हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ विराम ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ विराम ☆

सुनो, बहुत हो गया यह लिखना- लिखाना। मन उचट-सा गया है। यों भी पढ़ता कौन है आजकल?….अब कुछ दिनों के लिए विराम। इस दौरान कलम को छूऊँगा भी नहीं।

फिर…?

कुछ अलग करते हैं। कहीं लाँग ड्राइव पर निकलते हैं। जी भरके प्रकृति को निहारेंगे। शाम को पंडित जी का सुगम संगीत का कार्यक्रम है। लौटते हुए उसे भी सुनने चलेंगे।

उस रात उसने प्रकृति के वर्णन और सुगम संगीत के श्रवण पर दो संस्मरण लिखे।

©  संजय भारद्वाज

अपराह्न 2:43 बजे, 15 जून 2020

# आपका दिन सृजनशील हो।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग- 10 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत (मराठी)

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-10 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

देवव्रत

        “देव….” माता ने आवाज़ दी उस समय मैं एक बाघिन को ज़मीन पर लिटाकर उसके बच्चों को उसका दूध पिला रहा था।

बाघिन अपने पिल्ले जनकर भक्ष के लिए जंगल में घुस गयी थी।

दो दिन से बछडे भूखे ही थे। आखिर मैं ही जंगल में जाकर उसको पकड़ कर ले आया और उसे  अच्छी तरह से बाँधकर यहाँ ले आया। अब वह चुपचाप लेटी हुई थी। और बछडे उसके स्तनों से चिपक कर दूध पी रहे थे।

“देव, यह क्या कर रहे हो”? वह अदभुत प्रकार देखकर माता ने आश्चर्य से प्रश्न किया। किसी बाघिन को पकड़कर ले आना इतना आसान नहीं था। पर मेरे लिए वह उतना कठिन भी नहीं था। माता को मात्र वह चमत्कार ही लगा।

“माता, इसने इन बछडों को जन्म दिया और वह खुद जंगल में चली गयी।”

“भूखी होगी… भक्ष के लिए गयी होगी।”

“हां। पर यहाँ इनपिल्लों का क्या होगा? बछडे भूख से तड़पकर मर जाएंगे ना। बछडों को मृत्यु के मूँह में छोड़कर घूमनेवाली यह कैसी माता? माँ, मुझे उस पर क्रोध आया इसलिए मैं उसे पकड़कर यहाँ तक खींच कर ले आया हूँ। ऐसी माताओं को मैं शासन किए बगैर में नहीं छोडूँगा ।” इतना कहा और मैं एकदम से घबराया।

माता के चेहरे पर अचानक तीव्र वेदना दिखने लगी। उसके होंठो से दर्द के अस्पष्ट हुंकार निकल पडे।

“माता”?

“हूँ”?

“क्या हुआ”?

“कुछ नहीं।”

“स्वास्थ्य तो ठीक है ”? मैंने चिंता से उसका हाथ पकड़कर पूछा।

पर अब वह संभल गयी थी। अपनी पीड़ा उसने छिपा ली। दर्द छिपाया। वेदना पिघल गयी। पर वह वेदना मुझे चुभने लगी थी। वेदना का कारण किंतु अज्ञात ही रहा। अर्थात् इच्छा होने पर भी मैंने नहीं पूछा। कारण उससे माता को पीड़ा ही होती।

बादलों की आड़ से सूर्य निकल आए वैसे उसका चेहरा पहले जैसा दिखने लगा था। सस्मित वदन से उसने कहा, “देवव्रत…”

“जी.. ”?

“तुम्हें कृषि कर्म प्रिय है”?

“हां.. है। इसलिए तो मैंने उस तरफ की ज़मीन तैयार कर ली है। उसमे फसल भी खड़ी हो गयी है। और छः महीने में अनाज भी मिल जाएगा।”।

“इतने शौक से तुमने फसल तैयार कर ली है किंतु गत दो चार दिन से क्या वहाँ गये भी हो”? उसने वही शांति से लेटी बाघिन पर एक नज़र ड़ालकर पूछा। मैं सकपकाया।

“सच, नहीं गया। माते, क्या मेरे खेत में किसी ने मवेशी छोड़कर फसल को नुकसान तो नहीं पहुंचाया है न”?

“नहीं।”

“फिर”?

“अरे फसल को पानी नहीं चाहिए क्या? इन दो बछडों को दूध पिलाते बैठे हो, किंतु वहाँ जल सिंचना भी  आवश्यक है ना… फसल मुरझा रही है… पत्ते भी मरियल से हो गए हैं…”।

मैं खडा हो गया।

सच में  खेतों की ओर कुछ ज्यादा ही दुर्लक्ष हो गया था।

“माता, तुम चिंता मत करो। मैं संपूर्ण गंगा की धारा ही फसल में बहा देता हूँ”।

“क्या”?

“हाँ।”

“वह कैसे”?

“मेरा सामर्थ्य ही देखो अब।” इतना कहकर मैं खेत की तरफ चला आया। माता भी चकित होकर मेरे पीछे पीछे आयी। खेत पर्णकुटी से बहुत दूर नहीं था।

मैने धनुष्य लिया। बाण लगाया। प्रत्यंचा खिंची। भगवान परुषराम का स्मरण किया और फिर सर्रसर्र एक के बाद एक बाण छोड़ने लगा। मेरे चलाए बाण ज़मीन में धँस रहे थे और वहाँ की मीट्टी दूर उछल रही थी। इस प्रकार फसल से लेकर गंगा तट तक मैंने बाणों की एक रेखा ही खींच दी और देखते देखते गंगा के तट से लेकर फसल तक एक लंबा चौड़ा पाट निर्माण हो गया। वहाँ से अब पानी आना संभव हो सकता था। इसलिए अब गंगा के जल को रोकना ज़रूरी था।

मैं गंगा तट पर आया। मेरा पराक्रम देखकर चौंकनेवाली माता भी मेरे साथ साथ गंगा तट पर आ गयी। उसकी आँखें अभिमान से भर आयीं।

उसके मुखमंड़ल से भरकर बहनेवाला हर्ष देखकर मेरा उत्साह भी भरकर बढ़ने लगा। मुझे सारे संसार का चैतन्य भरभर कर उछलने का आभास होने लगा।

मैंने फिर से धनुष उठाया।

प्रत्यंचा खिंची और टंकार किया। उस टंकार की भेदने वाली ध्वनि आसमान में प्रतिध्वनित होने लगी। उस टंकार से डरकर वृक्ष पर बैठे पक्षी शक्रास्त्र से बाहर निकलनेवाले  नतपर्व बाणों की तरह हवा में उछल पडे।

गंगा को मैंने प्रणाम किया और दिव्य अस्त्र का मंत्रजाप कर तीरों की अनगिनत वृष्टि की। पलभर के लिए पर्जन्यधारा ही अवतिरत हो गयी है ऐसा आभास निर्माण हुआ । मेरे अनगिनत तीर गंगा की धारा में घुसने लगे। तलहटी के रेत को भेदकर धँसने लगे। एक के बाद एक  ज़ोर से आनेवाले बाण  विशिष्ट प्रकार से एकदूसरे में  फंसने लगे। पहले महीन सा जाला निर्माण होने लगे। फिर वहाँ भी मैंने बाण छोडे और कुछ ही क्षणो में एक अभूतपूर्व दीवार वहाँ निर्माण हुई।

बलशाली गंगा का प्रवाह खंडित हुआ।

प्रवाह का पानी रुक गया और मैंने जो पाट निर्माण किया था वहाँ से मेरे खेत की और दौड़ने लगा।

“माते, मिला न मेरे खेत को पानी? अब वह फसल ताज़ा और रसीली बनेगी।”

“हां देव।” माता ने कहा और मुझे अपने आलिगंन में भर लिया मेरे गाल चूमने लगी। मुझे भी अपनी धनुर्विद्या से संतोष हुआ। ह्रदय गदगद हो उठा।

और उसी समय..

