(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है यथार्थ के धरातल पर स्त्री विमर्श पर आधारित एक अत्यंत संवेदनशील एवं विचारणीय लघुकथा “दो बाँस…”। )
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 126 ☆
☆ लघुकथा – दो बाँस☆
कमलाबाई गाँव में अपने पति झुमुक लाल के साथ रहती थी। निसंतान होने के कारण सारी जमीन जायदाद उसके छोटे भाई ने अपने नाम लिखवा लिया। खाने के लाले पड़ने लगे, उम्र ज्यादा होने के कारण झुमुक लाल को दिखाई नहीं देता था। आँखों से लाचार फिर भी पत्नी के लिए परेशान रहता था।
किसी तरह खाने-पीने का इंतजाम हो जाता था। आस पड़ोस के लोग कुछ सहायता कर जाते हैं और थोड़ा बहुत अनाज दे जाते थे। एक छोटे से झोपड़ी नुमा घर में रहते थे।
चुनाव चल रहा था। वोट मांगने प्रत्याशी घर-घर दस्तक दे रहे थे। कमलाबाई के घर आने पर पूछा गया…” सब ठीक-ठाक है।” कमलाबाई ने हाथ जोड़कर कहा…. “जैसे तैसे खाने का इंतजाम हो जाता है साहेब, परंतु झोपड़ी में एक तरफ से पानी आएगा अब बरसात भी आने वाली है, आप मुझे दो बड़े बड़े बाँस दिलवा देते तो मैं पन्नी लगाकर घर को बचा लेती।”
मंत्री जी ने बड़े बड़े अक्षरों पर लिखवा लिया कि बाँस दिया जाए। कमला और झुमुक लाल खुश थे कि बाँस मिल जाएगा और घर की टपरिया में पन्नी बांध लेंगे।
वोट देते समय कमलाबाई खुश थीं। अब घर बन जाएगा।
अचानक रात में तेज बारिश और आंधी चली। पति-पत्नी एक कोने का सहारा लिए बैठे थे। सुबह-सुबह एक तरफ से दिवाल गिरी और झुमुक लाल बैठे का बैठा ही रह गया।
प्राण पखेरू उड़ चुके थे। मंत्री महोदय के घर से दो बाँस आ गया कोरे कागज पर कमला का अंगूठा लगाया गया बांस मिल गया।
कितने दयावान है मंत्री जी अंतिम संस्कार के लिए नया बाँस और कुछ रूपया कमलाबाई को दिए हैं।
तस्वीर खींचते देर नहीं लगी। शाम को कमलाबाई को एक बड़ी गाड़ी लेने आई और एक बाँसो से भरी ट्राली भी आई।
कमलाबाई को अनाथ आश्रम के लिए भेजा गया और उस झोपड़ी के चारों तरफ बाँस की बल्लियां लगाई गई।
कमलाबाई शून्य हो ताकतीं रहीं। झोपड़ी नुमा मकान में चारों तरफ से बल्लियां लगाकर मंत्री जी के नाम की तख्ती लग गई।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ कथा कहानी ☆ यह आम रास्ता नहीं है ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
यह जो छोटी सी पक्की ईंटों की पगडंडी जा रही है तब एकदम कच्ची हुआ करती थी। यह कच्ची पगडंडी इसलिए कि उन दिनों आवासों के आसपास मजबूत दीवार थी और इस कच्ची पगडंडी की जरूरत हर आम-ओ-खास को पड़ती रहती थी। मैं भी इसी पगडंडी पर संभल-संभल कर मोटरसाइकिल चलाते हुए पहली बार अमृता से मिलने गया था। उसे कॉलेनी में बिल्कुल दीवार के साथ सटा आवास मिला हुआ था।
यों अमृता से मेरी पहली मुलाकात अचानक हुई थी। मैं एक कार्यक्रम की कवरेज करके निकल रहा था और उस दिन मोटरसाइकिल की बजाय पैदल ही था। देखा मेरे सामने एक विभाग के मित्र गाड़ी में बैठे हैं और मुझे इशारा कर रहे हैं, गाड़ी में आ जाने का। ड्राइविंग सीट पर एक महिला स्टेयरिंग संभाले बैठी थी। मित्र ने परिचय कराया, वह अमृता थी, किसी दूसरे विभाग में पढ़ाती थी।
इसके बाद मैंने विभाग में जाकर चाय का प्याला पीने की पेशकश स्वीकार की तब अमृता ने बताया था कि परिचय करवाने वाले मित्र के बारे में उसकी राय बहुत अच्छी नहीं है और इसी के चलते वह मुझे भी कोई तरजीह नहीं दे रही थी लेकिन इधर-उधर की जानकारी मिली कि आप ठीक-ठाक आदमी हो, इसलिए चाय पर निमंत्रण दे दिया। अमृता की साफगोई मुझे अंदर तक झू गई थी। सरल भाव से सब सच-सच कह देने की अमृता की अदा से मैंने उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया था, जिसे थामने में उसने भी देरी नहीं की।
मैं उस शहर में नया-नया आया था और मेरी शामें बहुत अकेलीं और उदास बीतने से अमृता ने बचा लीं। यह तो बाद में अहसास हुआ क उसकी शामें भी उतनी ही उदास व तन्हा थीं। मैं एक दिन भीड़ भरे बाजार में से गुजर रहा था कि अमृता दिख गई। उसके कदम ठिठके तो मैं भी आगे नहीं बढ़ पाया। वह बताने को तो टेलर मास्टर के पास किसी सूट के डिजाइन के बारे में बात करने आई थी पर मेरे निमंत्रण पर ही एक रेस्टोरेंट में चलने को तैयार हो गई थी। मेज पर आमने-सामने पहली बार हम बैठे थे और रेस्टोरेंट के और ग्राहकों के शोर शराबे के बावजूद खामोश एक-दूसरे को देख रहे थे कि बात का सिलसिला कहां से शुरू करें।
आखिर अमृता ने बताना शुरू किया था कि कैसे वह बड़े विश्वविद्यालय में उस व्यक्ति के संपर्क में आई, जो अब उसका पति है और कैसे एक ही विश्वविद्यालय में पहुंचे पर उसकी महत्वाकांक्षा इस शहर में बने नए विश्वविद्यालय में नए विभाग में खींच लाई। अब बच्चों की मां की भूमिका के साथ-साथ महत्वाकांक्षा दुखदायी साबित हो रही है। पति महोदय किसी अखबार के रविवारीय संस्करण की तरह आते हैं और सोमवार से फिर जिंदगी का पहिया अकेले ही खींचना पड़ता है। बहुत से काम ऐसे होते हैं, जहां अकेले भाग-दौड़ कर जब बुरी तरह हांफ जाती हूं, तब भीड़ भरे बाजार में निकल पड़ती हूं, अजनबी चेहरे ही सही, कुछ नए लोगों को देख लेती हूं और किसी-किसी दिन पहचान वाले व्यक्ति से भी मुलाकात हो जाती हे, जैसे कि आपसे आज मुलाकात हो गई।
मुलाकातों का यह सिलसिला फिर चल निकला और उदास शामें खिलने लगीं। मन का पंछी उड़ान भरने लगा। पांव जमीं पर नहीं लगते थे और रुकते तो सीधे अमृता के घर जाकर। बात दोस्ती से आगे नहीं थी लेकिन लोगों को चर्चा के लिए कुछ न कुछ मसाला चाहिए और वह मिल रहा था। अमृता को इसकी कोई परवाह नहीं थी क्योंकि उसने इन चर्चाओं के बीच जीना सीख रखा था। उसका कहना था कि उसे अपने ढंग से जीना है और उसकी समस्याओं का हल दूसरों के पास नहीं, उसी को खोजना है। फिर दूसरों के रास्ते पर या कहने पर कैसे चल सकती है?
