लगना ही था। हर कोई फ़ोन पर बधाई देने का प्रयास जो कर रहा होगा! आज किसी को पोस्ट ऑफ़िस भेजकर बधाई का तार भिजवा देंगे। विजयेंद्र मन-ही-मन सोच रहे थे, लेकिन अगर फ़ोन पर बात होती है, तो उसकी सुरीली आवाज़ सुनाई देगी! अब तक तो उसने फ़ोन पर स्वयं बात की है। सचिव से संदेश देना-लेना नहीं किया है। देखते हैं, आज रात फ़िर से फ़ोन करेंगे!

‘‘आप उस समय रतनगढ़ में होंगे ना?” जेधेजी ने पूछा।

‘‘हाँ, बिल्कुल रहूँगा।”

इतना कहने-सुनने के बावजूद बात आगे नहीं बढ़ रही थी। विजयेंद्र समझ गए, ये लोग और कुछ कहना चाहते हैं। जो कहने के लिए आए हैं, अब तक वह कह नहीं पाए हैं। समझ में नहीं आ रहा था किन शब्दों में कहा जाए। मानो कोहरे में छिपा रास्ता ढूँढ़ रहे हों। मंज़िल का पता है, लेकिन जाएँ कैसे? उनकी चुलबुलाहट देखकर विजयेंद्र ने पूछा, ‘‘इस कार्यक्रम के संबंध में आपको क्या मुझसे कोई अपेक्षा है? आप खुलकर बताइए।”

‘‘हम रजतमहल के सारे ट्रस्टी चाहते हैं कि रजतमहल के कला कक्ष में मोहना देवी का पोर्ट्रेट लगाया जाए!” देसाई जी ने कहा।

‘‘दुनिया की सबसे मशहूर गायिका अपने रतनगढ़ की है, यह हमारे लिए गर्व की बात है।”

‘‘सही कहा आपने। उनके संगीत ने हम सबकी ज़िंदगी में खुशियाँ भर दी हैं। आपकी पोर्टेट की कल्पना बहुत अच्छी है।” विजयेंद्र ने कहा।

‘‘लेकिन मोहना देवी ने मना कर दिया है। अगर आप उन्हें मना लें तो… वो आपको न नहीं कहेंगी।”

‘‘में कोशिश करूँगा।”

रजतमहल में महेंद्रनाथ जी ने चुनिंदा चित्र-शिल्प कृतियों का बहुत ख़ूबसूरत संग्रह जमा किया था। महेंद्रनाथ जी रतनग़ढ रियासत के आख़िरी राज थे। उनकी ढलती उम्र में रियासत विलीन हो गई थी। वे बड़े रसिक और दिलदार थे। कलाकारों के क़द्रदान थे। उन्होंने कई कलाकारों को आश्रय दिया था। चित्रकला में उन्हें ख़ास रुचि थी। फ़ुरसत के समय में वे चित्र बनाते थे। कई जाने-माने, देशी-विदेशी चित्रकारों की चित्र-कृतियाँ उन्होंने ख़रीदी थीं। जब वे राजा थे, तब ब्रिटिश गवर्नर से और अन्य लोगों से भी कुछ चित्र उन्हें भेंटस्वरूप मिले थे। उन्होंने जाने-माने चित्रकारों से अपने दादा, परदादा, माँ, दादी, चाची आदि के पोर्ट्रेट बनवा लिए थे। एक इतालवी चित्रकार ने विजयेंद्र का भी चित्र बनाया था। उड़नेवाली तितली, उसे पकड़ने के लिए लपकते दो नन्हे हाथ! आँखों में उत्सुकता! विजयेंद्र को वह चित्र बहुत पसंद था। इसलिए नहीं की वह उनका था, बल्कि इसलिए कि वह एक सुंदर कलाकृति थी। रजतमहल के चित्र देखते-देखते और महेंद्रनाथ जी ने जिन कलाकारों को आश्रय दिया था, उनकी कलाकृतियों का कैसे निर्माण होता है, यह देखते-देखते वे बड़े हुए थे। स्वतंत्रता के बाद रतनगढ़ रियासत भारतीय प्रजातंत्र में विलीन हुई थी। रजतमहल, उसमें रखी चित्र-शिल्प कृतियाँ सैलानियों के आनंद का और चित्रकारों के अभ्यास का केंद्र बन गया था।

रजतमहल महेंद्रनाथ जी के पिताजी विश्वनाथ जी ने अपनी पत्नी माधवी देवी को उनके पच्चीसवें जन्मदिन पर बतौर तोहफ़ा देने के लिए बनवाया था। रतनगढ़ रियासत के दक्षिण में नील सरोवर नाम का विशाल सरोवर है। इस सरोवर का आकार कमल के पत्ते की तरह है। सरोवर का पानी साफ़ और मीठा है। सरोवर के किनारे रजतमहल ऐसा खड़ा है, मानो कमल के पत्तों के बीच खिला श्वेत कमल हो! महल संगमरमर का बना है। उसमें चाँदी जड़े खंबे हैं! उस पर नक़्क़ाशी की गई है।

