(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर, विचारणीय एवं चिंतनीय – चिंतन – “ऐसे भी बदलता है नाम”।)
☆ आलेख # 167 ☆ चिंतन – “ऐसे भी बदलता है नाम” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆
सन् 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय लगभग एक लाख पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सामने घुटने टेकते हुए आत्मसमर्पण किया था, उन युद्ध बंदियों को सामरिक दृष्टि से सबसे सुरक्षित स्थान होने के कारण जबलपुर में रखा गया था और उन्हें बाद में जरपाल गेट (ग्रेनेडियर रेजिमेंट) ग्वारीघाट रोड से रिहा किया गया था।
इसी पर से तिराहे को ‘बंदी रिहा तिराहा’ कहा गया, जो बाद में अपभ्रंश होकर ‘बंदरिया तिराहा’ कहा जाने लगा, तो भैया नाम की माया अपरंपार है।
कोई नाम बिगाड़ता है, कोई नाम बनाता है, कोई नाम बदलता है, कहीं नाम बदलने पर दंगल होता है, तो कहीं नाम डूबा देता है। सब राम नाम की माया है, तभी तो कहते हैं राम नाम सत्य है।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्री भास्कर साधना आरम्भ हो गई है। इसमें जाग्रत देवता सूर्यनारायण के मंत्र का पाठ होगा। मंत्र इस प्रकार है-
💥 ।। ॐ भास्कराय नमः।। 💥
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
☆ संजय उवाच # 168 ☆ कबिरा संगत साधु की…(2) ☆
गतांक में हमने सत्संगति के आनंद पर चर्चा की थी। आज इस विषय को आगे जारी रखेंगे।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है, ‘बिनु सत्संग विवेक न होई।’ सरल शब्दों में समझें तो भले- बुरे में, सही-गलत में, उचित-अनुचित में अंतर कर सकने की क्षमता अर्थात विवेक। इस संदर्भ में प्राय: ‘नीर क्षीर विवेक’ का प्रयोग किया जाता है। प्रकृति में हंस एकमात्र जीव है जो नीर और क्षीर अर्थात जल और दूध को अलग कर सकता है।
एक श्लोक है –
हंस: श्वेतो बक: श्वेतो को भेदो बकहंसयो: |
नीरक्षीरविवेके तु हंस: हंसो बको बक: ||
अर्थात हंस भी सफ़ेद है, बगुला भी सफ़ेद है तो फिर हंस और बगुले में अंतर क्या है? दूध और पानी के मिश्रण में से दोनों घटकों को अलग करने का प्रश्न आता है तब हंस और बगुले में अंतर पता चलता है।
नीर-क्षीर विवेक उपजता है ज्ञान से। ज्ञान प्राप्ति के अनेक स्रोत हैं। इनमें अध्ययन और अनुभव प्रमुख हैं। अध्ययन किये हुए और अनुभवी, दोनों तरह के लोग सत्संग में होते हैं। सत्संग का एक आयाम वैचारिक विमर्श में सम्मिलित होना है, विचारों के विनिमय में सहभागी होना है। अतः सत्संग को ज्ञान का अविरल स्रोत कहा गया है।
नीर-क्षीर विवेक जगने पर मनुष्य की समझ में आ जाता है कि भोजन, शयन, मैथुन तो हर योनि के जीव करते हैं। पेट भरने के लिए आवश्यक श्रम भी सब करते हैं। कम या अधिक बुद्धि भी हरेक के पास है पर ज्ञान प्राप्ति का, जागृति का अवसर केवल मानुष देह के माध्यम से ही संभव है।
स्मरण रखना चाहिए कि संग आने से संघ बनता है। संघ अर्थात समान विचार वालों का समूह। समान विचार वालों का साथ मिलना जीवन की बड़ी उपलब्धि है। संग से, संघ से विरेचन होता है। मानसिक तनाव ढहना शुरू हो जाता है। जहाँ कहीं अंधकार दिखता था, वहाँ राह दिखने लगती है। विवेक का चरम देखिए कि लक्ष्य पता होने पर भी सत्संगी यात्रा तो करता है पर लक्ष्य साधे बिना लौट आता है क्योंकि उसे सुख नहीं आनंद चाहिए। आनंद सज्जनों की संगति का, ज्ञानपिपासा की तृप्ति का, आनंद मुक्ति नहीं सृष्टि का। अपनी रचना ‘निर्वाण से आगे’ स्मरण हो आती है,
असीम को जानने की
अथाह प्यास लिए,
मैं पार करता रहा
द्वार पर द्वार,
अनेक द्वार,
अनंत द्वार,
अंतत: आ पहुँचा
मुक्तिद्वार…,
प्यास की उपज
मिटते नहीं देख सकता मैं,
चिरंजीव जिज्ञासा लिए
उल्टे कदम लौट पड़ा मैं,
मुक्ति नहीं तृप्ति चाहिए मुझे,
निर्वाण नहीं सृष्टि चाहिए मुझे!
