हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 614 ⇒ हरफनमौला ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हरफनमौला ।)

?अभी अभी # 614 ⇒  हरफनमौला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिन्हें अरबी फारसी नहीं आती, वे हरफनमौला को उर्दू शब्द मानते हैं। जिन्हें उर्दू नहीं आती, वे इसे मुसलमानों का शब्द मानते हैं। एक बहुमुखी व्यक्ति, जो कई चीजों में विशेषज्ञ है, हरफनमौला कहलाता है। क्रिकेट की भाषा में इसे आल राउंडर कहते हैं। कपिल दा जवाब नहीं।

एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी को आप अंग्रेज़ी में multifaceted talent भी कह सकते हैं। बहुविज्ञता ही बहुमुखी प्रतिभा है। एक मुख वाली प्रतिभा के धनी तो हमने देखे है, बहुमुखी प्रतिभा के धनी की तो बात ही और है। अंग्रेज़ी में एक शब्द और है, jack of all! सभी विषयों की थोड़ी थोड़ी जानकारी रखना क्या बुरा है। लेकिन यह वाक्य अधूरा है। जब इसके आगे, master of none, लगता है, तब इसका अर्थ पूरी तरह बदल जाता है।।

जो किसी एक विषय के जानकार होते हैं, उनसे आप किसी अन्य विषय के बारे में बातचीत नहीं कर सकते। मैं मेरे कितने ही दोस्तों को जानता हूं, उनका जीवन सिर्फ शेयर मार्केट बनकर रह गया है। जिस तरह कुछ लोग दिन भर टीवी पर न्यूज़ लगाए बैठे रहते हैं, ये लोग हमेशा सेंसेक्स पर नजर गड़ाए बैठे रहते हैं। एक छोटे से उतार चढ़ाव में लाखों के बारे न्यारे हो जाते हैं। यही इनकी ज़िन्दगी है, खून पसीने की कमाई है।

लाला हरदयाल की एक पुस्तक है, Hints for Self-Culture. इसका प्रथम संस्करण सन् १९३४ में प्रकाशित हुआ था।

इस पुस्तक का अब हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है। इस पुस्तक में जीवन के हर पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। यहां केवल भारतीय संस्कारों का जिक्र नहीं है, स्वयं के व्यक्तित्व के विकास के लिए, किन किन विषयों की जानकारी आवश्यक है, उनका विस्तारपूर्वक विवेचन, हर विषय को लेकर किया गया है। व्यक्ति के बौद्धिक, और शारीरिक विकास के साथ कलात्मक विकास की भी चर्चा की गई है इस पुस्तक में। साहित्य से इतर जितनी भी ललित कलाएं हैं, उनकी चार अध्यायों में विस्तृत व्याख्या इस पुस्तक की मुख्य विशेषता है।।

जानना ही ज्ञान है। ज्ञान की कोई सीमा नहीं ! सही समय पर ज्ञान का उपयोग, सदुपयोग है, अनावश्यक ज्ञान का प्रदर्शन व्यक्ति को दंभी और अहंकारी बनाता है। जो ज्ञानी कम बोलते हैं, उनसे और अधिक जानने की उत्सुकता रहती है। लेकिन जो अधूरे ज्ञान का ढोल पीटा करते हैं, उनके लिए ही शायद यह कहावत बनी हो। थोथा चना, बाजे घना।

व्यक्ति हो या व्यक्तित्व, गंभीरता और गहराई जीवन में परिपक्वता लाती है। आम का पेड़, जब फलों से लद जाता है, तो उसकी डालियां झुक जाती हैं। बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। बोलने में भी अगर मितव्ययिता हो, जहां बोलना ज़रूरी हो वहीं बोला जाए, मृदु भाषी भी अगर हों, तो सोने में सुहागा। गागर में सागर केवल शब्दों में ही संभव है। मीन तो बेचारी सागर में भी प्यासी ही रह जाती है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 120 – देश-परदेश – जब जागो तब सबेरा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 120 ☆ देश-परदेश – जब जागो तब सबेरा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

महाकुंभ का अंतिम सप्ताह हो चला है, हम दो मित्रों ने भी निश्चय किया कि सपत्नीक प्रयागराज जाते हैं। हमारे जो परिचित यात्रा कर वापिस आ गए थे, उनसे पूरी जानकारी प्राप्त कर, ट्रैवल एजेंट्स से संपर्क भी करा है। सभी लुभावने सपने दिखा रहे हैं।

 एक ट्रैवल एजेंट से जब हमने पूछा के स्लीपर कोच की क्षमता से अधिक यात्री तो नहीं बैठाते हो ? उसने कहा आप के शयन में कोई खलल नहीं होगी। हमारे एक परिचित ने बताया था, कि ये एजेंट बस की सीटों के मध्य गली में भी रात को यात्रियों को लिटा देता है, और शयन करते हुए यात्रियों को बहुत कठिनाई होती हैं।

 हमने भी उस एजेंट से जब ये बात बताई, तो बोला कुछ लोग हाइवे पर प्रयागराज के लिए बसों का इंतजार करते है, उनको पुण्य से वंचित ना रहना पड़े, तभी बैठाते हैं।

विषय को लेकर वाद विवाद हुआ, तब वो बोला यदि आपको सस्ते में जाना है, तो बस की छत पर लेट कर चले, आधे पैसे लूंगा। हमने कहा यदि छत से गिर गए तो क्या होगा ? उसने बताया आप को रस्सी से बांध देंगे, जब भी मार्ग में चाय आदि के लिए बस रुकेगी, तो आपकी रस्सी खोलकर ऊपर ही चाय की व्यवस्था कर देंगे।