एक अपरिचित पुरूष की आवाज़  आयी।

“गंगा..” अद्भुत सामर्थ्य से परिपूर्ण यह महातेजस्वी व्यक्ति कौन होगा? हम आलिंगन से मुक्त हुए।

मेरी माता भावविभोर होकर उसी ओर देख रही थी। मैं भी चकित होकर देखने लगा।

वह राजसी पुरूष आभुषणों से सुसज्जित, बलशाली था। उसके भी हाथों में धनुष्यबाण था। निश्चित ही वह किसी राज्य का सम्राट होगा और मृगया के लिए इस ओर आया होगा।

“महाराज.. आप”? माता उनकी ओर मुड़ी। उसके नेत्रों में हर्ष भरा था। आश्चर्य था। और और भी कुछ अननुभूत भाव थे।

“गंगा….” वह मेरी ओर विचलित नज़रों से देख रहा था। “  शांतनु ही हूँ.. तुम्हारा शांतनु… किंतु…….”

“किंतु  क्या महाराज”?

“यह धनुर्धर कौन है? इतनी छोटी आयु में कितनी प्रवीणता संपादन की है इसने? आज तक किसी से भी संभव नहीं हुआ… नही नहीं.. जिसके करने की कल्पना भी किसी ने की नहीं होगी.. ऐसा अमानुष पराक्रम इसने किया है। इसका हस्तकौशल मैं कबसे देख रहा हूँ। इसने साक्षात् गंगा का गतिमय तथा तथा विशाल प्रवाह ही रोक दिया है। वह भी कुछ ही क्षणों में। महाआश्चर्य! केवल असंभव! अतर्क्य! किंतु गंगा… यह दिव्य देहधारी सर्वांग सुंदर युवक है कौन ”?

मैं उत्सुकता से उस राजसी भव्य पुरूष की ओर देख रहा था। मेरे पराक्रम से वह  हैरान था। लेकिन मेरी माता का उससे कैसे परिचय था? मुझे रहस्य सा लगने लगा। शांतनु… शांतनु… कौन है यह शांतनु? और इसका मेरी माता से क्या संबंध है?

“महाराज, यही है आपका पुत्र। और देवव्रत ये हैं तुम्हारे पिता… तात.. हस्तिनापुर के सम्राट शांतनु। मिलन का मंगल समय आ गया है।”।

“माता.. क्या रही हैं आप”?

“तात”?

“यह भव्य पुरूष मेरे तात”?

“हस्तिनापुर के दिग्विजयी सम्राट महाराज शांतनु मेरे पिता”?

“ये मैं क्या सुन रहा हूँ”?

आकाश से संपूर्ण देह पर पुष्पवृष्टि होने का अनुभव हुआ। शरीर रोमांचित होने लगा। सारी काया प्रसन्न हुई। मुझे कपि का बच्चा कहनेवाला योगेन्द्र भी पलभर के लिए याद आ गया। पर अब वह सब समाप्त हो गया था। एक पल में सारा संसार बदल गया था। मैं कौन हूँ? इस प्रश्न का अंतिम उत्तर भले ही ना मिला हो लेकिन तो भी मैं एक सम्राट का पुत्र हूँ.. युवराज़ हूँ…. इतना तो  ज्ञात हुआ था। मेरी प्रसन्नता का मयूर पंख फैलाकर नृत्य करने लगा था। कई पराक्रमी सम्राट का मैं उत्तराधिकारी हूँ इस विचार से ही मेरे ह्रदय रूपी समुद्र में ज्वार आया था।

“देवव्रत”?

“तात…..”

और पल भर में मैं उनके बलशाली भुजाओं में समा गया था। उन्होंने मुझे आवेग से अपनी छाती से चिपका लिया। उनके बड़े बड़े अश्रु मेरे कंधे पर गिरने लगे।

“देवव्रत, तुम्हारा यह पिता तुम्हारे और तुम्हारी पवित्र माता की विरहाग्नि में झुलस रहा है। मेरे बच्चे, तुम्हारे दर्शनों से आज मेरा तृषार्त मन शांत हुआ है। इस शांतनु का हस्तस्पर्श हो जाय तो लोगों की बीमारियाँ दूर हो जाती है। वेदना शांत होती है। दग्ध देह भी शांत होती है। किंतु स्वयं शांतनु ही आज तक अंदर ही अंदर जल रहा था। क्योंकि उसका सर्वस्व खो गया था। वह आज मिला है। ” फिर माता की और मुड़कर वे बोले, “ गंगा, चलो,… उस और मेरा रथ सिद्ध है। हम तीनों अब हस्तिनापुर जाएंगे।”?

अश्रु पोंछते हुए माता ने कहा, “ नहीं महाराज, मैं आपके साथ नहीं आ सकूँगी। अगर मैं आ पाती तो मुझे हर्ष ही होता। किंतु नियति का लिखा वज्रलेख मिटाकर नए से लिखा नहीं जा सकता। पर जैसा मैंने वचन दिया है आप का यह दिव्य पुत्र आपको आज सौंप रही हूँ। यह श्रेष्ठतम है। सर्वास्त्रवेत्ता है। सभी शास्त्रों का जानकार है। इसने वशिष्ठ ऋषि से सांगवेद का अध्ययन किया है। बृहस्पति से, शुक्राचार्य से विविध अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है। च्यवन तथा मार्कण्डेय से धर्म ज्ञान प्राप्त किया है और साक्षात् भगवान परशुराम से धनुर्वेद,  अस्त्र शस्त्रों की विद्या का संपादन किया है। यह देवासुरों का प्रिय है। सभी वेदशास्त्र इसमें ही मानो प्रतिष्ठित हैं।  यह मानो विश्व में वंदनीय होने में सक्षम है।  आपके योग्य ही मैंने आपको पुत्र दिया है। आप उसे अपने साथ ले जाइए। किंतु मैं नहीं आ सकती…..।”
“ माता…” मैंने तड़पकर कहा।

“ तुम मेरा त्याग करोगी”?

मेरे प्रश्न से आहत होकर माता मेरी ओर दौड़ी और मुझे अपने आलिंगन में बद्ध करते हुए कहा, “ नहीं मेरे पुत्र.. मैं तुम्हारा कैसे त्याग कर सकती हूँ? पुत्र त्याग का भयंकर दुख जितना तुम्हारी माता ने सहा है उस दुख की कल्पना भी करनेवाली माता इस संसार  के इतिहास में नहीं हुई है। न होगी। पुत्र,यह त्याग नहीं है।.. मैं तुम्हें तुम्हारे पिता को सौंप रही हूँ।

“किंतु आप साथ नहीं आ रही है”?

“नहीं, मैं नहीं आ सकती। मैं तुम्हें उचित समय पर मिलती रहूँगी।” उसने मेरी पीठ थपथपाते कहा।

“ माँ, यह मेरा कैसा भाग्य है? आज तक माता थी। पिता का नाम तक पता नहीं था। आज तात मिल गए और तुम दूर जा रही हो। क्या देवव्रत के भाग्य में दोनों का सुख ही नहीं है”? मैं गदगद हो उठा।

“पुत्र,  तुम्हारा ज़न्म सुख के लिए है ही नहीं। सहन करते रहना यही महापुरूष का जीवन होता है। इस गंगा को तुमने बाणों से रोक दिया था। अब मुझे अपने प्रेम से मत रोको। जाने दो मुझे।” और उसने मुझे दूर कर वहाँ से चली गयी।

“माते….”

वह मुड़कर चलने लगी।

“गंगे….”

“माते….”

