हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-1-गंगा भाग-6 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत (मराठी)

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-1-गंगा भाग-6 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

 

मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि अभिशाप भी इतना सुंदर हो सकता है।

हस्तिनापुर की महारानी के रूप में जब मेरा भव्य स्वागत हुआ तो मैं अक्षरशः सम्मोहित हो गयी थी।  महाराज शांतनु से मेरा विवाह संपन्न हुआ और नगरवासियों ने हर्षोल्लास से परिपूर्ण उत्सव मनाया ।  महारानी के पद पर स्वर्गीय लावण्य विराजमान होते देखकर उनकी प्रसन्नता की सीमा ही नहीं रही थी। जब हमारा रथ राजपथ से गुज़रने लगा तो अपनी अपनी क्षमता के अनुसार उन्होंने हम पर सुवर्णफूलों की प्रचंड वर्षा की।

नगरवासियों का मेरे प्रति अभिमत सुनकर तो मैं  तो प्रसन्नचित्त हो गयी। सतत मेरे सौंदर्य पर अधिक्षेप होता आ रहा था। वह विषभरी स्मृतियाँ इस सम्मान के कारण पिघल गयी थीं। जहाँ मात्र अभिशाप ही दिया जाता है उस स्वर्ग लोक से अधिक स्तुतिसुमनों की मुक्त मन से वर्षा करने वाला यह मृत्यु लोक मुझे प्रिय लगने लगा था। नगरवासी बातें कर रहे थे। मेरे कानों पर उनका सुस्वर टकराया था और मैं पारिजात की तरह खिल रही थी।

“यह तो साक्षात् गंगा है।”

“यह लावण्य यहाँ का नहीं है। निश्चित ही स्वर्गीय है। इसलिए दैदिप्यमान है।”

“हमारी महारानी माने मूर्तिमंत लावण्य! ऐसा लावण्य युग में एक ही बार निर्माण होता है।”

“हाँ… और हमें वह देखने का सौभाग्य मिला है। भाग्यशाली, महान हो तो ही ऐसा संयोग आता है।”

“यह रानी हमारी देखभाल करेंगी। इसका रूप आश्वासक है। इसके चारित्र्य के सामने हिमालय का धवल वर्ण भी फीका पड़ जाएगा।… भविष्य के लिए यह भाग्ययोग है।”

“राजा शांतनु और गंगा.. साक्षात् विष्णु लक्ष्मी की जोडी! हमारे हस्तिनापुर की कीर्ती अब त्रिकाल, तीनों खंडो में युगों तक गूँजती रहेगी, इसमें कोई शंका नहीं।”

नगरवासी बातें कर ही रहे थे।

उनकी श्रावणधारा की रसवंती में मैं हर्ष से भीग गयी थी।

भव्य राजप्रासाद के सामने रथ खड़ा हो गया।

सुहागिने हमारी आरती उतारने लगीं। रत्नजड़ित सुवर्णपुष्प उन्होंने हमारे उपर से वार दिए। महाद्वार के सर्वोच्च सोपान पर मैं खड़ी थी। दहलीज पर चांदी का कलश धान से भरकर रखा था। वह लक्ष्मी का प्रतीक था। पैर लगाकर मैं चंचल लक्ष्मी को अपने घर में रोकनेवाली थी। मेरा गोरा पैर आगे बढ़नेवाला ही था कि…

एक वृद्ध पुरोहित ने अपनी गंभीर आवाज़ में मुझसे कहा, “महारानी…”!

“हाँ…”?

“आप सम्राज्ञी बनकर इस महल में प्रविष्ट हो रही हैं। ”

“जी हाँ।”

“परंपरानुसार आपको इस दहलीज को एक वचन देकर फिर यह भरा हुआ कलश लांघना होगा।।”

अबतक खुशी में मस्त मेरे मन में अशुभ शंका ने जगह बना ली।

मन थोडी देर के लिए  बावरा हो गया। मैंने खुद को संभाला। लंबी शिखावाले उस वृद्ध राजपुरोहित से मैंने कहा, “राजपुरोहित… कौनसा वचन”?

“महारानी, आप गृहप्रवेश कर रही हैं इसका अर्थ है कि, आप के कदमों से यहाँ सुख, समृद्धि, आनंद, आरोग्य आदि का भी प्रवेश हो रहा है।”

“हूँ।”

“यह सारी परंपरा बनाए रखनी जरूरी है। आप अपने अंतकाल तक यहीं रहेंगी और सारी बातें जतन करेंगी., इस राजप्रासद का त्याग नहीं करेगी ऐसा वचन इस दहलीज को देना होगा।”!

वह वयोवृद्ध पुरोहित अपने दंतहीन मुख से बोला और आसमान से बिजली कड़क गयी हो ऐसा लगा।

मेरे हर्षोल्लोसित मन पर अग्निवर्षाव करने का अधिकार किसने दिया इस पुरोहित को?  किसने इस मूर्ख को इस पद पर नियुक्त किया है ?  अंतकाल तक मुझे यहाँ रहना है? किसका अंतकाल? मेरा? इस चिरयौवन का? हे पुरोहित, तुम्हारे उस गोरे शीश की अतिधवल शिखा भी तुम्हारे भविष्य ज्ञान पर हँस रही है । अरे, क्या इस गंगा का कोई अंत है? मेरा जीवन अमर्याद! उसको मर्यादा की सीमा में स्वयं ब्रह्मदेव भी नहीं  बांध सकते। तो तुम उसके बारे में कहोगे? तुम्हें अपनी औकात का अहसास ही नहीं है। इसलिए तुम्हें मेरी क्षमता भी समझ नहीं आ रही है। इसमें तुम्हारा क्या दोष ?  सारा जीवन शब्दों के कोष में गुज़ारा है तुमने। शब्दों का कवच तोड़कर अर्थ का ब्रह्मांड खोजने का विचार तक तुम्हें स्पर्श नहीं कर सका । इसलिए तुमने यह साहस किया है। खैर.. हे विप्रवर तुमने इस गंगा के  सामने समस्या खड़ी कर दी है।

“गंगा…”! मुझे स्तब्ध देखकर महाराज ने पुकारा.. और मैं होश में आयी।

“अं”?

“ वचन दो ना.. यह शास्त्राज्ञा है… यह यहाँ की परंपरा है” स्नेहार्द नज़रों से मुझे देखते हुए शांतनु महाराज ने कहा।

दहलीज को देखते हुए मैंने कहा, “तुम्हारे सम्राट ने भी मुझे कुछ वचन दिए हैं.. उनका सम्मान किया जायेगा तो मैं भी साम्राज्य को छोड़कर नहीं जाऊँगी।… यह मेरा वचन है।”

मैंने फिर अपना पैर उठाया…

दहलीज लांघी!

अनाज के साथ साथ घर में आनंद भी  छा गया। आसपास खडे लोगों को मैंने क्या कहा इसका अर्थ बोध ही नहीं हुआ था। उनको इतना ही पता लगा था कि मैंने रीति के अनुसार वचन दिया था और वे पुलकित हो उठे थे। अब कदम उठाते समय मेरी दृष्टि उस वृद्ध पुरोहित की ओर गयी। वह व्याकुल हो गया था।

चिंतित था।

मेरे वक्तव्य का उसको उचित अर्थबोध नहीं हुआ था। आजतक ऐसा कभी नहीं घटित हुआ था। इस कारण वह हड़बड़ा गया था।

उसकी उतनी ही बुद्धि थी।

अब अन्य सारे पीछे हट गए। अपने अपने काम के लिए निकल गए।

केवल हम दो मुख्य सभामहल में आए। वह महल भव्यदिव्य था। रंगों की सुंदरता से सजा हुआ था।

वहाँ कई चित्र टंगे हुए थे। एक भव्य चित्र के सामने मुझे खड़ा करके महाराज ने कहा, “गंगा.. ये हमारे तात.. सम्राट प्रतीप….”!