सामने भव्य कक्ष है। उसके चारों तरफ़ छोटे-छोटे आठ कक्ष हैं। महल के दक्षिण की ओर नील सरोवर है, बाक़ी तीनों तरफ़ बग़ीचा है।

पहले रजतमहल में चुनिंदा कलाकारों के नृत्य संगीत के कार्यक्रम हुआ करते थे। राज परिवार के लोगों के साथ दरबार और रियासत के गिने-चुने प्रतिष्ठित लोगों को भी आमंत्रित किया जाता था। बसंत पंचमी, शरद पूर्णिमा को यहाँ बड़ा उत्सव मनाया जाता था। इस उत्सव में प्रजा भी शामिल हो सकती थी।

रियासत विलीन होने के बाद, रियासत के आश्रय में रहनेवाले लोग, अपना आबोदाना ढूँढ़ने के लिए चारों दिशाओं में चल पड़े। बग़ीचे वीरान हुए। फूल पौधों की जगह कँटीले पेड़-पौधों से बग़ीचा भर गया।

रजतमहल महेंद्रनाथ जी की पसंदीदा जगह थी। अपने अंतिम समय में वे वहीं पर थे। अपना चित्र-संग्रह उन्होंने वहीं पर मँगवाया था। उनकी मृत्यु के बाद महल और चित्र-संग्रह सरकार के क़ब्ज़े में चले गए। आज वह पर्यटन स्थल हो गया है। प्रकृति का ख़ूबसूरत नज़ारा, कला का उत्कृष्ट नमूना? रजतमहल और उसमें रखे गए सुंदर चित्र देखकर सैलानियों की आँखे जुड़ा जाती हैं। मन प्रसन्न हो जाता है। धन्य-धन्य कहते हुए लोग बाहर आते हैं।

रजतमहल के चित्र-संग्रह में और एक चित्र रखने का व्यवस्थापक मंडल ने निर्णय लिया था। मोहना देवी का चित्र। बाक़ी लोगों की सहमति थी। विजयेंद्र विश्वस्त मंडल के सदस्य थे। अगर रियासत विलीन न होती तो आज वे रजतमहल के मालिक होते, इसलिए उनके साथ चर्चा करके उनकी अनुमति लेना आवश्यक था। देसाई जी ने बात शुरू की थी।

रजतमहल में उनका चित्र लगाना उनका बड़ा सम्मान होगा। मोहना देवी आज दुनिया की मशहूर गायिका हैं। रतनगढ़ उनकी साधना भूमि है। रियासत विलीन होने के बाद अन्य कलाकारों की तरह नयनतारा भी अपनी बेटी को लेकर शहर चली गई थी। वहाँ उसने गाने के कार्यक्रम किए थे। बेटी की पढ़ाई का इंतज़ाम किया था। नयनतारा जब अपनी बेटी को लेकर रतनगढ़ आई थी, तब मोहना केवल डेढ़ साल की थी। महेंद्रनाथ जी ने उसे आश्रय दिया था। उसे घर दिया, अन्न-वस्त्र दिए, उसका मारा-मारा फिरना समाप्त हो गया था। महाराज की इच्छानुसार उसे उन्हें गाना सुनाना था। दशहरा, दीपावली, वर्षप्रतिपदा, बसंत पंचमी, जन्माष्टमी, शरद पूर्णिमा आदि ख़ास मौकों पर गिने-चुने आमंत्रित लोगों के सामने उसका गाना होता था। रतनगढ़ में आश्रय मिलने के बाद उसे अपनी बेटी मोहना की संगित शिक्षा की ओर ध्यान देने के लिए भी फ़ुरसत मिली थी। मोहना आज मशहूर गायिका है। उसे मिलनेवाले पैसा, प्रतिष्ठा, सराहना सब कुछ नयनतारा ने अपनी आँखों से देखा था। आज वह इस दुनिया में नहीं रही। दोनो – माँ – बेटी अपने अन्नदाता के प्रति कृतज्ञ थीं। अपनी साधना भूमि रतनगढ़ के लिए उनके मन में आत्मीयता थी। विजयेंद्र महेंद्रनाथ जी के पोते होने से उनके प्रति मोहना के मन में अपनापन था। कभी-कभी कार्यक्रम में वह प्रकट भी होता था। उसके पीछे क्या केवल कृतज्ञता है या और भी कुछ…? जब जब मोहना की याद आती है तो लगता है, मानो दूर से हवा के झोंके के साथ कोई ख़ुशबू आई और दिल पर छा गई। विजयेंद्र कभी-कभी सोचते, मोहना के दिल में उनके लिए कौन सी भावनाएँ होंगी भला!