हमने कहा गलत काम क्यों करते हो, वो लपक कर बोला साहब अभी तक सैकड़ों लोगों को अमेरिका भिजवा चुके हैं, वो तो आजकल थोड़ी सख्ती है। हम ये चिंदी के काम नहीं करते, आपकी जैसी मर्जी। हम समझ गए, ये अवश्य पहले “डंकी रूट” में कार्य करता होगा।

हम ने भी अब ट्रेन से जाने का मानस बना लिया है। बिना टिकट कहीं भी प्रवेश ले लेंगे यदि कहीं पकड़े गए तो पेनल्टी भर देंगें। जाने से पहले कुछ पाप (बिना टिकट) तो कर लेवें।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस ( Central Excise Duty Day )” – माहिती संग्राहक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर ☆

श्री मोहन निमोणकर 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस (Central Excise Duty Day)” – माहिती संग्राहक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर

भारतामध्ये केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस दरवर्षी 24 फेब्रुवारी रोजी साजरा केला जातो. हा दिवस केंद्रीय उत्पादन शुल्क विभागाच्या कार्यक्षमतेचा गौरव करण्यासाठी आणि देशाच्या आर्थिक प्रगतीतील त्यांच्या योगदानाची जाणीव करून देण्यासाठी साजरा केला जातो.

केंद्रीय उत्पादन शुल्क हा सरकारसाठी महत्त्वाचा कर स्त्रोत आहे. हा कर उत्पादन प्रक्रियेदरम्यान वस्तूंवर आकारला जातो आणि नंतर तो अंतिम ग्राहकांपर्यंत पोहोचतो. भारत सरकारने 1944 मध्ये केंद्रीय उत्पादन शुल्क कायदा लागू केला होता, जो कर प्रणाली सुलभ आणि प्रभावी बनवण्यासाठी महत्त्वाचा ठरला.

या दिवसाचे उद्दिष्ट म्हणजे करदात्यांमध्ये जागृती निर्माण करणे, प्रशासन अधिक पारदर्शक बनवणे आणि राजस्व संकलन प्रक्रियेत सुधारणा करणे.

माहिती संग्राहक : अज्ञात 

प्रस्तुती : श्री मोहन निमोणकर

संपर्क – सिंहगडरोड, पुणे-५१ मो.  ८४४६३९५७१३.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 613 ⇒ फ्रेंड्स लॉज ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फ्रेंड्स लॉज ।)

?अभी अभी # 613 ⇒  फ्रेंड्स लॉज ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे देश में ऐसा कौन सा औद्योगिक शहर होगा, जहां यात्रियों के ठहरने के लिए सराय, धर्मशाला, होटल अथवा लॉज नहीं हो। सन् ७० और ८० के दशक में, हमारे मालवा की अहिल्या नगरी यात्रियों के लिए एक आदर्श नगरी थी। हाल ही में प्रवासी निवेशकों ने जब इस महानगर के आतिथ्य के जलवे देखे होंगे तो उनका सर गर्व से ऊंचा हो गया होगा।

इंदौर स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जन्म स्थान भी है। सिख मोहल्ले के जिस गुरुद्वारे के पास का मेहता क्लॉथ स्टार्स आज धरोहर बन चुका है, बस उसी के आसपास थी कभी हमारी फ्रेंड्स लॉज। जब इंदौर हमारा है तो फ्रेंड्स लॉज भी हमारी ही हुई न। ।

एक यात्री को क्या चाहिए ! ठहरने की उत्तम व्यवस्था और स्वादिष्ट भोजन। आइए धर्मशालाओं से शुरुआत करें। धर्मशाला अगर सस्ती, सुंदर, सुविधायुक्त और बाजार में ही हो तो अति उत्तम। धर्मशाला और प्याऊ से इस शहर का बहुत पुराना नाता रहा है।

नसिया जी की धर्मशाला हो, छावनी की जगन्नाथ जी की धर्मशाला, अथवा शिकारपुर की सिंधी धर्मशाला, इस शहर में आज भी हर समाज की अपनी अपनी धर्मशाला है।

हुकमचंद सेठ की तो छोड़िए, यहां परदेशीपुरा में तो सेठ राखौड़ीमल की भी धर्मशाला है। जेलरोड, जो आजकल नॉवेल्टी मार्केट बन चुका है, वहां आज भी श्रीराम धर्मशाला मौजूद है।

चलिए अगर आपको धर्मशाला में नहीं रुकना तो यहां कई लॉज हैं। आज से ५० वर्ष पुराना इंदौर तब इतना विस्तृत, आधुनिक और भीड़भाड़ भरा नहीं था। आप इंदौर की मुख्य सड़कों पर शाम को भी परिवार सहित टहलने जा सकते थे। आज वहां पार्किंग तक की भी जगह नहीं। ।

तब अधिकांश यात्रियों का  आगमन रेल अथवा बस से ही होता था। सरवटे बस स्टैंड के सामने ही ठहरने के लिए चंद्रलोक लॉज थी। गांधी हॉल के सामने आराम लॉज और रामपुरावाला बिल्डिंग में सेंट्रल होटल थी। थोड़ा आगे चलने पर ही तो थी यह फ्रेंड्स लॉज जहां ठहरने की सुविधा के साथ माहवारी भोजन की भी व्यवस्था थी।

होटल और लॉज का रिश्ता 2 in 1 का रहता है। एक मुसाफिर को दुनिया में क्या चाहिए। बस ठहरने की अच्छी जगह और स्वादिष्ट भोजन चाहिए। बाहर के व्यापारी क्लॉथ मार्केट खरीदी के लिए आते थे। वहीं सीतलामाता बाजार में पृथ्वीलोक लॉज में रुक गए, ऊपर पृथ्वीलोक भोजनालय में शुद्ध सात्विक स्वादिष्ट शाकाहारी खाना भी।।