यों अमृता की शादी की सालगिरह में भी संगीत की धुन पर पति पत्नी को मस्त नाचते देखा तब सहज ही विश्वास नहीं हुआ। होली का गुलाल लगाने भी पहुंचा, उस समय घर के हर कोने में रंग बिखरे थे पर जीवन में वे रंग कहां खो गए थे? मैं वहां से लौट कर देर तक सोचता रहा था। अमृता को शराब से नफरत थी और पति महोदय की पहली पसंद। एक बार मैं मित्रता में उपहारस्वरूप उनकी पसंद की चीज ले गया था तब अमृता की आंखों में नफरत की इबारत पढ़ कर मैं ज्यों की त्यों लौटा आया था। कुछ दिन तक उसकी भवें मेरी ओर भी तनी रहीं थीं। उसे वापिस उसी रंग में लाने के लिए कई दिन लग गए थे। यह पहलू भी सामने आ गया था कि पति-पत्नी की प्रेम की डोर कैसे और किन कारणों से कमजोर होती जा रही है।
एक बार अमृता के घर जाते समय अचानक गाय सामने आ गई थी और मेरे थोड़ी चोट लगी देख कर अमृता ने एकदम रूई से सारी सफाई की थी, उससे मैं अंदर तक भीग गया था लेकिन यह सोच कर हैरान था कि आखिर पति-पत्नी के बीच कहां से और कैसे दूरियां शुरू होती हैं और इन दूरियों को पाटने की बजाय खामोशी से इन्हें बढ़ते हुए क्यों देखते रहते हैं? इससे बेकार की चर्चाएं जन्म लेती हैं और इन चर्चाओं से व्यक्ति व व्यक्तित्व अफवाओं के धुएं के घेरे में सिमटता जाता है और लोगों का कहना है कि धुआं वहीं होता है, जहां आग होती है।
अब देखो न अमृता ने अपने एक सहयोगी को कार चलाना सिखाना क्या शुरू किया था कि बातें बननी शुरू हो गईं। यहां तक कि उस समय विश्वविद्यालय के उच्च पद पर बैठे अधिकारी भी अमुक की गर्लफे्रंड कह कर अमृता की बात करने लगे थे पर वह बेफिक्र थी, पूरी तरह। उसके बाल हवा में लहराते रहते, वह यह सब सुन कर बालों की तरह बातों को हवा में लहरा देती। इससे क्या होता है? मैं सिखाती हूं तो किसी को क्या है? यह मेरी जिंदगी है, मुझे इसे जीने का पूरा हक है, किसी को इससे क्या?
इस बेफिक्री के पीछे कहीं यह उम्मीद कायम थी कि उसके पति को इसी विश्वविद्यालय में अच्छा पद मिल जाएगा और वे दोनों इसके लिए पूरी कोशिश में लगे थे। उच्च अधिकारी भी सपने दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे थे। आखिरकार साक्षात्कार रखा गया और अमृता की उम्मीदें आसमान छूने लगीं। उसे लगा कि अब बच्चों को उनके पिता का सहारा और साथ मिल जाएगा। ऐन आखिरी मौके पर यह साक्षात्कार जब रद्द कर दिया गया तब पहली बार अमृता टूट गई और बुरी तरह रो दी, आंसू कि बरबस आ रहे थे। उसके सपने बिखर गए थे। तब भी लगा कि वह पूरे मन से परिवार के प्रति समर्पित है और कहीं से भी उन चर्चाओं व अफवाहों वाली अमृता नहीं है, पर लोगो की जुबान को कौन रोक सका है?
आखिर एक दिन अमृता चली गई। अचानक। किसी और शहर में। जाने से पहले मुलाकात हुई। विदाई सोचकर कांप गया मैं भी। यों शहर और दुनिया बहुत छोटी हो चुकी है, फिर भी विदाई तो विदाई होती है।
क्यों? क्यों जा रही हो इस शहर और इस बसी बसाई दुनिया को छोड़ कर? उसकी मासूम आंखें कुछ देर मेरी ओर ताकती रही। मैं भी खामोशी से जवाब का इंतजार करता रहा। अमृता ने इतना ही कहा कि मैं या आप अपने तरीके से जी सकें, ऐसा मुश्किल है। सीधे-सादे रास्ते में भी कई जगह स्पीड ब्रेकर आ जाते हैं। चर्चाओं को बल मिलता है और वे दूर तलक जाती है। छोटी-छोटी बातें धीरे-धीरे बड़ा रूप ले लेती हैं। मेरी बच्चियां उसी सहयोगी के बच्चों के साथ खेला करती थीं।
एक दिन मेरी बच्ची ने पूछा-मम्मी, उनके पापा आपके फ्रेंड लगते हैं। क्यों, किसने कहा? कॉलोनी में सब बच्चे हमें छेड़ रहे हैं। बस, मैंने समझ लिया कि यह आम रास्ता नहीं है। इसलिए जा रही हूं। नई जगह नया जीवन और नया रास्ता खोजने का प्रयास करूंगी, नई हवा में सांस ले सकूंगी। उसने विदा के लिए हाथ मिलाया। पर उसके फैसले से मैं हिल कर रह गया। एक सवाल भी हवा में उछल गया कि क्या सारी शिक्षा व आधुनिकता के बावजूद औरत को कितनी लक्ष्मण रेखाओं का सामना करना पड़ता है और यह कब तक होता रहेगा।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा- “विकल्प”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 116 ☆
☆ लघुकथा- विकल्प ☆
दिसंबर की ठण्डी रात को अचानक पानी बरसने पर माँ की नींद खुल गई, “तूझे कहा था गेहूँ धो कर छत पर मत सुखा, पर, तू मानती कहाँ हैं।”
” तो क्या करती? इस में धनेरिये पड़ गए थे।”
“अब सारे गेहूँ गीले हो रहे हैं।”
” तो मैं क्या करूँ?” बेटी खीज कर बोली, “मेरा कोई काम आप को पसंद नहीं आता। ऐसा क्यों नहीं करते- मेरा गला घोंट दो। आप को शांति मिल जाएगी।”
” तूझ से बहस करना ही बेकार है,” माँ जोर से बोली। तभी पिता की नींद खुल गई, “अरे भाग्यवान! क्या हुआ ? रात को भी….”