ज्ञान की अपरिमित सृष्टि का साधन है सत्संग। इस सृष्टि का वासी होने का लाभ प्रत्येक को उठाना चाहिए।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का वैश्विक महामारी और मानवीय जीवन पर आधारित एक अत्यंत विचारणीय आलेख जुनून बनाम नफ़रत। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 162 ☆
☆ जुनून बनाम नफ़रत ☆
‘जुनून जैसी कोई आग नहीं/ नफ़रत जैसा कोई दरिंदा नहीं/ मूर्खता जैसा कोई जाल नहीं/ लालच जैसी कोई धार नहीं’ महात्मा बुद्ध की यह उक्ति अत्यंत कारग़र है, जिसमें संपूर्ण जीवन-दर्शन निहित है। जुनून वह आग है, जो मानव को चैन से बैठने नहीं देती; निरंतर गतिशीलता प्रदान कर अथवा कुछ कर गुज़रने का संदेश देती है। यदि मानव ठीक दिशा की ओर अग्रसर होता है, तो वह अपनी मंज़िल पर पहुंच कर ही सुक़ून पाता है; रास्ते में आने वाली बाधाओं का साहस-पूर्वक सामना करता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति घृणा भाव से ग्रस्त है, तो वह मूर्खतापूर्ण व्यवहार करता है तथा स्वयं को विश्व का सबसे अधिक बुद्धिमान इंसान समझता है।
नफ़रत वह दरिंदा है, जो पलभर में मानव के मनोमस्तिष्क को दूषित कर परिंदे की भांति उड़ जाता है और उस स्थिति में वह सोचने-समझने की शक्ति खो बैठता है। वह राह में आने वाली आगामी बाधाओं, आपदाओं व दुष्वारियों का सामना नहीं कर पाता। वह मूर्ख उस जाल में फंस कर रह जाता है। वह औचित्य-अनौचित्य व सही-गलत का भेद नहीं कर पाता और उसे अपने अतिरिक्त सब निपट बुद्धिहीन नज़र आते हैं। वह और अधिक धन-संपदा पाने के चक्कर में उलझ कर रह जाता है और उसकी लालसा व हवस का कभी भी अंत नहीं होता। जब व्यक्ति उसके व्यूह अर्थात् मायाजाल में उलझ कर रह जाता है और सब संबंधों को नकारता हुआ चला जाता है। उस स्थिति में दूसरों की पद-प्रतिष्ठा उसके लिए मायने नहीं रखती। अपने सपनों को साकार करने के लिए वह रास्ते में आने वाले व्यक्ति व बाधाओं को हटाने व समूल नष्ट करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करता।
इसीलिए मानव को सकारात्मक सोच रखते हुए लक्ष्य निर्धारित करने तथा उसे प्राप्त करने के लिए जी-जान से जुट जाने की सीख दी गयी है। अब्दुल कलाम जी ने मानव को जागती आंखों से स्वप्न देखने व बीच राह थक कर न बैठने का संदेश दिया है; जब तक उसे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। इसलिए महात्मा बुद्ध मानव को करुणा व प्रेम का संदेश देते हुए नफ़रत करने वालों से सचेत रहने की सीख देते हैं, क्योंकि नफ़रत वह चिंगारी है, जो व्यक्ति, परिवार, समाज व पूरे देश में तहलक़ा मचा देती है। धार्मिक उन्माद इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। सो! मानव हृदय में सबके प्रति स्नेह, सौहार्द व प्रेम का भाव होना चाहिए, क्योंकि जहां प्रेम होगा, नफ़रत वहां से नदारद होगी। इंसान को सावन के अंधे की भांति सब ओर हरा ही हरा दिखाई पड़ता है। इसलिए उसे उसके साए से भी दूर रहना चाहिए, क्योंकि वह उसे कभी भी कटघरे में खड़ा कर सकता है।
लालच बुरी बला है और उस भाव के जीवन में प्रकट होते ही मानव का अध:पतन प्रारंभ हो जाता है। लालची व्यक्ति किसी भी सीमा तक नीचे जा सकता है और उसकी लालसा का कभी अंत नहीं होता। पैसा इंसान को बिस्तर दे सकता है, नींद नहीं; भोजन दे सकता है, भूख नहीं; अच्छे वस्त्र दे सकता है’ सौंदर्य नहीं; ऐशो-आराम के साधन दे सकता है, सुक़ून नहीं। इसलिए मानव का आचार-व्यवहार सदैव पवित्र होना चाहिए, क्योंकि ग़लत ढंग से कमाया हुआ धन मानव को सदैव अशांत रखता है। उसका हृदय सदैव आकुल- व्याकुल व आतुर रहता है। सो! मानव को सत्य की राह पर चलते हुए ग़लत लोगों की संगति का परित्याग कर सबसे प्रेम के साथ रहना चाहिए। संत पुरुषों ने भी मानव को हक़-हलाल की कमाई पर जीवन-यापन करने का उपदेश दिया है, क्योंकि ग़लत ढंग से कमाया हुआ धन जहां बच्चों को दुष्प्रवृत्तियों की ओर धकेलता है, वहीं उन्हें कुसंस्कारित व पथ-विचलित करता है। जुनून वह आग है, जो चिराग बनकर जहां घर को रोशन कर सकती है; वहीं उसे जला कर राख भी कर सकती हैं। उस स्थिति में शेष कुछ भी नहीं बचता। इसलिए कभी ग़लत मत सोचो, न ही ग़लत करो, क्योंकि दोनों स्थितियां मानव को संपूर्णता प्रदान करती हैं।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – परदेश की अगली कड़ी “उल्टा पुल्टा”।)
☆ आलेख ☆ परदेश – भाग – 13 – उल्टा पुल्टा ☆ श्री राकेश कुमार ☆
स्वर्गीय जसपाल जी भट्टी का एक कार्यक्रम “उल्टा पुल्टा” टीवी शो बहुत प्रसिद्ध हुआ था। यहां विदेश आने पर भी आरंभ में दैनिक जीवन यापन में बहुत कुछ ऐसा ही लगा, जिसे देख कर भट्टी जी की याद आ गई। ये भी हो सकता है, उनको भी अपने उल्टा पुल्टा कार्यक्रम की प्रेरणा यहीं से प्राप्त हुई हो।
विदेश आगमन पर जब कार की आगे की सीट के बाएं भाग में स्थान ग्रहण कर रहे थे, तो देखा वहां तो स्टेयरिंग लगा हुआ है, तब मेजबान ने बताया हमारे देश में दाएं तरफ स्टेयरिंग होता है, लेकिन यहां उल्टा बाएं तरफ होता है। कार चलते ही हमें लगा गलत दिशा में चल रही है, लेकिन सभी कारें दाहिनी तरफ चल रही थी। इसी प्रकार से पैदल चलने वाले भी दाएं तरफ चल रहे थे। हमें तो पाठशाला के दिनो से ही “बायें चल” शब्द कंठस्थ करवाया गया था। कहीं, पैंसठ वर्ष तक का जीवन गलत निर्वाह तो नहीं हो गया?
