हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 77 – बदली सोच… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बदली सोच।)

☆ लघुकथा # 77 – बदली सोच श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

बाहर गली में अमिता की दोस्त रागिनी ने आवाज दिया “क्या बात है आज तुम मेरे घर बुलाने नहीं आई? क्या कॉलेज नहीं जाना है?”

अमिता ने कहा- “चलना तो है लेकिन मेरे पास किताबें नहीं है?”

कोई बात नहीं कॉर्नर में जो दुकान है वहाॅं पर आओ चलो हम अंकल से बात करते हैं शायद  कुछ रास्ता निकल आए।”

“अंकल क्या आपके पास  फर्स्ट ईयर की किताबें हैं मिल जाएगी।”

दुकान वाले ने कहा – “रागिनी बेटा तुम्हारे पापा तो कल ही किताबें खरीद कर गए हैं?”

“अंकल मेरी सहेली के पास किताबें नहीं है उसे चाहिये। क्या कोई आपकी जानकारी में बच्चा है जो हमें पुरानी किताबें दे सके।”

“हाॅं बेटा कुछ लोग जब पढ़ाई उनकी खत्म हो जाती है तो वह सारी किताबें मेरे पास छोड़ जाते हैं कि यदि कोई जरूरतमंद बच्चा जिसके पास पैसे नहीं है? वह यह किताबें ले सकता है।”

“शर्त यह है कि तुम दोनों को पढ़ने के बाद जब साल पूरा हो जाएगा तब अपनी किताबें मुझे जाकर देनी पड़ेगी।”

अमिता के चेहरे खुशी के मारे आंसू निकल रहे थे और बिना कुछ कहे ही वह बहुत कुछ कह रही थी सारी किताबें बड़े अच्छे से इकट्ठा करने लगी।

अमिता की आंखों से ऑंसू गिर रहे थे।

रागिनी ने अंकल की दुकान से एक अच्छा सा बैग खरीदा और सारी किताबें  उसमें रख दी और एक ऑटो रिक्शा रोका और बोला रोते ही रहेगी कॉलेज नहीं जाना है क्या?

दोनों हंसते हुए ऑटो रिक्शा में बैठ जाती हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#69 – तथाकथित… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– तथाकथित…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # 69 — तथाकथित — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

एक गुफा में कुछ अस्थियाँ मिल जाने पर उन्हें इतिहास से जोड़ कर देखा गया। माना गया जानवरों की अस्थियाँ होंगी। पर यह अंतिम तर्क न बन पाया। जो तर्क जमा वह यह था भगवानदर्शी ऋषि ऐसी ही गुफाओं में तप करते थे। उस देश का वर्तमान बहुत भ्रष्ट था। परंतु अब इतिहास की एक तथाकथित धरोहर मिल जाने से अब तो मानो तमाम भगवान वहीं से पैदा हो कर पूरे देश में विचरण करने निकलते हैं।

 © श्री रामदेव धुरंधर

17 – 07 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ विवाह संस्था का दरकता स्थापत्य–शिलांग प्रकरण ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ विवाह संस्था का दरकता स्थापत्य–शिलांग प्रकरण ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

विगत कुछ वर्षों से सामाजिक संरचना में होनेवाले भयावह परिवर्तन दहशतनाक दृश्य उपस्थित कर रहे हैं। विकराल आसन्न संकट की

सूचना दे रहे हैं। जो स्त्री पुरुष संबंधों में दरकते विश्वास, प्रेम में धोखा, विकृत मानसिकता,माता-पिता की रूढ़िवादी सोच तथा सूचना संचार क्रान्ति से उपजी विस्फोटक स्थिति का तस्करा करती हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि सदियों से सताई गयी असूर्यपश्या स्त्रियों के लिये शिक्षा और आत्मनिर्भरता के साथ उजालों की व्यवस्था की गयी ताकि वे इस आलोक मैं अपने वजूद को पहचान सकें।

स्त्री पैदा नहीं होती बना दी जाती है सिमोन द बोउआर के शब्दों का मर्म समझे। अपने दोयम दर्जे से मुक्त हो। उसे एक इन्सान की तरह जीने की सुविधा मिले।