वह रुकी।

मुड़कर हमपर एक दृष्टि डाली। उसकी आँखें भर आयी थीं। चिरविरह का शाप भोगनेवाली उसकी  मुद्रा शोक विह्वल हो गयी थी। उसने आँखे भर कर देख लिया और फिर वह  झाडियों में अदृश्य हो गयी।

“तात…” मैं सिसक उठा।

“पुत्र इतना शोक मत करो… चलो”।

“कुछ क्षणों बाद मैंने अपने को संभाल लिया। गंगा के प्रवाह से बाण निकाल लिए। प्रवाह पहले सा बहने लगा। “देवव्रत… चलो।” हम निकले।

…….क्रमशः – अध्याय 4 –  मत्स्यगंधा  – भाग 1  ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग- 9 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत (मराठी)

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-9 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

देवव्रत

इस पृथ्वीतल पर अगाध ज्ञान संपादन करनेवाले कितने ही लोग हैं। ऐसे महामानव कि जिनके सामने साक्षात् हिमालय भी विनय से झुक जाए।

भगवान परशुराम, महर्षी बृहस्पति, वशिष्ठ, शुक्राचार्य, च्यवन, मार्कंडेय कितने नाम लिए जाएं? मैं भगवान परशुराम से अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान लेकर लौटा। उसके बाद महर्षि वशिष्ठ  के पास रहकर वेदों का अध्ययन किया। गुरुदेव शुक्राचार्य से अन्य कुछ शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया, महातेज च्यवन ऋषि और मार्कंडेय से धर्मज्ञान सीख लिया। धर्म का स्वरूप, आचारधर्म, उनका जीवन में स्थान, उसके उपांग आदि का सूक्ष्म अध्ययन किया। इस सब महातपस्वियों के सानिध्य से मेरे व्यक्तित्व में आमूलचूल परिवर्तन आया। विचार, तत्व चिंतन तथा तत्वज्ञान में परिपक्वता आयी। सारासार विवेक का निर्माण हुआ। धर्मतेज प्राप्त हुआ। परप्रेम की अनुभूति  होने लगी।   भिन्न लगनेवाले विश्वचैतन्य की एकता का आकलन होने लगा।

इतना ज्ञान, सामर्थ्य प्राप्त होने पर भी जिज्ञासा उमड़ती ही थी। मेरे तात कौन है?

मैंने माता को यही प्रश्न किया।

“देवव्रत, थोड़ा रुको,शीघ्र ही तुम्हारी उनसे भेंट होगी।” माता ने मुस्कुराकर कहा।

“पर कब”? पूछने के लिए शब्द बिलकुल मेरे अधरों पर आए थे… पर कपूर की तरह वे वहीं पिघल गए।

…….क्रमशः – अध्याय 3 – देवव्रत  – भाग 10  ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ हिंदी का लेखक ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ हिंदी का लेखक ☆

हिंदी का लेखक संकट में है। मेज पर सरकारी विभाग का एक पत्र रखा है। हिंदी दिवस पर प्रकाशित की जानेवाली स्मारिका के लिए उसका लेख मांगा है। पत्र में यह भी लिखा है कि आपको यह बताते हुए हर्ष होता है कि इसके लिए आपको रु. पाँच सौ मानदेय दिया जायेगा..। इसी पत्र के बगल में बिजली का बिल भी रखा है। छह सौ सत्तर रुपये की रकम का भुगतान अभी बाकी है।

हिंदी का लेखक गहरे संकट में है। उसके घर आनेवाली पानी की  पाइपलाइन चोक हो गई है। प्लम्बर ने पंद्रह सौ रुपये मांगे हैं।…यह तो बहुत ज़्यादा है भैया..।…ज़्यादा कैसे.., नौ सौ मेरे और छह सौ मेरे दिहाड़ी मज़दूर के।….इसमें दिहाड़ी मज़दूर क्या करेगा भला..?….सीढ़ी पकड़कर खड़ा रहेगा। सामान पकड़ायेगा। पाइप काटने के बाद दोबारा जब जोड़ूँगा तो कनेक्टर के अंदर सोलुशन भी लगायेगा। बहुत काम होते हैं बाऊजी। दो-तीन घंटा मेहनत करेगा, तब कहीं छह सौ बना पायेगा बेचारा।…आप सोचकर बता दीजियेगा। अभी हाथ में दूसरा काम है..।

हिंदी के लेखक का संकट और गहरा गया  है। दो-तीन घंटा काम करने के लिए मिलेगा छह सौ रुपया।… दो-तीन दिन लगेंगे उसे लेख तैयार करने में.., मिलेगा पाँच सौ रुपया।…सरकारी मुहर लगा पत्र उसका मुँह चिढ़ा रहा है। अंततः हिम्मत जुटाकर उसने प्लम्बर को फोन कर ही दिया।…काम तो करवाना है। ..ऐसा करना तुम अकेले ही आ जाना।..नहीं, नहीं फिकर मत करो। दिहाड़ी मज़दूर है हमारे पास। छह सौ कमा लेगा तो उस गरीब का भी घर चल जायेगा।…तुम टाइम पर आ जाना भैया..।

फोन रखते समय हिंदी के लेखक ने जाने क्यों एक गहरी साँस भरी!

©  संजय भारद्वाज

रात्रि 1.11 बजे, 27.7.2019

# आपका दिन सृजनशील हो।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग- 8 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत (मराठी)

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-8 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

देवव्रत

आचार्य ने मुझे कई अस्त्रों की जानकारी दी थी। मुझे मंत्र तुरंत कंठस्थ हो जाते थे। उनकी विशिष्ट क्रिया भी मैं शीघ्र ही आत्मसात किया करता था। इस कारण आचार्य मुझ से बहुत खुश थे।  मैंने अस्त्रविद्या में उत्तम प्रदर्शन किया और आचार्य सुंतुष्ट होकर बोले, “ गांगेय, मेरे सभी शिष्यों में तुम ही सर्वश्रेष्ठ हो। अद्वितीय हो। इतना समुद्र सा सामर्थ्य, आसमान सा बुद्धि-वैभव और उसके साथ हिमालय जैसी विनयशीलता… ऐसा संगम जिस व्यक्तित्व में होता है वह लोकोत्तर व्यक्तित्व बनता है। जो किसी किसी युग में ही प्रकट होता है। तुम्हारे जैसा शिष्य मिलना भाग्य की बात है। क्योंकि ऐसे प्रतिभाशाली शिष्य से गुरु तथा गुरुकुल की कीर्ति दिगंतों तक पहुँचती है। गुरु और गुरुकुल प्रकाशमान हो जाते हैं। मुझे तुम्हारा अभिमान है। तुम्हें जितना सिखाना मुझसे संभव हो सकता था उतना मैंने तुम्हें सिखा दिया है। मेरी दृष्टि में अब तुम पारंगत हो गए हो। सर्व विद्याविशारद बन गए हो। तुम्हें अब अपने नियत कार्य के लिए  यहाँ से प्रस्थान करना आवश्यक है।”

मेरी आखों में आषाढ़ के बादल छा गए। गदगद ह्रदय से मैंने हाथ जोड़े और कहा, “ भगवान मैं तो बस एक पाषाण था, आपने उससे जो एक अद्भुत शिल्प का निर्माण किया है उसका सारा श्रेय केवल आपको ही जाता है। मैं मात्र विनय के लिए नहीं कह  रहा हूँ अपितु ये मेरे ह्रदय के भाव है। प्रभू, मैं कौन हूँ मुझे विदित नहीं है। मेरे जीवन में नियती कौनसा पासा फेंकनेवाली थी इससे मैं अनजान था। इसलिए जब जब  मेरी महामाता, गुरुदेव बृहस्पति और आप  मेरे भविष्य की ओर संकेत करते हैं तब मुझे भ्रांति सी हो जाती है। आप के लिए ये संकेत स्पष्ट होंगे लेकिन मेरे लिए संदिग्घ होते हैं। कुछ क्षणों के लिए चित्त विचलित हो जाता है, अंतःकरण थर्रा उठता है। ऐसे समय में मैं आप के भव्य व्यक्तित्व का स्मरण करता हूँ और मेरी निराशा काक पक्षियों के झुंड़ की तरह दूर उड़ जाती है। अंतःकरण नये उत्साह और प्रकाश से भर जाता है। जीवनयापन के लिए असीम बल प्राप्त होता है।”