प्रतीप…

स्मृति सरोवर के शांत जल में तरंगे उठीं…

उस भव्य पुरुष से संबंधित स्मृतियों के कपोत आसमान में फड़फड़ाने लगें।

“मैं आपको प्रणाम करती हूँ।” मैंने हाथ जोड़कर कहा, “सम्राट मैं आपकी बहु बन गयी हूँ। अब आपका कुलगौरव यही मेरा ध्येय रहेगा। आप आशीर्वाद दीजिए।”

मुझे ऐसा आभास हुआ कि प्रतिमा के भीतर से प्रतीप ने स्मित किया हो।

“गंगा, कुछ सालों पहले मेरे तात तपश्चर्या के लिए हरिद्वार गए थे। वहाँ से लौटने के बाद जब मैंने यौवन में पदार्पण किया था तब उन्होंने कहा था, गंगातट पर अगर कोई प्रियदर्शनी मन मोह लेने वाली लावण्यवती मिल जाय तो उसे पत्नीपद पर विराजमान करना। उसकी शर्तों के साथ उसका स्वीकार करना। मुझे अब उसका स्मरण हुआ। मुझे निश्चित ही लगता है कि तात ने जिसका उल्लेख किया था वह रूपगर्विता तुम ही हो।” और उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और हम दोनों रंग महल की ओर निकल पडे।

 

……….क्रमशः – भाग 7 ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ नामकरण ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

आज प्रस्तुत है एक सार्थक लघुकथा  नामकरण । कृपया आत्मसात करें।

☆ लघुकथा : नामकरण    

 

कच्चे घर में जब दूसरी बार भी कन्या ने जन्म लिया तब चंदरभान घुटनों में सिर देकर दरवाजे की दहलीज  बैठ गया । बच्ची की किलकारियां सुनकर पड़ोसी ने खिड़की में से झांक कर पूछा -ऐ चंदरभान का खबर ए ,,,?

-देवी प्रगट भई इस बार भी ।

-चलो हौंसला रखो ।

-हां , हौसला इ तो रखेंगे बीस बरस तक । कौन आज ही डिग्री की रकम मांगी गयी है । डिग्री ही तो आई है । कुर्की जब्ती के ऑर्डर तो नहीं ।

-नाम का रखोगे ?

-लो । गरीब की लड़की का भी नाम होवे है का ? जिसने जो पुकार लिया सोई नाम हो गया । होती किसी अमीर की लड़की तो संभाल संभाल कर रखते और पुकार लेते ब्लैक मनी ।

दोनों इस नाम पर काफी देर तक हो हो करते हंसते रहे । भूल गये कि जच्चा बच्चा की खबर सुध लेनी चाहिए ।

पड़ोसी ने खिड़की बंद करने से पहले जैसे मनुहार करते हुए कहा -ऐ चंदरभान, कुछ तो नाम रखोगे इ । बताओ का रखोगे?

-देख यार, इस देवी के भाग से हाथ में बरकत रही तो इसका नाम होगा लक्ष्मी । और अगर यह कच्चा घर भी टूटने फूटने लगा तो इसका नाम होगा कुलच्छनी ।

पड़ोसी ने ऐसे नामकरण की उम्मी द नहीं की थी । झट से खिड़की के दोनों पट आपस में टकराये और बंद हो गये ।

 

©  कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-1-गंगा भाग-5 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

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(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-1-गंगा भाग-5 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

संभवतः सूर्य कालरथ का दिव्य चक्र ही होता होगा।

राजा प्रतीप से मिलने के बाद कितना ही समय गंगा के पानी की तरह बह गया था और  इस धरती पर कई सारी घटनाएं भी घटित हो गयी थी।

स्मृति विस्मृति की रेखा पर मैं भी कालक्रमणा कर रही थी। श्रापसमय की प्रतीक्षा कर रह थी। श्राप भोगने से भी अधिक उस क्षण की प्रतीक्षा करना  भयावह होता है, इसका अनुभव मुझे हो रहा था।

कैसा विचित्र जीवन है मेरा!

मैं चिरयौवना।

नित्यतरुणी।

यौवन से भरी मेरी देह कभी मुरझाती नहीं। निर्माल्य नहीं होती।

किंतु…

किंतु आजकल मेरे मन को एक प्रश्न सतत सालजा जा रहा है.. चिरयौवना होने का यह वरदान जो मुझे मिला है वह सचमुच वरदान ही है ना या फिर वरदान की आड़ में अभिशाप ? अमृतकुंभ में छिपा हालाहल?  सौंदर्यसंपन्न देह में छुपा असुंदर ह्रदय? सच में क्या होगा?

यौवन है और वह भी चिरस्थायी है। नित्य और सतेज। इसलिए उसमें से कामज्वाला उफनती रहती है। काम से मोह प्रकट होता है और मोह की अग्नि में की राख होती है और फिर शापदग्ध जीवन जर्जर हो जाता है।

यौवन… कामभाव.. मोहावस्था… शापदग्धता.. मृत्युलोक…

जीवन ..

दुःख! यातना!

मृत्यु… मुक्ति….

जिसे सारा संसार आनंदनिधान कहता है उस चिरयौवन से इतनी वेदनाएं ह्रदय में जतन करनी होती है… यह कैसा महादैवीदुर्विलास है?

काल दौड़ रहा है।

पथ्वी पलट रही है।

तूफान उठते हैं.. शांत होते हैं।

पर मैं, मेरा यौवन, मेरा लावण्य सब स्थिर.. और उसके पीछे का असीम कारुण्य, प्राणों की कश्मकश लेकिन उतनी ठोस।

मेरी समझ में ही नहीं आता कि मेरा यह यौवन चिरस्थायी है या यह विक्राल वेदना?  इतना अप्रतिम लावण्य होने पर भी  उसका अधिक्षेप क्यों? ब्रह्मदेव के अभिशाप से मेरा और महाभिष का मिलन तो होनेवाला ही है। फिर भी मुझे प्रतीप का मोह क्यों हुआ होगा?  त्रिलोकपथगामिनी मैं भला क्यों बार बार अपना रास्ता भटक रही हूँ? पथभ्रष्ट क्यों हो रही हूँ?

अचानक मेरे शीश के ऊपर से एक बहुत बड़ी छाया सरक गयी और मैं एकदम होश में आयी। विचारों की कड़ी टूट गयी।

मेरी दृष्टि ऊपर की ओर  गयी। आसमान से एक कृष्णमेघ अपनी ही मस्ति में लहराता जा रहा था। पक्षियों का एक झुंड प्रसन्नता से  छलांग लगा रहा था। स्वच्छ प्रकाश में उनकी परछाइयाँ मन को मोह रही थी। वातावरण की रमणीयता  से मैं खुश हो रही थी, प्रसन्नचित्त हो रही थी।

मुझे समीप के जंगल से वनफूलों की मदहोश करनेवाली सुगंध हवा की लहरियों से आने का अनुभव हुआ। मेरे गुलाबी नथुने रोमांचित हुए।  मैं उन वनफूलों की सुगंध से पगलायी और अनजाने में मेरे कदम परिमल के सहारे फूलों को ढूँढने के लिए जल्दी ज्लदी बढ़ने लगे। घने हरे पर्णसंभार को हाथों से दूर करते हुए मैं जंगल में आयी। गंगा नदी पास में ही बह ही थी।  उसकी मधुर झरझर  वातावरण में आल्हाद निर्माण कर रही थी।

बीच बीच में सुखी घास के कुचलने की चर्रचर्र आवाज़ आ रही थी।

अरअराकर वृक्ष की एक शाखा नीचे गिर पड़ी। पत्तों की सरसराहट क्षण भर के लिए हुई और अचानक उस घटना से मैं स्तब्ध हो गयी।