इस विचारधारा के साइड इफेक्ट के रूप में एक ऐसा वर्ग उदित हुआ जो वीमेंस लिब के नाम पर स्वच्छन्दता और स्वैराचार का हिमायती हो गया। ऐसी में कितने ही अप्रिय और भीषण दृश्य सामने आने लगे।

ड्रग्स,ड्रिंक्स, स्मोकिंग ,मुक्त यौन संबंधों के चलते असंस्कृत प्रकरण समाज को दहलाने लगे।

सूक्ष्मवस्त्रधारिणी स्त्रियों ने स्लोगन दिया–मैं जो चाहे करूं मेरी मर्जी। वे स्टैंड अप काॅमेडी में अश्लील गालियां देती हुई पाई जा रही हैं।

ओ टी टी प्लेटफार्म पर प्रस्तुत, विकृत फिल्में हिंसा यौनाचार से जनता को उत्तेजित करती हैं। निर्माताओं को धन उगाहना है। देश जाये भाड़ में। सेंसर बोर्ड यानी बिजूका। टी वी पर क्राइम थ्रिलर भी दुष्टों को उकसाते हैं। उनकी कुत्सित सोच को खाद पानी देते हैं। स्मार्ट फोन भी पीछे नहीं। अश्लील साइट्स ने किशोरों की मानसिकता में जहर भरने का काम किया है। टीन एजर बच्चे जल्दी गिरफ्त में आते हैं। आजकल तीन साल के बच्चे को मोबाइल देने का फैशन है। कच्ची उम्र में माता पिता के मनोवैज्ञानिक ट्रीटमेंट की भारी जरूरत होती है। आधुनिकता के नाम पर निरंकुश आजादी के दुष्परिणाम समाज देख रहा है। । रेप और हत्याओं का सिलसिला इसी की परिणति है।

विश्वास ही एक ऐसी चीज है जिसके आधार पर राष्ट्र की हर इकाई, समाज परिवार और सारे रिश्ते परवान चढ़ते हैं। संस्कृति की दुहाई दी जा सकती है।

यह सारा कथानक इसलिए कि समाज का ढाँचा चरमरा रहा है। प्रेमी की मदद से पति की हत्या के प्रकरण लंबे अर्से से सुर्खियों में हैं। एक सुन्दर शिक्षित दुल्हन के रूप में कोई नागिन हत्यारिन डसने वाली है, ऐसी कल्पना भी कोई कैसे कर सकता है। मुस्कान ने प्रेमी के साथ पति के टुकड़े टुकड़े कर दिये और ड्रम में भर दिये। “—नीला ड्रम” लंबे समय तक दहशत का प्रतीक बना रहा।

और अब ताजातरीन “शिलांग प्रकरण”—इन्दौर की सोनम ने हनीमून के ख्वाब दिखाए और शिलांग में अपने पति राज रघुवंशी की हत्या करवाई। हैरानी है कि जो लड़की 20 लाख की सुपारी देकर इतने जघन्य कांड को अंजाम दे सकती है वह सीधे सीधे माता पिता से शादी के लिये मना कर सकती थी या प्रेमी संग भाग सकती थी। एक बेकसूर की हत्या कर डाली। अंततः सलाखों के पीछे ही उम्र गुजारेगी। ये किस प्रजाति की स्त्रियों का उदय हो रहा है। इन्हें परिणाम का भय नहीं होता। क्या इन्हें जरा भी अंदेशा नहीं होता कि फाँसी मिलेगी या आजीवन कारावास।

एक ने तो शादी के मंडप में वरमाला हाथ में लेकर दूल्हे से कह दिया कि वह किसी और से प्यार करती है लिहाजा ये शादी नहीं कर सकती। काश वह लड़की माता पिता की इज्जत की ऐसी धज्जियां न उड़ाती। और माता पिता को बेटी के प्रेम प्रकरण की भनक न हो ऐसा तो हो नहीं सकता।

पुणे का “लिव इन “कपल भूले नहीं होंगे लोग जहां पुरुष ने स्त्री को मारकर उसके टुकड़े फ्रिज में रख दिये थे।

इन दुर्दांत घटनाओं के अलावा डिवोर्स से लेकर एलीमनी गाँठना और प्रेमी संग ऐश करने की घटनाएं भी घटित हो रही हैं।