गुजराती साइंस कॉलेज में तब केन्या और नैरोबी से प्रवासी गुजराती छात्र पढ़ने इंदौर आते थे। यहां उनका एडमिशन आसानी से हो जाता था। फ्रेंड्स लॉज नजदीक ही था। पूरा इंदौर साइकिल पर आसानी से नाप लिया जाता था।

फ्रेंड्स लॉज की ही तरह शहर के अन्य प्रमुख हिस्सों में भी कई लॉज और होटलें थीं, लेकिन तब वातावरण सभी जगह उतना ही फ्रेंडली था जितना दोस्तों के बीच होना चाहिए। आज भले ही फ्रेंड्स लॉज वहां नहीं हो, लेकिन उस जमाने के दोस्तों की यादें तो आज भी मौजूद हैं। ।

तब कहां फोन और कहां मोबाइल, न दिन देखा न रात, उठाई साइकिल और चल पड़े दोस्त के पास।

सुविधाएं नजदीक आती चली गई, दोस्त दूर होते चले गए।

आजकल कौन ठहरता है धर्मशाला और लॉज में।

इतनी पांच सितारा होटलें किसके लिए खुली हैं।

अपने ही शहर को देखने के लिए आज एक टूरिस्ट की निगाह चाहिए। कुछ नहीं बचा पुराना। बस एक आम इंसान, बचा खुचा, पुराना। ।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 278 – सामान्य लोग, असामान्य बातें ! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 278 ☆ सामान्य लोग, असामान्य बातें ! ?

सुबह का समय है। गाय का थैलीबंद दूध लेने के लिए रोज़ाना की तरह पैदल रवाना हुआ। यह परचून की एक प्रसिद्ध दुकान है। यहाँ हज़ारों लीटर दूध का व्यापार होता है। मुख्य दुकान नौ बजे के लगभग खुलती है। उससे पूर्व सुबह पाँच बजे से दुकान के बाहर क्रेटों में विभिन्न ब्रांडों का थैलीबंद दूध लिए दुकान का एक कर्मचारी बिक्री का काम करता है।

दुकान पर पहुँचा तो ग्राहकों के अलावा किसी नये ब्रांड का थैलीबंद दूध इस दुकान में रखवाने की मार्केटिंग करता एक अन्य बंदा भी खड़ा मिला। उसके काफी जोर देने के बाद दूधवाले कर्मचारी ने भैंस के 50 लीटर दूध रोज़ाना का ऑर्डर दे दिया। मार्केटिंग वाले ने पूछा, “गाय का दूध कितना लीटर भेजूँ?” ….”गाय का दूध नहीं चाहिए। इतना नहीं बिकता,” उत्तर मिला।…”ऐसे कैसे? पहले ही गायें कटने लगी हैं। दूध भी नहीं बिकेगा तो पूरी तरह ख़त्म ही हो जायेंगी। गाय बचानी चाहिए। हम ही लोग ध्यान नहीं देंगे तो कौन देगा? चाहे तो भैंस का दूध कुछ कम कर लो पर गाय का ज़रूर लो।”….”बात तो सही है। अच्छा गाय का भी बीस लीटर डाल दो।” ..संवाद समाप्त हुआ। ऑर्डर लेकर वह बंदा चला गया। दूध खरीद कर मैंने भी घर की राह ली। कदमों के साथ चिंतन भी चल पड़ा।

जिनके बीच वार्तालाप हो रहा था, उन दोनों की औपचारिक शिक्षा नहीं के बराबर थी। अलबत्ता जिस विषय पर वे चर्चा कर रहे थे, वह शिक्षा की सर्वोच्च औपचारिक पदवी की परिधि के सामर्थ्य से भी बाहर था। वस्तुतः जिन बड़े-बड़े प्रश्नों पर या प्रश्नों को बड़ा बना कर शिक्षित लोग चर्चा करते हैं, सेमिनार करते हैं, मीडिया में छपते हैं, अपनी पी.आर. रेटिंग बढ़ाने की जुगाड़ करते हैं, उन प्रश्नों को बड़ी सहजता से उनके समाधान की दिशा में सामान्य व्यक्ति ले जाता है।

एक सज्जन हैं जो रोज़ाना घूमते समय अपने पैरों से फुटपाथ का सारा कचरा सड़क किनारे एकत्रित करते जाते हैं। सोचें तो पैर से कितना कचरा हटाया जा सकता है..! पर टिटहरी यदि रामसेतु के निर्माण में योगदान दे सकती है तो एक सामान्य नागरिक की क्षमता और उसके कार्य को कम नहीं समझा जाना चाहिए।

आकाश की ओर देखते हुए मनुष्य से प्राय: धरती देखना छूट जाता है। जबकि सत्य यह है कि सारा बोझ तो धरती ने ही उठा रखा है। धरती की ओर मुड़कर और झुककर देखें तो ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपने-अपने स्तर पर समाज और देश की सेवा कर रहे हैं।

इन लोगों को किसी मान-सम्मान की अपेक्षा नहीं है। वे निस्पृह भाव से अपना काम कर रहे हैं।

युवा और किशोर पीढ़ी, वर्चुअल से बाहर निकल कर अपने अड़ोस-पड़ोस में रहनेवाले इन एक्चुअल रोल मॉडेलों से प्रेरणा ग्रहण कर सके तो उनके समय, शक्ति और ऊर्जा का समाज के हित में समुचित उपयोग हो सकेगा।

सोचता हूँ, सामान्य लोगों की असामान्य बातों और तदनुसार क्रियान्वयन पर ही जगत का अस्तित्व टिका है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

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💥 मकर संक्रांति मंगलवार 14 जनवरी 2025 से शिव पुराण का पारायण महाशिवरात्रि तदनुसार बुधवार 26 फरवरी को सम्पन्न होगा 💥