रास्ते में जब गैस स्टेशन (पेट्रोल पम्प) से पेट्रोल भरवाने के लिए रुके तो बहुत ही अजीब लगा, कोई विक्रेता पूछने नहीं आया कि कितने का करना है? स्वयं ही पाइप से भरने के पश्चात कार्ड से भुगतान वो भी बिना ओ टी पी मैसेज। क्या यहां कार्ड का दुरुपयोग/ फ्रॉड नहीं होते है? या यहां की व्यवस्था राम राज्य की कल्पना को साकार कर रहा हैं।
मेज़बान से जानकारी मिली की यहां तरल पदार्थ गैलन में मापे जाते हैं। हमारे देश में तो मैट्रिक प्राणली लागू हुए कई दशक बीत गए। ये अभी दर्जन, ग्रुस, पाउंड और गैलन में ही कार्य कर रहे हैं। सब्जी और अन्य ठोस पदार्थ को वजन पाउंड में मापा जाता हैं। हमारे देश में अभी भी कुछ पुराने लोग नए पैदा हुए बच्चे या केक का वज़न पाउंड में ही पूछते हैं।
घरों में लगे हुए बिजली के बटन (स्विच) भी उल्टे कार्य करते है, ऊपर रखने से बिजली प्रवाह रुक जाता है, और नीचे करने से घर रोशन हो जाता हैं।
जैसा चल रहा है, चलने दे, हमें क्या? हम तो ठहरे परदेशी।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
मार्गशीष साधना सम्पन्न हो गई है।
अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जाएगी
आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं । यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है। ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
☆ संजय उवाच # 167 ☆ बिखराव… ☆
आगे दुकान, पीछे मकान वाली शैली की एक फुटकर दुकान से सामान खरीद रहा हूँ। दुकानदार सामूहिक परिवार में रहते हैं। पीछे उनके मकान से कुछ आवाज़ें आ रही हैं। कोई युवा परिचित या रिश्तेदार परिवार आया हुआ है। आगे के घटनाक्रम से स्पष्ट हुआ कि आगंतुक एकल परिवार है।
आगंतुक परिवार की किसी बच्ची का प्रश्न कानों में पिघले सीसे की तरह पड़ा, ‘दादी मीन्स?’ इस परिवार की बच्ची बता रही है कि दादी मीन्स मेरे पप्पा की मॉम। मेरे पप्पा की मॉम मेरी दादी है।… ‘शी इज वेरी नाइस।’
कानों में अविराम गूँजता रहा प्रश्न ‘दादी मीन्स?’ ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की संस्कृति में कुटुम्ब कितना सिमट गया है! बच्चों के सबसे निकट का दादी- नानी जैसा रिश्ता समझाना पड़ रहा है।
सामूहिक परिवार व्यवस्था के ढहने के कारणों में ‘पर्सनल स्पेस’ की चाहत के साथ-साथ ‘एक्चुअल स्पेस’ का कम होता जाना भी है। ‘वन या टू बीएचके फ्लैट, पति-पत्नी, बड़े होते बच्चे, ऐसे में अपने ही माँ-बाप अप्रासंगिक दिखने लगें तो क्या किया जाए? यूँ देखें तो जगह छोटी-बड़ी नहीं होती, भावना संकीर्ण या उदार होती है। मेरे वयोवृद्ध ससुर जी बताया करते हैं कि अपने गाँव जाते समय दिल्ली होकर जाना पड़ता था। दिल्ली में जो रिश्तेदार थे, रात को उनके घर पर रुकते। घर के नाम पर कमरा भर था पर कमरे में भरा-पूरा घर था। सारे सदस्य रात को उसी कमरे में सोते तो करवट लेने की गुंज़ाइश भी नहीं रहती तथापि आपसी बातचीत और ठहाकों से असीम आनंद उसी कमरे में हिलोरे लेता।
कालांतर में समय ने करवट ली। पैसों की गुंज़ाइश बनी पर मन संकीर्ण हुए। संकीर्णता ने दादा-दादी के लिए घर के बाहर ‘नो एंट्री’ का बोर्ड टांक दिया। दादी-नानी की कहानियों का स्थान वीडियो गेम्स ने ले लिया। हाथ में बंदूक लिए शत्रु को शूट करने के ‘गेम’, कारों के टकराने के गेम, किसी नीति,.नियम के बिना सबसे आगे निकलने की मनोवृत्ति सिखाते गेम। दादी- नानी की लोककथाओं में परिवार था, प्रकृति थी, वन्यजीव थे, पंछी थे, सबका मानवीकरण था। बच्चा तुरंत उनके साथ जुड़ जाता। प्रसिद्ध साहित्यकार निर्मल वर्मा ने कहा था, “बचपन में मैं जब पढ़ता था ‘एक शेर था’, सबकुछ छोड़कर मैं शेर के पीछे चल देता।”
शेर के बहाने जंगल की सैर करने के बजाय हमने इर्द-गिर्द और मन के भीतर काँक्रीट के जंगल उगा लिए हैं। प्राकृतिक जंगल हरियाली फैलाता है, काँक्रीट का जंगल रिश्ते खाता है। बुआ, मौसी, के विस्थापन से शुरू हुआ संकट दादी-नानी को भी निगलने लगा है।
मनुष्य के भविष्य को अतीत से जोड़ने का सेतु हैं दादी, नानी। अतीत अर्थात अपनी जड़। ‘हरा वही रहा जो जड़ से जुड़ा रहा।’ जड़ से कटे समाज के सामने ‘दादी मीन्स’ जैसे प्रश्न आना स्वाभाविक हैं।
अपनी कविता स्मरण आ रही है,
मेरा विस्तार तुम नहीं देख पाए,
अब बिखराव भी हाथ नहीं लगेगा,
मैं बिखरा ज़रूर हूँ, सिमटा अब भी नहीं…!
प्रयास किया जाए कि बिखरे हुए को समय रहते फिर से जोड़ लिया जाए। रक्त संबंध, संजीवनी की प्रतीक्षा में हैं। बजरंग बली को नमन कर क्या हम संजीवनी उपलब्ध कराने का बीड़ा उठा सकेंगे?