मैं रुका।

शिष्यगण सुन रहे थे।

मेरे स्तब्ध होते ही अपने घने केश पीछे की ओर करते हुए उन्होंने कहा, ‘देवव्रत,…. तुम कौन हो और इस भूतल पर तुम क्यों अवतीर्ण हुए हो यह तुम्हें यथा समय मालूम होगा। किंतु किसी भी घटना से विचलित होने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं है यह बात हमेशा ध्यान में रखना। भले ही हिमालय पर्वत तुम पर आकर गिरे तो भी बायें हाथ से उसे आसमान में उछालने का सामर्थ्य तुम में है, इसका कतई विस्मरण नहीं होने देना। तुम्हारे मार्ग में साक्षात् महासागर भी नहीं आ सकता। क्यों कि यदि तुम चाहो तो सागर का मार्ग भी बदल सकते हो, अपने पराक्रम की ऊर्जा से उसे दग्ध कर सकते हो… यह वह जानता है।” विचार मग्न होकर आसमान में उठे रवि बिंब पर अपनी दृष्टि स्थिर करते हुए धीर गंभीर स्वर में उन्होंने आगे कहा, ‘’गंगानंदन, सामान्य मनुष्य सदैव असामान्य होने की इच्छा  रखता है। किंतु उसे ज्ञात ही नहीं होता कि वह कितना सुखी है। असामान्यों के सुख क्षुद्र होते हैं किंतु उनके दुख असमान्य होते हैं। ऐसे तीव्र क्लेशकारी दुख सहन करने का चिरशाप इन असामान्यों को ही मिला है। गांगेय,  अपने गर्भकोष में जिसने हमें नौ महीने पाला पोसा हो, अपने खून से बना दूध पिलाया हो, प्रसुति के समय जिसने मृत्यु जैसी असहनीय यातना सहकर हमें ज़न्म दिया हो, जिसने मृत्यु के कराल जबडे में अपना जीवन ड़ालकर हमें जीवन दिया हो… ऐसी माता को … जीवनदायिनी को.. बोलो देवव्रत कौन राक्षस मार सकता है? भला ऐसा कौन पापी वीर  होगा जो उसके कंठ पर अपने तेज़ शस्त्र का प्रहार करेगा”?… आचार्य बहुत व्यथित हुए थे।

‘’भगवान…” मैंने बस इतना ही कहा।

उनकी भव्य  देह कांप रही थी।

उन्होंने अपनी नम आंखे पोंछकर सूर्य से अपनी नज़र हटाकर मुझपर स्थिर करते हुए कहा, ‘हां देवव्रत, वह नीच मनुष्य मैं ही हूँ। वह घोर पापी मैं ही हूँ। महन्मंगल माता के कमल पंखुड़ी सी कोमल गर्दन पर मृत्य का प्रहार करनेवाला निर्दयी पुत्र मैं ही हूँ….”।

‘’किंतु आचार्य….”

‘’हाँ, बोलो…”

‘’किंतु वह तो आपने अपने पिताजी के क्रोध से मुक्त होने के लिए अपनाया मार्ग था न? वह तो वचनपूर्ती थी… पितृ आज्ञा का पालन था और फिर आपने माता का जीवन भी मांग लिया था।।”

‘’हाँ देवव्रत, वह सब सत्य है। किंतु फिर भी मातृ हत्या यह पाप ही है।  जिसका कतई समर्थन नहीं हो सकता। वह  क्षम्य नहीं है। किंतु तुम इसको समझो कि नियति ने मेरे हाथों से क्यों करा लिया है? असमान्यों का दुख हालाहल जैसा होता है”।

“ जी, आचार्य।”

“ देव…. ऐसे प्रसंग तुम्हारे जीवन में  भी आएंगे।… ध्यान रहें, यदि किसी समय मेरे विरुद्ध भी अगर तुम्हें अपने शस्त्र उठाने पडे तो डगमगाना नहीं।”

“आचार्य”?

“अचंभित ना होना। नियति की योजना के सामने सारे नाते रिश्ते पके हुए फल की तरह टपटप गिर जाएंगे। उसके सामने हम हताश हो जाते हैं। यह हताशा साधारण लोगों की समझ में नहीं आती। असाधारणों को उसका अनुभव होता है। यही उनका दुख होता है। दुख की जड में भी ज्ञान का होना आवश्यक है। नहीं तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है, देवव्रत”?

“ अं”? मैंने उनकी ओर देखा।

“ यहाँ कुछ भी हो सकता है। आसमान में दिव्य तेज से चमकनेवाले तारे क्षण में धरती पर अधःपतित हो जाते हैं और भूतल पर सोया सागर बाष्प ओर मेघों के रूप में आसमान में संचारित होने लगता है। कौन कह सकता है कि हिमाच्छादित हिमालय किसी दिन अपना विशाल मुंह खोलेगा और उससे भयंकर ज्वालामुखी तांड़व करते फट जाय। कुछ भी हो सकता है। भविष्य का पेट काटकर वहाँ से कौन कौन से रहस्य छिपे बैठे हैं यह हम नहीं देख सकते।  संभवतः कल कोई ऐसा भी दिन आ सकता है  जब हम गुरु शिष्य न बनकर एक दूसरे के प्रतिस्पर्धि बनकर एक दूसरे के सामने खड़े हो जाएं।”

“गुरुदेव”?

“ देवव्रत…” मुस्कुराते हुए मेरी पीठ थपकाते उन्होंने कहा, “ ऐसा ही होगा ऐसा नहीं है। मैंने केवल संभावना जतायी। साधारण लोग कुछ अच्छा घटित होने की आशा रखते हैं। असाधारण लोग बुरे से भी बुरा होगा ऐसा सोचकर उससे  जूझने को सदैव सिद्ध रहते हैं। तुम्हें यही भूमिका निभानी है।.. गंगा के महापुत्र… मेरा सदैव तुमपर आशीर्वाद है।”

मैंने उनके चरणों पर भक्तिभाव से अपना मस्तक टिकाया। मैं अपना भावावेग रोक नहीं सका और आचार्य के गुलाबी चरण मेरे आँसूओं से भीगने लगे।

“आयुष्मान भव, विजयी भव”। आचार्य की दमदार आवाज़ आसमान में उभरी… और उसकी प्रतिध्वनि मेरे रोम रोम में गूँजने लगी और बहुत सारी ज़िम्मेदारीयां मुझ पर आ गयी है इसका अकारण अहसास हुआ।

…….क्रमशः – अध्याय 3 – देवव्रत  – भाग 9  ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग- 7 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

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(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-7 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

देवव्रत

उस घटना के बाद मैंने अपना सारा ध्यान युद्धशाला में केन्द्रित किया। भगवान मुझे अखंड़ सिखा रहे थे। मैं सारा ज्ञान आत्मसात कर रहा था। मेरी प्रगति देखकर वे प्रमुदित हो रहे थे और अन्य अचंभित।

मुझे संभवतः सभी शास्त्रों की जानकारी मिल गयी थी। मैं उसे बड़ी ही कुशलता से प्रयोग में ला रहा था। गदा, खड्ग, चक्र, परीघ, शूल, तोमर, शतघ्नी, पट्टा आदि शस्त्रों को मैं खेल ही खेल में चलाने लगा। मैंने इसके लिए काफी परिश्रम किया था। उसका मुझे लाभ भी हुआ।

इन सभी शस्त्रास्त्रों में मेरी विशेष रुचि घनुर्विद्या में थी। मानों धनुष ही मेरा जीवन था। बाण मेरे प्राण थे। इसलिए धनुर्विद्या का गहन ज्ञान मैंने पा लिया था। विविध प्रकार के बाणों का प्रयोग करने का तो जैसे मुझ पर पागलपन ही सवार हो गया था। एक पल भी न गंवाते हुए मैं सतत धुनर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। कई प्रकार के बाण थे, सीधे थे, मुख वैचित्र्यवाले थे। कुछ में दंड़ की भिन्नता भी थी। कुछ बाण ऐसे थे जो विविध अस्थियों के द्वारा बनाए गए थे जिनका प्रयोग विशेष प्रयोजन के लिए होता था। हाथी के अस्थियों से बना गजास्थि, गवि की अस्थियों से गवास्थि, काले रंग का कपिश बाण, जिनसे शत्रु को घृणास्पद उग्रगंध की पीड़ा हो ऐसा पूतीबाण, सर्पमुखी, अंजलिर, अश्वास्थि, नाराच, निसित, सुवर्णपंक, कंकमुख, सन्नतपर्व, क्षुरप्र, कंकपत्र, नतपर्व आदि ऐसे कई प्रकार के बाणों की मुझे जानकारी थी और कुछ बाणों की कुछ विशिष्ट बातें थीं। नास्तिक नाम का बाण बहुत ही चमत्कारिक था। वह बाण जब अपने लक्ष्य की देह में धँस जाता और जब उसको निकाला जाता जब उसका नोकवाला भाग अंदर ही धँसा रह जाता और मात्र दंड़ ही हाथ में आ जाता था।