हड़बड़ायी।

और मैं वह दृश्य देखकर चीखी।

चिल्लायी।

एक बलशाली व्याघ्र अपनी पीली देह पर काली रेखाएँ घारण कर इतराता हुआ मेरे पास से ही आगे की ओर छलांग मार कर विद्युतलता के समान जंगल में गायब हो गया। व्याघ्र होकर भी किसी से तो घबराया था। उसके आविर्भोवों को देखकर उसकी भयभीत स्थिति को मैंने समझ लिया था और तुरंत ही उसका कारण मुझे मालूम पड़ा।

एक अत्यंत भव्य पुरुष हाथ में धनुषबाण लेकर व्याघ्र के पीछे दौड़ता हुआ वहाँ आया था। किंतु उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और वह वहीं रुक गया। उसकी गति शीथिल हुई। रुक गयी। व्याघ्र वध का हेतु ही लुप्त हो गया था। वह एकटक मेरी ओर देखने लगा था।

मेरा ह्रदय धडकने लगा। और फिर मेरे ह्दय की धड़कन रुक सी गयी। ह्रदय में कई वनफूल खिल गए।  सारी काया रोमांचित हो गई थी। पैर का अंगूठा मिट्टी में धंसाते हुए मैंने उस पर नेत्र कटाक्ष डाला।

और वह सूर्य के समान वीर पिघल गया।

वह धनुर्धर एकदम सुंदर था। पौरुष से परिपुष्ट।

उसकी पुष्ट देह से नज़र हट ही नहीं रही थी। उसकी देह ऊँची पूरी और भव्य थी। उसके कंधे वृषभ के समान पुष्ट थे।

उसकी मुद्रा रत्न की तरह  स्वयंभू और तेजःपुंज थी और उसके नेत्र अर्थात् साक्षात् रत्न ही थे। महासर्प के नयनों का सम्मोहन उसके  नेत्रों में स्पष्ट दिखाई दे रहा था। वे नेत्र मेरे सर्वांग को अदृश्यरूप से सहलाते जा रहे थे।  इस कारण मेरी लावण्य से परिपूर्ण परिपुष्ट काया और भी रोमांचित हुई। विलोभनीय  नज़र आने लगी।  मेरी देह के नयनरम्य  ऊभारों  को निहारने में वह तल्लीन हो रहा था। मेरे उरोभाग में तूफान उठा और मैं मस्त हो उठी।

“हे स्वर्गलोक की सुंदरी…” उसकी दमदार आवाज़ मेरे कान पर पड़ी। मैं उसके राजसी चेहरे पर नज़र स्थिर कर रही थी।

“ तुम वनदेवी हो?  या व्योम देवता ? या सागर परी हो ?  यह असमान्य लावण्य भूलोक का नहीं है।… क्या मैं इस अतुलनीय सौंदर्यस्वामिनी का नाम  जान सकता हूँ ?”

“ गंगा.. “। मैंने कहा। “राजन… आप कौन हैं ”?  जिस तरह वह व्याघ्र भयभीत होकर भाग गया उससे तो यही लगता है कि आप एक श्रेष्ठ वीर है। आपका राजसी रूप  आपके सम्राटत्व की साक्ष देता है। आपकी ब्रह्मकमल सी विकसित मुद्रा आपके अंतःकरण की असीम प्रेमभावना व्यक्त करती है।… तो भी आपका नाम यह दासी जान पायेगी”?

“तुम्हारा यह विनय नम्रता को भी लजानेवाला है। तुम्हारे लावण्यपूर्ण व्यक्तिव में सौंदर्य और सारस्वत का मिलन हो गया है। हे गंगे, इस देह को राजा शांतनु कहा जाता है। क्षमा…किंतु… मैं सचमुच…. ”

“बोलिए राजन….”

“मैं प्रेम विह्वल हो गया हूँ। व्याकुल हो गया हूँ। गंगे.. मुझे ह्रदय से ऐसी प्रेरणा हो रही है कि .. तुम्हारी और मेरी भेंट इसके पहले ही हो गयी है। ऐसा मुझे निश्चित लगता है। ” शांतनु ने कहा।

और मैं चौंक गयी।

पूर्वस्मृतियाँ जाग गयीं। तो भी मेरी चित्तवृत्तियाँ उतनी ही ताजा थीं।

‘राजन….’

“ हाँ, प्रिये बोलो.. अब मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता। मेरे प्रेम का तिरस्कार मत करना। स्वीकारों… प्रियतमे… निर्मल गंगे… ”

मौं सावधान हुई।

मोहपाशों को दूर किया।

“मैं तुम पर अनुरक्त हूँ। आपके चरण कमलों की दासी बनने का भाग्य यदि मुझे मिल जाय तो मैं स्वयं को भाग्यशाली समझूँगी।.. किंतु,…” मैं रुक रुक कर बोली। प्रत्येक क्षण को वे अधीर, आतुर  हो रहे थे। उनकी आँखों में प्रेम का कहर मचा था।

“प्रेम देवी… किंतु क्या? बोलो.. मैं तुम्हारे प्रेम के लिए सागर को पी जाऊँ या आकाश को भस्म कर दूँ ?  हिमालय को चूर्ण करूँ या खुद ही ऊँची चोटी से गहरी खाई में छलाँग लगा दूँ ? ..रानी तुम्हारे लिए यह सम्राट अपना सारा साम्राज्य धुलिकन की तरह फूँकने के लिए तैयार है।.. आज्ञा दो”।

“राजन ..“ मैंने अपनी भावविह्वलता को दूर कर दृढ़ता से कहा, “ मैं आपसे विवाह करने के लिए तैयार हूँ। पर उसके पहले मेरी कुछ शर्ते आपको माननी पडेंगी…”

“मुझे तुम्हारी हज़ारों शर्तें मान्य हैं ।” मृगशावक के समान उत्साह से उन्होंने कहा।

“ नहीं राजन.. मेरी शर्ते बहुत कम हैं किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनका पालन अगर यथायोग्य नहीं हुआ तो भविष्यकाल आपको क्षमा नहीं करेगा।” मैंने अपने वक्षस्थल का वस्त्र ठीक करते हुए कहा। हवा तेज चल रही थी। पत्तों की सरसराहट बढ़ रही थी और हमारे ह्रदय की धडकन भी।

वे कुछ अस्थिरचित, विचलित से लगे। किंतु बाद में कहा, “ देवी अपनी शर्ते बताइए…”

“ठीक है… विवाह के बाद मैं आपकी हर बात सुनूंगी ही ऐसा नहीं है। कुछ मैं स्वेच्छा से करूँगी। आपके कोई बंधन नहीं मानूँगी। आप मेरे किसी भी कृत्य पर कुछ भी नहीं कहेंगे। मैं क्या और क्यों कर रही हूँ यह प्रश्न जिस दिन आपके मुख से निकलेगा उसी दिन हमारा संबंध समाप्त हो जाएगा। मेरी कृति पर तुम्हारा विरोध हमारे  संबंध को समाप्त करनेवाला होगा। आपके प्रश्न हमारे प्रेमपाश को तोड देंगे। तब मैं चली जाऊँगी”। सूर्य से निकलने वाली तप्त किरनों के समान मेरे कोमल अधरों से मेरी शर्तें बाहर निकल गयी।

शांति से शांतनु ने कहा, “ बस, इतना ही न?  मान्य !  प्रसन्नता से मैं इन शतों को स्वीकारता हूँ। साक्षात गंगा के समान शुभ्र, सतेज स्त्री कभी अनुचित कार्य नहीं ही करेगी, इसका मुझे विश्वास है।..प्रिये … अब तो तुम मेरे पास आओगी ना?” उसने अपने बलशाली हाथ फैलाए।

और मेरी देह उसके बलशाली शरीर से लग गई। अंग प्रत्यंग में काम-कलियाँ खिलने लगीं.. मानो वर्षा कालीन पाषाण को हरित तृण के अंकुर खिल गए हो। उसने मेरी कोमल ठोड़ी ऊपर उठायी, उसके जामुनि चुंबनोकोत्सुक अधर मेरे कोमलतम जर्द गलाबी अधरद्वय की ओर तेजी से बढ़ने लगे…

मैंने लज्जा से अपनी आँखे बंद कर ली।

अतिव सुख मैं डूबने लगी।

कामशक्ति का महात्म्य मैंने समझा। शाप को भी उसने रमणीय बना दिया था!