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का वैश्विक महामारी और मानवीय जीवन पर आधारित एक अत्यंत विचारणीय आलेख उम्मीद, कोशिश, प्रार्थना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 161 ☆
☆ उम्मीद, कोशिश, प्रार्थना ☆
‘यदि आप इस प्रतीक्षा में रहे कि दूसरे लोग आकर आपको मदद देंगे, तो सदैव प्रतीक्षा करते रहोगे’ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का यह कथन स्वयं पर विश्वास करने की सीख देता है। यदि आप दूसरों से उम्मीद रखोगे, तो दु:खी होगे, क्योंकि ईश्वर भी उनकी सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। इसलिए विपत्ति के समय अपना सहारा ख़ुद बनें, क्योंकि यदि आप आत्मविश्वास खो बैठेंगे, तो निराशा रूपी अंधकूप में विलीन हो जाएंगे और अपनी मंज़िल तक कभी नहीं पहुंच पाएंगे। ज़िंदगी तमाम दुश्वारियों से भरी हुई है, परंतु फिर भी इंसान ज़िंदगी और मौत में से ज़िंदगी को ही चुनता है। दु:ख में भी सुख के आगमन की उम्मीद कायम रहती है, जैसे घने काले बादलों में बिजली की कौंध मानव को सुक़ून प्रदान करती है और उसे अंधेरी सुरंग से बाहर निकालने की सामर्थ्य रखती है।
मुझे स्मरण हो रही है ओ• हेनरी• की एक लघुकथा ‘दी लास्ट लीफ़’ जो पाठ्यक्रम में भी शामिल है। इसे मानव को मृत्यु के मुख से बचाने की प्रेरक कथा कह सकते हैं। भयंकर सर्दी में एक लड़की निमोनिया की चपेट में आ गई। इस लाइलाज बीमारी में दवा ने भी असर करना बंद कर दिया। लड़की अपनी खिड़की से बाहर झांकती रहती थी और उसके मन में यह विश्वास घर कर गया कि जब तक पेड़ पर एक भी पत्ता रहेगा; उसे कुछ नहीं होगा। परंतु जिस दिन आखिरी पत्ता झड़ जाएगा; वह नहीं बचेगी। परंतु आंधी, वर्षा, तूफ़ान आने पर भी आखिरी पत्ता सही-सलामत रहा…ना गिरा; ना ही मुरझाया। बाद में पता चला एक पत्ते को किसी पेंटर ने, दीवार पर रंगों व कूची से रंग दिया था। इससे सिद्ध होता है कि उम्मीद असंभव को भी संभव बनाने की शक्ति रखती है। सो! व्यक्ति की सफलता-असफलता उसके नज़रिए पर निर्भर करती है। नज़रिया हमारे व्यक्तित्व का अहं हिस्सा होता है। हम किसी वस्तु व घटना को किस अंदाज़ से देखते हैं; उसके प्रति हमारी सोच कैसी है–पर निर्भर करती है। हमारी असफलता, नकारात्मक सोच निराशा व दु:ख का सबब बनती है। सकारात्मक सोच हमारे जीवन को उल्लास व आनंद से आप्लावित करती है और हम उस स्थिति में भयंकर आपदाओं पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैं। सो! जीवन हमें सहज व सरल लगने लगता है।
‘पहले अपने मन को जीतो, फिर तुम असलियत में जीत जाओगे।’ महात्मा बुद्ध का यह संदेश आत्मविश्वास व आत्म-नियंत्रण रखने की सीख देता है, क्योंकि ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ सो! हर आपदा का साहसपूर्वक सामना करें और मन पर अंकुश रखें। यदि आप मन से पराजय स्वीकार कर लेंगे, तो दुनिया की कोई शक्ति आपको आश्रय नहीं प्रदान कर सकती। आवश्यकता है इस तथ्य को स्वीकारने की…’हमारा कल आज से बेहतर होगा’–यह हमें जीने की प्रेरणा देता है। हम विकट से विकट परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। परंतु यदि हम नाउम्मीद हो जाते हैं, तो हमारा मनोबल टूट जाता है और हम अवसाद की स्थिति में आ जाते हैं, जिससे उबरना अत्यंत कठिन होता है। उदाहरणत: पानी में वही डूबता है, जिसे तैरना नहीं आता। ऐसा इंसान जो सदैव उधेड़बुन में खोया रहता है, वह उन्मुक्त जीवन नहीं जी सकता। उसकी ज़िंदगी ऊन के गोलों के उलझे धागों में सिमट कर रह जाती है। परंतु व्यक्ति अपनी सोच को बदल कर, अपने जीवन को आलोकित-ऊर्जस्वित कर सकता है तथा विषम परिस्थितियों में भी सुक़ून से रह सकता है।
उम्मीद, कोशिश व प्रार्थना हमारी सोच अर्थात् नज़रिए को बदल सकते हैं। सबसे पहले हमारे मन में आशा अथवा उम्मीद जाग्रत होनी चाहिए। इसके उपरांत हमें प्रयास करना चाहिए और अंत में कार्य-सम्पन्नता के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। उम्मीद सकारात्मकता का परिणाम होती है, जो हमारे अंतर्मन में यह भाव जाग्रत करती है कि ‘तुम कर सकते हो।’ तुम में साहस,शक्ति व सामर्थ्य है। इससे आत्मविश्वास दृढ़ होता है और हम पूरे जोशो-ख़रोश से जुट जाते हैं, अपने लक्ष्य की प्राप्ति की ओर। यदि हमारी कोशिश में कमी रह जाएगी, तो हम बीच अधर लटक जाएंगे। इसलिए बीच राह से लौटने का मन भी कभी नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि असफलता ही हमें सफलता की राह दिखाती है। यदि हम अपने हृदय में ख़ुद से जीतने की इच्छा-शक्ति रखेंगे, तो ही हमें अपनी मंज़िल अर्थात् निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति हो सकेगी। अटल बिहारी बाजपेयी जी की ये पंक्तियां ‘छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता/ टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता’ जीवन में