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 612 ⇒ अंग्रेजी की टांग ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंग्रेजी की टांग।)

?अभी अभी # 612 ⇒  अंग्रेजी की टांग ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे हिंदी के एक अध्यापक थे, उनका तकिया कलाम था, पिताजी की टांग। वे पढ़ाते पढ़ाते, अचानक ही किसी सुस्त और अलसाये से छात्र को खड़ा कर कोई कठिन सा प्रश्न दे मारते। उसे महसूस होता, मानो किसी ने पानी के छींटे मारकर उसे जबर्दस्ती उठा दिया हो। वह बेचारा हड़बड़ाया, सकपकाया, क्या जवाब देता, बगलें झांकने लगता। बस, वे शुरू हो जाते ! मलाई में पड़े हो, कहां है तुम्हारा ध्यान। परीक्षा में क्या लिखोगे, पिताजी की टांग ? जाओ, पहले मुंह धोकर आओ।

हमारी दो टांगें हैं, जिनके सहारे ही हम खड़े हो पाते हैं और चल पाते हैं। आजकल चलना भी व्यायाम की श्रेणी में आ गया है। एक समय था, जब इंसान थक जाता था, तो किसी सवारी की सहायता लेता था। घोड़ा, तांगा, बैलगाड़ी और घोड़ा गाड़ी पर चलते चलते वह कब साइकिल, साइकिल से स्कूटर और स्कूटर से कार और कार से हवाई जहाज तक पहुंच गया, कुछ पता ही नहीं चला, और उसने दुनिया नाप ली।।

जो टांग सिर्फ चलने के काम आती थी, इंसान उससे और भी कई काम लेने लग गया। सबसे पहले, सबसे बड़ा काम उसने यह किया, दूसरे के काम में टांग अड़ाना शुरू कर दिया। हो सकता है, टांग अड़ाने का यह अभ्यास उसने फुटबॉल के मैदान से सीखा हो।

यह खेल ही टांगों से खेला जाता है। पेले, सबसे पहला फुटबॉल का प्रसिद्ध खिलाड़ी हुआ। एक और खेल है हॉकी, कौन भूल सकता है हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को। इसमें एक स्टिक ही सब काम करती है, लेकिन दौड़ना तो इसमें भी टांगों के सहारे ही पड़ता है। जब तक गोल ना हो जाए, तसल्ली नहीं होती।।

यही हॉकी की स्टिक खेल के मैदान के बाहर भी टांग तोड़ने के काम आती है। कॉलेज के दो गुटों में झगड़ा हुआ, उठाई हॉकी की स्टिक और निकल पड़े कल के छेनू और श्याम। याद कीजिए गुलजार और मीनाकुमारी की मेरे अपने। बड़बोले शत्रुघ्न सिन्हा और छैल छबीले, गठीले विनोद खन्ना।

हमारी भी टांगें भी आज तक सिर्फ इसीलिए ही साबुत बची हैं कि बचपन में अम्मां और बाबूजी ने कई बार लाख शैतानी करने पर टांगें तोड़ने की चेतावनी जरूर दी, लेकिन कभी तोड़ी नहीं। उनकी सीख और सबक के कारण ही आज हम अपने पैरों पर खड़े हुए हैं। आज तो हमें मास्टर जी की छड़ी भी, बरसात की झड़ी नजर आती है। उधर छड़ी की छमछम इधर बारिश भी झमाझम।।

हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं, राष्ट्रभाषा भी है। हिंदी का अपमान हमारी मां का और मातृ भूमि का अपमान है। कोई हिंदी की टांग तोड़े, हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते लेकिन अंग्रेजी का क्या है, वह तो उन अंग्रेजों की भाषा है, जिन्होंने कभी हम पर राज किया था। हम आज भी उनसे नाराज हैं। काले गोरे में भेद करने वालों की मैकाले की पद्धति हमें वैसे भी कभी रास नहीं आई।

भला हो लोहिया जी का, जो उन्होंने हमें अंग्रेजी विरोध का एक मौका तो दिया। हमने तबीयत से अंग्रेजी की बारह बजाई। जितने भी बाजारों में, शहरों में, कस्बों में गांवों में, दीवारों पर अंग्रेजी में विज्ञापन और अंग्रेजी के साइनबोर्ड की हमने तोड़फोड़ कर, वो दुर्गति की कि हमने अंग्रेजी को उसकी सात पुश्तें याद दिला दी।।

इतना ही नहीं, तिरंगे झंडे तले, हमने अंग्रेजी नहीं सीखने की कसम भी खा ली। लेकिन सबै दिन एक ना होय गोपाला। हमारी लाख कोशिशों के बावजूद, हमारी इच्छा के खिलाफ हमें अपने बच्चों के भविष्य के कारण टूटी फूटी अंग्रेजी सीखनी ही पड़ी।

जब बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए कॉन्वेंट स्कूल में गए, तो वे हमारा ही अंग्रेजी में साक्षात्कार लेने लग गए। मत पूछिए, हमें तो साक्षात भगवान ही याद आ गए। लेकिन हमने भी हार नहीं मानी और कपिल देव वाला रेपीडेक्स इंग्लिश वाला कोर्स कर लिया। तब से आज का दिन है, हमने अंग्रेजी की टांग तोड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ा।।

जैसे फिल्म शोले में, गब्बर से बदला लेने के लिए, ठाकुर के पांव ही काफी थे, उसी प्रकार अंग्रेजी की टांग खींचने के लिए हमारा तो सिर्फ मुंह ही काफी है। वैसे मौके और दस्तूर को देखते हुए अंग्रेजी की टांग तोड़ने के साथ साथ ही टांग भी खींच ली जाए तो एक पंथ दो काज हो जाए। 

