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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 77 ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – षोडशोऽध्यायः ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे ।  आज से हम प्रत्येक गुरवार को साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत डॉ राकेश चक्र जी द्वारा रचित श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें । आज प्रस्तुत है षोडशोऽध्यायः। पुस्तक इस फ्लिपकार्ट लिंक पर उपलब्ध है =>> श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 77 ☆ ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – षोडशोऽध्यायः ☆  स्नेही मित्रो सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत गीता का अनुवाद मेरे द्वारा श्रीकृष्ण कृपा से दोहों में किया गया है। पुस्तक भी प्रकाशित हो गई...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मोक्ष ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) संजय दृष्टि – मोक्ष  भविष्य जीने की चाह वर्तमान खोता रहा, प्रतिपल संप्रति अतीत होता रहा, अमर कामनाओं का भार नश्वर जीव ढोता रहा, संसार लालसाओं का अपूर्ण परितोष है, लालसाओं के पार सम्पूर्ण मोक्ष है..! ©  संजय भारद्वाज 19.9.2017, प्रातः 7 बजे अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ संजयउवाच@डाटामेल.भारत writersanjay@gmail.com ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 3 (61-65)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #3 (61-65) ॥ ☆   आघात उसका विकट झेल छाती पै रघु गिरे नीचे औं आँसू भी सबके पर झट व्यथा भूल, ले धनुष, लडने लगे सुनके जयकार फिर सँभल तनके। 61।   वज्राहत रघु के पराक्रम औं साहस से होके प्रभावित लगे इंद्र हँसने सच है सदा सद्गुणों में ही होती है ताकत सदा सभी को वश में करने ॥ 62॥   कहा इंद्र ने इस बली वज्र से बस सहा पर्वतों के सिवा सिर्फ तुमने मै हूँ तुम से खुश रघु अब इस अश्व को छोड़ वरदेने का सोचा है हमने ॥ 63॥   तब स्वर्ण रंजित चले बाण कतिपय से भासित सी दिखती थी जिसकी ऊँगलियाँ उस रघु को बाणों को रख बात करते खिली पुष्प सी इंद्र के मन की कलियाँ। 64।   यदि अश्व यह आप देते नहीं है, तो यह दें - ‘‘ पिता यज्ञ का पुण्य पायें इस सौवें अश्वमेघ के पूर्ण फल से पिता जी मेरे लाभ...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 3 (56-60)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #3 (51-55) ॥ ☆   औं दूसरे से सुरेन्द्र - रथ - ध्वजा को जो थी वज्रचिन्हित को भी काट डाला तब देवलक्ष्मी के काटे गये केश सा कुपित इंद्र खुद को लड़ने सम्हाला ॥ 56॥   दोनों ही अपनी विजय कामना से लगे करने संग्राम भारी भयावह इंद्र और रघु के उड़नशील सर्पो से बाणों से भयभीत साथी थे रहरह ॥ 57॥   अपनी सुयोजित संबल बाण वर्षा से भी इन्द्र रघु को न कर पाये फीका जैसे स्वतः से ही अद्भुत विद्युत को बादल कभी भी न कर पाते फीका ॥ 58॥   तब रघु ने अपने एक अर्द्धचन्द्र श्शर से, देवेन्द्र के धनु की काटी प्रत्यंचा जो कपिल चंदन लगे हाथ से मथे जाते उदधि की सी करता गरजना ॥ 59॥   हो इंद्र क्रोधित अलग फेंक धनु को उठा वज्र पर्वत के पर जिसने छांटे - बिखरती रही थी प्रभा जिससे भारी बड़े वेग से चलाया रघु के आगे ॥ 60॥   ©...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 75 ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – चतुर्दश अध्याय ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे ।  आज से हम प्रत्येक गुरवार को साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत डॉ राकेश चक्र जी द्वारा रचित श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें । आज प्रस्तुत है  चतुर्दश अध्याय। पुस्तक इस फ्लिपकार्ट लिंक पर उपलब्ध है =>> श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 75 ☆ ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – चतुर्दश अध्याय ☆  स्नेही मित्रो सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत गीता का अनुवाद मेरे द्वारा श्रीकृष्ण कृपा से दोहों में किया गया है। पुस्तक भी प्रकाशित हो गई है।...