निराशा को अपना साथी कभी नहीं बनाने का सार्थक संदेश देती हैं। हमें दु:ख से घबराना नहीं है, बल्कि उससे सीख लेकर आगे बढ़ना है। जीवन में सीखने की प्रक्रिया निरंतर चलती है। इसलिए हमें दत्तात्रेय की भांति उदार होना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में चौबीस गुरु धारण किए और छोटे से छोटे जीव से भी शिक्षा ग्रहण की। इसलिए प्रभु की रज़ा में सदैव खुश रहना चाहिए अर्थात् जो हमें परमात्मा से मिला है; उसमें संतोष रखना कारग़र है। अपने भाग्य को कोसें नहीं, बल्कि अधिक धन व मान-सम्मान पाने के लिए सत्कर्म करें। परमात्मा हमें वह देता है, जो हमारे लिए हितकर होता है। यदि वह दु:ख देता है, तो उससे उबारता भी वही है। सो! हर परिस्थिति में सुख का अनुभव करें। यदि आप घायल हो गए हैं या दुर्घटना में आपका वाहन का टूट गया, तो भी आप परेशान ना हों, बल्कि प्रभु के शुक्रगुज़ार हों कि उसने आपकी रक्षा की है। इस दुर्घटना में आपके प्राण भी तो जा सकते थे; आप अपाहिज भी हो सकते थे, परंतु आप सलामत हैं। कष्ट आता है और आकर चला जाता है। सो! प्रभु आप पर अपनी कृपा-दृष्टि बनाए रखें।
हमें विषम परिस्थितियों में अपना आपा नहीं खोना चाहिए, बल्कि शांत मन से चिंतन-मनन करना चाहिए, क्योंकि दो-तिहाई समस्याओं का समाधान स्वयं ही निकल आता है। वैसे समस्याएं हमारे मन की उपज होती हैं। मनोवैज्ञानिक भी हर आपदा में हमें अपनी सोच बदलने की सलाह देते हैं, क्योंकि जब तक हमारी सोच सकारात्मक नहीं होगी; समस्याएं बनी रहेंगी। सो! हमें समस्याओं का कारण समझना होगा और आशान्वित होना होगा कि यह समय सदा रहने वाला नहीं। समय हमें दर्द व पीड़ा के साथ जीना सिखाता है और समय के साथ सब घाव भर जाते हैं। इसलिए कहा जाता है,’टाइम इज़ ए ग्रेट हीलर।’ सो दु:खों से घबराना कैसा? जो आया है, अवश्य ही जाएगा।
हमारी सोच अथवा नज़रिया हमारे जीवन व सफलता पर प्रभाव डालता है। सो! किसी व्यक्ति के प्रति धारणा बनाने से पूर्व भिन्न दृष्टिकोण से सोचें और निर्णय करें। कलाम जी भी यही कहते हैं कि ‘दोस्त के बारे में आप जितना जानते हैं, उससे अधिक सुनकर विश्वास मत कीजिए, क्योंकि वह दिलों में दरार उत्पन्न कर देता है और उसके प्रति आपका विश्वास डगमगाने लगता है।’ सो! हर परिस्थिति में खुश रहिए और सुख की तलाश कीजिए। मुसीबतों के सिर पर पांव रखकर चलिए; वे आपके रास्ते से स्वत: हट जाएंगी। संसार में दूसरों को बदलने की अपेक्षा उनके प्रति अपनी सोच बदल लीजिए। राह के काँटों को हटाना सुगम नहीं है, परंतु चप्पल पहनना अत्यंत सुगम व कारग़र है।
सफलता और सकारात्मकता एक सिक्के के दो पहलू हैं। आप अपनी सोच व नज़रिया कभी भी नकारात्मक न होने दें। जीवन में शाश्वत सत्य को स्वीकार करें। मानव सदैव स्वस्थ नहीं रह सकता। उम्र के साथ-साथ उसे वृद्ध भी होना है। सो! रोग तो आते-जाते रहेंगे। वे सब तुम्हारे साथ सदा नहीं रहेंगे और न ही तुम्हें सदैव ज़िंदा रहना है। समस्याएं भी सदा रहने वाली नहीं हैं। उनकी पहचान कीजिए और अपनी सोच को बदलिए। उनका विविध आयामों से अवलोकन कीजिए और तीसरे विकल्प की ओर ध्यान दीजिए। सदैव चिंतन-मनन व मंथन करें। सच्चे दोस्तों के अंग-संग रहें; वे आपको सही राह दिखाएंगे। ओशो भी जीवन को उत्सव बनाने की सीख देते हैं। सो! मानव को सदैव आशावादी व प्रभु का शुक्रगुज़ार होना चाहिए तथा प्रभु में आस्था व विश्वास रखना चाहिए, क्योंकि वह हम से अधिक हमारे हितों के बारे में जानता है। समय बदलता रहता है; निराश मत हों। सकारात्मक सोच रखें तथा उम्मीद का दामन थामे रखें। आत्मविश्वास व दृढ़संकल्प से आप अपनी मंज़िल पर अवश्य पहुंच जाएंगे। एमर्सन के इस कथन का उल्लेख करते हुए मैं अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगी ‘अच्छे विचारों पर यदि आचरण न किया जाए, तो वे अच्छे सपनों से अधिक कुछ भी नहीं हैं। मन एक चुंबक की भांति है। यदि आप आशीर्वाद के बारे में सोचेंगे; तो आशीर्वाद खिंचा चला आएगा। यदि तक़लीफ़ों के बारे में सोचेंगे, तो तकलीफ़ें खिंची चली आएंगी। सो! हमेशा अच्छे विचार रखें; सकारात्मक व आशावादी बनें।
☆ आलेख ☆ जन्मदिवस विशेष – “’अश्क’ जिन्हें केवल लिखने के लिए ही धरती पर भेजा गया ” ☆ डॉ. हरीश शर्मा☆
हिंदी उपन्यास और गद्य क्षेत्र में मध्यवर्गीय जीवन को चित्रित करने वाले उपेन्द्रनाथ अश्क 14 दिसम्बर, 1910 की दोपहर जालंधर में पैदा हुए और वो खुद इस बारे में कहते हैं कि दोपहर में पैदा होने वाले थोड़े शरारती और अक्खड़ माने जाते है।