जी हां, वह एक जमाना था। एक स्वास्थ्य मंत्री थे, जब उन्हें किसी अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग का उद्घाटन करने बुलाया तो वे बड़े खुश हुए। बोले, चलो अच्छा हुआ, अब मरीजों के मनोरंजन के लिए रेडियो का इंतजाम भी हो गया।।

हमारा एक मित्र था, बेचारा आज इस दुनिया में नहीं है, जब भी परेशान होता, मुझसे अपना दर्द बयां करता। दोस्त, जीवन में सेटिस्फिकेशन नहीं है, कभी कभी तो मन करता है, स्लीपिंग पाइल्स खाकर आत्महत्या कर लूं। वैसे यह नौबत ही नहीं आई, दिल का दौरा ऐसा आया, हमारा सबका दिल तोड़ गया।

अंग्रेजी की टांग हम जान बूझकर नहीं तोड़ते। हम नहीं मानते, हमारी अंग्रेजी कमजोर है, हमारा यह मानना है कि इंग्लिस में ही कम ज़ोर है। कहीं P साइलेंट तो कहीं L साइलेंट। यानी लिखो talk और बोलो टॉक। डरावनी फिल्म psycho को हम पहले पिस्को ही कहते थे। बस वहीं से शायद अंग्रेजी का डर अंदर समा गया है, लेकिन अंग्रेजी का भूत फिर भी ऐसा सर चढ़ा हुआ है कि हर हिंदी वाक्य में अंग्रेजी शब्द आ धमकते हैं। परमानेंट को प्रेगनेंट कहना तो खैर स्लिप ऑफ

टंग्यू हो सकता है, लेकिन जब डेथ (death) देठ हो जाती है और शिक्षक महोदय के ट्रांसफर पर बैन (ban) की जगह बैंड लग जाता है, तो अंग्रेजी की आत्मा मुक्ति के लिए छटपटाने लगती है, लेकिन अंग्रेजी जीये या मरे, हम तो उसकी टांग तोड़कर ही रहेंगे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 611 ⇒ पंचवटी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचवटी।)

?अभी अभी # 611 ⇒ पंचवटी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पंचवटी एक खंड काव्य है। बचपन में मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी और मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर पढ़ी थी। आज के तीर्थ स्थल नासिक में पंचवटी स्थित है, जहां कभी लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। पांच वृक्षों का समूह अशोक, पीपल, वट, बेल और पाकड़, पंचवटी कहलाता है और प्रेमचंद के पंच परमेश्वर भी पांच पंचों का एक समूह है, जिनके सर को सरपंच कहते हैं। एक परमेश्वर से भले ही काम चल जाए, पंच तो पांच ही भले।

पांच उंगलियों से ही पंजा बनता है और पांच ही नदियों से पंजाब ! गुरुद्वारे में भी पंच प्यारे होते हैं, पांच तत्वों से ही हमारा यह शरीर बनता है। पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश, पांच ही यम नियम अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, असंग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान।।

कुछ विशेष धार्मिक अवसरों पर पूजा आरती के बाद ठाकुर जी को अन्य पकवानों के साथ पंचामृत का भी भोग लगाया जाता है। पांच तरह के अमृत की जब संधि होती है तो वह पंचामृत कहलाता है। ये पांच अमृत हैं, दूध, दही, शहद, शकर और घी। क्या शब्दों का खेल है, अमृत का सिर्फ अ हटाने से मृत हो जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे शिव की मात्रा हटाओ, तो वह शव हो जाता है। शिव अमर है, सबको अमृत की आस है, जीवन मीठी प्यास है।

एक पहलवान हुए हैं खली और एक मुक्केबाज हुए हैं मोहम्मद अली। मुक्केबाजी को बॉक्सिंग भी कहते हैं। पांच उंगलियों से मिलकर ही मुट्ठी बनती है जो जब तक बंद रहती है, लाख की रहती है, और खुलते ही ख़ाक की हो जाती है। मुष्टि प्रयोग को आजकल पंच कहा जाता है।

हाथ में दस्ताने और चेहरे पर सुरक्षा कवच। फिर भी पंच इतना तगड़ा कि चेहरा लहूलुहान !

समय समय की बात है, आज लोगों के हाथों में दस्ताने हैं, चेहरे पर मास्क है। नियति का एक ऐसा पंच मानवता पर पड़ा है कि इंसान सभी प्रपंच भूल गया है। करारा तमाचा तो भाग्य मारता ही है, लेकिन कोरोना के इस पंच ने तो इंसान की शक्ल ही बिगाड़कर रख दी है।।

विसंगतियों से ही व्यंग्य पैदा होता है। व्यंग्य भी कभी सहलाता है, कभी पुचकारता है, फिर धीरे धीरे चिकौटी काटने लगता है और कभी कभी तो प्रचलित इन मान्यताओं और विसंगतियों पर जमकर प्रहार करता है। इसे भी अंग्रेजी में पंच ही कहते हैं। एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कार्टून पत्रिका पंच भी कभी प्रकाशित होती थी। आज की तारीख में पंच का स्थान मानसिक हिंसा, चरित्र हनन और नफ़रत ने ले लिया है।

व्यंग्य भी एक तरह की वटी ही है जो पांच औषधियों को मिलाकर बनी है। ज़माना मिक्सड पेथी का है, देसी विदेशी सब जायज़ है। हिंदी में हास्य है, विनोद है, अगर तंज है तो विद्रूप भी है। ठहाका और अट्टहास है, थोड़ा परिहास भी है। आप इन्हें wit, satire irony, laughter और punch भी कह सकते हैं।।