……….क्रमशः – भाग 6 ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-1 भाग-4 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत (मराठी)

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ युगांत – अध्याय -1 -भाग – 4 – गंगा  ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

पृथ्वी पर रहते समय मेरे मन की स्थिति हिमपातकालीन वातावरण की तरह हो गयी थी।

धूसर..

गूढ़…

मैं स्मृति और विस्मृति के कोहरे में जकड़ती जा रही थी।

मैं वास्तव में हूँ कहाँ? और किस प्रयोजन के लिए? क्षण में कोहरे का पटल हटते ही सूर्य के दर्शन होते हैं इतनी स्पष्टता से कभी कभी स्मृतियाँ सजग हो जाती है। तो कभी कभी मैं विस्मृतियों के भँवर में घर्रघर्र घूमती हूँ। ऐसा क्यों होता होगा? इस विचित्र भ्रम का क्या कारण होगा? क्या शापदग्धता होगी?

छोड़ो भी…

अरे, अंततः मैं आयी हूँ तो भला कहाँ आयी हूँ ?

यह तो हरिद्वार।

सृष्टिसौंदर्य से भरापूरा महन्मंगल तीर्थक्षेत्र। घने वनप्रदेश से दिखाई देनेवाले कई कंचन कलश मन मोह ले रहे थे। रमणीय प्रभातकाल का रवि प्रसन्नता से जगमगा रहा था। हरे भरे  कोमल तृणपातों पर विराजमान ओसकणों को अपने कोमल अधरों से चुग रहा था। विहगों का घने पत्तों से आनेवाला कलरव मानो स्वर माधुर्य का फौव्वारा ही उड़ा रहा था।

मेरा चित्त चैतन्य से भर गया था। श्राप, मृत्यलोक, जन्म आदि सारी बातें सहजता से विस्मृति में विलुप्त हो गयीं थीं। मैं भूलोक की आनंदयात्रा में तल्लीन हो गयी थी।

नगरवासी प्रसन्नचित्त, सुशोभित होकर अपने दैनिक कामों में लग गए थे। रमणीय सुंदरियाँ सुंदर वस्त्र  और आभुषणों से सजकर पूजापाठादि के नित्य कामों में  तल्लीन थीं।

मेरे कदम गंगा की तरफ चल पडे।

लोगों की मेरी ओर दृष्टि जाते ही वे मेरा आनंदाश्चर्य से अवलोकन करते। मेरे अद्वितीय सौंदर्य का वह जादू था। मुग्ध सा स्मित करके मैं गंगातट पहुँच गयी।

गंगा का शीतलप्रवाह वेग से बह रहा था। इस गंगा को देखकर वह गंगा भी रोमांचित हुई होगी। फेनिल लहरों का रोमांच उसकी तेजपूर्ण देहपर उमड़ रहा था। सर्वांग कंपायमान था।

वह —

और मैं..?

मैंने तट के ऊँचे सोपान पर खड़े होकर जलाशय में झाँका.. मेरा लुभावने वाला प्रतिबिंब उसमें पड़ा था।…

सुंदर!

उन्मत्त!

और उसी क्षण…

मुझे एक अननुभूत संवेदना का अनुभव हुआ।

मेरा सारा तन ऐसे रोमांचित हो गया जैसे किसी लतिका पर फूलों की बहार आ गई हो।

कारण?

मेरा प्रतिबिंब धीरे धीरे विस्तृत होने लगा था जैसे प्रातःकाल में पूर्व दिशा की ललाट पर रविबिंब के उदित होते ही उसकी किरनें दूर दूर तक फैलती  जाती है। कुछ ही क्षणों में संपूर्ण गंगा ही मेरा प्रतिबिंब हो गयी।

मैं?

मैं इतनी सी…

और मेरा प्रतिबिंब…

कितना भव्य ! कितना विशाल!

ऐसे कैसे?

मैं कौन हूँ ?

और यह सरिता कौन है?

मेरा और इसका क्या संबंध है?

हमारे मध्य के परमतत्व का अनुभव मुझे इसी क्षण क्यों हो रहा है? जीवन अर्थात् जल! – पर इस जल में मेरे जीवन का रूप क्यों प्रतिबिंबित हुआ?

डुबुक?

डुबुक?

अचानक आवाज़ आयी और मेरी भाव समाधि भंग हो गयी।

प्रतिबिंब नष्ट हो गया।

मृग की एक जोड़ी पानी में उतर रही थी।

नर पुष्ट और शानदार था। उसकी शान दर्शनीय थी। मादा भी उतनी ही सुंदर थी। अनुरूप थी। आँखों में तृप्तता का भाव समाकर वे जल प्राशन कर रहे थे। उनकी लाल गुलाबी जीव्हाएँ शीतल जलप्राशन कर रहीं थीं। उनकी स्याहसार आँखें मुझ पर टिकी थीं। उनमें भय नहीं था। निर्भीकता थी।

मैं एकटक उस मृगयुगल की ओर देख रही थी। मन में कुछ हिल रहा था। दबी हुई भावनाओं के बुलबुले ऊपर आने के लिए तड़प रहे थे। वह युगल भरपेट जलप्राशन कर किनारे की घनी हरीतमा पर खेलने लगे। उनकी पुष्ट पीठ सूर्य की किरणों में चमक रही थी।

वे दोनों एक दूसरे का मुख चाटने लगे। धीरे धीरे उनकी श्रृंगार लीलाएं बढ़ने लगीं। अब वे एक दूसरे के गले में पड़ने लगे। शरीर का घर्षण शुरु हुआ और इस चर्मस्पर्श से भावनाओं की चिन्गारियाँ उठने लगीं।

मेरा दिल धड़कने लगा। ढ़लनेवाला आँचल मैंने संभाला। दिल में उठनेवाला तूफ़ान हाथों से दबाते हुए मैं वहाँ से चल पड़ी ।

वह युगल भी अपनी मस्ती में ही जंगल में गायब हो गया।

मेरी चित्तवृत्तियाँ भी पलाश पुष्प के समान मेरे सारे शरीर में खिल गयीं…  रोम रोम में गुलाबी कलियाँ खिलने लगीं…  उसी  मदमस्ती में मैं वह नीली पहाड़ी लांघकर आयी और देखती ही रह गयी..

स्तब्ध!

मुग्ध!

मस्त!

एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एक बलशाली योद्धा तपमग्न बैठा था।

गौरगुलाबी, पुष्ठ, मज़बूत देह, तेजःपुंज मुद्रा, सिंह के समान गरदन पर फैले केश, सर्वांग सुंदर और भव्य पुरूष था वह!

मैं उन्मत्त हो गयी।

वीरत्व तथा संतत्व दोनों का मोहक मेल उसके व्यक्तित्व में दिखाई दे रहा था।

मैं मदमस्त हुई।

और उसकी बंद आँखें खुलने से पहले ही मैं उसकी गोद में जाकर बैठ गयी।

वह घबराया।

उसके रोंगटे खडे हो गए।

किंतु वह तुरंत संभल गया। उसने मुझे सहजता से उठा लिया। फिर बहुत ही नम्रता से पूछा, ‘ हे लावण्यवती, क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ’?