एक हठी और सख्त पिता तथा सहनशीलता की मूरत माँ से पैदा हुआ ये आदमी कमाल के बातूनी और मोहक व्यक्तित्व को लेकर पैदा हुआ । पंजाब के निम्न मध्यवर्गीय मुहल्ले में पला बढ़े अश्क जी ने लाहौर, जालंधर, मुंबई से होते हुए इलाहाबाद को अपना पक्का ठिकाना बनाया। आप सोच कर देखिए कि उर्दू में लिखने की शुरुआत करने वाले उपेन्द्रनाथ अश्क को 1932 में एक खत के द्वारा मुंशी प्रेमचंद हिंदी में लिखने की प्रेरणा देते हैं और अश्क हिंदी की ओर मुड़ते हुए उस समय की चर्चित पत्रिका ‘चंदन’ में छपना शुरू हो जाते हैं । इस पर उर्दू के चर्चित कथाकार कृष्ण चन्दर लिखते हैं, अश्क मुझसे बहुत पहले लिखना शुरू कर चुके थे और लोकप्रियता की मंजिल तय करके उर्दू कहानीकारों की पहली पंक्ति में आ चुके थे । उस जमाने मे सुदर्शन जी लाहौर से कहानी की एक बहुत ही अच्छी पत्रिका ‘चंदन’ निकालते थे और अश्क जी की कहानियाँ अक्सर उसमें छपती थीं ।
अश्क जी चर्चित कथाकार राजेन्द्र सिंह बेदी, सहादत हसन मंटो के समकालीन रहे । 1947 में इनके साथ ही लाहौर रेडियो स्टेशन के लिए कृष्ण चंदर भी नाटक लिखा करते थे । अश्क जी लाहौर रेडियो पर नाटक लिखने के लिए बाकायदा तनख्वाह पाते थे ।
अश्क जी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा सबूत उनकी 57वीं वर्षगाठ पर लिखे गए संस्मरणों की किताब ‘अश्क, एक रंगीन व्यक्तित्व’ है, जिसमे हिंदी और उर्दू के कई जाने माने चेहरों ने अश्क जी पर अपने अनुभव साझा किए हैं, इन साहित्यकारों में शिवपूजन सहाय, मार्कण्डेय, सुमित्रानन्दन पंत, भैरवप्रसाद गुप्त, राजेंद्रयादव, मोहन राकेश, जगदीश चन्द्र माथुर, फणीश्वर नाथ रेणु, शेखर जोशी, ख्वाजा अहमद अब्बास, कृष्ण चन्दर, बेदी, देवेंद्र सत्यार्थी, शानी आदि ने लिखा । इस अर्ध शती समारोह के अवसर पर लेनिनग्राद से लेखक बारानिकोव ने भी संस्मरण लिखा है।
अश्क जी ने अपना पहला उपन्यास ‘सितारों के खेल’ 1940 में लिखा और फिर ‘गिरती दीवारें’ बड़ी बड़ी आँखें, एक नन्ही कंदील, बांधो न नाव इस ठाँव, शहर में घूमता आईना, पलटती धारा, निमिषा, गर्म राख सहित दस उपन्यास लिखे । उपन्यास ‘इति नियति’ उनकी अंतिम रचना थी जो उनकी मृत्यु के उपरांत 2004 में छपा। इसके इलावा अश्क जी ने साहित्य की हर विधा में हाथ आजमाया । उन्होंने लगभग सौ किताबें हिंदी साहित्य को दीं ।
अश्क जी द्वारा लिखे नाटक भारत और लंदन तक में खेले गए । उनका लिखा नाटक ‘अंजो दीदी ‘तो जालंधर में एक ही दिन छह जगह खेला गया । उनके अन्य चर्चित नाटक स्वर्ग की झलक, छठा बेटा, कैद और उड़ान, जय पराजय आदि भारत के विभिन्न राज्यों और विदेशों में चर्चित रहें । अश्क जी का मंटो पर लिखे संस्मरण की किताब, ‘मंटो: मेरा दुश्मन’ बहुत चर्चित रहा ।
अश्क जी ने दर्जनों कहानियाँ हिंदी और उर्दू साहित्य की झोली में डाली । ‘छींटे, काले साहब, बैंगन का पौधा, पिंजरा, आदि कहानी संग्रहो में सौ के लगभग कहानियां उन्होंने लिखी ।
उनके पूरे साहित्य में लाहौर,जालंधर क्षेत्र का पंजाबी मध्यवर्ग मुखर रहा । उपन्यासों में तो वे चेतन नाम के पात्र द्वारा अपने ही जीवन की एक लंबी कथा लिखते रहे जिसने पंजाब के मध्यवर्ग के हर कोण को बहुत बारीकी से पकड़ा । बंटवारे से पहले और बाद के संदर्भो को समझने के लिए उनके उपन्यास एक अहम दस्तावेज हैं ।
मैं खुद 2003 में जब अश्क जी पर पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में शोध कर रहा था तो विभाग अध्यक्ष डॉ चमनलाल जी ने बताया कि डेजी रोकवेल की एक किताब अंग्रेजी में अश्क जी पर आई है । अमेरिकन लेखक और अनुवादक डेजी रोकवेल वही नाम है जिसे गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद के लिए अभी हाल ही में बुकर पुरस्कार मिला ।
डेजी की किताब उपेन्द्रनाथ अश्क, अ क्रिटिकल बायोग्राफी’ में भी अश्क जी के जीवन और उनकी रचना प्रक्रिया पर बहुत शोधात्मक काम हुआ है । डेजी ने अश्क के उपन्यास ‘गिरती दीवारें’ और ‘शहर में घूमता आईना’ को भी अंग्रेजी में अनुवाद किया। इससे अश्क के महत्व का अंदाजा स्वयं ही लगाया जा सकता है कि वे कॉटन महत्व पूर्ण व्यक्ति थे ।
अश्क जी को उनके लेखन के लिए कभी किसी पुरस्कार की आकांक्षा नही थी, आकाशवाणी को दिए एक साक्षात्कार में वो कहते हैं “लिखना मेरे लिए जीवन है और मैं अखबारों की संपादकीय, वकालत को छोड़कर लेखन में ही लग गया क्योंकि इससे मुझे खुशी मिलती थी ।” अश्क जी न केवल देश की राज्य सरकारों ने सम्मानित किया बल्कि विदेश में भी सम्मानित हुए । उनके उपन्यास ‘बड़ी बड़ी आंखे’ 1956 में भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत हुआ । ‘शहर में घूमता आईना, पत्थर अल पत्थर, हिंदी कहानियाँ और फैशन (आलोचना) आदि को पंजाब सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया । ‘साहब को जुकाम है’ एकांकी नाटक को पंजाब तथा उत्तर प्रदेश सरकार ने सम्मान से पुरस्कृत किया | संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ नाटककार का सम्मान दिया । 1972 में अश्क जी को नेहरू पुरस्कार मिला तथा रूस जाने का निमंत्रण दिया गया । पंजाब सरकार के भाषा विभाग ने अपने इस धरती पुत्र की स्वर्ण जयंती मनाई गई तथा उनके गृहनगर जालंधर में लोकसम्मान किया गया । इसी प्रकार अश्क की अर्धशती केवल जालंधर और इलाहाबाद में नही बल्कि रूस के लेनिनग्राद में भी मनाई गई । जीवन के अंतिम दिनों में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा उन्हें एक लाख रुपये का ‘इकबाल सम्मान’ देने की भी घोषणा हुई । इस प्रकार अश्क जी अपने अथक लेखन के लिए अनगिनत पुरस्कारों से सम्मानित हुए ।