शरीर के विकारों के लिए तो कई औषधियां हैं, सामाजिक विसंगतियों का कोई इलाज नहीं। महंगाई, भ्रष्टाचार, निंदा स्तुति, और नफ़रत की राजनीति से स्थायी निदान तो संभव नहीं, हां यह पंचवटी आपको थोड़ी राहत जरूर दे सकती है।

व्यंग्य एक तरह का रसायन है, जो मीठा कम, कड़वा अधिक है। अगर इसे शुगर कोटेड पिल के रूप में लिया जाए तो अधिक असरकारक व लाभप्रद है। आप भी व्यंग्य रूपी इस पंचवटी का सेवन करें और अवसाद, कुंठा और संत्रास जैसी मनोवैज्ञानिक बीमारियों से निजात पाएं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #267 ☆ बढ़ती संवेदनशून्यता– कितनी घातक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख बढ़ती संवेदनशून्यता– कितनी घातक। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 267 ☆

☆ बढ़ती संवेदनशून्यता– कितनी घातक… ☆

‘कुछ अदालतें वक्त की होती हैं, क्योंकि जब समय जवाब देता है, ग़वाहों की ज़रूरत नहीं होती और सीधा फैसला होता है’ कोटिशः सत्य हैं और आजकल इनकी दरक़ार है। आपाधापी व दहशत भरे माहौल में चहुँओर अविश्वास का वातावरण तेज़ी से फैल रहा है।  हर दिन समाज में घटित होने वाली फ़िरौती, दुष्कर्म व हत्या के हादसों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। संवेदनहीनता इस क़दर बढ़ रही है कि इंसान इनका विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाता बल्कि ग़वाही देने से भी भयभीत रहता है, क्योंकि वह हर पल दहशत में जीता है और सदैव आशंकित रहता है कि यदि उसने ऐसा कदम उठाया तो वह और उसका परिवार सुरक्षित नहीं रहेगा। सो! उसे ना चाहते हुए भी नेत्र मूँदकर जीना पड़ता है।

आजकल किडनैपिंग अर्थात् अपहरण का धंधा ज़ोरों पर है। अपहरण बच्चों का हो, युवकों-यवतियों का– अंजाम एक ही होता है। फ़िरौती ना मिलने पर उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है या हाथ-पाँव तोड़कर बच्चों से भीख मंगवाने का धंधा कराया जाता है या ग़लत धंधे में झोंक दिया जाता है, जहाँ वे दलदल में फंस कर रह जाते हैं। जहाँ तक बालिकाओं के अपहरण का संबंध है, उनकी अस्मिता से खिलवाड़ होता है और उन्हें दहिक शोषण के धंधे में धकेल कोठों पर पहुंचा दिया जाता है। वहाँ उन्हें 30-40 लोगों की हवस का शिकार बनना पड़ता है। रात के अंधेरे में सफेदपोश लोग उन बंद गलियों में आते हैं, अपनी दैहिक क्षुधा शांत कर भोर होने से पहले लौट जाते हैं, ताकि वे समाज के समक्ष दूध के धुले बने रहें और सारा इल्ज़ाम उन  मासूम बालिकाओं व कोठों के संचालकों पर रहे।

जी हाँ! यही है दस्तूर-ए-दुनिया अर्थात् ‘शक्तिशाली विजयी भव’ अर्थात् दोषारोपण सदैव दुर्बल व्यक्ति पर ही किया जाता है, क्योंकि उसमें विरोध करने की शक्ति नहीं होती और यह सबसे बड़ा अपराध है। गीता में यह उपदेश दिया गया है कि ज़ुल्म करने वाले से बड़ा दोषी ज़ुल्म सहने वाला होता है। अमुक स्थिति में हमारी सहनशक्ति हमारे दुश्मन होती है, अर्थात् इंसान स्वयं अपना शत्रु बन जाता है, क्योकि वह ग़लत बातों का विरोध करने का सामर्थ्य नहीं रखता। मेरे विचार से जिस व्यक्ति में ग़लत को ग़लत कहने का साहस नहीं होता, उसे जीने का अधिकार नहीं होना चाहिए। सत्य की स्वीकार्यता व्यक्ति का सर्वोत्तम गुण है और इसे अहमियत ना देना जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है।

आजकल लिव-इन का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसमें दोष युवतियों का है, जो अपने माता-पिता के प्यार-दुलार को दरक़िनार कर, उनकी अस्मिता को दाँव पर लगाकर एक अनजान व्यक्ति पर अंधविश्वास कर चल देती है उसके साथ विवाह पूरव उसके साथ रहने ताकि वह उसे देख-परख व समझ सके। परंतु कुछ समय पश्चात् जब वह पुरुष साथी से विवाह करने को कहती है, तो वह उसकी आवश्यकता को नकारते हुए यही कहता है कि विवाह करके ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोनेने का प्रयोजन क्या है– यह तो बेमानी है। परंतु उसके आग्रह करने पर प्रारंभ हो जाता है मारपीट का सिलसिला, जहाँ उसे शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। श्रद्धा व आफ़ताब, निक्की व साहिल जैसे जघन्य अपराधों में दिन-प्रतिदिन इज़ाफा होता जा रहा है। युवतियों के शरीर के टुकड़े करके फ्रिज में रखना, उन्हें निर्जन स्थान पर जाकर फेंकना इंसानियत की सभी हदों को पार कर जाता है। साहिल का निक्की की हत्या करने के पश्चात् दूसरा विवाह रचाना सोचने पर विवश कर देता है कि इंसान इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है? यह तो संवेदनशून्यता की पराकाष्ठा है। मैं इस अपराध के लिए उन लड़कियों को दोषी मानती हूँ, जो हमारी सनातन संस्कृति का अनुकरण न कर पाश्चात्य की जूठन स्वीकार करने में फख़्र महसूसती हैं। वैसे ही पित्तृसत्तात्मक युग में हम यह  अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि पुरुष की सोच बदल सकती है। वह तो पहले ही स्त्री को अपनी धरोहर / बपौती समझता था। आज भी वह उसे उसका मालिक समझता है तथा जब चाहे उसे घर से बाहर का रास्ता दिखा सकता है। उसकी स्थिति खाली बोतल के समान है, जिसे वह बीच राह फेंक सकता है; वह उस पर शक़ के दायरे में अवैध संबंधों का  इल्ज़ाम लगा पत्नी व बच्चों की निर्मम हत्या कर सकता है।  वास्तव में पुरुष स्वयं को सर्वश्रेष्ठ ही नहीं, ख़ुदा समझता है, क्योंकि उसे कन्या-भ्रूण को नष्ट करने का अधिकार प्राप्त है।