” पानी बरस रहा है। छत पर गेहूँ गीले हो रहे है। इस को कहा था- गेहूँ धो कर मत सूखा, पर यह माने तब ना,” कहते हुए माँ ने वापस अपनी बेटी की बुराई करना शुरू कर दिया।
मगर पिता चुपचाप उठे। बोले, “चल ‘बेटी’! उठ। छत पर चलते हैं,” कहते हुए पिता ने छाता उठा कर खोल लिया।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
संजय दृष्टि – लघुकथा- डर
पिता की खाँसी की आवाज़ सुनकर उसने रेडिओ की आवाज़ बेहद धीमी कर दी। उन दिनों संयुक्त परिवार थे, पुरुष खाँस कर ही भीतर आते ताकि महिलाओं को सूचना मिल जाए।…”संतोष की माँ, ये तुम्हारे लल्ला को बताय देना कि वो आज के बाद उस रघुवंस के आवारा छोकरे के साथ दीख गया तो टाँग तोड़कर घर बिठाय देंगे, कौनो पढ़ाई-वढ़ाई नाय, सब बंद कर देंगे’…. वह मन मसोस कर रह गया। रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचता रहा कि सत्रह बरस का तो हो लिया, अब और कितना बड़ा होना पड़ेगा कि पिता से डरना न पड़े।.. “शायद बेटे का जन्म बाप से डरने के लिए ही होता है” – वह मन ही मन बड़बड़ाया और औंधे होकर सो गया।
आज उसका अपना बेटा पंद्रह बरस का हो चुका। बेहद ज़िद्दी! कल-से उसने घर में कोहराम मचा रखा था। उसे अपने जन्मदिन पर मोटरसाइकिल चाहिए थी और अभी तो उसकी आयु लाइसेंस लेने की भी नहीं हुई थी। ऊपर से शहर का ये विकराल ट्रैैफिक, उसने सोच लिया था कि अबकी बार बेटे की ये ज़िद्द पूरी नहीं करेगा।…”मॉम, डैड को साफ-साफ बता देना, नेक्स्ट वीक मेरे बर्थडे से एक दिन पहले तक बाइक नहीं आई न, तो मैं घर छोड़कर चला जाऊँगा.. और हाँ, कभी वापस नहीं आऊँँगा।”… उसने बेटे की माँ के हाथ में बाइक के लिए चेक दे दिया। रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचता रहा-…”शायद बाप का जन्म बेटे से डरने के लिए ही होता है”- और वह सीधा होकर पीठ के बल सो गया।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(श्री अरुण कुमार डनायक जी महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.
श्री अरुण कुमार डनायक जी ने अपनी सामाजिक सेवा यात्रा को संस्मरणात्मक आलेख के रूप में लिपिबद्ध किया है। आज प्रस्तुत है इस संस्मरणात्मक आलेख श्रृंखला की अगली कड़ी – “चंचल बैगा लड़की”।)
☆ संस्मरण # 111 – चंचल बैगा लड़की – 4 ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆
अनपढ़ आदिवासी कार्तिक राम बैगा और फूलवती बाई की दूसरी संतान के रूप में 02.05.1991 को जन्मी प्रेमवती के पिता को जब पता चला कि समीपस्थ ग्राम लालपुर में कोई बंगाली डाक्टर बैगा बालिकाओं को निशुल्क शिक्षा दे रहे हैं तो वे पत्नी के विरोध के बावजूद उसे भर्ती कराने चले आए। अपने बचपन के दिनों की याद करते हुए प्रेमवती बताती है कि पूरा परिवार अत्यंत गरीब था । माता-पिता दिन भर मजदूरी करते, जंगल लकड़ियाँ फाड़ने जाते और उसे बेचकर जो धन मिलता उससे खंडा अध टुकड़ा व सस्ता चावल खरीदते । इससे बना पेज पीकर पाँच लोगों का परिवार किसी तरह जीवित रहता। यह पेज भी भरपेट नहीं मिलता और कई बार तो तीन चार दिन तक भूखे रहना पड़ता । प्रेमवती और उसके दो भाई आपस में भोजन के लिए लड़ते और अक्सर एक दूसरे के हिस्से का निवाला छीन लेते। अक्सर हम बच्चे रात भर भूख से बिलबिलाते और रोते रहते।
ऐसी विपन्न स्थिति में रहने वाली यह अबोध बालिका जब बिना किसी सामान के 1996 में सेवाश्रम द्वारा संचालित स्कूल में लाई गई, तो माता-पिता से बिछुड़ने का दुख, क्रोध में बदलते देर न लगी और इस आवेश की पहली शिकार बनी बड़ी बहनजी । प्रेमवती बताती है कि उस दिन जब माँ-बाप उसे छोड़कर जाने लगे तो वह उनके पीछे दौड़ी लेकिन बड़ी बहनजी ने उसे पकड़कर अपनी बाहों में संभाल लिया और मैं इतने आवेश में थी कि उनपर अपने हाथ पैर बड़ी देर तक फटकारती रही । बाबूजी ने अतिरिक्त जोड़ी कपड़े, पुस्तकें और बस्ता दिया। धीरे धीरे सभी बच्चों से मैं हिल-मिल गई । लेकिन घर की याद बहुत आती। जब छुट्टियों में घर जाते तो वापस आने को मन न करता । माँ को भी मेरी बहुत याद आती और एक बार वह मुझे आश्रम से बहाना बनाकर घर ले आई । पिताजी को जब इस झूठ के बारे में पता चला तो वह मुझे पुन: स्कूल छोड़ने आए।
प्रेमवती का मन धीरे धीरे पढ़ने में रमने लगा। पढ़ाई के दिनों की याद करते हुए वह बताती है कि बाबूजी शाम को सभी लड़कियों को एकत्रित करके पहाड़े रटवाते थे, उनकी बंगाली मिश्रित टोन से हम लोगों को हंसी आती और लड़कियों को हँसता देख बाबूजी भी मुस्करा देते । जब 2001 में उसने माँ सारदा कन्या विद्यापीठ से पाँचवी की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली तो बाबूजी ने उसका प्रवेश पोड़की स्थित माध्यमिक शाला में करवा दिया । आठवीं पास करने के बाद पिता को यह भान हुआ कि लड़की बड़ी हो गई है और इसका ब्याह कर देना चाहिए। प्रेमवती को अब तक शिक्षा का महत्व समझ में आ चुका था । वह अड गई कि आगे और पढ़ेगी और अपने पैरों पर खड़े होने के बाद शादी करेगी । उसकी इस भावना को सहारा मिला बाबूजी का । उन्होंने उसका प्रवेश भेजरी स्थित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में करवा दिया तथा सेवाश्रम के छात्रावास में ही उसके रहने खाने की व्यवस्था कर दी । वर्ष 2008 में जब कला संकाय के विषय लेकर प्रेमवती ने बारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की तो डाक्टर सरकार ने गुलाबवती बैगा के साथ उसका प्रवेश भी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय के बी ए पाठ्यक्रम में करवा दिया । दुर्भाग्यवश अंतिम वर्ष की परीक्षा के समय वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई और फिर ग्रेजुएट होने का सपना अधूरा ही रह गया।