इस दौरान वे गम्भीर बीमारियों से लगातार जूझते रहे पर लेखन ने उन्हें हमेशा ऊर्जा दी और जीते रहने की संजीवनी बूटी दी ।
वे लगातार लिखते रहे । वे खुद लिखते हैं कि दस से पंद्रह पेज जब तक वे रोजाना लिख न लें उन्हें चैन नही पड़ता था। शायद इसी कारण वे अपने बृहद उपन्यासों की रचना कर पाए। उनका उपन्यास ‘शहर में घूमता आईना’ जो लगभग 450 पृष्ठों में फैला है, एक ही दिन की कथा है, जिसमे वो बहुत से पात्रों और स्थान का वर्णन करते हुए उनकी मनोवैज्ञानिक, सामाजिक तथा आर्थिक दशा को दिखाते हैं | उनके पास हर विधा में लिखने की जो कला थी, वो उन्हें हर प्रकार की ऊब से परे रखती ।
विविधता ने उनकी कलम को कभी रुकने न दिया । इसलिए वे उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, लेख, आलोचना, संस्मरण के बीच पाला बदल बदल कर आगे बढ़ते रहे । बीमारियां चलती रही पर उन्होंने इन्ही के साथ जीना सीखते हुए लिखना जारी रखा। उन्होंने बीमारी के दौरान लाभ उठाते हुए टालस्टाय, दस्तोवस्की, जेन आस्टन, मैन्टरलिक,पिरेन्डलो और बर्नार्ड शा को पढ़कर अपने लेखन को नया शिल्प दिया और इन क्लासिक रचनाओं को पढ़कर लिखने की प्रेरणा पाते रहे । कहने के लिए उनके पास अपना खुद का जीवन था, जिसमे मुहल्ले, बदहाली, आर्थिक विषमता, संघर्ष और एक नौजवान के जीवन की लंबी किस्सागोई मौजूद थी । उन्होंने एक साक्षात्कार में भी कहा, “मुझे सच में किसी बात का अफसोस नही, मुझे संतोष है कि जैसे भी जिया, अपनी तरह जिया और अपनी जिंदगी से कुछ लिया तो बदले में कुछ कम नही दिया।”
अश्क जी की लेखन परम्परा को उनके पुत्र नीलाभ ने आगे बढ़ाया । उसी के नाम से उन्होंने इलाहाबाद में नीलाभ प्रकाशन शुरू किया था । नीलाभ हिंदी के चर्चित कवि, अनुवादक रहे | काफी समय बी बी सी लंदन में भी उन्होंने काम किया । अब वे भी इस दुनिया से जा चुके हैं ।
9 जनवरी 1996 को अश्क जी ने अंतिम सांस ली । वे अपने पीछे एक बड़ा साहित्य कर्म छोड़ कर गए जो रचनाओं के रूप में एक समाज और क्षेत्र का शाश्वत दस्तावेज है ।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – परदेश की अगली कड़ी “झीलें”।)
☆ आलेख ☆ परदेश – भाग – 12 – झीलें ☆ श्री राकेश कुमार ☆
मुम्बई निवास के समय “बल्लार्ड पियर” के नाम का क्षेत्र सुना/देखा था। अमेरिका के शिकागो शहर में भी एक स्थान है, “नेवी पियर” गूगल से जब पियर का अनुवाद ढूंढा तो उसने पहले तो नाशपाती नामक फल बता दिया, हमें लगा जुलाई माह (सावन) के आस पास ही इस फल का मौसम रहता है। गूगल भी हमारे समान मौसम को मानता होगा, हम तो जीवन में मौसम को ही सबसे अधिक महत्व देते हैं।
नेवी पियर क्षेत्र यहां की सबसे बड़ी “मिशेगन झील” के एक तट को बांध कर बनाए गया था। झील इतनी बड़ी है, तो नेवी (नौसेना) भी इसका उपयोग करती रही होगी। अब ये एक दर्शनीय भ्रमण स्थल है, जहां हमेशा भीड़ रहती है। आसपास के क्षेत्र में उत्तर भारत के मेरठ शहर में प्रतिवर्ष भरने वाले “नौचंदी मेले” जैसा नज़ारा रहता हैं। खाने पीने की सैकड़ों दुकानें, बच्चे और बड़ो के विद्युत संचालित झूले, सार्वजनिक संगीत के माहौल में झूमते हुए युवा, मनोरंजन के नाम पर सब कुछ है।
मिशीगन झील एक “शिकागो नदी” से भी जुड़ी हुई है। झील में एकल नाव से दो सौ लोगों के बैठने वाले जहाज तक घूमने के लिए उपलब्ध हैं। पैसा फेक और तमाशा देख वाली कहावत यहां भी चरितार्थ होती है।
यहां के युवा “पानी के खेल” (वाटर स्पर्ट्स) को भी बहुत शौक से खेलते हुए प्रकृति द्वारा उपलब्ध साधन का सही उपयोग करते हैं।
यहां के अमीर अपनी बड़ी वाली कार को नाव की छत पर रखकर आनंद लेने आते हैं। बड़े अमीर बड़ी नाव (Y वाला याट) को कार के साथ खींच कर लाते हैं। पुरानी कहावत है “जितना गुड डालेंगे उतना ही मीठा हलवा होगा। सावन आरंभ हो चुका है, तो कुछ मीठा हलवा हो जाए।
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर एवं विचारणीय आलेख–चिंतन – “महत्व श्रम”।)
☆ आलेख # 165 ☆ चिंतन – “महत्व श्रम” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆
स्त्री -पुरुषों के पास समय बिताने के लिए कोई काम न हो तो वे पतित हो जाते हैं। हमे काम मतलब श्रम से जी नहीं चुराना चाहिए, अन्यथा हम ऐसी वस्तु बन जायेंगे जिसका प्रकृति के लिए कोई उपयोग नहीं होगा। ”फल हीन अंजीर” की कथा याद करो जिसमे कहा गया था कि- बिना काम स्त्री-पुरुष झगड़ालू , असंतुष्ट, अधीर और चिड़चिड़े हो जाते हैं, चाहे ऊपर से वे कितने ही मीठे और मिलनसार ही क्यों न दिखाई दें। जो यह शिकायत करे कि ”मेरे पास कोई काम नहीं है” या ”मुझसे काम नहीं बनता” उसे झगड़ालू और शिकायत से भरा हुआ समझना चाहिए, उसके चेहरे पर थकावट सी छाई हुई होगी, … उसका चेहरा देखने में भला न प्रतीत हो रहा होगा।