मोहना देवी आज कला, प्रतिष्ठा, पैसा और लोकप्रियता के जिस शिखर पर है, उसकी तुलना में विजयेंद्र उस शिखर के तीसरे-चौथे पायदान पर भीं नहीं होंगे। लेकिन व्यवस्थापक मंडली का मानना है कि पुराने ऋणानुबंध के कारण एक-दूसरे के लिए जो आत्मीयता, सम्मान उनके दिल में है, यदि विजयेंद्र बात करेंगे तो मोहना देवी पोर्ट्रेट बनवाने के लिए मना नहीं करेंगी।

क्रमशः…

© श्रीमती उज्ज्वला केळकर

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संपर्क -17 16/2 ‘गायत्री’ प्लॉट नं. 12, वसंत दादा साखर कामगारभावन के पास , सांगली 416416 महाराष्ट्र 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #128 ☆ लघुकथा – निर्णय ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  एक विचारणीय लघुकथा “निर्णय।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 128 – साहित्य निकुंज ☆

☆ लघुकथा – निर्णय ☆

“बाबूजी यह मैं क्या सुन रहा हूँ.. कि नीता कहीं और शादी करना चाहती है और वह लड़का अपनी जात बिरादरी का नहीं है।”

हाँ तुमने सही सुना है ..कोई बात नहीं जब उसकी यही मर्जी है तो उसे करने दो।”

” बाबू जी आपका दिमाग खराब हो गया है कोई ब्राह्मण पंजाबी लड़के से शादी करेगा क्या? मैं तो हरगिज भी उसकी शादी नहीं करूंगा।”

नीता के आते ही सुदीप ने कहा..” एक बात कान खोल कर सुन लो जहां हम चाहेंगे वही तुम्हारी शादी होगी घर से बाहर कदम निकाला तो टांग तोड़ देंगे।”

नीता भाई के डर के मारे  उस वक्त कुछ कह न पाई और एक दिन उसने फैसला किया कि मैं अपनी जिंदगी इस घर में नहीं गुजार सकती और वह घर से निकल गई।” भाई को जैसे ही पता चला भाई ने माता-पिता से कहा कि खबरदार आपने जो इससे रिश्ता रखा तो आप मेरा मरा हुआ मुंह देखेंगे या मैं समझ लूंगा कि आप हमारे लिए मर गए।”

माता पिता डर के मारे उससे मिलने नहीं जाते थे। कुछ दिन बाद नीता ने एक बेटे  को जन्म दिया।नीता माता पिता के दर्द और तड़प के कारण उसको बीमारी ने घेर लिया और एक दिन वह इस दुनिया को छोड़ कर चली गई।

अब सुदीप भैया के बेटी की शादी है भैया बहुत उत्साह के साथ अपनी बिटिया का विवाह कर रहे हैं क्योंकि बिटिया ने अपनी मनपसंद बंगाली लड़के को चुना है।

पिताजी यह सब देखकर अपने आपको रोक नहीं पाए और वक्त  उनके मुंह से निकला “अगर तुमने  यही सही निर्णय उस वक्त लिया होता तो आज शायद मेरी बेटी जिंदा होती।”

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 91 ☆ फाँस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक संवेदनशील लघुकथा ‘फाँस’. डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस ऐतिहासिक लघुकथा रचने  के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 91 ☆

☆ लघुकथा – फाँस ☆ 

अर्चना बालकनी में खड़ी बिजली के तार पर बैठी गौरैया को देख रही थी जिसने बच्चों के उड़ जाने के बाद अभी – अभी घोंसला छोड़ दिया था। घोंसला सूना पड़ा था। कुछ दिन पहले ही चूँ –चूँ  की आवाजों से लॉन गूँजा करता था।  जैसे बच्चों के रहने से घर में रौनक बनी रहती है। घोंसले का सूनापन घर के सन्नाटे को और बढ़ा रहा था। फ्लैशबैक की तरह पति की  एक- एक बात उसके दिमाग में गूँज रही थी –  ‘टू बेडरूम हॉल किचन के फ्लैट से क्या होगा ? कम से कम थ्री बेडरूम हॉल किचन का फ्लैट होना चाहिए। एक  बेटे – बहू का, दूसरा बेटी- दामाद या कोई मेहमान आए तो उसके लिए और तीसरा बेडरूम हमारा। ऐश करेंगे यार, पैसे कमाए किस दिन के लिए जाते हैं।‘  बड़े चाव से खरीदे तीन बेडरूम के फ्लैट में आज सन्नाटा पसरा था। बेटी की शादी हो गई,  कभी – कभार आ जाती हैं सुख – दुख में। बेटे को एम.एस करने विदेश भेजा था,  वह वहीं रम गया।  तीसरे में अकेली रह गई वह। क्यों ???  शादी के बीस साल बाद उसके पतिदेव को समझ में आया कि वे दोनों अब साथ नहीं रह सकते। उसने पति के फोन पर कई बार उसके ऑफिस की एक महिला की चैट पढ़ी  थी। इस पर उसने सवाल भी किए थे पर पति ने उसे तो यही जताया कि ‘तुम हमें समझ ही नहीं सकीं। गल्ती तुम्हारी ही है जो मुझे बांधकर ना रख सकीं। यह तो औरतों का काम होता है पति और बच्चों को संभालना। मेरा क्या ? ‘जो भी राह में मिला, हम उसी के हो लिए’ गीत गुनगुना दिया उसने। दो बेडरूम  खाली रह सकते हैं यह तो उसे मालूम था लेकिन तीसरा ?