बाबूजी के विशेष प्रयासों से उसे और उसकी सहपाठी गुलाबवती को वर्ष 2012 में मध्य प्रदेश सरकार ने सीधी नियुक्ति के जरिए प्राथमिक शाला शिक्षक के रूप में चयनित किया। इन दोनों बैगा बालिकाओं की सीधी नियुक्ति का परिणाम यह हुआ कि उसी वर्ष अनेक आदिवासी युवक युवतियाँ शिक्षक बनाए गए । लेकिन उसके बाद राज्य सरकार ने पढे लिखे बैगाओं की कोई सुधि नहीं ली और अब इस आदिम जनजाति के युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं ।
स्नातक युवा एवं फर्रीसेमर गाँव की प्राथमिक शाला में शिक्षक सोन शाह बैगा की पत्नी प्रेमवती स्वयं प्रातमिक विद्यालय अलहवार में शिक्षक है और तीन बच्चों की माँ है । वह परिवार को नियोजित रखना चाहती है तथा अपने सजातीय आदिवासियों को कुरीतियाँ त्यागने, शिक्षित होने की प्रेरणा देती रहती है ।
मैंने प्रेमवती से बैगा आदिवासियों की विपन्नता का कारण जानना चाहा । उसने उत्तर दिया की गरीबी के कारण माता-पिता बच्चों को मजदूरी के लिए विवश कर देते हैं । जब माता पिता जंगल में मजदूरी करने जाते हैं तो बड़े बच्चे छोटे भाई बहनों को संभालते हैं या गाय-बकरियाँ चराते हैं । बालपन से ही मजदूरी को विवश बैगाओं के पिछड़ेपन का अशिक्षा सबसे बड़ा कारण है । शराब पीना तो बैगाओं में बहुत आम चलन है । इस बुराई ने स्त्री और पुरुषों दोनों को जकड़ रखा है । अत्याधिक मदिरापान से उनकी कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है । लेकिन इस बुराई को खत्म करना मुश्किल इसलिए भी है क्योंकि बड़े बुजुर्ग इसे बैगाओं की प्रथा मानते हैं और छोड़ने को तैयार नहीं हैं । प्रेमवती कहती है कि पुरानी परम्पराएं अब धीरे धीरे कम हो रही हैं । नई पीढ़ी की लड़कियां अब गोदना नहीं गुदवाती, शादी विवाह में पारंपरिक गीत संगीत का स्थान अब अन्य लोगों की देखादेखी में डीजे आदि ले रहे हैं । बैगा समाज में स्त्रियों के प्रति सम्मान के भाव और उनको प्रदत्त स्वतंत्रता की प्रेमवती बड़ी प्रसंशक है । लड़की वर का चुनाव स्वयं करती है और वर पक्ष के लोग तीज त्योहार पर अक्सर कन्या को अपने घर बुलाते हैं। ऐसा तब तक होता जब तक वर वधू विवाह के बंधन में नहीं बंध जाते। वह बताती है कि विधवा को पुनर्विवाह का अधिकार है ।
मैंने प्रेमवती के बालपन की यादों को कुरेदने का प्रयास किया । उसे आज भी नवाखवाई की याद है । वह बताती है कि जब खीरा, कोदो, कुटकी, धान मक्का आदि की नई फसल घर आ जाती तो उसे सबसे पहले ग्राम के देवी देवताओं को अर्पित किया जाता और उसके बाद ही ने अनाज का हम लोग सेवन करते थे । इन्ही दिनों सारे बच्चे एक खेल गेंडी खेलते थे । लाठी में अंगूठे को फसाने के लिए जगह बनाकर उसपर चढ़ जाते और घर घर गाते हुए जाते थे । घर के लोग उन्हे नेंग में अनाज देते और फिर सभी बालक अपनी अपनी गेंडी पर चढ़े चढ़े पास के किसी नाले के समीप जा प्रसाद चढ़ाते और गेंडियों को नदी में सिरा देते हैं ।
प्रेमवती के पास स्कूल और गाँव की यादों का पिटारा है और उससे वार्तालाप करते ऐसा नहीं लगता कि यह नवयुवती विपन्न आदिम जन जाति में जन्मी है, अच्छी शिक्षा का यही प्रभाव है ।
(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। आज से प्रस्तुत है आपके कांकेर पदस्थापना के दौरान प्राप्त अनुभवों एवं परिकल्पना में उपजे पात्र पर आधारित श्रृंखला “आत्मलोचन “।)
☆ कथा कहानी # 34 – आत्मलोचन– भाग – 4 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆
आत्मलोचन जी का प्रशासनिक कार्यकाल धीरे धीरे गति पकड़ रहा था. इसी दौरान जिला मुख्यालय के नगरनिगम अध्यक्ष की बेटी के विवाह पर आयोजित प्रीतिभोज के लिये स्वंय अध्यक्ष महोदय कलेक्टर साहब के चैंबर में पधारे और परिवार सहित कार्यक्रम को अपनी उपस्थिति से गौरवान्वित करने का निवेदन किया. यह कोरोनाकाल के पहले की घटना है पर फिर भी अतिमहत्वपूर्ण व्यक्तियों के आगमन की संभावना को देखते हुये सीमित संख्या में ही आमंत्रण भेजे गये थे. नगर के लगभग सभी राजनैतिक दलों के सिर्फ वरिष्ठ नेतागण और उच्च श्रेणी के प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा परिजनों की संख्या भी सीमित थी. पर सीमित मेहमानों के बीच में भी सबसे ज्यादा ध्यानाकर्षित करने वाले विशिष्ट अतिथि थे प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री जो महापौर की पार्टी के ही वरिष्ठ राजनेता थे.