बेंगलुरु मेरठ आगरा मुंबई कितने शहरों के नाम लिये जायें। दुष्ट महिलाएं बेखौफ हैं। इधर शादी के आकांक्षी युवाओं में खौफ छाया हुआ है। दुल्हन के रूप में यमदूती न आ जाये कहीं। खून पसीने की कमाई एलीमनी की भेंट न चढ़ जाये।

यह विवाह संस्था के स्थापत्य की ढहती हुई दीवारों की ओर इशारा है।

अधिकांश कानून स्त्रियों के पक्ष में हैं। विवाहेतर संबंधों में स्त्री को पीड़िता का दर्जा दिया गया है। दहेज प्रताड़ना के दृश्य भी विचलित करते हैं। आश्चर्यजनक हैं ऐसी खबरें कि कुछ लड़कियां खुद भारी भरकम दहेज चाहती हैं। रक्षा के लिये निर्मित कानूनों का बेजा फायदा उठा रही हैं स्त्रियां। वे अपनी नैसर्गिक छवि का जनाजा निकाल रही हैं।

माता पिता –बच्चों की परवरिश और नैतिक मूल्यों को लेकर सचेत हों और समाज में नाक कटेगी इस सड़े विचार को लेकर समाज का ही नुकसान न करें। जब बेटी हत्या करवाती है तब नाक नहीं कटती ?

संबंधों की चूलें हिल चुकी हैं। अगर वक्त रहते पारिवारिक परिवेश और बासी बेकार मान्यताओं को लेकर लोग सजग न हुये तो और भी कई गुनाह जन्म ले सकते हैं। वक्त बेशक पीछे मुड़ना नहीं जानता पर परिवार प्रणाली का पुनरीक्षण करने की महती आवश्यकता है। शिलांग हत्याकांड के सूत्र हर रिश्ते को आईना दिखा रहे हैं। कोई भी गुनाह एक दिन के विचार की परिणति नहीं होती। वह समय के साथ परिवेश से खाद पानी लेता हुआ पल्लवित होता है। तब दायित्व के निर्वाह को लेकर हर रिश्ते को कठघरे में उपस्थित किया जाना चाहिए।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – सुचालक ☆ सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ☆

सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा

परिचय

शिक्षण : प्रयागराज विश्वविद्यालय से स्नातक (हिंदी, राजनीति-शास्त्र, इतिहास) 

सृजन की विधाएँ : लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘रोशनी के अंकुर’ एवं  ‘टूटती मर्यादा’ लघुकथा संग्रह तथा  ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह। अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित। सम्पादन :  ‘खाकीधारी’ 2024{लघुकथा संकलन} ‘अदृश्य आँसू’ 2025 {कहानी संकलन} ‘किस्से खाकी के’ 2025 {कहानी संकलन} ‘उत्तर प्रदेश के कहानीकार’ 2025 {कहानी संकलन}

पुरस्कार : लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य/कविता विधा में कई बार पुरस्कृत। आकाशवाणी आगरा से कहानी प्रसारित 

अनुवाद : ‘अदहने क आखर’ अवधी अनुबाद [लघुकथा-संकलन], कुछ लघुकथाएँ पंजाबी, उर्दू, नेपाली और उड़िया में अनूदित होकर प्रकाशित।

यू ट्यूब चैनेल :  ‘savita mishra akshja’ और ‘साहित्य एक समुन्दर: ‘अक्षजा’ नाम से।  ब्लॉग : ‘मन का गुबार’ एवं ‘दिल की गहराइयों से’।

सम्प्रति: परिवार की धुरी, ब्लॉगर, साहित्यकार, यूट्यूबर।

☆ लघुकथा – सुचालक ☆ सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ☆

“आज मेरे मैसेज का तुमने कोई जवाब नहीं दिया।”

“सिर में दर्द हो रहा था यार।”

“क्यों! क्या हुआ?”

“अरे जानती ही हो, फेसबुक पर कहीं पार्टी विरोधी और समर्थकों की लम्बी हांक, तो कहीं जातिवाद का जहर।”

“अरे तो कौन कहता है कि फेसबुक की सारी पोस्ट पढ़ों!”

“सारी कौन पढ़ रहा। लेकिन फ्रेंडलिस्ट वालों की पोस्ट-कमेन्ट तो दिख ही जाती हैं। कमेन्ट ऐसे कि बुझ चुकी राख में भी आग पैदा कर दें।

“हटाओ अपनी फ्रेंड-लिस्ट से ऐसे सिर-दर्दो को, क्यों झेले पड़ी हो?”