सूची बाण नुकीला तथा पतली सी पूँछवाला होता था। सूक्ष्म लक्ष्य को भेदन करने के लिए यह बहुत उपयुक्त था।  युद्ध में हाथी हो या अश्व इस बाण से उनकी आँखों की पुतलियों का अचूक निशाना साधा जा सकता हैं। नालिक बाण की रचना ही भिन्न थी। क्योंकि उसकी पाती मोटी थी और उसके दाँत वक्र थें। इसलिए शरीर में घूसने के बाद उसको निकालना मुश्किल था… उसको बाहर निकालते समय धमनियों का जाल ही बाहर निकलकर आता है। कर्णी बाण की करनी ही विपरीत थी। क्योंकि उसके दो शुलाग्र थे। वह देह से बाहर आते समय आतडियों को लेकर ही बाहर आता था। लीप्त एक भयानक बाण था। उसकी नोक पर सर्प या वृक्ष का ज़हर लगाया जाता था। उससे त्तत्काल प्राणघात हो जाता था। मुझे इन सबकी सविस्तार जानकारी मिली। मैं अविरत प्रयत्नों से, अभ्यास से, कुशलता से ये सारे तीर चलाने लगा। अचूक निशाना साधने लगा। मेरा हस्तकौशल तथा चपलता देखकर भगवान परशुराम ने स्मित हास्य करते हुए कहा,

“देवव्रत, तुम्हारा बाणों का फेंकना देखकर ऐसा लगता है कि जिस किसी ने इस शस्त्र का निर्माण किया है उसकी आँखों के सामने तुम ही रहे होगे। इस शस्त्र का निर्माण तुम्हारे लिए ही हुआ है और तुम्हारा जन्म भी इनके लिए ही हुआ है। अब तुम्हें अधिक कुछ सिखाने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहा है। मैं कल से तुम्हें अस्त्रविद्या सिखाना शुरु करता हूँ।”

भगवान के वे शब्द सुनते ही मेरा शरीररूपी पलाशवृक्ष खिलकर लाललाल हो गया।

…….क्रमशः – अध्याय 3 – देवव्रत  – भाग 8  ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-6 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

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(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-6 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

देवव्रत

मैं शीघ्र ही भगवान के आश्रम में रम गया। शस्त्रास्त्रों की शिक्षा देने के लिए उन्होंने आश्रम से कुछ दूरी पर एक युद्धशाला का भी निर्माण किया था।

बिलकुल दूसरे दिन से ही उन्होंने मुझे जानकारी देना प्रारंभ किया। मैं सब आत्मसात कर ले रहा था। छोटी छोटी बातों को भी मैं विस्तार से पूछ लेता था। कोई भी ज्ञान मूल से सीख लेना चाहिए यह मुझे आचार्य बृहस्पति ने बताया था। और यह बात मेरे व्यक्तित्व में ही सहजता से घुलमिल गयी थी। उसका यहाँ उपयोग हो रहा था। मेरी आशंका मूलभूत होने की सानंद  प्रचीती वे दिया करते थे और उस आशंका का निवारण भी किया करते थे। मैं शीघ्र ही उनका प्रिय शिष्य बन गया।

उनके अन्य शिष्य मेरे मित्र बन गए। उनमें से शाल्व नामक सौभ राष्ट्र का राजकुमार मुझे बहुत प्रिय था। वह मुझ से बहुत छोटा था। इतनी छोटी आयु में उसे भगवान के आश्रम में आने की क्या आवश्यकता थी?  किंतु उसकी ज़िद  प्रशंसा करने योग्य थी। ‘जो जो दूसरों को आता है  वह सारा मुझे आना ही है’ ऐसी उसकी ज़िद थी। इसकारण वह छोटा सा राजकुमार अपने गोरी देह से न उठाये जानेवाले कष्ट भी करने  के लिए तैयार रहता था।

शाल्व सतत मेरे साथ रहा करता था। गायों का दोहन हो, शुष्क काष्ठ लाने हो या फिर गायों को  चराने ले जाना हो वह सतत मुझसे चिपका रहा करता था। जैसे डंठल के साथ फूल।

एकबार पर्वत पर जाते समय उसने कहा, “देवव्रत”

“हाँ बोलो”

“क्या हम थोडी देर रुक जाय?”

“क्यों?”

“ पैरों में  पीड़ा हो रही है। वेदना से पैर दुख रहे हैं। थोड़ा विश्राम करते हैं। फिर चलेंगे। ”

“ठीक है।”

एक विशाल वृक्ष के नीचे एक बड़े से शिलाखंड़ पर हम स्थानापन्न हो गए। मंद हवा चल रही थी। पर्णजाल सरसरा रहे थे। वन से विविध श्वापदों की आवाज़ आ रही थीं। हम जिस वृक्ष के पास बैठे थे उसके पीछे से निर्झर बह रहा था। शीतल छाया और निर्झर के सानिध्य से वहाँ  आल्हाददायक वातावरण का निर्माण हो गया था।

“देवव्रत…”

“बोलो शाल्व….”

“तुम कितने सुंदर हो.. कितने भव्य हो… एकदम भगवान की तरह।”

“अरे छोडो…”

“सच में… तुम्हारी ओर सतत देखने को मन करता है। तुम्हारा शरीर देखो गोरा गोरा और लाललाल… मानो दूध में सूर्यबिंब को डूबोया गया हो। तुम्हारे घने नीले नेत्र.. तुम्हारी मज़बूत शक्तिशाली देह… देवव्रत….” वह मेरे शरीर की ओर टकटकी लगाकर देख रहा था।

“क्या?” मुझे संकोच हुआ।

उसकी प्रशंसा से मैं सकुचाया।

“मैं पुरुष हूँ फिर भी तुम्हारा व्यक्तित्व मुझे मोहित करता है तो फिर कुमारिकों को उसका कितना मोह  होता होगा? वह पागल होकर तुम्हारे पीछे ही लग जाएंगी.. है ना?”

“शाल्व, यह कैसे विचार तुम्हारे मस्तिष्क में आ रहे हैं? हम महाजेतस्वी आचार्य परशुराम जी के आश्रम के शिष्य हैं। संभवतः यह तुम भूल गए हो। शरीरबल प्राप्त करना और अस्त्र शस्त्र विद्या में पारंगत होना हमारा ध्येय है।” मैंने उसे हल्के से डाँटा।

तो वह झिझक गया।

“देव, तुम जो कह रहे हो वह उचित ही है। किंतु मेरे मन में जो आया उसे मैंने कह दिया। हम शरीरबल प्राप्त तो कर ही रहे हैं और आखिर उसका आनंद तो स्त्रीसंग में ही तो होता है न?”

“शाल्व, अपनी आयु के अनुसार तो तुम कुछ ज्यादा ही सोच रहे हो। तुम्हारे जीवन का कोई ध्येय है भी या नहीं? आत्मसंयम का तो तुम्हें भान तक नहीं है। ”

‘है, पर उस होश की भी कुछ मर्यादाएं हैं। जीवन का हर सुख मुझे आकर्षित करता है। मैं शारीरिक बल और अस्त्र का उपयोग निसंदेह जन कल्याण के लिए ही करूँगा। किंतु…’? उसने मुग्ध होकर हँसते हुए कहा और सहेतुक रुका।

‘बोलो न…।’

‘किंतु मुझे तीव्रता से लगता है कि कोई सुंदर रूपगर्विता राजकुमारी मुझसे नितांत प्रेम करे… उतनी ही उत्कटता से मैं भी उससे प्रेम करूँ…. उससे मेरा विवाह हो… और हम प्रेम सागर में डूबकर संतोषपूर्ण जीवन जीते हुए प्रजाहित करते रहें… बस.. मेरा यही ध्येय है… भविष्य का मेरा यही स्वप्न है। ’

‘तुम्हारा स्वप्न बहुत अच्छा है। किंतु मुझे इसमें कोई रुचि नहीं है।’

‘देवव्रत…’

‘हं’?

‘मुझे कभी कभी डर लगता है।’

‘किसका’?