“गंगा…” मैंने कहा। उसकी नज़रों में नज़र डालकर मैंने कहा। अपने नयन बाणों से उसे विद्ध करना था, घायल करना था।

किंतु…

आज पहलीबार मुझे पराजित होना पड़ा था।  सूर्य पर जैसे अपनी नज़रे नहीं गडायी जा सकती वैसे ही कुछ मेरी दशा हो गयी थी। मेरी पलकें झुक गयीं।

‘गंगा, मेरी गोद में बैठने का क्या प्रयोजन था? तुम्हारे ह्रदय में क्या चल रहा है? क्या मैं जान सकता हूँ?” धीरगंभीर आवाज़ में उसने पूछा। विशाल गोपूर के घंटानाद से उसकी ध्वनि निनादित हुई।

‘’महाराज, मैं आप पर अनुरक्त हो गयी हूँ। मेरी इच्छा को स्वीकार कर अपने विशाल ह्रदय में मुझे स्थान दें। मैं अपना शेष जीवन आपकी दासी बनकर बिताउंगी ।’ मैंने सलज्ज कहा। आषाढ़ मेघ सा मेरा मन प्रेमभाव से भर गया।

“गंगा, भावावेग में आकर तुम्हारे हाथ से एक भूल हो गयी है। मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता। कारण तुम मेरी दाहिनी जंघा पर बैठ गयी हो। शास्त्रानुसार दाहिनी जंघा पर मात्र पुत्री या फिर पुत्रवधु ही बैठ सकती है। वामांगी बैठने का अधिकार प्रिया या पत्नि का होता है। तुम स्त्री हो। तुम्हारी इच्छा पूर्ण करना मेरा कर्तव्य होने पर भी मैं ऐसा नहीं कर सकता। कारण तुम पुत्री के स्थान पर बैठी हो”। वह महापुरूष उचित ही कह रहा था।

मोह के कारण फिर एक बार मेरी भावनाओं का अधिक्षेप हुआ था।

पुनः एक बार दारुण दुख को ह्रदय में दबाना पड़ रहा था।

मैं मलिन मुख लेकर खडी थी।

“गंगा, मैं स्रमाट प्रतीप तुम्हें पुत्रवधु के रूप में स्वीकार करता हूँ। चिंता मत करों। यथा समय तुम राजप्रासाद में बड़े सम्मान के साथ आओगी। मेरे पुत्र के साथ तुम्हारा विवाह होगा।।” राजा प्रतीप ने कहा।

उनके शब्दों ने मेरे तप्त मन पर थोडी शीतल फूँक मारी थी। किंतु मेरा उकसाया स्वाभिमान मात्र उतने  भर से शांत होनेवाला नहीं था  उल्टा उसने तो अपना फन ही निकाला था । इसिलिए शायद मैं बोल गयी थी.. “किंतु महाराज….”!

“बोल देवांगना  बोल.. अपना मन मुक्त कर के बोल….”!

“मैं आपकी बहु जरुर बनूँगी। किंतु मेरी कुछ शर्तें हैं…”!

उसे मेरे स्वाभिमान का अहसास हुआ होगा कारण उसके तेजःपुंज मुखमंडल पर  अस्पष्ट सा स्मित क्षणार्ध में झलक कर लुप्त हो गया। मेरी ओर देखकर वह बोला, “तुम्हारी सारी शर्ते मान्य की जाएंगी।”

और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। मैं लौटी।

मेरे ह्रदय की मनस्थिति गंगा की जल-लहरियों से भी अधिक समिश्र सी हो गयी थी। भविष्य में सचमुच में क्या होनेवाला है ?

……….क्रमशः – भाग 5 ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी/मराठी साहित्य – लघुकथा ☆ सुश्री मीरा जैन की हिन्दी लघुकथा ‘कर्तव्य’ एवं मराठी भावानुवाद ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। )

आज प्रस्तुत है  सर्वप्रथम सुश्री मीरा जैन जी  की  मूल हिंदी लघुकथा  ‘कर्तव्य ’ एवं  तत्पश्चात श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  द्वारा मराठी भावानुवाद कर्तव्य 

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सुश्री मीरा जैन 

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री मीरा जैन जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है ।  अब तक 9 पुस्तकें प्रकाशित – चार लघुकथा संग्रह , तीन लेख संग्रह एक कविता संग्रह ,एक व्यंग्य संग्रह, १००० से अधिक रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से व्यंग्य, लघुकथा व अन्य रचनाओं का प्रसारण। वर्ष २०११ में ‘मीरा जैन की सौ लघुकथाएं’  पुस्तक पर विक्रम विश्वविद्यालय (उज्जैन) द्वारा शोध कार्य करवाया जा चुका है।  अनेक भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद प्रकाशित। कई अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय पुरस्कारों से पुरस्कृत / अलंकृत । नई दुनिया व टाटा शक्ति द्वारा प्राइड स्टोरी अवार्ड २०१४, वरिष्ठ लघुकथाकार साहित्य सम्मान २०१३ तथा हिंदी सेवा सम्मान २०१५ से सम्मानित। २०१९ में भारत सरकार के विद्वानों की सूची में आपका नाम दर्ज । आपने प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर पांच वर्ष तक बाल कल्याण समिति के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं उज्जैन जिले में प्रदान की है। बालिका-महिला सुरक्षा, उनका विकास, कन्या भ्रूण हत्या एवं बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ आदि कई सामाजिक अभियानों में भी सतत संलग्न । आपकी किताब 101लघुकथाएं एवं सम्यक लघुकथाएं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मानव संसाधन विकास मंत्रालय व छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आपकी किताबों का क्रय किया गया है.)

☆ कर्तव्य  

शंभू पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़ विनती करने लगा- ‘साहब जी! मेरी ट्रक खराब हो गई थी इसलिए समय पर मैं अपने शहर नहीं पहुंच पाया। प्लीज जाने दीजिए साहब जी।’

पुलिस वाले की कड़कदार आवाज गूंजी- ‘साहब जी के बच्चे! एक बार कहने पर तुझे समझ में नहीं आ रहा कि आगे नहीं जा सकता। ‘कोरोना’ की वजह से सीमाएं सील कर दी गई है। कर्फ्यू की सी स्थिति है।  १ इंच भी गाड़ी आगे बढ़ाई तो एक घुमाकर दूंगा,समझे सब समझ आ जाएगा।’

पुलिसवाला तो फटकार लगाकर चला गया, किंतु शंभू की भूख से कुलबुलाती आँतें…सारे ढाबे व रेस्टोरेंट बंद…पुलिस का खौफ, रात को १० बजे अब वह जाए तो कहां जाए, साथ में क्लीनर वह भी भूखा। अब क्या होगा ? यही सोच आँखें नम होने लगी, तभी पुलिस वाले को बाइक पर अपनी ओर आता देख शंभू की घिग्गी बंध गई। फिर कोई नई मुसीबत…। शंभू की शंका सच निकली। बाइक उसके समीप आकर ही रुकी।  पुलिसवाला उतरा, डिक्की खोली और उसमें से अपना टिफिन निकाल शंभू की ओर यह कहते हुए बढ़ा दिया- ‘लो इसे खा लेना,मैं घर जाकर खा लूंगा।’

शंभू की आँखों से आँसूओं की अविरल धारा बह निकली। वह पुलिस वाले को नमन कर इतना ही कह पाया- ‘साहब जी! देशभक्त फरिश्ते हैं आप। ‘

इस पर पुलिस वाले ने कहा- ‘वह मेरा ऑफिशियल कर्त्तव्य था, और यह मेरा व्यक्तिगत कर्त्तव्य ही नहीं, सामाजिक दायित्व भी है.

© मीरा जैन

उज्जैन, मध्यप्रदेश

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☆ कर्तव्य 

(मूळ हिन्दी कथा –  कर्तव्य  मूळ लेखिका – मीरा जैन   अनुवाद – उज्ज्वला केळकर)

शंभू पोलीसवाल्यांना हात जोडून विनंती करत होता, ‘साहेब माझा ट्रक ना दुरूस्त झाला, म्हणून मी  वेळेत आपल्या शहरात जाऊ शकलो नाही. प्लीज जाऊ द्या ना साहेब!’