“अरे यार! जातिवाद का जहर बोते देखकर क्रोध में दिल तो मेरा भी यही कहता है। उनकी प्रोफाइल खोलती भी हूँ, लेकिन अनफ्रेंड पर गया मेरा अँगूठा उस समय रुक जाता है, जब उनके द्वारा कहा गया दीदी/जिज्जी का सम्मानजनक संबोधन याद हो आता है।”

“भावनाओं में बहकर तुम उनके नकारात्मक विचारों को बढ़ावा दे रही हो, फिर से सोच लो!”

“नहीं यार, तू समझती क्यों नहीं है! ये दीदी/जिज्जी मेरे लिए सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि अपनेपन की मिठास है। मैं उन्हें अन्फ्रेंड करके इस रिश्ते को कसैला नहीं करना चाहती हूँ।”

“चाहे अपनी बात को शिष्टता से रखने पर भी वो तुम्हें अनफ्रेंड कर दें! पीठ पीछे तुम्हारी इस परम्परावादी सोच की चाहे हँसी ही क्यों न उड़ाएं! क्यों?” क्रोध की लकीरें दोनों के माथे पर उभर आई थीं।

“तू जानती है न कि स्त्रियाँ रिश्तों की सुचालक होती हैं। वे रिश्तों को तब तक जीना चाहती हैं, जब तक पानी सिर के ऊपर से न बहने लगे।” अब दोनों के चेहरे पर गर्वीली मुस्कान कानों तक खिंच गयी थी ।

© सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

सम्पर्क: फ़्लैट नंबर-302, हिल हॉउस, खंदारी अपार्टमेंट {हनुमान मन्दिर के बगल में} खंदारी, आगरा, {उ. प्र.} पिन-282002

ई-मेल: 2012.savita.mishra@gmail.com मोबाइल: 09411418621

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी – लघुकथा – “बच्चे पालने हैं…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी – लघुकथा – “बच्चे पालने हैं ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

आज मेडिकल हाल बंद था ।

क्यों ? साथ वाले करियाना के दुकानदार से पूछा ।

कुछ बता नहीं पाया ।

काफी दिनों से यहीं दवाई लेने से एक मुस्कान का रिश्ता बन गया था और नम्बर भी ले लिया था । 

फोन मिलाया ।

-क्या हुआ ? मेडिकल हाल बंद क्यों है ?

-चालान हो गया ।

-क्यो ?

-नकली ग्राहक आया और बिना पर्ची वाली दवाई दे बैठा।

-फिर सात दिन मेडिकल हाल बंद करने का सरकारी हुक्म ।

-कब खुलेगा मेडिकल हाल ?

-बस । कल का दिन और बंद रहेगा ।

-जब इतनी बड़ी बात थी तो खोलने का हुक्म कैसे?

-ले लिया न माल इंस्पेक्टर ने ।

-अरे । ऐसे कैसे ?

-यह इंस्पेक्टर ऐसा ही है । कुछ दिन पहले सामने वाले केमिस्ट से भी ले गया ।

-तुमसे कितने ले गया ?

-छोड़ो जी ।

-क्यों ?

-बच्चे पालने हैं ।

-मैं तुम्हारे पैसे वापस दिला सकता हूं ।

-कैसे ?

-अधिकारियों तक मामला ले जाकर ।

-न जी । ऐसा न करना ।

-क्यों ?

-जो हो गया सो हो गया ।

-अरे ? कोई बड़ा जुर्म नहीं किया और बड़ी रकम ऐंठ ले गया और तुम चुप के चुप सह रहे हो जुल्म?