 फाँस बहुत गहरी चुभी थी। समझ ही नहीं पाई कि कहाँ,  क्या गलत हो गया? खुद को  कितना समझाती पर चुभन कम नहीं होती। फाँस कुरेद रही थी  उसे भीतर ही भीतर – ‘ इतने वर्षों का साथ, पर एक पल नहीं लगा घरौंदा बिखरने में ? पति और बच्चों के इर्द- गिर्द ही तो जीवन था उसका। मकान को घर बनाने में उसने जीवन खपा दिया। किसी बात का कोई मोल नहीं ? ‘ आँसू थम नहीं रहे थे, दिल बैचैन जोर से धड़कने लगा,  घबराकर फिर से बालकनी में जाकर घोंसले को देखने लगी। गौरैया आकाश में दूर उड़ गई। अर्चना हसरत भरी निगाहों से गौरैया को उड़ते देख रही थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – [email protected]  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – कालजयी☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – लघुकथा – कालजयी ??

कितना धीरे धीरे चढ़ते हैं आप..! देखो, मैं कैसे फटाफट दो-दो सीढ़ियाँ एक साथ चढ़ रहा हूँ..! लिफ्ट खराब होने के कारण धीमी गति से घर की सीढ़ियाँ चढ़ रहे दादा जी से नौ वर्षीय पोते ने कहा। दादा जी मुस्करा दिए। अनुभवी आँख के एक हिस्से में अतीत और दूसरे में भविष्य घूमने लगा।

अतीत ने याद दिलाया कि बरसों पहले, अपने दादा जी को मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ाते समय यही बात उन्होंने अपने दादा जी से कही थी। उनके दादा जी भी मुस्करा दिए थे।

भविष्य की पुतली दर्शा रही थी कि लगभग छह दशक बाद उनके पोते का पोता या पोती भी उससे यही कहेंगे। दादा जी दोबारा मुस्करा दिए।

© संजय भारद्वाज

प्रात: 4:34 बजे, 18.4.22

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # 105 ☆ बुंदेलखंड की कहानियाँ # 16 – पुन्न पुरानौ घृत नयौ… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.

श्री अरुण डनायक जी ने बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर कई कहानियों की रचना की हैं। इन कहानियों में आप बुंदेलखंड की कहावतें और लोकोक्तियों की झलक ही नहीं अपितु, वहां के रहन-सहन से भी रूबरू हो सकेंगे। आप प्रत्येक सप्ताह बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ बुंदेलखंड की कहानियाँ आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ कथा-कहानी # 105 – बुंदेलखंड की कहानियाँ – 16 – पुन्न पुरानौ घृत नयौ… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

(कुछ कृषि आधारित कहावतों और लोकोक्तियों का एक सुंदर गुलदस्ता है यह कहानी, आप भी आनंद लीजिए)

अथ श्री पाण्डे कथा (16)  

पुन्न पुरानौ घृत नयौ, उर कुलवंती नार।

जे तीनों तबहीं मिलै, जब प्रसन्न करतार ॥

शाब्दिक अर्थ :- पुरखों द्वारा कमाया पुण्य, ताजे घी से युक्त स्वादिष्ट भोजन और कुल का मान बढ़ाने वाली चरित्रवान पत्नी हर किसी के भाग्य में नहीं होती और यह तीनों तभी प्राप्त होते हैं जब ईश्वर की कृपा होती है।

हिरदेपुर में हुई पंचायत की खबर आसपास के गाँवों में और दमोह तक जंगल में आग की तरह फैल गई। दुपरिया होते होते आसपास के गाँवों से लोग बाग शिव मंदिर में और ठाकुर साहब की बखरी पर जुटना चालू हो गए। कुछ तो सजीवन के समर्थन में थे पर ठाकुर साहब के दर से खुल कर कुछ न कह पाते। अनेक तमाशबीन भी थे जो चुपचाप तमाशा देख मजे लेने वाले भी थे तो कुछ चुखरयाई करबे में माहिर  इधर की बात उधर करने में लग गए। कुछ बुजुर्ग जो समझाइश देने को अपना पुश्तैनी दायित्व  समझते थे दोनों पक्षों को समझाने में लग गए। लेकिन बात जितनी बनती उतनी ही बिगड़ जाती। ठाकुर साहब को धर्म की चिंता थी, पुरखों का यशोगान और धर्म के लिए क्षत्रियों द्वारा किया गया बलिदान रह रहकर याद आ रहा था तो सजीवन के कान में महात्मा जी के शब्द गूँज रहे थे, हिन्दुस्तान में जो सबसे सबसे अधिक दुःख में पड़े हुए हैं, उन्हें हरिजन कहना यथार्थ है| हरिजन का अर्थ है, ईश्वर का भक्त, ईश्वर का प्यारा, गरीबा बसोर की कातर आँखे बार बार उनके सामने आ जाती मानो कह रही हों कि ‘महराज एक बार शंकर जी की बटैया मोहे भी छू लेन देओ।