पोलिसांचा कडक आवाजा घुमला, ‘ए, साहेबजीच्या बच्चा, एकदा सांगितल्यावर तुला कळत नाही, तू पुढे जाऊ शकत नाहीस. ‘करोंना’ मुळे सीमा सील केल्या आहेत. कर्फ्यूच आहे. एक इंच जरी ट्रक पुढे सरकला तरीही लाठी फिरवेन. कळलं, मग सगळं ल्क्षात येईल.’

पोलीसवाला दरडावून निघून गेला पण भुकेने कळवळ कळवळणारं शंभूचं पोट … सगळे ढाबे, रेस्टोरंटस बंद. पालिसांची भीती. रात्री 10ची वेळ. आता त्याने जायचं म्हंटलं तरी कुठे जायचं? बरोबर क्लीनर . त्यालाही भूक लागलेली. आता कसं होणार.? विचाराने त्याच्या डोळ्यात पाणी जमलं.

एवढ्यात तो पोलिस पुन्हा बाईकवरून येताना दिसला. शंभूची तर जीभच टाळ्याला चिकटली. आता आणखी काय झालं? कसलं नवीन संकट?  शंभूला वाटलं, आपली शंका खरी आहे, कारण बाईक त्याच्याच दिशेने येत होती.

पोलीस बाईकवरून उतरला. डिककी उघडली. त्याने त्यातून टिफीन काढून शंभूच्या हातात दिला.

‘ हे घे खाऊन. मी घरी जाऊन जेवीन. ‘

शंभूच्या डोळ्यातून अविरत अश्रू धारा वाहू लागल्या. पोलिसाला प्रणाम करत तो म्हणाला, ‘ साहेब, आपण देवदूत आहात, पण मगाशी….’ यावर पोलीस म्हणाला, ‘ते माझं राष्ट्रीय कर्तव्य होतं आणि हे माझं व्यक्तिगत कर्तव्यच नाही, तर सामाजिक दायित्वदेखील आहे.

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170




हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 37 ☆ लघुकथा – सदा सुहागिन ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक के मर्म पर विमर्श करती लघुकथा  सदा सुहागिन। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी  को जीवन के कटु सत्य को दर्शाती  लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 37 ☆

☆  लघुकथा – सदा सुहागिन

लंबी छरहरी  काया,  रंग गोरा, तीखे नाक- नक्श, दाँत कुछ आगे निकले  हुए थे लेकिन उनकी मुस्कान के पीछे छिप जाते थे. वह सीधे पल्लेवाली साडी पहनती थीं, जिसके पल्लू से उनका सिर हमेशा ढका ही रहता. माथे पर लाल रंग की मध्यम आकार की बिंदी और मांग सिंदूर से  भरी  हुई.  पैरों में चाँदी की पतली – सी पायल, कभी- कभार  नाखूनों में लाल रंग की नेलपॉलिश भी लगी होती,   इन सबको  सँवारती थी उनकी मुस्कुराहट . मिलने पर वे अपनी चिर परिचित   मुस्कान के साथ कहती – कइसन बा बिटिया?  एक नजर पडने पर पंडिताईन भारतीय संस्कृति के अनुसार  सुहागिन  ही कहलायेंगी.

हर दिन की तरह वह सुबह भी थी, सब कुछ वैसा ही था लेकिन पंडिताईन के लिए मानों दुनिया ही पलट गई. पूरा घर छान मारा, खेतों पर भी दौडकर देख आई, आसपास पता किया पर पंडित का कहीं पता ना चला.वह समझ  ना पाई कि धरती निगल  गई कि आसमान खा गया. बार -बार खटिया पर हाथ फेरकर बोलती – यहीं तो सोय रहे हमरे पंडित, कहाँ चले गए. महीनों पागल की तरह उन्हें ढूंढती रही,  कभी गंगा किनारे, कभी मंदिरों में.बाबा,फकीर कोई नहीं छोडा. एक बार तो किसी ढोंगी बाबा के  कहने पर  पंडित का एक  कपडा  लेकर उसके पास  पहुँच गई. बाबा पंडित के बारे में तो क्या बताता पंडिताईन से पैसे लेकर  चंपत हो गया. उसके बाद से पंडिताईन ने  पंडित को ढूंढना छोड दिया. उन्होंने  मान लिया कि वह  सुहागिन हैं और अपने रख – रखाव से गांववालों को जता भी दिया.

पंडिताईन ने  अपने मन को समझा लिया, जरूरी भी था वरना छोटे – छोटे   बच्चों को  पालती कैसे ? खेत खलिहान कैसे संभालती. लेकिन गांववालों को चैन कहाँ. सबकी नजरें पंडिताईन के सिंदूर और बिछिया पर अटक जाती. एक दिन ऐसे ही किसी की बात कानों में पड गई – ‘ पति का पता नहीं और पंडिताईन जवानी में सिंगार करे मुस्काती घूमत हैं गाँव भर मां ‘. पंडिताईन  की आँखों में आँसू आ गए बोलीं- बिटिया! ई बतावा इनका का करे का है ? हमार मरजी हम सिंगार करी या ना करी ? हम सिंदूर लगाई, पाजेब पहनी कि  ना  पहनी ? जौन सात फेरे लिया रहा ऊ मालूम नहीं कहाँ  चला गवा हमका छोडकर,  तो ई अडोसी – पडोसी कौन हैं हमें बताए वाले.  मांग में लगे सिंदूर की ओर इशारा करके बोलीं –‘ जब  तलक हम जिंदा हैं तब तलक ई मांग में रही, हमरे साथ हमार सुहाग जाई.’

पंडिताईन सुहागिन हैं या नहीं, वह विधवा की तरह रहे या नहीं  ?  पंडिताईन ने किसी को यह तय करने का अधिकार दिया ही नहीं.

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-1 भाग-3 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत (मराठी)

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ युगांत – अध्याय -1 -भाग – 3 – गंगा  ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

अब मृत्युलोक में जाना अनिवार्य था। देवलोक का त्याग आवश्यक था।

अनंत दुखों से भरा मृत्युलोक!

कामसुख के कुछ क्षण छोड दे तो मन को सदैव विवंचनाओं की लताओं में उलझा रखनेवाला मृत्युलोक!

मैं चल पड़ी!

मनुष्य पृथ्वी पर हो या स्वर्ग में उसका दैवभोग कभी चूकता नहीं है। सुखदुख की लुकाछिपी  का खेल उसे सहना ही होता है। मन में भावनाएं होती हैं। दुख उन भावनाओं द्वारा प्रकट होता है। पर दुखों का कारण भी यह भावनाएं ही होती हैं। भला अश्रु कभी पाषाणों से बह सकते हैं?

विचारमग्न होकर मैं चल रही थी कि अचानक कानों पर किसी की आवाज़ आकर टकरायी।

“गंगा ….”

मैं मुड़ी।

वह आवाज़ अष्टवसुओं में से एक की आर्त पुकार थी। मैं भयचकित हो गयी। इस पुण्यात्मा की आवाज़ में इतनी विवश आर्तता क्यों थी ?

“क्या”? मैंने ऊँचे स्वर में पूछा।

वे आठों वहाँ खड़े थे और फूर्ति से मेरी ओर आ रहे थे। उन दिव्य देहधारी वसुओं की मुद्राएँ तेजहीन हो  गयी थीं।  स्याह हो गयी थी।

“हे, दिव्यस्वरूपी वसुओं, आप इतने गंभीर क्यों हैं? क्या पीड़ा है आपकी? आपकी मुद्राएं ऐसी निस्तज क्यों हैं”?