‘कहीं कोई मेरे इस सपने में बाधा बनकर आएगा तो? कोई मेरे इन सपनों के टुकड़े टुकड़े तो नहीं कर देगा तो? वह भविष्य की चिंता से अभी व्याकूल हो गया। वह बहुत भावुक था। मुझे सचमुच उसकी उस मनःस्थिति को देखकर हँसी ही आयी थी। पर मैं चुप रहा। कारण वह ह्रदय से बोल रहा था।

‘शाल्व… तुम अकारण ही चिंता कर रहे हो। भला कोई क्यों तुम्हारा स्वप्नभंग करेगा? मान लो यदि कोई राजकुमारी अगर तुम पर आसक्त हो जाए तो फिर तुम्हारे पवित्र प्रेम में भला कौन किसलिए बाधा डालेगा?’  प्रेम जल जैसा होता है। यदि कोई उसमें लाठी भी चला दे तो वह टूटता नहीं। और मानो लो… ”।

“क्या”?

“वैसे तुम्हारे प्रेम के मार्ग में कोई बाधा भी डाले तो तुम तो अपने शारीरिक बल से उस विघ्न संतोषी मनुष्य से निपट ही सकते हो। तुम्हारे शस्त्रसामर्थ्य, अस्त्रज्ञान का उपयोग कब होगा”?

“सच है, तो भी”?

“तो भी क्या”?

“यदि विघ्न लानेवाले व्यक्ति का बाहुबल मुझसे भी अधिक होगा तो”?

“शाल्व, तुम्हें यह सतत ध्यान में रखना होगा कि प्रेम की सफलता के लिए पराक्रम की आवश्यकता होती है। इसलिए वह सामर्थ्य तुम यहाँ संपादन कर लो।” मैंने इस चर्चा को समाप्त करते हुए कहा।

“देव…” उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर भावविह्वल होकर कहा।

“बोलो…”।

“तुम प्रचंड पराक्रमी हो। तुम्हारा सामर्थ्य अतुलनीय है। तुम अजेय हो।”

मैंने केवल स्मित किया ।

“यदि मुझे कभी तुम्हारी आवश्यकता पड़ी तो… तो तुम मेरी मदत करोगे, ऐसा वचन मुझे तुमसे चाहिए… अभी इसी क्षण…।” उसने ठानकर कहा।

और उसी क्षण…

वनराज सिंह की कानों को फाडनेवाली महारव गर्जना पीछे की झाड़ी से आयी और हम पीछे मुडकर देखे कि इतने में ही वह प्रचंड सिंह शाल्व पर आकर टूट पड़ा।

वचन के लिए आगे बढ़ाया हुआ उसका हाथ मेरे हाथ से फिसल गया और वह नीचे गिर गया।

“देव… बचाओ…” वह भय से चिल्ला पड़ा।

मैं हैरान था।

क्षणभर मुझे समझ में ही नहीं आया कि हो क्या रहा है। क्षणभर पहले भावुक होकर भविष्य के सुनहरे सपने देखनेवाला युवराज शाल्व मृत्य के पाश में जकड़ गया था। मनुष्य के सपने सच होगें ही इस आशावाद के लिए कोई आधार ही नहीं है। भावी जीवन का प्रेम-तृप्त जीवन तो दूर ही रहा.. जीवन की निश्चिचता ही नहीं रही। इस संसार में मृत्यु जैसी घातक चीज़ नहीं है। जिसपर  तिलमात्र भरोसा रखना भी असंभव है। मृत्यु को भावनाएं नहीं होती। किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं होता। उलटे आकस्मिक आक्रमण करके  अभी अभी  खिले अकुंर को मसल देना उस क्रूर काल को अधिक प्रिय होता है। मृत्यु इस क्षण बनराज के रूप में शाल्व के साथ घातक खेल खेल रही थी जैसे बिल्ली का चूहे के साथ खेल, मौज उडाना और फिर उसकी हत्या करना।

“देव… मर गया मैं….”

मैं क्षणभर में सचेत हुआ। उस बलशाली शेर की दृष्टि हतबल पड़े  शाल्व के गले पर स्थिर थी। वह निर्णय का क्षण था। एक क्षण का भी विलंब अक्षम्य होनेवाला था। मेरा रक्त  जंगली अश्व की तरह खौल उठा और मैं सागर लहरी के समान उछल पड़ा। मैने अपनी मज़बूत पकड़ उस पगलाए शेर के गले के इर्द गिर्द जकड़ ली। मैंने अपनी दांयीं बांह से उसका गला जकड़ लिया और उसे ऊपर की तरफ खींच लिया। वह शक्तिमान था। पर मेरा सामर्थ्य निश्चित ही कम नहीं था। मेरे उस बलशाली वनराज को ऊपर उठाते ही शाल्व मुक्त हुआ और बड़ी चपलता से और प्राणों को बचाते तत्काल परे हट गया और कांपते हुए देखने लगा।

अब मेरी उस शेर के साथ अच्छी खासी मुठभेड़ शुरु हुई थी। मैंने उसका गला जकड़ लिया था। वह चिघांड़ रहा था उसकी साँस उखड़ गयी थी। फिर भी वह चिंघाड़ रहा था।  पर मेरी पकड़ मज़बूत थी। इतने में ही उसने मुझे अपने शरीर से दूर फेंक दिया। मैं पास की लताओं के झुरमुट पर जा गिरा। पूंछ ऊँची उठाकर और घनी आयाल  घास की तरह फूलाकर वह मेरी ओर क्रुद्ध होकर उछला।

“सावधान… देवव्रत” शाल्व ने चिल्लाकर कहा।

मैं सावधान तो था ही।

मैं झट् से खड़ा हो गया। मेरी भूजाएँ नीलवृक्ष की शाखा सी आगे बढ़ीं… और दांत पीसते हुए वह मुझ पर चढ़कर आने लगा उस शेर का जबडा मैंने दोनों हाथों से पकड़ लिया। बायें पंजे में ऊपर का जबड़ा और दांये पंजे से नीचे का जबडा पकड़ कर मैं उसे तानने लगा.. मेरे हाथ के स्नायू तनने लगे। हाथ की शिराएं फूलने लगीं। रक्तप्रवाह बिजली सा दौड़ने लगा। मेरी देह की सारी ताकत अब मेरी कलाई में समा गयी थी। मैं उस शेर को हिलने भी नहीं दे रहा था। उसके तीक्ष्ण दाँत मुझे स्पष्ट दीखाई दे रहे थे। उसकी लंबी, लाचिली जीभ अग्निशिखा सी हिल रही थी। वह अपने तेज़ नाखूनों से मुझे फाड़ने का हर प्रयास कर रहा था। पीछे के पैर मिट्टी में घँसा रहा था। किंतु मेरे सामर्थ्य के सामने उसका कुछ भी नहीं चल सका। इससे वह और भी क्रुद्ध हो रहा था।

मैंने सारी शक्ति अपने हाथों में स्थिर कर दी और उसका जबडा ऊपर का ऊपर और नीचे का नीचे करते हुए महत्प्रयास से फाड़ दिया.. बबूल के वृक्ष की छाल छिलने की तरह।

रक्त का फौंवार मेरे सर्वांग पर उछल गया ..और…

आखरी चिंघाड़ भी न देकर वह महाकाय वनराज़ नीचे गिर गया। उसके पीछे के पैरों में कुछ क्षण हलचल हुई, पूँछ हिलती रही फिर सब शांत हो गया।

फिर मैंने उसके पीछे के पैर पकड़कर उसको ऊपर उठाया और गर्रगर्र घूमाकर उसकी मृतदेह खाई में फेंक दी।

इतनी देर तक यह रोमांचकारी युद्ध देखनेवाला शाल्व मेरे पास आया और बोला, “ हे महाबली देवव्रत, निसंदेह तुम इस संसार के सर्वश्रेष्ठ योद्धा बनोगे। तुमने मुझे बचाया है। मुझे अब विश्वास हो गया है कि आगे के  जीवन में तुम मेरे सहायक होंगे। मुझे तुम्हारे वचन की भी आवश्यकता नहीं है। तुम्हें अधिक चोट तो नहीं आयी न”?