शाम होते होते खबर आई कि दमोह से कांग्रेसियों का एक दल कल सुबह हिरदेपुर आयेगा और समस्या का  समाधान खोजने में मदद करेगा। इस खबर से बड़े बुजुर्गों ने राहत की साँस ली और ठाकुर साहब भी गाँव के लोगों की बात मानकर चर्चा के लिए तैयार हो गए। सब अपने अपने घर चल दिये पर लोगों को अनिष्ट की आशंका सता रही थी ऐसे में  भला नींद किसे आती। ठंड से गाँव के कुत्ते भी रोने लग जाते तो कहीं छींक की आवाज आती और लोग बाग भयभीत हो जाते। खैर रात कटी मुर्गे की बांग और चिड़ियों के चहचहाने ने सुबह की घोषणा कर दी। सारा गाँव फिर से ठाकुर साहब की बखरी पर आ डटा तो अनेक लोग मंदिर में बैठ सजीवन के साथ भजन गाने लगे। सूरज चढ़ते ही दमोह से कांग्रेसियों के दल आने शुरू हो गए। कुछ ही देर में ढगटजी, वर्माजी, मोदीजी, पलन्दीजी, मेहताजी, श्रीवास्तवजी   आदि नेता भी हिरदेपुर पहुँच गए। बातचीत शुरू हो इसके पहले ही ठाकुर साहब ने अपने कारिंदों को भेजकर नेताओं को अपनी बखरी में ही बुला लिया। कांग्रेस के नेता काफी देर तक ठाकुर साहब से चर्चा करते रहे और जलपान आदि ग्रहण कर ठाकुर साहब को ले कर मंदिर आ पहुँचे, जहाँ सजीवन अपनी मण्डली के साथ गांधीजी का प्रिय भजन जो उन्होने परसों ही दमोह की सभा में सुना था गा रहे थे।

रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम

सीताराम सीताराम, भज प्यारे तू सीताराम

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सब को सन्मति दे भगवान

सबको अपनी ओर आता देख सजीवन ने भजन गाना बन्द कर दिया पर रणछोड़ शंकर ढगट ने सजीवन से भजन को गाना जारी रखने को कहा और खुद भी उसे दुहराने लगे।

भजन समाप्ति पर पलन्दीजी ने चर्चा शुरू की’ ठाकुर साहब और गाँव की जनता हम सब जानते हैं की दो दिन पहले जब महात्माजी दमोह पधारे थे तब आपके गाँव के लोगों ने यहाँ उनका भारी स्वागत किया था।‘

ठाकुर साहब बोले हाँ भैया जा सही बात हे और ई कार्यक्रम की सफलता को पुरो यश सजीवन पंडित जी खों हेंगो। गाँव के अन्य लोगों ने भी ठाकुर साहब की हाँ में हाँ मिलाई।

‘ठाकुर साहब कल आपके गाँव की पंचायत के बारे में सुना और हम सब दमोह से इस विषय पर चर्चा करने आए हैं कि एक समाधान जो सबके हिट में हो निकाल सकें।‘ वर्माजी की गंभीर वाणी गूँजी।

‘भाइयो यह मंदिर हमारे पुरखों ने धर्म की रक्षा के लिए बनवाया था।‘  ठाकुर सहाब बोले।

‘लेकिन ठाकुर साहब महात्मा गांधी कहते हैं कि हरिजनों को अधिकारों से वंचित रखना अधर्म है।‘ दमोह से आए श्रीवास्तव जी बोले।

धनीराम बनिया से रहा न गया वह बोला कि ‘भइया गोस्वामी जी कह गए हैं कि ढ़ोल ग्वार शूद्र पशु नारी सकल तारणा के अधिकारी।‘

‘कल की बातें छोड़ो बाबू ,जमाना बदल रहा है।‘ धनीराम बनिया का शहर में पढ़ने वाला लड़का बोला।

‘तुम बीच में मत बोलो अभी कल के लड़के हो वेद पुराण मनु स्मृति सब कहते हैं कि केवल द्विज को शिक्षा ग्रहण करने का पात्रता है। शूद्र तो पैदा ही इसलिए होते हैं कि वे सवर्णों की सेवा करें, यह मंदिर उनके लिए खोलना घोर पाप का काम है।‘ बटेसर यादव बोले । 

अब सजीवन से रहा न गया वे बोले ‘भाइयो मैंने अपने पिताजी से वेद आदि शास्त्र पढ़े हैं। मनु स्मृति में भी शूद्र को शिक्षा न दिए जाने को कहीं भी स्पष्ट रूप से मनाही  नहीं  है। वैदिक काल में एतरैय, एलुष आदि दासी पुत्रों, सत्यवान जाबाल गणिका पुत्र व मातंग चांडाल पुत्र का उल्लेख है जो उच्च शिक्षित होने पर ब्राह्मण बन समाज में प्रतिष्ठित हुए। महर्षि बालमिकी भी शूद्र थे, विदुर दासी पुत्र थे तो निषादराज आदिवासी। यदि वैदिक काल में व मनु स्मृति में शूद्रों के पठन पाठन पर रोक लगाई गई होती तो उपरोक्त व्यक्ति ऋषि न बनते।‘