दूसरा वसु बोला, “ गंगा, जैसी तुम पापभ्रष्ट हो गयी हो वैसे ही हम भी शापबद्ध हैं। मृत्युलोक में जन्म लेने का शाप हमें छल रहा है। तोड़ रहा है”।

“शाप”? मैं घबरा गयी। जैसे महाभुजंग चंदन के वृक्ष को घेर कर रखता है वैसे शाप रूपी सर्प ने मेरे जीवन को भी जकड़ कर रखा है! इस शाप ने मुझे भी हतबल करके रखा था।

“हाँ”!

“किसने दिया? क्यों”? मैंने उनकी शापदग्ध चर्या का अवलोकन करते हुए पूछा।

उन्होंने जो हकीकत कही थी वह अत्यंत चमत्कारिक थी।.. उन्होंने ऋषि वशिष्ठ की कामधेनु का अपहरण किया था। यूँ ऋषि को छेड़ना नहीं चाहिए था। वशिष्ठ का कामधेनु से  बहुत लगाव था, प्रेम था। उसका वियोग सहना उनके लिए असंभव था। इस कारण उन्होंने अष्टवसुओं को शाप दिया। उसके बाद अपने अविचारी कृत्य का पश्चाताप अष्टवसुओं को हुआ। पर तब तक देर हो गयी थी। वशिष्ठ ऋषि के मुख से शापरूपी शर निकल चुका था।

“ अच्छा… तो मेरे समान आप भी शोकग्रस्त हैं… पर आपको शाप भोगना ही पडेगा।” .. मैंने उनको धैर्य देने का प्रयास किया।।

“तभी तो हमने आपको आवाज़ दी है। आपके शाप की वार्ता हमें मिली और आपका शाप हमारे लिए उपःशाप लगा।”। तीसरे वसु ने कहा।

“वह कैसे”?

“ हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि हम आपके उदर से जन्म लेंगे..किंतु आपको हमारे लिए एक काम करना होगा।”

“वह कौन सा”?

“हमारे जन्म लेते ही आप हमें पानी में डूबोकर मार दें। आपके लिए तो यह सहज संभव हैं।”

मैं मुस्कुरायी।

अपने पेट से जने को मारना क्या इतना सहज संभव होता है? .. और उसे मारना ही है तो उसे नौ माह अपने गर्भ में  उसे क्यों संभाल कर रखे…जतन करे”?

“गंगा..”?

“अं”?

“इतना करोगी न ”?

“जी हाँ।.. ठीक है। मेरे कारण आपको मुक्ति मिलेगी और जल्दी ही आप शाप मुक्त हो जाएंगे… पर आप आठों का जन्म होने तक मुझे वहीं रहना होगा। शापदग्धता का काल बढ़ गया। अभी और क्या क्या भोगना है किसे पता।”!

मैं जल्दी ही वहाँ से निकल गयी। जाते जाते मैंने देखा अष्टवसुओं के भाल की चिंता रेखाएं कम हो गयी थीं। मन का एक कोना थोड़ा खुश हो गया था।

……….क्रमशः – भाग 4 ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 56 – तकनीक☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “तकनीक। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 56 ☆

☆ लघुकथा – तकनीक ☆

बिना मांगे ही उस ने गुरु मन्त्र दिया, “आप को किस ने कहा था, भारी-भारी दरवाजे लगाओं. तय मापदंड के हिसाब से सीमेंट-रेत मिला कर अच्छे माल में शौचालय बनावाओं.  यदि मेरे अनुसार काम करते तो आप का भी फायदा होता ?” परेशान शिक्षक को और परेशान करते हुए पंचायत सचिव ने कहा, “बिना दक्षिणा दिए तो आप का शौचालय पास नहीं होगा. चाहे आप को १०,००० का घाटा हुआ हो.”

“ नहीं दूं तो ?”

“शौचालय पास नहीं होगा और आप का घाटा ३५,००० हजार हो जाएगा. इसलिए यह आप को सोचना है कि आप १५,००० का घाटा खाना चाहते है या ३५,००० हजार का?”

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

२४/०६/२०१५

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ “युगांत” अध्याय-1 भाग-2 – डॉ विनोद गायकवाड ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार (हिन्दी भावानुवाद)

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत (मराठी)

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपका ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ युगांत – अध्याय -1 -भाग – 2 – गंगा  ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

उस क्षण का आज भी मुझे स्मरण है।

आप उसे मोह का क्षण कहें या अधःपतन का, किंतु उसके बारे में मुझे कुछ और ही लगता है। वह क्षण मुझे नियती की लीला का क्षण लगता है। जिस प्रकार बीज में वटवृक्ष समाहित रहता है उसी प्रकार आज की क्षणिक घटनाओं में भविष्य में घटित होनेवाली  घटनाएं समाहित होती हैं, ऐसा मेरा दृढ़मत है।

वह साक्षात् ब्रह्मदेव की ऐश्वर्यसंपन्न सभा थी। कई सारे देवताएँ, महर्षि तथा सन्मानीय तेजस्वी जन वहाँ स्वाभिमानपूर्वक स्थानापन्न थे। सभा के प्रमुख स्थान पर ब्रह्मदेव उपस्थित थे, उनका तेज, उनकी प्रसन्न मुद्रा के कारण वहाँ सहस्त्रसूर्यों की आभा फैल रही थी। वातावरण आल्हाददायक और रमणीय था।

मैं सद्यस्नाता अलंकारों से मंडित अमूल्य वस्त्रप्रवरणों से सजी हुई थी। चिरयौवन का वरदान प्राप्त मेरी कोमल, लुभावनी काया विलोभनीय लग रही थी। मुझे अपने सौंदर्य के असीम प्रभाव का पूरा अहसास था और उसका विलक्षण मद भी मुझ पर चढ़ा था।

देवसभा में किसी विषय पर कोई चर्चा हो रही थी और मैंने वहाँ प्रवेश किया।

पर्णसमूह में छुपा पूर्ण विकसित पुष्प पत्ते हटाकर बाहर आ जाए मानो वैसा ही मेरा प्रवेश हुआ था। मुझे अनुभव हुआ कि मेरे असीम सौंदर्य की मोहिनी वहाँ फैल रही है और मैं और भी मस्त हो गयी।

उसी क्षण.. एक चमत्कार हुआ।

सभाजनों की दृष्टि मुझ पर टिक गयी।  किंतु अचानक सभी गर्दन झुकाकर विचारमग्न हो गए ऐसा मुझे आभास हुआ और मैं चौंक हो गयी।

क्यों इन्होंने मेरी सौंदर्यसंपन्न देह से अपनी नज़रे चुराकार नीचे की ओर कर ली थी?

क्या यह मेरे स्वर्गीय लावण्य का यह अधिक्षेप तो नहीं था? क्या ये सभी कामद्वेषी है? नपुसंक हैं ?

उई माँ!

निराशा की खाई में जानेवाला मेरा मन अचानक उछल पड़ा,क्योंकि मेरे लावण्य का सम्मान करनेवाला कोई तो था! मेरे यौवन का आस्वाद नजरों से लेनेवाला कोई तो था! मेरी देहलता पर खिलनेवाले फूल को सूंघने की इच्छा रखनेवाला कोई तो महावीर वहाँ उपस्थित था!

वह एकटक मुझे देख रहा था। मेरा ध्यान भी उसकी दैदिप्यमान देह की ओर गया। वह अप्रतिम सुंदर था। बलशाली था। उसका देहसौष्ठव उसके पराक्रमी इतिहास की दृढ़ साक्ष दे रहा था।

इक्ष्वाकू कुल का वह पराक्रमी और पुण्य  प्रतापी राजा महाभिष राजा था। उसने पृथ्वीपर एकसहस्त्र अश्वमेघ यज्ञ किए थे। एक शतक राजसूय यज्ञ पूर्ण करके इंद्र को प्रसन्न कर लिया था। उस पुण्यकर्म के कारण वह ब्रह्मदेव की सभा में कई महर्षियों के साथ उपस्थित था। और अब मुझपर मुग्ध था।

और मैं ?