“नहीं”। मैंने हँसकर कहा।

“चलो, तुम्हारे इस भव्य शरीर पर उछले रक्त के दाग हम जल से साफ करते हैं।” और वह मेरी बांह पकड़कर निर्झर की दिशा की ओर मुझे ले जाने लगा।

…….क्रमशः – अध्याय 3 – देवव्रत  – भाग 7  ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-5 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत (मराठी)

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-5 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

देवव्रत

सभी शास्त्रों में मेरा प्राविण्य देखकर माता का ह्दय प्रलय सा आनंद से उमड़ पड़ा। उसने मुझे आवेग से आलिंगन में ले लिया और मेरे विशाल कंधों पर अपनी  ठोड़ी रखकर कहा, “ देवव्रत, पुत्र, इतनी छोटी आयु में तुमने इतना सारा शास्त्र आत्मसात किया है। वास्तव में तुम्हारी बालबुद्धि पर मुझे इतना बोझ नहीं डालना चाहिए था। किंतु इस भूतल पर तुम्हारे जैसे बालक इसलिए पैदा होते हैं कि वे सारे विश्व का भार अपने कंधे पर ले सकें। सारी धरती को संभाल सके। पुत्र, अब इतने पर ही रुककर नहीं चलेगा। सारे शास्त्र तुम्हें अवगत हों तब भी शरीर सामर्थ्य के बिना शास्त्रज्ञान को महत्व नहीं है। शरीर सामर्थ्य महासागर की तरह प्रचंड होना चाहिए और उसमें ज्ञान सूर्य की सर्वगामी किरनें चमचमा उठें। तभी परिपूर्ण व्यक्तिमत्व साकार होता है। तुम्हें अब मैं भगवान परुशुराम के पास ले जाती हूँ। वहाँ तुम्हारी आगे की शिक्षा पूर्ण होगी।  वहाँ तुम्हारा आगे का अध्ययन होगा।”

भगवान परशुराम के बारे में मैंने बहुत कुछ सुना हुआ था। अधिक जानकारी के लिए मैंने माता से पूछा, “माता, परशुराम के बारे में कुछ और बताइए ।”

“देव, महातेजस्वी और्व का पुत्र था ऋचिक। ऋचिक का पुत्र जमदग्नि। जमग्दिन एक महाक्रोधी ऋषि थे। जमदग्नी के चार पुत्र थे। उनमें से सबसे कनिष्ठ परशुराम । किंतु यही परशुराम श्रेष्ठ गुणों से संपन्न हैं। वे जितेन्द्रिय हैं। सभी शास्त्रों में पारंगत हैं। रेणुकानंदन परशुराम जैसा धनुर्धर वर्तमान में तो इस भूतल पर कोई नहीं है। अस्त्र, धनुर्विद्या और शास्त्रविद्या उनसे ग्रहण करो, जिससे तुम अवद्य, अजेय बन जाओगे।”

माता के साथ मैं महेन्द्र पर्वत की चढ़ाई चढ़ने लगा। भगवान परशुराम का वास वहीं था।

नीले पर्वतशिखरों से महेन्द्रपर्वत सजा हुआ था। वह घना जंगल था। महेन्द्रपर्वत का वन डंडणी, सांतवण, शाल, किंशुर, तमाल, पुन्नाग, मधुक, पाटल, कटक आदि घने वृक्षों से संपन्न था। चित्तर, चंडोल, लटवाक, चक्रवाक, क्रोंच, सारंग, कारंडव आदि विभिन्न पक्षियों की फड़फड़ाहट तथा उनकी चहचहाट से वह पर्वत भरा था। सूर्य की किरनों तथा वृक्षों के पर्णसंभार में मानो युद्ध ही चल रहा था। पेड़ पत्तों तथा लताओं की घनी उलझनों से सूर्य किरनों को धरती तक पहुँचना कठिन हो रहा था। किंतु कुछ चालाक किरनों के तीर आड़े तिरछे होकर किसी तरह नीचे आ रहें थे, कम से कम ऐसा लग तो रहा था।

“ हे, स्वर्ग की गंगा, इस महेन्द्र पर्वत पर यह जमदग्न तुम्हारा स्वागत करता है।” अचानक बादल के फटने के समान एक ध्वनि कर्णपटल पर आकर टकरायी और मैंने झट् से उस दिशा की ओर देखा।

हिमालय के धवल शिखर से भव्य भगवान परशुराम खड़े थे। हाथी की पीठ के समान उनके विस्तृत स्कंध, साल की शाखा से उनके बलदंड़ बाहू, मेरु पर्वत के समान सीधी ऐंठी देह… भगवान अत्यंत सुंदर तेजस्वी लग रहे थे। उनकी गोलाकार मुद्रा लाल-लाल थी। असीम रक्ततेज उनकी चर्या पर खिल रहा था। उनकी घनी जटाएं थीं। कुंतल घने काले थे। छाती पर लहरानेवाली उनकी काली दाढ़ी उनकी भव्यता बढ़ा ही रही थी।  उन्नत भाल, सीधी नासिका और तेजःपुंज नेत्रों  से उनका चेहरा उदात्त और प्रसन्न लग रहा था। मैं अनजाने आगे बढ़ा और उनके चरणों पर अपना मस्तक रखा। उनकी लंबी उंगलियाँ पीपल की जडों जैसी लगीं।

“आयुष्मान भव” उन्होंने आशीर्वाद दिया और मुझे उठाकर खड़ा किया। मेरे कंधे थपकाते हुए उन्होंने कहा, “गंगा, यही है ना तुम्हारा पुत्र?”

“हाँ भगवान।”

“मेरे जितना ही ऊंचा है। सुंदर। गंगा, मेरे शिष्यों ने तुम्हारे आगमन का समाचार दिया था ।”

घनी झाडियों में से जानेवाली संकरी पगडंडियाँ चढ़कर हम ऊपर महेन्द्र पर्वत पर आ गए। आश्रम विशाल था।

वहाँ कई सारी पर्णकुटियाँ थीं। वह संभवतः ज्ञानपिपासु शिष्यों के लिए थीं।

आश्रम के बीचोंबीच एक यज्ञकुंड़ था।

पर्णकुटी के उस ओर एक विशाल गोशाला थी.. किंतु अब वह खाली थी। वहाँ की गायें वन में चरने के लिए गयी होंगी।

भगवान की पर्णकुटी के सामने हम स्थानपन्न हो गए । पर्वत चढ़ते समय पहाडियों से झरनेवाले निर्झरों से ही हम पैदल चलकर आए थे इसलिए चरण प्रक्षालन की आवश्यकता नहीं थी। एक शिष्य ने मधुर फलों की एक टोकरी और दूध लाकर रखा। फलाहार के बाद माँ ने कहाँ, “भगवान।”

“बोलो।”

“देवव्रत को आपके पास छोड़ने के लिए मैं आयी हूँ। महर्षि बृहस्पति के पास उसने शास्त्र ज्ञान प्राप्त किया है। मेरी कामना है कि अब वह आपसे धनुर्वेद, शास्त्र तथा अस्त्रविद्या आदि का ज्ञान प्राप्त करे। आपका पारस स्पर्श अगर हो जाए तो वह कंचन के तेज से चमक उठेगा। भगवान क्या आप उसका शिष्य के रूप में स्वीकार करेंगें? ” माता ने उनकी भव्य मुद्रा निहारते हुए पूछा।

मैं भी उनकी ओर कौतुहल से देख रहा था। किंतु उनके चेहरे पर दृष्टि का स्थिर होना असंभव था। सूर्यगोल पर नेत्र रखने का अनुभव ही होगा। वहाँ के वातावरण पर उनकी मोहिनी पड़ी हुई थी। वहाँ के अणुरेणु पर उनका प्रभाव था। उनके दिव्य व्यक्तित्व की अपनी अमीट छाप सबपर पड़ी हुई थी।

मेरे मन में आशंका जाग गयी। कारण मैं उनके क्षत्रिय द्वेष को जानता था। और मैं क्षत्रिय था। भगवान मुझे मना तो नहीं कहेंगे ना?

उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। अपनी गदा सी गर्दन ऊपर की ओर कर वे मानो भविष्य में कुछ देख रहे थे। फिर एक दीर्घ श्वास छोड़कर प्रसन्नचित्त होकर बोले, “गंगा, तुम्हारा पुत्र अद्वितीय है। महाप्रतापी है। साक्षात् ज्ञानरवि बृहस्पति से उसने शास्त्र आत्मसात किया है। इसलिए उसकी मुद्रापर ब्रह्मतेज विलसित हो रहा है। मैं उसका शिष्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। यह मेरा शिष्य जगदवंद्य होगा….”