रणछोड़ शंकर ढगट की दमोह और आस पास के गाँवों में धर्म प्रेमी विद्वान ब्राह्मण के रूप में  बड़ी प्रतिष्ठा थी उन्होने ने भी सजीवन की बात का समर्थन करते हुये कहा कि शास्त्रों में  वर्ण परिवर्तन को मान्यता  है व शिक्षा प्राप्त कर शूद्र भी उच्च वर्ण में जा सकता है। अशिक्षित ब्राह्मण शूद्र समान है। ब्राह्मण का कर्तव्य है कि वह सब वर्णों को उनकी जीविकोपार्जन के उपाय बताए व स्वंय भी अपने कर्तव्यों को जाने इस प्रकार सजीवन की बात सही है और हमे उनकी बात मानते हुये यह मंदिर हरिजनों के लिए खोल देना चाहिए।

‘सही बात है राजा गरीबा बसोर और पुनिया चमार अपने साथियों के साथ मंदिर आएँगे, हम सब लोगों के बीच उठेंगे बैठेंगे तो उनका ज्ञान बढ़ेगा।‘ परम लाल काछी बोला।

यह सब बातें सुनते सुनते हरिजनों में भी कुछ जाग्रति का भाव आया और पुनिया व गरीबा एक साथ बोल उठे ‘राजा हम ओरन पर क्रिपा करो मंदिर में दर्शन कर लें देओ।‘

‘भाइयो गांधीजी खाते हैं कि हरिजनों को साथ लाने से अंग्रेजों को देश की एकता समझ में आएगी देश जल्दी आजाद हो जाएगा। उनकी हरिजन यात्रा से अंग्रेज डर गए हैं।‘ प्रेम शंकर धगट बोले।

ठाकुर साहब पर इन सब बातों का कोई असर न हुआ और उन्होने अपनी अंतिम घोषणा कर दी कि ‘ ‘हमारा मंदिर शूद्रों के लिए नहीं खोला जाएगा।‘

सभा ख़त्म होने की घोषणा होती उसके पहले ही सहसा सजीवन की कोठरी का द्वार खुला और पंडिताइन एक पोटली लेकर मंदिर के चबूतरे पर पहुँच अपनी धीमी किन्तु मधुर आवाज़ में बोली ‘ राजा अब तुमने हुकुम सुआ दओ हेगों कि हम जा मंदिर छांड देबें तो ठीक है जा गहनों की पुटलिया आय, भोला के बब्बा और दद्दा ने मंदिर के खेत जौन आमदनी बची उसे हमाए लाने बनवाए हते अब जब हम मंदिर छोड़ राय हें तो इन पर भी हमाओ कौनों अधिकार नई रह जात।‘

इतना कह कर पंडिताइन मुडी और वापस अपनी कोठरी की ओर चल दी.  

क्रमश:…

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # 28 – स्वर्ण पदक – भाग – 3 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे।  उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है।)   

☆ कथा कहानी # 28 – स्वर्ण पदक 🥇 – भाग – 3 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव 

जैसा कि अनुमान था, स्वर्णकांत ने परिवीक्षाधीन अधिकारी की परीक्षा पास की और देश के एक प्रतिष्ठित बैंक में दो वर्षीय प्रशिक्षण के लिये स्टॉफ एकेडमी गुरुग्राम की राह पकड़ी किन्तु, इसके पहले जब मां ने स्वर्णकांत को अपने गुरुजनों और मार्गदर्शकों से उनके घर जाकर उन्हें मिठाई भेंटकर आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ने की सलाह दी तो समय की कमी का बहाना बनाकर टाल गये. अब उनके मन में “स्वंय ग्रंथि” ने जड़ जमाने की शुरुआत कर दी थी जब उन्होंने यह सोचना शुरु कर दिया कि “शिक्षक तो बहुतों को पढ़ाते हैं, ये तो उनकी नौकरी का अंग है, सफलता तो प्रतिभाशाली छात्र को ही वरण करती है जो उनमें कूट कूट कर भरी है.”

जो गुरु उन्हें पहले सफलता के गुर सिखाते थे अब उनकी नज़रों में नज़रअंदाज करने लायक बन गये थे. गुरुग्राम, हैदराबाद के विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सभी व्यवसायिक प्रखंडों के व्यवहारिक ज्ञान से लैस होकर स्वर्णकांत जी ने दूसरे सर्किल में ज्वाइनिंग की और अनुभवों के समृद्धि कोष में निरंतर पायदान चढ़ते हुये विशालनगर की विशाल शाखा के मुख्य प्रबंधक की कुर्सी पर पदासीन हुये. इस पद का पदभार ग्रहण करने के पहले स्वर्णकांत ने अपना रूरल, और लाईन असाइनमेंट नाम करने के नाम पर पूरा किया. वे इस अवधि में हाईवेल्यू एडवांसेस के दुर्लभ विशेषज्ञ बन चुके थे तो उनकी अपरिहार्यता को देखते हुये ठीक 731वें दिन वे अपनी सिद्धहस्तता के बल पर विशिष्ट क्रेडिट एनालिस्ट की मनपसंद पोस्ट प्राप्त कर लेते हैं.