मेरी भी स्थिति कुछ  कुछ वैसी ही थी। मैं भी उसके स्वरूप संपन्नता से घायल हो गई थी और उसकी ओर व्याकुल नज़रों से देख रही थी।

इतनी मोहमाया निर्माण हो गयी थी हम दोनों को समूची सभा का स्मरण ही नहीं रहा।

उसी क्षण …

‘गंगा…’ ब्रह्मदेव की क्रोध से भरी आवाज़ कानों पर पड़ी। जैसे मेघपटल पर बिजली की कडकडाहट … मैं चौंक गई।

होश में आयी।

“क्षमा देव…” हाथ जोड़कर मैं बोली। मधु का मद उतर गया था।

“पहले अपना वस्त्र संभालो”। उतने ही क्रोध से उन्होंने कहा और मैं पूरी तरह से लज्जित हो गई।

मतलब?

मेरे वक्षस्थल से मेरा वस्त्र ढुलक गया था! इसलिए तो मेरा अनावृत सौंदर्य नज़रों में आते ही सभाजनों ने अपनी नज़रें झुका ली थीं! इसका मतलब उन्होंने मेरे लावण्य का अपमान नहीं किया था। अपितु उन्होंने अपनी सभ्यता ही प्रकट की थी।

और मैं ? मदहोशी में गलत समझ गयी थी। मोह में विवेक खतम होता है यही सच है।

मेरी देह में हलकी सीं कंपन हुई। भविष्य के अशुभ की कुछ आहट सी हुई।

सारी देह पर वस्त्र लपेट कर मैंने गर्दन झुकाकर क्षमाचना की।

पर नहीं !

जो अटल होता है वह कभी टलता नहीं। भाग्य में बदे सकंट कभी चुकते नहीं है।

क्रोधित ब्रह्मदेव क्रोध से कडके, “ इक्ष्वाकू कुलोत्पन्न सम्राट महाभिष …..”

वह तेजस्वी राजा तत्परता से खड़ा हो गया। उसके नेत्र करुणा से भर आए थे। किसी शाप से दग्ध होने की टोह लेता हुआ वह गूंगा बन कर खड़ा था। क्योंकि अब बोलने से कोई लाभ नहीं था। महर्षि की सभा में जो होना था वह घटित हो चुका था। अपराध तो हुआ था। प्रायश्चित लेना अटल था।

वह पराक्रमी योद्धा हाथ जोड़कर दीनता से खड़ा था।

“महाभिष ब्रह्मदेव का स्वर उफनने लगा, “यह स्वर्ग है और यह ब्रह्मदेव की सभा। यहाँ पुण्यात्मा उपस्थित हैं, महर्षि उपस्थित हैं, यहाँ धर्म और न्याय की चर्चा हो रही और ऐसे समय में तुम कामलोलुप हो गए जिससे मेरी सभा के सम्मान पर लांछन लग गया है। जो खुद पर नियंत्रण नहीं रख सकता वह स्वर्गलोग में रहने के लिए अपात्र है। मनुष्य का जन्म कामपूर्ति के लिए होता है। किंतु वासनांध को एक जन्म में तृप्ति नहीं मिलती। यहाँ सभी दिव्यजनों के होते हुए भी तुम कामातुर हो गए, तुम्हारा यह पतन गृहितप्राय है। तुम दंड के पात्र हो…इसलिए… जाओ.. पुनः तुम्हें पृथ्वीतल पर मनुष्य  जन्म लेना पडेगा.. गंगा को भी मैं यही शाप देता हूँ। वहाँ तुम्हारा मिलन होगा… किंतु… ”?

“किंतु क्या देव …”? महाभिष के मूँह से अस्पष्ट सा प्रश्न निकला।

“किंतु… भले ही गंगा तुम्हें पत्नि के रूप में प्राप्त भी हो तो भी वह तुम्हारी इच्छा का सम्मान नहीं करेगी। वियोग के भय से तुम्हें मिलन में भी सुख पाप्त नहीं होगा.. संतोष नहीं मिलेगा..समुद्र में रहकर भी तुम सदैव प्यासे रहोगे।……..”

और ब्रह्मदेव उठकर चले गए।

जाते समय वे हम दोनों की खुशी लेकर चले गए।

मोह के उस क्षणार्ध में मेरे भाग्य में मृत्यु लोक का दान उछाला गया था।

……….क्रमशः – भाग 3 ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in




हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास ” युगांत” – डॉ विनोद गायकवाड ☆ (हिन्दी भावानुवाद) डॉ प्रतिभा मुदलियार

डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी  उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपका ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ युगांत – अध्याय -1 -भाग – 1 – गंगा  ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक रूप से पढ़ सकेंगे। हमें पूर्ण विश्वास है आप इस कृति को सहर्ष आत्मसात करेंगे। )

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत ( मराठी )

बड़ा ही रहस्यमय है यह जीवन! गूढ़ और उलझा उलझा सा! किसी बीहड़ वन के घनी जाली सा! निथरे जलाशय की कमल लताओं की भीड़ सा सुंदर, विलोभनीय, चित्ताकर्षक किंतु वास्तव में गहन, गूढ़ और प्रलयंकारी!

मनुष्य के जीवन को नदी की उपमा सहजता से दी जाती है। मेरे .. इस गंगा के जीवन को किसकी उपमा दी जाएगी ? दसअसल मैं हूँ कौन ? मेरा अधःपतन तो नहीं हुआ है न?  असल में क्या और कैसे कहें यही मेरी समझ में नहीं आ रहा है। वर्षाकाल की सरिता के प्रवाह सी मैं भावजल में भर भर कर बह रही हूँ। मन में समिश्र भावनाओं की भीड़ जमा हो रही है। इन भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए मुझे उचित शब्द .. आकृतिबंध मिल ही नहीं रहे है। तो भी जंगली घोड़े के समान भावनाएँ चारों ओर उछल रही हैं। उनको संभालने में मैं असहाय. और दुर्बल हो रही हूँ।

अपनी कथा बताते समय मेरा कई बातों की ओर ध्यान जा रहा है। समग्र संसार का जीवन ही असल में गूढ़ रहस्य से भरा और अकल्पनीय है। फूल सुगंध क्यों बिखेरता है यह जैसे समझ नहीं आता वैसे ही साँप क्यों ज़हरीले फुत्कार करते हैं यह भी समझ नहीं आता। मनुष्य को जीवन देने वाली नदियाँ महाप्रलय में उनके ही प्राण क्यों लेती हैं, यह प्रश्न भी तो अनुत्तरित हैं ना! क्या माता कभी अपने ही संतान के प्राण… ?

संसार की कुछ बातों के निर्माण का प्रयोजन क्या होता है, यही नहीं मालूम…

अग्नि.. वायू.. जल…

प्राणरक्षक या प्राण भक्षक?

अग्नि प्रकाश देती है, जीवन को ऊर्जा प्रदान करती है… गरिमा देती है… और अगर उसने बडवानल का रूप धारण किया तो… कोमल कलि से लेकर बालकों तक सब भस्मिभूत!

वायू अर्थात् साक्षात् प्राण ! उसके बिना क्षणकाल जीवन भी असंभव। अगर उसने भी तूफान का रूप धारण किया तो विप्लवकारी मृत्यु का तांडव प्रारंभ होता है।

जल…साक्षात् जीवन… पवित्र…चैतन्य..

किंतु वर्षाकाल की सरिता का जल और तूफान का समुद्रजल यानि मृत्यु के महान देवदूत।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन का यह दोहरा रूप रहस्यपूर्ण होता है.. और जब यह रहस्य खुलेगा तो मेरे चमत्कारिक जीवन की कुछ अतर्क्यपूर्ण लगनेवाली बातों का अन्वयार्थ भी लग जाएगा।

……….क्रमशः – भाग 2 ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in