‘औरत में जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया / जब जी चाहा मसला-कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया।’ ये पंक्तियाँ औरत की नियति को उजागर करती हैं। वह अपनी जीवन-संगिनी को अपने दोस्तों के हम-बिस्तर बनाने का जघन्य अपराध कर सकता है। वह पत्नी पर अकारण इल्ज़ाम लगा कटघरे में खड़ा सकता है। वैसे भी उस मासूम को अपना पक्ष रखने का अधिकार प्रदान ही कहाँ किया जाता है? कचहरी में भी क़ातिल को भी अपना पक्ष रखने व स्पष्टीकरण देने का अधिकार होता है। इतना ही नहीं एक दुष्कर्मी पैसे व रुतबे के बल पर उस मासूम की जिंदगी के सौदे की पेशकश करने को स्वतंत्र है और उसके माता-पिता उसे दुष्कर्मी के हाथों सौंपने को तैयार हो जाते हैं।

वास्तव में दोषी तो उसके माता-पिता हैं जो अपनी नादान बच्ची पर भरोसा नहीं करते। वैसे भी वे अंतर्जातीय विवाह की एवज़ में कभी ऑनर किलिंग करते हैं, तो कभी दुष्कर्म का हादसा होने पर समाज में निंदा के भय से उसका तिरस्कार कर देते हैं। उस स्थिति में वे भूल जाते हैं कि वे उस निर्दोष बच्ची के जन्मदाजा हैं। वे उसकी मानसिक स्थिति को अनुभव न करते हुए उसे घर में कदम तक नहीं रखने देते। अच्छा था, तुम मर जाती और उसकी ज़िंदगी नरक बन जाती है। अक्सर ऐसी लड़कियाँ आत्महत्या कर लेती हैं या हर दिन ना जाने वे कितने सफेदपोश मनचलों की हमबिस्तर बनने को विवश होती हैं। काश! हम अपने बेटे- बेटियों को बचपन से यह एहसास दिला पाते कि वे अपने संस्कारों अथवा मिट्टी से जुड़े रहते व सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करते। वे उसे आश्वस्त कर पाते कि यह घर उसका भी है और वह जब चाहे, वहाँ आ सकती है।

यदि हम परमात्मा की सत्ता पर विश्वास रखते हैं, तो हमें इस तथ्य को स्वीकारना पड़ेगा कि परमात्मा की लाठी में आवाज़ नहीं होती और कुछ फैसले रब्ब के होते हैं और जब समय जवाब देता है तो ग़वाहों की ज़रूरत नहीं होती– सीधा फैसला होता है। कानून तो अंधा व बहरा है, जो गवाहों पर आश्रित होता है और उनके न मिलने पर जघन्य अपराधी भी छूट जाते हैं और निकल पड़ते हैं अगले शिकार की तलाश में और यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता। हमारे यहाँ फ़ैसले बरसों बाद होते हैं, जब उनकी अहमियत ही नहीं रहती। इतना ही नहीं, मी टू ने भी अपना खाता खोल दिया है। पच्चीस वर्ष पहले घटित हादसे को भी उजागर कर, आरोपी पर इल्ज़ाम लगा हंसते-खेलते परिवार की खुशियों में सेंध लगा लील सकती हैं; उन्हें कटघरे में खड़ा कर सकती हैं। वैसे यह दोनों स्थितियाँ विस्फोटक हैं, लाइलाज हैं, जिसके कारण समाज में विसंगति व विद्रूपताएं निरंतर बढ़ गई हैं, जो स्वस्थ समाज के लिए घातक हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस ? ?

आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने उर्दू को अपनी राजभाषा घोषित किया था। पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) बांग्लाभाषी था। वहाँ छात्रों ने बांग्ला को द्वितीय राजभाषा का स्थान देने के लिए मोर्चा निकाला। बदले में उन्हें गोलियाँ मिली। इस घटना ने तूल पकड़ा। बाद में 1971 में भारत की सहायता से बांग्लादेश स्वतंत्र राष्ट्र बन गया।

1952 की इस घटना के परिप्रेक्ष्य में 1999 में यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया।

आज का दिन हर भाषा के सम्मान, बहुभाषावाद एवं बहुसांस्कृतिक समन्वय के संकल्प के प्रति स्वयं को समर्पित करने का है।

मातृभाषा मनुष्य के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मातृभाषा की जड़ों में उस भूभाग की लोकसंस्कृति होती है। इस तरह भाषा के माध्यम से संस्कृति का जतन और प्रसार भी होता है। भारतेंदु जी के शब्दों में,

‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल/ बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।’