कई लोग ऐसा सोचते हैं कि उनके पास काम नहीं है तो वे भाग्यवान हाँ या उनसे काम नहीं बनता तो वे खुशहाल है यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि काम का न होना सौभाग्य या मनचाही वस्तु है । काम न करना एक तरह से प्रक्रति के विरुद्ध -विद्रोह है, मनुष्यता या पौरुष का अपमान है। यह पुर्णतः अप्राकृतिक और लोकिक नियमो के विपरीत है … अपनी रोजी-रोटी के लिए थोड़ी कमाई कर के अपने अन्दर अहं पाल लेना … बाल-बच्चे पैदा कर के घर चला लेना क्या इतना ही पर्याप्त है इस जीवन के लिए … सोचो तो जरा … अरे भाई कुछ काम करो। कुछ काम करो … जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ कुछ व्यर्थ न हो …। तो कुछ तो ऐसा ‘काम’ कर लो जिससे पूरे विश्व के उत्थान का रास्ता प्रशस्त हो… जिस दिन इस धरती पर श्रम और काम की कीमत गिर जायेगी उस दिन यहाँ की सारी चहल-पहल और खुशहाली मिटटी में मिल जायेगी … अतः हमें अपने काम और श्रम के द्वारा इस संसार को बहुत सुन्दर बनाना है काम।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
🕉️ मार्गशीष साधना सम्पन्न हो गई है। 🌻
अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जाएगी
आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं । यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है। ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
☆ संजय उवाच # 166 ☆ कबिरा संगत साधु की… ☆
जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं,
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेत: प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,
सत्संगति: कथयं किं न करोति पुंसाम्।।
अर्थात् अच्छे मित्रों का साथ बुद्धि की जड़ता को हर लेता है, वाणी में सत्य का संचार करता है, मान और उन्नति को बढ़ाता है और पाप से मुक्त करता है | चित्त को प्रसन्न करता है और हमारी कीर्ति को सभी दिशाओं में फैलाता है। आप ही बताइए कि सत्संगति मनुष्यों का कौन- सा भला नहीं करती!
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। सामाजिक है अर्थात समाज में रहनेवाला है। समाज, समूह से बनता है। तात्पर्य है कि मनुष्य समूह में रहनेवाला प्राणी है। ऐसे में एक-दूसरे की संगति स्वाभाविक है। साथ ही यह भी स्वाभाविक है कि समूह के हर सदस्य पर एक-दूसरे के स्वभाव का, विचारों का, गुण-अवगुण का प्रभाव पड़े। ऐसे में अपनी संगति का विचारपूर्वक चुनाव आवश्यक हो जाता है।
अध्यात्म में सत्संगति का विशेष महत्व है। ‘सत्संग’ के प्रभाव से मनुष्य की सकारात्मकता सदा जाग्रत रहती है।
सत्संग के महत्व से अनजान एक युवा कबीरदास जी के पास पहुँचा। कहने लगा, ‘मैं शिक्षित हूँ, समझदार हूँ। अच्छाई और बुराई के बीच अंतर ख़ूब समझता हूँ। तब भी मेरे माता-पिता और परिवार के बुज़ुर्ग मुझे सत्संग में जाने के लिए बार-बार कहते हैं। अब आप ही बताइए कि भला मैं सत्संग में क्यों जाऊँ?”
कबीर कुछ नहीं बोले। केवल एक हथौड़ा उठाया और पास ही ज़मीन में गड़े एक खूँटे पर दे मारा। कोई उत्तर न पाकर युवक वहाँ से लौट गया।
अगले दिन युवक फिर आया। उसने फिर अपना प्रश्न दोहराया। कबीर फिर कुछ नहीं बोले। फिर हथौड़ा उठाकर उसी खूँटे पर दे मारा। खूँटा ज़मीन में कुछ और गहरा गड़ गया। युवक लौट गया।
तीसरे दिन वह फिर आया। फिर वही प्रश्न, उत्तर में कबीर द्वारा फिर खूँटे को हथौड़े से ज़मीन में और गहरा गाड़ना। अब युवक का धैर्य जवाब दे गया। रुष्ट स्वर में बोला, “महाराज आप मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं जानते या नहीं देना चाहते तो न सही पर रोज़-रोज़ यूँ मौन धारण कर इस खूँटे पर हथौड़ा क्यों चलाते हैं?” कबीर मुस्कराकर बोले, “मैं रोज़ तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देता हूँ पर तुम समझदार होकर भी समझना नहीं चाहते। मैं रोज़ खूँटे पर हथौड़ा मारकर ज़मीन में इसकी पकड़ मज़बूत कर रहा हूँ अन्यथा हल्की-सी ठोकर से भी इसके उखड़ने का डर है।..बेटा, मनुष्य का मन इस खूँटे की तरह है। मन के खूँटे पर सत्संग का प्रहार और संस्कार निरंतर होता रहना चाहिए ताकि मनुष्य सकारात्मक चिंतन कर सके, बेहतर मनुष्य बन सके। सकारात्मकता जितनी गहरी होगी, जीवन में कठिनाइयाँ और संकट उतने ही उथले लगेंगे। इसलिए सत्संग अनिवार्य है।”
सत्संग या सज्जनों के साथ के इसी महत्व ने कबीरदास जी से लिखवाया,
कबिरा संगत साधु की, ज्यों गंधी की बास।
जो कुछ गंधी दे नहीं, तो भी बास सुबास।।
गंधी या इत्र बेचनेवाला कुछ न भी दे तब भी उसकी उपस्थिति से ही वातावरण में सुगंध फैल जाती है। सत्संगति का भी यही आनंद है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