पहले एकेडमिक सफलता, फिर प्रतियोगितात्मक सफलता और फिर मैनेजर क्रेडिट की एक्सप्रेस क्रेडिट की सफलता ने जब अतिआत्मविश्वास रूपी व्याधि से उन्हें संक्रमित किया तो वो आत्मविश्लेषण की विधा में निपुण होने की जगह उसे अनावश्यक एक्सेसरीज़ समझकर किनारा कर बैठे और उसे नाग की केंचुली के समान उतार फेंकने में कामयाब हो गये.

जब विशालनगर की विशाल सेंटर शाखा में उनकी पदस्थापना हुई तो उनके पास अतिआत्मविश्वास था जिसके सामने घमंड भी खुद को छोटा महसूस करने लगता था. शैक्षणिक योग्यता और कैडर के डंके थे, प्रसिद्घ क्रेडिट एनालिस्ट की सर्किल स्तर की ख्याति थी, पर जो नहीं थी वह थी आत्मविश्लेषण करने की योग्यता जिसे उन्होंने हासिल करने की जरूरत भी नहीं समझी. अगर समझते भी तो किताबों में नहीं मिलती. विधाता अगर हर उँगली एक सी बना देता तो हाथों से लिखने पकड़ने की जगह सिर्फ एक ही काम हो पाता “करबद्धता”.

विशालनगर की ये शाखा कुरूक्षेत्र का मैदान थी जहां अच्छे-अच्छे सूरमा ढेर हो जाते थे और उच्च प्रबंधन ने इनके प्रोफाईल को देखते हुये और इनकी क्रिटिकल ब्रांच संचालन की अनुभवहीनता को नज़रअंदाज करते हुये इन्हें कुरूक्षेत्र का अर्जुन समझकर रणभूमि में उतार दिया. ये उतर तो गये पर न इनके साथ कृष्ण थे न ही गीता का ज्ञान जो आध्यात्मिक से ज्यादा व्यवहारिक है.

पराक्रम कथा जारी रहेगी.   क्रमशः …

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ प्रतिमा ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

☆ कथा-कहानी ☆ प्रतिमा ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆

‘साहबजी…’

‘बोल…’

‘सरकार की हर योजना, हर निर्णय की आलोचना करना, यही हमारी पक्षीय नीति है नं?’

‘हुँ… तो फिर…’

‘तो उस दिन आप ने मुख्यमंत्रीजी की नई घोषणा का स्वागत कैसे किया?’

‘मैं ने किया? कौनसी  घोषणा? कैसा स्वागत?’

‘वही … नगर के बीचोंबीच उस नेताजी की प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा… उस दिन आप ने कहा था, ‘सरकार के विधायक कार्य में हमारा पक्ष सहयोग देगा।‘ आप की दृष्टी से सरकार का कोई भी कार्य विधायक हो ही नही सकता। फिर इस बार सहयोग की भाषा कैसी?

‘अरे, मूरख, प्रतिमा बनानी है, तो चंदा इकठ्ठा करना ही पडेगा…’

‘हां! सो तो है। ‘

‘इस काम में हम उनकी की मदद करेंगे।‘

‘क्यौं?’

‘तभी तो चंदे का कुछ हिस्सा अपनी तिजोरी में भी आ जाएगा।‘

‘उँ…’

‘प्रतिमा की स्थापना के बाद कभी-न-कभी, कोई-न-कोई उस की विटंबना करेगा। शायद उस की तोड –फोड भी हो सकती है।‘

‘उस से क्या साध्य होगा?’

‘ तो आंदोलन होगा। निषेध मोर्चे निकाले जाएंगे। लूट मार होगी। दंगा – फसाद होगा। तब तो समझो अपनी चाँदी ही चाँदी…’

‘मगर ऐसा नहीं हुआ तो?’

‘तो इस की व्यवस्था भी हम करेंगे।

 

© श्रीमती उज्ज्वला केळकर

मो. 9403310170,   e-id – [email protected]  

संपर्क -17 16/2 ‘गायत्री’ प्लॉट नं. 12, वसंत दादा साखर कामगारभावन के पास , सांगली 416416 महाराष्ट्र 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार # 86 – मांस का मूल्य ☆ श्री आशीष कुमार ☆

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। 

अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”)

☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #86 – 🌻 मांस का मूल्य 🌻 ☆ श्री आशीष कुमार

मगध सम्राट् बिंन्दुसार ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा – “देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है…?” मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोचमें पड़ गये। चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आद तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता.. शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है…..उसने मुस्कुराते हुऐ कहा – “राजन्… सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।”

सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री आचार्य चाणक्य चुप रहे। सम्राट ने उससे पुछा : “आप चुप क्यों हो? आपका इस बारे में क्या मत है?” चाणक्य ने कहा : “यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है…., एकदम गलत है, मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूँगा….रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था।”

चाणक्य ने द्वार खटखटाया….सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा? प्रधानमंत्री ने कहा – “संध्या को महाराज एकाएक बीमार हो गए है उनकी हालत नाजूक है राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते है….आप महाराज के विश्वास पात्र सामन्त है। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूँ। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहे, ले सकते है। कहे तो लाख स्वर्ण मुद्राऐं दे सकता हूँ…..।” यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फिका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राऐं किस काम की?

उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजोरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राऐं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।

मुद्राऐं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामन्तों, सेनाधिकारीयों के द्वार पर पहुँचे और सभी से राजा के लिऐ हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ….सभी ने अपने बचाव के लिऐ प्रधानमंत्री को दस हजार, एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख तक स्वर्ण मुद्राऐं दे दी। इस प्रकार करोडो स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुँच गऐ और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्राऐं रख दी….!

सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है….? यह मुद्राऐं किसलिऐ है? प्रधानमंत्री चाणक्य ने सारा हाल सुनाया और बोले – “दो तोला मांस खरिदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला। अपनी जान बचाने के लिऐ सामन्तों ने ये मुद्राऐं दी है। राजन अब आप स्वयं सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है….??”

जीवन अमूल्य है।

हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को प्यारी होती है..! इस धरती पर हर किसी को स्वेछा से जीने का अधिकार है…

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – मसीहा ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी  एक विचारणीय लघुकथा मसीहा ।)

☆ लघुकथा – मसीहा ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

पीढ़ियों से प्रजा मसीहाओं के भरोसे रहती आई थी। हर राजा में प्रजा ने मसीहा देखा और हर बार छली गई। प्रजा अकर्मण्य नहीं थी ,पर ‘कर्म करो और फल की चिन्ता मत करो’ के सिद्धांत में उसकी गहरी आस्था थी। प्रजा कर्म करती, फल राजा या दरबारी भोग लेते। अब हालत यह थी कि भूख थी, खेत बंजर हो गये थे। प्यास थी, नदियों में पानी नहीं था। हाथ थे, हाथों के लिए कोई काम नहीं था। लोग बिना किसी पवित्र उद्देश्य के मर रहे थे। प्रजा सदा की तरह मसीहे की प्रतीक्षा कर रही थी।

ऐसी निराशा के बीच प्रजा ने अपने नये राजा में भी मसीहे को देखा। प्रजा का दृढ़ विश्वास था कि यह सचमुच का मसीहा साबित होगा। उसकी वाणी में ओज था, चेहरे पर आत्मविश्वास। वह शेर की तरह चलता था, बाज़ की तरह देखता था, कृष्ण की तरह वस्त्र धारण करता था। प्रजा नये मसीहे की पूजा करने लगी। मसीहे का हर झूठ प्रजा को सच से भी ज़्यादा विश्वसनीय तथा मोहक लगता। हर मसीहे की तरह नया मसीहा भी जानता था (बल्कि औरों से कहीं बेहतर जानता था) कि जैसे प्यार हर व्यक्ति के भीतर सहज ही उपस्थित रहता है, ठीक वैसे ही प्यार से कई गुणा अधिक घृणा भी सहज ही उपस्थित रहती है। उसने पहले प्रजा के भीतर गौरव जगाया कि उसकी प्रजा सर्वश्रेष्ठ है। प्रजा को अपनी क़ीमत समझ में आई। फिर मसीहे ने उनके भीतर की घृणा को कुरेदकर उसमें आग लगा दी। चूँकि घृणा सृष्टि की सर्वाधिक विस्फोटक सामग्री है, सो जल्दी ही आग पूरी रियासत में फैल गई। अब प्रजा रक्त से फाग खेलती है। उसे न रोटी चाहिए, न पानी, न काम। प्रजा ख़ून देखकर अट्टहास करती है और मसीहे की जय-जयकार करती है। उसका दृढ़ विश्वास है कि रक्त की नींव पर जल्दी ही उसके स्वर्णिम भविष्य की भव्य इमारत बनने वाली है।

© हरभगवान चावला

सम्पर्क –  406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य#127 ☆ लघुकथा – सम्मान – सुरक्षा… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा  रात  का चौकीदार”  महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा “कोई बात नहीं…”)

☆  तन्मय साहित्य  #127 ☆

☆ लघुकथा –  सम्मान – सुरक्षा… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

“हम जरा बाहर जा रहे हैं, पिताजी!”

बहु के साथ दरवाजे से निकलते हुए बेटे ने कहा।

“ठीक है बेटे।”

“कुछ लाना तो नहीं है आपके लिए?”

“नहीं।”

“लौटने में हमें कुछ देर हो सकती है”

“कोई बात नहीं”

भले ही बच्चे पूछते नहीं है अब मुझसे, पर बता के तो बाहर जाते हैं, सोचते हुए बुजुर्ग सुखलाल इसी में संतुष्ट थे।

यह अलग बात है कि, घर से निकलते  समय उनके लिए यह बताना भी कितना जरूरी रहता है कि,

“पिताजी! दरवाजा ठीक से बंद कर लेना”

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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