हृदय के शूल को मिटाने के लिए हम मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा की मांग और समर्थन सदैव करते रहे। आनंद की बात है कि करोड़ों भारतीयों की इस मांग और प्राकृतिक अधिकार को पहली बार भारत सरकार ने शिक्षानीति में सम्मिलित किया। नयी शिक्षानीति आम भारतीयों और भाषाविदों-भाषाप्रेमियों की इच्छा का दस्तावेज़ीकरण है। हम सबको इस नीति के क्रियान्वयन से अपरिमित आशाएँ हैं।

विश्वास है कि यह संकल्प दिवस, आनेवाले समय में सिद्धि दिवस के रूप में मनाया जाएगा। अपेक्षा है कि भारतीय भाषाओं के संवर्धन एवं प्रसार के लिए हम सब अखंड कार्य करते करें। सभी मित्रों को शुभकामनाएँ।

संजय भारद्वाज
अध्यक्ष, हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे
?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 मकर संक्रांति मंगलवार 14 जनवरी 2025 से शिव पुराण का पारायण महाशिवरात्रि तदनुसार बुधवार 26 फरवरी को सम्पन्न होगा 💥

 🕉️ इस वृहद ग्रंथ के लगभग 18 से 20 पृष्ठ दैनिक पढ़ने का क्रम रखें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 610 ⇒ उस्तरा (R A Z O R) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उस्तरा।)

?अभी अभी # 610 ⇒ उस्तरा (R A Z O R) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम जिस तरह के उस्तरे की बात कर रहे हैं, उस तरह का उस्तरा केवल बाल काटने और हजामत बनाने वाले हज्जाम के पास ही होता है। प्रचलित भाषा में हम उसे नाई कहते हैं और पढ़े लिखे लोग उसे बार्बर (barber) कहते हैं। इनके संस्थान को कभी केश कर्तनालय अथवा हेयर कटिंग सैलून कहा जाता था।

याद कीजिए दाढ़ी बनाने वाले रेजर और रेजर ब्लेड को। अशोका, टोपाज, इरेस्मिक, विल्टेज, विल्किंसन और जिलेट ब्लेड को। कितने काम की होती थी एक रेजर ब्लेड! भले ही उंगली कट जाए, लेकिन पेंसिल ब्लेड से ही छीलते थे। तब के रबर और चक्कू ही तो आज के इरेज़र (eraser) और शार्पनर (sharpner) हैं। लेकिन जो बात उस्तरे में है, वह आज के इलेक्ट्रिक शेवर में कहां।।

उस्तरा एक जमाने में नाई का प्रमुख औजार होता था। आपकी दाढ़ी यानी हजामत बनाने के पहले एक शेविंग ब्रश से आपके खुरदुरे गालों वाली दाढ़ी पर ख़ूब सारा खुशबूदार शविंग क्रीम लगा दिया जाता था। एक अच्छे भले नौजवान को, शेविंग क्रीम पोत पोतकर, सफेद झाग वाला बाबा बना दिया जाता था। उसके बाद निकलता था ब्रह्मास्त्र यानी उस्तरा। उसे पहले एक काली रबड़ की पट्टी पर फेर फेरकर तेज किया जाता था और उसके बाद तबीयत से गर्दन घुमा घुमाकर हजामत बनाई जाती थी।

अक्सर यह टू इन वन पैकेज ही होता था, यानी दाढ़ी और कटिंग एक साथ। मेरे जैसे कंजूस लोग उसी दिन घर से ही शेव करके जाते थे। फिर भी वह अपनी आदत से बाज नहीं आता था। एक बार पूछता जरूर था, शेविंग कर दूं। अच्छी नहीं बनी है।।

एक समय था जब विशेष अवसरों पर हजामत और बाल काटने की घर पहुंच सुविधा भी उपलब्ध हो जाती थी। तब यह पारिवारिक रस्म खुले आंगन में ही संपन्न की जाती थी। बार्बर महोदय अपना टूल बॉक्स लेकर घर ही पधार जाते थे। जो पेशेवर बाराती होते हैं, वे हर बारात में इसका भरपूर लाभ उठाने से नहीं चूकते।

बाल बढ़ने पर कटिंग कराना भले ही मेरी मजबूरी हो, मैं वहां कभी हजामत नहीं बनवाता। नाई का उस्तरा और अपना सर। वह बड़े प्रेम से बातों में उलझाता, पूरी फसल कब काट लेता है, कुछ पता ही नहीं चलता। पुताई जैसे दाढ़ी पर भी दो दो हाथ चलते हैं। कभी कभी बातों बातों में थोड़ा कट भी जाता है। बड़ी कड़क दाढ़ी है आपकी, एकदम खुरदुरी, सफाई पेश की जाती है। उसका कागज में आफ्टर शेव का झाग वाला साबुन समेटना मुझे पसंद नहीं।।

आजकल के उस्तरों का वह स्तर कहां ! आज के आधुनिक उस्तरो में भी रेजर ब्लेड ही लगाई जाने लगी है। अब पहले जैसी उस्तरे की धार तेज नहीं करनी पड़ती। हम जैसे पुराने लोग ही उनके ग्राहक होते हैं। नई पीढ़ी के लिए तो सर्व सुविधायुक्त मैन्स ‘ पार्लर हैं ना।

वह नाई ही क्या, जिसके हाथ में उस्तरा ना हो। एक जमाना वह भी था, जब समाज और कुटुंब के बुलावे के लिए नाई घर घर आता था, बोलकर संदेश दे जाता था। यानी बेचारा नाई मैसेंजर का काम भी करता था। मोबाइल में व्हाट्सअप संदेश तो अब आने लगे हैं। कितना छोटा शहर था तब, लेकिन कितना परिचित, घर घर संदेश पहुंचाता नाई। अब तो शादी के आमंत्रण भी pdf में आने लग गए हैं। बिना उस्तरे की पांच सौ की घर बैठे हजामत तय है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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