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संजय दृष्टि – अबूझ ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) संजय दृष्टि – अबूझ अपनी ही तस्वीरों, अपने ही प्रशंसागान से दबे और भरे पड़े हैं फेसबुक, ट्विटर, वॉट्सएप, इन्स्टाग्राम आदि, आदि..., लेकिन- इस भीड़ से परे कोई छोटी कविता, लघुकथा, टिप्पणी, अथवा भावाभिव्यक्ति भीतर तक उतर जाती है, पत्थर पर रची तस्वीर-सी मानस पर अंकित हो जाती है.., पता नहीं, ये दृष्टि विपन्नता है या दृष्टि सम्पन्नता..! ©  संजय भारद्वाज (बुधवार दि. 30 अगस्त 2017, अप. 12:56 बजे) अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 2 (71-75)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 2 (71-75) ॥ ☆   प्रदक्षिणा करके वेदिका की, गुरू दंपती, धेनु की वत्स की भी समस्त कल्याण की कामना रख, प्रस्थान कर भूप ने यात्रा की ॥ 71॥   अबाध गति सुख से मार्ग चलते रथ की मधुर कर्णप्रिय ध्वनि वह वीर श्शालीन व्रती सपत्नी प्रसन्न था पूर्ण मनोरथों से ॥ 72॥   जो पुत्र की प्राप्ति हित व्रत नियम से,कृशकाय था क्षीण नव चंद्रमा सा उत्सुक प्रजा नेत्र आतृप्ति लखते उसे प्रतिपदा चंद्र के सम सुखदप्त ॥ 73॥   आ निज नगर में श्री वृद्धि करते, ऊँची उड़ाते ध्वजा - पताका फिर विष्णु की भॉति पूजित जनों से नृप ने धराभार शासन सम्हाला ॥ 74॥   चंदासम सुखदायी गंगा सम तेजस्वी और स्कन्द के समान बलशाली गुण में । नरपति कुलभूषण दिकपालों सम ते जवान पुत्र जन्म हेतु खुशी छायी जन - जन में ॥75।।   द्धितीय सर्ग समाप्त © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 74 ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – त्रयोदश अध्याय ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे ।  आज से हम प्रत्येक गुरवार को साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत डॉ राकेश चक्र जी द्वारा रचित श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें । आज प्रस्तुत है  त्रयोदश अध्याय। पुस्तक इस फ्लिपकार्ट लिंक पर उपलब्ध है =>> श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 74 ☆ ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – त्रयोदश अध्याय ☆  स्नेही मित्रो सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत गीता का अनुवाद मेरे द्वारा श्रीकृष्ण कृपा से दोहों में किया गया है। पुस्तक भी प्रकाशित हो गई...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 2 (61-65)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 2 (61-65) ॥ ☆   ‘‘ बेटे उठो '' -अमृतसम मधुर शब्द सुन ज्यों उठे, देखते क्या है राजा - वहाँ न कोई सिंह था किन्तु सम्मुख थी वत्सला प्रेमल धेनु माता ॥ 61॥   चकित नृपति से कहा धेनु ने पुत्र मैने ही ली थी परीक्षा तुम्हारी माया रची थी मुझे ऋषि हप्त सेन यमराज भय है क्या पुनि वन्यचारी ॥ 62॥   गुरू भक्ति औं त्याग मम हेतु लख पुत्र मैं हूॅ प्रसन्नाति वरदान मॉगो - समझो न मुझको बस दुग्ध दायिनि पर कामना पूर्ति हित पुत्र जानो ॥ 63॥   तब वीर मानी विनयी नृपति ने, करबद्ध कर प्रार्थना धेनु आगे स्ववंश की कीर्तिलता बढ़ाने सुदक्षिणा में सुपुत्र माँगे ॥ 64॥   सुन प्रार्थना पुत्र पाने नृपति की, उस धेनु ने कहा उससे - ‘‘तथा हो '' ‘‘ दोहन मेरा दुग्ध कर पत्रपुर में इस कामना पूर्ति हित पुत्र ! पी लो '' ॥ 65॥   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संजय दृष्टि – काला पानी ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) संजय दृष्टि – काला पानी सुख-दुख में समरसता, हर्ष-शोक में आत्मीयता, उपलब्धि में साझा उल्लास, विपदा में हाथ को हाथ, जैसी कसौटियों पर कसते थे रिश्ते, परम्पराओं में बसते थे रिश्ते, संकीर्णता के झंझावात ने उड़ा दी सम्बंधों की धज्जियाँ, रौंद दिये सारे मानक, गहरे गाड़कर अपनापन घोषित कर दिया उस टुकड़े को बंजर.., अब- कुछ तेरा, कुछ मेरा, स्वार्थ, लाभ, गिव एंड टेक की तुला पर तौले जाते हैं रिश्ते.., सुनो रिश्तों के सौदागरो! सुनो रिश्तों के ग्राहको! मैं सिरे से ठुकराता हूँ तुम्हारा तराजू, नकारता हूँ तौलने...
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