राजनीति में आने के पूर्व वे संयुक्त मध्यप्रदेश के दो बड़े जिलों के कलेक्टर रह चुके थे और सिविल सर्विस को त्याग कर राजनीति में प्रवेश किया था. यहां भी मुख्य मंत्री का पद सुशोभित कर चुके थे और अपने दल के संख्या बल में पिछड़ने के कारण विपक्ष की शमा को रोशन कर रहे थे. विधाता दोनों हाथों से गुडलक और सफलता किसी को नहीं देता, यही ईश्वरीय विधान है. एक भयंकर कार एक्सीडेंट में जान तो बच गई पर क्षतिग्रस्त बैकबोन ने हमेशा के लिये व्हीलचेयर पर विराजित कर दिया. जो कभी अपनी पार्टी के प्रदेश स्तरीय बैकबोन थे अब स्वयं बैकबोन के जख्मों के शिकार बन कर उठने बैठने की क्षमता खो चुके थे. पर ये विकलांगता सिर्फ शारीरिक थी, मस्तिष्क की उर्वरता और आत्मविश्वास की अकूट संपदा से न केवल विरोधी दल बल्कि खुद की पार्टी के नेता भी खौफ खाते थे.संपूर्ण प्रदेश के महत्वपूर्ण व्यक्ति और घटनायें उनकी मैमोरी की हार्डडिस्क में हमेशा एक क्लिक पर हाज़िर हो जाती थीं.
आत्मलोचन तो उनके सामने बहुत जूनियर थे पर उनकी विशिष्ट कुर्सी की आदत के किस्से उन तक पहुँच ही जाते थे क्योंकि उनका जनसंपर्क और सूचनातंत्र मुख्यमंत्री से भी ज्यादा तगड़ा था. कार्यक्रम में भोजन उपरांत उन्होंने स्वंय अपने चिरसेवक के माध्यम से कलेक्टर साहब को बुलाया और औपचारिक परिचय के बाद जिले के संबंध में भी चर्चा की. फिर चर्चा को हास्यात्मक मोड़ देते हुये बात उस प्वाइंट पर ले गये जहां वो चाहते थे.
“आत्मलोचन जी जिस पद पर आप हैं वह तो खुद ही पॉवर को रिप्रसेंट करती है, आप तो जिले के राज़ा समझे जाते हैं फिर उस पर भी विशिष्ट कुर्सी का मोह क्यों. आप तो अभी अभी आये हैं पर मैने तो कई साल पहले दो महत्वपूर्ण जिलों में आपके जैसे पद पर कार्य किया, जो थी जैसी थी पर कुर्सी तो कुर्सी होती है. पावर की मेरी महत्वाकांक्षा तो इस कुर्सी के क्षेत्रफल में सीमित नहीं हो पा रही थी तो मैं ने राजनीति में प्रवेश किया और वह कुर्सी पाई जो लोगों के सपने में आती है याने चीफमिनिस्टर की. पर सत्ता तो चंचल होती है हमेशा नहीं टिक पाती.आज जिस कुर्सी पर बैठ कर मैं तुमसे बात कर रहा हूं वह भी पावरड्रिवन है पर ये साईन्स के करिश्में याने बैटरी से चलती है पर एक बात की गठान बांध लो , कुर्सी नहीं उस पर बैठा व्यक्ति महत्वपूर्ण है और साथ ही महत्वपूर्ण है वह नेटवर्क जो जितना मजबूत होता है, व्यक्ति उतना ही कामयाब होता है चाहे वह क्षेत्र राजनीति का हो, सिविल सर्विस का हो या फिर परिवार का.”
बात बहुत गहरी थी, आत्मलोचन बहुत जूनियर तो पूरा समझ नहीं पाये, प्रतिभा और जोश तो था पर अनुभव कम था. शायद यही बात उनका भाग्य उन्हें किसी और ही तरीके से समझाने वाला था.
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ कथा कहानी ☆ हिस्सेदार…! ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
ड्राइंग रूम में पैर रखते ही हमें यह अहसास हो गया था कि इस समय वहां पहुंच कर बहुत बड़ी गलती की है । पहले ही उनके यहां कुछ मेहमान आए हुए थे । अभी वे उनसे फुरसत नहीं पा सके थे कि हम पहुंच गये । हम यानी मैं और मेरी पत्नी । इस पर हमारे मेजबान थोड़ा सकपकाये , कुछ हम सकुचाये और फिर कभी आएंगे कह कर लौटने लगे , यह हमारे मेजबान को गवारा न हुआ । उनके आतिथ्य भाव को ठेस न पहुंचे , इसलिए हमें न चाहते भी रुकना पड़ा ।
इसके बावजूद हवा जैसे रुकी हुई थी और अंदर ही अंदर यह बात खाये जा रही थी कि हम यहां रुक कर गलती कर रहे हैं । कहीं शायद उनके निजी जीवन में अनचाहे झांकने का अपराध कर रहे हैं । मेज़बान ने औपचारिकता के नाते दूसरे मेहमानों से हमारा परिचय करवाया । नौकर को पहले पानी लाने और फिर चाय बनाने का आदेश देकर मानो हमारे पांवों में प्यार भरी बेड़ियां डाल दीं । अब वहां बैठे रहने के सिवाय दूसरा कोई चारा न था ।
इस तरह से जहां से बातों का सिलसिला छूटा था , वहीं से पकड़ कर वे शुरू हो गये । शायद वे यह भूल ही गये कि हम उनके ड्राइंग रूम में मौजूद हैं भी या नहीं । इसी बीच उनके ड्राइंग रूम को निहारने का हमें अवसर मिल गया । बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया हुआ था । कहीं एक दूसरे को काटती हुईं तलवारें तो कहीं छोटी सी , प्यारी सी तोप । कहीं गरजता हुआ वनराज तो कहीं शिकारी का हंटर लटक रहा था । ऐसे लगता था कि हमारे मेजबान को शिकार का खूब शौक है । या वे वीर रस से अपने आपको सराबोर रखते हैं ।
ड्राइंग रूम में बड़े बड़े विशिष्ट व्यक्तियों के साथ मेजबान के विभिन्न अवसरों पर खींचे गये फोटोज हमारे मन पर उनके व्यक्तित्व की छाप छोड़ने में पूरी तरह सब हो रहे थे कि ऐसे व्यक्तित्व के इतने निकट होने पर भी हम उनसे अंतरंग होकर पहले मिलने क्यों नहीं आए ? उन्हीं चित्रों के बीच एक चित्र को देखते हुए हमारे मेज़बान ने जैसे हमारी चोरी पकड़ ली थी । हमारे मेज़बान के चेहरे पर चमक आ गयी थी । इसी जोश में भरे वे एक पिता बन गये थे और बताने लगे थे -यह हमारा बेटा है , एक आर्मी ऑफिसर । ये जो हमारे अतिथि हैं , ये हमारे बेटे के होने वाले सास ससुर हैं । आप लोग बड़े शुभ अवसर पर पधारे हैं । आज ये शगुन देने आए हैं बेटे के लिए ।
हमने फिर औपचारिकता निभाते हुए कहा कि आप लोगों से मिल कर बहुत खुशी हुई और इस अवसर पर तो और भी ज्यादा । तभी हमारा ध्यान कोने में रखी डाइनिंग टेबल पर गया था जो रंगीन कागज़ों में लिपटी फलों को टोकरियों व मिठाइयों के डिब्बों से भरी पड़ी थी । इस स्थिति में मैं मन ही मन हैरान परेशान हो रहा था कि यह कैसा शुभ अवसर है जिसमें अपने निकट संबंधी तक आमंत्रित नहीं हैं । इस शुभ अवसर पर घर की हवा में इतना भारीपन क्यों है ? खुशी की चिड़िया कहीं फुदक क्यों नहीं रही या चहक क्यों नहीं रही ?