…….क्रमशः – अध्याय 3 – देवव्रत  – भाग 6  ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-4 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

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(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

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☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-4 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

देवव्रत

        गुरुदेव बृहस्पति अर्थात् ज्ञान का महासागर। उनकी ज्ञानकक्षाएं आसमान की तरह थीं और उनकी मति साक्षात् सूर्य जैसी थी।

उनके मुख से सतत स्त्रवित होनेवाली ज्ञानघारा में मैं शुचिर्भूत हो रहा था।

शास्त्रों का मुझे आकलन हो रहा था। उनके अंग उपांग मैं जान रहा था। मैरी बौद्धिक आयु उन ज्ञानऋषि के साथ तेज़ी से वृद्धिगंत हो रही थी। और मेरे व्यक्तित्व में आमूलाग्र इष्ट परिवर्तन आया था।

कालचक्र घूम रहा था।

और वह क्षण आ गया।

विदाई का…

अन्य आश्रमवासियों के साथ गुरुदेव मुझे विदा देने के लिए आए। उनके अधरों पर स्मितहास्य था। किंतु आँखें डबडबायी थी।

मैंने उनके चरणों पर अपना मस्तक रखा और मेरा ह्दय गदगद हो उठा। मैंने अपने कृतज्ञ आसूओं से उनके चरणों का अभिषेक किया। उन्होंने मुझे ऊपर उठा लिया और आवेग से अपने आलिंगन में भर लिया।

मैं सिसक पड़ा।

अन्य आश्रमवासी बंधु भी अपनी आँखें पोंछ रहे थे। मेरी पीठ थपकाते हुए अपने अश्रु पोंछते हुए आचार्य ने कहा, “ गांगेय, तुम्हें विदा देते समय मन गदगद हो उठा है। व्यामिश्र भावनाओं से मन भर उठा है।  मनुष्य अपने जन्म के साथ अपने भाल पर विषिट्य कर्तव्यों का वज्रलेख लिखकर आता है। उन कर्तव्यों की आपूर्ति के लिए सारे मोहपाश तोड़कर मुक्त होना होता है। यहाँ से जाते समय तुम्हें उसका ही अनुभव हो रहा है। देवव्रत, तुम्हारे ललाट पर मैंने तुम्हारी जीवनदशा स्पष्टता से देखी है। तुम्हारे भावी जीवन में होनेवाली घटनाओं को मैं जानता हूँ। असाधारण सा जीवन तुम्हारे हिस्से में आनेवाला है। तुम बलशाली हो। महातेजस्वी हो। शरीर सामर्थ्य में तुम बेजोड़ हो। यहाँ आकर शास्त्रों का अध्ययन करने से तुम अब और परिपूर्ण होगए हो। जन्मजात सामर्थ्य को  शास्त्रशुद्धता का कवच चाहिए । योग गुरु से तुम उसकी शिक्षा प्राप्त कर लो। एक महाकाय, विशाल उलझा हुआ कालखंड़ तुम्हारे मार्गदर्शन की प्रतीक्षा कर रहा है। इसलिए सभी दृष्टियों से तुम्हें सिद्ध होना है। वत्स, तुम पर मेरा आशीर्वाद सदैव रहेगा। भावी कालखंड़ की पीढियाँ मुझे तुम्हारे गुरु के रूप में  भी जान जाय तो भी मेरा जीवन धन्य हो जाएगा।… गंगानंदन.. जा रहे हो… लेकिन जाते समय तुम्हें जो माँगना हो मुझसे मांग लो…. ”

“आचार्य, आपने मुझे सबकुछ दिया है। फिर भी मांग रहा हूँ… किसी भी चीज़ का मुझे मोह न हो पाए..इतना मनोबल मुझे प्राप्त हो।”

“तथास्तु। तुम वज्रनिग्रही होगे। तुम्हें मोह में फँसानेवाली कोई भी वस्तु इस भूतल पर होगी ही नहीं… विजयी भव…।”उनका शुभ्र हस्त ऊपर उठा।

मैं झुक गया। और आश्रुओं को रोकते हुए मैं मुड़कर चलने लगा।

…….क्रमशः – अध्याय 3 – देवव्रत  – भाग 5  ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-3 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

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(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-3- देवव्रत भाग-3 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

देवव्रत 

एकबार मैं और आचार्य शुष्क लकडियाँ लाने के लिए नदी तट की ओर गए थे।

उस दिन एक आनंददायक घटना घटित हुई।  बरगद के वृक्ष पर एक रंगबिरंगी पंखोवाला पक्षी बैठा था। आचार्य उसके निकट जाकर खड़े हो गए।  वह पक्षी भी निड़र था वहीं डटा रहा और अपनी नीलि आँखों से उनको निहारने लगा।

मेरी जिज्ञासा जाग गयी। मैंने कहा,

“ आचार्य।”

“जी।”

“यह कौनसा पक्षी है?”

“यह पक्षी बहुत ही दुर्लभ है। देव, इसे वाक्-विहग कहते हैं।” उस पर अपनी नज़र स्थिर करते हुए उन्होंने कहा।

“क्या?”

“वाक्-विहग।”

“मतलब?”

“यह बिलकुल मनुष्य की तरह बोल सकता है। इसकी ध्वनि एकदम मुधर होती है। उसकी ग्रहणशक्ति भी बहुत विलक्षण होती है। इसकारण वह अतिशीघ्र बोल सकता है।”

“अच्छा?”

“हाँ। इसके सिवाय वह अन्य पक्षियों की तरह भयभीत नहीं होता। हमेशा सावधान रहता है। बड़ा ही साहसी होता है यह।”

“वह.. अभी.. इस क्षण बोलेगा?” मेरी जिज्ञासा बहुत अधिक बढ़ गयी थी। इस सतरंगी पखोंवाले पक्षी के प्रति मुझे अधिक प्रेम होने लगा।

“हाँ।… देखो…” इतना कहकर गुरुदेव ने पक्षी से कहा,

“नमोःSS.. नमोःSS..”

“नमोःSS.. नमोःSS..”

वह वाक् विहग बडे ध्यान से सुनने लगा। और फिर एक बार “नमः नमः” इतना भर बोलकर कलरब करता हुआ उड़कर चला गया  और असमान में कहीं लुप्त हो गया।

हम हँसते हँसते आगे चल पड़े।

“गुरुदेव..”

“बोलो वत्स…”

“पक्षी भी अच्छा बोलते हैं। किंतु वाणी के होते हुए भी कई लोगों को उत्तम भाषण करना नहीं आता। विविध प्रसंगों में हमारी वाणी कैसी हो, कृपया इस बात पर भी आप प्रकाश डालिए। ” मैंने कहा।

“अवश्य, देवव्रत, वाणी मनुष्य को प्राप्त एक श्रेष्ठ शक्ति है। मानव के अतिरिक्त अन्य पशु पक्षियों की भी आवाज़ होती है। किंतु विशिष्ट भावों की अभिव्यक्ति के बिना उनको ध्वनि विनियोग का ज्ञान नहीं होता है। मानवमात्र ही ध्वनि के माध्यम से भाषा का प्रयोग कर सकता है। बोल सकता है। विचार कर सकता है। भाषा और विचार हमारी क्रांति है। उनका उपयोग श्रेष्ठ पद्धति से होना आवश्यक है। हमें सबके साथ मधुरता से बोलने आना चाहिए। जिससे हम महायश के भागी होते हैं। हमें अपने विचारों को रोचक तथा अस्वाद्य शब्दों के माध्यम से बड़े विनय के साथ रखने चाहिए। जो बिना कुछ कहे सदैव अपने भाल पर शिकन की रेखा रखकर बैठता है वह सबके तिरस्कार का पात्र होता है। जो किसी को देखते हुए मुस्कुराकर संभाषण करता है उसकी  सबको चाहत होती है।  दान देने के साथ मधुर वाणी का भी प्रयोग होना चाहिए।  दंड देते समय भी मधुर वाणी से संभाषण करना चाहिए। सामोपचार का उत्तम प्रयोग करते हुए मीठी तथा मधूर वाणी का प्रयोग करने से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। मधुरवाणी सर्वोत्कृष्ट साधन है।”

गुरुदेव बोल रहे थे। फिर मैंने लकडियाँ बीन लीं और कंधे पर डालकर हम दोनों वापिस लौटे।

…….क्रमशः – अध्याय 3 – देवव्रत  – भाग 4  ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in