-बस जी । क्या करें ?…  बच्चे पालने हैं ।

शहीद भगतसिंह ने यदि एक बार भी सोचा होता कि बच्चे पालने हैं तो,,,,

मैं सोचता गया सोचता गया…

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ पुरस्कृत लघुकथा – कोख में आत्महत्या… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह तथा 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह। कुल 9 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कलेलकर पुरुसकर 2013 लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 35 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभरती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा कोख में आत्महत्या

? लघुकथा – कोख में आत्महत्या ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

(आचार्य जगदीशचंद्र शर्मा स्मृति अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 2025 में पुरस्कृत)

“ प्यारी मां , मैं जानता हूं आज तुम बेहद खुश हो , तनाव मुक्त हो, बल्कि यूं महसूस कर रही हो मानो जीवन में कोई बड़ी जंग जीत ली हो. आज तुमने सोनोग्राफी की आड़ में लिंग परीक्षण कराया. जब डॉक्टर ने कहा आपकी कोख में लड़का है तो तुम्हारे मुख से खुशी से हल्की सी चीख निकल गई थी. आखिर दो लड़कियों की कोख में हत्या के बाद तुम्हें वह खुशखबरी सुनने को मिली थी जिसका तुम मुद्दत से इंतजार कर रही थी.

डॉक्टर को अनेक बार धन्यवाद देकर तुम घर लौटी .पापा भी बहुत खुश हैं और दोनों बेटियों को जब बताया कि उनका भाई आने वाला है तो वे भी खुशी से चहकने लगीं .उन्हें भी खेलने के लिए छोटा सा खिलौना मिल जाएगा. राखी बांधने भाई के लिए कितना तरसती थीं अब वह इच्छा भी पूरी हो जाएगी.

 मेरी मां, विज्ञान ने कितनी भी तरक्की कर ली हो लेकिन इस बार डॉक्टर भी गच्चा खा गए. तुम्हारी कोख में लड़का नहीं बल्कि मैं हूं, न लड़का ना लड़की. जिसे आम  इंसान अधूरा कहते हैं. मैं चिंतित हूं यह सोच कर कि मेरे जन्म से तुम सबको कितना बड़ा सदमा लगेगा. मेरे जन्म पर तुमने बैंड बाजे बजवाने की योजना बना रखी है. उसके स्थान पर ताली बजाने वाले आ जाएंगे  क्या हाल होगा तुम्हारा ? बहनों का राखी बांधने का अरमान कहां पूरा होगा? समाज से तिरस्कार,  व्यंग्य बाण, खिल्ली, सहानुभूति के सिवाय कुछ भी तो नहीं मिलेगा.  कैसे जी पाओगे इतने तनाव, परेशानियों के बीच ? इन सब से बचने का एक ही तरीका है मेरे जन्म को रोकना.  इसी में सब की भलाई है. इसलिए मैं अपनी सांसों की गति को विराम देने जा रहा हूं. कोख में कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला तो वर्षों से जारी है , लेकिन कोख में आत्महत्या कदाचित पहली बार होगी वह भी एक ऐसे शिशु द्वारा जिसके आगमन का पूरा परिवार बड़ी शिद्दत से इंतजार कर रहा है.इंद्रधनुषी सपने देखे जा रहे हैं.खुशियां मनाने की बड़ी योजनाएं बनाई जा रही हैं.

हमारी जमात हमेशा सबकी खुशियों में शामिल होकर , नाच गाकर आशीर्वाद और दुआएं देती है.उसी का अनुसरण करते हुए मैं भी आपकी खुशियों और दुआओं की कामना करते हुए हमेशा के लिए बिदाई ले रहा हूं…”

 तुम्हारा अजन्मा शिशु

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 219 – वैज्ञानिक बाल कथा – शरीर की आत्मकथा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी वैज्ञानिक बाल कथा – शरीर की आत्मकथा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 219 ☆

☆ वैज्ञानिक बाल कथा – शरीर की आत्मकथा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

क्या आप मुझे जानते हो ? शरीर से आती आवाज सुन कर बेक्टो चौंका, ‘‘ नहीं तो ?’’

‘‘ मैं शरीर हूं. ’’ उस के शरीर से आवाज आई, ‘‘ चलो ! तुम्हें मैं अपनी आत्मकथा सुनाता हूं.’’ कहने के साथ उस ने लगातार बोलना शुरू किया. बेक्टो केवल गरदन हिलाहिला कर हांहां कहता रहा.

मेरे अंदर मस्तिष्क सब से महत्वपूर्ण अंग है. यह हजारों कंप्युटर जितनी सूचनाएं एकत्र कर सकता है. यह पूरे शरीर को अपने नियंत्रण में रखता है. किसे क्या काम करना है ?  कैसे करना है ? इन सब को यही दिशानिर्देश देता है.