हमारे मेजबान अपने बेटे के गुणों का बखान करते चले जा रहे थे और अब तक आए रिश्तों का जिक्र भी करते जा रहे थे । बिना देखे उनका बेटा हमारी ही नहीं , बल्कि भावी सास ससुर की नज़रों में बहुत ऊंचा उठ गया था । सास बोली थी -हमारी बेटी भी कम नहीं । लैक्चरार है , हमें खुशी है कि यह खूबसूरत जोड़ी बनने छा रही है आज । इस तरह कहते हुए लड़की की मम्मी ने रेशमी धागे से बंधे एक लिफाफे को अपनी समधिन के हाथों में सौंप दिया और गले मिल कर रिश्ता तय होने को घोषणा कर दी । ड्राइंग रूम में बैठे बाकी लोगों ने तालियां बजा कर इसका स्वागत् किया ।
हमने समझा कि शगुन की रस्म पूरी हो गयी पर यह तो हमारी नासमझी थी । इसके सिवा कुछ नहीं । यह तो औपचारिक शगुन था । अब अनौपचारिक कार्रवाई शुरू हुई । अब हमारे मेजबान ने जेब से एक लिस्ट निकाल कर उनसे यह जानना शुरू किया कि वे शादी में क्या क्या देंगे या देने जा रहे हैं । क्या क्या नहीं देंगे । उनके विशिष्ट अतिथियों की बारात को वे क्या क्या परोसेंगे ? यानी मीनू तक । यह मीनू एक दूसरी लिस्ट में तय किया गया ।
अब ड्राइंग रूम में सजावट के लिए लगाई गयीं तलवारें , बंदूकें और हंटर मानो सजीव हो उठे थे और देखते देखते हमारे मेजबान ने शिकार करना शुरू कर दिया था । लड़की के पिता ने हार रहे सेनापति की तरह संधि की एक एक शर्त सिर झुकाये किसी बलि के बकरे की तरह स्वीकार कर ली थी । हम चुपचाप देखते रह गये शिकार होते।
कई बार जहां हम बैठे होते हैं , हम वहीं नहीं रह जाते । कहीं और पहुंच जाते हैं । यही मेरा साथ हुआ । मैं कैसे वहां बैठे बैठे अपने बचपन के एक दृश्य में खो गया । हमारा घर बीच मोहल्ले में पड़ता था । शादी ब्याह के दिनों में एक दो कमरे जरूरत के लिए हमसे ले लिए जाते थे । हमारे उन कमरों में खूब सारा नया नया सामान सजाया गया था। मुहल्ले भर की औरतों को न्यौता दिया गया था । भीड़ जुट गयी थी । एक बार मैं अपनी दादी के साथ उसी भीड़ में खड़ा था । वहां दिखाया जा रहा था वह सामान । इतने बिस्तर , इतनी पेटी , यह पंखा , साइकिल , ये मेज़ कुर्सियां और वगैरह वगैरह ।
मैंने दादी से पूछा था -क्या यह कमरा आपने किसी दुकान के लिए किराये पर दे दिया ?
आसपास खड़ी सभी महिलाएं मेरी नादानी पर हंस दी थीं , खूब खिलखिला कर ।
-अरे मुन्ने । यह तो दहेज में दी जाने वाली चीज़ें हैं ।
उस उम्र में दहेज तो नहीं जान पाया पर वह कमरे का दृश्य सदा सदा के लिए मन के किसी कोने में अटका रह गया ।
फिर वहीं बैठे बैठे दृश्य बदला । इस बार अपने मात्र के छोटे भाई के विवाह के शगुन में शामिल होने क्या था । वहां खूब धूम धड़ाके के बीच शगुन की रस्म पूरी हुई थी । इस फार रंगीन टीवी व मोटरसाइकिल सबके बीच उपहार कह कर भेंट किए गये थे । मैं वहां बड़ी घुटन महसूस करने लगा था और जल्द खिसकने की कोशिश में था कि मित्र ने कहा था-भई यह शुभ अवसर है । जल्दी क्या है ? आज कुछ देर पहले घटित हुए दृश्य से क्या मैं अपने आपको अलग कर सकता हूं ? मेरी आत्मा मुझे धिक्कारते हुए कहती है -नहीं । तुम इस दृश्य से अलग नहीं बल्कि तुमने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है इसमें । फिर जैसे जज फैसला सुनाता है -गवाहों और बयानात के आधार पर मेरी आत्मा कहती है कि तुम्हें मुजरिम ठहराया जाता है । तुम इस पाप में बराबर के हिस्सेदार हो । समाज तुम्हे कभी माफ नहीं करेगा ।
अभी सोफे पर नोटों की गड्डियों का लिफाफा पड़ा है -मुंह चिढ़ाता हुआ ।
बाहर मेजबान अपने नये सगे संबंधियों को विदा कर रहे हैं । ठहाकों की गूंज दूर से सुनाई दे रही है । यह दूसरी बात है कि जवाब में ठहाके सुनाई नहीं दे रहे ।
मेहमानों को विदा कर मेजबान व उनकी पत्नी और बेटी लौट आए हें । उनके चेहरे खिले हुए हैं । शिकार की सफलता के चलते ।
वे हमारी ओर मुखातिब होते हैं -आप बडे ही शुभ अवसर पर हमारे घर पधारे । क्यों न चाय का एक एक प्याला और हो जाये ?
हमने माफी मांगते हुए चलने की अनुमति मांगी और वहां से चलने से लेकर अब तक मन में यह मलाल है कि उस दिन वहां क्यों गये थे हम ? एक गुनाह में हिस्सेदार होने के लिए ? यह बोझ हम आज तक उठिए घूम रहे हैं उस दिन से ।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सम्मान के पर्याय पानी पर आधारित एक अतिसुन्दर लघुकथा “पानी का स्वाद…”। )
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 125☆
☆ लघुकथा – 🌨️पानी का स्वाद 🌨️ ☆
गर्मी की तेज तफन, पानी के लिए त्राहि-त्राहि। सेठ त्रिलोकी चंद के घर के आसपास, सभी तरह के लोग निवास करते थे। परंतु किसी की हिम्मत उसके घर आने जाने की नहीं थी, क्योंकि वह अपने आप को बहुत ही अमीर समझता था।
सारी सुख सुविधा होने के बाद भी त्रिलोकी चंद मन से बहुत ही अवसाद ग्रस्त था, क्योंकि सारी जिंदगी उसने अपने से छोटे तबके वालों को हमेशा नीचा दिखाते अपना समय निकाला था।
उसके घर के पास एक किराये के मकान में बिटिया तुलसी अपनी माँ के साथ रहती थी।
गरीबी की मार से दोनों बहुत ही परेशान थे। माँ मिट्टी, रेत उठाने का काम कर करती और बिटिया घर का काम संभाल रखी थी।
गर्मी की वजह से नल में पानी नहीं आ रहा था और मोहल्ले में पानी की बहुत परेशानी थी। मोहल्ले वाले सभी कहने लगी कि शायद त्रिलोकी चंद के यहाँ जाने से सब को पीने का पानी मिल जाएगा।
उसने पानी तो दिया परंतु सभी से पैसा ले लिया। जरुरत के हिसाब से सभी अपनी अपनी हैसियत से पानी खरीद रहे थे। सभी के मन से आह निकल रही थी।
कुछ दिनों बाद सब ठीक हुआ मोहल्ले में पानी की व्यवस्था हो गई। सब कुछ सामान्य हो गया।
आज त्रिलोकी चंद अपने घर के दालान दरवाजे के पास कुर्सी लगा बैठा था।
तुलसी माँ के काम में जाने के बाद पानी के भरें घड़े को लेकर आ रही थी। उसके चेहरे पर पसीने और पानी की धार एक समान दिख रही थी।
ज्यों ही वह त्रिलोकी चंद के घर के पास पहुंची वह देख रही थी कि अचानक वह कुर्सी से गिर पड़े।
परिवार के सभी सदस्य घर के अंदर थे। तुलसी को कुछ समझ में नहीं आया फिर भी हिम्मत करके घड़े का पानी त्रिलोकी चंद के चेहरे और शरीर पर डाल दिया। पास में रखे गिलास से उसने पानी पिलाया। त्रिलोकी चंद पानी पी कर बहुत खुश हुआ और उसे आराम लगा।
आज उसे पानी से स्वाद मिला। और उसकी आँखें भर आई। और उसे समझ आया कि मेहनत का पानी मीठा होता है।
घर के सभी सदस्य बाहर निकल कर तुलसी को डांटने लगे कि “तुमने कहां का पानी पापा को पिला दिया।”परंतु त्रिलोकी चंद को जैसे मन से भारी बोझ हट गया हो। उसे असीम शांति मिली। आज वह पानी में स्वाद होता है ऐसा कह कर तुलसी के सर पर हाथ रखा।
मोहल्ले वाले कभी सपने में नहीं सोचते थे कि अपने घर के बाहर दरवाजे के पास पानी की व्यवस्था कर सभी को पानी लेने के लिए कहेगा।
परंतु यह सब काम उसने किया।
त्रिलोकी चंद की जय जयकार होने लगी। वह समझ चुका था….
(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है।
अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”)
☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #92 जीभ का रस ☆ श्री आशीष कुमार☆
एक बूढ़ा राहगीर थक कर कहीं टिकने का स्थान खोजने लगा। एक महिला ने उसे अपने बाड़े में ठहरने का स्थान बता दिया। बूढ़ा वहीं चैन से सो गया। सुबह उठने पर उसने आगे चलने से पूर्व सोचा कि यह अच्छी जगह है, यहीं पर खिचड़ी पका ली जाए और फिर उसे खाकर आगे का सफर किया जाए। बूढ़े ने वहीं पड़ी सूखी लकड़ियां इकठ्ठा कीं और ईंटों का चूल्हा बनाकर खिचड़ी पकाने लगा। बटलोई उसने उसी महिला से मांग ली।
बूढ़े राहगीर ने महिला का ध्यान बंटाते हुए कहा, ‘एक बात कहूं.? बाड़े का दरवाजा कम चौड़ा है। अगर सामने वाली मोटी भैंस मर जाए तो फिर उसे उठाकर बाहर कैसे ले जाया जाएगा.?’ महिला को इस व्यर्थ की कड़वी बात का बुरा तो लगा, पर वह यह सोचकर चुप रह गई कि बुजुर्ग है और फिर कुछ देर बाद जाने ही वाला है, इसके मुंह क्यों लगा जाए।
उधर चूल्हे पर चढ़ी खिचड़ी आधी ही पक पाई थी कि वह महिला किसी काम से बाड़े से होकर गुजरी। इस बार बूढ़ा फिर उससे बोला: ‘तुम्हारे हाथों का चूड़ा बहुत कीमती लगता है। यदि तुम विधवा हो गईं तो इसे तोड़ना पड़ेगा। ऐसे तो बहुत नुकसान हो जाएगा.?’