दूसरा महत्वपूर्ण अंग आंख होती है. यह 2 मिली सैकण्ड में किसी भी चीज पर प्रतिस्थापित हो जाती है. किसी दृश्य को देखना इसी के द्वारा संभव है. हम ज्ञान का अधिकांश  भाग इसी के द्वारा अर्जित करते हैं.

तीसरा महत्वपूर्ण अंग फैफडे होते हैं. ये एक दिन में एक टेंकर से भी ज्यादा खून साफ कर के उसे पूरे शरीर में पंपा कर देते हैं. पूरे शरीर में आवश्यक पोषक तत्व पहुंचाने में इसी खून की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

हाथपैर हमारे चौथे महत्वूपर्ण अंग होते हैं. इस के द्वारा ही हम अधिकांश कार्य करते हैं. ये न हो तो हमारे अधिकांश कार्य बाधित हो जाए. इन अंग पर पाई जाने वाली एक इंच त्वचा में 72 फीट नव्र्स होती है.

कान हमारे पांचवे महत्वपूर्ण अंग है. इन के द्वारा हम ध्वनि सुन कर बोलना सीखते हैं. यदि ये न हो तो हम बोल नहीं सकते हैं. इसलिए जो व्यक्ति सुन नहीं पाता हे, वह बोल नहीं पाता है.

नाक हमारा छटा सब से महत्वपूर्ण अंग है. इस के बिना हम सूंघने में सक्षम नहीं हो सकते हैं. खुशबू और बदबू इसी से पता चलती है. ये नाक ही है जो हमारी सांस के रूप में जाने वाली हवा को साफ व शुद्ध करने का काम करती है.

मुंह हमारा सातवां सब से महत्वपूर्ण अंग है. इस के द्वारा हम बोलने और खाने का काम करते हैं. इस के अंदर उपस्थित मजबूत दांत 280 किलो तक का वजन सहन कर सकते हैं. दांत जितने दिखने में छोटे होते हैं उतने ही ज्यादा मजबूत होते हैं.

आठवें महत्वपूर्ण अंग हमारे निकास द्वार हैं. ये अंग हमारे शरीर के मलमूत्र को बाहर करते हैं.

उपरोक्त सभी अंग हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंग है जो हमे दिखाई देते हैं. इन के अलाव भी कई अंग है. गला, छाती, पेट, पीठ, कमर, घुटने, पिंडली और बहुत कुछ. मगर,  सब से महत्वूपर्ण अंग में त्वचा भी शामिल है.

वैसे हमारे शरीर के पास पांच ज्ञानेंद्रिया है. नाक,  कान,  आंख, मुंह और त्वचा. जिन के द्वारा हम ज्ञानवर्धन करते हैं.

इतना कह कर शरीर चुप हो गया. बैक्टो को अपने स्कूल जाना था. वह चुपचाप स्कूल चला गया. उसे आज अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियो के बारे में लिखना था. शरीर की यह आत्मकथा सुन कर वह बहुत कुछ जान गया था. इसलिए वह खुश था. ‘‘ चलो ! आज मैं अपनी ज्ञानेंद्रियों के बारे में अच्छी तरह से लिख पाऊंगा.’’ 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

11- 05-2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

सेवकराम जी को अपने प्रिय साहित्यकार मित्र डॉ रंजीत की काफी याद आ रही थी. उनका देहावसान बीस दिन पूर्व ही हुआ था. उनके जाने के एक माह पूर्व ही उनकी पत्नी रंजना भाभी का देहावसान हो गया था.

उन्होंने अपना सारा जीवन अध्यापन और साहित्य सेवा में निकाल दिया. उनके सुशील और सेवाभावी पुत्र सुजीत और विनम्र पत्नी सुनीता ने रंजीत जी और रंजना भाभी की अंत तक सेवा की. ऐसे भाग्यशाली बहुत कम ही देखने को मिलते हैं. डॉ रंजीत ने अपने बेटे को बमुश्किल शहर के एक प्राइवेट कॉलेज में नौकरी भी दिला दी थी.

आज सेवाराम जी को डॉ रंजीत की याद उनके घर तक ले गई थी. सुजीत उन्हें डॉ रंजीत जी के कमरे में ले गया.  वे टेबल के पास कुर्सी पर बैठ गए जैसा हमेशा बैठते थे. कमरा अब भी वैसा ही था.