इस बार महिला से सहा न गया। वह भागती हुई आई और उसने बुड्ढे के गमछे में अधपकी खिचड़ी उलट दी। चूल्हे की आग पर पानी डाल दिया। अपनी बटलोई छीन ली और बुड्ढे को धक्के देकर निकाल दिया।
तब बुड्ढे को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने माफी मांगी और आगे बढ़ गया। उसके गमछे से अधपकी खिचड़ी का पानी टपकता रहा और सारे कपड़े उससे खराब होते रहे। रास्ते में लोगों ने पूछा, ‘यह सब क्या है.?’ बूढ़े ने कहा, ‘यह मेरी जीभ का रस टपका है, जिसने पहले तिरस्कार कराया और अब हंसी उड़वा रहा है।’
शिक्षा:- तात्पर्य यह है के पहले तोलें फिर बोलें। चाहे कम बोलें मगर जितना भी बोलें, मधुर बोलें और सोच समझ कर बोलें।
(श्री घनश्याम अग्रवाल जी वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि हैं. आज प्रस्तुत है आपकीअत्यंत विचारणीय दो लघुकथाएं – “विश्व विवशता दिवस” – [1] सिलेक्शन [2] औरत का गहना)
☆ कथा-कहानी ☆ लघुकथाएं – “विश्व विवशता दिवस” – [1] सिलेक्शन [2] औरत का गहना ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆
आज विश्व विवशता दिवस है? मुझे पता नहीं। होता भी है या नहीं, में नहीं जानता। हाँ, इतना अवश्य जानता हूँ कि जब विश्व में ऐसी विवशताएँ हैं, तो हम सभ्य हैं, विकसित हैं, आदमी हैं, ये भ्रम टूट जाता है।
तो फिर पढ़िए, ऐसी ही दो विवश लघुकथाएं:-
[1] सिलेक्शन
वह हर सवाल का जबाव देता था सिर्फ एक सवाल को छोड़कर, और वह सवाल होता था, “यदि तुम्हारा सिलेक्शन होता है तो बदले में तुम हमें क्या दोगे ? “इस सवाल पर वह हमेशा चुप रह जाता। खाली पेट और खाली जेब लिए लौट आता।
आज भी वह थका-हारा, निराश, बोझिल कदमों से अपने ख्यालों में खोया चला जा रहा था। उसे अपनी बीमार माँ और ब्याह लायक बहन याद आ रही थी। वह खुद भी दो दिन से भूखा था। सूर्य अभी अस्त नहीं हुआ था, लेकिन उसकी आँखों के आगे अँधेरा-सा छाने लगा। तेजी से आती हुई एक कार से वह अचानक टकरा गया। उसके मुँह से एक चीख निकल पड़ी। लोग जमा हो गए। असहनीय वेदना और नीम बेहोशी में उसने देखा, उसकी एक टाँग बुरी तरह टूट गई थी।
“अरे, इसे अस्पताल ले चलो,” भीड़ मे से कोई बोला।
“नहीं-नहीं, मुझे अस्पताल मत ले चलिए”, कराहते हुए उसने कहा।
“देखो, तुम्हारी टाँग टूट चुकी है। हम अस्पताल ले चलते हैं। घबराओ मत, अस्पताल का सारा खर्च मैं दूँगा।” कारवाले ने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा।
“प्लीज़, मुझे अस्पताल मत ले चलिए।” कुछ संयत हो हाथ जोड़ते हुए वह पुनः बोला- “मैं सात साल से बेकार हूँ। मुझे नौकरी तो नहीं मिलेगी। पर हाँ, टाँग टूटने से भीख तो मिल सकती है। ” कहते हुए उसने जेब से अपनी डिग्री निकाली। उसके टुकड़े-टुकड़े कर हवा में उछालते हुए, अपनी हथेली लोगों के सामने फैला दी। हथेली पर कुछ सिक्के जमा हो गए। उसने एक क्षण अपनी हथेली को और दूसरे क्षण अपनी कटी हुई टाँग को देखा। उसे लगा यह उसका एक सौ छत्तीसवाँ इंटरव्यू है, जिसमें उसने उस सवाल का भी जवाब दे दिया है : ” अगर तुम्हारा सिलेक्शन होता है तो बदले में तुम हमें क्या दोगे?”
“अपनी टाँग।” एक दर्दभरी मुस्कान के साथ वह बुदबुदा उठा।
और इस बार उसका सिलेक्शन हो गया, एक भिखारी की पोस्ट के लिए।
[2] औरत का गहना
इदरिस बहुत बीमार था। पाँच बच्चों का बोझ ढोते-ढोते उसे पता ही नहीं चला, कब मामूली खाँसी धीरे-धीरे उसकी साँसों में समा गई।
अबकि बार खाँसी का दौरा उठा तो नूरा काँप गई। उसे प्राइवेट डाक्टर को बुलाना ही होगा, मगर उसकी फीस ? अचानक उसकी निगाह उँगली में पड़े पुराने चाँदी के छल्लों पर गई। ये छल्ले इदरिस ने उसे सुहागरात को दिए थे। कहा था- “नूरा, ये मेरे प्यार की निशानी है, इन्हें कभी जुदा मत करना।” जब देनेवाला ही जुदा हो जाए तो ये किस काम के।
थोड़ी देर बाद नूरा की उँगली में छल्लों की जगह सौ-सो के दो नोट थे। एक घंटे बाद डाक्टर ने ये नोट लेते हुए कहा- “तुमने बहुत देर दी, खुदा पर भरोसा रखो।”
डाक्टर के जाते ही नूरा इदरिस के पास आकर उसकी छाती सहलाने लगी। इदरिस का ध्यान उसकी उँगली पर गया। वह बोला-” अरे, तुम्हारे छल्लों का क्या हुआ,? लगता है, तुमने बेच दिए। ले-दे के यही तो एक गहना था तुम्हारे पास।”
“ये क्या कहते हैं आप? हया औरत का सबसे बड़ा गहना होता है, और फिर गहने मुसीबत के वक्त ही तो बेचे जाते हैं, अच्छे हो जाना, फिर आ जाएँगे।”
इदरिस न अच्छा हो सकता था और न हुआ।
इदरिस के चले जाने के बाद नूरा टूट गई। जब घर के डिब्बे खाली हों तो पेट कैसे भर सकता है! नूरा सोचती ही रही, न जाने कब हारून बड़ा होगा, अभी तो बारह बरस का ही है। जमीला भी तो सयानी हो गई। जवानी गरीबी-अमीरी कुछ नहीं देखती, बस चढ़ी ही चली जाती है। इदरिस था तो आधा पेट तो भर जाता था, अब उसके भी लाले पड़ गए। इदरिस का खयाल आते ही उसे हारून याद आया।
एक दिन हारून को हल्का-सा बुखार हो आया, साथ ही कुछ खाँसी भी। नूरा ने गौर से देखा, न केवल हारून का चेहरा, बल्कि उसकी खाँसी भी इदरिस से मिलती-जुलती है। उसके कानों में प्राइवेट डाक्टर के शब्द गूँज उठे- “तुमने बहुत देर कर दी।”
“या अल्लाह, रहम कर मेरे हारून पर। ” नूरा बुदबुदा उठी। अपनी उँगलियों को देखकर बोली-” अब तो छल्ले भी नहीं है, समझ में नहीं आता, क्या करूँ?”
“तू फिक्र मत कर अम्मा, अब देर नहीं होगी।प्राइवेट डाक्टर जरूर आयेगा।” जमीला ने अम्मा को हिम्मत दी।
शाम को डाक्टर आया। सूई लगाते बोला- “घबराने की कोई बात नहीं। मै ठीक वक्त पर आ गया। ये जल्दी ठीक हो जायेगा। “जमीला ने डाक्टर को फीस दी। हारून के लिए फल भी लायी। डाक्टर के जाते ही नूरा ने पूछा – “अरी जमीला, मैं पूछती हूँ, ये फीस, ये दवा, ये फल, तू पैसे कहाँ से लायी?”
“अम्मा, मुझे कुछ काम मिल गया था।” यह कह जमीला औंधी पड़ सुबकने लगी। उसे नूरा के शब्द याद आए -” हया औरत का सबसे बड़ा गहना होता है, और फिर गहने मुसीबत के वक्त ही तो बेचे जाते हैं।”