औपचारिकतावश सुजीत से उन्होंने पूछा – “बेटे मेरे लायक कुछ हो तो निसंकोच बताना.”

सुजीत ने झिझकते हुए अपनी समस्या साझा करना चाहा- “चाचा जी, आप यह सब जो इस कमरे में चारों ओर देख रहे हैं न, पिताजी के सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकों से भरी बुकशेल्फ! इतनी ही पुस्तकें इस दो कमरे के घर में भरी पड़ी हैं। मैं इनका क्या करूँ? कोई इन्हें लेने के लिए भी तैयार नहीं है. शहर में एक भी पुस्तकालय नहीं बचे जहाँ ये पुस्तकें दी जा सकें. उनके कोई मित्र भी लेने को तैयार नहीं हैं.”

अब सेवकराम जी का मस्तिष्क शून्य हो गया. उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था. बड़े मुश्किल से वह यही कह सके – “बेटा सुजीत, मुझे सोचने के लिए थोडा वक्त दो.”

और वे चुपचाप घर की ओर निकल पड़े.

©  हेमन्त बावनकर  

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 234 – मै किसान हूँ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “मै किसान हूँ ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 234 ☆

🌻लघु कथा🌻 👨‍🎓मै किसान हूँ 🌻

शहर में कई प्राईवेट दंत चिकित्सालय, और सभी अस्पताल में मारामारी। पहले हम, पहले हम, और नेता, पैसे वालों की पुर पहुँच। पूछताछ  कक्ष पर बैठी सिस्टर बार-बार कह रही थी – – – सभी लाइन में आए, सभी लाइन में आए!! अपनी-अपनी पारी से आए नहीं तो डॉक्टर साहब बाहर निकाल देंगे।

फिर ना कहना हमें बताया नहीं। सभी के नाम परिचय के साथ लिख रही थी।लगभग चौबीस वर्ष का युवक पिता के साथ बैठा था। जब उससे पूछा गया – –

आपका नाम– बहुत ही शालीनता के साथ उसने बोला- अभिषेक

किसको दिखाना है?

अपने पिताजी लेकर आया हूँ।

क्या करता है – – – खेती करता हूँ।

सर से पाँव तक  न जाने क्यों सभी  लोग देखने लगे। साधारण पहनावा पर कद काठी गठीला दमकता शरीर।

अपने पिताजी के दांत दर्द से वह परेशान हो रहा था। बातों ही बातों में पास बैठी एक सज्जन महिला ने पूछ लिया— नौकरी नहीं? मिली या पढ़ाई नहीं किया?

अभिषेक ने धीरे से गहरी मुस्कान के साथ बताया बी. ई. की पूरी पढ़ाई करने और सर्विस को छोड़ने के बाद मैं खेती करने आ गया।

पापा का हाथ बटाना चाहता हूँ।

और यह कहते हुए पेंट की जेब से नोटों की गड्डी को निकाला और फीस जमा करने लगा।

उसके दृढ विश्वास को देख महिला ने ताली बजाकर कहा – – गर्व से कहो मै किसान हूँ।

प्यार दुलार से उसके सिर पर हाथ फेरा और बोली अब कोई पूछे तो खेती करता हूँ नहीं गर्व से सीना तानकर कहना – – – मैं एक किसान हूँ।

अभिषेक के चेहरे पर मासूम भरी मुस्कान और किसान की पहचान।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#68 – कविता का गिद्ध… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कविता का गिद्ध…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # 68 — कविता का गिद्ध — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

वह अपने कवि मित्र की तरह कविताएँ लिख कर उसी की तरह मशहूर होना चाहता था। पर पीछे तो छूट ही जाता था। बहुत बाद में उसे पता चला मित्र की कविताओं में तो बहुत सारा चोरी का माल है। उसके मन में बात आई, आज अपना स्वाभिमान इस तरह से हो जाए एक गिद्ध से अपनी होड़ मानता था। वक्त पर अपनी आँखें न खुलतीं तो कविता की देवी कभी पूछ लेती क्या गिद्ध का आभास तुम्हें होता नहीं था?

 © श्री रामदेव धुरंधर

11 / 07 / 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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